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अयं
सर्व० [सं० अयम्] यह । उ०—दुई दंड भरि ब्रह्माड भीतर काम कृत कौतुक अयं ।—मानस । १ ।८५ ।

अयंत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं० अयन्त्र] १. वह जो वश या नियंत्रण में न हो । १. यंत्र का अभाव । ३. अनियंत्रण । नियंत्रण का अभाव [को०] ।

अयंत्र (२)
वि० अनियंत्रित । अवशीकृत [को०] ।

अयंत्रित
वि० [सं० अयन्त्रित] १. जो यंत्रित या वशीकृत न हो स्वेच्छाचारी ।

अयः
संज्ञा पुं० [सं०] अयस् (लोहा) का समासगत रूप ।

अयःपान
संज्ञा पुं० [सं०] भागनत के अनुसार एक नरक का नाम ।

अयःपिंड
संज्ञा पुं० [सं० अय? पिण्ड] लोहे का गोला । लौहपिंड [को०] ।

अयःशंकु
संज्ञा पुं० [सं० अयः शङ्कु] १. नेजा । भला । २. लोहे की कील । अँटी [को०] ।

अयःशय
वि० [सं०] लोहे में रहनेवाला (अग्नि) [को०] ।

अयःशूल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक अस्त्र । तीव्र उपपात । तीक्ष्ण उपाय ।

अयःशोभो
वि० [अयःशोभिन्] सौभाग्य से दिप्त [को०] ।

अय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. गमन । जाना । गति । २. अच्छा भाग्य । शुभविवाह विधि । अभ्युदय । ३. पासा । अक्ष । ४. शुभ कार्य । मगल कृप [को०] । यौ०—अयवान् अयान्वित=भाग्यवान् ।

अय (२)
संज्ञा पुं० [सं० अयस्] १. लोहा । उ०—सुमग सकल सुठि चंचल करनी । अय इव जरत धरत पग धरनी ।—मानस, १ ।२९८ । २. इस्पात । शुद्ध लोहा [को०] । ३. अस्त्र शस्त्र । हथियार । ४. अग्नि । ५. कोई धातु [को०] । ६. स्वर्ण [को०] ।

अय (३)
अव्य [सं० अयि] संबोधन का शब्द । हे । विशेष—वह अधइकतर 'ए' लिखआ जाता है ।

अयक्ष्म
वि० [सं० अपक्ष्मन्] १. नीरोग । रोगरहित । २. निरुपद्रव । बाधाशून्य ।

अयजनीय
वि० [सं०] जो यज्ञ में पूजा या आदर के अयोग्य हो । अपूज्य । २. निंदित ।

अयज्ञ
वि० [वि०] १. यज्ञ न करनेवाला । २. यज्ञ न हो [को०] ।

अयज्ञक
वि० [सं०] जो यज्ञ के लिये अनुपयुक्ति हो [को०] ।

अयज्ञिय
वि० [सं०] १. जो यज्ञ के काम में न लाया जाता हो । २. जो यज्ञ में न दिया जाता हो । ३ अपवित्र । अशुद्ध । ४. यज्ञ करने के अयोग्य । जो शास्त्र के अनुसार यज्ञ करने का अधि— कारी न हो ।

अयज्ञीय
वि० [सं०] दे० 'अयज्ञित' [को०] ।

अयत
वि० [सं०] उच्छृखल । स्वेच्छाचारी । जो संयत न हो [को०] ।

अयति
वि० [सं०] उद्योगहीन । यत्न न करनेवाला [को०] ।

अयती
वि० [सं० अ + यतिन्] जो यकी या जितोंद्रिय न हो । इंद्रियों के वश में रहनेवाला [को०] ।

अयतोंद्रिय
वि० [सं० अयतेनिद्रय] १. जो इंद्रियों का संयम न कर सके । इंद्रियनिग्रह न करनेवाला । २. ब्रह्मचर्यभ्रष्ट । ३. चंचलोंद्रिय । इंद्रिय विलुप ।

अयत्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] यत्न का अभाव । उद्योगशून्यता ।

अयत्न (२)
वि० यत्नशून्य । उद्योगहीन । यौ०—अयत्नसिद्ध=अयत्नसाध्य । जो बिना प्रयास हो जाय ।

अयत्नकृत्
वि० [सं०] बिना प्रयास के होनेवाला । सरलता से पूर्ण होनेवाला [को०] ।

अयत्नज
वि० [सं०] स्वतः हो जानेवाला । आसानी से होने वाला [को०] ।

अयत्नलभ्य
वि० [सं०] बिना प्रयास के प्राप्त होने योग्य [को०] ।

अयथा (१)
वि० [सं०] १. मिथ्याभूत । झूठ । अतथ्य । २. अयोग्य ।

अयथा (२)
अव्य० गलत ढंग से । अनुचित रूप से [को०] ।

अयथा (३)
संज्ञा पुं० १. किसी काम को विधि के अनुसार न करना । विधिविरुद्ध कर्म । अनुचित काम ।

अयथातथ (१)
वि० [सं०] अयथाथै । विरुद्ध । विपरीत । ययायोग्य नहीं ।

अयथातथ (२)
संज्ञा पुं० विपरीत या अयोग्य कार्य [को०] ।

अयथातथ्य
संज्ञा पुं० [सं०] अयोग्यता । अनुपयुक्तता । व्यर्थता अयथार्थता [को०] ।

अयथाद्योतन
संज्ञा पुं० [सं०] अप्रत्याशित घटना घटित होना [को०] ।

अयथापूर्व
वि० [सं०] जो पूर्ववत् नहो । जो पहले जैसा न हो ।

अयथामुखीन
वि० [सं०] जिसका व्यवहार पहले जैसा न हो । जिसने मुँह फेर लिया हो [को०] ।

अयथावृत्त
वि० [सं०] अनुचित या गलत ढंग से काम करनेवाला ।

अयथास्थित
वि० [सं०] जो बेढंगेपन से रखा गया । अव्यय- स्थित [को०] ।

अयथार्थ
वि० [सं०] १. जो यथार्थ न हो । निथ्या । असत्य । २. जो ठीक न हो । अनुचित । अनुपयुक्त । यौ.—अयथार्थज्ञान=मिथ्या ज्ञान । झुठा ज्ञान । भ्रम ।

अयथावत्
वि० [सं०] अनुचित ढंग या गलत तरीके से [को०] ।

अयथेष्ट
वि० [सं०] १. जो यथेष्ट या संतोषजनक नहो । २. इच्छा के विपरीत हो [को०] ।

अयथोचित
वि० [सं०] १. जो समुचित या मुनासिब न हो । ३. अयोग्य [को०] ।

अयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. गति । चाल । २. सूर्य या चंद्रमा की दक्षिण से उत्तर या उत्तर से दक्षिण की गति या प्रवृत्ति जिसको उत्तरायण और दक्षिणयन कहते हैं । बारह राशिचक का आधा । विशेष—मकर से मिथुन तक छह राशियों को उत्तरायण कहते हैं । कवोंकि इसमें स्यित पूर्य या चंद्र पूर्व से पश्चिम को जाते हुए भी क्रम से कुछ कुछ उत्तर को भुकते जाते हैं । ऐसे ही कर्क से धनु की संक्रांति तक जव सुर्य या चंद्र की गति दक्षिण की ओर झुकी हुई दिखाई देती है तब दक्षिणायन होता है । ३. राशिचक्र की गति । विशेष—ज्योतिषशास्व के अनुसार यह राशिचक प्रतिवर्ष २४ विकला, प्रतिमास ४ विकला, ३. अनुकला और प्रतिदिन ९. अनुकला खिसकता है । ६३ वर्ष ८ महीने में राशिचक्र विषुवत् रेखा पर पूरा एक फेरा लगाता है । याह दो भागों में विभक्त है—प्रागयन और पश्चादयन । ४. ग्रह तारादि की गति का ज्ञान जिस शास्त्र में हो । ज्योतिष शास्त्र । ५. सेना की गति । एक प्रकार का सेनानिवेश (कवायद) जिसके अनुसार व्यूह में प्रवेश करते हैं । ३. मार्ग । राह । ७. आश्रम । ८. स्थान । ९. घर । १० । काल । समय । ११. अश । १२. एक प्रकार का यज्ञ जो अयन के प्रारंभ में होता था । १३. गाय या भैस के थन के ऊपर का वह भाग जिसमें दुध भरा रहता है । उ०—अंतर अयन अयन भल, थन फल, बच्छ वेद बिस्वासी ।—तुलसी ग्रं० पृ० ४६४ ।

अयनकाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह काल जो एक अयन में लगे । २. छह् महीने का काल ।

अयनभाग
संज्ञा पुं० [सं०] अयन अंशा वा हिस्सा ।

अयनवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुर्य के गमन से वनेनेवाला वृत्ता । २. ग्रहण की रेखा [को०] ।

अयनसंक्रम
संज्ञा स्त्री० [सं० अयनसंङ्क्रम] १. मकर और कर्क की संक्रांति । अयन संक्रांति । २. प्रत्येक संक्रांति से २० दिन पहले का काल ।

अयनसेक्रांति
संज्ञा स्त्री० [सं० अय वसंङ्कान्ति] मकर और कर्क की संक्रांति । अयनसंकम ।

अयनसंपात
संज्ञा पुं० [सं० अयनसम्पात] अयनांशों का योग ।

अयनसमांत
संज्ञा पुं० [सं० अयनतमान्त] १. रात और दिन दोनों का बराबर होना । विषुवन् रेखा पर उन दो विंदुओं में से एक, जिनपर से होकर सूर्य का क्रांतिकत्त (सूर्य का नार्ग) विषुवत् रेखा को वर्ष में दो बार (छह छह महीने पर) काटता है । जब किसी एक बिंदु पर सूर्य आता है, तब रात और दिन दोनों बराबर होते हैं । इसी को अयनसमांत कहते हैं । २. उक्त दोनों बिंदु ।

अयनांत
संज्ञा पुं० [पुं० अयनान्त] अयन की समाप्ति । वह संधिकाल जहाँ एक अयंन समाप्त हो और दूसरा अयन आरंम ।

अयनांशा
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य की गतिविशेष के काल का भाग । २. विषुवत् रेखा पर के वे दो बिंदु जिनपर से होकर सूर्य का क्रांतिवूत्त (गमन का गार्ग) वर्ष में दो बार (छह छह महीने पर) काटता है और जिनपर सूर्य के आने पर रात और दिन दोनों बराबर होते हैं ।

अयमदिन
संज्ञा पुं० [सं०] ६० घड़ी का वह एक ही रात दिन जिसमें दो तिथियों का अवशान हो जाय । विशेष—कहा गया है कि ऐसे दिन में स्नानर और दानादि के अतिरिक्त और कोई शुम कर्म नहीं करना चाहिए ।

अयमिन
वि० [सं०] १. जिसे नियंत्रित न किया जाय । २. जो काट छाँटकर दुरुस्त न किया गया हो । असज्जित [को०] ।

अयम्
सर्व० [सं०] यह ।

अयव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरीष का एक कीड़ा जो यव से छोटा होता है । कद् दूदाना । २. पितृकर्म, कयोंकि इस कृत्व में यव नहीं काम आता । ३. शत्रु । ४. कृष्णा पक्ष ।

अयव (२)
वि० १. जिसमें ०यव का प्रयोग नहो । २. अभावयुक्त । अपूर्ण [को०] ।

अयश
संज्ञा पुं० [सं० अयशास्] १. अपयश । अपकोर्ति । २. निंदा ।

अयशास्कर
वि० [सं०] अपयशा का कारण । जिसके करने से बदनामी हो ।

अयशस्य
वि० [सं०] जिनसे बदनामी हो । बदनाम करानेवाला ।

अयशास्वी
वि० [सं० अयशस्विन्] १. जिसे यश न मिले । अकीर्ति- मान् । बदनाम ।

अयशी
वि० [सं० अयशस्वी; हि० अयशी, अजसी] बदनाम ।

अयरचूर्ण
संज्ञा पुं० [स०] लोहे का चूरा [को०] ।

अयस
संज्ञा पुं० [सं० अयम्] लोहा ।, विशेष—समासांत में प्रयुक्त, जैसे कृष्णयस, कालयस आदि ।

अयस्कंस
संज्ञा पुं० [सं] लोहे का प्यालानुमा पात्र [को०] ।

अयस्कांड
संज्ञा पुं० [सं० अयस्काण्ड] १. लोहे का तीर । २. लोहे की अधिकता । ३. उत्तम लोहा [को०] ।

अअयस्कांत
संज्ञा पुं० [सं० अयस्कान्त] चुंबक ।

अयसस्कांतमणि
संज्ञा पुं० [सं० अयस्कान्त मणि] चुंबक [को०] ।

अयस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] १. लोहार । २. जाँघ का ऊपरी भाग (को०) ।

अयस्कीट
संज्ञा पुं० [सं०] मोरचा । जंग (को०) ।

अयस्कुंभ
संज्ञा पुं० [सं० अयस्कुम्भ] [स्त्री० अयस्कुंभी] लोहे का गगरा [को०] ।

अयस्कृशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लोहे की बनी रस्सी । लोहे के मेल से बनी रस्सी [को०] ।

अयस्ताप
वि० [सं०] लोहे को तपानेवाला [को०] ।

अयस्थूण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक ऋषि [को०]

अयस्थूण (२)
वि० [सं०] लोहे के स्तंभ से युक्त । जिसमें लोहे के खंभे लगे हों [को०] ।

अयाँ
वि० [अ०] १. प्रकट । जाहिर । २. स्पष्ट ।

अयाचक
वि० [सं०] १. नहीं माँगनेवाला । जो माँगे नहीं । २. संतुष्ट । पूर्णकाम ।

अयाचित
वि० [सं०] बिना माँगा हुआ । उ०—सदा अवाचित देते हैं फल प्रेम से ।—कानन०, पृ० १०५ । यो०—अयाचितोपस्थित=बिना माँगे प्राप्त । अयाचितवृत्ति, अयाचित व्रत=बिना माँगे प्राप्त वस्तु से जीविकाविर्वाह करने का नियम ।

अयाची
वि० [सं० अयाचिन्] १. अयाचक । न माँगनेवाला । २. अयाच्च । पूर्णाकाम । संपन्न । ३. समृद्ध । धनी ।

अयाच्य
वि० [सं०] १.जिसे माँगने की आवश्यकता न हो । पूर्ण- काम । भरापुरा । उ०—कुछ को अयाच्य करने से देश की दशा सुधर नहीं सकती ।—प्रेमघन०, पृ० २७९ । २. संतुष्ट । तृप्त । ३. जो माँगे जाने योग्य न हो ।

अयाज्य (१)
वि० [सं०] १. जो यज्ञ कराने योग्य न हो । जिसको यज्ञ कराने का अधिकार न हो । २. पतित । ३. यज्ञ के अयोग्य [को०] ।

अयाज्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] चांडाल । अंत्यज [को०] ।

अयाज्ययाजक
संज्ञा पुं० [सं०] वह याजक जो ऐसे पुरुष को यज्ञ करावे जिसको यज्ञ कराना शास्त्रों में वर्जित है ।

अयाज्ययाजन
संज्ञा पुं० [सं०] अनधिकारी व्यक्ति से यज्ञ कराना [को०] । विशेष—यह उपपातको में है । इसे अयाज्यसंयाज्य भी कहते हैं ।

अयात
वि० [सं०] जो न गया हो [को०] ।

अयातपूर्व
वि० [सं०] १. अनुगत । अनुयायी । २. उत्तराधिकारी । ३. स्थानापन्न [को०] ।

अयातयाम
वि० [सं०] १. जिसको एक पहर न बीता हो । २. जो बासी न हो । ताजा । ३. विगतदोष । शुद्ध । ४. जो अतिक्रांत काल का न हो । ठीक समय का ५. जो व्यबहृत होने से नष्ट न हुआ हो [को०] ।

अयाथार्यिक
वि० [सं० स्त्री० अयायार्थिकी] १. जो सत्य न हो । गलत । झूठा । २. अवास्तविक । ३. अनुचित । अन्याय [को०] ।

अयान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वभाव । निसर्ग । २. प्रचंचलता । स्थिरता ।

अयान (२)
वि० [सं०] बिना सवारी का । पैदल ।

अयान (३)पु
वि० [सं० अज्ञान, प्रा० अयाण] १. अज्ञ । मूर्ख । उ०— कहइ सो अधमु अयान असाधू ।—मानस, २ ।२०६ । २. ज्ञान- रहित । नादान । उ०—पुनि हैं कुसल गेह में तेरे । जे प्रयान अरु वृद्ध घनेरे । —हम्मीर० पृ० १७ ।

अयानत
संज्ञा स्त्री० [अ० इआनत] सहायता । मदद ।

अयानता पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० अयान + ता (प्रत्य०)] ज्ञानहीनता । अज्ञता । मूर्खता ।

अयानप
संज्ञा पुं० [हिं० अयान+प (प्रत्य०)] १. अज्ञानता । अनजानापन । उ०—यहाँ को सयानप अयानय सहस सम, सूधौ सन भाय कहें मिटति मलीनता ।—तुलसी ग्रं०, पृ०, ५८९ । २ भोलापन । सीधापन ।

अयानपन पु
संज्ञा पुं० [हिं० अयान+पन] १. अज्ञानता । २. भोलापन । सीधापन । उ०—तुव अयानयन लखि भटू लटू भए नँदलाल, जब सयानपन पेखिहैँ तब धौं कहा हवाल ।— पद्मकर ग्रं०, पृ० १२८ ।

अयानय पु
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी या बुरी तकदीर । सौभाग्य या दुर्भाग्य२. शतरंज की एक ऐसी जगह जिसे विरोधी खिलाड़ी के मुहरे नहीं अपना सकते [को०] ।

अयाना
वि० पुं० [सं० अज्ञान, प्रा० अयाणय] [वि० स्त्री० अयानी] अजान । बुद्धिहीन । अज्ञानी । उ०—(क) जौ पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करै अयाना ।—मानय, १ ।२०६ ।

अयाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. समयाभाव । समय की कमी । २. दिन का कोई भाग । ३. जो मार्ग या पथ न हो [को०] ।

अयाल (१)
संज्ञा पुं० [तु० याल फा० अयाल] घोड़े और सिंह आदि की गर्दन के बाल । केसर ।

अयाल (२)
संज्ञा पुं० [अ० इयाल] लड़के बाले । बाल बच्चे ।

अयालदार
संज्ञा पुं० [फा०] १. कंधे पर बालवाला पशु, जैसे घोड़ा, शेर । २. बालबच्चोबाला गृहस्थ [को०] ।

अयावक
वि० [सं०] स्वाभाविक या प्रकृत्या लाल [को०] ।

अयावन
संज्ञा पु० [सं०] समिलित न होने देखा [को०] ।

अयास
क्रि० वि० [सं०] [अ=नहीं+यास=यत्व] बिना प्रयास । बिना उद्योग के । सहज ही । उ०—वृक्षो से ही बढ़ो अयास ।— युग, पृ० ७३ ।

अयास्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु । विरोधी । २. प्राणावायु । ३. अंगिरा ऋषि ।

अयास्य (२)
वि० निश्चल । अटल ।

अयि
अव्य [सं०] हे । अरे । अरी । यह संबोधन के लिये प्रयुक्त होता है ।

अयुक
वि० [सं० अयुज्] अयुक्त [को०] ।

अयुक्छद
संज्ञा पुं० [सं०] १. सप्तपर्ण वृक्ष । छतिवन । सतवन । २. वह वृक्ष या पौधा जिसकी अवुग्म पत्तियाँ हों, जैसे बेल, अरहर आदि ।

अयुक्नेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

अयुक् पलाश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अयुक्छद' ।

अयुक्शक्ति
संज्ञा पुं० [सं०] शिव ।

अयुक्शर
संज्ञा पुं० [सं०] पंचशर । कामदेव [को०] ।

अयुक्त
वि० [सं०] १. अयोग्य । अनुचित । बेठीक । २. अमिश्रित । असयुक्त । अलग । ३. आपद् ग्रस्त । ४. जो दूसरे विषय पर आसक्त हो । अनमना । ६. असंबद्ध । युक्तिशून्य । ७. अविवाहित (को०) । यौ०—अयुक्तक्रत्=बुरा या गलत काम करनेवाला । अयुक्तवार= जिसने दूतों या जासूसों की नियुक्ति न की हो ।

अयुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १ युक्ति का अभाव । असंबद्धता । गड़बड़ी । २. अयुक्तता [को०] । योग न देना । अप्रवृत्ति ३. वंशी बजाने में उँगली से उसके छेद को बंद करने की क्रिया ।

अयुग
वि० [सं०] १. विषम । ताक । २. अकेला । ३. जो शिष्ट या मिला न हो ।

अयुगक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] शिव । त्रिनयन [को०] ।

अयुगपद
अव्य० [सं०] एक साथ नहीं । क्रमशः [को०] ।

अयुगल
वि० [सं०] दे० 'अयुग' [को०] ।

अयुगिषु
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव । अयुग्वाण [को०] ।

अयुगू (१)
वि० [सं०] १. जिसका कोई मित्र या संगी न हो । २. वाह लड़की जिसकी कोई बहन न हो [को०] ।

अयुगू (२)
संज्ञा स्त्री० वह स्त्री जिसे जीवन में एक ही संतान उत्पन्न होकर फिर कोई संतान न हो । काकवंध्या [को०] ।

अयुग्बाण
संज्ञा पुं० [सं०] विषमबाण । कामदेव [को०] ।

अयुग्म
वि० [सं०] १. विषम । ताक । २. अकेला । एकाकी । यौ०.—अयुग्मच्छ़द ।अयुग्मनेत्र ।अयुग्मवाह ।अयुग्मशर ।

अयुग्मच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] १. सप्तयर्ण वृक्ष । छतिवन । सतवन । २. वह वृक्ष या पौधा जिसकी अयुग्म पत्तियाँ हों, जैसे बेल, अरहर इत्यादि ।

अयुग्मनयन
संज्ञा पुं० [पुं०] दे० 'अयुग्मनेत्र' [को०] ।

अयुग्मनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री०अयुग्मनेत्री] शिव । महादेव । विशेष—शिव की शक्तियों को भी अयुग्मनेत्रा कहते हैं ।

अयुग्मबाण
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव ।

अयुग्मवाद
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

अयुग्मशर
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव । अयुग्मवाण [को०] ।

अयुग्मसप्ति
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसके रथ में सात घोड़े जुते हों । सूर्य [को०] ।

अयुज
वि० [सं०] १. जो जोड़ा न हो । तक । २. अकेला । संगी- विहीन । ३. अश्लिष्ट [को०] ।

अयुत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दस हजार संखया का स्थान । २. उस स्थान की संख्या ।

अयुत (२)
वि० १. असंबद्ध । युक्त न हो । २. अक्षुब्ध [को०] ।

अयुतसिद्ध
वि० [सं०] जो पृथक करने योग्य न हो । परंपरा से युक्त । अविच्छेद्य [को०] ।

अयुध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यक्ति जो युद्ध न करता हो ।

अयुध (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आयुध' ।

अयुध्य
वि० [सं०] जिससे युद्ध न किया जा सके । दुर्धर्ष [को०] ।

अयुव
वि० [सं०] १. असंबद्ध । २. शांत [को०] ।

अयुष
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आयुष्' ।

अये (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] स्लोय की जाति का एक जंतु । यह जंतु अये, अये शब्द करता है । इसीलिये इसको 'अये' कहते हैं ।

अये (२)
अव्य [सं०] १. क्रोध, विषाद, भयादि द्योतक अव्यय । २. संबोधन ।

अयोग (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. योग का अभाव । २. अपशस्त योगयुक्त काल । वह काल जिसमें फलित ज्योतिष के अनुसार दुष्ट ग्रह नक्षत्रादि का मेल हो । ३. कुसमय । कुकाल । ४. कठिनाई । संकट । ५. वह वाक्य जिसका अर्थ सुगमता से न लगे । कूट । ६. अप्राप्ति । ७. असंभव । ८. अलगाव [को०] । ९. अनुपयुक्तता [को०] । १०. तीव्र प्रयत्न । जोरदार कोशिश [को०] । ११. विधुर । १२. हयौड़ा [को०] । १३. किसी वस्तु को न चाहना । नापसंदगी [को०] ।

अयोग (२)
वि० [सं०] १. अप्रशस्त । बुरा । २. असंबद्ध [को०] । ३. जोरदार कोशिश करनेवाला [को०] ।

अयोग (३)
वि० [सं० अयोग्य] अयोग्य । अनुचित ।

अयोगव
संज्ञा पुं० [सं०] वैश्य जाति की स्त्री और शूद्र पुरुष से उत्पन्न एक वर्णसंकर जाति ।

अयोगवाह
संज्ञा पुं० [सं०] वह वर्ण जिनका पाठ अक्षरसमाम्नाय सूत्र में नहीं है । विशोष—ये किसी किसी के मत से अनुस्वार, विसर्ग,/?/क और/?/प चार हैं, और किसी किसी के मत से अनुस्वार, विसर्ग/?/क/?/ख/?/प और/?/फ छह हैं । अनुस्वार विसर्ग के अतिरिक्त जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय भी अयोगवाह है ।

आयोगी (१)
वि० [सं० अयोगिन्] योगशास्त्रानुसार जिसने योगांगों का अनुष्टान न किया हो । योगांगों के अनुष्टान में असमर्थ । जो योगी न हो ।

अयोगी (२
पु वि० [सं० अयोग्य] अयोग्य ।

अयोगुड
संज्ञा पुं० [सं०] १. लोहे की गोली । लोहे की बनी गेंद । लौह कंदुक । २. एक प्रकार का शस्त्र जिसमें लोहे के गेंद लगे रहते हैं [को०] ।

अयोग्य
वि० [सं०] १. जो योग्य नहो । अनुपयुक्त । २ अकुशल । नालायक । बेकाम । निकम्मा । अपात्र । ३. अनुचित । नामुनासिब । बेजा ।

अयोघन
संज्ञा पु० [सं०] लोहे का घन या हथोड़ा [को०] ।

अयोच्छिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] मोरचा । जंग [को०] ।

अयोजाल
संज्ञा पुं० [सं०] लोहे का बाना हुआ जाल [को०]

अयोद्धा
संज्ञा पुं० [सं०] १. निम्न कोटि का सैनिक । २. वह व्यक्ति जो योद्धा या सैनिक नहीं है [को०] ।

अयोध्य
वि० [सं०] १. जिससे युद्ध न किया जा सके । अजेय । २. जो युद्ध के लिये असमर्थ हो [को०] ।

अयोध्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी । विशेष—वाल्मीकीय रामायण के अनुसार इसे सरयू नदी के किनारे वैवस्त मनु ने बसाया था जो ४८ मील लंबा और १२ मील चौड़ा बड़ा नगर था । इसका एक नाम साकेत भी है । रामचंद्र जी का जन्म यहीं हुआ था । पुराणनुसार यह हिंदुओं की सप्तपुरियों में से है ।

अयोध्याकांड
संज्ञा पुं० [सं० अयोध्याकाण्ड] रामायण का द्धितीय कांड ।

अयोनि (१)
वि० [सं०] १. जो उत्पन्न न हुआ हो । अजन्मा । २. नित्य । ३. अवैध रूप से पैदा [को०] । ४. अज्ञान कुलवाला [को०] ।

अयोनि (२)
संज्ञा पुं० १. योनि से भिन्न । २. ब्रह्मा । ३. शिव । ४. मूसल या लोढ़ा [को०] ।

अयोनिज (१)
वि० [सं०] १. जो योनि से उत्पन्न न हो । जो प्रजनन की साधारण प्रक्रिया से उत्पन्न न हो । २. स्वयंभू । ३. अदेह ।

अयोनिज (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु । २. ब्रह्मा । ३. शिव । ४. अगस्त्य या कुंभज ऋषि ।

अयानिजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सीता [को०] ।

अयोनिसंभवा
संज्ञा स्त्री० [सं० अयोनिसस्भवा] दे० 'अयोनिजा' [को०] ।

अयोमय
वि० [सं०] लोहे से रचित । लोहे का [को०] ।

अयोमल
संज्ञा पुं० [सं०] मोरचा । जंग [को०] ।

अयोमुख
वि० [सं०] जिसका मुख लोहे का हो ।

अयोहृदय
वि० [सं०] लोहे जैसा कठोर हृदयवाला । संगदिल । निष्ठुर [को०] ।

अयौक्तिक
वि० [सं०] युक्तिहीन । असंगत [को०] ।

अयौगिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० अयौगिकी] १.रूढ़ । जो (शब्द) व्याकरणविरुद्ध हो । २. जिसका योग या जोड़ से संबैध न हो [को०] ।

अरंग
संज्ञा पुं० [सं० अर्ध्य=पूजाद्रव्य अथवा सं० आघ्राण, तुल० 'अरघान'] सुगंध । महक । उ०—रूप के तरगन के अंगन ते सोधो के अरग लै लै तरल तरंग उठै पौन की ।—देव (गब्द०)

अरंगम
संज्ञा पुं० [सं० अरङ्गम] १. समीप आगमन या दिखाई पड़ना । २. सहायतार्थ उपास्थित होना [को०] ।

अरंगर
वि० [सं०] १. तुरंत स्तुति करनेवाला । २. जहर का बना हुआ [को०] ।

अरंगी
वि० [सं० अरङ्गिन्] रागरहित । रागविहीन [को०] ।

अरंड पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'एरंड, रेंड' ।

अरंधन
संज्ञा पुं० [सं० अरन्धन] एक प्रकार का व्रत जो सिंहसंक्रांति और कन्यासंक्रांति के दिन पड़ता है । इस दिन 'आचारमार्तड' के अनुसार भोजन नहीं पकाया जाता ।

अरंब्यंद पु
संज्ञा पुं० दे० अरविंद' । उ०—रवी पंग दरसं अरंव्यंद मानं ।—पृ० रा० ६१ ।६३९ ।

अरंभ पु
संज्ञा पुं० दे० 'आरंम' । उ—कथा अरंभ करइ सोइ चाहा । तेही समय गएउ खगनाहा ।—मानस, ७ ।६३ ।

अरंभना (१) पु
क्रि० स [सं० आ+रभ्भ=शब्द करना] बोलना । नाद करना । उ०—रोवत पंखि बिमोहे जस कोकिला अरंभ ।जाकरि कनक लता सो बिछुरा पीतम खंभ ।—जायसी ग्रं०, पृ० १७८ ।

अरंभना (२) पु
क्रि० स० [सं० आरभ्भण] आरंभ करना । शुरू करना उ०—सकुचहिं बसन बिभूषन परसत जो बपु । तेहि सरीर हर हेतु अरंभेउ बड़ तपु ।—तुलसी (शब्द०) ।

अरंभना पु
क्रि० अ० आरंभ होना । शुरू होना । उ०—अनरथु अवध अरंभेउ जब ते । कुसगुन होंहि भरत कहुँ तब तें ।— मानस २ ।१५७ ।

अर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहिए की नाभि और नेमि के बीच की आड़ी लकड़ी । आरागज । २. आरी । ३. कोण । कोना । ४. सेवार । ५. पित्तपापड़ा । पर्पट [को०] ।

अर (२)
वि० १. शीघ्र । जल्दी । २. छोटा [को०] ।

अर (३) पु
संज्ञा पुं० [हिं० अड़] १. हठ । अड़ । जिद । उ०—(क)परि पाकरि बिनती धनी नीमरजा ही कीन । अब न नारि अर करि सकै जदुवर परम प्रवीन ।—बिहारी (शब्द०) ।

अरइल (१) पु
वि वि० [हिं० अरना, अड़ना०] १. जो चलते चलते रुक जाय़ और आगे न बढ़े । अड़ियल ।

अरइल (२) पु
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक वृक्ष का नाम । २. प्रयाग में वह स्थान जहाँ गंगा में यमुना मिलती है । अरैल । उ०—की कालिंदी बिरह सताई । चलि पयाग अरइल बिच आई ।—जायसी ग्रं०, पृ० ४६ ।

अरई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० ऋ=जाना] बैल हाँकने की छड़ी या पैने के सिरे पर की लोहे की नुकीलो कील जिससे बैल को गोदकर हाँकते हैं । प्रतोद । मुहा०.—अरई लगाना=ताकीद करना । प्रेरण करना ।

अरई (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'अरपी' ।

अरक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेबार । २. पहिए का आरा । आरागज [को०] । ३. पितपापड़ा [को०] ।

अरक (२)
संज्ञा पुं० [अरक] १. किसी पदार्थ का रस जो भमके से खींचने से निकले । आसव । अर्क । क्रि० प्र०—उतरना ।खींचना ।निकालना । २. रस । क्रि० प्र०—निचोड़ना । ३. पसीना । क्रि० प्र०—आना—निकलना । मुहा०.—अरक अरक होना=पसीने में भींग जाना ।

