हिन्दी-हिन्दी/उद

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उदंक
संज्ञा पुं० [सं० उदङ्क] चमड़े का बना तैलपात्र । कुप्पी [को०] ।

उदंगल
संज्ञा पुं० [फा० दंगल] हंगामा । शेरगुल । उ०—इस ही बीच नगर मैं सोर । भयौ उदंगल चारिहु ओर—अर्ध०, पृ० २४ ।

उदंचन
संज्ञा पुं० [सं० उदञ्चन] १. आवारण । ढकना । २. ऊपर की ओर फेंकना । ३. चढ़ना । ४. डोल । घड़ा । बालटी । जल रखने का बड़ा बरतन [को०] ।

उदंचित
वि० [सं० उदञ्चित] १. आदृत । पूजित । २. ऊपर की ओर उठाया हुआ । ३. कथित । उक्त । ४. प्रतिध्वनी [को०] ।

उदंचु
वि० [सं० उदञ्चु] ऊपर की ओर जानेवाला [को०] ।

उदंजरस्थान
संज्ञा पुं० [सं० उदञ्जर स्थान] पानी रखने का स्थान या गुसलखाना ।

उदंड (१)पु
वि० [सं० उद्दयण्ड] दे० 'उद्दंड़' । उ०—है बलभार उदंड भरे हरि के भुजदंड सहातक मेरे :—इतिहास, पृ० २४३ ।

उदंड (२)
वि० स्त्री० [सं० उदण्ड] अनेक अंडे देनेवाली । जैसे, मत्स्य, सर्प आदि [को०] ।

उदडपाल
संज्ञा पुं० [सं० उदण्डपाल] १. मछली । २. एक प्रकार का साँप [को०] ।

उदंडी पु
वि० [हिं०] दे० 'उद्दड़' । उ०—उदंडी भुसंडी लियैं हत्य केते चलैं, चाल उत्ताल आतंक देते ।—सुजान०, पृ० २९ ।

उदंत (१)
वि० [सं० अ+दन्त] जिसके दाँत न जमे हों । बिना दाँत का । अदंत । विशेष—इसका प्रयोग चौपायों के लिये होता है । वह बैल या गाय अथवा भैंस जो तीन साल से कम अवस्था की होती है तथा जिसके दूध के दाँत न जमें हों उसे 'उदंत' । कहते हैं ।

उदंत (२)
वि० [सं० उदन्त] किसी वस्तु की समाप्ति या सीमा तक पहुँचानेवाला [को०] ।

उदंत (३)
संज्ञा पुं० १. वार्ता । वृत्तांत । समाचार । लेखाजोखा । विवरण । २. साधु । सज्जन (को०) । ३. यज्ञ आदि द्वारा जीविका प्राप्त करनेवाला व्यक्ति (को०) । ४. वह जो व्यापार एवं कृषि के द्वारा जीविकार्जन करता हो (को०) ।

उदंतक
संज्ञा पुं० [सं० उदन्तक] समाचार । वृत्तांत । वार्ता ।

उदंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० उदन्तिका] संतोष । तृप्ति [को०] ।

उदंत्य
वि० [सं० उदन्त्य] सीमांत या सीमा के बाहर रहनेवाला [को०] ।

उद् (१)
उप० [सं०] एक उपसर्ग जो शब्दों के पहले लगकर उनमें इन अर्थों की विशेषता उत्पन्न करता है—ऊपर, जैसे—उदगमन; अतिक्रमण, जैसे,—उत्तीर्ण, उत्क्रांत; उत्कर्ष, जैसे—उदबोधन, उदगति; प्राबल्य, जैसे—उदवेग, उदबल; प्राधान्य, जैसे— उद्देश; अभाव जैसे— उत्पथ, उदवासन; प्रकाश, जैसे— उच्चारण; दोष, जैसे—उन्मार्ग ।

उद् (२)
संज्ञा पुं० १. मोक्ष । २. ब्रह्म । ३. सूर्य । जल ।

उद् (३)
संज्ञा पुं० [सं०] जल । पानी । समास आदि या अंत में प्रयुक्त, जैसे अछोद, क्षीरोद, उदकुंभ, उदकोष्ठ, उदपात्र = जलपूर्ण घट ।

उदउ पु
संज्ञा पुं० [सं० उदय] दे० 'उदय' । उ०—उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर, अवध विलोकि सूल होइहि उर ।—मानस, २ ।३७ ।

उदक् (१)
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तर दिशा ।

उदक् (२)
क्रि० वि० [सं०] १. ऊपर की ओर । २. उत्तर की ओर [को०] ।

उदक् (३)
वि० [सं०] [अन्य रूप—उदङ्, उदव्] [वि० स्त्री० उदीची] १. ऊपर की ओर गतिभील । २. उत्तर का । उत्तरी । ३. परवर्ती । बाद का । ४. ऊँचा [को०] ।

उदक
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तर दिशा । २. जल । पानी । यौ० उदककार्य । उदककुंभ । उदकक्रीड़न । उदकक्रीड़ा । उदक ग्रहण = जल लेना । उदकद । उदकदानिक = दे० 'उदकदाता' । उदकधर = मेघ । उदक प्रतिकाश = उदकविंदु । उदकशाक । उदकाद्रि । गंगोदक । विशेष—समस्त पदों के आदि में कभी कभी उदक के स्थान में उत् हो जाता है; जैसे—उत्कुंम ।

उदक्र अद्रि पु
संज्ञा पुं० [सं० उदगद्रि] दे० 'उदगद्रि' ।

उदककर्म
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उदकक्रिया' ।

उदकक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तिलांजलि । जलदान । उदकदान । प्रेत का तर्पण । विशेष—यह क्रिया मृतक के शव का दाह हो जाने पर उसके गोत्रवालों को दस दिन तक करनी पड़ती है । २. तर्पण ।

उदककृच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णुस्मृति के अनुसार एक व्रत जिसमें एक मास तक जौ का सत्तू और जल पिने का विधान है ।

उदकगाह
संज्ञा पुं० [सं०] स्नान करना । नहाना [को०] ।

उदकगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] जलाशयों से पूर्ण पर्वत [को०] ।

उदकचरण
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह चोर या घातक जो स्नान । करते हुए मनुष्य को पानी के भीतर खींच ले जाय । पनडुब्बा । बुड़आ ।

उदकदाता
संज्ञा पुं० [सं० उदकदातृ] १. वह व्यक्ति जो पितरों का तर्पण करता हो । २. उत्तराधिकारी । हकदार [को०] ।

उदकदान
संज्ञा पुं० [सं०] जलदान । तर्पण ।

उदकना
क्रि० अ० [सं० उद् = ऊपर+क = उदक या उद्+ √ अञ्ज्] कूदना । उछलना । छटकना । उ०—भक्षण करतदेखि लोगन को हन्या कुलिश सुरराई । गड्यो न तनु । में उदकि गयो मुरि शक्र भज्यो भय पाई ।—रघुराज (शब्द०) ।

उदकपरीक्षा
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल में अपने शपथ का एक भेद जिसमें शपथ करनेवाले को जल में अपने वचन की सत्यता प्रमाणित करने के लिये डूबना पड़ता था ।

उदकप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] प्रमेह रोग का एक भेद । विशेष—इसमें वीर्य अत्यंत पतला हो जाता है और मूत्र के साथ निकला करता है । मूत्र सफेद रंग का चिकना गाढ़ा गंधरहित और ठंडा होता है । इस रोग में पेशाब बहुत होता है ।

उदकमेह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदक प्रमेह' ।

उदकल
वि० [सं०] जलवाला । जलसंबंधी [को०] ।

उदकशांति
संज्ञा स्त्री० [सं० उदयशान्ति] व्याधि दूर करने के लिये रोगी पर अभिमंत्रित जल छिड़कना [को०] ।

उदकशुद्ध
वि० [सं०] स्नात । नहाया हुआ [को०] ।

उदकस्पर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. शरीर के विभिन्न अंगों को जल से स्पर्श करना । २. शपय, दान, प्रतिज्ञा आदि के समय जल का स्पर्श करना ।

उदकहार
संज्ञा पुं० [सं०] पनिहार [को०] ।

उदकांत
संज्ञा पुं० [सं० उदकान्त] किनारा । पुलिन [को०] ।

उदकाधार
संज्ञा पुं० [सं०] कूँआँ । हौज [को०] ।

उदकार्थी
वि० [सं० उदकार्थिन्] तृषित । प्यासा । दल चाहनेवाला [को०] ।

उदकीर्य
संज्ञा पुं० [सं०] करंज का वृक्ष और फल [को०] ।

उदकेचर
संज्ञा पुं० [सं०] जलचर । पानी का जंतु ।

उदकेविशीर्ण
वि० [सं०] जल में सुखाया हुआ अर्थात् कभी न सुना हुआ । अस भव [को०] ।

उदकोदंचन
संज्ञा पुं० [सं० उदकोदञ्चन] जल भरने का घड़ा ।

उदकोदर
संज्ञा पुं० [सं०] जलोदर ।

उदकौदन
संज्ञा पुं० [सं० उदक+ओदन] पानी में पकाया हुआ चावल । भात [को०] ।

उदक्त
वि० [सं०] १. ऊपर की ओर मोड़ा या उठाया हुआ ।२. ऊपर जाता हुआ । ३. कयित [को०] ।

उदक्य (१)
वि० [सं०] १. जलवाला । जलीय । २. जिसको पवित्रता के लिये स्नान की आवश्यकता हो । अपवित्र । अशुचि । ३. जलेच्छु (को०) ।

उदक्य (२)
संज्ञा पुं० पानी में होने वाला अन्न; जैसे, धान ।

उदक्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] रजस्वला नारी ।

उदग्
संज्ञा पुं० [सं०] 'उदक्' शब्द का समास प्रयुक्ति रूप ।

उदगद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय ।

उदगयन
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तरायण ।

उदगरना †
क्रि अ० [सं० उदगरण] १. उगरना । निकलना । बाहर होना । २. प्रकाशित होना । खुल पड़ना । प्रकट होना । ३. उभड़ना । भड़कना ।

उगगगल
संज्ञा पुं० [सं० ] ज्योतिषशास्त्र के अंतर्गत वह विद्या जिससे यह ज्ञान प्राप्त हो कि अमुक स्थान में इतने हाथ की दूरी पर जल है । यह भूगर्म विद्या के अंतर्गत है ।

उदगार पु
संज्ञा पुं० [सं० उदगार] दे० 'उदगार' । उ०— रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते ज्ञान—गुन गौरव के अति उदगार मैं ।—रत्नाकर, भा० १, पृ० १५६ ।

उदगारना पु
क्रि० स० [सं० उदगरण] १. बाहर निकालना । डकार लेना । २. बाहर फेकना । उगलना । ३. खोदकर उभाड़ना । भड़काना । प्रज्वलित करना । उत्तेजित करना । जैसे— क्रोध उदगारना । उ०—पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी । अरध उरध लै भाठी रोपी ब्रह्म अगिन उदगारी । —कबीर (शब्द०) ।

उदगारी पु
वि० [सं० उदगारीया हिं० उदगारना] १. उगलनेवाला । २. बाहर निकालनेवाला । डकार लेनेवाला । ३. उभाड़नेवाला ।

उदग्ग पु
वि० [सं० उदग्र, प्रा० उदग्ग] १. ऊचाँ । उन्नत । उ०— सुंडन झपट्टिकै उल्लट्टत उदग्गगिरि पदत सुसद्दबल किंमत बिहद्द है । —सुजान०, पृ० ८ । २. प्रचंड । उग्र । उद्धत । उ०—(क) सत एक हयंदनु लै उदग्ग हरिनारायन जिहिं प्रबल खग्ग । — सूदन (शब्द०) । (ख) औरौ उदग्ग कर खग्ग धरी अग्ग पग्ग धर धरिय रन । —सुजान०, पृ० २२ । (ग) मालव भूप उदग्ग चल्यो कर खग्ग जग्ग जित । —गोपाल (शब्द०) ।

