शून्य

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'धरा' पर भी रहकर हमनें देखे सपनें सुहाने हैं ; असम्भव को भी सम्भव कर दिखाने हैं ; उम्मीदों में हम हमेशा 'शून्य' को रखते हैं; छोड़ दिया बहुत पहले ही कुछ पास रखना ; इसलिए अक्सर खुशियाँ हम बाँट दिया करते हैं; दौलत-शोहरत की ख्वाहिंश भी नहीं रखते ; बस दुआओं की चाहत होती हैं आपसे ; वहीं पहुँचनें के लिए जहाँ मनुष्य कोई पीड़ित हो और मैं उनके काम आ सकूँ ।