अरक (३) पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्क] १. मदार । आक । उ०—छपि छपि अरकन में खरि खरकन में भ्रमि भरकन में जाइ छसैं ।—पद्माकर ग्र०, पृ० २८९ । २. सूर्य ।

अरकगीर
संज्ञा पुं० [फा०] नमदे का बता हुआ वह टुकड़ा जिसको घोड़े की पीठ पर रखकर जीन या चारजामा खीचते हैं ।

अरकटी
संज्ञा पुं० [हिं० आड़+काटना] वह माँझी जो नाव की पतवार पर रहता और उसे घुमाता है ।

अरकना (१) पु
क्रि० अ० [अनु०] अरराकर गिरना । टकराना । उ०—कढ़ै दंत बिनु अंत लुथ्यि पर लुथ्यि अरक्किय ।—सूदन (शब्द०) ।

अरकना (२)
क्रि० अ० [हिं० दरकना] फटना । दंरकना । यौ०.—अरकना दरकना ।

अरकनाना
संज्ञा पुं० [अ०] एक अरक जो पुदीना और सिरका मिलाकर खींचने से निकाला जाता है ।

अरकना बकरना पु
क्रि० अ० [अनु०] इधर उधर करना । ऐंचातानी करना । उ०—अर कै डरि कै अरकैबरकै फरकै न रुकै भजिबोई चहै ।—केशव (शब्द०) ।

अरक बादियान पु
संज्ञा पुं० [अ०] सौंफ का अरक ।

अरकला पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्गला=अगरी या बड़ा] रोक । मर्यादा । उ०—भाँट अहै ईश्वर की कला । राजा सब राखहिं अरकला ।—जायसी (शब्द०) ।

अरकसी †
संज्ञा स्त्री० [सं० आलस्य] सुस्ती । प्रमाद ।

अरकाट
संज्ञा पुं० दक्षिण भारत का एक स्थान ।

अरकाटी
संज्ञा पुं० [हि० अरकाट] वह व्यक्ति जो कुलियों आदि को चाय के बगीचों मों या मारिशस, गिआना आदि टापुओं में काम करने के लिये भरती करके भेजता हो ।

अरकान
संज्ञा पुं० [अ० 'रुक्त'का बहुव०] राज्य के प्रधान संचालक । प्रधान राजकर्मचारी । मांर्त्रिवर्ग । उ०—जावत अहहिं सकल । अरकाना । संभरि लेहु दूर है जाना ।—जायसी (शब्द०) ।

अरकासर
संज्ञा पुं० [सं० कासार] तालाब । बावली ।—डिं० ।

अरकोल
संज्ञा पुं० [सं० कौलीरा] एक वृक्ष जो हिमालय पर्वत पर होता है । इसका पेड़ झेलम से आसाम तक २००० से ८००० फुट की ऊँचाई पर मिलता है । इसकी गोंद ककरासिंगी या काकड़ासिंगी कहलाती है । लाखर ।

अरक्षित
वि० [सं०] १. जिसकी रक्षा न की गई हो । रक्षाहीन । २. जिसका रक्षक न हो ।

अरखट पु
संज्ञा पुं० [ पु अखरावट, पु अखरोटी, पु अखरोट] १. अक्षर २. लिखीवट । उ०—लिखें लिलाट पट्ट बिधि अरखट मिटही न कोटि जतन धीरे धैए ।—अकबरी०, पृ० ३२४ ।

अरग (१)
संज्ञा पुं० [सं०अगरु=एक चंदन] अरगजा । पीले रंग का एक मिश्रित द्रव्य जो सुगंधित होता है । इसे देवताओं को चढ़ाते हैं ओर माथे में लगाते हैं ।

अरग (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्क' । उ०—अरुन बरुन उट्ठायौ । अरग उद्दिग उद्दिग जुज ।—पृ० रा०, ६१ ।१६६५ ।

अरगजा
संज्ञा पुं० [हिं०] एक सुगंधित द्रव्य जो शरीर में लगाया जाता है । यह केशर, चंदन, कपूर, आदि को मिलाने से बनता है । उ०—मैं लै दयौ, लयौ सुकर छुवत छिनकि गौ नीरु । लाल तिहारो अरगजा, उर ह्वै लग्यौ अबीरु ।—बिहारी र०, दो० ५३५ ।

अरगजी (१)
संज्ञा पुं० [हिं० अरगजा] एक रंग जो अरगजे का सा होता है ।

अरगजी (२)
वि० १. अरगजी रंग का । २. अरगजा की सुगंध का । उ०—उरघारी लटै छूटी आनन पर भीजी फुलेलन सों आली हरि संग केलि । सोधे अरगजी अरु मरगजी सारी केसरिखोरिं विराजित कहुँ कहुँ कुचनि पर दरकी अँगिंया धन बेलि ।—(शब्द०) ।

अरगट पु
वि० [हिं० अलगंट] पृथक् । अलग । निराला । भिन्न उ०—बाल छबीली तियनु में बैठी आपु छिपाई । अरगट हीं फानूस सी परगट होति लखाइ ।—बिहारी र०, दो० ६०३ ।

अरगड़ा †
संज्ञा पुं० दे० 'अर्गला' ।

अरगन
संज्ञा पुं० [अं० आर्गन] एक अँगरेजी बाजा । विशेष—यह धौंकनी से बजता है । इसमें स्वर निकलने के लिये नलियाँ लगी रहती हैं । यह बाजा प्रायः गिरजाघरों में रहता है और एक आदमी के बजाने से बजता है ।

अरगनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० अलगनी] बाँस, लकड़ी या सस्सी जो किसी घर में कपड़े आदि रखने के लिये बाँधी या लटकाई जाय । अलगनी ।

अरगल
संज्ञा पुं० [सं० अर्गल] १. वह लकड़ी जो किवाड़ बंद करने पर इसलिये आड़ी लगाई जाती है कि किवाड़ बाहर से खुले नहीं । ब्योंड़ा । गज । उ०—अरि दुर्ग लूटि अरगल अखंड । जनु धरी बड़ाई बाहु दंड । गोपुर कपाट विस्तार झारि । गहि धरयो बच्छ थल में सँवारि ।—गुमान (शब्द०) ।

अरगवान
संज्ञा पुं० [फा०] गहरे लाल रंग का एक फूल तथा उक्त फूल का वृक्ष [को०] ।

अरगवानी (१)
संज्ञा पुं० [फा०] रक्तवर्ण । लाल रंग ।

अरगवानी (२)
वि० १. गहरे लाल रंग का । लाल । बैंगनी ।

अरगा †
संज्ञा [फा० इर्कास] घोड़ें की एक प्रकार की चाल । कदम चाल जिसमें चारों पैर अलग अलग पड़ते है । विशेष—इस चाल को चलते समय घोड़ा देह को साधकर चलता है । चारों टाँग अलग अलग पड़ती हैं । इस चाल में सवार घो की लगाम खिंची हुई रखता है और घोड़े का कल्ला (गर्दन) उठा हुआ और स्थिर रहता है ।

अरगाना (१) पु
क्रि० अ० [हिं० अलगाना] १. अलग होना । पृथक् होना । उ०—(क) लोग भरोसे कौन के जग बैठे अरगाय ।—कबीर (शब्द०) । २. सन्नाटा खींचना । चुप्पी साधना । मौन होना । (ख) सुनि लिहयौ उनहीं की कहयौ । अपनी चाल समुभि मन ही मन गुनि अरगाई रहयौ ।— सूर०, १० ।४१२७ । मुहा० .—प्राण अरगाना=प्राण सूखना । अकचका जाना । विस्मित होना । उ०—जसौं जैसी भाँति चाहियै ताहि मिले त्यौं धाइ । देस देस के नृपति देखि यह प्रीति रहे अरगाइ ।— सूर०, १० ।४२८२ ।

अरगाना (२) पु
क्रि० स० अलग करना । छाँटना । उ०—बरनि न जाइ भक्त की महिमा बारंबार बखानौं । ध्रुव गाजयूत विदुर दासी सुत कौन कौन अरगनौ ।—सूर०, १ ।११ ।

अरघ पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्घ] १. सोलह उपचारों में से एक । वह जल जिसे फूल, अक्षत, दूब आदि के साथ किसी देवता के सामने गिराते हैं । उ०—करि आरती अरघ तिन्ह दीन्हा । राम गमनु मंडप तब कीन्हा ।—मानस, १ ।३१९ । २. वह जल जो हाथ धोने लिये किसी महापुरुष को उसके आने पर दिया जाय । उ०—आदर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ।—तुलसी (शब्द०) । ३. वह जल जो बरात के आने पर वहाँ भेजा जाता है । उ०—गिरिबर पठए बोलि लगन बेरा भई । मंगल अरघ पावड़े देत चले लई ।—तुलसी ग्रं० पृ० ३९ । ४. वह जल जो किसी के आने पर दरवाजे पर उसके सामने आनंदप्रकाशनार्थ ढरकाया जाता है । ढरकावन । उ०—गजमुकुता हीरामनि चोक पुराइय हो । देह सु अरध राम कहु लेइ बैठाइय हो ।—तुलसी ग्र०, पृ० ३ । ५. जल का छिड़काव । उ०—नाइ सीस पगनि असीस पाइ प्रमुदित पावड़े अरघ देत आदर से आने हैं ।—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र.—करना । उ०—हरि को मिलन सुदामा आयो । विधि करि अरघ पावड़े दीदे अंतर प्रेम बढ़ायो ।—सूर (शब्द०) । देना । उ०—हृदय ते नहिं टरत उनके श्याम नाम सुहेत । अश्रु सलिल प्रवाह उर मनो अरघ नैनन देत ।—सूर (शब्द०) ।

अरघटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह बाल्टी जो रहट में लगी रहती है । २. गहरा कूप [को०] ।

अरघट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] रहट । अरहट ।

अरघट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अरघट्ट' ।

अरघनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्घणिक] आम का वह पत्ता जिसका प्रयोग देवविशेष को जल देने में किया जाता है । विशेष—कभी कभी पंड़ित अपने यजमान के हाथ में एक आम का पता देते हैं और देवविशेष के लिये जल छुड़वाते हैं, तब वह पत्ता अरधनी कहलाता है ।

अरघा (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्घ] १. एक पात्र जिसमें अरघ का जल रखकर दिया जाता है । यह ताँबे का थूहर के पत्तें के आकार का गावदुम होता है । २. एक पात्र जिसमें शिवलिंग स्थापित किया जाता है । जलधरी । ३. वह पात्र जिसमें अर्घ रखकर दिया जाता ।

अरघा (२)
संज्ञा पुं० [सं० अरघट्ट] कुएँ की जगत पर पानी निकलने के लिये बनाया गया रास्ता । चँवना ।

अरघान पु †
संज्ञा पुं० [सं० आघ्राण] गंध । महक । आघ्राण । उ०— (क) भौंर केस वह मालति रानी । बिसहर लुरे लेहिं अरघानी ।—जायसी ग्रं०, पृ० ४१ । (ख) अरघान की फैन, मैली हुई मालिनी की मृदुल शौल ।—आराधना पृ० ७ ।

अरघानि पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरघान' ।

अरचन पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्चन] पूजा । नव प्रकार की भक्ति में से एक । उ०—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादरत, अरचन, वंदन दास । सख्य और आत्ममिवेदन, प्रेम लक्षणा जास ।—सूर (शब्द०) ।

अरचना पु
क्रि० स० [सं० अर्चन] पूजा करना । उ०—(क) दुख में आरत अधम जन पाप करै डर डारि । बलि दै भूतन मारि पशु अरचैं नहीं मुरारि ।—दीनदयाल (शाब्द०) ।

अरचल †
संज्ञा स्त्री० [हिं० अड़चन] अंडस । रुकावट । अड़चन । उ०—मैं कैसे सजनी चलौ न जाया ।....उरझी हैं सारी रे बीरिया की झारी रे अरचन औंर परी ।—प्रताप (शब्द०) ।

अरचा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अर्चा (१)' । उ०—त्यों पदमाकर सालिगराम को कै अरचा चरनोदक चाखै ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २४४ ।

अरचि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्चि] ज्योति । दीप्ति । आभा । प्रकाश । तेज । उ०—भे चलत अकरि करि समरपन रचि मुखमंडल अरचिकर ।—गोपाल (शब्द०) ।

अरचित पु
वि० [हिं०] दे० 'अर्चित' ।

अरज (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० अर्ज] विनय । निवेदन । विनती । उ०— होत रंग संगीत गृह प्रतिध्वनि उड़त अपार । अरज करत निकरत हुकुम मनौ काम दरबार ।—गुमान (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।—कहना । यौ०.—अरज गरज ।

अरज † (२)
संज्ञा पुं० [अ० अर्ज] चौड़ाई ।

अरज (३)
वि० [सं०] १. जिसमें धूल न लगी हो । स्वच्छ । २. राग आदि से रहित । ३. जिसे मासिक धर्म न हो [को०] ।

अरजन पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'अर्जन' । उ०—करन लगे जब सों अन्याय सहित धन अरजन ।—प्रेमघन०, भा०१, पृ० ५३ ।

अरजना पु
क्रि० अ० [हिं० अरज से नाम०] निवेदन या प्रार्थना करना ।

अरजम
संज्ञा पुं० [देश०] कुंबी नाम का एक बड़ा वृक्ष जिसकी लकड़ी से खेती के औजार और गाड़ी के धुरी आदि बनाए जाते हैं । वि० दे० 'कुंबी' ।

अरजल (१)
संज्ञा पुं० [अ० अर्जल] १. वह घोड़ा जिसके दोनों पिछले पैर और अगला दाहिना पैर सफेद या एक रंग का हो । (ऐसा घोड़ा ऐबी माना जाता है) । उ०—तीन पाँव एक रंग हो एक पाँव एक रंग । ताको अरजल कहत हैं करत राज में भंग । २. नीच जाति का पुरुष । ३. वर्णसंकर ।

अरजल (२)
वि० नीच, जैसे अरजल कौम ।

अरजस्क
वि० [सं०] दे० 'अरज' (३) ।

अरजाँ
वि० [फा०] सस्ता । कमकीमत [को०] ।

अरजा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भार्गव ऋषि की पुत्री । २. घीकुआर । घृतकुमारी । ३. वह कन्या जिसे रजोधर्म न हुआ हो [को०] ।

अरजा (२)
दि० [सं०] अरजस्वला [को०] ।

अरजो (१) †
संज्ञा स्त्री० [अ० अर्जी] १. आवेदनपत्र । निवेदनपत्र । प्रार्थनापत्र । उ०—गरजी ह्वै दियो उन पान हमैं पढ़ि साँवरे रावरे की अरजी ।—तोष (शब्द०) । २. दे० 'अर्जीं' ।

अरजी (२) पु †
[अ० अर्ज+हिं० ई (प्रत्या०)] प्रार्थी । उ०—अरजी पिव पिव रटन परखि तब प्रगटत मरजी ।—सुधाकर (शब्द०) ।

अरजुन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्जुन' ।

अरज्जु (१)
वि० [सं०] बिना रस्सीवाला [को०] ।

अरज्जु (२)
संज्ञा पुं० कारागृह । जेल [को०] ।

अरझना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'अरुझना' ।

अरझा (१) †
संज्ञा पुं० [दे०] छोटी जाति का सन । सनई ।

अरझा (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० अरुझाना] १. उलझन । झमेला । २. बखेड़ा । टंटा । झगड़ा ।

अरटु
संज्ञा पुं० [सं०] अरल नाम का वृक्ष [को०]

अरडींग †
वि० [देश०] बलिष्ठ । जोरावर ।—डिं० ।

अरण †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरण्य' । उ०—अरण आज्ञाकारी मूझ नायक अवध अवध वितानै वेग आवाँ ।—रघु० रू०, पृ० १०४ ।

अरणव पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्णव' । उ०—अरणव सांते उदर विरछ रोमांच विचालें ।—रघु० रू०, पृ० ४४ ।

अरणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रकार का वृक्ष । गनियार । अँगेयू । २. सूर्य । ३. काठ का बना हुआ एक यंत्र जो यज्ञों में आग निकालने के काम आता है । अग्निमंथ । विशेष—इसके दो भाग होते हैं—अरणि या अधरारणि और उत्तरारणि । यह शमीगर्भ अश्वत्य से बनाया जाता है । अध- राराणि नीचे होती है और इसमें एक छेद होता है । इस छेद पर उत्तरारणि खड़ी करके रस्सों से मथानी के समान मथी जाती है । छेद के नीचे कुश या कपास रख देते हैं जिसमें आग लग जाती है । इसके मथने के समय वैदिक मंत्र पढ़ते हैं और ऋत्विक् लोग ही इसके मथने आदि का काम करते हैं । यज्ञ में प्रायः अरणि से निकली हुई आग ही काम में लाई जाती हैं । ४. चीता नामक वृक्ष या उसकी लकड़ी । ५. श्योनाक । सोना पाढ़ा । ६. अग्नि । ७. चकमक पत्थर ।

अरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'अरणि' ।

अरणिकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] अग्निमंय नामक वृक्ष (को०) ।

अरणीसुत
संज्ञा पुं० [सं०] शुकदेव । विशेष—लिखा है कि व्यास जी का वीर्यपात अरणी पर होने से शुकदेव की उत्पत्ति हुई थी ।

अरण्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वन । जंगल । २. कटफल । कायफल । ३. संन्यासियों के दस भैदों सें से एक । ४. रामायण का एक कांड । यौ०.—अरण्यगान अरण्यरोदन ।

अरण्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. जंगल । २. जंगली सभा । ३. एक पौधा [को०] ।

अरण्यकणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जंगली जीरा [को०]

अरण्यगान
संज्ञा पुं० [सं०] सामवेद के अंतर्गत एक गान जो जंगल में गाया जाता था ।

अरण्यचंद्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० अरण्यचन्द्रिका] जंगल की चाँदनी (ला०) । वह शृंगार जिसका देखनेवाला या प्रशंसा करनेवाला न हो [को०] ।

अरण्यदमन
संज्ञा पुं० [सं०] दोन नामक एक पौधा । दोना [को०] ।

अरण्यनृपति
संज्ञा पुं० [सं०] शेर । सिंह [को०] ।

अरण्यपंडित
संज्ञा पुं० [सं० अरण्यपण्डित] मूर्ख व्यक्ति । बुद्धिहीन मनुष्य [को०] ।

अरण्यमक्षिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] डाँस । जंगली मक्खी [को०] ।

अरण्ययान
संज्ञा स्त्री० [सं०] वानुप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना [को०] ।

अरण्यरोदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. निष्फल रोना । ऐसी पुकार जिसका सुननेवाला कोई न हो । २. ऐसी बात जिसपर कोईध्यान न दे । वह बात जिसका कोई ग्राहक न हो । जैसे—इस भीड़भड़ में कोई बात कहना अरण्यरोदन है ।— (शब्द०) ।

अरण्यवास्तुक
संज्ञा पुं० [सं०] जंगली बेंत [को०] ।

अरण्यवास्तूक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अरणयवास्तूक' [को०] ।

अरण्यविलाप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अरण्यरोदन' [को०] ।

अरण्यव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] एक व्रत जो मृगशिरा नक्षत्र के बारहवें दिन पड़ता है [को०] ।

अरण्यश्वान
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेड़िया । २. गीदड़ [को०] ।

अरण्यषष्टी
संज्ञा पुं० [सं०] एक व्रत जो जेठ महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ता है । विशेष—इस दिन स्त्रियाँ फलाहार करती हैं और देवी की पूजा करती हैं यह व्रत संतानवर्धक माना जाता है । शास्त्रानुसार स्त्रियों को बेना लेकर जंगल में घूमना चाहिए ।

अरण्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ओषधि ।

अरण्यानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बीहड़जंगल या वीरान जंगल । २. वन की देवी [को०] ।

अरण्यायन
संज्ञा पुं० [सं०] वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना [को०] ।

अरण्यीय
वि० [सं०] १. जंगल का । २. जंगल के समीप [को०] ।

अरत
वि० [सं०] १. जो अनुरक्त न हो । जो किसी पदार्थ में आसक्त न हो । २. विरत । विरक्त । उ०—मन गोरख गोविंद मन, मन ही ओषधि सोय । जो मन राखै यतन करि, आपै अरता होय ।—कबीर (शब्द०) । ३. सुस्त । आलसी । ४. असंतुष्ट ।

अरति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विराग चित्त का न लगना । उ०— सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु । रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ।—मानस, २ ।२९४ । २. जैन शास्त्रानुसार एक प्रकार का क्रम जिसके उदय से चित्त किसी काम में नहीं लगता । यह एक प्रकार का मोहनीय कर्म है । अनिष्ठ में खेद उत्पन्न होने को भी अरति कहते है ३. असंतोष [को०] । ४. क्रोध [को०] । ५. चिंता [को०] । ६. उच्चाटन [को०] । ७. उद्वेग [को०] । ८. सुस्ती । प्रमाद [को०] । ९. व्यथा । पीड़ा [को०] । १०. एक प्रकार पित्तरोग [को०] ।

अरति (२)
वि० १. असंतुष्ट । २. शांतिरहित । अशांत । ३. सुस्त । प्रमादी [को०] ।

अरत्त पु
वि० [हिं०] दे० 'अरत' । उ०—आलिंगन दे हथ्थ धरि, अरु पुच्छिय इह बत्त । जा जीवन रत्तौ जगत, तू क्यों राज अरत ।—पृ० रा०, १ ।५४८ ।

अरत्नि
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाहु । हाथ । २. कुहनी । ३. मुट्ठी बँधा हाथ । ४. मीमांसा शास्त्र के अनुसार एक माप । विशेष—इससे प्राचीन काल में यज्ञ की वेदी आदि मायी जाती थी । यह माप कुहनी से कनिष्ठा के सिरे तक होती है ।

अरथ पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्थ' । उ०—भनइ विद्यापति, कहओं बुभाए अरथ असंभव के पतिआए ।—विद्यापति, पृ० २३६ ।

अरथाना पु †
क्रि० स० [सं० अर्थ+हिं० आना (प्रत्य०)] १. समझाना । विबरण करना । उ०—पठवौ दूत भरत को ल्यावन बचन कहयौ बिलखाई । दशरथ बचन राम बन गवने यह कहियो अरथाइ ।—सूर०, ९ ।४७ । २. व्याख्या करना । बताना । उ०—भा बिहान पंड़ित सब आए । काढ़ि पुरान जनम अरथाए । जायसी ग्रं०, पृ० १९ ।

अरथी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० रथ] १. लकड़ी की बना हुई सीढ़ी के आकर का एक ढाँचा जिसपर मुर्दे को रखकर श्मशान ले जाते हैं । टिखटी । विमान ।

अरथी (२)
वि० [सं० अ+रथी] १. जो रथी न हो । पैदल । २. जो रथ पर से युद्ध न करे [को०] ।

अरथी (३)
वि० [हिं०] दे० 'अर्थी' । उ०—उत्तम मनुहारिन करे मानै मानिनि संक । मध्यम समयी अधम निजु अरथी निलजु निसंक ।—भिखारी ग्रं० भा० १, पृ० २७ ।

अरदंड †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का करील जो गंगा के किनारे होता है ।

अरद (१)
वि० [सं०] १. बिना दाँतवाला । २. जिसके सभी दाँत गिर गए हों [को०] ।

अरद (२)
संज्ञा पुं० १. दुःख पहुँचाना । २. विनाश [को०] ।

अरदन (१) पु
वि० [सं० अ+रदन] १. बे दाँत का । बे दाँतवाला ।

अरदन (२) पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्दन' ।

अरदना पु †
क्रि० स० [सं० अर्द्दन] १. रौंदना । कुचलना । उ०— जदपि अरदरिपु बधत तदपि रद कांति प्रकासत ।—गोपाल (शब्द०) । २. वध करना । मार डालना । उ०—जिमि नकुल नाग को मद हरत तिमि अरि अरदत प्रण किए ।— गोपाल (शब्द०) ।

अरदल
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का वृक्ष जो पश्चिमी घाट और लंक द्विप में होता है । बिशेष—इससे पीले रंग की गोंद निकलती है जो पानी में नहीं घुलती, शराब में घुलती है । इससे अच्छा पीले रंग का वारनिश बनता है । इसका फल खट्टा होता है और खटाई के काम आता है । इसकी लकड़ी भूरे रंग की होती है जिसमें नीली धारियाँ होती हैं । गोरका । ओट । भव्य ।

अरदली
संज्ञा पुं० [अं० आँर्डरली] वह चपरासी या भृत्य जो किसी कर्मचारी या राजपुरुष के साथ कार्यालय में उसके आज्ञापालन के लिये नियुक्त रहता है और लोगों के आने इत्यादि की इत्ताला करता है ।

अरदावा पु †
संज्ञा पुं० [सं० अर्दद्; फा० आरद] १. दला हुआ अन्न । कुचला हुआ अन्न । २. भरता । उ०—घीव टाँक माहिं सौध सिरावा । पंख बधार कीन्ह अरदावा ।—जायसी (शब्द०) ।

अरदास पु †
संज्ञा स्त्री० [फा० अर्जदारत] १. निवेदन के साथ भेंट । नजर । उ० एहि बिधि डील दीन्ह तब ताई । देहली की अरदासें आई ।—जायसी (शब्द०) । २. शुभ कार्य या यात्रारंभ में किसी देवता की प्रार्थना करके उसके निमित्त कुछ भेंट निकाल रखना । ३. वह ईश्वरप्रार्थना जो नानकपंथी प्रत्येक शुभ कार्य, चढ़ावे आदि के आरंभ में करते हैं । ४. प्रार्थना । विनंती ।

अरधंग (१) पु
संज्ञा [सं० अद्धङ्गि] १. आधा अंग । उ०—सिव साहेब अचरज भरो सकल रावरो अंग । क्यों कामहिं जारयो, कियो क्यों कामिनि अरधंग ।—भिखारी ग्रं०, भा० २, पृ० १२५ । २. शिव । उ०—तजै गौरि अरधंग अचल ध्रुव आसन चल्लै ।—हम्मीर०, पृ० १३ ।

अरधंग (२)
वि० दे० 'अर्धांग' ।

अरधंगी (१) पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्धंगी' ।

अरधांगी (२) पु
संज्ञा स्त्री० [अरधंग+ई (प्र०)] स्त्री । पत्नी । उ०—आपु भए पति वह अरधंगी । गीपनि नाँउ धरयौ नवरंगी । सूर०, १० ।३१४४ ।

अरधांगी पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्द्धांग' ।

अरध (१) पु
वि० [हिं०] दे० 'अर्धं' । उ०—फूटयौ पहार सतखंड ह्वै अरध खंड गढ़ भरहरयो ।—हम्मीर०, पृ० ४३ ।

अरध (२) पु
क्रि० वि० [सं० अध०] अंदर । भीतर । उ०—अरध उरध अस है दुइ हीया । परगट गुपुत बरै जस दीया ।— जायसी (शब्द०) ।

अरधभाषरी पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] अर्ध भाषरी । एक प्रकार का राजस्थानी गीत जो भाषरी का आधा होता है ।

अरधसाबझड पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] एक प्रकार का राजस्थानी गीत ।

अरधाई पु
वि० [हिं० अरध+आई प्रत्य०] आधा । उ०—तीनि हाथ एक अरधाई ।—कबीर ग्रं०, पृ० १३३ ।

अरध्र
वि० [सं०] १. जो पराजित न हो । अपराजेय । २. समृद्ध [को०] ।

अरन (१)
संज्ञा पुं० [हिं० अड़न] एक प्रकार की निहाइ जिसके एक या दोनों ओर नोंक निकली होती है ।

अरन (२)
संज्ञा पुं० [सं० अरण्य, प्रा० अरण्य] दे० 'अरण्य' ।

अरना (१)
संज्ञा पुं० [सं० आरण्यक] जगली भैंसा । विशेष—जंगलों में इसके भुंड के झुंड मिलते हैं । यह साधारण भैसे से बड़ा और मजबूत होता है । इसके सुडौल और दृढ़ अंगों पर बड़े बड़े बाल होते हैं । इसका सींग लंबा, मोटा और पैना होता है और शेर तक का सामना करता है ।

अरना (२) पु
क्रि० अ० [हिं०] शीघ्रता करना । उ०—करौ दया मौ सीस दया कर आयौ सारा चार गुण अरकर ।—रा० रू०, पृ० ६ । २. दे० 'अड़ना' ।

अरनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अड़न' ।उ०—बरषि निझरे मेघ पाइक बहुत कीनी अरनि । सूर सुरपति हारि मानी तब परयौ दुहुँ चरनि ।—सूर०, १० ।९५९ ।

अरनी
संज्ञा स्त्री० [सं० अरणी] १. एक छोटा वृक्ष जो हिमालय पर होता है । विशेष—इसका फल लोग खाते हैं । इसकी गुठली भी काम प्राती है । काश्मीरी और काबुली अरनी बहुत अच्छी होती है । इसकी लकड़ी से चरखे की चरख और डोई आदि बनती है । यह माघ, फाल्गुन में फूलता है और बरसात में पकता है । २—यज्ञ का अग्निमंयन काष्ठ जो शमी के पेड़ में लगे हुए पीपल से लिया जाता है । वि० दे० 'अरणि' । उ०—बारंबार विचार तें उपजै ज्ञान प्रंकास । र्ज्यौ अरनी संघरन तें प्रगटै गु हुतास ।—दीन, ग्रं, पृ० १९६ । ३. जलन । दाह ।

अरन्य पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरण्य' । उ०—'दास' कहै मृगहूँ कों उदास कै बास दियो है अरन्य मँमीरनि ।—भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० १०१ ।

अरपन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्पण' । उ०—बरनै दीनदयाल न देखत रूप कुरूपहि । जो घट अरपन करै ताहि ते ममता कूयही ।—दीन० ग्र०, पृ० २५६ ।

अरपना पु
क्रि० स० [सं० अर्पण] अर्पणा करना । भेंट करना । उ०—(क) पहिले दाता सिख भया तन मन अरपा सीस ।— कबीर (शब्द०) । (ख) तोहि आम की मंजरी अरपित हो सिर माथ । महाराज कंदर्प के धनुष जिन हाथ ।— शकुंतला, पृ० १०६ ।

अरपा
संज्ञा पुं० [देश०] एक मसाला ।

अरपित पु
वि० [हिं०] दे० 'अर्पित' ।

अरब (१)
संज्ञा पुं० [स० अर्बुद] १. सौ करोड़ । संख्या में दसवाँ स्थान । २. इस स्थान की संख्या ।

अरब (२)
संज्ञा पुं० [सं० अर्वन्] १. घोड़ा । २. इंद्र । उ०—सरब गरबंत अरब अरब ऐसे अरब के अरब चरब जहराय के ।— गोपाल (शब्द०) ।

अरब (३)
संज्ञा पुं० [अ०] १. एक मरु देश जो एशिया खंड के पश्चिम- दक्षिण भाग में और भारतवर्ष से पश्चिम है । यहाँ इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब उत्पन्न हुए थे । यहाँ घोड़े, ऊँट और छुहारे बहुत होते हैं । २. अरब देश का उत्पन्न घोड़ा ३. अरब का निवासी ।

अरबर पु
वि० [अनुध्व०] [स्त्री० अरबरी०] १. ऊटपटाँग । असंबद्ध । उ०—भक्तनि की सुधि करी खरी अरबरी मति, भावन करत भोग सुखद लगाए हैं—प्रिया (शब्द०) । २. कठिन । मुश्किल ।

अरबराना पु
क्रि० अ० [हिं० अरबर से नाम०] १. घबराना । व्याकुल होना । विचलित होना । (क) ब्याही ही विमुख घर आयो लेन कहै पर खरी अरबरी कोई चित्त चिंता लागी है ।— प्रिया (शब्द०) । (ख) सुनि सीच परेउ हियो खरो अरबरेउ मन गाढ़ो लै कै करेउ बोल्यो हाँ जू सरसाई है ।—प्रिया (शब्द०) । २. लटपटाना । अड़बड़ाना । उ०—सिखवति चलन जसोदा मैया । अरबराइ कर पानि गहावत डगमगाइ धरनी धरे पैंया ।—सूर०, १ । ११५ ।

अरबरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० अरबर] घबराहट । हड़बड़ी । उ०— (क) सभा की चाह अवगाह हनूमान की गरे डारि दई सुधि भई अति अरबरी है ।—प्रिया (शब्द०) ।

अरबिंद पु
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्द] दे० 'अरविंद' । उ०—देखत क्यों न अपूरब इंदु में द्वे अरबिंद रहे गहि लाली ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २०६ ।