उदग्गति
संज्ञा स्त्री० [सं० ] उत्तरायण [को०] ।

उदग्द्वार
वि० [सं० ] उत्तराभिमुख दरवाजेवाला [को०] ।

उदग्भूमि
संज्ञा स्त्री० [सं० ] उपजाऊ भूमि [को०] ।

उदग्र
वि० [सं० ] [वि० स्त्री० उदग्रा] १. ऊँचा । उन्नत । २. बढ़ा । परिवर्धित । ३. प्रचंड । उद्धत । उग्र । भयंकर । प्रबल । शक्तिशाली (को०) । ५. उदार (को०) । ६. आयुवृद्ध । वयोवृद्ध (को०) । ७. असह्य । जो सहन न हो सके (को०) ।

उदग्रदत् (१)
वि० [सं० ] जिसके दाँत निकले हुए हों । बड़े दाँतवाला [को०] ।

उदग्रदत् (२)
संज्ञा पुं० बड़े दाँतोंवाला हाथी [को०] ।

उदग्रनख
संज्ञा पुं० [सं० ] जुड़े हुए हाथ । अंजलि [को०] ।

उदग्रप्लुतत्व
संज्ञा पुं० [सं० ] ऊँचे कूदने का भाव या क्रिया [को०] ।

उदग्रशिर
वि० [सं० ] १. ऊँचे शिरवाला । ऊँची चोटीवाला २. अभिमानी [को०] ।

उदघटना पु
क्रि० अ० [सं० उदघटन = संचालन] प्रकट होना । उदय होना । उ०—कुथि रटि अटत बिमूढ़ लट घट उदघटत न ग्यान । तुलसी रटत हटत नहीं अतिसय गत अभिमान । — स० सप्तक, पृ० ३० ।

उदघाटन पु
संज्ञा पुं० [सं० उदघाटन] दे० 'उदघाटन' ।

उदघाटना पु
क्रि० स० [सं० उदघाटन] प्रकट करना । प्रकाशित करना । खोलना । उ०— (क) तब भुज बल महिमा उदघाटी । प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी । —मानस, १ । २३९ । (ख) तहाँ सुधन्वा सब शर काटी । उदघाटी अपनी परीपाटी । — सबल (शब्द०) ।

उदघोष
संज्ञा पुं० [सं० ] जलीय गर्जन [को०] ।

उदङमुख
वि० [सं०उदक् + मुख] उत्तर की ओर जिसका मुख हो [को०] ।

उदङमृत्तिक
संज्ञा पुं० [सं० उदक् + मृत्तिका] उर्वरा भूमि । उपजाऊ धरती [को०] ।

उदचमस
संज्ञा पुं० [सं० ] जल पीने का पात्र [को०] ।

उदज
संज्ञा पुं० [सं० ] १. जल में उत्पन्न या जलीय पदार्थ । ८. कमल [को०] ।

उदथ
संज्ञा पुं० [सं० उदगीथ = सूर्य] सूर्य । उ०— बिन अवलंब कलिकानि आसमान मैं ह्वै होत विसराम जहाँ इंदु और उदथ को । भूषण ग्रं०, पृ० ६५ ।

उदधान
संज्ञा पुं० [सं० ] १. मेघ । बादल । २. घड़ा [को०] ।

उदधि (१)
संज्ञा पुं० [सं० ] २. समुद्र । यौ०—उदधिजा । उदधितनय । उदधितिय । उदधिमल । उदधिमेखला । उदधिवस्त्रा । उदधिसुत । २. घड़ा । ३. मेघ । ४. झील या जलाशय (को०) । ५. चार और सात की संख्या का वाचक (शब्द०) (को०) । ६. नदी (को०) ।

उदधि (२)
वि० चार । वि० दे०'समुद्र' ।

उदधिकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं० ] लक्ष्मी [को०] ।

उदधिकुमार
संज्ञा पुं० [सं० ] जैन मत के अनुसार एक देवता जो भुवनपति नामक देवगण में हैं ।

उदधिक्रम, उदधिक्राम
संज्ञा पुं० [सं० ] केवट । माँझी । नाविक [को०] ।

उदधितनय
संज्ञा पुं० [सं० ] चंद्रमा । उ०—उदधितनयबाहन सुनौ तासम तुल्य बखानिये । यौं सुंदर सदगुर गुण अकथ तास पार नहिं जानिये । —सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० १११ ।

उदधितनया
संज्ञा स्त्री० [सं० ] समुद्र की पुत्री । लक्ष्मी [को०] ।

उदधितल
संज्ञा पुं० [सं० ] समुद्रफेन [को०] ।

उदधिमेखला
संज्ञा स्त्री० [सं० ] पृथिवी [को०] ।

उदधिवस्त्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० ] पृथिवी ।

उदधिसंभव
संज्ञा पुं० [सं० उदधिसम्भव] समुद्र के पानी से तैयार नमक [को०] ।

उदधिसुत
संज्ञा पुं० [सं० ] १. वह पदार्थ जो समुद्र से उत्पन्न हो या समझा जाता हो । २. चंद्रमा । ३. अमृत । ४. शंख । ५. कमल ।

उदधिसुता
संज्ञा स्त्री० [सं० ] १. समुद्र से उत्पन्न वस्तु । २. लक्ष्मी ३. द्वारिकापुरी (को०) । ४. सीप ।

उदधीय
वि० [सं० ] १. समुद्र संबंधी ।

उदन्य
वि० [सं० ] १. प्यासा । तृषित । २. जल संबंधी [को०] ।

उदन्या
संज्ञा स्त्री० [सं० ] उषा । प्यास । जल की इच्छा [को०] ।

उदन्यु
वि० [सं० ] १. प्यासा । २.जलवारी [को०] ।

उदन्वान्
संज्ञा पुं० [सं० उदन्वत्] समुद्र । सिंधु [को०] ।

उदपान
संज्ञा पुं० [सं० ] १. कूँएँ के समीप का गड्ढा । कूल । खाता । २. कमंडलु । उ०— मुद्रा स्त्रवन कंठ जपमाला, कर उदपान काँध धबछाला । —जायसी ग्रं०, पृ० ५३ । ३. तालाब के आसपास की भूमी या टीला ।

उदबर्तन पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्वर्तन] दे० 'उद्वर्तन' ।

उदबस पु
वि० [सं० उद्वास = निर्जन, उजाह वा सं० उदवासन = स्थान से हटाना] १. उजाड़ । सूना । उ०— (क) उदबस अवध नरेश बिनु देश दुषी नर नारी । राजभंगु कुसमाज बड़ गतग्रह चालि बिचारि । तुलसी (शब्द०) । (ख) उदबस अवध अनाथ सब अंब दशा दुख देखि । —तुलसी ग्रं०, पृ० ९१ । २. उद्वासित । स्थान से निकाला हुआ । एक स्थान पर न रहनेवाला । खानाबदोश । उ०—(क) अब तौ बात घरी पहरन की ज्यौं उदबस की भीत्यौ । सूर स्याम दासी सुख सोबहु, भयौ उभै मनचीत्यौ । सूर०, १० । ४००१ । (ख) चंचल निशि उदबस रहैं करत प्रात बसि राज । अरबिंदनि में इंदिरा सुंदर नैननि लाज । मतिराम (शब्द०) ।

उदबासना
क्रि० स० [सं० उदवासन] १. स्थान से हटाना । उठा देना । भगा देना । २ उजाड़ना ।

उदबेग पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्वेग] दे० 'उद्वेग' । उ०—(क) गुन बर्नन, उदबेग पूनि कहि प्रलाप, उन्माद । —मतिराम ग्रं०, पृ० ३५३ । (ख) 'मुनि उदबेगु न पावइ कोई' । — मानस, २ ।१२६ ।

उदभट पु †
वि० [सं० उदभव] दे० 'उदभट' । उ०—उदभट भूप मकर— केतन कौ, आग्या होत नई । —पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २३८ ।

उदभव पु
संज्ञा पुं० [सं० उदभव] दे० 'उदभव' ।

उदभौत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अदभुत] अदभुत वस्तु या घटना । अचंभा ।

उदभौति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अदभुत] दे० 'उदभौत' । उ०— अखियनि तैं मुरली अति प्यारी— वै बैरिनि यह सोति । सूर परस्पर कहति गोपिका, यह उपजी उदभौति । — सूर०, १० । ३०२७ ।

उदमद पु
संज्ञा पुं० [सं० उद् + मद] १. दे० 'उदमाद' । उ०— (क) गुरु अंकुस मानैं नहीं उदमद माता अंध । दादू मन चेतै नहीं, काल न देखै फंध । —दादू०, पृ० १६ । मदाधिक्य । मद की अधिकता । उ०—छिन एकै मनवो उदमदि मातौ स्वोदै लागौ खाए रे । — दादू० — पृ० ६२२ ।

उदमदना पु
क्रि० अ० [सं० उद् + मद] पागल होना । उन्मत्त होना । आपे को भूलना । उ०—(क) अपने अपने टोल कहत व्रजबासी आई । आव भगति ले चले सुदंपति आसी आई । शरद काल ऋतु जानि दीपमालिका बनाई । गोपन के उदमाद फिरत उदमदे कन्हाई । सूर० (शब्द०) ।

उदमाती †
वि० स्त्री० [हिं० उदमादी] मद से भरी हुई । मतवाली ।

उदमाद पु
संज्ञा पुं० [सं० उद् + माद] उन्मत्तता । पागलपन । उ०—(क) गोपन के उदमाद फिंरत उदमदे कन्हाई । —सूर (शब्द०) । (भ) दाऊ उमिरि अराक दुहुन उदमाद रारि हित । दोऊ जानत जीति हारि जानत न दुहूँ चित । —सूदन (शब्द०) । (त) सुंदर यह मन मीन है बंधै जिह्वा स्वाद । कंटक काव न सूझई करत फिरै उदमाद । —सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० २७२ ।

उदमादी पु †
वि० [सं० उन्मादिन्] उन्मत्त । मतवाला । बावला ।

उदमान पु
वि० [सं० उन्मत्त] [स्त्री० उदमानी] उन्मत्त । उ०— साल्व परधान उदमान मारी गदा प्रद्युमन मुरहित भए सुधि बिसारा । —सूर (शब्द) ।

उदमानना पु
क्रि० अ० [सं० उन्मादन] उन्मत्त हाना । उ०—मैं तुम्हरे मन की सब जानी । आपु सबै इतराति हौ दूषन हेतु स्याम को आनी । मेरे हरि कहँ दसहि बरस को तुमही जोबन मद उदमानी । लाज नहीं आवत इन लँग रन कैसे धौं कहि आवत बानी । । —सूर (शब्द०) ।

उदय
संज्ञा पुं० [स० ] [वि० उदित] १. ऊपर आना । निकलना । प्रकट होना । जैसे— (क) सूर्य के उदय से अंधकार दूर हो जाता है । (ख) न जाने हमारे किन बुरे कर्गों का उदय हुआ ? विशेष— ग्रहों और नक्षत्रों के संबंध में इस शब्द का प्रयोग विशेष होता है । क्रि० प्र० —करना (अकर्मक प्रयोग) = उगना । निकलना । प्रकट होना । उ०— जनु ससि उदय पुरुब दिसि लीन्हा । औ रबि उदब पछिउँ दिसि कीन्हा । जायसी ग्रं०, पृ० ८५ । करना । —(सकर्मक प्रयोग) = प्रकट करना । प्रकाशित करना । उ०— तिलक भाल की पर परम मनोहर गोरोचन को दीनो । मानो तान लोक की सोभा अधिक उदय सो कीनो ।—सूर (शब्द०) । लेना = उगना । निकलना । उ०— जनु ससि उगय पुरुब दिसि लीन्हा । जायसी ग्रं०, पृ० ८५ । — होना = उगना । मुहा०—उदय से अस्त तक या लौ=पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक । सारी पृथ्वी में । उ०—(क) हिरनकश्यप बढ़यो उदय अरु अस्त लौं हठी प्रहलाद चित चरन लायौ । भीर के परे तैं धार सबहिन तजी खभ तैं प्रकट ह्वै जन छुड़ायौ ।— सूर—(शब्द०) । (ख) चारिहु खंड भीख का बाजा । उदय अस्त तुम ऐस न राजा ।—जायसी (शब्द०) । यौ०—सूर्योंदय । चंद्रोदय । शुक्रोदय । कर्मोदय । २. वृद्धि । उन्नति । बढ़ती । जैसे—किसी का उदय देखकर जलना नहीं चाहिए । क्रि० प्र०—देना पु [सकर्मक प्रयोग] उन्नति करना । बढ़ती करना । उ०—प्रबोधौ उदै देइ श्रीबिंदुमाधव ।—केशव (शब्द०) ।—होना । यौ०—भाग्योदय । ३. उदगम । निकलने का स्थान । ४. उदयाचल । ५. व्यक्त होना । प्रकट होना । प्रादुर्भाव (को०) । ६. सृष्टि (को०) । ७. परिणाम । परिणति (को०) । ८. कार्य का पूर्णत्व (को०) । ९. लाभ (को०) । १०. सद । ब्याज (को०) ।

उदयगढ़ पु
संज्ञा पुं० [सं० उदय+हिं० गढ़] उदयाचल । उ०— सूर उदयगढ़ चढ़त भुलाना, गहने कमल कुंभिलाना ।— जायसी (शब्द०) ।

उदयगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] उदयाचल । उ०—उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बाल पतंग ।—मानस, १ ।२५४ ।

उदयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अवंती देश का राजा वत्सराज जिसका वर्णन गुणाढ्य की 'बढ्ढकहा', क्षेमेंद्र की 'बृहत्कथामंजरी' और सोमदेव के 'कथासरित्सागर' में है । २. एक दार्शनिक आचार्य जिसने 'न्यायकुसुमांजलि' और ' आत्मतत्वविवेक' आदि ग्रंथ रचे हैं । ३. गौड़ देश का एक पंडित जिसे शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में परास्त किया था । ४. ऊपर को ओर उठना । उगना (को०) । ५. फल । परिणाम (को०) । ६. समाप/?/। परिणति (को०) ।

उदयनक्षत्र
संज्ञा पुं० [सं०] जिस नक्षत्र पर कोई ग्रह दिखाई पड़े वह नक्षत्र उस ग्रह का उदयनक्षत्र कहलाता है ।

उदयना पु
क्रि० अ० [सं० उदय] उदय होना । उ०— (क) जोबन भानु नहीं उनपो ससि सैसव हूँ को प्रकाश न ऊनो । ज्यौं हरदी महँ की पियराई जुन्हाई को तेज भयो मिलि चूनो । — देव (शब्द०) । (ख) सहौं बालबय में तबहिं उदए भाग अपाप । —पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २८५ ।

उदयपर्वत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदयगिरि' [को०] ।

उदयपुर
संज्ञा पुं० [सं०] मेवाड़ की पुरानी राजधानी का नाम ।

उदयशैल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदयगिरि' [को०] ।

उदयाचल
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार पूर्व दिशा का एक पर्वत जहाँ से सूर्य निकलता है ।

उदयातिथि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह तिथि जिसमें सूर्योदय हो । विशेष— शास्त्र में स्नान, दान और अध्ययन आदि कर्म इसी तिथि में करना लिखा है ।

उदयाद्रि पु
संज्ञा पुं० [सं०] उदयाचल । उदयगिरि ।

उदयान पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्यान] दे० 'उदयान' । उ०—(क) गिरह उदयान एक सम लेखूँ ।—कबीर श०, पृ० ७२ । (ख) जस गृह जस उदयाना । वै सदा अहैं निरबाना ।— जग० बानी, पृ० ५२ ।

उदयास्त
संज्ञा पुं० [सं०] उत्कर्ष और अपकर् ष । उत्थान और पतन । वृद्धि और ह्रास [को०] ।

उदयी
वि० [सं० उदयिन्] उदयोन्मुख । विकासशील ।

उदरंभर
वि० [सं० उदरम्भर] दे० 'उदरंभरि' ।

उदरंभरि
वि० [सं० उदरम्भरि] अपना पेट भरनेवाला । पेटू । पेटार्थी ।

उदरंभरी
संज्ञा स्त्री० [सं० उदरम्भरि + हिं० ई (प्रत्य०)] पेटार्थीपन । पेटूपन ।

उदर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पेट । जठर । मुहा०— उदर जिलाना = पेट पालना । पेट भरना । खाना । उ०— माँगत बार बार शेष ग्वालन को पाऊँ । आप लियो कछु जानि भक्ष करि उदर जियाऊँ । —सूर (शब्द०) । उदर भरना = पेट भरना । खाना । उ०— भिक्षावृति उदर नित भरै, निसिदिन हरि हरि सुमिरन करै । —सूर (शब्द०) । यौ० —जलोदर । बृकोदर । २. किसी वस्तु के बीच का भाग । मध्य । पेटा । जैसे, यवोदर ।३. भीतर का भाग । अंतर । जैसे— पृथ्वी के उदय में अग्नि है । ४. विभिन्न विकारों के कारण पेट का फूलना (को०) ।

उदरक
वि० [सं०] उदर से संबद्ध । पे संबंधी [को०] ।

उदरकृमि
संज्ञा पुं० [सं०] १. पेट में होनेवाला कीड़ा । ८. क्षुद्र या निम्न व्यक्ति [को०] ।

उदरगुल्म
संज्ञा पुं० [सं०] प्लीहा रोग का एक प्रकार [को०] ।

उदरग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० उदरग्रन्थि] दे० 'उदरगुल्म' [को०] ।

उदरज्वाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जठराग्नि । २. भूख ।

उदरत्राण
संज्ञा पुं० [सं०] पेट अथवा शरीर के सामने के हिस्से की रक्षा के निमित्त बाँधा जानेवाला कवच [को०] ।

उदरथि
संज्ञा पुं० [सं० उदरथिन] १. सागर । सिंधु । ८. सूर्य [को०] ।

उदरदास
संज्ञा पुं० [सं०] जन्म से दास या दास का पुत्र हो । विशेष— ऐसे मनुष्य को छोड़ दूसरे किसी मनुष्य को बेचना अपराध माना जाता था ।

उदरना पु †
क्रि० अ० [सं० अवदारण, हिं० उदारना] १. फटना । विदीर्ण होना । उ०—अमित अविद्या राक्षसी प्रेत सहित पाखंड । रामनिरंजन रटत मुख उदरि गई सत खंड । —केशव (शब्द०) । ७. छिन्न भिन्न होना । ढहना । नष्ट होना । जैसे— पानी से उसका कोठिला उदर गया । ३. गिरना । उखाड़ना । उ०—देखत ऊँचाई उदरत पाग सूधी राह द्योस हू मैं चढ़ै ते जे साहसनिकेत है, —भूषण ग्रं०, पृ० ७८ ।

उदरपिशाच
संज्ञा पुं० [सं०] बहुत खानेवाला आदमी । पेटू ।

उदररेख पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उदररेखा] दे० 'उदररेखा' ।

उदररेखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह लकीर जो बैठने से पेट में पड़ जाती है । त्रिबली ।

उदरवृद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक रोग जिसमें पेट बढ़ आता है और उसमें पानी भर जाता है । जलोदर । जलंधर ।

उदरशय
वि० [सं०] पेट के बल सोनेवाला । पट सोनेवाला [को०] ।

उदरसर्पी
वि० [सं० उदरसर्पिन] पेट के बल सरकनेवाला [को०] ।

उदरसर्वस्व
वि० [सं०] पेट को ही सब कुछ माननेवाला । भोजन के लिये ही जीनेवाला । बहुत खानेवाला [को०] ।

उदरस्थ (१)
वि० [सं०] खाया हुआ । भक्षित [को०] ।

उदरस्थ (२)
संज्ञा पुं० जठराग्नि [को०] ।

उदराग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] जठरानल । भोजन को पचानेवाली पेट के भीतर स्थित अग्नि [को०] ।

उदराट
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदरकृमि' [को०] ।

उदराध्मान
संज्ञा [सं०] अपव का रोग । अजीर्ण । पेट का फूल जाना [को०] ।

उदरामय
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उदरामयी] पेट का रोग । उदररोग

उदरावरण
संज्ञा पुं० [सं०] पेट को घेरनेवाली झिल्ली [को०] ।

उदरावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] नाभि । ढोंढ़ी ।

उदरावेष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] कब्ज । अपच [को०] ।

उदरिक
वि० [सं०] तोंदवाला । तुंदिल । बड़े पेटवाला [को०] ।

उदरिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गर्भिणी नारी । अंतर्वत्नी [को०] ।

उदरिल
वि० [सं०] दे० 'उदरिक' [को०] ।

उदरी
वि० [सं० उदरिन्] [वि० स्त्री० उदरिणी] दे० 'उदरिक' [को०] ।

उर्दक
संज्ञा पुं० [सं०] १. धतूरा । मदन वृक्ष । २. गुंबद । मीनार । ३. भविष्यत् काल । ४. भावी फल । अभिवृद्धि । वर्धन । बढ़ना । अंत या समाप्ति [को०] ।

उदर्चि (१)
संज्ञा पुं० [सं० उदर्चिस्] १. शिव । २. अग्नि । ३. कामदेव [को०] ।

उदर्चि (२)
वि० ऊपर की ओर ज्वाला या प्रकाश फेंकनेवाला । जिसकी किरणें ऊपर की ओर जाती हों [को०] ।

उदर्द
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रोग जो शिशिर ऋतु में होता है । ददोरा । जुड़पित्ती । विशेष— इसमें शरीर पर ददोरे निकलते हैं । ये ददोरे बीच में गहरे और किनारों पर ऊँचे होते हैं । इनका रंग लाल होता है और इनमें खुजली होती है । वैद्यक के अनुसार यह रोग कफ की अधिकता से होता है ।

उदर्ध
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का ज्वर [को०] ।

उदर्य
वि० [सं०] १. उदर संबंधी । २. उदर के भीतर का [को०] ।

उदवना पु
क्रि० अ० [सं० उदयन] उगना । निकलना । प्रकट होना । उ०—दमयंती भहराइ, उठी देखि आयो नृपति । उदवत शशि नियराइ सिंधु प्रतीची बीच ज्यों । —गुमान (शब्द०) ।

उदवसित
संज्ञा पुं० [सं०] घर । भवन [को०] ।

उदवाह पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्वाह] दे० 'उद्वाह' ।

उदवेग पु †
संज्ञा पुं० [सं० उद्वेग] दे० 'उद्वेग' ।

उदश्रु
संज्ञा पुं० [सं०] रोता हुआ या रोनेवाला । [को०] ।

उदसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. निरसन । खंडन । २. फेंकना । निकाल देना । ३. उठाना [को०] ।

उदसना पु
क्रि० अ० [सं० उदसन (= नष्ट करना) या उद् + ध्वंसन अथवा उद्वासन] १. उजड़ना । उ०— तिन इन देसन आनि उजार्यो । उदसि देश यह भो बन भार्यो । —पद्माकर (शब्द०) । २. बेतरतीब होना । अंड बंड होना । उड़सना ।

उदस्त
वि० [सं०] १. उदसन किया हुआ । २. उजाड़ा हुआ । ३. फेंका हुआ । ४. अपमानित । ५. उठा हुआ [को०] ।

उदात्त (१)
वि० [सं०] १. उँचे स्वर से उच्चारण किया हुआ । २. दयावान् । कृपालु । ३. दाता । उदार । ४. श्रेष्ठ । बड़ा । ५. स्पष्ट । विशद । ६. समर्थ । योग्य । ७. प्रिय । प्यारा (को०) । ८. ऊँचा । उच्च (को०) ।

उदात्त (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेद के स्वरों के उच्चारण का एक भेद जो तालु आदि के ऊपरी भाग की सहायता से होता है । २. उदात्त स्वर । ३. एक काव्यालंकार जिसमें संभाव्य विभूति का वर्णन खूब बढ़ा चढ़ाकर किया जाता है । जैसे— कुंदन की भूमि कोट काँगरे सुकंचन दिवार द्वार विद्रुम अशेष के । लसत पिरोजा के किवार खंभ मानिक के हीरामय छात छाजै पन्ना छवि वेश के । जटिल जवाहिर झरोखा पै सिम्याने तास तास आसपास मोती उडुगन भेष के । उन्नत सुमंदिर से सुंदर परंदर के मंदिर तै सुंदर ये मंदिर बृजेश के । (शब्द०) । ४. दान । ५. एक आभूषण । ६. एक प्रकार का बाजा । बड़ा ढोल । नायक का एक भेद । दे० 'धीरोदात्त' (को०) ।