अरबिस्तान
संज्ञा पुं० [अ० अरब+फा० स्तान] अरब देश ।

अरबी (१)
वि० [अ० अरब+फा० ई (प्रत्य०)] अरब देश का ।

अरबी (२)
संज्ञा पुं० १. अरबी घोड़ा । अरब देश का उत्पन्न या अरबी नस्ल का घोड़ा । ताजी । ऐराकी ।विशेष—यह सब घोड़ों से अधिक बलवान, मेहनती, सहिष्ण, और आज्ञानुवर्ती होता है । इसके नथने चौड़े, गाल और जबड़े मोटे, माथा चौड़ा, आँखें बड़ी बड़ी, थुथुने छोटे, पुट्ठा ऊँचा और दुम जरा ऊपर चढ़कर शुरू होती है । इसके कान छोटे, तथा दुम और अयाल के बाल चमकीले होते हैं । २. अरबी ऊँट । अरब देश का ऊँट । विशेष—यह बहुत दृढ़ और सहिष्णु होता है और बिना दाने पानी के मरुभूमि में चलता रहता है । ३. अरबी बाजा । ताशा ।

अरबी (३)
संज्ञा स्त्री० अरब देश की भाषा ।

अरबीला पु
वि० [हिं अरबर] १. भोलाभाला । अंडबंड । उ०— देखति आरसी मैं मुसुक्याति है छाँडि दई बतियाँ अरबीली ।— लाल (शब्द०) । २. लड़ाका । युद्ध से न भागनेबाला । अड़नेवाला ।

अरबुद पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्बुद' । उ०—बुरे ऋषि बृंद सुअरबुद आय । जहाँ ऋषि चाय बसैं सत भाय ।— हम्मीर रा०, पृ० ८ ।

अरब्बी (१)
वि० [हिं०] दे० 'अरबी' ।

अरव्बी (२)
संज्ञा पुं० [फा० अरबी] १. अरबी बाजा । ताशा ।— बाजै अरब्बी उमड़िकै गज्जै मनो घन घुमड़ि कै—पद्माकर ग्रं०, पृ० ८ । २. अरबी घोड़ा । उ०—अरब्बी फिरै बेस उब्बीन पै जे । नटों की कला सीकला जान लै जे ।-पद्मामकर ग्रं०, पृ० २८० ।

अरभक पु
वि० [हिं०] दे० 'अर्भक' ।

अरम
वि० [सं०] क्षुद्र । नीच [को०] ।

अरमण
वि० [सं०] १. अरुचिकार । २. खराब । ३. असंतोषदायक । ४. बिरामरहित । निरंतर ।

अरममाण
वि० [सं०] दे० 'अरमण' [को०] ।

अरमनी
संज्ञा पुं० [फा०] आरमेनिया देश का निवासी । विशेष—आरमेनिया काकेशश पहाड़ से दक्षिण में है यहाँ के लोग विशेष सुंदर होते हैं ।

अरमाँ
संज्ञा पुं० [तु० अर्मान] दे० 'अरमान' । उ०—ऐ फलक क्या क्या हमारे दिल में अरमाँ रह गया ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८४९ ।

अरमान
संज्ञा पुं० [तु० अर्मान] इच्छा । लालसा । चाह । मुहा०—अरमान निकालना=इच्छा पूरी करना । उ०—बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।—कविता कौ०, भा० ४. पृ० ४७६ । अरमान भरा=उत्सुक । अरमान रहना या रह जाना=इच्छा का पूरा न होना । मन की बात मन ही में रहना ।

अरर (१)
अव्य० [सं० अरेरे] एक शब्द जो अत्यंत व्यग्रता तथा अचभे की दशा में मुँह से निकलता है, जैसे—अरर ! यह क्या हुआ (शब्द०) ।

अरर (२)
संज्ञा पुं० [सं० अरर] १. किवाड़ कपाट । २. पिधान । ढक्कन । ३. उलूक [को०] । ४. युद्ध [को०] ।

अरर (३)
संज्ञा पुं० [सं० अरर, अरल] मैनफल [को०] ।

अररनादररना पु
क्रि० स० [अमु०] दलना । पीसना । उ०— चित करु गोहुआँ प्रेम की दउरिया समुझि समुझि झिंकवा नावहु रे का अररिदररि जो पीसैं लागी सजनी ह्वै वह पिया की सोहागिनि रे की ।—कबीर (शब्द०) ।

अररराना पु
क्रि० अ० [अनुध्व] अरर शब्द करना । अरराना । उ०—अरररात दोउ बृच्छ घर । अति आघान भयौ ब्रज भीतर ।—सूर०, १० ।३८१ ।

अरराना
क्रि० स० [अनुघ्व०] अररर शब्द करना । टूटने या गिरने का शब्द करना । उ०—तरु दोउ धरनि गिरे भहराइ । जर सहित अरराई कै आघात शब्द सुनाइ ।—सूर०, १० ।३९१ । २. अरररर शब्द करके गिरना । तुभुल शब्द करके गिरना । उ०—बरत बनपात भहरात झहरात अररात तरु महा धरनी गिरायौ ।—सूर० १० ।५९६ । ३. भहरा पड़ना । सहसा गिरना । उ०—(क) खाय दरार परी छतियाँ अब पानी परे अरराय परेंगी (शब्द०) । (ख) सिंहद्वार अरराया जनता भीतर आई ।—कामायनी० पृ० १६८ ।

अरराहट
संज्ञा सज्ञा [हिं० अरर+आहट (प्रत्य०)] अरराने की घ्वनि या आवाज । उ०—यों ही अरराहट अरावन को छायों है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ३२० ।

अररि
संज्ञा पुं० [सं०] १. द्वार । २. किवाड़ [को०] ।

अररी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. द्वार । २. किवाड़ [को०] ।

अररु
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुश्मन । २. एक हथियार । ३. एक असुर का नाम [को०] ।

अरलु
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्योनाक । टेंटु । सोनापाड़ा । सोनागाछ । २. अलाबु । अलाबू । कडुई लौकी ।

अरव
वि० [सं०] शोरगुल रहित । रवरहित । शाँत [को०] ।

अरवन
संज्ञा पुं० [सं० अ=नहीं+हिं लवना=खेत की कटाई] १. फसल जो कच्ची काटी जाय । २. वह फसल जो पहले पहल काटी जाय और खलिहान में न ले जाकर घर पर लाई जाय । इसके अन्न से प्रायः देवताओं की पूजा होती है और ब्र ह्नाण आदि खिलाए जाते हैं । अवई । अवरी । अवाँसी । कवल । कवारी ।

अरवान
संज्ञा पु० [देश०] वह भौंरी जो घोड़े के कान की जड़ में गर्दन की ओर होती है । यह यदि दोनों ओर हो तो शुभ और एक ओर ही तो अशुभ समझी जाती है ।

अरवा (१)
संज्ञा पुं० [सं० अ=नहीं+हिं० लावना=जलाना, भूनना] वह चावल जो कच्चे अर्थात् बिना उबाले या भूने धान से निकाला जाय ।

अरवा (२) †
संज्ञा पुं० [सं०आलय=स्थान] आला । ताखा ।

अरवाती पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० ओरवती] छाजन का वह किनारा जहाँ से पानी बरसने पर नीचे गिरता है । ओलती । ओरौती । उ०—सजनी नैना गए भगाइ । अरवाती कौ नीर बड़ेरी कैसैं फिरिहैं धाइ ।—सूर० (शब्द०) ।

अरवाह पु
संज्ञा पुं० [अ० रूह का बहुव० अवहि] जीवात्मा । उ०— दादू इश्क अल्लाह का, जे कबहूँ प्रगटै आइ । तौ तन मन अरवाह का सब पड़दा जलि जाइ ।—दादू बा०, पृ० ६७ ।

अरविंद
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्द] १. कमलयौ०—अरविंदनयन । अरविंदनाभ । अरविंदबंधु । अरविंदलोचन अरविंदाक्ष । २. सारस । ३. नील या रक्तकमल [को०] । ४. कामदेव के पाँच वाणों में से एक [को०] । २. तांबा [को०] ।

अरविंददल प्रभ
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्ददलप्रभ] ताँबा [को०] ।

अरविंदनयन
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्दनयन] कमलनयन । विष्णु ।

अरबिंदनाभ
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्दनाभ] कमलनाभ । विष्णु ।

अरविंदनाभि
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्दनाभि] विष्णु [को०] ।

अरविंदवंधु
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्दबन्धु] कमलबंधु । सूर्य ।

अरविदयोनि
संज्ञा पुं० [सं० अरन्दियोनि] कमलयोनि । ब्रह्मा ।

अरविंदलोचन
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्दलोचन] कमलनयन । विष्णु ।

अरविंदसद्
संज्ञा पुं० [सं० अरविन्दसद्] ब्रह्मा [को०] ।

अरविंदाक्ष
सज्ञा पुं० [सं० अरविन्दाक्ष] विष्णु ।

अरविंदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० अरविन्दिनी] १. कमलिनी । २. कमल लता । ३. कामलसमूह । ४. कमल से भरा स्थान [को०] ।

अरवी
संज्ञा पुं० [स० आलू] एक प्रकार का कंद । विशेष—इसके पत्ते पान के पत्तों के आकार के बड़े बड़े होते हैं । यह दो प्रकार की होती है, एक सफेद डंठी की, दूसरी काली डठी की । जड़ या कंद से बराबर पत्तों के लंबे लंबे डंठल निकलते रहते हैं । नीचे नई पत्तियाँ बंधती जाती हैं । यह छूने में लसदार और खाने में कुछ कनकनाहट लिए हुए स्वादिष्ट होती है । लोग इसके पत्ते का साग इत्यादि बनाकर भी खाते हैं । यह अधिकतर बैसाख जेठ में बोई जाती है और सावन में तैयार हो जाती है । उ०—चूक लाय कै रीधे भाँटा । अरवी कहँ भल अरहन बाँटा ।—जायसी (शब्द०) ।

अरअ (१)
वि० [सं०] नीरस । फीका । २. गँवार । अनाड़ी । ३. कमजोर । निर्बल [को०] ।

अरस (२)
संज्ञा पुं० [सं० अ० अर्श] आलस्य । उ०—नहिंन दुरत हरि प्रिय कौ परस । उपजत है मन को अति आनँद, अधरनि रँग, नैननि को अरस ।—सूर०, १० ।२६५९ ।

अरस पु
संज्ञा पुं० [अ अर्ब्श] १. छत । पाटन । २. धरहरा । महल । उ०—(क) मारु मारु कहि गारि दे, धिक गाइ चरैया । कंस पास ह्वै आइए कामरी ओढ़ैया । बहुरि अरस तैं आइ कै, तब अंबर लोजौ ।—सूर०, १० ।३०३८ । (ख) अरस नाम है महल कौ, जहँ राजा बैठे । गारी दै दैसब उठे, भुज निज कर ऐठे ।—सूर० (शब्द०) । ३. आकाश । उ०—चलकर महल निकट गिर पहुँचिय चढ़ रज अरस फरक धुज चाहि ।— र घु० रू० पृ० ११९ । ४. मुसलमानों के मतानुसार सबसे ऊपरवाला स्वर्ग जहाँ खुदा रहता है ।

अरसठ पु
वि० [हिं०] दे० 'अड़सठ' ।

अरसथ
संज्ञा पुं० [देश०] मासिक आयव्यय का लेखा । बही जिसमें प्रति मास के आयव्यय की खतियौनी जाती है ।

अरसनपरसन पु
संज्ञा [हिं०] दे० 'अरसपरस' ।

अरसना पु
क्रि० अ० [सं० अलस] शिथिल पड़ना । ढीला पड़ना । मंद होना । उ०—आवती हों उत ही सो, उनकी विलोकि दसा, बिरह तिहारे अंग अंग अरसे ।—रघुनाथ (शब्द०) ।

अरसनापरसना
क्रि० सं० [सं० स्पर्शन] १. छूना । उ०— अरस परस चुटिया गहै, बरजति है माई ।—सूर० १० । १६२ । २. आलिंगन करना । मिलना । भेंटना । उ०—काहू कै मन कछु दुख नाहीं । अरसी परसि हाँसि हँसि हँसि लपटाहीं ।— सूर० १० । ९२० ।

अरसपरस (१)
संज्ञा पुं० [सं० स्पर्श] लड़कों का एक खेल । आँखमिचौनी । छुआछुई । अँखमुनाल । उ०— गुरू बतावै साध को साधु कहैं गुरु पुज । अरस परस के खेल में भई अगम की सूझ —कबीर (शब्द०) । विशेष—इस खेल में एक लड़के को अलग कर देते है । वह लड़का आँख मूँदता है ओर सब लड़के दूर भाग जाते है । जब उससे आँख खोलने को कहते है तो वह औरों की छूने के लिये दौड़ता है । जिसे बह छू लेता है वह भी अलग किया जाता है और फिर उसे भीआँख मूँदनी पड़ती है ।

अरसपरस (२)
संज्ञा पुं० [सं० दर्शन स्पर्शन] देखना । उ०—बिनु देख बिनु अरस परस बिनु नाम लिए का होई । धन के कहे धनिक जो हो तो निर्धन रहत न कोई ।—कबीर (शब्द०) ।

अरसा
संज्ञा पुं० [अ० अर्सह] १. समय । काल । २. देर । अतिकाल ३. अंतर । दूरी । फसिला [को०] । ४. क्षेत्र । मैदान [को०] ।

अरसाना पु
क्रिया अ० [सं० अलप्त] अलसाना । निद्रग्रस्त होना । उ०—ऐंवति सी चितवन चितै, भई ओट अरसाय । फिर उझकन को मृगनयनी, दृगनि लगनियाँ लाय ।—बिहारी (शब्द०)

अरसात
संज्ञा पुं० [सं० अलस आलस्य़] २४ अक्षरों का एक बृत्त जिसमें सात 'भरण' और एक 'रगण' होता है । यह एक प्रकार का सवैया है । य़था—भासत रुद्र जु घ्यानिन में पुनि सारसुती जस वानिन मानिए । नारद ज्ञानिन पनिन गंग सु रानिन में विकटोरिया मानिए । दानिन में जस कर्ण बड़े तस भारत अंब खरी उर आनिए । बेटन के दुख छूटन में कबहूँ अरसात नहीं फुर जानिए । (शब्द०) ।

अरसान पु
वि० [सं० अश्रव] बाधा । पाप । उ०— बोलै गंगा साँचही महादेव कर भाव । जोगिन्ह । आनि जेवाबहू जाई कौल अरसाब । —चित्रा० पृ० १२५ ।

अरसाशा
संज्ञा पुं० [सं०] रूखा सुखा भोजन । बिना स्वाद का । स्वादरहीत [को०] ।

अरसिक
वि० [सं०] १. जो रसिक न हो । अरसज्ञ । रूखा । २. कविता के मर्म को न समझनेवाला । ३. बेस्वाद या बिना जायका का [को०] ।

अरसी (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० अतसी, प्रा० *प्रड़सी] अलसी । तीसी । उ०—जनहु मात निययानी बरसी । आति बिसभर फूले जनु अरसी ।—जायसी (शब्द०) ।

अरसी (२) पु
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'आरसी' । उ०— तन झुरसी तरसी हियै परसी बिरह जरूर । दृगनि बारि झर सी लगी दरसी आरसी नूर ।—सं० सप्तक, पृ० ३८६ ।

अरसीला पु
वि० [सं० अलस] [स्त्री० अरसीली] आलस्यरपूर्ण । आलस्य से भरा । उ०—आजु कहाँ तजु बैठी है भूषण ऐसे ही अंग कछू अरसीलो । —मतिरम (शब्द०) ।

अरसाँहाँ पु
वि० [सं० आलस्य,. हि० अरस + औहाँ (प्रत्य०)] आलस्यपूर्ण । आलस्यभरा । उ०—(क) नखरेखा । सोहै नई, अरसोहै सव गात, सौहै होत न नैन ये तुम सौंहैं कत खात— बिहारी (शब्द०) ।(ख) सोहै चितै अरसौहै तिया तिरछोहै हसोहैं सरवत्ति मालहिं । —देव (शब्द०) ।

अरहंत पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्हत्, प्रा० अरहंत] दे० 'अर्हत' । उ०— पियारे दूजो को अरहंत पूजा जोग मानि कै जग कै जग मै जाको पूजै संत । —भारतेंदु, ग्रं०, भा,० २ पृ० १३३ ।

अरहट
संज्ञा पुं० [सं० अरघट्ट, प्रा० अरहट्ट] एक यंत्र जिसमें तीन चक्कर या पहिए होते है । इन पहीयों पर घड़ों की माला लगी होती है जिनसे कुएँ से पानी निकाला जाता है । रहँट । उ०—कबीर माला मन की और संसारी भेष । माला पहरयाँ हरि मिलै, तो अरहट कै गलि देष । कबीर ग्रं, पृ० ४५ ।

अरहन
संज्ञा पुं० [सं० रन्धन] वह आटा या बेसन जो तरकारी, साग आदि पकाते समय उसमें मिला दिया जाता है । रेहन । उ०—चूक लाइकै रींधे भाँटा । अरवी कहँ भल अरहन बांटा ।— जायसी (शब्द०) ।

अरहना (१) पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्हण; प्रा० अरहणा] पूजा आराधना

अरहना (२) पु
क्रि० सं० पूजा करना । आराधना करना ।

अरहर
संज्ञा स्त्री० [सं० आढ़की प्रा० अड़्ढकी] १. एक अनाज जो दो दल के दाने का होता है । रहर । उ०— सन सूख्यो बीत्यो बनौ, ऊखौ लई उखारि । हरी हरी अरहर आजों । धर धरहर हिय नारि ।—बिहारी (शब्द०) । २. अरहर का बीज । तुवरी । तूअर । पर्या०—तुवरी । वीर्य्या० । करवीरभुजा । बृत्तवीजा । पीतपुष्पा । काशीगृत्स्ना । मृतालका । सुराष्ट्रजंभा । विशेष—इसका पौधा चार पाँच हाथ ऊँचा होता है । इसकी एक एक सीके में तीन तीन पत्तियाँ होती है जो एक ओर हरी और दूसरी ओर भूरी होती है । इसका स्वाद कसैला होता है । मुँह आने पर लोग इसे चबाते है और फोड़े फुंसियों पर भी पीसकर लगाते है । अरहर की लकड़ियां जलाने और छप्पर छाने के कान आती है । इसकी टहनियों और पतले ड़ंठलों से खाँचे और दौरियां बनाई जाती है । अरहर बरसातमें बोई जाती है और अगहन पूसमें फूलती है । इसका फूल पीले रंगका होता है और फूल झड़ जाने पर इसमें डेढ़ दो इंच दालें होती हैं । हैं जिनमें चार पांच दाने होते हैं । गानों नें दो दालें होती हैं । इसके दो भेद हैं । एक छोटी दूसरी बड़ी । बड़ी को 'अरहरा' कहते है और छोटी को रयिमुनिया कहते है । छोटी दाल अच्छी होती है । अरहर फागुन में पकती है और चैत में काटी जाती है । पानी पाने से इसका पेड़ कई वर्ष तक हरा रह सकता है । भिन्न भिन्न देशों में इसकी कई जातियां होती है, जैसे रायपुर में 'हरोना' और 'मिही', बगल में 'मधवा' और 'चैती' तथा आसाम में 'पलवा', 'देव' या 'नली' ।

अरहेड़ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० हेड़] चौपायों का झुड़ । लेहड़ी । —ड़ि० ।

अरा (१) पु
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'आरा' । भौंहें अरालै अरेरति है उरकोर कटाक्षन ओर अराए ।—दे (शब्द०) ।२. संघर्ष । झगड़ा ।

अरा (२) †
संज्ञा स्त्री० [सं० आर] पहिए की गड़ारी और उसके मध्य भाग को मिलने वाली पतली सलाई । तीली ।

अराअरी पु
संज्ञा स्त्री० [हि० अड़ना] अड़ाअड़ी । होड़ स्पर्धा । उ०— प्यारी तेरे पूतरी कागज हु ते कारी । मानी द्बै भँवर उड़े बराबरी । चंपे की ड़रि बैठे कुंद अलि लागी है जेब अराअरी —हरिदास (शब्द०) ।

अराक (१)
संज्ञा पुं० [अ०] १. एक देश जो अरब में है । एराक । इराक । २. वहाँ का धोड़ा । उ०—हरतौ हरीफ मान तरतौ समुद्बु य़ुद्दु क्रुदु ज्वाल जरतै अराकनि सों अरतौ ।—भूषण (शब्द०) ।

अराक (२) पु
संज्ञा पुं० दे० 'अड़ाक' ।

अराकन
संज्ञा पुं० [सं० अरि = राक्षस + ग्राम, बरमी, कान = देश] बरमा देश के एक प्रांत का नाम । यह बंगाल की खाड़ी के किनारे पर है ।

अराकी पु
वि० [हि०] दे० 'इराकी' ।

अराग (१)
संज्ञा पुं० [सं०] रागभाव । राग का अभाव । रति का अभाव [को०] ।

अराग (२)
वि० वासनाविहीन । रागविहीन । रातिविहीन [को०] ।

अरागी
वि० [सं० अरागिन्] [स्त्री० अरागिनी] रागरहित । वासनाबिहीन [को०] ।

अरातना पु
क्रि० सं० [सं० अर्चन] अर्चन करना । आदर देना । उ०—तिय तजि लाज कहत रति जाचन । को नहि धर्म जो पुरुष अराचन् ।—हम्मीर रा०, पृ०,४० ।

अराज (१)
वि० [सं० अ + राजन्] बिना राजा का । उ०—जग अराज ह्वै गयौ रिषिन तब अति दुख पायौ । लै पृथ्वी कौ दान ताहि फिरि बनाहि पठायौ ।—सुर०, ९ ।१४ ।

अराज (२)
संज्ञा पुं० अराजकता । शासन विप्लव । हलचल ।

अराजक
वि० [सं०] १. जहाँ राजा न हो । राजहीन । बिना राजा का । २. अराजकता फैलानेवाला । विद्रोह या बिप्लव करनेवाला ।

अराजकता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. राजा का न होना । २. शासन का अभाव । ३. अशांति । हलचल । आँधेर । यौ०—अराजकतावाद=व्याक्तिस्वातंत्र्य का समर्थ न करेवाला तथा शासन की अनावश्यकता मनानेवाला सिद्धात या वाद ।

अराजन्य
वि० [सं०] क्षत्रियविहीन [को०] ।

अराजवीजी
वि० [सं० अराजवीजिन्] अराजकता फैलनिवाला । राजविद्रोह का प्रचार करनेवाला । विशेष—कौटिल्य ने ऐसे मनुष्यों को बहाँ भैजने का विधान बताया है जहाँ उपनिवेश बसाने सें बहुत कठिनता या खर्च हो ।

अराजव्यसन
संज्ञा पुं० [सं०] अराजकता संबंधी संकट ।

अराजो
संज्ञा स्त्री० [अ० अर्ज का बहुव०] १. भूमि । धरती । जमीन । २. वह जमीन जो खेती बारी के काम आती है [को०] ।

अराड़
संज्ञा पुं० [सं० अट्टाल] १. राशि ढेर । अंबार । २. टूटी फूटी रठा रद्दी वस्तुओं का अंबार । ३. जलावन की दूकान ।

अराड़ना
क्रि० अ० [१] गर्भपात हो जाना । गर्भ का गिर जाना । बच्चा फेंकना ।विशेष—इस शब्द का व्यवहार प्रायः पशुपो ही के लिये होता है ।

अरात पु
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'अराति' [को०] ।

अराति
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु । उ०—कर लिया निश्चित अरिंदम ने निपात अराति का ।—कानन० पृ० ११२ । २. फलित ज्योतिष में कुंड़ली का छठा स्थान । ३. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य जो मनुष्य को आंतरिक शत्रु है । ४. छह की संख्या ।

अराद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वैमनस्य । २. दुर्भाग्य । ३. दोष । पातक [को०] ।

अराधन पु
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'अराधन' ।

अराधना पु
क्रि० स० [सं० आराधन] १. आराधना करना । उपासना करना । उ०—हम अलि गोकुलनाथ अराध्यौ । सूर० १० । ३५३० । २. पूजा करना । अर्चना करना । ३. जपना । ४.ध्यान करना ।

अराधी पु
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'आराधी' ।

अराना पु
क्रि० स० [हि०] दे० 'अड़ाना' । उ०—भौहै । अरा लै अरेरति है उर कोर कटाक्षन ओर अरारे ।—देव (शब्द०) ।

अराबा
संज्ञा पुं० [अ०] १. गाड़ी । रथ । उ०—(क) चामिल पार भए सब आछे । तबै अड़ोल अराबे पाछे ।—लाल (शब्द०) । (ख) जोतै अराबी नार है सो सब लीना संग । उतारि पार ड़ेरा दए ठठि पठान सों जंग ।—सुजान०, पृ० ५१ । २. वह गाड़ी जिसपर तोप लादी जाय । चरख । उ०—लावदार रक्खो किए सबै अराबौ एहु । ज्यों हरीफ आबै नजरि तबै धड़ाधड़ देहु ।—सुजान०, पृ० १५ । (ख) दाराघाट धीरपुर बाँध्यौ । रोपि अराबै कलहै काँध्यो । लाल (शब्द०) । ३. जहाज पर तोपों का एक बार एक ओर दागना । सलख ।

अराम (१) पु †
संज्ञा पुं० [सं० आराम] बग । उपवन ।—ये नहिं फूल गुलाब के दाहत हिय जु हमार । बिन घनश्याम अराम में लगी दुसह दबार ।

अराम (२)
संज्ञा पुं० [फा आराम] दे० 'आराम' ।

अरारूट
संज्ञा पुं० [अ० एरोरुट] एक पौधा जो अमेरिका से हिंदुस्तान में आया है । विशेष—गरमी के दिनों में दो दो फुट की दूरी इसके कंद गाड़े जाते हैं । इसके लिये प्रच्छी दोमट और बलुई जमीन चाहिए । यह अगस्त से फूलने लगता है और जनवरी फरवरी में तैयार हो जाता है और इसकी पत्ते झड़ने लगने है तब यह पक्का समझ्ना जाता है और इसकी ज़ड़ खोद ली जाती है । खोदने पर भी इसकी जड़ रह ही जाती है । इससे, जहाँ यह एक बार लगाया गया वहाँ इसका उच्छिन्न करना कठिन होता है । इसकी जड़ को पानी में खूब धोकर कूटते है और फिर उसका सत निकालते हैं जो स्वच्छा मैदे की तरह होता है । यह अमेरिका की तीखुर है । इसका रंग देसी तीखुर के रंग से सफेद होता है तथा इसमें गंध और स्वाद नही होता । २. अरारूट का आटा ।

अरारोट
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'अरारुट' ।

अराल (१)
वि० [सं०] कुटिल । टेढ़ा । उ०—भाल पर भाग, लाल बेंदी पै सुहाग, देव भृकुटी अराल अनुराग हुलस्यो परै ।—देव (शब्द०) । यौ०—अरालकेशी = कुटील केश या अलकवाली । घुँघराले बालोंवाली ।

अराल (२)
संज्ञा पुं १. सर्ज रस । राल । २. मत्त हाथी । ३. देढ़ा या टूटा हाथ (को०) । ४. एक समुद्र [को०] ।

अआला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अपवित्र नारी । सतीत्वहीन नारी २. अधृष्ठा स्त्री० [को०] ।

अरावल पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'हरावल' ।

अरावली
संज्ञा पुं राजस्थान का एक पहाड़ ।

अराष्ट्र
संज्ञा पुं० [सं०] राज्यसत्ता का नाश या अभाव [को०] ।

अरिंज
संज्ञा पुं० [देश.] एक प्रकार का बबूल । सफेद बबूल । विशेष—यह पंजाब, राजपूताना, मध्य और दक्षिण भारत तथा बरमा में पाया जाता है । इसका छिलका रेशेदार होता हैऔर इससे मछली पकड़ने का जाल बनाया जाता है । इससे एक प्रकार की गोंद भी निकलती है जो पानी में घोली जाने पर पीला रंग पैदा करती है । यह अमृतसरी गोंद कहलाती है । इसे बबूल की गोंद के साथ भी मिलाकर बेचते है । पेड़ की छाल को पीसकर गरीब लोग अकाल में बाजरे के आटे के साथ खाने के लिये मिलाते हैं । इसमें एक प्रकार का नशा भी होता है और यह मद्य में भी मिलाई जाती है । इसीलिये अरिंज को "शराब का कीकर" भी कहते है ।

अरिंद पु
संज्ञा पुं० [सं अरि + इन्द्न] शत्रु । उ०—तहँ मारि मारि अरिंद बरछी सों गिराए गयन तें ।—पद्माकर ग्रं० पृ० २० ।

अरिंदम
वि० [सं० अरिन्दम] १. शत्रुनाशक । बैरी का दमन करनेवाला । उ०—कर लिया निश्चिन अरिंदम ने निपात अराति का । —कानन०, पृ० ११२ । २. विजयी ।

अरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु । बैरी । चक्र । ३. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य । ४. छह की संख्या । ५. ज्योतिष में लग्न से छठा स्थान । ६. विट् खदिर । दुर्गंध खैर । अरिमेद । ७. स्वामी [को०] । ८. रथ का कोई हिस्सा [को०] । ९. वायु [को०] ।१०. धार्मिक व्यक्ति [को०] ।

अरिकर्षक
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रुओं का कर्षण या पराभव करनेवाला [को०] ।

अरिकुल
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रुसमूह । २. शत्रु [को०] ।

अरिकेलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शत्रुक्रीड़ा । २. वासनात्मक आनंद [को०] ।

अरिकेशी
संज्ञा पुं० [सं० अरी + केशी] केशी के शत्रु, कृष्ण ।

अरिक्थभाग
वि० [सं०] जिसे पिता के धन का भाग न मिल सके । पिता का हिस्सा पाने रे अयोग्य अनंश ।

अरिघ्न
वि० [सं०] शत्रुहंता [को०] ।

अरिचिंता
संज्ञा स्त्री० [सं० अरिचिन्ता] शत्र के विघटन या विनाश के लिए सोचना [को०] ।

अरित्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बल्ला जिससे नाव खेते हैं । डाँड़ । २. क्षेपणी । निपातक । ३. जल की थाह लेने की ड़ोरी । ४. लंगर ।

अरित्र (२)
वि० [सं०] १. शत्रु से रक्षा करनेवाला । २. आगे बढ़ानेवाला [को०] । यौ०—अरित्रगाध=छिछला ।

अरिदमन (१)
वि० [सं० अरी + दमन = नाश] शत्रु का नाश करनेवाला ।

अरिदमन (२)
संज्ञा पुं० शत्रुध्न । लक्षमण के छोटे भाई का नाम । रिपुदमन ।

अरिनिपात
संज्ञा पुं० [सं०] दुश्मन का हमला [को०] ।

अरिनुत
वि० [सं०] शत्रु भी जिसकी प्रशंसा करें [को०] ।

अरिप्रकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] य़ुद्ध में प्रवृत्त राजा के चारों ओर के शत्रुओं की स्थिति ।

अरिभद्र
संज्ञा पुं० [सं०] अति शक्तिशाली शत्रु [को०] ।

अरिमर्द
संज्ञा पुं० [सं०] काममर्द नाम का पौधा [को०] ।

अरिमर्दन (१)
वि० [सं०] शत्रुओं का नाश करनेवाला । शत्रुसूदन ।

अरिमर्दन (२)
संज्ञा पुं० १. केकयनरेश राजा भानुप्रताप का भाई जो शापवश कुंभकर्ण हुआ था । २. अक्रूर का भाई ।

अरिमेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. विट् खदिर । २. एक बदबूदार कीड़ा । गंधिया । ३. एक वृक्ष ।

अरिमेदक
संज्ञा पुं० [सं०] मल में उत्पन्न होनेवाला एक प्रकार का कीड़ा [को०] ।

अरिया †
संज्ञा स्त्री० [देश.] एक प्रकार की छोटी चिड़िया जो प्राय?पानी के किनारे रहती है । इसे ताक या लेदी भी कहते हैं ।

अरियाना पु
क्रि० स० [सं० अरे] अरे कहकर बुलाना । तिरस्कार करना । उ०—वलकलौ धरैं तजै अनेक भरैं, जनपद गहत लहत मंत्र मत हैं । ऐसे बल तपैं परलोकन ते अरियाते कोसनि अचल तैते केबरो लगत है ।—गुमान (शब्द०) ।

अरिल्ल
संज्ञा पुं० [सं० अरिला] सोलह मात्राओं का एक छंद जिसके अंत में दो लघु अथवा एक यगण होता है, परंतु इसमें जगण का निषेध है । भिखारीदास ने इसके अंत में भगण माना है । जैसे,—ले हरिनाम मुकुंद मुरारी । नारायण भगवंत खरारी (शब्द०) ।

अरिवन
संज्ञा पुं० [देश.] रस्सी का फंदा जिसमें फँसाकर घड़ा या गगरा कुएँ में ढीलते है । उबका । उबका । छोर । फँसरी ।