उदात्तराघव
संज्ञा पुं० [सं०] संस्कृत का एक नाटक ।

उदात्तश्रुति
वि० [सं०] जो उदात्त स्वर में उच्चरित या कहा हुआ हो (वर्ण) [को०] ।

उदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राणवायु का एक भेद जिसका स्थान कंठ है । इसकी गति हृदय से कंठ और तालु तक और सिर से भ्रूमध्य तक है । इससे डकार और छींक आती है । २. श्वास । साँस (को०) । ३. पक्ष्म । बरौनी (को०) । ४. नाभि (को०) । ५. प्रशंसा या आनंद की व्यंजना (बौद्ध) (को०) । ६. एक प्रकार का सर्प (को०) ।

उदाम पु
वि० [सं० उद्दाम] दे० 'उद्दाम' ।

उदायन पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्यान] बाग । वाटिका । उपवन । उ०— तुम श्याम गौर सुनो दोउ लालन आयो कहाँ से उदायन में । — रघुराज (शब्द०) ।

उदार (१)
वि० [सं०] [संज्ञा उदारता] १. दाता । दानशील । २. महान् । बड़ा । श्रेष्ठ । ३. जो संकीर्णचित न हो । उँचे दिल का । ४. सरल । सीधा । शीलवान् । शिष्ट । ५. दक्षिण । अनुकूल । ६. सुंदर । उत्कृष्ट । उम्दा (को०) । ७. प्रभूत । प्रचूर (को०) । ८. उचित । ठीक (को०) । धैर्यशील । धीर (को०) । १०. विस्तृत । बड़ा । विशाल (को०) । ११. ईमानदार (को०) ।

उदार (२)
संज्ञा पुं० [देश०] गुलू नाम का वृक्ष । (अवध) ।

उदार (३)
संज्ञा पुं० [सं०] योग में अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश इन चारों क्लेशों का एक भेद या अवस्था जिसमें कोई क्लेश अपने पूर्ण रूप में वर्तमान रहता हुआ अपने विषय का ग्रहण करता रहता है ।

उदारचरित
वि० [सं०] जिसका चरित उदार हो । ऊँचे दिल का । शीलवान् ।

उदारचेता
वि० [सं० उदारचेतस्] जिसका चित उदार हो ।

उदारता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दानशीलता । फैयाजी । २. उच्च विचार । शील ।

उदारथि (१)
वि० [सं०] १. ऊपर की ओर जाने या उठनेवाला । २. ज्ञानेंद्रियों की चेतना को जागरित करनेवाला । ३. उफनाता हुआ । भाप देता हुआ [को०] ।

उदारथि (२)
संज्ञा पुं० विष्णु [को०] ।

उदारदर्शन
वि० [सं०] जिसे देखने से आँखों को शीतलता और हृदय को शांति मिले । देखने मात्र से तृप्ति प्रदान करनेवाला [को०] ।

उदारधी (१)
वि० [सं०] बुद्धिमान् । प्रशस्त बुद्धिवाला । प्रतिभाशाली [को०] ।

उदारधी (२)
संज्ञा पुं० विष्णु [को०] ।

उदारधी (३)
संज्ञा स्त्री० उत्तम गुण । उत्कृष्ट बुद्धि [को०] ।

उदारना
क्रि० स० [सं० उद्दारण] १. फाड़ना । विदीर्ण करना । उ०—भनैं रघुराज तैसे अतिथि से आदर को, आसु ही अनादर उदारयो करि पीर को । ।—रघुराज (शब्द०) । २. गिराना । तोड़ना । ढाना । छिन्न भिन्न करना । उ०—रावण से गहि कोटिक मारों । कहहु तो जननि जानकी ल्याऊँ कहो तो लंक उदारों । कहों तो अबहीं पैठि सुभट हति अनल सकल पुर जारों ।—सूर (शब्द०) ।

उदाराशय
वि० [सं०] उदार आशय का । जिसका उददेश्य उच्च हो । जिसके विचार संकुचित न हों ।

उदावत्सर
संज्ञा पुं० [सं०] बर्षविशेष । कालविशेष का निर्माण करने वाले पाँच वर्षों में से एक [को०] ।

उदावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] गुदा का एक रोग जिसमें काँच निकल आती है ओर मलमृत्र रुक जाता है । दुदाग्रह । काँच । विशेष—वैद्यक शास्त्र के अनुसार यह रोग वायु के बिगड़ने से होता है । यह वायु अधोवायु, मल, मूत्र, जँभाई, आँसू (रोवाई), छींक, डकार, वमन, काम, भूख, प्यास, नींद के वेगों को रोकने से तथा श्वासरोग से कुपित हो जाती है ।

उदावर्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्त्रियों का एक रोग जिसमें रजोधर्म रुक जाता है और ऋतुकाल में पीड़ा के साथ योनि से फेनयुक्त रुधिर या रज निकलता है ।

उदावसु
संज्ञा पुं० [सं०] विदेहराज जनक के एक पुत्र का नाम [को०] ।

उदास (१)
वि० [सं० उत्+आस] १. जिसका चित्त किसी पदार्थ से हट गया हो । विरक्त । उ०—(क) घरहीं महँ रहु भई उदासा । अंचल खप्पर शृंगी खासा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) तेहि के बचन मानि विश्वासा । तुम्ह चहहु पति सहज उदासा । मानस, १ ।७९ । (ग) नि?किंचन जन मैं मम वास । नारि संग तैं रहौं उदास ।—सूर, १० ।४१९५ । २. झगड़े से अलग । निरपेक्ष । तटस्थ । जो किसी के लेन देन में न हो । उ०—(क) एक भरत कर संमत कहहीं ।एक उदास बाय सुनि रहहीं ।—मानस, २ ।४८ । ३. खिन्नचित । दु?खी । रंजीदा । उ०— (क) साधू, भँवरा जग कली, निसि दिन फिरै उदास । टुक इक तहाँ बिलंबिया जहुँ शीतल शब्द निवास ।—कबीर (शब्द०) । (ख) हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केश जरै ज्यों घास । यह सब जलता देखि के भया कबीर उदास ।—कबीर (शब्द०) । रामचंद्र अवतार कहत हैं सुनि नारद मुनि पास । प्रकट भयो निश्चर मारन को सुनि वह भयो उदास ।—सूर (शब्द०) ।

उदास पु (२)
संज्ञा पुं० १. दु?ख । खेद । रंज । उ०—कहहिं कबीर दासन के दास । काहुहि सुख दे काहुहि उदास । —कबीर (शब्द०) ।

उदास (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऊपर उठना । उठना । २. तटस्थता । विरक्ति । संन्यास [को०] ।

उदासना
क्रि० अ० [सं० उदास से नामिक धातु] खिन्न या विरक्त होना । दु?खयुक्त होना ।

उदासना पु
क्रि० स० [सं० उदासन] १. उजाड़ना । नष्ट करना । उ०—केशव अफल अकाश वायु विल देश उदासै ।—केशव (शब्द०) । २. (बिस्तर) समेटना या बटोरना । (फैला- हुआ बिस्तर) लपेटना ।

उदासिता
वि० [सं० उदासितृ] उदासीन । तटस्थ । निरपेक्ष [को०] ।

उदासिल पु
वि० [सं० उदास+हिं० इल (प्रत्य०)] उदासीन । उदास । उ०—देवता तुमको चहैं निज प्राण सो सरसाइ कै । आप हौ उनते उदासिल कौन सो गुण पाइ कै ।—गुमान (शब्द०) ।

उदासी (१)
वि० [सं० उदासिन्] तटस्थ । अलग । निरपेक्ष [को०] ।

उदासी (२)
संज्ञा पुं० [सं० उदास+हिं० ई (प्रत्य०)] [स्त्री० उदासिन] १. विरक्त पुरुष । त्यागी पुरुष । संन्यासी । उ०—(क) होय गृही पुनि होय उदासी । अंतकाल दोनों विश्वासी ।—जायसी (शब्द०) । (ख) ओहि पथ जाइ जो होय उदासी । जोगी जती तपा संन्यसी ।—जायसी ग्रं०, पृ० ५० । (ग) प्रमुदित तीरथराज निवासी । बैषानस, बटु गृही उदासी ।—मानस, २ ।२०५ ।२ नानकशाही साधुओं का एक भेद । दे साधु शिखा नहीं रखते । ये संन्यासियों के समान सिर घुमाते और लँगोट पहनते हैं ।

उदासी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० उदास+हिं० ई (प्रत्य०)] १. खिन्नता । उत्साह या आनंद का अभाव । दुख जैसे—(क) नादिरशाह के आक्रमण के बाद दिल्ली में चारों ओर उदासी बरसती थी । (ख) राम के वनवास से अयोध्या में उदासी छा गई । उ०— बिनु दशरथ सब चले तुरत ही कोशल पुर के वासी । आए रामचंद्र मुख देख्यो सबकी मिटी उदासी ।— सूर (शब्द०) । क्रि० प्र०—छाना । टपकना । बरसना ।—होना ।

उदासीन (१)
वि० [सं०] [वि० क्त्री० उदासीना; संज्ञा उदासीनता] १. विरक्त । जिसका चित्त हट गया हो । प्रपंचशून्य । २. झगडे़ बखेड़े से अलग । जो किसी के लेने देने में न हो । ३. जो दो विरोधी पक्षों में से किसी की ओर न हो । निष्पक्ष । तटस्थ । ४. रूखा । उपेक्षायुक्त । जैसे, —हम उनसे मिलने गए पर उन्होंने बड़ा उदासीन भाव धारण किया ।

उदासीन (२)
संज्ञा पुं० १. बारह प्रकार के राजाओं में वह राजा जो दो राजाओं के बीच युद्ध होते समय किसी की ओर न हो, किनारे रहे । २. वह पुरुष जिसे किसी अभियोग या मामले में दो पक्षों में से किसी के संबंध में न हो । ३. पंच । तीसरा । ४. कौटिल्य के अनुसार दूरवर्ती राष्ट्र का वह राजा जो शक्तिशाली तथा निग्रह अनुग्रह में समर्थ हो ।५. अजनबी (को०) ।

उदासीनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विरक्ति । त्याग । निरपेक्षता । निर्द्वद्वता । ३. उदासी । खिन्नता ।

उदासीन मित्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह मित्र राजा जिसके संबंध में यह निश्चय न हो कि वह सहायता में कुछ करने का कष्ट उठाएगा । विशेष—कौटिल्य के अनुसार जिस राजा के पास बहुत अधिक उपजाऊ जमीन होगी, जो बलवान संतुष्ट तथा आलसी होगा और कष्ट से दूर भागनेवाला होगा, उसे सहायता के लिये कुछ करने की कम परवा होगी ।

उदासीबाजा
संज्ञा पुं० [हिं० उदासी+फा० बाजा] एक प्रकार का भोंग या फूँककर बाजाया जानेवाला बाजा ।

उदास्थित (१)
वि० [सं०] नियुक्ति । काम पर लगाया हुआ [को०] ।

उदास्थित (२)
संज्ञा पुं० १. द्वारपाल ।२. चर ।३. अधीक्षक । निरि- क्षक ।४. संन्यास आश्रम का त्यागकर गुप्तचर का काम करनेवाला व्यक्ति [को०] ।

उदाहट
संज्ञा पुं० [हिं० ऊदा+हट (प्रत्य०)] ललाई मिला हुआ नीलापन । ऊदापन ।

उदाहरण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उदाहरणीय, उदाहार्य, उदाहृत] १. दृष्टांत । मिसाल । न्याय में वाक्य के पाँच अवयवों में से तीसरा जिसक साथ साध्य का साधर्म्य या वैधर्म्य होता है । विशेष—उदाहरण दो प्रकार का होता है, एक 'अन्वयी' और दूसरा 'व्यतिरेकी' । जिससे साध्य के साथ साधर्म्य होता है वह अन्वयी है; जैसे—शब्द अनित्य है, उत्पत्ति धर्मवाला होने से घट की तरह । यहाँ घट अन्वयी उदाहरण है । व्यतिरेकी वह है जिसका साध्य के साथ वैधर्म्य हो; जैसे—शब्द अनित्य है उत्पत्ति धर्मवाला होने से । जो उत्पत्ति धर्मवाला नहीं होता, वह नित्य होता है, जैसे, आकाश, आत्मा आदि । ३. आरंभ (को०) । ४. एक प्रकार का अर्थालंकार जिसमें प्रस्तुतार्थ के समर्थन के लिये उसी की समता के अप्रस्तुत को उदाहरणस्वरूप उपस्थित कर देते हैं (को०) ।

उदाहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. उदाहरण । दृष्टांत । २. वक्तव्य का आरंभ [को०] ।

उदाहित
वि० [सं०] ऊपर उठाया हुआ [को०] ।

उदाहृत
वि० [सं०] १. कथित । उक्त । २. उदाहरणया दृष्टांत के रूप में प्रयुक्त [को०] ।

उदाहृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नाट्यशास्त्र के अनुसार किसी प्रकार का उत्कर्षयुक्त वचन कहना, जो गर्मसंधि के १३ अंगों में से एक है । जैसे—रत्नावली में विदूषक का यह कथन—(हर्ष से) आज मेरी बात सुनकर प्रिय मित्र को जैसा हर्ष होगा, वैसा तो कौशांबी का राज्य पाने से भी न हुआ होगा । अच्छा, अब चलकर यह शुभ संवाद सुनाऊ । २. उदाहरण । दृष्टांत [को०] ।

उदिआन पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्यान] दे० 'उद्यान' ।

उदिआना पु
क्रि० अ० [सं० उद्विग्न] उद्विग्न होना । घबड़ाना । हैरान होना । उ०—मर रे कौन कुमति तैं लीनी । परदारा निदिंया रस रचि, और रामभगति नहिं कीन्हीं ।..... ना हरि भज्यो न गुरुजन सेयो नहिं उपज्यो कछु ज्ञाना । घट ही माँहि निरंजन तेरे तैं खोजत उदिआना ।—तेगबहादुर (शब्द०) ।

उदित (१)
वि० [सं०] [स्त्री० उदिता] १. जो उदय हुआ हो । निकला हुआ । २. प्रकट । जाहिर । ३. उज्वल । स्वच्छ । ४. प्रफुल्लित । प्रसन्न । ५. कहा हुआ । कथित । ६. उच्च । ऊँचा (को०) । ७. उत्पन्न । पैदा हुआ (को०) । ८. तत्पर । संनद्ध । तैयार (को०) ।

उदित (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार की सुगंध ।२. एक प्रकार का उच्चारण [को०] ।

उदितयौवना
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुग्धा नायिका के सात भेदों में से एक जिसमें तीन हिस्सा यौवन और एक हिस्सा लड़कपन हो । उ०—तीन अंश जोबन जहाँ लरिकाई इक अंस । उदितयौवना सो तहाँ बरनत कवि अवतंस ।—रघुनाथ (शब्द०) ।

उदिताचल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदयाचल' ।

उदिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. (सूर्य का) चढ़ना या ऊपर उठना । २. सनिवेश । निवेशन । ३. अस्त होना । ४. वक्तव्य [को०] ।

उदिम पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्यम] दे० 'उद्दिम' । उ०—दादू उदिम ओगुण को नहीं, जे करि जाणौ कोइ । उदिम मैं आनंद है, जे साँई सेती होइ ।—दादू० बानी, पृ० ३३९ ।

उदियान पु
संज्ञा पुं० [सं० उदयान] दे० 'उद्यान' ।

उदियाना पु
क्रि० अ० [सं० उद्विग्न] घबड़ाना । उद्विग्न होना ।

उदीक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. देखना । तजबीजना ।२. ऊप की ओर देखना [को०] ।

उदीची
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० उदीचीन, उदीच्य, औदिच्य] उत्तर दिशा ।

उदीचीन
वि० [से० तुल० अवे० उदीचीन (=उत्तरी)] १. उत्तर दिशा का । उत्तर का ।२. उत्तर की ओर । उत्तरा- भिमुख [को०] ।

उदीच्य (१)
वि० [स०] १. उत्तर दिशा का रहनेवाला । २. उत्तर दिशा का । उत्तर की ओर का ।

उदीच्य (२)
संज्ञा पुं० १. एक देश जो सरस्वती के उत्तर पश्चिम ओर है । २. किसी यज्ञ आदि कर्म पीछे दान दक्षिणादि कृत्य । ३. एक सुगंधित पदार्थ (को०) । ४. ब्राह्मणों की एक शाखा ।

उदीच्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] बैताली छंद का एक भेद जिसके विषम अर्थात् पहले और तीसरे चरणों में दूसरी और तीसरी मात्राएँ मिलकर एक गुरु वर्ण हो जाएँ । जैसे—हरिहिं भज जाम आठहुँ । जंजालहि तजिकै करौ यही । तनै मनै दे लगा सबै पाइहौ परम धम ही सही ।

उदीतना पु
क्रि० स० [सं० उद्दीप्त, प्रा० उद्दित्त] प्रकाशित करना । उ०—दादू जी दयाल गुरु अंतर उदीत्यौ है ।—सुंदर ग्रं० भा० १, पृ० ९० ।

उदीप (१)
वि० [सं०] बाढ़ के जल से प्लावित [को०] ।

उदीप (२)
संज्ञा पुं० पानी की बाढ़ । जलप्लावन [को०] ।

उदीपन पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्दीपन] दे० 'उद्दीपन' ।

उदीपित पु
वि० [सं० उद्दीपित] दे० 'उद्दीपित', 'उद्दीप्त' ।

उदीयमान
वि० [सं०] १. उगता हुप्रा । २. विकासोन्मुख । होनहार [को०] ।

उदीरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कथन । उच्चारण । २. बोलना । कहना । ३. फेकना । क्षेपण (अस्त्र का) [को०] ।

उदीरित
वि० [सं०] १. कथित । कहा हुआ । २. संक्षुब्ध । प्रथमित । उत्तेजित । ३. विकसित । प्रफुल्लित । ४. अभिवृद्धि । समुन्नत [को०] । यौ०—उदीरितधी=कुशाग्रबुद्धि । तीक्ष्णबुद्धि ।

उदीर्ण
वि० [सं०] १. कथित । २. विकसित । ३. पैदा किया हुआ । ४. आविष्ट । उत्तेजित । ५. उदार । उत्तम ।६. प्रस्तुत । तत्पर (अस्त्रसंधानार्थ) । ७ । महान् । श्रेष्ठ । ८. अभिमानी । गर्विष्ठ [को०] ।

उदुंबर
संज्ञा पुं० [सं० उदुम्बर] [वि० औदुंबर] १. गूद्दर । २. देहली । डयौढ़ी । नपुंसक । ४. एक प्रकार का कोढ़ । ५. ताबा । ६. अत्ती रस्सी की एक तौल । पर्था०—उडुंबर । उदुंबल ।

उदुंबरपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं० उदुम्बरपर्णी] दंती । दाँती । एक वृक्ष ।

उदुंबल
वि० [सं० उदुम्बल] शाक्तिशाली । ताकतवर [को०] ।

उदुआ †
संज्ञा पुं० [सं० ऋतु, प्रा० उतु=एक प्रकार का भोजन] एक प्रकार का मोटा जड़हन ।

उदुष्ट
वि० [सं०] लाल [को०] ।

उदूखल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उलूखल' ।

उदूढ
वि० [सं०] १. विवाहित । २. प्राप्त । स्वायत्त । ३. लंबा । ऊँचा । ४. भारी । वजनी । ५. स्थूल । पीन । ६. सारवान् । सारयुक्त । ७. बहुत अधिक ।

उदूल
संज्ञा पुं० [अ०] अवज्ञा । नाफर्मानी । अवहेलना [को०] ।

उदूलहुक्मी
संज्ञा स्त्री० [अ० उदूल+हुक्म+फा० ई (प्रत्य०)] आज्ञा न मानना । आज्ञा का उल्लंघन ।

उदेग पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्वेग] उद्वेग । उचाट । उ०—देश काल बल ज्ञान लोभ करि हीन हे । स्वामि काम मैं लीन सुसील कुलीन है । बहु वीधि बरने बानि हिये नहि भै रहै । पर उर करै उदेग दूत तासौं लहै ।—सूदन (शब्द०) ।

उदेजय
वि० [सं०] १. कंपित करनेवाला कँमानेवाला । २. भयंकर । डरावना । [को०] ।

उदेल
संज्ञा पुं० [अ० ऊद] लाबान ।

उदेस पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० उद्देश] खोज । अनुसंधान । उ०—प्रिय कै उदेश न पायो कैसे क जिय ठहराय ।—गुलाल० बानी पृ० ८२ ।

उदेश (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० विदेश, प्रा० विएस, विदेस पु बिदेस अथवा सं० उत्=उद्रत+देश] अन्य देश । परदेश । उ०—कमर बाँधि खोजन चले, पलटू फिर उदेस । षट दरसन सब पचि मुए, कोऊ न कहा संदेस ।—पलटू० बानी, भा० ३, पृ० ११५ ।

उदै पु
संज्ञा पुं० [सं० उदय] दे० 'उदय' । उ०—पूरन ससि प्राची उदै बिहरनि रुचि कीनी ।—घनानंद, पृ० ४५५ ।

उदैही पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्देहिका] दीमक । उ०—बाँकी फिर अंगह बली, अंग उदैही जाम ।—पृ० रा० १ । ११० ।

उदो पु
संज्ञा पुं० [सं० उदय] दे० 'उदय' ।

उदोत (१)पु, उदोति पु
संज्ञा पुं० [स० उद्योत] प्रकाश । दीप्ति । उ०—गंग नीर बिधु रुचि झलक मृदु मुसुरानि उदोति । कनक भौन के दप लौं जगमगाति तन जोति ।—मति० ग्रं०, पृ० ४२१ । २. अभिवृद्धि । बढ़ती । उन्नति । यौ०—उदोतकर । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

उदोत (२
पु वि० १. प्रकाशित । दीप्त । उ०—फबहुँ न मूर्ति बिलग दोउ होती । दिन दिन करती कला उदोती ।—रघुनाथ (शब्द०) । २. शुभ्र । उत्तम । उ०—एक ब्राह्मणी रत्रै एक धोती । वर्ष दिवस महँ अतिहिं उदोती ।—रघुनाथ (शब्द०) ।

उदोतकर पु
वि० [सं० उद्योतकर] १. प्रकाश करनेवाला । प्रकाशक । २. चमकानेवाला । उज्वल करनेवाला । उ०—प्रोषधि बर वंश उदोतकर सूर सूरता लोप रत । गोपाल (शब्द०) ।

उदोती पु
वि० [सं० उद्योत] [स्त्री० उदोतिनी] प्रकाश करनेवाला । उदय करनेवाला । विकासक । उ०—अट्टहास की रोरनि चिंतित मन की द्योतिनि, कलित किलकिला मिति त मोद उर भाव उदोतिनि ।—श्रोधर पाठक (शब्द) ।

उदौ पु
संज्ञा पुं० [स० उदय] दे० 'उदय' ।

उद्गागांध
वि० [सं० उद्गगन्ध] १. तीखी गंधवाला । २. सुगंध युक्त [को०] ।

उद्गगत
वि० [सं०] १. निकला हुआ । उद्भूभूत । उत्पन्न । २. प्रकट । जाहिर । ३. फैला हुआ । व्याप्त । ४. वमन किया हुआ । छर्दित । ५. प्राप्त । लब्ध । ६. गया हुआ । गमित (को०) ।

उद्गता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वृत का नाम [को०] ।

उद्गगतार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वह पदार्थ या धरोहर जिसका पड़े पड़े ही भोग आदि बढ़ने से दाम चढ़ गया हो ।

उद्गगतासु
वि० [सं०] निष्प्राण । मृत [को०] ।

उद्गगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ऊपर की ओर जाना । आरोह । २. वमन । छर्दि । ३. उदय । ४. उत्स । मूल [को०] ।

उद्गगम
संज्ञा पुं० [सं०] १. उदय । अविर्भाव । २. उत्पत्ति का स्थान । उदभवस्थान । निकास । मखरज । ३. वह स्थान जहाँ से कोई नदी निकलती हो । ४. वमन (को०) । ५. जाना । निकलना । जैसे, प्राणोद्गगम (को०) । ६. खड़ा होना । भर- भराना । जैसे, रोमोद्गगम (को०) । ७. अंकुर । अँखुआ (को०) । ८. जन्म । पैदाइश । उत्पत्ति (को०) । ९. अवलोकन । दृष्टि (को०) ।