अरिष
संज्ञा पुं० [सं०] १. लगातार बरसत । २. गुदा का एक रोग । [को०] ।

अरिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्लेश । पीड़ा । २. आपत्ति । विपत्ति । ३. दुर्भाग्य । अमंगल । ४. अपशकुन । अशुभ लक्षण ५. दुष्ट ग्रहों का योग जिसका फल ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अनिष्ट होता है । मरणकारी योग । ६. लहसुन । ७. नीम । निंब । ८. लंका के पास एक पर्वत । ९. कौवा । काक । १०. कंक । गिद्ध । ११. रीठे का पेड़ । फोनिल । निर्मली । १२. वह अरक जो बहुत सी दवाओं की मीठे में सड़ाकर बनाया जाय । एक प्रकार का मद्य जो धूप में ओषधियों का खमीर उठाकर बनता है । १३. काढा़ । १४. एक ऋषि । १५. एक राक्षस का नाम जिसे श्रीकृष्णचंद्र ने मारा था । वृषभासुर । १६. अनिष्टसूचक उत्पात; जैसे भूकंप आदि । १७. बलि का पुत्र, एक दैत्य । १८. मट्ठा । तक । १९. सौरी । सूतिकागृह । २०, कौटिल्य के अनुसार एक प्रकार का असंहत व्यूह जिसमें रथ बीच में, हाथी कक्ष में और घोड़े पृष्ठ भाग में रहते थे ।

अरिष्ट (२)
वि० १. दृढ़ । अविनाशी । २. शुभ । ३. बुरा । अशुभ ।

अरिष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] १. रीठा । निर्मली । २. रीठे का वृक्ष ।

अरिष्टगृह
संज्ञा पुं० [सं०] सौरगृह [को०] ।

अरिष्टनेमि
संज्ञा पुं० [सं०] १. कश्यप प्रजापति का एक नाम । २. हरिवंश के अनुसार कश्यप का एक पुत्र जो विनता से उत्पन्न हुआ था । ३. राजा सगर के श्वशुर का नाम । ४. सोलहवें प्रजापति । ५. जैनियों के बाईसवें तीर्थंकर । ६. हरिवंश के अनुसार वृष्णि का एक प्रपौत्र जो चित्रक का पुत्र था ।

अपिष्टमथन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिष्णु । २. शिव [को०] ।

अरिष्टसूदन
संज्ञा पुं० [सं०] बिष्णु का एक नाम ।

अरिष्टा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कश्यप ऋषि की स्त्री और दक्ष प्रजापति की पुत्री जिससे गंधर्व उत्पन्न हुए थे । २. कुटकी । ३. पट्टी [को०] ।

अरिष्टिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रीठी । २. कुटकी ।

अरिहंत पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्हंत' । उ०—कै पूजै श्रीकंत नू, कै पूजै अरिहंत । —बाँकीदास ग्रं० भा०२. पृ० ६० ।

अरिहन (१)
संज्ञा पुं० [सं० अरिघ्न] शत्रुघ्न ।

अरिहन (२)
संज्ञा पुं० [सं० अर्हत्] वीतराग । जिन ।

अरिहन (३)
संज्ञा पुं० [सं० रन्घन] रेहन । अरहन ।

अरिहा (१)
वि० [सं० अरिहन्] शत्रुघ्न । शत्रु का नाश करनेवाला ।

अरिहा (२)
संज्ञा पुं० लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न । उ०— (क) बोरौं सबै रघुवंश कुठार की धार में बारन बाजि सरत्थहिं । बान की वायु उड़ाय के लच्छन लच्छ करौं अरिहा समरत्थहिं ।— राम चं० पृ० ३५ । (ख) जूझि गिरे जबहीं अरिहा रन । भाजि गए तबहीं भट के गन ।-राम चं० पृ० १७५ ।

अरी
अव्य० [सं० अयि] संबोधनार्थक अव्यय जिसका प्रयोग स्त्रियों के ही लिये होता है । उ०— अरी, खरी सटपट परी, बिधु आधैं मग हेरि । संग लगैं मधुपनु लई भागनु गली अँधेरि ।-बिहारी र०, दो० ४५९ ।

अरिझना पु
क्रि० अ० [हिं०] बझ जाना । रीझना । दे० 'अरुझना' ।

अरीठा
संज्ञा पुं० [सं० अरिष्टक, प्रा० अरिट्ठा] रीठा ।

अरुंतुद (१)
वि० [सं अरुन्तुद] १. मर्मस्थान को तोड़नेवाला । मर्म- स्पृक् । उ०—अरुंतुद वाक्य कहतेहो अही तुम । —साकेत, पृ० ६२ । २. दु?खदायी । ३. कठोर बात कहकर चित्त को दुखानेवाले परुषभाषी । यौ०—अरुंतुदवचन ।

अरुंतुद (२)
संज्ञा पुं० शत्रु । वैरी ।

अरुंधती
संज्ञा स्त्री० [सं० अरुन्धती] १. वशिष्ठ मुनि की स्त्री । २. दक्ष की एक कन्या जो धर्म से ब्याही गई थी । ३. एक बहुत छोटा तारा जो सप्तर्षि मंड़लस्थ वशिष्ठ के पास उगता है ।विवाह में इसे वधू को दिखाने का विधान है । सुश्रुत के अनुसार जिसकी मृत्यु समीप होती है वह इस तारे को देख नहीं सकता । ४. तंत्र के अनुसार जिह्वा । यौ०—अरुंधतीजानि, अरुंधतीनाथ, अरुंधतीपति = वशिष्ट ऋषि । अरुंधती दर्शन न्याय = स्थूल से सूक्ष्म की ओर गमन । वि० दे० 'न्याय' ।

अरुंषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक क्षुद्र रोग जिसमें कफ और रक्त के विकार या कृमि के प्रकोप से माथे पर अनेक मुँहवाले फोड़े हो जाते हैं ।

अरु (१)
संज्ञा पुं० [सं० अरुस्] १. मूर्व । २. रस्म खदिर । ३. मंदार वृक्ष । ४. मर्मस्थान । ५. घाव । जख्म । ६. नेत्र । आँख [को०] ।

अरु (२) पु
संयों [हिं०] दे० 'और' । उ०—सनमुख आयउ दधि अरु मीना । कर । पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ।— मानस, १ । ३०३ ।

अरुआ
संज्ञा पुं० [सं० आलु] एक प्रकार का बहुत बड़ा जंगली वृक्ष । विशेष—यह बंगाल, मध्यभारत तथा दक्षिण भारत में प्राय? जंगली दशा में पाया जाता है । तथा उत्तरप्रदेश में लगाया जाता है । इसमें चैत वैशाख में पीले फूल लगते हैं । इसकी छाल और पत्तियाँ ओषधि के रुप में काम में आती हैं तथा इसकी लकड़ी से ढोल और तलवार की म्यान या इसी प्रकार की अन्य हल्की चीजें बनाई जाती है ।

अरुई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० ] दे० 'अरवी' । उ०— अरुइहिं इमली दई खटाई जेंवत षटरस जात लजाई ।— सूर० १० । १२१३ ।

अरुकटि
संज्ञा स्त्री० [देंश०] एक नगर जो कर्नाटक की राजधानी है । आर्काट । आरकाट ।

अरुगण
वि० [सं०] नीरोग । रोगरहींत ।

अरुचि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रुचि का अभाव । अनिच्छा । २. अग्निमांद्य रोग जिसमें भोजन की इच्छा नहीं होती । ३. धृणा । नफरत । ४. संतोष देनेवाली व्याख्या का अभाव [को०] ।

अरुचिकार
वि० [सं०] जिससे अरुचि हो जाय । जो रुचिकर न हो । जो भला न लगे ।

अरुचिर
वि० [सं०] १. असुंदर । जो अच्छा न लगे । २. अरुचिकर [को०] ।

अरुज्
वि० [सं] रोग से मुक्त । नीरोग [को०] ।

अरुज (१)
वि० [सं०] नीरोग । रोगरहित । स्वस्थ ।

अरुज (२)
संज्ञा पुं० १. अमलतास । २. केसर । ३. सिंदूर ।

अरुझना पु
क्रि० अ० [सं० अवरुन्धन, प्रा० ओरुज्झ] १. उलझाना । फँसना । उ०— (क) पाखन फिरि फिर परा सों फाँदू । उड़ि न सकइ अरुझइ भइ बाँदू । —जायसी (शब्द०) । २. अट— कना । ठहरना । अड़ना । उ०—दुख न रहै रघपतिहि बिलोकत तनु रहै बिनु देखे । करत न प्रान पयान सुनहु सखिअरुझि परी यहि लेखे । —तुलसी ग्र, पृ० ३५१ । ३. लड़ना भिड़ना । संघर्षरत होना ।

अरुझाना पु (१) †
क्रि० स० [हि० अरुझना का प्रं रु०] उलझाना । फँसाना । उ०—नागरि मन गई अरुझाइ । अति विरह तनु भई व्याकुल घरन नैकु सहाइ । —सूर० १० । ६७८ ।

अरुझाना (२)
क्रि० अ० लिपटना । उलझना । उ० —बिटप बिसाल लता अरुझानी ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) मेरो मन हरि चितवनि अरुझानौ । —सूर० १० ।१६६७ ।

अरुटु पु
वि० [सं० रुष्ट] नाराज ।

अरुट्ठना पु
क्रि० अ० [सं० रुष्ट] रुष्ट होना । क्रुद्धहोना । उ०— तिन पर तुट्टौ बीज जौं, जिन पर राज अरुठ्ट । राजकाज संमुह मिरन, दई न कबहू पुट्ठ ।—पृ० रा० ५ ।५ ।

अरुण (१)
वि० पु० [सं०] [वि० स्त्री० अरुणा] लाल । रक्त ।

अरुण (२)
संज्ञा पुं० १. सूर्य । २. सूर्य का सारथी । ३. गुड़ । ४. ललाई जो संध्या के समय पश्चिम मे दिखलाई पड़ती है । ५. एक दानव का नाम । ६. एक प्रकार का कुष्ठ रोग । ७. पुन्नाग वृक्ष । ८. गहरा लाल रंग । ९. कुमकुम । १०. सिंदूर । ११. एक देश । १२. बारह सूर्यो में से एक सूर्य । माघ महिने का सूर्य । १३. एक आचार्य का नाम जो उद्दालक ऋषि के पिता थे १४. एक जहरीला क्षुद्र जंतु [को०] । १५. एक झील जो हिमालय के इस पार है । १६ । सोना । स्वर्ण [को०] । १७ । एक प्रकार का पुच्छल तारा । विशेष—इनकी चोटियाँ चँवर की सी होती हैं । ये कृष्ण अरुण वर्ण के होते हैं । इनका फल अनिष्ट है । ये संख्या में ७७ हैं और वायुपुत्र भी कहलाते हैं । यौ०—अरुणलोचन ।अरुणात्मज ।अरुणोदय । अरुणोपल ।

अरुणकर
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

अरुणकिरण
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

अरुणचूड़
संज्ञा पुं० [सं०] कुक्कुट । मुर्गा । अरुणशिखा ।

अरुणज्योति
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

अरुणनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अरुणलोचन' [को०] ।

अरुणप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

अरुणप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अप्सरा । २. छाया और संज्ञा, सूर्य की स्त्रियाँ ।

अरुणमल्लार
संज्ञा पुं० [सं०] मल्लार राग का एक भेद । इसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं ।

अरुणलोचन
संज्ञा पुं० [सं०] जिसकी आँखे लाल हों । कबूतर [को०] ।

अरुणाशिखा
संज्ञा पुं० [सं०] कुक्टुट । मुर्गा ।

अरुणासारथि
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

अरुणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मजीठ । २. कोदो । ३. अतिविषा । ४. एक नदी का नाम । ५. मुंड़ी । ६. निसोथ । त्रिवृता । ७. इंद्रायन । ८घुँघची । ९. लाल रंग की गाय । १०. उषा । ११. काला अनंतमूल ।

अरुणाई
संज्ञा स्त्री० [सं० अरुणा + हि० आई (प्रत्य०)] ललाई । रक्तता । ललिमा ।

अरुणाग्रज
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ [को०] ।

अरुणाचल
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूरब दिशा ।

अरुणात्मज
संज्ञा पुं० [सं०] १. जटायु । २. यम ३. शनि । ४. सुग्रीव । ५. कर्ण [को०] ।

अरुणात्मजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यमुना । २. ताप्ती [को०] ।

अरुणानुज
संज्ञा पुं० [सं०] अरुणा के लघु भ्राता । गरुड़ [को०] ।

अरुणाभ
वि० [सं०] लालिमायुक्त । राक्ताभ [को०] ।

अरुणार पु
वि० [हिं०] दे० 'अरुनार' ।

अरुणार्चि
संज्ञा पुं० [सं० अरुणार्चिस] सूर्य [को०] ।

अरुणावरज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अरुणानुज' ।

अरुणाश्व
संज्ञा पुं० [सं०] मरुत [को०] ।

अरुणित
वि० [सं०] लाल किया हुआ ।

अरुणिमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ललाई । लालिमा । सुर्खी ।

अरुणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अरुण वर्ग की गाय । २. उषा [को०] ।

अरुणोद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जैन मतानुसार एक समुद्र जो पृथ्वी को आवेष्टित किए है । २. लाल समद्र । अरुणोदधि । ३. एक भील [को०] ।

अरुणोद (२) पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरुणोदय' । उ० —पहिलौ मुख- राग प्रगट भ्यो प्राची, अरुण कि अरुणोद अंबर ।— बेलि०, पृ० १६ ।

अरुणोदधि
संज्ञा पुं० [सं०] एक सागर जो मिश्र और अरब के मध्य में है । पहले यह स्वेज स्थलडमरूमध्य के द्बारा रूम के समुद्र से पृथक् था पर अब डमरू भंगकर देने से यह रूम के समुद्र से मिल गया है । इंगलिस्तान को भारत से जहाज इसी मार्ग से होकर जाते है । लाल सागर ।

अरुणोदय
संज्ञा पुं० [सं०] वह काल जब पूर्व दिशा में निकलते हुए सूर्य की लाली दिखाई पड़ती है । यह काल सूर्योदय से दो मुहूर्त या चार दंड़ पहले होता है । उषाकाल । ब्राह्ममुहूर्त । तड़का । भोर । उ०— देखा तो सुंदर प्राची में अरुणोदय का रसरंग हुआ ।—कामायनी, पृ० ७७ ।

अरुणोदयसप्तमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] माघ शुक्ला । सप्तमी । इस दिन अरुणोदय में स्नान करना पुण्य माना गया है ।

अरुणोपल
संज्ञा पुं० [सं०] पद्मराग मणि । लाल । उ०—जिमि अरुणोपल निकर निहारी ।—मानस ।

अरुन पु
वि०, संज्ञा पुं० [हिं० ] दे० 'अरुण' । उ०— अरुत अधरनि दसन झांई कहौ उपमा थोरि । —सूर० १० ।२२५ ।

अरुनई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अरुणाई' ।

अरुनचूड़ पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरुणचूड़' । उ०**— प्रात पुनीत काल प्रभु जागे । अरुनचूड़ बर बोलन लागे ।—मानस, १ ।११७ ।

अरुनता पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अरुणाई' । उ०—वसी मानहु चरनकमलनि अरुनता तजि तरनि ।-तुलसी ग्रं० पृ० २८२ ।

अरूनाशिखा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरुणाशिखा' । उ०—उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनाशिखा धुनि कान ।—मानस, १ ।११५ ।

अरुनाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अरुणाई' । उ०—प्ररुन चरन अंगुली मनोहर, नख दुतिवंत कछुक अरुपाई । —तुलसी ग्रं०, पृ० ३२५ ।

अरुनाना (१) पु
क्रि० अ० [सं० अरुण, हि० 'अरुन' से नाम०] लाल होना । उ०—अँग अँग भूषन ओर से माँगे कहुँ पाए । देखि थकित रहिं रूप कौं लोचन अरुनाए । —सूर०, १० । २५२२ ।

अरुनाना पु
क्रि० स० लाल करना । उ०—बल लेन चाहे प्राण अति रिसाइ दृग अरुनाइ कै ।—गोपाल (शब्द०) ।

अरुनारा (२) पु
वि० [हिं० अरुन + आरा (प्रत्य०) ][वि०, स्त्री० अरुनारी] लाल रंग का । लाल । उ०—दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे । नासा तिलक को बरनै पारे । —मानस, १ ।१९९ ।

अरुनोदय पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरुणोदय' । उ०—अरुनोदय सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन ।—मानस, १ ।२३८ ।

अरुनोपल पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरुणोपल' ।

अरुरना (१) पु
क्रि० अ० [सं० अरुस = घाव] दुःखित होना । पीड़ित होना । उ०—लै भुजवल्लरी पल्लव हाथन बल्लव मल्लव मोद बिहारै । प्यारी के अंगनि रंन चढ़ै त्यौ अनंग कला कररी नहिं हारै । ओठन दंत उरोज नखक्षत हु जीतै तिया पिय हारौ । उरू मरोरनि ज्यों मरुरै उरही अरुरै अरुरैनि निहारे ।— देव (शब्द०) ।

अरुरना (१) पु
क्रि० अ० [सं० मरोड़] मुड़ना । सिकुड़ना । संकुचित होना । उ०—नीकौ दीठ तूख सी, पतूख सी अरुरि अंग ऊख सी मसरि मुख लागाति महूख सी ।—देव (शब्द०) ।

अरुराना पु
क्रि० सं० [हिं० अरुरना का स० रु०] १. मरोड़ना । २. सिकोड़ना ।

अरुलित पु †
वि० [सं० अरुणित मै० अरुलित] ललाई युक्त । अरुणिमा लिए हुए । उ०—पूर्व दीश अरुलित भेल ।—वर्ण०, पृ० १५ ।

अरुवा (१)
संज्ञा पुं० [सं० अरु] १. एक लता जिसके पत्ते पान के पत्ते के सदृश होते हैं । विशेष—इसकी जड़ में कंद पड़ता है और लता की गाँठों से भी एक सूत निकलता है जो चार पाँच अंगुल बढ़कर मोटा होने लगता है और कंद बन जाता है । इसके कंद की तरकारी बनती है । यह खाने पर कनकनाहट पैदा करता है । बरई लोग इसे पान के भीट पर बोते हैं ।

अरुवा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० रुरुआ] उल्लू पक्षी ।

अरुष (१)
वि० [सं०] १. अक्रोधी । २. चमकदार । ३. बिना हानि का । अक्षत । ४. चक्कर काटनेवाला, जैसे घोड़ा ।

अरुष (२)
संज्ञा पुं० १. अग्नि का लाल रंग का घोड़ा । २. सूर्य । ३. ज्वाला । ४. रक्त वर्णँ के तूफानी बादल [को०] ।

अरुषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उषा । २. ज्वाला । ३. और्व की माता जो भृगु की पत्नी थी [को०] ।

अरुष्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. भिलावाँ । २. अडूसा ।

अरुष्कर (१)
वि० [सं०] घाव या चोट करनेवाला । क्षतकारक [को०] ।

अरुष्कर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अरुष्क' [को०] ।

अरुहा
संज्ञा पुं० [सं०] भुधात्री । भुई आँवला ।

अरू पु
संयो० [हिं०] दे० 'अरु' । उ०—और अब दोनों गई तपस्या तो खंडित भई, अरु, उर्बसी हु जात रही ।—हम्मीर, रा०, पृ० २९ ।

अरूक्ष
वि० [सं०] मुलायम । सुकुमार । नाजुक [को०] ।

अरुझना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'अरुझना' । उ०—(क) कहुँ लरत गजराज बाघ हरना कहुँ जूझत । मल्लयुद्ध कहुँ होत मेष, वृष, महिष अरूझत ।—गुमान (शब्द०) ।

अरूट पु
वि० [सं० आ + रुष्ठ, प्रा० अरुट्ठ हिं० अरुट] अत्यंत क्रुद्ध । उ०—भए कइकाल कराल अरूट । लगै जनु क्रोध सुकज्जल कूट । पृ० रा०, ६ ।१५७ ।

अरूढ़ (१) पु
वि० [सं० आरूढ़] दे० 'आरूढ़' ।

अरूढ़ (२)
वि० [सं० अरूढ़] जो रुढ़ या प्रचलित न हो । अप्रचलित [को०] ।

अरुप (१)
वि० [सं०] रूपरहित । निराकार । उ०—कोइ अरूप ईश्वर मन दीन । —कबीर (शब्द०) । (ख) अगुन अरुप अलख अज जोइ । —तुलसी (शब्द०) । बदशक्त । भद्दा [को०] । असदृश । बेमेल [को०] ।

अरूप (२)
संज्ञा पुं० १. बदसूरत वस्तु । २. सांख्य में प्रधान औ वेदांत में ब्रह्म [को०] ।

अरूपक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध दर्शन के अनुसार योगियों की एक भूमि या अवस्था । निर्बीज समाधि । विशेष—यह चार प्रकार की होती है—(१) आकाशायतन (२) विज्ञानायतन, (३) अविज्ञातायतन, और (४) नैवसंज्ञा संज्ञायतन ।

अरूपक (२)
वि० १. अलंकारविहीन । अभिधात्मक । २. आकृति वा आकार से विहीन [को०] ।

अरूपहार्य
वि० [सं०] जो सौंदर्य द्वारा आकार्षित या परास्त न हो सके ।

अरूपावचर
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध दर्शन के अनुसार चित्त की वृत्ति का वह जिससे अरूप लोक का ज्ञान प्राप्त होता है । विशेष—यह बारह प्रकार के होती है-चार प्रकार की कुशल वृत्ति चार प्रकार की विपाक वृत्ति और चार प्रकार की क्रिया वृ्त्ति ।

अरूपी
वि० [सं० अरूपिन्] बिना रूपवाला । रूप आकार विहीन [को०] ।

अरूरना पु
क्रि० अ० [सं० अरुस् = घाव] दुःखित होना । पीड़ित होना ।

अरूलना पु
क्रि० अ० [अरुस = क्षत, घाव] छिपाना । छिदना । चुभना । उ०—छत आजुको देखि कहौगी कहा छतिया नित ऐसे अरूलति है ।—देव (शब्द०) ।

अरूष
संज्ञा पु० [सं०] १. सूर्य । २. एक प्रकार का साँप [को०] ।

अरूस †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अडूसा' ।

अरे
अव्य० [सं०] १. एक संबोधनार्थक अव्यय । ए । ओ । जैसे— अरे मिठाईवाले इधर आ । २. एक आश्चर्यसूचक अव्यय । जैसे—अरे ! देखते ही देखते इसे क्या हो गया ।

अरेणु (१)
वि० [सं०] १. धूलविहीन । धूलरहित । २. अपार्श्रिव [को०] ।

अरेणु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जो धुल न हो । अधूलि । २. देवी देवता [को०] ।

अरेप
वि० [सं० अपरेस] १. पाप या कंलकरहित । २. शुद्ध । स्वच्छ । कांतिमान् [को०] ।

अरेरना पु
क्रि० अ० [सं० ऋ=जाना] रगड़ना । उ०—भौंहैं अरा लै अरेरति है । उरकोर कटाक्षन ओर अराए । —देव (शब्द०) ।

अरेरे
अव्य० [सं०] क्रोधोदगार तथा निम्नता सूचक संबोधन । २. या दु?खसूचक उदगार । जैसे—अरेरे ! उनका निधन हो गया ।

अरेस पु †
[हिं०] दे० 'अरेह' । उ०—पिड़ जुड़वा भड़ पाँच सौ, रहिया अडिग अरेस । —रा० रू०, पृ० ३१ ।

अरेह पु
वि [सं० अरेख = दास रहित] हार न माननेवाला । उ०—आद नाय लख धीर अरेहा । औ मछरीक ढाल दल एहा । —रा० रू०, पृ० ३१४ ।

अरैल
वि० [हिं० आरला] हठी । जिद्दी । उ०—कोऊ नाहिनै जो बरजै निडर छैल अररानो ही परत डरत रोकत रहत मग बनि अरैल ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०२, पृ० ३६५ ।

अरैली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की झाड़ी जिसके डठलों आदि से नेपाली कागज बनता है । वि दे० 'कघुती' ।

अरोक (१)
वि० [सं० अ + हिं० रोक] न रुकनेवाला । अबाध्य । उ०—तीन लोक माहिं देव मुनि थोक माहिं जाय विकम अरोक सोक ओक करि दियो है ।—गोपाल (शब्द०) ।

अरोक (२)
वि० [सं०] १. प्रभाहीन । बिना कांतिवाला । २. जिसमें छिद्र न हो । अच्छिद्र । यौ०—अरोकंदत, अरोकदंत्=(१) जिसके दाँत काले या बद- रंग हों । (२) घने या निविड़ दाँतोंवाला ।

अरोग
वि० [सं०] रोगरहित । निरोग ।

अरोगना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'अरोगना' । उ०—नंद भमन मैं कान्ह अरोगैं । जसुदा ल्यावैं षटरण भोगौं ।—सूर०, १० । ३९६ ।

अरोगी
वि० [सं०] जो रोगी न हो । नीरोग । चंगा ।

अरोच पु
संज्ञा पुं० [सं० अरुचि] रुचि का अभाव । अनिच्छा । त्याग । उ०—मोचु पंच बान को अरोचु अभिमान को ये सोचु पति प्राण को सकोच सखियान को ।—देव (शब्द) ।

अरोचक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक रोग जिसमें अन्न आदि का स्वाद मुँह में नहीं मिलता । विशेष—यह दुर्गंधयुक्त और घिनौनी चीजों खाने और घिनौना रुप देखने तथा त्रिदोष के प्रकोप से उत्पन्न होता है । इसके प्रधान पाँच भेद हैं—(१) वातज, (२) पित्तज, (३) कफज (४) सन्निपातज और (५) शोकादि से उत्पन्न । २. अरुचि ।

अरोचक (२)
वि० जो रुचे नहीं । अरुचिकर । उ०—सुनि अघाई बत— लाइ उत सुधासने तिय बैन । हठि कत लाल बोलाइअत मोहि अरोचक ऐन—भिखारी ग्रं०, भा० १, पृ० ५४ ।

अरोचकी
वि० [सं० अरोचकिन्] १. मंदाग्नि से पीड़ित । २. सुरुचिसंपन्न । परिमार्जित रुचिवाला [को०] ।

अरोड़
वि० [अरुढ] शूर वीर । वीर ।—डिं० ।

अरोड़ा
संज्ञा पुं० [सं० आरुढ़] [स्त्री० अरोड़ी अरोड़िन] पंजाब की एक जाति जो अपने को खत्रियों के अंतर्गत मानती है ।

अरोध्य
वि० [सं०] जिसकी चाल रोकी न जा सके । अबाध गति वाला [को०] ।

अरोप
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आरोप' । उ०—सदस वाक्यजुग अरथ को करिए एक अरोप ।—भुषण ग्रं०, पृ० ३० ।

अरोर पु
वि० [हिं०] रोर रहित । शांत [को०] ।

अरोष
वि [सं०] रोषरहित । क्रोधविहीन । उ०—अंकु भरे आदरु करै धरै अरोप विधान ।—भिखारी ग्रं०, भा१, पृ० १० ।

अरोहण
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आरोहण' ।—रिषि कस्यप अरोहण कमठ शृंगार रस ।—रघु० रु, पृ० ५३ ।

अरोहन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आरोहण' ।

अरोहना पु
क्रि० अ० [सं० आरोहण] चढ़ना । सवार होना ।

अरोही (१) पु
वि० [सं० आरोही] सवार होनेवाला ।

अरोही (२) पु
संज्ञा पुं० आरोही । सवार ।

अरौसपरौस पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अड़ोस पड़ोस' । उ०—गंग नहावन को नर नारि, चले हैं अरौस परौस के सोऊ ।— पोद्दार० अभि०, ग्रं०, पृ० ५७४ ।

अर्क (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. इंद्र । ३. ताँबा । ४. स्फटिक । ५. विष्णु । ६. पड़िंत । ७. आक । मदार । उ०—अर्कजबास पात बिनु भओउ ।—मानस, ४१५ । ८. ज्येष्ठ भाई । ९. आदित्यवारा । १०. उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र । ११. बारह की संख्या । १२. प्रकाशकिरण [को०] । १३. अग्नि [को०] । १४. एक धार्मिक कृत्य [को०] । १५. स्तुति । स्तोत्र [को०] । १६. भोजन । खाद्य पदार्थ [को०] । १७. सूर्यकांतमणि [को०] ।

अर्क (२)
बि० पूजनीय । अर्चनीय ।

अर्क (३)
संज्ञा पुं० [अ० अरक] किसी चीज का निवोड़ा हुआ रस । राँग । वि० दे० 'अरक' । यौ०—अर्क बादियान=सौफ का अर्क ।

अर्ककांत
संज्ञा पुं० [सं० अर्ककान्त] ११ मंजिलो का भवन [को०] ।

अर्ककांता
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्ककान्ता] हुरहुर का क्षुप [को०] ।

अर्कक्षेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिंह राशि । २. उड़िसा स्थित एक पवित्र स्थान [को०] ।

अर्कगीर
संज्ञा पुं० [अ० अरक + फा० गीर] वह जो इव चुनावे का काम करता है ।

अर्कग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यग्रहण [को०] ।

अर्कचंदन
संज्ञा पुं० [सं० अर्कचन्दन] रक्त चंदन । लाल चंदन ।

अर्कज
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य के पुत्र—१. यम । २. शनि । ३. अश्विनीकुमार । ४. सुग्रीव । ५. कर्ण ।

अर्कजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सूर्य की कन्या१. यमुना । ताप्ती ।

अर्कतनय
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य का पुत्र । कर्ण, यम, शनि, वैवस्वत और सावर्णि मनु आदि [को०] ।

अर्कदिन
संज्ञा पुं० [सं०] रविवार [को०] ।

अर्कनंदन
संज्ञा पुं० [सं० अर्कनन्दन] दे० 'अर्कतनय' [को०] ।

अर्कनयन
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य चंद्रमा जिसके नेत्र हैं वह—विराट् पुरुष ।

अर्कनना
संज्ञा पुं० [अ० अरकनाना] सिरके के साथ भमके में उतरा हुआ पुदीने का अर्क ।

अर्कपत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुनदा । २. एक लता जो विष की ओषधि है । अर्कमूल ।

अर्कपर्ण
संज्ञा पु० [सं०] १. मदार का वृक्ष । २. मदार का पत्ता ।

अर्कपुष्पी
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यमुखी ।

अर्कप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] जवा । जपा । अड़हुल । गुड़हर ।

अर्कबंधु
संज्ञा पुं० [सं०] १. गौतम बुद्ध । २. पद्म ।

अर्कभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह नक्षत्र जो सूर्य द्वारा आक्रांत हो । जिस नक्षत्र में सूर्य हो वह नक्षत्र । २ सिंह राशि । ३. उत्तरा फाल्गुनी ।

अर्कभक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] हुरहुर का पौधा । हड़हुड़ ।

अर्कमूल
संज्ञा पुं० [सं०] इसरमूल लता । रुहिमूल । अहिगंध । विशेष—इसकी ज़ड़ साँप के काटने मेंदी जाती है । बिच्छ के डंक मारने में भी उपयोगी होती है । यह पिलाई और ऊपर लगाई जाती है । स्त्रीयों के मासिक धर्म को खोलने के लिये भी यह दी जाती है । कालीमिर्च के साथ हैजा अतीसार आदि पेट के रोगों में पिलाई जाती है । पत्ते का रस कुछ मादक होता है । छिलका पेट की बीमारियों में दिया जाता है । रस की मात्रा ३० से १०० बूंद तक है ।

अर्कवर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सौर वर्ष [को०] ।

अर्कवल्लभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. बंधुजीव । दुपहरिया । २. कमल [को] ।

अर्कवल्लाभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बंधुजीव । दुपहरिया । २. कमल [को०] ।

अर्कविवाह
संज्ञा पुं० [सं०] मदार के वृक्ष से किया जानेवाला विवाह । विशेष—तीसरे विवाह के पूर्व मदार के साथ विवाह करने का विधान है । तीसरी पत्नी या तीसरा विवाह शुभ नहीं माना गया है । अत? मदार के साथ विवाह कर के उस विवाह को चौथा मान लिया जाता है ।

अर्कवेध
संज्ञा पुं० [सं०] तालीशपत्र ।

अर्कव्रत
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक व्रत जो माघ शुक्ला सप्तमी को पड़ता है । २. राजा का प्रजा की वृद्धि के लिये उनसे कर लेना । जैसे सूर्य बारह महीने अपनी किरणों से जल खींचता है और चार महीने उसे प्रजा की वृद्धि के लिये बरसात है, उसी प्रकार राजा का प्रजा से कर लेकर उनकी वृद्धि में उसे लगाना ।

अर्कसुत
संज्ञा पुं० [सं०] यम । उ०—अर्कसुत की त्रास माहीं कृष्न- रामहिं काम ।—ब्रजनिधि ग्रं०, पृ० १६० ।

अर्कसोदर
संज्ञा पुं० सूर्य का भाई । ऐरावत [को०] ।

अर्कश्मा
संया पुं० [सं०] १. एक प्रकार का छोट नगीना । अरुणो- पल । चुन्नी । २. सूर्यकांतमणि ।

अर्कोपल
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यकांतमणि । लाल पद्मराग ।