उद्गगमन
संज्ञा पुं० [सं०] उगना । प्रकट होना [को०] ।

उद्गगमनीय
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वच्छ या धुले हुए वस्त्रों का जोड़ा । २. धुला वस्त्र [को०] ।

उद्गगाढ
वि० [सं०] १. गहरा ।२. अतिशय । अधिक ।३. प्रचंड [को०] ।

उद्गगाता
संज्ञा पुं० [सं० उद्गगातृ] यज्ञ में चार प्रधान ऋत्वजों में एक जो सामवेद के मंत्रों का गान करता है और सामवेद संबंधी कृत्य कराता है ।

उद्गागातृ
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उद्गागाता' ।उ०—एक उद्गागातृ चाहिए था जो सोम गाए ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ४२ ।

उद्गगाथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आर्या या गाथा छद का एक प्रकार [को०] ।

उद्गगार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्गारी, उद्गगारित] १. तरल पदार्थ के वेग से बाहर निकलने या ऊपर उठने की क्रिया । उबाल । उफान । २. मुँह से निकल पड़ने की क्रिया । वमन । ३. वेग से वाहर निकला हुआ तरल पद्रर्थ । ४. वमन की हुई वस्तु । कै । ५. थूक । कफ । ६. डकार । खट्टी डकार । ७. बाढ़ । अत्रधिक्य । ८. घोर शब्द । तुमुल शब्द । घरघराहट । ९. किसी के विरुद्ध बहुत दिनों से मन में रखी हुई बात को एकबारगी कहना । जैसे, उनकी बातें सुनकर न रह गया, मैने भी अइपने हृदय का उद्गगार खूब निकाला । यौ०—उद्गगारचूडक—एक पक्षी ।

उद्गगारकमणि
संज्ञा पुं० [सं०] विद्रुम । प्रवाल [को०] ।

उद्गगारी (१)
वि० [सं० उद्गगारिन्] [वि० स्त्री उद्गगारिणी] १. उगलने वाला । बाहर निकालनेवाला । २. प्रकट करनेवाला ।

उद्गगारी (२)
संज्ञा पुं० ज्योतिष में बृहस्पति के १२र्वे युग का दूसरा वर्ष । इसमें राजक्षय और असमान वृष्टि होती है । इसका दूसरा नाम रक्तोद्गगारी भी है ।

उद्गिगरण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्गगीर्ण] १. उगलना । बाहर निकलना । २. वमन । ३. डकार [को०] ।

उद्गगीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आर्या छंद का एक भेद जिसके विषम पदों में १२ और दूसरे में १५ तथा चौथे में १८ मात्राएँ होती हैं । इसके विषम चरणों में जगण नहीं होता । इसे विगाथा और विगाहा भी कहते हैं । जैसे—राम भजहु मनलाई तन मन धन के सहित मीता । रामहिं निसि दिन ध्यावौ, राम भजहिं तबहिं जग जीता । २. जोर से गाना गाना (को०) । ३. साम का गाम (को०) ।

उद्गगीथ
संज्ञा पुं० [सं०] सामवेद के गाने का एक भेद । सामवेद का द्वितीय खंड । एक प्रकार का सामगान । उ०—जिसमें शीतल पवन गा रहा पुलकित हो पावन उद्गगीथ ।—कामायनी, पृ० ३४ । २. ओंकार । ३. सामगान ।

उद्गगीरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाहर निकाल देना । २. उगलना । थूकना । ४. वमन करना (को०) ।

उदगीर्ण
वि० [सं०] १. उगला हुआ । मुँह निकला हुआ । २. निकला हुआ । बाहर किया हुआ । ३. वमन किया हुआ ।

उद्गगूर्ण
वि० [सं०] १. उठाया हुआ । २. उत्तेजित । क्षुब्ध [को०] ।

उद्गगेय
वि० [सं०] १. गाए जाने योग्य । २. गाया जानेवाला [को०] ।

उद्गगेही
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की चींटी । उदैही [को०] ।

उद्ग्रंथ (१)
वि० [सं० उद्ग्रन्ध] बिना बंधन का । बंधनमुक्त । ढीला [को०] ।

उद्ग्रंथ (२)
संज्ञा पुं० पुस्तक का एक अध्याय या विभाग [को०] ।

उद्ग्रंथि
वि० [सं० उद्ग्रन्धि] १. खुला हुआ । मुक्त । २. विरक्त । माया के बंधन से मुक्त [को०] ।

उद्ग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] १. कर के लिये एकत्र धन । २. प्रतिवाद । ३. ऊपर उठाना या ले लेना । ४. उन्नति की ओर बढ़ना । ऊँचे जाना । ५. प्रातिशाख्य में कथित एक प्रकार की स्वरसंधि । इसे 'उद्ग्राह पदवृत्ति' भी कहते हैं । [को०] ।

उद्ग्राहित
वि० [सं०] १. हटाया हुआ । लिया हुआ । २. उपन्यस्त । रखा हुआ । ३. बँधा हुआ । ४. स्मरण किया हुआ । स्मृत । ५. कथित । जिसका उल्लेख किया गया हो । ६. श्रेष्ठ [को०] ।

उद्ग्रोव
वि० [सं०] १. गर्दन उठाए हुए । उन्नतशिर । उ०—हींस रहे थे उधर अश्व अश्व उद्ग्रीव हो, मानों उसका उड़ा जा रहा जीव हो । साकेत, पृ० १२७ ।२. उत्कंठित । उ०—गौर से सुननेवाले जमाने को उद्ग्रीव छोड़कर यह महान कलाकार खुद ही सो गया ।—प्रेम० और गोर्की, पृ० १२५ ।

उद्ग्रीवी
वि० [सं० उद्ग्रीविन्] दे० 'उद्ग्रीव' ।

उद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्रेष्ठता । महत्ता । जैसे, ब्राह्मणोद्ध=श्रेष्ठ या उत्तम ब्राह्मण । २. प्रसन्नता । ३. रिक्त हस्त । ४. अग्नि । ५. आदर्श । नमूना । ६. प्राणवायु [को०] ।

उद्घटित
संज्ञा पुं० [सं०] इशारा । सकेत [को०] ।

उद्घट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] ताल के ६० मुख्य भेद में से एक ।

उद्घट्टन
संज्ञा पुं० [सं०] [संज्ञा स्त्री उद्घट्टना] १. मुक्त करना । खोलना ।२. फैलना । छिड़कना । ३. रगड़ । संघर्ष [को०] ।

उद्घट्टित
वि० [सं०] १. उन्मुक्त । खोला हुआ । २. पृथक् किया हुआ [को०] ।

उद्घन
संज्ञा पुं० [सं०] बढ़ई के काम करने की वह लकड़ी जिसपर रखकर वह लकड़ियों को गढ़ता है । ठीहा [को०] ।

उद्घर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. रगड़ । २. घोटने की क्रिया । ३. मारना । आहनन । ४. डंडा । सोंटा [को०] ।

उद्घस
संज्ञा पुं० [सं०] मांस [को०] ।

उद्घाट
संज्ञा पुं० [सं०] १. खोलने या दिखाने का कार्य (दाँत संबंधी) ।२. वह स्थीन जहाँ राज्य की ओर से माल को खोलकर जाँच हो । चौकी ।

उद्घाटक (१)
वि० [सं०] उद्घाटन करनेवाला [को०] ।

उद्घाटक (२)
संज्ञा पुं० १. ताली । कुंजी । २. कुएँ पर लगी हुई पानी खींचने की चरखी [को०] ।

उद्घाटन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्घाटक, उद्घाटनीय, उदधाटित, उद्घाट्य] १. खोलना । उघाड़ना । २. प्रकट करना । पकाशित करना । ३. किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा किसी कार्य का प्रारंभ ।

उद्घाटित
वि० [सं०] १. खोला हुआ । २. ऊपर उठाया हुआ । ३. शुरु किया हुआ ।

उद्घात
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्घाटक, उद्घातकी] १. ठोकर । धक्का । आघात । २. आरंभ । ३. हवाला । विवरण । उल्लेख (को०) । ४. शस्त्र । आयुध (को०) । ५. हिलना । डगमगाना (को०) । ६. गदा या परिध (को०) । ७. प्राणायाम (को०) । ८. ग्रंथ का विभाग । अध्याय (को०) ।

उद्घातक (१)
वि० [सं०] स्त्री० [उद्घातिका] १. धक्का मारनेवाला । ठोकर लगानेबाला । २. आरंभकर्ता [को०] ।

उद्घातक (२)
संज्ञा पुं० नाटक में प्रस्तावना का एक भेद । विशेष—इसमें सूत्रधार और नटी आदि की कोई बात सुनकर उसका अर्थ लगाता हुआ कोई पात्र प्रवेश करता है या नेपथ्य से कुछ कहता है । जैसे,—सूत्रधार—प्यारी, मैंने ज्योतिषशास्त्र के चौंसठों अंगों में बड़ा परिश्रम किया है । जो जो, रसोई तो होने दो । पर आज ग्रहण है, यह तो किसी ने तुम्हें धोखा ही दिया है क्योंकि 'चंद्रबिंब' पूर न भए क्रूर केतु हठ दीप । वल सों करिहै ग्रास कह— । (नेपथ्य में) हैं मेरे जीते चंद्र को कौन वल से ग्रास कर सकता ? सूत्र०—जेहि बुध रच्छत 'आप' । भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० १३८ । यहाँ सूत्रधार ने तो ग्रहण का विषय कहा था किंतु चाणक्य ने 'चंद्र' शब्द का अर्थ चंद्रगुप्त प्रकट करने प्रवेश करना चाहा, इसी से उद्घघातक प्रस्तालना हुई ।

उद्घाती
वि० [सं० उद्घातिन्] [स्त्री० उद्घातिनी] १. ठोकर मारनेवाला । धक्का पहुँचानेवाला ।२. ऊँचा नीचा । ऊबड़ खाबड़ ।

उद्घुष्ट (१)
वि० [सं०] घोषित । जिसकी घोषणा हो चुकी हो [को०] ।

उद्घुष्ट (२)
संज्ञा पुं० कोलाहल । शोरगुल [को०] ।

उद्घोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. घोषणा । ड़ौंडी पीटना ।२. चर्चा । प्रवाद ।३. निवाद । गर्जन [को०] ।

उद्दंड
वि० [सं० उद्दणड] [संज्ञा उद्दंडता] १. जिसे दंड इत्यादि का कुछ भी भय न हो । अक्खड़ । निडर । उजड्ड । प्रचंड । उद्धत ।२. जिसका डंडा ऊँचा हो ।

उद्दंडपाल
संज्ञा पुं० [सं० उद्दण्डपाल] १. दंडनायक । दंडाधिकारी । २. एक प्रकार की मछली ।३. एक तरह का साँप [को०] ।

उद्दंतुर
वि० [सं० उद्दन्तुर] १. बडे दाँतोंवाला ।२. ऊँचा । ३. डरावना [को०] ।

उद्दंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. मच्छड़ ।२. खटमल ।३. जूँ [को०] ।

उद्दत पु
वि० [सं० उद्यत] दे० 'उद्यत' ।

उद्दम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वशीकरण । वश में करना ।२. दमन करना । नीचा दिखाना [को०] ।

उद्दम (२)पु †
संज्ञा पुं० [सं० उद्यम] दे० 'उद्यम' ।

उद्दर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] स्पष्टीकरण । साफ करना । द्रष्टव्य बनाना [को०] ।

उद्दांत
वि० [सं० उद्दान्त] १. विनीत । नम्र ।२. उत्साहवान् [को०] ।

उद्दान
संज्ञा पुं० [सं०] १. बंधन । बाँधना । २. उद्यम । ३. बड़वानल । ४. चूल्हा । ५. लग्न । ६. मध्य । कमर [को०] ।