अर्गजा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरगजा' ।

अर्गल
संज्ञा पुं० [सं०] वह लकड़ी जिसे किवाड़ बंद करके पीछे से आड़ी लगा देते है जिससे किवाड़ बाहर से न खुले । अरगल । अगरी । ब्योंड़ा । २. किवाड़ । ३. अवरोध । ४. कल्लोल । लहर । ५. वे रंगबिरंगे बादल जो सुर्योदय या सुर्यास्त केसंमय पूर्व या पश्चिम दिशा में दिखाई पड़ते है और जिनमें होकर सूर्य का उदय या अस्त होता है । ६. मांस । ७. एक नरक [को०] ।

अर्गला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अरगल । अगरी । २. ब्योंड़ा । ३. बिल्ली । किल्ली । सिटकिनी । ४. जंजीर जिसमें हाथी बाँधा जाता है । सिक्कड़ । ५. एक स्तोत्र जिसका दुर्गासप्तशती आदि में पाठ करते हैं । मत्स्य सूक्त । ६. अवरोध । ७. वाधक । अवपरोधक । रुकावट डालनेवाला ।

अर्गलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अर्गला का छोटा रुप । छोटी अगरी [को०] ।

अर्गलित
वि० [सं०] सिटकिनी या अर्गला से बंद किया हुआ [को०] ।

अर्गली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'अर्गला' [को०] ।

अर्गली (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] भेड़िए की एक जाति जो मिस्त्र, शाम आदि देशों में होती है ।

अर्गवनी
वि० [हिं०] दे० 'अर्गवान' । उ०—उस गरहे अर्गवनी रंग के पर्दे पर ऊँची काली चोटियाँ निश्चल, शांत और गंभीर खड़ी थीं ।—पिंजरे०, पृ० ९ ।

अर्गवानी
वि० [फा०] अर्गवान नामक फूल के रंग का । सुर्ख [को०] ।

अर्घ
संज्ञा पुं० [सं०] १. षोडशोपचार में से एक । जल, दूध, कुशाग्र, दही, सरसों, तंडुल और जव को मिलाकर देवता को अर्पण करना । २. अर्घ देने का पदार्थ । ३. जलदान । सामने जल गिराना । ४. हाथ धोने के लिये जो जल दिया जाय । ५. हाथ धोने के लिये जल देना । ६. मूल्य । दाम । ७. वह मोती जो एक धरण तौल में २५ चढ़े । ८. भेंट । ९. जल से संमानार्थ सींचना । १०. मधु । शहद । ११. घोड़ा । अश्व । क्रि प्र०—देना । करना । यौ०—अर्घपाद्य = हाथ पैर घोने के निमित दिया जानेवाला जल ।

अर्घट
संज्ञा पुं० [संज्ञा] भस्म । राख ।

अर्घपतन
संज्ञा पुं० [सं०] भाव का गिरना । माल की कीमत बाजार में कम होना ।

अघपात्र
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबे का एक बर्तन जो शंख के आकार का होता है और जिससे सूर्य आदि देवताओं को अर्घ दिया जाता है या पितरों का तर्पण किया जाता है । अर्घा ।

अर्घबलाबल
संज्ञा पुं० [सं०] १. उचित मूल्य । २. सस्ता या महँगा दाम । कीमतों का चढ़ाव उतार [को०] ।

अर्घवर्णांतर
संज्ञा पुं० [सं० अर्घवर्णन्तर] अच्छे माल में घटिया माल मिलाकर अच्छे के दाम पर बेंचना । विशेष—ऐसा करनेवाले को चंद्रगुप्त के समय में २०० पण तक जुर्माना होता था ।

अर्घवर्धन
संज्ञा पुं० [सं०] कीमन बढ़ाना । विशेष—कौटिल्य ने इसे अपराध माना है और इस प्रकार दाम बढ़ानेवाले व्यापारी पर २०० पण तक जर्माना लिखा है ।

अर्घवृद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] माल की दर बढ़ना । बाजार में किसी माल की कीमत चढ़ना ।

अर्घसंस्थापन
संज्ञा पुं० [सं०] वस्तुओं का मूल्य निश्चित करना । मूल्यनियंत्रण [को०] ।

अर्घा (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्घ] १. ताँबै या अन्य धातु का बना हुआ थूहर के पत्ते या शंख के आकार का एक पात्र जिससे अर्घ देते हैं । पितरों का तर्पण भी इससे किया जाता है । २. जलधरी ।

अर्घा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] २० मोतियों का लच्छा जिसकी तौल ३२ रत्ती हो । विशेष—वारहमिहिर के समय में एक अर्घा १७० कार्षापण में बिकता था ।

अर्घापचय
संज्ञा पुं० [सं०] मूल्य गिरना [को०] ।

अर्घीश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

अर्घशवर
संज्ञा पुं० [सं०] शिव । महादेव [को०] ।

अर्घ्य (१)
वि० [सं०] १. पूजनीय । २. बहुमूल्य । ३. पुजा में देने योग्य (जल, फूल, मूल आदि) । ४. भेंट देने योग्य ।

अर्घ्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] जिस वन में जरत्कारु मुनि व्रत करते थे वहाँ का मधु ।

अर्चक
वि० [सं०] पूजा करनेवाला । पूजक ।

अर्चन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पूजा । पूजन । २. आदर । सत्कार ।

अर्चन (२)
संज्ञा पुं० [देश०] धुंडी जिसपर दुर दुर कलाबत्तू लपेटा हो ।

अर्चना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूजा । पूजन ।

अर्चना (२) पु
क्रि स० [हिं०] दे० 'अरचना' ।

अर्चनोय
वि० [सं०] १. पूजनीय । पूजा करने योग्य । २. आदरणीय ।

अर्चमान
वि० [सं०] पूजनीय । अर्चनीय । उ०—विचारमान ब्रह्म, देव अर्चमान मानिए ।—राम चं०, पृ, ३ ।

अर्चा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पूजा । २. प्रतिमा ।

अर्चि
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्चिस्] १. अग्नि आदि की शिखा । उ०— शुष्क डालियों से वृक्षों की अग्नि अर्चियाँ हुई समिद्ध—कामा- यनी, पृ०... । २. दीप्ति । तेज । ३. किरण ।

अर्चित (१)
वि० [सं०] १. पूजित । २. आदृत । आदरप्राप्त ।

अर्चित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु ।

अर्चिती
वि० [सं० अर्चितिन्] आराधना करनेवाला [को०] ।

अर्चिमान
वि० [सं०] प्रकाशमान । चमकता हुआ ।

अर्चिमाल्य
संज्ञा पुं० [सं०] वामीकि के अनुसार एक बंदर जो महर्षि मरीचि का पुत्र था ।

अर्चिरादिमार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] देवयान । उत्तर मार्ग ।

अर्चिष्मती
संज्ञा स्त्री० [सं०] अग्निपुरी । अग्निलोक ।

अर्चिष्मान (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्चिष्मत्] [स्त्री० अर्चिष्मती] १. सूर्य । २. अग्नि । ३. देवताओं का एक भेद ४. वाल्मिकि के अनुसार एक बंदर जो महर्षि मरिचि का पुत्र था ।

अर्चिष्मान (२)
वि० दीप्त । प्रकाशमान ।

अर्ज
संज्ञा पुं० [अ० अर्ज] १. विनती । विनय । क्रि० अ०—करना = प्रार्थना करना । कहना । निवेदन करना । २. चौड़ाई । आयत ।

अर्जइरसाल
संज्ञा पुं० [फा०] वह पत्र जिसके द्धारा रुपया खजाने में दाखिल किया जाता है । चलान ।

अर्जक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बनतुलसी । बंबई ।

अर्जक (२)
वि० उपार्जन करनेवाला । करनेवाला [को०] ।

अर्जदाश्त
संज्ञा स्त्री० [फा०] निवेदनपत्र । प्रार्थापत्र । क्रि० प्र०—करना । —देना । —भेजना ।

अर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपार्जन । पैदा करना । कमाना । २. संग्रह करना । संग्रह । क्रि० प्र०—करना ।

अर्जनीय
वि० [सं०] १. संग्रह करने योग्य । २. ग्रहण करने योग्या । प्राप्त करने योग्य ।

अर्जमा पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्यमा] दे० 'अर्यमा' ।

अर्जस्त पु
संज्ञा स्त्री० [फा० अर्जदाश्त] दे० 'अर्जदाश्त' । उ०—पंग काज अर्जस्त चलावहु ।—प० रासो, पृ० ९७ ।

अर्जित
वि० [सं०] १. संग्रह किया हुआ । संग्रहीत । २. प्राप्त किया हुआ । कमाया हुआ । प्राप्त ।

अर्जी
संज्ञा स्त्री० [फा० अर्जी] प्रार्थनापत्र । निवेदनपत्र ।

अर्जीदावा
संज्ञा स्त्री० [फा० अर्जीदावा] वह निवेदनपत्र को अदालत दीवानी या माल में किसी दादरसी के लिए दिया जाय ।

अर्जीनवीस
वि० [फा० अर्जीनवीस] प्रार्थनापत्र या निवेदनपत्र लिखनेवाला [को०] ।

अर्जीनालिश
संज्ञा पुं० [फा० अर्जीनालिश] दे० 'अर्जीदावा' [को०] ।

अर्जीमरंमत
संज्ञा स्त्री० [फा० अर्जीमरम्मत] वह आवेदनपत्र जो किसी पूर्व आवेदनपत्र में छूटी हुई बातों को बढ़ाने या अशुद्धि को शोधने आदि के लिये दिया जाय ।

अर्जुन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वृक्ष जो दक्खिन से अवध तक नदियों के किनारे होता है । विशेष—यह बरमा और लंका में भी होता है । इसके पत्ते टसर के कीड़ों को खिलाए जाते हैं । छाल, चमड़ा, सिझाने, रंग बनाने तथा दवा के काम में आती है । इससे एक स्वच्छ गोंद निकलती है जो दवा के काम में आती है । लकड़ी से खेती के औजार तथा नाव और गाड़ी आदि बनती है । इसको जलाने से राख में चूने का भाग अधिक निकलता है । पर्या०—शिवभल्ल । शंबर । ककुम । काहु । २. पाँच पांड़वों में से मँझले का नाम । ये बड़े वीर और धनु- र्विद्या में निपुण थे । पर्या०—फाल्गुन । जिष्णु । किरीटी । श्वेतवाहन । वृहन्नल । धनंजय । पार्थ । कपिध्वज । सव्यसाची । गांडीवधन्वा । गांडीवी । वीभत्सु । पांडुनंदन । गुडाकेश । मध्यम पांडव । विजय । राधाभेदी ऐंद्रि । २. हैहयवंशई एक राजा । सहस्त्रार्जुन । ४. सफेद कनैल । ५. मोर । ६. आँख का एक रोग जिसमें आँख में सफेद छीटे पड़ जाते हैं । फूली । ७. एकलौना बेटा । ८. अर्जुन (वैदिक) । ९. इंद्र [को०] । १०. चाँदी [को०] । ११. सोना [को०] । १२. दूब [को०] । १३. सफेद रंग [को०] ।

अर्जुन (२)
वि० १. उज्वल । सफेद । २. शुभ्र । स्वच्छ ।

अर्जुनक
वि० [सं०] १. अर्जुन संबंधी । १. अर्जुन की पूजा करनेवाला [को०] ।

अर्जुनच्छवि
वि० [सं०] सफेद । सफेद रंगवाला [को०] ।

अर्जुनध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद ध्वजवाला । हनुमान [को०] ।

अर्जुनपाकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पौधा तथा उसका फल [को०] ।

अर्जुन बदर
संज्ञा पुं० [सं०] अर्जुन नामक पौधे का रेशा [को०] ।

अर्जुनसखा
संज्ञा पुं० [सं०] अर्जुन के मित्र श्रीकृष्ण [को०] ।

अर्जुनयान
संज्ञा पु० [सं०] वराहमिहिर के अनुसार उत्तर का एक देश ।

अर्जुनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बाहुदा या करतोया नदी जो हिमालय से निकलकर गंगा मिलती हैं । २. सफेद रंग की गाय । ३. कुटनी । ४. अनिरुद्ध की पत्नी । उषा का नाम । ५. एक सर्प जाति [को०] ।

अर्जुनीपम
संज्ञा पुं० [सं०] सागौन या टीक नामक वृक्ष [को०] ।

अर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. वर्ण । अक्षर । जैसे, पंचाण=पंचाक्षर । २. जल । पानी । यौ०—दशार्ण = एक देश । दशार्ण = मालवा की एक नदी । ३. एक दंडक वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और आठ रगण होते हैं । यह प्रचित का एक भेद है । ४. सागौन । शाल वृक्ष । ५. रंग [को०] । ६. शोरगुल । युद्धघोष [को०] । ७. जलप्रवाह (को०) ।

अर्णव
संज्ञा पुं० [सं०] १. समुद्र । २. सूर्य । ३. इंद्र । ४. अंतरिक्ष । ५. दंडक वृत्त का एक भेद जिसके प्रत्येक चरण में २. नगण और ९ रगण होते हैं । यह प्रचित का एक भेद है । ६. चार की संख्या । ७. रत्न । मणि । जवाहिर । ८. प्रवाह । धारा [को०] ।

अर्णवज
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्फेन [को०] ।

अर्णवनेमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी [को०] ।

अर्णवपति
संज्ञा पुं० [सं०] सागर । समुद्र [को०] ।

अर्णवपोत
संज्ञा पुं० [सं०] जलयान । पानी का जहाज [को०] ।

अर्णवमंदिर
संज्ञा पुं० [सं० अर्णवमन्दिर] १. वरुण । २. विष्ण [को०] ।

अणवमल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्णवज' [को०] ।

अर्णवयान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्णवपोत' [को०] ।

अर्णवोदभव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्निजार नाम का पौधा । चंद्रमा । ३. अमृत [को०] ।

अर्णवोद् भवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अर्णव से उत्पन्न—लक्ष्मी [को०] ।

अर्णस
वि० [सं०] १. तरंगपूर्ण । २. फेनिल [को०] ।

अर्णस्वान् (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्णस्वत] सागर [को०] ।

अर्णस्वान् (२)
वि० अतिशय जालवाला [को०] ।

अर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नदी ।

अर्णोदि
संज्ञा पुं० [सं०] १. बादल । मुस्तक नाम का पौधा । मोथा [को०] ।

अर्णोनिधि
संज्ञा पुं० [सं०] सागर । समुद्र [को०] ।

अर्णोरुह
संज्ञा पुं० [सं०] कमल [को०] ।

अर्तगल
संज्ञा पुं० [सं०] नीलझिंटी । नीली कटसरैगा [को०] ।

अर्तन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] निंदा [को०] ।

अर्तन (२)
वि० १. निंदा करनेवाला । २. दु?खी । खिन्न [को०] ।

अर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० अर्तित] १. पीड़ा । व्यथा । २. धनुष की कोटि । धनुष के दोनों छोर ।

अर्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] (नाटक में) बड़ी बहन [को०] ।

अर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १.शब्द का अभिप्राय । मनुष्य के हृदय का आशय जो शब्द से प्रकट हो । शब्द की शक्ति । विशेष—साहित्यशास्त्र में अर्थ तीन प्रकार माना गया है— (क) अभिधा से वाच्यार्थ, (ख) लक्षण से लक्ष्यार्थ और (ग) व्यंजना से व्यंग्यार्थ । क्रि० प्र०—करना । —लगाना । —बैठना । २. अभिप्राय । प्रयोजन । मतलब । जैसे—वह किस अर्थ से यहाँ आया है' (शब्द०) । ३. काम । इष्ट । उ०—'यहाँ बैठने से तुम्हारा कुछ अर्थ न निकलेगा' । (शब्द०) । क्रि० प्र०—निकलना । —निकालना । —सधना । साधना । ४. हेतु । निमित । जैसे—'विद्या के अर्थ प्रयत्न करना चाहिए' (शब्द०) । ५. इंद्रियों के विषय । ये पाँच हैं—शब्द, स्पर्श, रुप, रस, और गंध । ३. चतुर्वग में से एक । धन । संपत्ति । ७. अर्थशास्त्र के अनुसार मित्र, पशु, भूमि, धन, धान्य, आदि की प्राप्ति और वृद्धि । ८. कंडगी में लग्न में दुसरा घरा । ९. कारण [को०] । १०. वस्तु । पदार्थ [को०] । ११. लाभ । प्राप्ति [को०] १२. याचना । प्रार्थना [को०] । १३. वास्तिविक स्थिति [को०] १४. तौर तरीका । ढंग [को०] । १५. रोक । रुकावट [को०] । १६. मूल्य [को०] । १७. परिणाम । नतीजा [को०] । १८. धर्म क एक पुत्र [को०] । १९. विष्णु २०. [को०] पुर्वमीमांसा के अनुसार एक श्रेणी अपूर्व [को०] । २१. शक्ति [को०] । २२. दावा [को०] । यौ०—अनर्थ । अभ्यर्थना । समर्थ । समर्थन । सार्थक । निरर्थक । अर्थपति । अर्थगौरव । अर्थकृच्छु । अर्थकरी । अर्थपत्ति । अर्थांतर । अर्थवान् ।

अर्थकर
वि० पुं० [सं०] [स्त्री० अर्थकरी] १. जिससे धन उपार्जन किया जाय । लाभकारी, जैसे—अर्थकरी विद्या ।

अर्थकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. मुख्य या प्रधान काम । २. फलदायक कार्य [को०] ।

अर्थकाम
वि० [सं०] धन की इच्छा रखनेवाला [को०] ।

अर्थकिल्विषी
वि० [सं० अर्थकिल्विषिन्] जो लेनदेन में शुद्धव्यवहार न रखे । बेईमान ।

अर्थकृच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] १. धन की कमी । दरिद्रता । २. राज्य की आर्थिक तंगी । राज्यकर से व्यय का बढ़ना । विशेष—कौटिल्य के अनुसार ऐसी तंगी में चंद्रगुप्त के समय में राज्य जनता से संपूर्ण राज्यकर एक दम से माँग लेता था ।

अर्थकोविद
वि० [सं०] अनुभवी । विशेषज्ञ [को०] ।

अर्थगत
वि० [सं०] शब्द के अर्थ पर आश्रित [को०] ।

अथंगर्भ
वि० [सं०] जिसमें अर्थ भरा हो । अर्थयुक्त [को०] ।

अर्थगृह
संज्ञा पुं० [सं०] कोष । खजाना । जहाँ रुपया पैसा रखा जाता हो [को०] ।

अर्थगौरव
संज्ञा पुं० [सं०] किसी शब्द या वाक्य में अर्थ की गंभीरता ।

अर्थध्न
वि० [सं०] अपव्ययी । फजूलखर्च [को०] ।

अर्थचर
संज्ञा पुं० [सं०] सरकारी नौकर ।

अर्थचिंतक
संज्ञा पुं० [सं० अर्थचिन्तक] वह मंत्री जो राज्य के आयव्यय पर ध्यान रखे । अर्थसचिव । मशीरमाल ।

अर्थचिंतन
संज्ञा पुं० [सं० अर्थचिन्तन] १. अर्थ (माने) के लिये चिंतन । २. धन के लिये सोचना [को०] ।

अर्थचिंता
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्थचिन्ता] अर्थ या धन संबंधी चिंता [को०] ।

अर्थजात
वि० [सं०] १. अर्थ से भरा हुआ । २. धनी [को०] ।

अर्थज्ञ
वि० [सं०] उद्देश्य या मतलब समझनेवाला [को०] ।

अर्थतः
अव्य [सं०] १. वास्तव में । सचमुच । वस्तुत? । २. अर्थ की दृष्टि से [को०] ।

अर्थदंड
संज्ञा पुं० [सं० अर्थदण्ड] वह धन जो किसी अपराध के दंड में अपराधी से लिया जाय । जुर्माना ।

अर्थद (१)
वि० [सं०][स्त्री० अर्थदा] [स्त्री० अर्थदा] धन देनेवाला ।

अर्थद (२)
संज्ञा पुं० १. कुबेर । २. दस प्रकार के शिष्यों में से एक । वह जो धन देकर विद्या पढ़े ।

अर्थदर्शक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो अर्थसंबंधी मुकदमों पर विचार करता है [को०] ।

अर्थदूषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फिजूल खर्च । अपव्यय । २. अन्याय या धोखे से दूसरे की सपत्ति लेना । ३. अर्थ (माने) में गलती पाना । ४. दूसरे की संपत्ति का नष्ट भ्रष्ट करना [को०] ।

अर्थदोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. अर्थसंबंधी दोष । २. साहित्य में चार दोषों में एक [को०] ।

अर्थना (१) पु
क्रि० स० [सं० अर्थ] माँगना । याचना करना ।

अर्थना (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] याचना । निवेदन । प्रार्थना । २. अर्जी- दावा [को०] ।

अर्थन्यायालय
संज्ञा पुं० [सं०] वह न्यायालय जहाँ अर्थसंबंधी भुक- दमो का निर्णय होता है ।

अर्थपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुबेर । २. राजा ।

अर्थपिशाच (१)
वि० [सं०] जो द्रव्य का संग्रह करने में कर्तव्याकर्तव्य पर विचार न करे । धनलोलुप ।

अर्थपिशाच (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो धन का अत्यंत लोभ करता है ।

अर्थप्रकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] नाटको में आनेवाली पाँच महत्वपूर्ण स्थितियाँ—१. बीज, २. बिंदु, ३. पताका, ४. प्रकरी और ५. कार्य ।

अर्थबंध
संज्ञा पुं० [सं० अर्थबन्ध] छंद में शब्द आदि का उचित प्रयोग । पद्यरचना ।

अर्थबुद्धि
वि० [सं०] स्वार्थपरायण [को०] ।

अर्थबोध
संज्ञा पुं० [सं०] वास्तिविक अर्थ का ज्ञान [को०] ।

अर्थभाक्
संज्ञा पुं० [सं० अर्थभाज्] जायदाद में हिस्सा पानेवाला । हकदार [को०] ।

अर्थभृत
संज्ञा पुं० [सं०] अधिक तनखवाह में नकद रुपया लेकर काम करनेवाला व्यक्ति ।

अर्थभ्रंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. धन संपत्ति का विनाश । २. उद्देश्य पूर्ण न होना [को०] ।

अर्थमंत्री
संज्ञा पुं० [सं० अर्थपन्त्रिण] अर्थ के मामनो से संबंद्ध मंत्री ।

अर्थयुक्त
वि० [सं०] अर्थगर्मित । अर्थपूर्ण [को०] ।

अर्थयुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राप्ति । लाभ [को०] ।

अर्थराशि
संज्ञा पुं० [सं०] प्रचुर धन [को०] ।

अर्थलाभ
संज्ञा पुं० [सं०] धन या द्रव्य की प्राप्ति [को०] ।

अर्थलोभ
संज्ञा पुं० [सं०] धन की तृष्णा या लोभ [को०] ।

अर्थवाद
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय के अनुसार तीन प्रकार के वाक्यों में से एक । वह वाक्य जिससे कीसि विधि के करने की उत्तेजना पाई जाय । यह चार प्रकार का है—स्तुति, निंदा, परकृति और पुराकल्य ।

अर्थवादी
वि० [सं० अर्थवादिन्] अर्थवाद को माननेवाला [को०] ।

अर्थवान्
वि० [सं०] १. अर्थ मतलब) वाला । एक विशेष अर्थरखनेवाला । २. धनवान । पैसेवाला [को०] ।

अर्थविकरण
संज्ञा पुं० [सं०] तात्पर्य परिवर्तन [को०] ।

अर्थविज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'अर्थशास्त्र' । २. अर्थ को समझने की ६ प्रक्रियाओं में से एक । धी गुण । [को०] ।

अर्थविद्
वि० [सं०] अर्थ का ज्ञाता । समझकर [को०] ।

अर्थविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यावहारिक जीवन का ज्ञान या विद्या [को०] ।

अर्थवेद
संज्ञा पुं० [सं०] शिल्पशास्त्र ।

अर्थव्यवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] सार्वजनिक राजस्व और उसके आय- व्यय की पद्धति । फाइनांस ।

अर्थशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें अर्थ की प्राप्ति, रक्षा और वृद्धि का विधान हो । प्राचीन काल में इस विषय पर बहुत से आचार्यों के रचे ग्रंथ थे, पर अब केवल कौटिल्य (चाणक्य) का रचा हुआ ग्रंथ मिलता है । अर्थविज्ञान ।

अर्थशौच
संज्ञा पुं० [सं०] लेन देन में शु्द्ध व्यवहार । अर्थव्यवहार की पवित्रता रखना [को०] ।

अर्थसंशयापद
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार ऐसे समानतो्ऽ- थपिद की प्राप्ति जिसमें पार्ष्णिग्राह बाधक हों ।

अर्थसचिव
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्थमंत्री' ।

अर्थसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कौटिल्य के अनुसार पार्ष्णिग्राह को मित्र तथा आक्रंद (शत्रु के शत्रु) का सहारा मिलना । २. अमिलषित की प्राप्ति । सफलता [को०] ।

अर्थहर
वि० [सं०] उत्ताराधिकार में धन पानेवाला ।

अर्थहीन
वि० [सं०] १. निर्धन । २. जिसमें अर्थ न हो । निरर्थक । ३. असफल [को०] ।

अर्थांतर
संज्ञा पुं० [सं० अर्थान्तर] १. भिन्न अर्थ । २. भिन्न कारण । ३. नई परिस्थिति । ४. अर्थ का अंतर [को०] ।

अर्थातरन्यास
संज्ञा पुं० [अर्थान्तरन्यास] १. वह काव्यालंकार जिसमें सामान्य से विशेष का या विशेष से सामान्य का, साधार्म्य या वैधर्म्य द्वारा, समर्थन किया जाय; जैसे-(क) 'लागत निज मति दोष ते सुंदरहू विपरीत । पित्तरोगवश लखहि नर शशि सित शंखहु पीत । 'यहाँ पूर्वार्ध के सामान्य कथन का समर्थन उत्तरार्घ के विशेष कथन से साधर्म्य द्वारा किया गया है । (ख) 'हरि प्रताप गोकुल बच्चों का नहिं करहिं महान । यहाँ 'हरि प्रताप गोकुल बच्यो' इस विशेष वाक्य का समर्थन 'का नहिं करहिं महान' इस सामान्य वाक्य से साधर्म्य द्वारा किया गया है । इसी प्रकार वैधर्म्य का भी उदाहरण समझना चाहिए २. न्याय में एक प्रकार का निग्रह स्थान । जब वादी ऐसी बात कहे जो प्रकृत (असल) विषय या अर्थ से कुछ संबंध न रखती हो, तब वहाँ यह होता है ।

अर्थागम
संज्ञा पुं० [सं०] धनलाभ । आमदनी ।

अर्थात्
अव्य० [सं०] यानी । तात्पर्य यह कि । विशेष—इसका प्रयोग विवरण करने में आता है; जैसे—ऐसा कौन होगा जो भले की प्रशंसा नहीं करता अर्थात् सब करते हैं ।

अर्थातिक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार हाथ में आई या मिली हुई अच्छी वस्तु को छोड़ देना ।

अर्थानर्थसंशय
संज्ञा पुं० [सं०] एक ओर से अर्थ तथा दूसरी ओर से अनर्थ की संभावना ।

अर्थानर्थापद
संज्ञा पुं० [सं०] एक ओर से प्राप्ति और दूसरी ओर से राज्य जाने का भय ।

अर्थानुबंध
संज्ञा पुं० [सं० अर्थानुबन्ध] शत्रु को नष्ट कर पार्ष्णिग्राह को अपने वश में करना ।

अर्थाधिकारी
संज्ञा पुं० [सं० अर्थाधिकारिन्] कोषाधिकारी । खजांची [को०] ।

अर्थाना पु
क्रि० स० [सं० अर्थ+ हिं० आना (प्रत्य०)] अर्थ लगाना । ब्योरे के साथ समझाकर कहना । अरथाना ।

अर्थानुवाद
संज्ञा पुं० [सं०] न्यायशास्त्रानुसार अनुवाद का एक भेद । विधि से जिसका विधान किया गया हो, उसका अनुवचन या फिर फिर कहना ।

अर्थान्वित
वि० [सं०] १. अर्थयुक्त । अर्थगर्भ । २. महत्वपूर्ण । ३. धनवान् [को०] ।

अर्थापत्ति
संज्ञा पुं० [सं०] १. मीमांसा के अनुसार एक प्रकार का प्रमाण जिसमें एक बात कहने से दूसरी बात की सिद्धि आप— से आप हो जाय । नतीजा । निगमन; जैसे—'बादलों के होने से वृष्टि होती है' । इससे यह सिद्धि हुआ कि बिना बादल के वृष्टि नहीं होती । न्यायशास्त्र में इसे पृथक् प्रमाण न मानकर अनु— मान के अंतर्गत माना है ।२. एक अर्थालंकार जिसमें एक बात के कथन से दूसरी बात की सिद्धि दिखलाई जाय । इसअलंकार में वास्तव में यह दिखाया जाता हैं कि जब इतनी बड़ो बात हो गई, तब यह छोटी बात होने में क्या संदेह है; जैसे— (क) मुख जीत्यो वा चंद को कहा कमल की बात । (ख) जिसने शालिग्राम को भूना, उसे बैंगन भूनते क्या लगता है ।

अर्थापत्तिसम
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय में जाती के चौबीस भेदों में से एक । वादी के उत्तर में यह कहना कि यदि तुम मेरा प्रतिपादितअमुक सिंद्धांत न मानोगे तो बड़ा दोष पड़ेगा, अर्थापत्ति सम कहलाता है ।

अर्थाप्रतिकार
संज्ञा पुं० [सं०] वह प्रबंधकर्ता जो कारखाने नौकरों तथा अन्य मनुष्यों को, जिन्होंने कच्चा माल आदि दिया हो, धन देता है ।

अर्थार्थी
वि० [सं० अर्थार्थिन्] १. धन की कामनावाला ।२. धन- प्राप्ति के लिये प्रयास करनेवाला । ३. अपना मतलब चाहनेवाला [को०] ।

अर्थालंकार
संज्ञा पुं० [सं० अर्थआलङ्कार] वह अलंकार जिसमें अर्थका चमत्कार दिखाया जाय । शब्दालंकार के विरुद्ध अलंकार ।

अर्थिक
संज्ञा पुं० [सं०] वे वंदीगण जो राजा को शयन से जगाते है । वैतालिक । स्तुतिपाठक । २. पहरुआ । प्रहरी [को०] ।

अर्थित (१)
वि० [सं०] माँगा हुआ । इच्छित [को०] ।

अर्थित (२)
संज्ञा पुं० कामना । इच्छा [को०] ।

अर्थी (१)
वि० [सं० अर्थिन्] [वि० स्त्री० अर्थिनी] १. इच्छा रखनेवाला । चाह रखनेवाला ।२. कार्यार्थी । प्रयोजनवाला । गर्जी । याचक ३. वादी । मद्दई । ४. सेवक । ५. धनी । ६. दे० 'अरथी' ।

अर्थी (२)
संज्ञा पुं० वह जिसने किसी पर रुपयों का दावा किया हो (स्मृति) ।

अर्थ्य (१)
वि० [सं०] १. माँगने योग्य ।२. उचित । उपयुक्त । अच्छा । ३. धनी । ४. बुद्धिमान् । ५. सत्य । ६. अर्थोंपार्जन करने में कुशल [को०] ।

अर्थ्य (२)
संज्ञा पुं० लाल खड़िया या चाक [को०] ।

अर्दन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० अर्दना] १. पीड़न । दलन । हिंसा । २. जाना । गमन । ३. याचना । माँघना । ४. शिव का एक नाम [को०] ।

अर्दन (२)
वि० १.पीड़क । हिंसक ।२. बेचैन या क्षूव्ध होकर घूमने वाला [को०] ।

अर्दना पु
क्रि० स० [सं० अर्दन = पीड़न] पीड़ित करना । उ०— गहि वैष्णव की दंड कर मेघ समान ननर्दि । मर्दि सुरन रन अर्दि अति जैसे कुपित कपर्दि ।—गोपाल (शब्द०) ।

अर्दनि
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रार्थना । २. माँनना । भिक्षा । ३. बीमारी रोग । ४. आग [को०] ।

अर्दली
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरदली' ।

अर्दित (१)
वि० [सं०] १. पीड़ित । दलित ।२. गत । ३ याचित ।

अर्दित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] एक वातरोग । विशेष—इसमें वायु के प्रकोप से मुहँ और गर्दन टेढ़ी हो जाती है, सिर हिलता है, नेत्र आदि विकृत हो जाते है, बोला नहीं जाता और गर्दन तथा दाढ़ी में दर्द होता है ।

अर्द्धंग पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्द्धिङ्ग] १ शिव । उ०—भंग होत अर्द्धग धनु जानि लखन तिहि काल । कह्यो लोकपालन मनहि सजग होहु यहि काल ।—रघुराज (शब्द०) ।२. एक रोग । दे० 'अर्द्धँग' ।