उद्दाम (१)
वि० [सं०] १. बंधनरहित । २. निरंकुश । उग्र । उद्दंड । बेकहा । ३. स्वतंत्र । ४. महान् । गंभीर । ५. गर्वयुक्त । अभिमानी (को०) । ६. भयदायक । भयंकर (को०) । ७. बड़ा । विशाल (को०) ।

उद्दाम (२)
संज्ञा पुं० १. वरुण । २. दंडक वृत्त का एक भेद जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और १३ रगण होते हैं । ३. यम (को०) ।

उद्दाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. उद्दालक ऋषि ।२. बहुवारक नाम का पौधा [को०] ।

उद्दालक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बनकोदव नाम का अन्न । २. एक ऋषि का नाम । ३. एक प्रकार का मधु (को०) । ४. जिसकी सावित्री पतित हो गई हो, अर्थत् १६ वर्ष की अवस्था हो जाने पर भी जिसको गायत्री दीक्षा न मिली हो, उसके लिये कर्तव्य एक व्रत । विशेष—इस व्रत में दो महीने जौ, एक महीना सिखरन (दही, दूध और चीनी का शरबत), आठ रात घी और छह रातबिना माँग मिले हुए पदार्थ पर निर्वाह करना चाहिए । इसके पीछे तीन रात केवल जल पीकर एक दिन रात उपवास करना चाहिए ।

उद्दित (१)पु
वि० [सं० उद्यत, उदित, उद्धद] दे० १. 'उद्यत' । २. दे० 'उदित' । ३. दे० 'उद्धत' ।

उद्दित (२)
वि० [सं०] बँधा हुआ । प्रतिबद्ध [को०] ।

उद्दिन
संज्ञा पुं० [सं०] दोपहर । मध्याह्न [को०] ।

उद्दिम पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्दम] दे० 'उद्दम' । उ०—मघवा है मेघनि को राजा, यह उद्दिम सब उनके काजा ।—नंद० ग्र०, पृ० १९० ।

उद्दिष्ट (१)
वि० [सं०] १. दिखाया हुआ । इंगित किया हुआ । २. लक्ष्य । अभिप्रेत । ३. बताया अथवा कहा हुआ (को०) । ४. ख्यात । प्रसिद्ध । मशहूर (को०) ।

उद्दिष्ट (२)
संज्ञा पुं० १. पिंगल में वह क्रिया जिससे यह बतलाया जाता है कि दिया हुआ छंद मात्राप्रस्तार का कौन सा भेद है । २. लाल चंदन । ३. किसी वस्तु का वह भोग जो मालिक से आज्ञा प्राप्त करके किया जाय ।

उद्दीप
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रज्वालन । जलाना । २. उत्तेजित या उद्दीप्त करना । ३. एक प्रकार की लसदार चीज (जैसे गोंद) । ४. गुग्गुल [को०] ।

उद्दीपक (१)
वि० [सं०] [स्त्री० उद्दीपिका] १. उद्दीपन करनेवाला । उत्तेजित करनेवाला । उभाड़नेवाला ।२. जलानेवाला [को०] ।

उद्दीपक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की चिड़िया [को०] ।

उद्दीपका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चींटी का एक भेद [को०] ।

उद्दीपन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्दीपनीय, उद्दीपक, उद्दीपित, उद्दीप्त, उदीष्य] १. उत्तेजित करने की क्रिया । उभाड़ना । बढ़ाना । जगाना ।२. उद्दीपन करनेवाली वस्तु । उत्तेजित करनेवाला पदार्थ ।३. काव्य में वे विभाव जो रस को उत्तेजित करते हैं जैसे शृंगार रस का का उद्दीपन करनेवाले सखा, सखी, दूती, ऋतु, पवन, वन, उपवन, चाँदनी आदि हैं । ४. ज्वलित करना जलाना । (को०) ।४.मृत व्यकित को जलाना । शवदाह (को०) ।

उद्दीपित
वि० [स०] १. उद्दीप्त किया हुआ ।२. जागरित किया हुआ [को०] ।

उद्दीप्त
वि० [सं०] १. जगाया हुआ ।२. उत्तेजित । चमकीला । दीप्त [को०] ।

उद्दीप्ति
संज्ञा । स्त्री० [सं०] १. जागरण ।२. उत्तेजन [को०] ।

उद्दीप्र (१)
वि० [सं०] चमकता हुआ । उद्दीप्त [को०] ।

उद्दीप्र (२)
संज्ञा पुं० गुग्गुल [को०] ।

उद्देश
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्दिष्ट, उद्देश्य उद्देशित] १. अभि- लाषा । चाह । इष्ट । मंशा । मतलब । अभिप्राय ।२. हेतु । कारण ।३. अनुसंधान ।४. न्याय में प्रतिज्ञा ।५. स्पष्टीकरण [को०] । ६. निश्चयन । निर्धारण (को०) ।७. उच्च स्थान । ऊँचा पद (को०) ।८. स्थान । जगह (को०) ।

उद्देशक (१)
वि० [सं०] उदाहरणस्वरूप [को०] ।

उद्देशक (२)
संज्ञा पुं० १. दृष्टांत । उदाहरण ।२. निर्देशक व्यक्ति । ३. प्रश्न (गणित) ।

उद्देशन
संज्ञा पुं० [सं०] दिखलाने या बताने की क्रिया [को०] ।

उद्देश्य (१)
वि० [सं०] १. लक्ष्य इष्ट ।२. स्पष्ट करने योग्य (को०) ।

उद्देश्य (२)
संज्ञा पुं० १. लक्ष्य वस्तु जिसपर ध्यान रखकर कोई बात कही या की जाय । अभिप्रेत अर्थ । इष्ट । जैसे,—किस उद्देश्य से तुम यह कार्य कर रहे हो । २. वह जिसके विषय में कुछ विधान किया जाय । वह जिसके संबंध मे कुछ कहा जाय । विशेष्य । विधेय का उल्टा । जैसे,— वह पुरुष बड़ा 'वीर है' इस वाक्य में 'वह पुरुष' या 'पुरुष' उद्देश्य है और 'वीर है' या 'वीर' विधेय है । यौ०—उद्देश्य—विधेय—भाव=उद्देश्य और विधेय का संबंध । विशे- शण विशेष का भाव ।

उद्देष्टा
वि० [सं० उद्देष्ट्ट] १. संकेत करनेवाला ।२. किसी लक्ष्य के अनुसार काम प्रवृत्त होनेवाला [को०] ।

उद्देस पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्देश] दे० 'उद्देश्य' । उ०—कवन सु फल काके उद्देस । कवन देवता सेस सुरेस ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०५ ।

उद्देहिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीमक [को०] ।

उद्दोत (१)पु
वि० [सं० उद्योत] प्रकाश । उ०—बन ते घर आवै नहीं घर ते बन नहीं जाइ, सुंदर रवि उद्दोत तै तिमिर कहा ठहराइ ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ८११ ।

उद्दोत (२)
वि० १. प्रकाशित । चमकीला । २. उदित । उत्पन्न । उ०— काहू को न भयो कहूँ ऐसो सगुन न होत, पुर पैठत श्रीराम के भयो मित्र उद्दोत ।—केशव (शब्द०) ।

उद्दोतिताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं उद्योतित+हिं० आई (प्रत्य०)] चमकीलापन । प्रकाश ।

उद्दोत (१)
वि० [सं० उद्द्योत] प्रकाशित । ज्योतियुक्त । कांतियुक्य [को०] ।

उद्दोत (२)
संज्ञा पुं० १. प्रकाश । उजाला । उ०—ज्ञान उद्योत करि हृदय गरु वचन धरि जोग संग्राम के खेत आवै ।—गुलाल०, बानी पृ० १०९ । २. चमक । झलक । आभा । ३. प्रकाशन । व्यक्तीकरण । आविष्करण (को०) । ४. ग्रंथ का विभाग । अध्याय या परिच्छेद (को०) । ५. महाभाष्य, काव्यप्रदीप और रत्ना- वली की टीका का नाम (को०) ।

उद्दोतन
संज्ञा पुं० [सं० उद्दयोतन] [वि० उद्योतक, उद्योतनीय, उद्योतित] १. प्रकाशित करने या होने की क्रिया । चमकने या चमकाने का कार्य । २. प्रकट करने की क्रिया । व्यक्त करने का कार्य ।

उद्दोतित
वि० [सं उद्दयोतित] प्रकाशित । प्रज्वलित । द्योतित । [को०] ।

उद्द्राव (१)
वि० [सं०] दौड़ता या भागता हुआ [को०] ।

उद्द्राव (२)
वि० पुं० अपसरण । पलायन [को०] ।

उद्द्रुत
वि० [सं०] पलायनशील । भागनेवाला [को०] ।

उद्ध पु
क्रि० वि० [सं० ऊर्ध्व, पा० प्रा, उद्ध=ऊँचा] ऊपर । उ०— मिली परस्पर डीठ बीर पग्गिय रिस लग्गिय । जग्गिय जुद्ध विरुद्ध उद्ध पलचर खग खग्गिय ।—सूदन (शब्द) ।

उद्धत (१)
वि० [सं०] [संज्ञा औद्धत्य] १. उग्र । प्रचंड । अक्खड़ ।अविनीत । जैसे,—वह उद्धत स्वभाव का मनुष्य है । २. प्रगल्भ । जैसे, वह अपने विषय का उद्धत विद्धान् है । ३. अभिमानी । गरबीला (को०) । ४. क्षुब्ध । उत्तेजित (को०) । ५. अत्यधिक । अतिशय (को०) । ६. ऊपर उठा हुआ (को०) । ७. राजसी । राजकीय (को०) ।

उद्धत (२)
संज्ञा पुं० १. ४० मात्राऔं का एक छंद जिसमें प्रत्येक दसवीं मात्रा पर विराम होता है और अंत में लघु होते हैं । जैसे,—विभुपूरन रघुबर, सुंदर हरि नरवर, बिभु परम धुरंधर, राम जू सुख सार । मम आशय पूरन, बहु दानव मारन, दीनन जन तारन, कृष्ण जू हर भार ।२. राजा का पहलवाला । राजमहल ।

उद्धतपन
संज्ञा पुं० [सं० उद्धत+हिं० पन (प्रत्य०)] 'उजड्डपन । उग्रता ।

उद्धतमनस्क
वि० [सं०] दे० उद्धतमना' ।

उद्धतमना
वि० [सं० उद्धतमनस्] गर्विष्ठ । अभिमानी [को०] ।

उद्धति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अक्खड़पन । उजड्डपन । २. अभिमान । गर्व । ३. उत्थान । उठान । ४. आघात । चोट मारना [को०] ।

उद्धना पु
क्रि० अ० [सं० उद्धरण] ऊपर उठना । उड़ना । छितराना । बिखरना । उ०—जरै बाँस औ काँस, उद्धै फुलंगा । नचै भूमि को पूत कै कोटि अंगा ।—सूदन (शब्द०) ।

उद्धम
संज्ञा पुं० [सं०] १. ध्वनित करना । बजाना ।२. जोर जोर से साँस लेना [को०] ।

उद्धरण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्धरणीय, उद्धृत] १. ऊपर उठना । २. मुक्त होने की क्रिया । छुटकारा । ३. बुरी अवस्था से अच्छी अवस्था में आना । ४. पढ़े हुए पिछले पाठ का अभ्यास के लिये फिर फिर पढ़ना । ५. किसी पुस्तक या लेख के किसी अंश को दूसरी पुस्तक या लेख में ज्यों का त्यों रखना । क्रि० प्र०— करना ।—होना । ६. उन्मूलन । उखाड़ना । ७. उठाना । उत्थापन । ८. परोसना । ९. वमन । १०. निकालना । भीतर से बाहर करना (को०) । ११. वमन किया हुआ पदार्थ (को०) ।

उद्धरणो
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्धरण+हिं० ई (प्रत्य०)] पढ़े हुए पिछले पाठ को अभ्यास के लिये बार बार पढ़ना । क्रि० प्र०— करना ।—होना ।

उद्धरना पु (१)
क्रि० स० [सं० उद्धरण] उद्धार करना । उबारना । उ०—अब ह्वाँ कौन जतन अनुसरौं, इहि मारौं अपनेन उद्धरौं ।—नंद० ग्रं०, पृ०