अर्द्ध (१)
वि० [सं०] किसी वस्तु के दो सम भागों में से एक । आधा

अर्द्ध (२)
संज्ञा पुं० १. स्थान । क्षेत्र ।२. भाग । हिस्सा । ३. आधा हिस्सा । ४. वायु । हवा । ५. वृद्धि । ६. समीप । लगभग [को०] । विशेष—यह शब्द अर्द्ध अर्ध इन दोनों रूपों में संस्कृत है । इससे बननेवाले शब्द भी दोनों रुपों में प्राप्त होते हैं । उनमें और कोई अंतर नहीं होता ।

अर्द्धक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] चंडातक । घुटने तक का लहँगा या पेटी- कोट [को०] ।

अर्द्धक (२)
वि० आधा [को०] ।

अर्द्धकर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] अर्धव्यास त्रिज्या [को०] ।

अर्द्धकाल
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम [को०] ।

अर्द्धकूट
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

अर्द्धकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] रुद्र [को०] ।

अर्द्धगंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्द्धाङ्गा] कावेरी ।

अर्द्धगुच्छ
संज्ञा पुं० [सं० अर्धगुच्छ] वह मोती की माला जिसमें चोबीस लड़ियाँ हों । वाराहमिहिर के अनुसार इसमें बीस लड़ियाँ होनी चाहिए ।

अर्द्धगोल
संज्ञा पुं० [सं०] गोलार्ध [को०] ।

अर्द्धचंद्र
संज्ञा पुं० [सं० अर्द्धचन्द्र] १. आधा चाँद । अष्टमी का चंद्रमा । २. चंद्रिका । मोरपंख पर की आँख । ३. नखक्षत का एक भेद । ४. एक प्रकार का बाण जिसके अग्रभाग पर अर्धचद्राकार नोक होती है । ५. सानुनासिक का एक चिह्न । चंद्रबिंदु— । ६. एक प्रकार का त्रिपुंड । ७. निकाल बाहर करने के लिये गले में हाथ लगाने की मुद्रा । गरदनिया ।

अर्द्धचंद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्द्धचन्द्रा] तिधारा या कर्णस्फोट नाम का पौधा ।

अर्द्धचंद्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्द्धचंद्रिका] कनफोड़ नाम की लता ।

अर्द्धजल
संज्ञा पुं० [सं०] श्मशान में शव को स्नान करा के आधा जल में और बाहर डाल देने की क्रिया ।

अर्द्धज्योतिका
संज्ञा संज्ञा [सं०] ताल का एक भेद ।

अर्द्धतिक्त
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की नीम जो नेपाल में होती है ।

अर्द्धतूर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वाद्य [को०] ।

अर्द्धधार
संज्ञा पुं० [सं०] एक ओर घरवाला चाकू । सुश्रुत में वर्णित २० शल्योपकरणों में से एक [को०] ।

अर्द्धनटेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक रूप [को०] ।

अर्द्धनयन
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं की तीसरी आँख जो ललाट में होती है ।

अर्द्धनाराच
संज्ञा पुं० [सं०] १. जैन शास्त्रानुसार वह हड्ड़ी जो मर्कटबंध और कीलक पाशों में बँधी होती है । २. एक प्रकार का बाण ।

अर्द्धनारी
संज्ञा पुं० [सं०] अर्धनारीश्वर । शिव [को०] ।

अर्द्धनारीश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

अर्द्धनारीश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. तंत्र में शिव और पार्वती का संमिलित रूप । २. आयुर्वेद में रसाजन जिसि आँख में लगाने से ज्वर उतर जाता है ।

अर्द्धपारावत
संज्ञा पुं० [सं०] तीतर ।

अर्द्धपोहल
संज्ञा पुं० [दे०] एक पौधा जिसकी पत्तियाँ मोटी होती हैं ।

अर्द्धप्रादेश
संज्ञा पुं० [सं०] वास्तुशास्त्र में प्रलंबित सेतु के मध्य से आलंबन विंदु तक का अंतर जहाँ शृंखल बँधे रहते हैं । सेतु के मध्य से उसके उस स्थान तक का अंतर जहाँ वह खंमेया दीवार पर टीका रहता है ।

अर्द्धभागिक
वि० [सं०] आधे का हिस्सेदार [को०] ।

अर्द्धभास्कर
संज्ञा पुं० [सं० अर्धभास्कर] दुपहरी । दुपहरिया । मध्याह्न [को०] ।

अर्द्धमागधी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राकृत का एक भेद । पटना औऱ मथुरा के बीच के देश की पुरानी भाषा ।

अर्द्धमाणाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. कौटिल्य के अनुसार वह शीर्षकहार जिसके बीच में मणि हो । २. दस मोतियों की माला । ३. बारह लड़ियोंवाला एक हार [को०] ।

अर्द्धमाणवक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्द्धमाणव' ।

अर्द्धमात्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आधी मात्रा । २. व्यंजन । ३. संगीत शास्त्रानुसार चतुंर्दश मात्राओं का एक भेद ।

अर्द्धमासभृत
संज्ञा पुं० [सं०] वह मजदूर या नौकर जिसे अर्धमासिक (१५ दिन पर) वेतन मिलता हो ।

अर्द्धरथ
संज्ञा पुं० [सं० अर्घरथ] वह रथी जो दूसरे से साथ होकर लड़े [को०] ।

अर्द्धविसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] क, ख, प, फ, के पहले होनेवाले आधे विसर्ग का उच्चारण । विसर्ग का आधा उच्चारण [को०] ।

अर्द्धाविसर्जनीय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्द्धाविसर्ग' [को०] ।

अर्द्धवीक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] कनखी से देखना । तिरछी चितवन ।

अर्द्धवृत
संज्ञा पुं० [सं०] वृत का आधा भाग । वृत का वह भाग जो व्यास और परिधि के आधे भाग से विरा हो । २. पूरे वृत्त की परिधि का आधा भाग ।

अर्द्धवृद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] प्रौढ़ । मध्य आयु का व्यक्ति [को०] ।

अर्द्धवृद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] किराए या सूद का आधा [को०] ।

अर्द्धवैनाशिक
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार अर्धनाश के पक्ष- पाती कणाद के अनुयायी जन [को०] ।

अर्द्धव्यास
संज्ञा पुं० [सं०] केंद्र से परिधि तक का अंतर । त्रिज्या । रेडियस [को०] ।

अर्द्धशफर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की मछली [को०] ।

अर्द्धशब्द
वि० [सं०] धीमी आवाजवाला [को०] ।

अर्द्धसम
वि० [सं०] आधे के बराबरवाला । आधा [को०] ।

अर्द्धसमवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] वह वृत्त जिसका पहला चरण तीसरे चरण के बराबर हो; जैसे, दोहा और सोरठा ।

अर्द्धसीरी
संज्ञा पुं० [सं० अर्घसीरिन्] अपने पारिश्रमिक के बदले में आधी फसल लेनेवाला । अधिया पर खेत जीतनेवाला कृषक [को०] ।

अर्द्धार
संज्ञा पुं० [सं०] ६४ मोतियों की माला अथवा ४० लड़ियोंवाला हार (को०) ।

अर्द्धह्नस्व
संज्ञा पुं० [सं०] ह्नस्व स्वर का आधा [को०] ।

अर्द्धाग
संज्ञा पुं० [सं० अर्घाङ्ग] १. आधा आ । उ०—स्म सवाग अर्धाग शैलात्मजा व्याल नृकपाल माला बिराजै ।—तुलसी ग्रं० पृ० ४५८ । २. एक रोग जिसमें आधा अंग चेष्टाहीन और बेकाम हो जाता है । लकवा । फालिज । पक्षाघात । ३. शिव ।

अर्द्धागिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्द्धाङ्गिनी] पत्नी । भार्या ।

अर्द्धागी (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्धाङ्गिन्] शिव ।

अर्द्धागो (२)
वि० अर्द्धागरोग्रस्त ।

अर्द्धाँशी
वि० [सं० अर्घांशिन्] अर्द्धभाग का अधिकारी [को०] ।

अर्द्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऐसी २५ मोतियों का गुच्छा जिसकी तौल ३२ रत्ती हो । विशेष—वाराहमिहिर के समय एक अर्धा का दाम १३० कर्षापण था । उस समय कर्षापण में दस मासे चाँदी होती थी और वह सोलह मोटे (गोरखपुरी) पैसों के बराबर होता था ।

अर्द्धाली
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्घालि] वह चौपाई जिसमें दो ही चरण हों । आधी चौपाई; जैसे—राम भजन बिनु सुनहु खगेसा । मिटै न जीवन केर कलेसा ।

अर्द्धाविभेदक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अधकपारी । आधासीसी । २. अर्धांग [को०] ।

अर्द्धाशन
संज्ञा [सं०] १. आधा भोजन [को०] ।

अर्द्धासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. आधा आसन । २. अतिशय संमान का स्थान । ३. बराबरी की जगह [को०] ।

अर्द्धिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अर्धसीसी । २. वैश्य स्त्री और ब्राह्मण पिता से उत्पन्न संतान जिसका संस्कार हुआ हो ।

अर्धिक (२)
वि० अधिया पर काम करनेवाला [को०] ।

अर्द्धाकरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. आधा करना । २. मंजूषा काढ़ना बैठाना । जब एक कड़ो दूसरी कड़ो पर (होकर) रखी जाती है तब धरातल समान करके ठीक ठीक बैठाने के लिये प्रत्येक संधिस्थल को आधा आधा छील देते हैं । वास्तुशास्त्र में यह अर्धिकरण कहलाता है ।

अदर्धुक
वि० [सं०] उत्कर्षशील । उन्नतिशील [को०] ।

अद्धेंदु
संज्ञा पुं० [सं० अर्द्धैन्दु] १. अर्धचन्द्र । २. अर्धचंद्राका नखक्षत । दे० 'अर्द्धचंद्र' [को०] ।

अर्द्धेंदुमौलि
संज्ञा पुं० [सं० अर्द्धैन्दुमौलि] शिव ।

अर्द्धैदिक
सं० पुं० [सं०] आधे शरीर तक भिंगोता हुआ पानी । २. मृत शरीर को नहलाकर आधा जल में और आधा बाहर रखने की क्रिया [को०] ।

अर्द्धैदय
संज्ञा पुं० [सं०] एक पर्व जो उस दिन होता है जिस दिन माघ की अमावस्या रविवार को होती है तथा उसी दिन श्रवण नक्षत्र और व्यतीपात योग पड़ता है । इस दिन स्नान करने से सूर्यग्रहण में स्नान करने का फल होता है ।

अर्घंग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अद्धगि' ।

अर्धगी
१ पु संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अर्द्धांगी' ।

अर्धगी (२) पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] आधे अंगवाली स्त्री । अर्धांगिनी उ०—अर्धंगी पूछति मोहन सौं, कैसे हितू तुम्हारे ।—सूर०, १० ।४२३० ।

अर्घ
वि० [सं०] दे० 'अर्द्ध' ।

अर्न पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्ण] जल । पानी । उ०—थंम स्नेह रोमांच स्वरभंग कंप बैबर्न । सबही के अनुभाव ये सात्विक औरो अर्न । भिखारी ग्रं०, भा०२, पृ० २५ ।

अर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० अर्पित] किसी वस्तु पर से अपना स्वत्व हटाकर दूसरे का स्थापित करना । देना । दाना । २. नजर । भेंट । यौ०—कृष्णार्पण । ब्रह्मार्पण । ३. स्थापन । रखना जैसे, पदार्पणकरना । ४. वापस करना । लौटाना [को०] । ५. छेदन [को०] ।

अर्पणप्रतिभू
संज्ञा पुं० [सं०] वह प्रतिभू (जामिन) जो किसी की इस प्रकार जमानत कर कि यदि यह ऋण का धन देगा, तो मैं दूँगा ।

अर्पतर्प पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उरप' तरप । उ०—गाइन अति भाइत भरति अर्प तर्प की तान । अर्प दर्प कंदर्प जनु कीनौ सर संधान ।—स० सप्तक, पृ० ३८३ ।

अर्पना पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्पण] दे० 'अर्पण' । उ०—सिव सर हमको फल दीन्हौं । पुहुप, पान, नामा, फल, मेवा, षटरस अर्पन कीन्हौ ।—सूर०, १० ।७९८ ।

अर्पना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'अरपाना' । उ०—पांडे नहिं भोग लगावन पावै । करि करि पाक जवै अर्वत हैं, तबहीं तब छवै आवै ।—सुर०, १० ।२४९ ।

अर्पित
वि० [सं०] अर्पण किया हुआ । उ०—देवों को अर्पित मधु- तमिश्रित सोम अधर से छूलो ।—कामायनी, पृ० १२८ । २. उकीर्ण [को०] । ३. चित्रित [को०] ।

अर्पिस
संज्ञा पुं० [सं०] हृदय । हृदय का मांस [को०] ।

अर्बदर्ब पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्बद + द्रव्य] धन । संपत्ति । धनदौलत । उ०—अर्बदर्व सब देई बहाई । कै सब जाब न जाय पियाई ।—जायसी (शब्द०) ।

अर्बुद
संज्ञा पुं० [सं०] १. गणित में नवें स्थान की संख्या । दस कोटि । दस करोड़ । २. एक पर्वत जो राजपूताने की मरुभूमि में है । अरावली । आबू जो जैनों पवित्र स्थान है । ३. एक असुर का नाम । ४. कद्रू का पुत्र एक सर्प विशेष एक नरक का नाम [को०] । ५. मेघ । बादल । ६. दो मास का गर्भ । एक रोग जिसमें शरीर में एक प्रकार की गाँठ पड़ जाती है । बतौरी । विशेष—इसमें पीड़ा तो नहीं होती पर कभी कभी यह पक भी जाती है । इसके कई भेद हैं जिनमें से मुख्य रक्तार्बुद और मांसार्बुद हैं ।

अर्बुदी
वि० [सं० अर्बुदिन्] अर्बुद नामक रोग से ग्रसित [को०] ।

अर्भ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बालक । २. शिशि ऋतु । ३. शिष्य । छात्र । ४. सागपात । ५. नेत्रबाला । ६. कुशा ।

अर्भ (२)
वि० १. मिलिन । धुँधला । २. लघु । छोटा [को०] ।

अर्भक (१)
वि० पुं [सं०] १. छोटा । अल्प २. मूर्ख । ३. दुबला । पतला । ४. तुल्य । समान [को०] ।

अर्भक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बालक । लड़का । उ०—गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ।-मानस, १ ।२७२ । २. किसी भी जानवर का बच्चा [को०] । मूर्ख या जड़ व्यक्ति [को०] । ३. नेत्र- बाला । कुश ।

अर्म
संज्ञा पुं० १. आँख का एक रोग । टेंटर । ढेंढ़र । २. पुराना आधा उजड़ा नगर या गावँ । ३. गंतव्य देश वा स्थान [को०] ।

अर्मनी
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अरमानी' ।

अर्य (१
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० अर्या, अर्याणी, अर्यों,] १. स्वामी । २. ईश्वर । ३. वैश्य ।

अर्य (२)
वि० १. श्रेष्ठ । उत्तम । २. दयालु । अनुकूल [को०] ।

अर्यमा
संज्ञा पुं० [सं० अर्यमन्] १. सूर्य । २. बारह अदित्यों में से एक । ३. पितर के गणों में से एक जो सबसे श्रेष्ठ कहे जाते हैं । ४. उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र । ५. मदार । ६. अंतरंग मित्र लँगोटिया यार [को०] ।

अर्रबर्र †
संज्ञा पुं० [हिं०] अंडबंड बात । बेकार बात । फिजूल चर्चा ।

अर्रा
संज्ञा पुं० [देश०] १. जंगली पेड़ जो अर्जुन वृक्ष से मिलता जुलता होता है । इसकी लकड़ी बड़ी मजबूत होती है और छत पाटने के काम आती है । २. अरहर ।

अर्ल
संज्ञा पुं० [अं०] [स्त्री० कौंटेस] इंगलैंड के सामंतो और बड़े भूम्याधिकारियों को वंशपरंपरा के लिये दी जानेवाली एक प्रतिष्ठासूचक उपाधि इसका दर्जा मार्किवंस के नीचे और वाइकौंट के ऊपर है । वि० दे० 'ड्यूक' ।

अर्वट
संज्ञा पुं० [सं०] भस्म । राख [को०] ।

अर्वती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. घोड़ी । २. दूती । कुटनी । ३. परी । विद्याधरी [को०] ।

अर्वा
संज्ञा पुं० [सं० अर्वन्] १. घोड़ा । २. घोड़े का सवार । असवार सवार । ३. चंद्रमा के दस घोड़ों में से एक । ४. इंद्र । ५. एक प्रकार की दूरी । ६. जाना । दौड़ना । घूमना [को०] ।

अर्वाक
अव्य० [सं० अर्वाक्] १. पीछे । इधर । २. निकट । समीप । ३. नीचे । यो०—अर्वाक् कालिक = आधुनिक । अर्वाकस्त्रोता = जिसका वीर्यपात हुआ हो । उर्द्धरेता का उलटा ।

अर्वाग्विल
वि० [सं०] १. अधोमुख । निचे की तरफ मुँह या छिद्र वाला [को०] ।

अर्वाग्वसु (१)
वि० [सं०] धनदाता [को०] ।

अर्वाग्वसु (२
संज्ञा पुं० १. वर्षा । २. बादल [को०] ।

अर्वाचीन
वि० [सं०] १. पीछे का । आधुनिक । २. नवीन । नया । ३. उलटा । विपरीत [को०] । ४. नम्र । कृपालु [को०] ।

अर्वावसु
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं का होता [को०] ।

अर्वुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत में कथित दक्षिण की एक जंगली जाति जिसे सहदेव ने विजित किया था ।

अर्श (१)
वि० [सं०] १. पापयुक्त । दुर्भाग्य लानेवाला ।

अर्श (२)
संज्ञा पुं० [सं० अर्शस्] १. बवासीर । २. क्षति । हानि [को०] ।

अर्श (३)
संज्ञा पुं० [अ०] १. आकाश । उ०—अर्श तक जाती थी अब लब तक भी आ सकती नहीं । रहम आता है 'बयाँ' अब मझको अपनी आह पर ।—शेर०, भा०१. पृ० १७५ । २. स्वर्ग । ३.चरखी जिसपर ऊन काता जाता है । ४. छत । पाटन [को०] । ५. सिंहासन । तखत [को०] । ६. लड़ाई । झगड़ा [को०] ।

अर्शवर्त्म
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की बवासीर जिसमें गुदा के किनारे ककड़ी के बीज के समान चिकनी और किंचित् पीड़ा- युक्त फुंसिय़ाँ होती हैं ।

अर्शस
वि० [सं०] बवासीर का रोगी [को०] ।

अर्शसान
संज्ञा पुं० [सं०] १. आग । २. एक राक्षस [को०] ।

अर्शहर
संज्ञा पुं० [सं०] सूरन । ओल । जमींकद ।

अर्शी
वि० [सं० अर्शिन्] अर्शरोगी [को०] ।

अर्शोघोर
वि० [सं०] अर्श नामक रोग का नाशक [को०] ।

अर्शोध्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूरन । ओल । जमीकंद । २. मिलावाँ । ३. सज्जीखार । ४. तेजबल । ५. सफेद सरसों ।

अशोध्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तालमूली । २. भल्लातक [को०] ।

अर्शोहर
संज्ञा पुं० दे० 'अर्शोध्न' [को०] ।

अर्शोहित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] भल्लातक [को०] ।

अर्शोहित (२)
वि० अर्शरोग को ठीक करनेवाला [को०] ।

अर्हत
संज्ञा पुं० [सं० अर्हन्त] १. जैनियों के पुज्यदेव । जिन । २. बुद्ध ।

अर्ह (१)
वि० [सं०] १. पूज्य । २. योग्य । उपयुक्त । ३. मूल्य के योग्य मूल्यवान् [को०] । विशेष—इस शब्द का प्रयोग अधिकतर यौगिक शब्द बताने में होता है; जैसे—पूजार्ह । मानार्ह । दंडार्ह ।

अर्ह (२)
संज्ञा पुं० १. ईश्वर । २. इंद्र । विष्णु [को०] । ४. मूल्य । दाम [को०] । ५. गति [को०] । ६. उपयुक्तता [को०] ।

अर्हणा
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्हणा' ।

अर्हणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० अर्हणीय] पूजा । संमान ।

अर्हणीय
वि० [सं०] पूजनीय । संमाननीय [को०] ।

अर्हत (१)
वि० [सं०] पूजा ।

अर्हत (२)
संज्ञा पुं० जिनदेव ।

अर्हता
संज्ञा स्त्री० [स०] योग्यता । उपयुक्तता [को०] ।

अर्हन
वि० संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अर्हत' ।

अर्हित
वि० [सं०] पूजित । संमानित । आदृत ।

अर्ह्य
वि० [सं०] १. पूज्य । मान्य । २. पूजनीय । माननीय । आदर— णीय । ३. योग्य । उपयुक्त । अधिकारी [को०] ।

अलं
अव्य० [सं० अलम्] दे० 'अलम्' ।

अलंकटंकटा
संज्ञा स्त्री० [सं० अलङ्गङ्गटा] विद्युतकेश नामक राक्षस की पत्नी । सुकेश की माता । विशेष—वाल्मिकि रामायण के उत्तरकांड में इस राक्षसवंश का सृष्टि के आदिकाल में उत्पन्न होना लिखा है ।

अलंकरण
संज्ञा पुं० [सं० अलङ्गरण] १. सजावट । २. शृंगार ३. आभुषण [को०] ।

अलंकर्ता
वि० [सं० अलङ्गर्त] सजाबट करनेवाला । अलकृत करनेवाला [को०] ।

अलंकार
संज्ञा पुं० [सं० अलङ्कार] [वि० अलंकृत] १.आभूषण । गहना । जेवर । २. अर्थ और शब्द की वह युक्ति जिससे काव्य की शोभा हो । वर्णन करने की वह रीति उसमें प्रभाव और रोचकता आ जाय । विशेष—इसके तीन भेद हैं—(क) शब्दालंकार, अर्थात् वह अलंकार जिसमें शब्दों का सौंदर्य हो, जैसे अनुप्रस; (ख) अर्थालंकार, जिसके अर्थ में चमत्कार हो, जैसे उपमा और रूपक और किसी किसी आचार्य के मत से (ग) उभयालंकार जिसमें शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार हो । आदि में भरत मुनि ने चार ही अलंकार माने हैं—उपमा, दीपक, रूपक और यमक । उन्होंने अलंकारों के धर्म को इन्हीं के अतंर्गत माना है । अलंकार यथार्थ में वर्णन करने की शैली है, वर्णन का विषय नहीं । पर पीछे वर्ण नीय विषयों को भी अलंकार मान लेने से अलंकारों की संख्या और भई बढ़ गई । स्वभावोक्ति औक उदात्त आदि अलंकार इसी प्रकार के हैं । ३. वह हाव, भाव या क्रिया आदि जिससे स्त्रियों का सौंदर्य बढ़े । ४. सजावट । मंडप [को०] । ५. अलंकार संबंधी शास्त्र [को०] ।

अलंकारक
संज्ञा पुं० [सं० अलङ्कारक] आभूषण । अलंकार [को०] ।

अलंकारमंडप
संज्ञा पुं० [सं० अलङ्कारमण्डप] सजावट का स्थान । प्रसाधनकक्ष । ड्रसिंग रूम ।

अलंकारशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं० अलङ्कारशास्त्र] वह शास्त्र जिसमें अलं— कारों का वर्णन और विवेचन हो ।

अलंकित पु
वि० [हिं०] दे० 'अलंकृत' ।

अलंकिय पु
वि० [सं अलङ्कृत, प्रा० अलंकिय] दे० 'अलंकृत' । उ०—नील बरन बसुमतिय । पहिर आभ्रन अलंकिय ।— पृ० रा०, २५ । ३५ ।

अलंकृत
वि० [सं० अलङअकृत] १. विभूषित । गहना पहनाया हुआ । २. सजाया हुआ । सँवरा हुआ । ३. काव्यालंकारयुक्त ।

अलंकृति
संज्ञा स्त्री० [सं० अलंङ्कृति] १. अलंकार । आभूषण ।२. सजा- वट । ३. उपमा, रूपक आदि अलंकार । उ०—प्राखर अरथ अलंकृति नान । छंद प्रबंध अनेक बिधान ।—मानस, पृ० ८ ।

अलंग पु
संज्ञा पुं० [सं० अल = पूर्ण, बड़ा + अंग = प्रदेश] [हिं० अलंग †] ओर । तरफ । दिशा । उ०—(क) उमर अमीर रहे जहँ ताई, सब ही बाँट अलंगै पाई ।-जायसी (शब्द०) । (ख) लेन आयो कान्ह कोऊ मथुरा अलंग तें ।—मिखारी ग्रं०, भा० २. पृ० १०७ । मुहा०—अलंग पर आना या होना = धोड़ी का मस्ताना ।

अलंघनीय
वि० [सं० अलङ्घनीय] १. जो लाँघने योग्य न हो । जिसे फाँद न सके । जिसे पार न कर सके । अलंध्य । २. अटल ।

अलंध्य
वि० [सं० अलङ्घ्य] १. जो बाँधने योग्य न हो । जिसे फाँद न सकें । २. जिसे टाल न सर्कें । जिसे मानना ही पड़े; जैसे— राजा की आज्ञा अलंध्य होती है । यौ०—अलंध्य शासन ।

अलंजर
संज्ञा पुं० [सं० अलञ्चर] मिट्टी का घड़ा । झंझर [को०] ।

अलंपट (१)
वि० [सं० अलम्पट] जो लंपट या विषयी न हो । सच्चरित्र ।

अलंपट (२)
संज्ञा पुं० स्त्रीयों का कक्ष । अंतःपुर [को०] ।

अलंब पु
संज्ञा पुं० [सं० आलाम्ब] दे० 'आलंव' ।

अलंबुष
संज्ञा पुं० [सं० अलम्बुषा] १. वमन । उल्टी । कै । २. कौरवों का सहायक एक राक्षस जिसे भीम के पुत्र घटोत्कच ने मारा था । ३. प्रहस्त नाम का रावण का एक मंत्री [को०] । ४. हथेली जिसकी ऊँगलियाँ फैलाई गई हों (को०) ।

अलंबुषा
संज्ञा स्त्री० [सं० अलम्बुषा] १. मुंडी । गोरखमुंडी । २. स्वर्ग की एक अप्सरा । ३. दूसरे का प्रवेश रोकने के लिये खींची हुई रेखा । गड़ारी । मंडल । विशेष—इसका व्यवहार अधिकतर भोजन को छुवाछूत से बचाने के लिये होता है । ४. लज्जावंती । छुई मई । लजालू पौधा । उ० —नव अलंबुषा की ब्रीड़ा सी खुल जाती फिर जा मुंदसी ।—कामायनी, पृ० २६३ ।

अलंभ पु
वि० [सं० अलभ्य] दे० 'अलभ्य' । उ०—सरग का देवता अलंभ चितोड़ ।—बि० रासो, पृ० २४ ।

अल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिच्छू का डंक । २. हरताल । ३. विष । जहर । उ०—अति बल करि काली हान्यो । लपटि गयो सब अंग अंग प्रति निर्विष कियो सकल अल झार्यो ।— सूर (शब्द०) ।

अल (२)
वि० [सं०] समर्थ । शक्त । उ०—कारन अबिरल अल अपितु तुलसी अबिद भुलान ।—स० सप्तक, पृ० २६ ।

अलई
संज्ञा स्त्री० [देश०] ऐल नाम की कँटीली लता जिसकी बाढ़ प्रायः खेती में लगाई जाती है । ऊरू ।

अलक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मस्तक के इधर उधर लटकते हुए मरोड़दार बाल । २. बाल । केश । लट । ३. छल्लेदार बाल । उ०— मुकुट कुंडल तिलक अलिब्रात इव, भृकुटि द्विज अधर बर चारु नासा ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४९१ । २. हरताल । ३. सफेद आक । श्वेत मदार । ४. शरीर पर लगाया हुआ केसर । अंग पर लिप्त केसर [को०] । ५. पागल कुत्ता । अलर्क [को०] ।

अलक पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० अलक्तक] महावर । आलता ।

अलक पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० अलका] अलकापुरी । उ०—अलक लोक बज्जत विषम ।—पृ० रा० २ १०१ ।

अलकत
संज्ञा पुं० [अ०] १. अवहेलना । २. नष्ट करना । रद्द करना । ३. काट देना [को०] ।

अलकतरा
संज्ञा पुं० [अ०] पत्थर के कोयले को आग पर गलाकर निकाला हुआ एक गाढ़ा पदार्थ । उ०—छत छतरी बर बंद खंभ गेरू रँग राखे । अलकतरे रँग कल किवार सित सोहत पाखे ।—रत्नाकर १ ।१०२ । विशेष—कोयले को बिना पानी दिए भभके पर चढ़ाकर जब गैस निकाल लेने हैं, तब उसमें दो प्रकार के पदार्थ रह जाते हैं— एक पानी की तरह पतला, दूसरा गाढ़ा । यही गाढ़ा काला पदार्थ अलकतरा है जो रँगने के काम में आता है । यह कृमिनाशक है अतः इसमें रँगी हुई लकड़ी घुन और दीपक से बहुत दिनों तक बची रहती है । इससे कृमिनाशक औषधियाँ जैसे—नेप्थलीन कारबोलिक एसिड, फिनाइल आदि—तैयार होती हैं । इससे कई प्रकार के रंग भी बनते हैं ।

अलकनंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० अकलनन्दा] १. हिमालय (गढ़वाल) की एक नदी जो गंगोत्री के आगे भागीरथी (गंगा) की धारा से मिल जाती है । २. आठ से दस वर्ष उम्र तक की कन्या [को०] ।

अलकप्रभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अलकापुरी । कुबेरपुरी ।

अलकप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] पीतसाल नाम का एक पेड़ [को०] ।

अलकलड़ैता पु
वि० [सं० अचक=बाल+लाड़=दुलार या अ० अलक=प्यार+हिं० लाड़+ऐता (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० अलकलड़ैती] दुलारा । लाड़ला । उ०—सूर पथिक सुनि मोहिं रैनि दिन, बढयौ रहत उर सोच । मेरौ अलकलड़ैतौ मोहन ह्वै है करत सँकोच ।—रूर०, १० ।३७९३ ।

अलकसंहति
संज्ञा स्त्री० [सं०] घुंघराले बालों की कतार [को०] ।

अलकसलोरा पु
वि० [सं०=अलक=बाल या अ० अलक=प्यार+ हिं० सलोना=अच्छा] [स्त्री० अलकसलोरी] लाड़ला । दुलारा । उ०—हम तुम्हरैं नितहीं प्रति आवतिं सुनहु राधिका गोरी । ऐसौ आदर कबहुँ न कीन्हौ मेरी अलकसलोरी ।-सूर०, १० ।२८२८ ।

अलका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कुबेर की पुरी । यक्षों की पुरी । उ०— हलका छुटत सोर अलका परत हैं ।-गंग०, पृ० १०५ ।२. आठ से दस वर्ष उम्र तक की लड़की [को०] ।

अलकाउरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अलकावलि' । उ०—प्रंधर अधर सों भीज तबोरी । अलकाउरि मुरि मुरि गा मोरी ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३४२ ।

अलकाधिप
संज्ञा पुं० [सं०] अलरापुरी के स्वामी । कुबेर [को०] ।

अलकापति
संज्ञा पुं० [सं०] कुबेर ।

अलकाब
संज्ञा पुं० [अ० लकब का बहुव०] १. प्रशस्ति । २. उपाधि या खिताब [को०] ।

अलकावती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अलका' ।

अलकावलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] केशों का समूह । बालों की लटें । उ०—कोमल नील कुटिल अलकावलि, रेखा राजति भाल ।— सूर०, १० ।२९५६ ।

अलकेस पु
संज्ञा० पुं० [सं० अलकेश] कुबेर । उ०—अकबकात अलकेस अखंडल ।-पद्माकर ग्रं०, पृ० १० ।

अलक्त
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अलक्तक' ।

अलक्तक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाही जो पेड़ों में लगती है । लाख । चपड़ा । २. लाह का बना हुआ रंग जिसे स्त्रियाँ पैर में लगाती हैं । महावर । यौ०—अलक्तकरस=महावर । अलक्तक राग=महावर की लाती ।

अलक्षण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चिह्न या संकेत का न होना । २. ठीक ठीक गुण धर्म का अनिर्वाचन । ३. बुरा लक्षण । कुलक्षण । अशुभ चिह्न ।

अलक्षण (२)
वि० जो लक्षणहीन हो । बुरे लक्षणवाला [को०] ।

अलक्षित
वि० [सं०] १. अप्रकट । अज्ञान । २. अदृश्य । गायब । ३. अचिह्नित ।

अलक्ष्मी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. धनाभाव । निर्धनता । दरिद्रता । २. बुरा भाग्य । विपरीत भाग्य । ३. अशुभ लक्षणोंवाली स्त्री । ४. भाग्य की देवी । दरिद्रता देवी [को०] ।

अलक्ष्य
वि० [सं०] १. अदृश्य । जो न देख पड़े । गायब । २. जिसका लक्षण न कहा जा सके । ३. छलविहीन । छलरहित [को०] । ४. अचिह्नित [को०] ।

अलक्ष्यगति
वि० अदृश्य रूप से गमन करनेवाला [को०] ।

अलक्ष्यजन्मता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अज्ञान जन्म या उत्पत्ति [को०] ।

अलक्ष्यलिंग
वि० [सं० अलक्ष्यलिग] अपने को छिपाए रखनेवाला [को०] ।

अलख (१)
वि० [सं० अलक्ष्य] १. जो दिखाई न पड़े । जो नजर न आए । अदृश्य । अप्रत्यक्ष । उ०—बुधि, अनुमान, प्रमान, स्त्रुति किऐं नीठि ठहराय । सूछम कटि परब्रह्म की, अलख, लखी नहि जाय ।-बिहारी र०, दो० ६४८ ।२. अगोचर । इंद्रियातीत । उ०—जे उपमा पटतर लै दीजै ते सब उनहिं न लायक । जौ पै अलख रह्मौ चाहत तौ बादि भए ब्रजनायक ।-सूर०, २ ।४६४५ ।३. ईश्वर का एक विशेषण । उ०—प्रलख अरूप अबरन सो करता । वह सबसों सब वहि सों बरता ।-जायसी (शब्द०) । मुहा०—अलख जगाना=(१) पुकारकर परमात्मा का स्मरण करना या कराना । (२) परमात्माके नाम पर भिक्षा माँगना । यौ०—अलखधारी । अलखनामी । अलखनिरंजन । अलखपुरुष= ईश्वर । अलखमंव=निर्गुण संत संप्रदाय में ईश्वर मंत्र ।

अलख (२)
संज्ञा पुं० ब्रह्मा । ईश्वर [को०] ।

अलखधारी
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अलखनामी' ।

अलखनामी
संज्ञा पुं० [सं० अलक्ष्यसं० नाम+हिं० ई (प्रत्य०)] एक प्रकार के साधु जो गोरखनाथ के अनुयायियों में से हैं । विशेष—अलखिया । ये लोग सिर पर जटा रखते हैं, गेरुआवस्त्र धारण करते हैं, भस्म लगाते हैं और कमर में ऊन की सेली बाँधते हैं जिसमें कभी कभी घुंधरू या घंटी भी बाँध लेते हैं । ये लोग भिक्षा के लिये प्रायः दरियाई नारियल का खप्पर लेकर जोर जोर से 'अलख अलख' पुकारते हैं जिससे उनका अभिप्राय अलक्ष्य परमात्मा का स्मरण करना वा कराना होता है । इन लोगों में एक विशेषता यह है कि ये कहीं भिक्षाके लिये अधिक अड़ते नहीं ।

अलखित पु
वि० [हिं०] दे० 'अलक्षित' । उ०—कवि अलखित गति बेषु बिरागी ।—मानस २ । ११० ।

अलखिया पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अलखनामी' ।

अलग
वि० [सं० अलग्न प्रा० अलग्न] १. जुदा । पृथक् । न्यारा । भिन्न । अलहदा । उ०—संपति सकल जगत्र की स्वासा सम नहिं होइ । सो स्वासा तजि राम पद तुलसी अलग न खोइ ।—स० सप्तक, पृ० ४ । क्रि० प्र०—करना । रखना ।—होना । मुहा०—अलग करना=(१) जुदा करना । दूर करना । हटाना । खसकाना । जैसे—इसे हमारे सामने से अलग करो । (२) छुड़ाना । बरखास्त करना; जैसे—मैंने उस नौकर को अलग कर दिया । (३) चुनना । छाँटना । (४) बेच डालना; जैसे—उसने उस घोड़े को अलग कर दिया । (५) निपटाना । समाप्त करना; जैसे—थोड़ा सा बचा है, खा पीकर अलग करो । २. बेलाग । बचा हुआ । रक्षित; जैसे—घबराओ मत, तुम्हारा बच्चा अलग है । यौ०—अलग अलग=दूर दूर । जुदा जुदा ।

अलगगीर
संज्ञा पुं० [अ० अरक फा० गीर] कंबल या नमदा जिसे घोड़े की पीट पर रखकर ऊपर से जीन या चारजामा कसते हैं ।

अलगनी
संज्ञा स्त्री० [सं० आलग्न] आड़ी रस्सी या बाँस जो कपड़े लटकाने या फैलाने के लिये घर में बाँधा जाता है । डारा ।

अलगरज †
वि० [अ० अल्+गरज] दे० 'अलगरजी' ।

अलगरजी †
वि० [अ०] बेगरज । बेपरवाह ।

अलगरजी (२) पु
संज्ञा स्त्री० बेपरबाही । बेगरजी । उ०—आसिक अरु महबूब बिच आप तमासा कीन । ह्याँ ह्वै अलगरजी करै ह्वाँ ह्वै होइ अधीन ।—सं० सप्तक, पृ० १७६ ।

अलगर्द
संज्ञा पुं० [सं०] एक तरह का जल में रहनेवाला साँप [को०] ।

अलगर्दा
संज्ञा पुं० [सं०] एक तरह की लंबी जहरीली जोंक [को०] ।

अलगाऊ †
वि० [हिं० अलगाना] अलग करनेवाला । अलग रखनेवाला ।

अलगाना (१)
क्रि० स० [हिं० अलग+आना (प्रत्य०)] १. अलग करना । छाँटना । बिलगाना । पृथक् करना । जुदा करना । २. दूर करना । पटाना ।

अलगाना (२)
क्रि० अ० अलग । पृथक् होना । उ०—बदरिका- सरम दोउ मिलि आइ । तीरथ करत दोउ अलगाइ ।— सूर०, ३ ।४ । यौ०—अलगागुजारी = अलगाव ।

अलगार पु
वि० [हिं०] दे० 'अलग' । उ०—चामंडराय दिल्ली धरह गढ़पति करि गढ़भार दिय । अलगार राज प्रथिराज तब पूरब दिसि तब गमन किय ।—पृ० रा०, २० ।३६ ।

अलगाव
संज्ञा पुं० [हिं० अलग+आव (प्रत्य०)] पृथक्करण । अलग रहने का भाव । बिलगाव । उ०—होली, सावन, झूले वा झेलुए की गीत आदि का अलगाव या ठहराव हुआ होगा ।—प्रेमघन०, भा०, २, पृ० ३५१ ।

अलगोजा
संज्ञा पुं० [अ० अलगोजह] एक प्रकार की बाँसुरी । उ०—अलगोजे बज्जत छिति पर छज्जत सुनि धुनि लज्जत कोइ रहैं—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८५ । विशेष—इसका मुँह कलम की तरह कटा होता है और जिसकी दूसरी छोर पर श्वर निकालने के लिये सात समानांतर छेद होते हैं । इसको मुँह में सीधा रखकर उँगलियों को छेदों पर रखते और उठाते हुए बजाते हैं ।

अलगौझा †
संज्ञा पुं० [हिं० अलग+औझा (प्रत्य०)] [स्त्री० अलगोझी] पृथक्करण । अलगाव । बिलगाव ।

अलग्ग पु
वि० [सं० अलग्न] समीप नहीं । दूर । उ०—ढोलइ चित्त विमासियउ, मारू देस अलग्ग ।—ढोला०, दू० ३०७ ।

अलघु
वि० [सं०] [वि० स्त्री० अलव्वी] १. जो लघु न हो । बड़ा । वजनी । २. गंभीर । ३. जो छोटा न हो । लंबा । ४. उग्र । भयंकर [को०] ।

अलच्छ पु
वि० [हिं०] दे० 'अलक्ष्य' । उ०—पग मग धरत अलच्छ जात अधरहिं जनु पचछी ।—भा० १, पृ० ११२ ।

अलच्छि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अलक्ष्मी] दरिद्रता । गरीबी । उ०— माया ब्रह्म जीव जगदीसा । लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा ।— मानस, १ । ६ ।

अलज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पक्षी [को०] ।

अलज (२) पु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अलज्ज' ।

अलजी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आँखों में होनेवाली एक प्रकार की लाल या काली फुंसी जो बहुत पीड़ा देती है ।

अलज्ज
वि० [सं०] निर्लज्ज । बेहया । उ०—तुम अलज्ज से क्यों यहाँ अड़े ।—साकेत, पृ० ३१३ ।

अलटबिलट
संज्ञा पुं० [देश०] उलट पुलट । हेर फेर । गड़बड़ी । उ०—बात व्यौहार में कहीं कुछ अलटबिलट हो तो अपने नौगछिया की जगहँसाई होगी ।—नई०, पृ० ३१ ।

अलटा
संज्ञा पुं० [सं० अलक्तक, प्रा० अलत्तय, राज० अलत्ता] १. वह लाल रंग जो स्त्रीयाँ पैरों में लगाती हैं । २. खसी की मूत्रेंद्रिय; जैसे-अलते की बोटी ।

अलत्ता पु
संज्ञा पुं० [सं० अलक्तक, प्रा० अलतय] दे० 'अलता' । उ०—सुंदरि, सोबन वर्ण तसु अहर अलत्ता रंगि । केसरिलंकी खीण कटि, कोमल नेत्र कुरंगि ।-ढोला०, दू० ८७ ।

अलप पु
वि० [हिं०] दे० 'अल्प' । उ०—तातें अनुमानौं अब जीवन अलप है ।—भइखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० १५८ ।

अलपाका
संज्ञा पुं० [स्पे० एलपका] १. ऊँट की तरह का एक जान- वर जो दक्षिण अमेरिका के पेरू नामक प्रांत में होता है । इसके बाल लंबे और ऊन की तरह मुलायम होते हैं । २. अलपाका का ऊन । ३. एक पतला कपड़ा जो रेशम या सूत के साथ अलपाका जंतु के ऊनी बालों को मिलाकर बनाया जाता है । यह कई रंगों का बनता है, पर विशेषकर काला होता है ।

अलफ
संज्ञा पुं० [अ० अलिफ] १. घोड़े का आगे के दोनों पाँव उठाकर पिछली टाँगों के बल खड़ा होना । विशेष—अरबी वर्णमाला का पहला अक्षर अलिफ खड़ा होता है । इसी से यह शब्द इस अर्थ में व्यवहृत होने लगा । २. हरा चारा । हरी घास [को०] ।

अलफा
संज्ञा पुं० [अ० अलफा] [स्त्री० अलफी] एक प्रकार का ढीला ढाला बिना बाँह का बहुत लंबा कुरता जिसे अधिकतर मुसल- मान फकीर गले में डाले रहते हैं । उ०—अद्धी की टोपी लगाए सुकेशधारी अलफी पहने लँगड़ाता हुआ चिल्लाने लगा ।-श्यामा०, पृ० १५० ।

अलफाज
संज्ञा पुं० [अ० लफ्ज का बहुव० अलफाज] शब्दसमूह । उ०—बिना अरबी के अलफाज मिलाए ।—प्राण०, २ । ५६ ।

अलबत
अव्य० [हिं०] दे 'अलाबत्ता (१)' । उ०—तथ्यों का आरोप या संभआवना अलबत वे कभी किया करते हैं ।— रस० क०, पृ० १४ ।

अलबत्ता
अव्य० [अ० अलबत्तह्] १. निस्संदेह । निःसंशय । बेशक; जैसे—'अब अलबत्ता यह काम होगा' । २. हाँ । बहुत ठीक । दुरुस्त । जैसे-अलबत्ता, बहादुरी इसका नाम है (शब्द०) । ३. लेकिन । परंतु; जैसे-हम रोज नहीं आ सकते, अलबत्ता कहो तो कभी कभी आ जाया करें (शब्द०) ।

अलबम
संज्ञा पुं० [अ०, एलबम] तस्वीरें रखने की किताब ।

अलबल
वि० [अनु०] अटपट । जल्दी जल्दी । उ०—अपने अपराधन कबहूँ बैठि विचारै हुव मिलन मनोरथ अल बल बैन उचारै ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० २९३ ।

अलबीतलबी
[अ०] अरबी, फआरसी आदि विदेशी भाषाएँ अथवा बहुत कठिन उर्दू; जैसे—'आप अपनी अलबी तलबी छोड़कर सीधी तरह से हिंदी में बातें कीजिए' ।

अलबेला (१)
वि० [सं० अलभ्य+हिं० ला (प्रत्य०)] [स्त्री० अलबेली] १. बाँका । बना ठना । छैला । २. अनोखा । अनूठा । सुंदर; जैसे-'तुमने तो यह बड़ी अलबेली चीज निकाली ।' ३. अल्हड़ । बेपरवाह । मनमौजी । जैसे-यह बड़ा अलबेला है ।

अलबेला (२)
संज्ञा पुं० [सं० अलभ्य] नारियल का बना हुआ हुक्का । उ०—खायकै पान बिदोरत होंठ हैं बैठि सभा में पिएँ अलबेला ।—वंशगोपाल (शब्द०) ।

अलबेलापन
संज्ञा पुं० [हिं० अलबेला + पन (प्रत्य०)] १. बाँकापन । सजधज । छैलापन । २. अनोखापन । अनूठापन । सुंदरता । ३. अल्हड़पन बेपरवाही ।

अलब्ध
वि० [सं०] जिसकी प्राप्ति न हो सकी हो । जो हस्तगत न हुआ हो [को०] । यौ०—अलब्धनाथ=बिना संरक्षक । स्वामीवीहीन । अलब्ध— निद्र=जिसे नींद न आई हो ।

अलब्धभूमिकत्व
संज्ञा पुं० [सं०] समाधि का न जुड़ना । समाधि की अप्राप्ति ।

अलब्धव्यायामाभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कौटिल्य के अनुसार ऐसी भूमि जिसमें सैन्यसंग्रह न हो सके ।

अलभ पु
वि० [हिं०] दे० 'अलभ्य' ।

अलभ्य
वि० [सं०] १. न मिलने योग्य । अप्राप्त । उ०—रस पिया सखि नित्य जहाँ नया अब अलभ्य वहाँ विष हो गया ।— सारेत, पृ० ३०७ ।२. जो कठिनता से मिल सके । दुर्लभ । उ०—मुनिहुँ मनोरथ को अगम अलभ्य लाभ सुगम सो राम लघु लोगनि को करिगे ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३३९ । ३. अमूल्य अनमोल । उ०—जीवन सौभाग्य है जीवन अलभअय है ।-लहर, पृ० ७० ।

अलम्
अव्य० [सं०] यथेष्ट । पूर्ण । काफई । उ०—कृपा कटाक्ष अलम् है केवल, कोरदार या कोमल हो ।—झरना, पृ० ८१ ।

अलम
संज्ञा पुं० [अ०] १. रंज । दुःख । उ०—अलम है दर्दे हसरत है फना है आहोजारी है ।—शेर०, पृ० ३७७ । २. झंडा ।

अलमनक
संज्ञा पुं० [अं०] अँगरेजी ढंग की जंत्री या पत्रा ।

अलमनाक
वि० [अ०] १. दुःखपूर्ण । २. अतिदुःखदाई [को०] ।

अलमबरदार
संज्ञा पुं० [अ०] १. वह जो झंडा उठाना है । २. वह जो आंदोलन आदि में आगे रहता है [को०] ।

अलमर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पौधा ।

अलमस्त
वि० [फा०] १. मतवाला । बदहोश । बेहोश । २. बेगम । बेफिक्र । निर्द्वद्व ।

अलमारी
संज्ञा स्त्री० [पुर्त० अलमारियो] वह खड़ा संदूक जिसमें चीजें रखने के लिये खाने या दर बने रहते हैं और बंद करने के लिये पल्ले होते हैं । कभी कभी दिवार खोदकर और नीचे ऊपर तख्ते जोड़कर भी अलमारी बना दी जाती है । बड़ी भंडरिया ।

अलमास
संज्ञा पुं० [फा०] हीरा ।

अलय (१)
वि० [सं०] बिना घरवाला । चलता फिरता । जिसका नाश न हो [को०] ।

अलय (२)
संज्ञा पुं० १. लय न होने का भाव । अनित्यता । २. जन्म । उत्पत्ति [को०] ।

अलर्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. पागल कुत्ता । २. सफेद आक या मदार । ३. एक प्राचीन राजा जिसने एक अंधे ब्राह्मण के माँगने पर अपनी देनों आँर्खे निकालकर दे दी थीं । ४. शूकर जैसै एक आठ पैरोंवाला जंतु [को०] । ५. एक तरह का कीड़ा [को०] ।

अलल पु †
क्रि० वि० [अ० आलाआला] इधर उधर । उ०— सँभलत धवलसर साहुलि संभलि । आलूदा ठाकुर अलल ।— वेलि०, दू० ११३ ।

अललटप्पू
वि० [देश०] अटकलपच्चू । बेठिकाने का । अंडबंड ।

अललबछेड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० अल्हड़+बछेड़ा] १. घोड़े का जवान बच्चा । २. अल्हड़ आदमी । वह व्यक्ति जिसे कुछ अनुभव न हो ।

अललहिसाब
क्रि० वि० [अ०] बिना हिसाब किए हुए [को०] । क्रि० प्र०—देना ।

अललाना
क्रि० अ० [सं० अर्=बोलना] तेज चिल्लाना । गला फाड़कर बोलना ।

अलल्ल पु
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'अलल्ल' ।

अलल्ल पु
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'अलल्लाँ' ।

अलल्लाँ
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़ा (डिं०) ।

अलवाँत
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'अलवाँती' ।

अलवाँती
वि० स्त्री० [सं० बालवती] (स्त्री) जिसके बच्चा हुआ हो । प्रसूता । जच्चा ।

अलवाई
वि० स्त्री० [सं० बालवती, हिं० अलवाँती] (गाय या भैसं) जिसको बच्चा जने एक दो महीन हुए हों । 'बाखरी' का उलटा ।

अलवान
संज्ञा पुं० [अ०] पश्मीने की चादर । ऊनी चादर ।

अलवाल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आलवाल' ।

अलविदा (१)
अव्य० [अ० अल+विदाअ] विदा होते समय कहा जानेवाला शब्द ।

अलविदा (२)
संज्ञा स्त्री० रमजान के महीने का अंतिम शुक्रवार ।

अलस (१) पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आलस्य' । उ०—वारि जाम जु निसि उनीदे, अलस बसहि जम्हात ।—सूर०, १० ।२६७६ ।

अलस (२)
वि० [सं०] आलस्ययुक्त । आलसी । सुस्त । मंद । निरुद्योगी । उ०—चंदन मिटाए तन अतिहीं अलस मन तागरी की पीक लीक लागी है कपोलौ ।—सूर०, १० ।२५०७ ।

अलस (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाँव का एक रोग जिसमें पानी से भींगे रहने या गंदे कीचड़ में पड़े रहने के कारण उँगलियों के बीच का चमड़ा सड़कर सफेद हो जाता है और उसमें खाज और पीड़ा होती है । खरवात । कंदरी । २. एक जहरीला छोटा जंतु [को०] । ३. एक तरह का पौधा [को०] ।

अलसई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आलस्य] अलसता । उ०—कुंभकरन को रन हुयो गह्मो अलसई आइ । सिर चढि श्रति नासा हसत जु न रोक्यो हरिराइ ।—भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० ७५ ।

अलसक
संज्ञा पुं० [सं०] अजीर्ण रोग का एक भदे ।

अलसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हंसपदी लता । लज्जालू । लाल फूल की लज्जावंती ।

अलसाई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० अलस] अलसता । सुस्ती । उ०— लटपटी पाग, अलक जो बिथुरीं, बात कहत आवत अलसाई ।—सूर,० १० ।२६४० ।

अलसान पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अलसानि' ।

अलसाना
क्रि० अ० [सं० अलस] आलस्य में पड़ना । क्लांत होना । शिथिलता अनुभव करना । उ०—(क) बल मोहन दोऊ अल— साने ।-सूर०, १० ।२३० । (ख) कबहुँ नैन अलसात जानि कै, जल लै पुनि धोवति ।—सूर०, १० ।२४९८ ।

अलसानि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आलस्य] आलस । सुस्ती । उ०— (क)आँखिन में अलसानि, चितौन में मंजु बिलासन की सरसाई ।—मतिराम (शब्द०) । उ०—(ख) चिंता जृंभ उनीदता बिहवलता अलसानि । लह्यो अभआगिनि हौ अली, तैहूँ गहै सु बानि ।—भिखारी० ग्रं०, भा० २, पृ० १४ ।

अलसि पु
वि० [हिं०] दे० 'आलस्य' । उ०—बढ़ै अलसि जिय माँहि बैर मैं कहा जु पावो ।—हम्मीर रा०, पृ० ५६ ।

अलसी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अतसी] एक पौधा और उसका फल या बीज । तीसी । विशेष—यह पौधा प्रायः दो ढाई फुट ऊँचा होता है । इसमें डालियाँ बहुत कम होती हैं, केवल दो या तीन लंबी, कोमल और सीधी टहनियाँ छोटी छोटी पत्तियों से गुछी हुई निकलती हैं । इसमें नीले और बहुत सुंदर फूल निकलते हैं जिनके झड़ने पर छोटी घुंडियाँ बँधती हैं । इन्हीं घुंडियों में बीज रहते हैं जिनसे तेल निकलता है । यह तेल प्रायः जलाने और रंगसाजी तथा लीथो के छावे की स्याही बनाने के काम में आता है । बहुत से स्थानों पर साग, सब्जी आदि में भी इसका प्रयोग होता है । छापने की स्याही भी इसकी मिलावट से बनती है । इसको पकाकर गाढ़ा करके एक प्रकार का वारनिश भी बनता है । तेल निकालने के बाद अलसी की जो सीठी बचती है उसे खरी, खली कहते हैं । यह खली गाय को बहुत प्रिय है । अलसी या अलसी की खली को पीसकर उसकी पुलटिस बाँधने से सूजन बैठ जाती है, कच्चा फोड़ा शीघ्र पककर बह जाता है तथा उसकी पीड़ा शांत हो जाती है ।

अलसी (२) पु
वि० [हिं०] दे० 'आलसी' । उ०—राम सुभाव सुने तुलसी हुलसे अलसी हम से गलगाजे ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १९८ ।

अलसेट पु
संज्ञा पुं० [सं० अलस+हिं० एट (प्रत्य०)] [वि० अलसेटिया] १. ढिलाई । व्यर्थ की देर । २. टालमटूल । भुलावा । चकमा । उ०—महरि गोद लैबे लगी करि बातन अलसेट ।—व्यास (शब्द०) । ३. बाधा । अड़चन । क्रि० प्र०—करना ।—लगाना ।

अलसेटिया पु
वि० [हिं० अलसेट+इया (प्रत्य०)] १. ढिलाई करनेवाला । व्यर्थ की देर करनेवाला । २. अड़चन डालनेवाला । बाधा उपस्थित करनेवाला । टालमटूल करनेवाला ।

अलसौंहा पु †
वि० [सं० अलस+हिं० औहाँ (प्रत्य०)] [स्त्री० अलसाँही] आलस्ययुक्त । क्लांत । शिथिल । उ०—सही रँगीले रति जगै, जगी पगी सुख चैन । अलसौहैं सौहें किऐं, कहैं हंसौंहैं नैन ।—बिहारी र०, दो० ५११ ।

अलह पु
संज्ञा पुं० [अ० अल्लाह] अल्लाह । ईश्वर । खुदा । उ०— सुलतान जलाल सिकंदर जाया । सुलतान । साहबदीन अलह उपाया । पृ० रा०, ६६ । १४० ।

अलह पु (२)
वि० [सं० अ+लभ्] व्यर्थ । वृथा । अलभ्य । उ०—गाजै जलहर गयण में जाय अलह तै जोह ।—बाँकीदास ग्रं०, भा० १, पृ० ३० ।

अलहदगी
संज्ञा स्त्री० [अ० अलाहदह्+फा० गी (प्रत्य०)] अलग होने का भाव । अलगाव । बिलगाय ।

अलहदा
वि० [अ० अलाहदह्] जुदा । अलग । पृथक् ।

अलहदी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अहदी' । उ०—'कर्तव्यशून्य स्वभाव अलहदी बनि गया' । प्रेमधन०, भा० २, पृ० ४१ ।

अलहन
संज्ञा स्त्री० [सं० अलभन] अभाग्य का उदय । विपत्ति । उ०—एकहि रितु सौं अंत दुहुनि की अलहन आई ।—रत्नाकर भा० २, पृ० ४८ ।

अलहना पु †
वि० [सं० अ+लभन्] न पानेवाला । उ०—जे गुणमंता अलहना गौरव लहइ भूजन ।—कीर्ति०, पृ० ३४ ।

अलहनियाँ
संज्ञा पुं० [हिं० अलहन] जो कोई काम क कर सकता हो । अकर्मण्य । अहदी । मु०—अपने अलहनियाँ आन के गंडा पूरे=अपना काम न सँभालकर दूसरे का काम करनेवाला ।

अलहा
वि० [सं० अलभ्य] अलभ्य । जो प्राप्त न हो । उ०—अगहा गहणा, अकहा कहणा, अलहा लहणा तहँ मिलि रहणा ।— दादू०, पृ० ५१६ ।

अलाहिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० आल्हा] एक रागिनी जिसमें सब कोमल स्वर लगते हैं । हिंडोल राग की स्त्री और दीपक की पुत्रवधू । इसका व्यवहार करुण रस प्रकट करने में अधिक होता है ।

अलहैरी
संज्ञा पुं० [अ०] एक जाति का अरबी ऊँट जिसके एक ही कूबड़ होता है और जो चलने में बहुत तेज होता है ।

अलाई (१)
वि० [सं० अलस] [वि० स्त्री० अलाइन] आलसी । काहिला ।

अलाई (२)
वि० [हिं०] अलाउद्दीन संबंधी । अलाउद्दीन का; जैसे— अलाई दरवाजा, अलाई मोहर (शब्द०) ।

अलाई (३)
संज्ञा पुं० [देश० अलल्ल] घोड़े की एक जाति ।

अलागलाग
संज्ञा पुं० [हिं० लाग=लगाव] नृत्य या नाचने का एक ढंग ।

अलात
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंगार ।२. जलती हुई लकड़ी । लुपाठी ।

अलातचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलती हुई लकड़ी या लुक को जल्दी जल्दी घुमाने से बना हुआ मंडल । उ०—मनु फिर रहे अलातचक्र उस धन तम में ।-कामायनी, पृ० २०० ।२. बनेठी । ३. गतिभेदानुसार एक प्रकार का नृत्य या नाच ।

अलान
संज्ञा पुं० [सं० आलान] [स्त्री० अलानी] १. हाथी बाँधने का खूँटा । २. हाथी बाँधने का सिक्कड़ । उ०—नवगयंदु रघु- बीर मनु राजु अलान समान ।-मानस, २ ।५१ । ३. बंधन । बेड़ी । ४. लता या बेल चढ़ाने के लिये गाड़ी हुई लकड़ी ।

अलाना †
क्रि० अ० [सं० √ अर्=बोलना] चिल्लाना । गला फाड़कर बोलना । अललाना ।

अलानाहक †
अव्य [फा० नाहक] बिना मतलब । बेसबब ।

अलानिया
क्रि० वि० [अ० अलानियह्] उन्मुक्त रुप से । प्रकट रुप से । खुल्लम खुल्ला । सबके सामने [को०] ।

अलाप पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आलाप (१)' । उ०—आदर अलाप छाँड़ि आगे तें अनखि उठी, मेरे मुहें एक बोल आकरो सो आइगो । गंग ग्रं०, पृ० ७८ ।

अलापना
क्रि० अ० [सं० आलापन] १. बोलना । बातचीत करना । २. सुर खींचना । तान लगाना । उ०—अधर अनूप मुरलि सुर पुरत गौरी राग अलापि बजावत ।-सूर०, १० ।१३६८ ।

अलापी पु
वि० [सं० आलापिन्] बोलनेवाला । शब्द निकालनेवाला । उ०—नृत्यत कलापी झिल्ली पिक हैं अलापी बिरहीजन बीलापी हैं मिलापी रसरास मैं ।-भिखारी० ग्रं०, भा०,२, पृ० २८ ।

अलाबू
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लौकी । कद्दु । २. तूँबा ।

अलाभ
संज्ञा पुं० [सं०] लाभ का अभाव । नुकसान । उ०—दुख सुख, लाभ अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोई ।—सूर०, १ ।२६२ ।

अलाम पु
वि० [अ० अल्लामह्=चतुर] जिसकी बात का कोई ठिकाना न हो । बात बनानेवाला । मिथ्यावादी ।

अलामत
संज्ञा पुं० [अ०] १. लक्षण । निशान । चिह्न । उ०— बहुत रोने रुसवा कर दिखाया । न चाहत की छुपी हमसे अलामत ।—शेर०, भा०१, पृ० ११९ । २. पहचान ।

अलामत मलामत
संज्ञा स्त्री० [अ० मलामत] डाँट डपट । भर्त्सना । क्रि० प्र०—करना ।

अलायक पु
संज्ञा पु० [सं अ=नहीं+अ० लायक] नालायक । अयोग्य । उ०—(क) अगुन अलायुक आलसी जन अधन अनेरो ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) सुर स्वारथी अतीस अलायक निठुर दया चित नाहीं ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५२२ ।

अलार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कपाट । किवाड़ ।

अलार (२) पु
[सं० अलात] अलाव । आग का ढेर । अँवाँ । भट्ठी । उ०—तान आनि परी कान वृषभानु नंदिनी के तच्यो उर प्रान पच्यो विरह अलार है ।—रघुनाथ० (शब्द०) ।

अलार्म
संज्ञा पुं० [अं०एलार्म] खतरे की सूचना । खतरे का बिगुल [को०] । मुहा०—अलार्म बजना=खतरे की घंटी या बिगुल बजना ।

अलार्म घड़ी
संज्ञा स्त्री० [अं० एलार्म+ सं० घंटी] जागरन घड़ी । जगानेवाली घड़ी ।

अलाल पु
वि० [सं० अलस] १. आलसी । सुस्त । काहिल । २. अक- र्मण्य । निकम्मा । उ०—ऐसे अधम अलाल को कीन्हों आप निहाल ।—रघुराज (शब्द०) ।

अलाव पु
संज्ञा पुं० [सं० अलात=अंगार] आग का ढेर । जाड़े के दिनों में घास, फूस, सूखी पत्तियों और कंड़ों से जलाई हुई आग जिसके चारों ओर बैठकर गाँव के लोग तापते हैं । कौड़ा ।

अलावज
संज्ञा पुं० [सं० आलाप+ वाद्य] १. एक प्रकार का पुराना बाजा जो चमड़ा मढ़कर बनाया जाता था ।

अलावनी
संज्ञा स्त्री० [सं० आलापिनी] एक पुराना बाजा जो तार से बनाया जाता था ।

अलावलसाही
वि० [हिं० अलावल=अलाउद्दीन+ साही] अलाद्दीन शाह संबंधी ।

अलावा
क्रि० वि० [अ० अलावह्] सिवाय । अतिरिक्त ।

अलास
संज्ञा पुं० [सं०] एक रोग जिसमें जीभ के नीचे का भाग सूज कर पक जाता है और दाढ़ तन जाती है ।

अलास्य
वि० [सं०] नृत्य न करनेवाला । सुस्त [को०] ।

अलाहरी
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'अलहदा' । उ०—कवि ठाकुर देखौ विचार हिये, कुछ ऐसी अलाहदी राह सी है ।-ठाकुर०, पृ० १० ।

अलिंग (१)
वि० [सं० अलिङ्ग] १. लिंगरहित । बिना चिह्णन का । जिसका कोई लक्षण न हो । २. जिसका ठीक ठीक लक्षण निर्धारित न हो सके । जिसकी कोई पहचान बतलाई न जा सके । ३. बुरे लक्षण या चिह्णनवाला [को०] ।

अलिंग (२)
संज्ञा पुं० १. व्याकरण में वह शब्द जो दोनों लिंगो में व्यव हृत हो; जैसे हम, तुम, मै, वह, मित्र । २. वेदांत । ईश्वर । ब्रह्म । ३. चिह्णन या लक्षण का अभाव [को०] ।

अलिंगन पु
संज्ञा पुं० [सं० आलङ्गिन] दे० 'आलिंगन' । उ०—कंठ लगाइ लेत पुनि ताहीं । देत अलिंगन रीझत जाहीं ।— सूर०, १० ।११६४ ।

अलिंगी (१)
संज्ञा पुं० [अलिङ्गिन्] लिंग या परिचायक चिह्णनों से रहित साधु [को०] ।

अलिंगी (२)
वि० बिना लिंग या पहचान का ।

अलिंजर
संज्ञा पुं० [सं० अलिञ्जर] पानी रखने के लिये मिट्टी का बरतन । झंझर । घड़ा ।

अलिंद (१)
संज्ञा पुं० [सं० अलिन्द] १. मकान के बाहरी द्वार के आगे का चबूतरा या छज्जा । २. एक पुराना जनपद [को०] ।

अलिंद पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० अलीन्द] भौंरा । उ०—कौन जानै कहा भयो सुंदर सबल स्याम टूटें गुन धनुष तुनीर तीर झरिगो । ....नीलकंज मुद्रित निहारि विद्यामान भानु सिंधु मकरंदहि अलिंद पान करिगो (शब्द०) ।

अलिंपक
संज्ञा पुं० [सं० अलिम्पक] १. मेढक । २. कोकिल । ३. भौंरा । ४. मधुमक्खी । ५. महुवे का पेड़ [को०] ।

अलि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० अलिनौ] १. भौंरा । भ्रमर । उ०—रे अलि चपल, मोद रस लंपट कतहिं बकत बेकाज ।—सूर० १० ।३७४२ । २. कोयल । ३. कौवा । ४. बिच्छू । ५. वृश्चिक राशि । ६. कुत्ता । ७. मदिरा ।

अलि पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० आलि, आली] दे० 'अली' । उ०—कुँवर सो कुसल छेम अलि तेहि पल कुलगुरु कहँ पहुँचाई ।-तुलसी ग्रं०, पृ० ३६२ ।

अलिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. ललाट । कपाल । २. दे० 'अलि' । उ०—सुनि लोल लोचनी नवल निधि नेही की अलका की अलिक अलक लटकति है ।-केशव ग्रं०, भा०१, पृ० २१० ।

अलिखित
वि० [सं०] १. जो लिखा न हो । २. मौखिक रुप से परंपराप्राप्त ।

अलिगर्द
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अलिगर्द्ध' [को०] ।

अलिगर्द्ध
संज्ञा पुं० [सं०] पानी में रहनेवाला एक प्रकरा का साँप [को०] ।

अलिजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गले की घाँटी । गले के भीतर का कौवा

अलित्त पु
वि० [हिं०] दे० 'अलिप्त' । उ०—मराल बाल आसनं । अलित्त साय सासनं । पृ० रा०, ५७ ।११९ ।

अलिदूर्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पौधा । मालादूर्वा [को०] ।

अलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भ्रमरी । उ०—गिरा अलिनी मुखपंकज रोकी । प्रगट न लाज निसा अवलोकी ।-मानस १ ।२५९ ।

अलिपक
संज्ञा पुं० [सं०] १. भौंरा । २. कोयल । ३. कुत्ता ।

अलिपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बिछुआ घास ।

अलिपणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अलिपत्रिका । बिछुआ घास [को०] ।

अलिप्त
वि० [सं०] जो लिप्त न हो । निर्लिप्त । उ०—रहकर भी जल जाल में तूँ अलिप्त अरविंद ।—साकेत, पृ० २९४ ।

अलिप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] अरुणकमल । लाल कमल [को०] ।

अलिमक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कोयल । २. मेढ़क । ३. कमल का केसर [को०] ।

अलिमोदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गनियारी नामक पौधा [को०] ।

अलियल पु
संज्ञा पुं० [सं० अलिकुम; प्रा० अलिउल] (अलिसमूह) भ्रमरगण । उ०—अलियल अज करत नह, गयँद कपौलाँ गान ।—बाँकीदास ग्रं०, भा०१, पृ० ३१ ।

अलिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० आलय] १. एक प्रकार की खारी । २. वह गड्ढ़ा जिसमें कोई वस्तु रखकर ढँक दी जाय ।

अलिवल्लभ
संज्ञा पुं० [सं०] लाल कमल [को०] ।

अलिविरुत
संज्ञा पुं० [सं०] भौरों की गूँज [को०] ।

अली पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० आली] १. सखी । सहचरी । सहेली । उ०—येहिं भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहिन हिय हरषी अली ।-मानस, १ ।२३९ ।२. श्रेणी । पंक्ति । कतार ।

अली (२)
संज्ञा पुं० [सं० अलिन्] [स्त्री० अलिनी] १. भौंरा । उ०— अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल ।-बिहारी र०, दो० ३८ । २. बिच्छू [को०] ।

अलीक (१)
वि० [सं०] १. बेसिर पैर का । मिथ्या । झूठा । उ०— (क) सोइ रावनु जग विदित प्रतापी । सुनेहि न स्त्रवनअलीक प्रलापा ।-मानस, ६ ।२५ । (ख) अनख भरी धुनि अलिन की वचन अलीक अमान ।-भिखारी०, ग्रं०, भा०,१, पृ० ४८ । २. अमान्य । अप्रिय [को०] । ३. अल्प । थोड़ा [को०] ।

अलीक (२)
संज्ञा पुं० १. नापसंद या असत्य चीज । २. ललाट । ३. स्वर्ग । आकाश । ४. दुःख [को०] ।

अलीक (३)
संज्ञा पुं० [सं० अ=नहीं+हिं० लीग] अप्रतिष्ठा ।

अलीक (४)
वि० मर्यादाररहित । अप्रतिष्ठित ।

अलीकी
वि० [सं० अलीकिन्] १. नापसंद । अप्रिय । २. असत्य [को०] ।

अलीगर्द
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अलिगर्द्ध' [को०] ।

अलीगर्द्ध
संज्ञा पुं० दे० 'अलीगर्द' [को०] ।

अलौजा पु
वि० [अ० आलीजाह] बहुत सा । अधिक । बुलंद । उ०—मोम महावर मूली बीजा । अकरकरा अजमोद अलीजा ।-सूदन (शब्द०) । २. दे० 'आलीजाह' ।

अलीन (१)
संज्ञा पुं० [सं० आलीन=मिला हुआ] १. द्वार के चौखट की खड़ी लंबी लकड़ी जिसमें पल्ला या किवाड़ जड़ा जाता है । साह । बाजु । २. दालान या बरामेद के किनारे का खंभा जो दीवार से सटा होता है । इसका घेरा प्राय? आधा होता है ।

अलीन (२)
वि० [सं० अ=नहीं+लीन=रत] १. अग्राह्वय । अनुप- युक्त । उ०—'हे सखा पुरुवंशियों का मन अलीन वस्तु कभी नहीं जाता' ।-शकुंतला०, पृ० ३४ । २ अनुचित । बेजा । उ०—अरि दलयुक्त आप दलहीना । करि बैठे कछु कर्म अलीना ।-सबल (शब्द०) ।

अलीपित पु
वि० [हिं०] दे० 'अलिप्त' ।

अलीबंद
संज्ञा पुं० [अ० अली+ फा० बंद] एक प्रकार का आभूषण । एक प्रकार का बाजूबंद ।

अलील
वि० [अ०] बीमार । रुग्ण ।

अलीह पु
वि० [सं० अलीक] मिथ्या । असत्य । उ०—कान मूदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं अहे बात अलीहा ।-मानस २ ।४८ ।

अलु
संज्ञा पुं० [सं०] एक छौटा जलपात्र [को०] ।

अलुक्
संज्ञा पुं० [सं०] व्याकरण में समास का एक भेद जिसमें बीच की विभक्ति का लोप नहीं होता । जैसे—सरसिज, मनसिज, युधिष्ठिर, कर्णोंजय, अगदंकर, असूर्यपंश्या, विश्भं- भर ।

अलुक्क पु
वि० [सं अ=नहीं+प्रा० लुक्क=छिपना] न छिपनेवाला । उ०—अलुक्क लुक्क मान की कला अचुक्क धारहीं ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८३ ।

अलुज्झना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'अलुझना' । उ०—खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहि सुभट भटन ढहावहीं ।—मानस, ६ ।७८ ।

अलुझना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'अरुझना' और 'उलझना' ।

अलुटना पु
क्रि० अ० [सं० √ लुठ्=लोटना, लड़खडा़ना] लड़ख- ड़ाना । गिरना पड़ना । उ०—वले जात अल्ह मग, लागे बाग दीठि परयो, करि अनुराग हरि सेवा बिस्तारिये । पकि रहे आम माँगै माली पास भोग लिए, कहो लीजै, कही झुकि आई सब डारिये । चल्यौ दौरि राजा जहाँ जाइकै सुनाई बात, गात भई प्रीति, अलुटन पैव धारिये—प्रिया (शब्द०) ।

अलुमीनम
संज्ञा पुं० [अं० एलमीनियम] एक धातु जो कुछ कुछ नीलापन लिए सफेद होती है और अपने हल्केपन के लिये प्रसिद्ध है । इसके बरतन बनते है । इसनें रखने से खट्टी चीजें नहीं बिगड़ती ।

अलूक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उलूक' । उ०—सारस्स चिल्ह चात्रिग अलूक ।—पृ० रा०, ६१ ।१६७ ।

अलूप पु
वि० [सं लुप=अभाव] लुप्त । गायब । उ०—ससि औ सुर जो नर्मल तेहि ललाट की रूप । निसि दिन चलहिं न सरवरि पावैं तपि तपि होंहिं अलूप ।—जायसी (शब्द०) ।

अलूफा पु
वि० [हिं०] दे० 'अलोप' । उ०—सुखमन के घर तारी लाओं अमी अलूफा पाओंगा ।—गुलाल०, पृ० ५५ ।

अलूला पु
संज्ञा पुं० [हिं० बुलाबुला बलूता ?] बुलबुला । भभूका । लपट । उदगार । उ०—बानर बदन रुधिर लपटाने छबि के उठत अलूले । रघुपति रन प्रताप रन सरवर, मनहुँ कमलकुल फूले ।—हनुमान (शब्द०) ।

अलेख (१)
वि० [सं०] १. जिसके विषय में कोई भावना न हो सके । दुर्बोध । अज्ञेय । उ०—अगुन अलेख अमान एक रस । राम सगुन भए भक्त प्रेम बस ।—तुलसी (शब्द०) । २. जिसका लेखा न हो सके । बेहिसाब । बेअंदाज । अनगिनत । बहुत अधिक । उ०—योग जप ध्यान अलेख । तीरथ फिरे धरे बहु भेख ।—कबीर (शब्द०) ।

अलेख (२) पु
वि० [सं०अलक्ष्य] अदृश्य । उ०—सितासित अरुनारे पानिप के राखिबे कों, तीरथ के पति हैं अलेख लखि हारे हैं ।—भिखारी० ग्रं०, भा०२, पृ० ३९ ।

अलेख (३) पु
संज्ञा पुं० [सं० लेख=देवता] देवता । देव । उ०—सजि तिय नरभेषनि सहित अलेखनि करहिं असेषनि गानन कों ।— भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० २२९ ।

अलेखा पु
वि० [सं० अलेख] १. जो गिना न जा सके । बेहिसाब । २. व्यर्थ । निष्फल । उ०—सूरदास यह मति आए बिन सब दिन गए अलेखे । का जानै दिनकर की महिमा अंध नैन बिन देखे ।—सूर०, २ ।२५ ।

अलेखी पु (१)
वि० [सं० अलेख] गड़बड़ मचानेवाला । अंधरे करनेवाला । अन्यायी । उ०—बड़ै अलेखी लखि परे परिहरे न जाहीं । असमंजस मो मगन लौजै गहि बाहीं ।—तुलसी (शब्द०) ।

अलेखी (२)
वि० [सं अ+ लेख्य] जो लिखी न गई हो या जिसका लेखआ न हो । उ०—लेखी मैं अलेखी मैं नहीं है छबि ऐसी औ, असमसरी समसरी दीबै कों परै लियै ।—भिखारी० ग्रं०, भा० २, पृ० १८९ ।

अलेपक (१)
वि० [सं०] किसी भी चिज में लोप्त न होनेवाला । निर्लिप्त निष्कलुष । बेदाग [को०] ।

अलेपक (२)
संज्ञा पुं० परमात्मा । ब्रह्म ।

अलेपा पु
वि० [हिं०] दे० 'अलेपक' । उ०—सर्ब निवासी सदा अलेपा तोही संग समाई ।—संतवाणी०, भा०२, पृ० ४९ ।

अलेल पु
वि० [प्रा० अल्लिह=अप्रयोज्य अर्थात् प्रयोजन से अधिक] बहुत । अधिक । ज्यादा । उ०—घनआनंद खेल अलेल दसै बिलसै, सुलसै लट भुमि झुलि ।—घनआनंद, पृ० १५९ ।

अलेलह †
वि० [हिं०] दे० 'अलेल' ।

अलेव पु
वि० [हिं०] अलेप । अलिप्त । उ०—सुने अचंभो सो लगै सहजो ब्रह्मा अलेव ।—सहजो०, पृ० ४६ ।

अलैया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० अलहिया] एक रागिनी । वि० दे० 'अलहिया' ।

अलोइ पु
वि० [सं० अलौकिक] अलौकिक । इस लोक से भिन्न । उ०—जंपि राज दुजराज सम । तुम मति रूप अलोइ ।— पृ० रा०, २५ ।१५३ ।

अलोक (१)
वि० [सं०] १. जो देखने में न आए । अदृश्य । २. लोक शून्य । निर्जन । एकांत । ३. पुण्यहीन ।

अलोक (२)
संज्ञा पुं० १. पातालादि लोक । परलोक ।२. जैन शास्त्रा नुसार वह स्थान जहाँ आकाश के अतिरिक्त धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय आदि कोई द्रव्य न हो और जिसमें मोक्षगामी के सिवा और किसी की गति न हो । पु ३. बिना देखी बात । मिथ्यादोष । कलंक । निंदा । उ०—(क) लक्ष्मण सीय तजी जब ते बन । लोक अलोकन पूरि रहे तन ।—रामचं०, पृ० १८१ । (ख) पुत्र होई कि पुत्रिका यह बात जानि न जाइ । लोक लोकन मैं अलोक न लीजिये रघुराइ ।—रामचं०, पृ० १६४ ।४. संसार का विनाश [को०] । यौ०—अलोक सामान्य=अद्वितीय । असामान्य ।

अलोक (३) पु
संज्ञा पुं० [सं० आलोक] दे० 'आलोक' ।

अलोकन
संज्ञा पु० [सं०] अदृश्यता । न दिखाई पड़ना [को०] ।

अलोकना पु
क्रि० स० [सं०आलोकन] देखना ।ताकना । उ०— रंचक दीठि को भार लहे बहुबार बिलोकनि ईठि अनौसी । टुटिहै लागिहै लोक अलोकत वै हठ छूटिहै जूटिहौ कैसी ।— केशव (शब्द०) ।

अलोकनीय
वि० [सं०] जो दीख न पड़े । अदृश्य [को०] ।

अलोकित
वि० [सं०] अदेखा । बिना देखा हुआ [को०] ।

अलोकी पु
वि० [हिं० अलोक=निंदा+ई (प्रत्य०)] निंदित । कलंकी । बदनाम । उ०—भ्रमै सभ्रमी, यत्र शौके सशोकी अधर्मै अधर्मी अलौकै अलोकी ।—रामचं०, पृ० १५८ ।

अलोक्य
वि० [सं०] १. जो स्वर्ग दिलानेवाला न हो । अस्वर्ग्य । २. बुरे स्वभाववाला । क्रुर प्रकृति का [को०] ।

अलोचन
वि० [सं०] १. जिसे आँख न हो । २. बिना खिड़की या झरोखावाला [को०] ।

अलोना
वि० [सं० अलवण] [वि० स्त्री० अलोनी] १. बिना नमक का । जिसमें नमक न पड़ा हो । उ०—कीरति कुल करतूति भूति भलि सील सरूप सलोने । तुलसी प्रभु अनुराग रहित जस सालन साग अलोने ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५४६ ।२. जिसमें नमक न खाया जाय; जैसे—'रविवार को बहुत लोग अलोना व्रत रखते हैं' । ३. फीका । स्वादरहित । बेमजा । उ०— केसोदास बोले बिन, बोल के सुने बिना हू हिलन मिलन बिना मोह क्यों सरतु है । कौ लग अलोनो रूप प्याय प्याय राखौं नैन, नीर बिना मीन कैसे धीरज धरतु है ।—केशव (शब्द०) ।

अलोप पु
वि० [सं० लोप] दे० 'लोप' । उ०—अलोप टोप कै अटोप चाइ चोप सों धरैं ।—पद्माकर ग्रं पृ० २८४ ।

अलोपना (१) पु
क्रि० स० [सं० आलोपन] लुप्त करना । उ०—लेइगा कृस्तहि गरुड़ अलोपी ।—जायसी ग्रं०, पृ० १५१ ।

अलोपना (२) पु
क्रि० अ० लुप्त हो जाना । उ०—छत्रहि सरग छाइगा सूरुज गयउ अलोपि ।—जायसी ग्रं०, पृ० १०४ ।

अलोप
संज्ञा पुं० [सं० अलोप] एक पेड़ जो सदा हरा रहता है । विशेष—इसके हरि की लाल और चिकनी लकड़ी बहुत मजबुत होती है । यह नाव और गाड़ी बनाने के काम में आती है तथा घरों में लगती है । इसकी लकड़ी पानी में खराब नहीं होती ।

अलोभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. लालाच से मुक्ति । २. उलझन का अभाव [को०] ।

अलोभी
वि० [सं० अलोभिन्] इच्छारहित । अनिच्छुक [को०] ।

अलोल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १४ मात्राओं का एक छंद जिसके चार चरण होते हैं [को०] ।

अलोल (२)
वि० [सं०] १. जो चंचल न हो । स्थिर । टिका हुआ । उ०—नना री करे अलोल, धरे री पानी कपोल, भुव नख लिखै तिलहू न कछु भटकी री ।—सूर०, १० ।२७९७ ।२. जो लोभी न हो । अनिच्छृक [को०] ।

अलोलिक पु
संज्ञा पु० [सं० अलोस्र + इक (प्रत्य०)] अचंचलता । धीरता । स्थिरता उ०—लोल अमोल कटाक्ष कलोल अलोलिक सों पट ओलि कै फेरै ।—केशव (शब्द०) ।

अलोलु
वि० [सं०] विषय वासनाओं में रुचि न लेनेवाला । उदासीन [को०] ।

अलोलुप
वि० [सं०] १. इच्छाओं से मुक्त । २. अलोभी । लोभ से दूर रहनेवाला [को०] ।

अलोलुपता
संज्ञा स्त्री० [सं०] लोलुपता या लालच का अभाव [को०] ।

अलोहित
संज्ञा पुं० [सं०] लाल कमल ।

अलोही पु
वि० [सं अ=नहीं+लहिन=रक्त] रक्त से अछूता । उ०—इहि बिधि सु बीरनि संग लै पैठो अलोहो अनी में ।— पद्माकर ग्रं०, पृ० १८ ।

अलौकिक
वि० [सं०] १. जो इस लोक में न दिखाई दे । लोकोत्तर । लोकबाह्य । २. असाधारण । अदभुत । अपूर्व । उ०—हिय हरषे रघुबंस मनि प्रीति अलौकिक जानि ।—मानस, १ ।२६५ । ३. अमानुषी ।

अलौकिक
वि० [सं० आ+ लोल] अल्हड़पन । उ०—लाल अलौलिक लरिकई लखि लखि सखी सिहाँति ।-बिहारी र०, दो० १६५ ।

अलौही
वि० [सं० अलौह+ हिं० ई (प्रत्य०) जिसका लोहा कोई न ले सके । जिसका कोई टक्कर न ले सके । उ०—इहि बिधि सुबीरन संग लै पैठो अलौही अनी में ।-हिम्मत०, पृ० २५ ।

अल्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का वृक्ष । २. अवयव । अंग [को०] ।

अल्टिमेटम
संज्ञा पुं० [अं०] (किसी देश या राज्य का दूसरे देश या राज्य से) अंतिम प्रस्ताव, सूचना, पत्र या शर्तें, जिनके अस्वीकृत होने पर युद्ध के सिवा उपायांतर नहीं रहता । अंतिम पत्र । अंतिम सुचना; जैसे—'जापान ने चीन को अल्टिमेटम दिया है कि २४ घंटे के अंदर टिनसित खाली कर दो' ।— (शब्द०) ।विशेष—द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान में इसकी जागह हिंदी समा- चार पत्रो में 'अंतिमेत्यम' शब्द प्रचलित किया गया हैं ।

अल्प (१)
वि० [सं०] १. थोड़ा । कम । न्यून । कुछ । २. छोटा । ३. तुच्छ । ४. मरणशील । ५. विरल । ६. थोड़ी अवस्थावाला ।

अल्प
संज्ञा पुं० एक काव्यालंकार । विशेष—आधेय की अपेक्षा आधार की अल्पता या छोटाई का वर्णन होता है, जैसे—'सुनहु श्याम ब्रज में जगी, दसम दसा की जोति । जँह, मुणदरी अँगुरीन की, कर ढीली होति' । यहाँ आधेय मुँदरी की अपेक्षा आधार हाथ पतला या सूक्ष्म बतलाया गया है (शब्द०) ।

अल्पक (१)
वि० [सं०] [स्त्री० अल्पिका] थोड़ा । कम ।

अल्पक (२)
संज्ञा पुं० जवास का पौधा ।

अल्पकालिक
वि० [सं०] क्षणस्थायी । थोड़े काल का । उ०—'पर यह उच्छृंखलता और ध्वंस अल्पकालिक होता है' ।—रस०, पृ० १९ ।

अल्पकालीन
वि० [सं० अल्प+कालीन] दे० 'अल्पकालिक' ।

अल्पकेशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जटामासी । भूतकेशी । निगुँडी [को०] ।

अल्पगंध
संज्ञा पुं० [सं० अल्पगन्ध] रक्त कुमुदिनी । लाल कुँई ।

अल्पजीवी
वि० [सं० अल्पजीविन्] थोड़ा जीनेवाला । जिसकी आयु कम हो । अल्पायु ।

अल्पज्ञ
वि० [सं०] १. थोड़ा ज्ञान रखनेवाला । कम बातों को जाननेवाला । २. छोटी बुद्धि का । नासमझ ।

अल्पज्ञता
संज्ञा स्त्री० [सं०] थोड़ी जानकारी । ज्ञान की अपुर्णता । २. नासमझी ।

अल्पतनु
वि० [सं०] १. छोटे शरीरवाला । २. दुबला पतला । कमजोर । ३. छोटी हड़ि़डयोंवाला [को०] ।

अल्पता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कमी । न्यूनता । २. छोटा ।

अल्पत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. कमी । न्यूनता । २. छोटापन ।

अल्पदक्षिण
वि० [सं०] उपहार या दान देने में कजूसी करने वाला [को०] ।

अल्पदर्शन
बि० [सं०] अधिकतर दूर तक न सोचनेवाला । अदूरदर्शी । संकुचित विचार वाला [को०] ।

अल्पदृष्टि
वि० [सं०] संकुचित दृष्टि या विचारवाला [को०] ।

अल्पधन
वि० [सं०] कम पैसेवाला । निर्धन । गरीब [को०] ।

अल्पधी
वि० [सं०] कम बुद्धि वाल । मुर्ख [को०] ।

अल्पपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की तुलसी । २. कम पत्तों— वाला वृक्ष । मुसली [को०] ।

अल्पपदम
संज्ञा पुं० [सं०] अरुण कमल [को०] ।

अल्पप्रमाणक (१)
वि० १. थोड़े वजन या नापवाला । २. स्वल्प अधि कार या समीक्षावाला [को०] ।

अल्पप्रमाणक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खरबूजा । २. तरबूजा ।

अल्पप्रसार
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार छोटी सी जांगलिक सेना या जांगलिक सहायता ।

अल्पप्राण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह वर्ण जिसके उच्चारण में प्राणवायु का अल्प व्यवहार हो । व्यजनों के प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ अक्षर तथा य, र, ल और व । अल्पप्राण ये हैं—क, ग, ङ, च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म, य, र, ल और व ।

अल्पप्राण (२)
वि० १. कमजोर । २. अल्पश्वासवाला । श्वासरोगग्रस्त [को०] ।

अल्पबल
वि० [सं०] कम शक्तिवाला । कमजोर [को०] ।

अल्पबुद्धि
वि० [सं०] थोड़ा बुद्धिवाला । मुर्ख [को०] ।

अल्पभाग्य
वि० [सं०] अभागा । मंदभाग्य [को०] ।

अल्पभाषी
वि० [सं० अल्पभाषिन्] [वि० स्त्री० अल्पभाषिणी] कम बोलनेवाला । [को०] ।

अल्पभृत
संज्ञा पुं० [संज्ञा] वार्षिक भृति (भत्ता या वेतन) पानेवाला कर्मचारी ।

अल्पमत
संज्ञा पुं० [सं०] १. वे लोग जिनकी संख्या या मत औरों की अपेक्षा कम हो । अल्पसंख्यक । २. घोड़े से लोगों का मत । बहुमत का । उलटा ।

अल्पमध्यम
वि० [सं०] पतली कमरवाला । जिसकी कटि क्षीण हो [को०] ।

अल्पमारिष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मरसा का साग [को०] ।

अल्पमेधा
वि० [सं० अल्पमेधष्] अल्पबुद्धि । मूर्ख [को०] ।

अल्पवयस्क
वि० [सं०] [वि० स्त्री० अल्पवयस्का] छोटी अवस्था का । थोड़ी उम्र का । कमसिन ।

अल्पवया
वि० [सं० अल्पवयस्] कमसिन । अल्पवयस्क [को०] ।

अल्पविराम
संज्ञा पुं० [सं०] वाक्य में अर्थबोध की दृष्टि से थोड़े विराम की सूचना देनेवाला चिह् न । इसका रुप यह (;) है । कामा ।

अल्पव्यय
संज्ञा पुं० [सं०] वह काम जो केवल कुछ भत्ता (खाने— पीने का खर्च) मात्र देने से हो जाय ।

अल्पव्यायारंभ
संज्ञा पुं० [सं० अल्पव्यायारम्भ] कौटिल्य के मत से बहुत कम खर्चे में बननेवाला काम ।

अल्पशः
क्रि० वि० [सं०] थो़ड़ा थोड़ा करके धीरे धीरे । क्रमशः ।

अल्पशमी
संज्ञा पुं० [सं०] शमी की तरह एक छोटा वृक्ष [को०] ।

अल्पसंख्यक (१)
वि० [सं० अल्पसङ्ख्यक] कम संख्यावाला । गिनती का । थोड़े या कम ।

अल्पसंख्यक (२)
संज्ञा पुं० १. वह गुट, दल, पक्ष या समाज जिसके सदस्यों की संख्या औरों की अपेक्षा कम हो । बहुसंख्यक का उलटा । २. उक्त पक्ष दल या समाज का सदस्य ।

अल्पसंतोषी
वि० [अल्पसन्तोषिन्] थोड़े में संतुष्ट रहनेवाला [को०] ।

अल्पसार
वि० [सं०] १. स्वल्प मूल्य का । २. अल्प शक्ति का । कमजोर [को०] ।

अल्पसत्व
वि० [सं०] कम शक्ति या साहसवाला [को०] ।

अल्पस्वाप
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार आराम करने के लिये स्थान या अवसर का बहुत कम मिलना ।

अल्पांश
संज्ञा पुं० [सं०] थोड़ा अंश । कुछ भाग ।

अल्पायु (१)
वि० [सं०] थोड़ी आयुवाला । जो थोड़े दिन जीए । जो छोटी अवस्था में मरे ।

अल्पायु (२)
संज्ञा पुं० बकरा ।

अल्पारंभ
संज्ञा पुं० [सं० अल्पापम्भ] छोटे तौर पर या धीरे धीरे कार्य शुरू करना [को०] ।

अल्पाहार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] थोड़े भोजन । कम भोजन । संयत भोजन [को०] ।

अल्पाहार (२)
वि० कम खानेवाला । अल्पाहारी [को०] ।

अल्पाहारी
वि० [सं० अल्पाहारिन्] थोड़ा खानेवाला । कम खाने— वाला । संयत भोजन करनेवाला [को०] ।

अल्पित
वि० [सं०] जिसकी उपेक्षा की गई हो । २. घटाया हुआ । अल्प किया हुआ [को०] ।

अल्पिष्ट
वि० [सं०] सबसे कम । सबसे छोटा । बहुत छोटा [को०] ।

अल्पेतर
वि० [सं०] १. छोटा नहीं । बृहद् । २. थोड़ा नहिं । बहुत । अनेक [को०] ।

अल्फाज
संज्ञा पुं० [अ० लफ्ज का बहुव०] वाक्य । शब्द समूह ।

अल्यंग पु †
संज्ञा पुं० [सं० आलिङ्गन] दे० 'आलिंगन' । उ०— रूठी गोरी अल्यंग नू लेहि । पल्यंग बइसइ नवि पान नू लेहि ।—बी० रासो, पृ० ९७ ।

अल्ल
संज्ञा पुं० [अ० आल] वंश का नाम । उपगोत्रज नाम । जैसे—पाँड़े, त्रिपाठी, मिश्र, आदि ।

अल्लक पु
संज्ञा पुं० [सं० अल्लक] १. दे० 'अलक' । उ०—सुहंत स्याँम अल्लकं, भ्रमत और ब्रल्लकं ।—हम्मीर रा०, पृ० २५ । २. धनिया या धनिया का पौधा [को०] ।

अल्लमगल्लम
संज्ञा पुं० [अनु०] अनाप शनाप । अंडबंड । व्यर्थ की बकवाद । प्रलाप ।

अल्ला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. माता । २. पराशक्ति [को०] ।

अल्ला (२)
संज्ञा पुं० ईश्वर । परमात्मा [को०] ।

अल्लाई
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्=शब्द करना] चौपायों के गले की एक बीमारी । घँटियार ।

अल्लाना पु †
क्रि० अ० [सं० अर=बोलना] चिल्लाना । जोर से बोलना । उ०—पावस की अधिक अँधेरी अधरात समै कान्ह हेत कामिनी यों कीन्हीं अभिसार को । 'राम' कहै चकित चुरैलैं चहु अल्लै; त्यों खबीस करि भल्लैं, चौहै चकित समान को ।— राम (शब्द०) ।

अल्लामा (१)
वि० स्त्री० [अ० अल्लामह्=चतुर अथवा हिं० अल्लाना= चिल्लाना] कर्कशा । लड़ाकी ।

अल्लामा (२)
वि० [अ० अल्लामह] बहुविज्ञ । श्रेष्ठ विद्वान् । महा— पंडित [को०] ।

अल्लाह
संज्ञा पुं० [अ०] ईश्वर । उ०—अल्लाह की नहीं तुझेऐ बेखबर तलाश ।—शेर०, भा०१, पृ० ६७१ । मुहा.—अल्लाह मियाँ की गाय=सीधा सादा । बहुत भोला । निष्कपट । अल्लाह आमीन से पालन=मनौती मानकर पालना । देवताओं की विनय करके पालना । अल्लाह ने अकल ही नहीं दी=परमात्मा ने बुद्धि पर परदा डाल दिया है । यौ.—अल्लाहताला=ईश्वर । अल्लाहबेली=ईश्वर तुम्हारा रक्षक है । अल्लहो अकबर=ईश्वर महान् है ।

अल्लोल पु
वि० [सं० आलोल] लोल । चंचल । उ०—जलकेलि करत मिलि सजन संग । अल्लोल कलभ जनु सरति रंग ।— पृ० रा०, १ ।७२४ ।

अल्ह पु
संज्ञा पुं० [सं० अह्व अथवा प्रा० अल्ल=दिवस] दिन । उ०—परत भोमि रोचनिय । सस्त्र पुढ्ढ़ी अल्ह फुट्टिय ।— पृ० रा०, ६४ ।३५१ ।

अल्हजा पु
संज्ञा पुं० [अ० अल् हजल्] यह बात और वह बात । गप्प । इधर उधर की बात । उ०—कबिरा जीवन कछु नहीं, खिन खारा खिन मीठ । काल्हि अल्हजा मारिया, आज मसाना दीठ ।—कबीर (शब्द०) । क्रि० प्र०—मारना ।

अल्हड़ (१)
वि० [सं० अल=बहुत+ लल चाह] १. मनमौजी । निर्द्वद्व । बेपरवाह । २. छोटी उम्र का । बिना अनुभव का । जिसे व्यवहार ज्ञात न हो । लोकज्ञातशून्य । ३. उद्धत । उजड्ड अनगढ़ । अपरिष्कृत । अकुशल । ४. अनारी । गँवार । अपरिपक्व ।

अल्हड़ (२)
संज्ञा पुं० १. नया बछड़ा । वह बछड़ा । जिसे दाँत न आए हों । २. बैल या बछड़ा जो निकाला न गया हो ।

अल्हड़पन
संज्ञा पुं० [हिं० अल्हड़+ पन (प्रत्य०)] १. मनमौजीपन । बेपरवाही । निर्द्वद्वता । २. कमसिनी । लड़कपन । व्यवहारज्ञात का अभाव । भोलापन । ३. उजड्डपन । अक्खड़पन । ४. अनाड़ीपन ।

अल्हर †
वि० [हिं०] दे० 'अल्हड़' ।