उद्धरना (२)
क्रि० अ० बचना । छूटना । मुक्त होना । उ०—सूस सदा ही उद्धरै दाता जाय नरक, कहै कबीर ये साख सुनि मति कोइ जाय सरक ।—कबीर (शब्द) ।

उद्धर्ता (१)
वि० [सं० उद्धर्तृ] १. उद्धार करनेवाला । संकट से बचानेवाला । उठानेवाला । २. जायदाद में हिस्सेदार । ३. संपत्ति को बचानेवाला । ४. उद्धरणी करने या दुहरानेवाला । ४. उद्धरण देनेवाला [को०] ।

उद्धर्ता (२)
संज्ञा पुं० १. विध्वंसक या नाशक व्यक्ति । २. रक्षा करनेवाला । त्राता [को०] ।

उद्धष
संज्ञा पुं० [सं० उद+ हष] १. प्रसन्नता । आनद । अति हर्ष । २. व्रतादि का उत्सव । ३. किसी कार्य को करने का साहस । ४. उद्रेक । अधिक्य [को०] ।

उद्धर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तेजना । २. रोमांच । ३. हर्षित करना [को०] ।

उद्धव
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्सव । पर्व । २. यज्ञ की अग्नि । ३. कृष्ण के चाचा और सखा एक यादव ।

उद्धव्य
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध शास्तानुसार दस क्लेशों में से एक ।

उद्धस्त
वि० [सं०] जिसके हाथ ऊपर उठे हों [को०] ।

उद्धांत (१)
वि० [वि० उद्धान्त] दे० 'उद्धान (१)'

उद्धांत (२)
संज्ञा पुं० मदर हित हाथी [को०] ।

उद्धान (१)
वि० [सं०] १. उगला हुआ । वमन किया हुआ । २. स्थूल- काय । पीन । फूला हुआ । ३. ऊपर गया या निकला हुआ । उदगत [को०] ।

उद्धान (२)
संज्ञा पुं० १. उलटी । वमन । २. अग्निस्थआन । चूल्हा [को०] ।

उद्धार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्धारक, उद्धारित] १. मुक्ति । छुटकारा । त्राण । निस्तार । दु?खनिवृत्ति । जैसे,—(क) इस दु?ख से हमारा उद्धार करो । (ख) इस ऋण से तुम्हारा उद्धार जल्दी न होगा । २. बुरी दशा से अच्छी दशा में आना । सुधार । उन्नति । अभ्युदय । यौ०—जीर्णोद्धार । क्रि० प्र०— करना ।—होना । ३. ऋणमुक्ति । कर्ज से छुटकारा । ४. संपत्ति का वह अंश जो बराबर बाँटने के पहले किसी विशेष क्रम से बाँटने के लिये निकाल लिया जाय । विशेष—मनु के अनुसार पैतृक संपत्ति का २० वाँ भाग सबसे बड़े के लिये, ४०वाँ उससे छोटो के लिये, ८०वाँ उससे छोटे के लिये इत्यादि निकालकर तब बाकी को बराबर बाँटना चाहिए । ५.युद्ध की लूट का छठा भाग जो राजा लेता है । ६. ऋण, विशेषकर वह जिसपर ब्याज न लगे । ७. चूल्हा । ८. अनु— कंपा । कृपा (को०) । ९. जाना । गमन करना (को०) । १०. उद्धगण (को०) ।

उद्धारक
वि० [सं०] निस्तार करनेवाला । वि० दे० 'उद्धर्ता' ।

उद्धारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. त्राण करना । २. ऊपर उठाना । ३. विश्लेष या विभाग करना [को०] ।

उद्धारना पु
क्रि० स० [सं० उद्धारण] उद्धार करना । मुक्त करना । छुटकारा देना ।

उद्धारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुड़ची । गिलोय [को०] ।

उद्धारित
वि० [सं०] उद्धार किया, बचाया हुआ [को०] ।

उद्धित
वि० [सं०] उठाया हुआ । ऊपर उठाया हुआ [को०] ।

उद्धर
वि० [सं०] १. विजेता । २. हिम्मती । साहसी । ३. आजाद । मुक्त । स्वतंत्र । ४. भार से मुक्त । ५. मोटा । ६. प्रसन्न । सुंदर । ७. उच्च (स्वर) । ८. योग्य । अनुकूल । [को०] ।

उद्धूत
वि० [सं०] १. ऊपर उछाला हुआ । २. उन्नत । ऊँचा । ३. हिलाया हुआ । कगित [को०] ।

उद्धूनन
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऊपर उछालना या फेंकना । २. हिलाना । ३. उठाना [को०] ।

उद्धूपन
संज्ञा पुं० [सं०] धूपयुक्त करना । वासित करना [को०] ।

उद्धूलन
संज्ञा पुं० [सं०] धूलि या भस्म आदि से युक्त करना । [को०] ।

उद्धूषण
संज्ञा पुं० [सं०] रोंगटे खड़े होना । रोमांच । पुलक [को०] ।

उद्धृत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] गाँव के वे वृद्ध जन जो गाँव सबंधी पुरानी घटनाऔं से परिचित तथा समय पर उनको प्रकाशित करनेवाले हों । विशेष—मध्यकाल में सीमा संबंधी झगड़ों का इन्हीं लोगों के साक्ष्य के अनुसार निर्णय किया जाता था । आजकल पटवारी (लेखपाल) ही इन लोगों का स्थानपन्न है ।

उद्धुत (२)
वि० [सं०] १. उगला हुआ । २. ऊपर उठाया हुआ । ३. अन्य स्थान से ज्यों लिया हुया । जैसे,—(क) यह लेख उसका लिखा नही है कहीं से उद्धृत है । (ख) इन उद्धृत वाक्यों का अर्थ बतलापो । ४. वांत । वमित (को०) । ५. खुला हुआ । अनावृत्त (को०) । ६. अलग या पृथक् किया हुआ (को०) । ७. उन्मूलन । उत्पाटित (को०) । ८. विकीर्ण (को०) । ९. चुना हुआ । छाँटा हुआ (को०) । १०. अलग अलग हिस्सों में विभक्त (को०) । ११. बचाया हुआ । रक्षित (को०) ।

उद्धृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उद्धार । निकालना, बचाना या रक्षा करना । २. उद्धगण देना । ३. हटाना । दूर करना [को०] ।

उद्धौ पु
संज्ञा पुं० [सं० उद्धव] कृष्ण के चाचा और सखा एक यादव । उ०—पुनि तिनकी पद पंकज रज अज अजहुँ छिंछै । उद्धौ शुद्धि बिशुद्धनु सौं पुनि सो रज इंछै ।—नंदं ग्रंथ, पृ० ४९ ।

उद् ध्मान
संज्ञा पुं० [सं०] चूल्हा । सिगड़ी [को०] ।

उद् ध्वंस
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाश । उच्छेद । कर्कशता । कठोरता । (वाणी की] । (रोग से) ग्रस्त होना [को०] ।

उद् ध्वस्त
वि० [सं०] ध्वस्त । गिरा पड़ा हुआ । टूटा हुआ । भग्न । नष्ट ।

उदबंध (१)
वि० [सं० उदबन्ध] बंधनमुक्त । छूटा हुआ [को०] ।

उदबंघ (२)
संज्ञा पुं० १. फाँसी लगा लेना । २. लटकाना [को०] ।

उदबंधक (१)
वि० [सं० उद् बन्धक] छुड़ानेवाला । मुक्त करनेवाला । [को०] ।

उद्बंधक (२)
संज्ञा पुं० एक मिश्रित जाति । जातिविशेष जो कपड़ा धोने का काम करती है [को०] ।

उद्धुंधन
संज्ञा पुं० [सं० उद् बन्धन] १. दे० 'उद्वंध' । २. छोड़ना । मुक्त करना [को०] ।

उद्धंधनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हुक । काँटी । खूँटी [को०] ।

उद्वल
वि० [सं०] शक्तशाली । मजबूत । ताकतवर [को०] ।

उद्धाष्प
वि० [सं०] अश्रुपूर्ण्ण । बाष्पपूरित [को०] ।

उद्धाहु
वि० [सं०] हाथ ऊपर उठाए हुए । उर्ध्वबाहु (को०) ।

उदबृद्ध
वि० [सं०] १. बिकसित । फूला हुआ । २. प्रबृद्ध । चेतन्य । जिसे बोध या ज्ञान हो गया हो । ३. जगा हुआ । ४. स्मृत । स्मरण किया हुआ (को०) । ५. उद्दीप्त (को०) ।

उदबृद्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपनी ही इच्छा से उपपति से प्रेम करनेवाली परकीया नायिका ।

उदबोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. थोड़ा बहुत ज्ञान । २. जागना । प्रबृद्ध होना [को०] । ३. स्मरण होना । याद आना (को०) ।

उदबोधक (१)
वि० [सं०] [स्त्री० उद् बोधक] १. बोध करानेवाला । चेतानेवाला । खयाल रखनेवाला । २. प्रकाशित करनेवाला । प्रकट करनेवाला । सूचित करलेवाला । ३. उद्दीप्त करनेवाला । उतोगित करनेवाला । ४. जगानेवाला ।

उदबोधक (२)
संज्ञा पुं० सूर्य [को०] ।

उदबोधन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उदबोधनीय, उद् बोधक, उद् बोधित] १. बोध कराना । चेताना । खयाल रखना । २. उद्दीपन करना । उत्तोजित करना । ३. जगाना ।

उदबोधित
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह परकीया नायिका जो उपपति के चतुराई द्वारा प्रकट किए हुए प्रेम को समझकर प्रेम करे ।

उदभट (१)
वि० [सं०] [संज्ञा उदभटना] १. प्रवल । प्रचंड़ । यौ०—रणोदभट । २. श्रेष्ठ । असाधारण । जैसे,—ईशवर चंद्र संस्कृत के एक उदभट विद्धान् थे । ३. उच्चाशय ।

उदभट (१)
संज्ञा पुं० १. सूप । २. कच्छाप । ३. मुक्तक । स्फुट रचना । फुटकल छंद । उ०—मुक्ततक या उदभट में जो रस की रस्म अदा की जाती है उसमें शील दशा का समावेश नहीं होना ।—रस०, पृ० १८९ ।

उदभव
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उदभूत] १. उत्पति । जन्म । सृष्टि । यौ०—उदभवकर = उत्पादक । पैदा करनेवाला । उदभव क्षेत्र, उदभवस्थान = उत्पत्तिस्थान । २. वृद्धि । बढ़ती । जैसे—हम दुसरे के उदभब को देख क्यों जलें । ३. मूल । उदगम । बुनियाद । (को०) । ४. विष्णु का नाम (को०) ।

उदभार
संज्ञा पुं० [सं०] बादल । मेघ [को०] ।

उदभाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. उदभव । उत्पत्ति । २. कल्पना । उदभावना । ३. उदारता [को०] ।

उदभावक
वि० [सं०] १. उत्पन्न करनेवाला । २. कल्पना या उदभावना करनेवाला [को०] ।

उदभावन
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उदभावना, वि० उदभावनीय, उदमा- वित, उदमाव्य] १. कल्पना करना । मन में लाना । २. उत्पन्न होना । उत्पादन । ३. कहना । बोलना (को०) । ४. उपेक्षा या तिरस्कार करना (को०) ।

उदभावना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कल्पना । मन की उपज ।

यौ०—दोषोदभावना । २. उत्पत्ति ।

उदभावयिता
वि० [सं० उदभावयितृ] दे० 'उदभावक' [को०] ।

उदभास
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उदभासनीय, उदभासित, उदभासुर] १. प्रकाश । दीप्ति । आभा । २. हृदय में किसी बात का उदय । प्रतीति ।

उदभासित
वि० [सं०] १. प्रकाशित । उद्दीप्त । २. प्रकट । जैसे,— उसकी आकृति से क्रूरता उदभासित होती है । ३. प्रतीत । विदिन । जैसे,—हमें तो ऐसा उदभासित होता है कि इस वर्ष वृष्टि कम होगी ।

उदभासी
वि० [सं० उदभासिन्] [वि० स्त्री० उदभासिनी] १. दमकवाला । चमकीला । २. प्रकट होनोवाला । ३. प्रकट करने या चमकानेवाला [को०] ।

उदभासुर
वि० [सं०] ज्योतिष्मान् । तेजवान् । चमकीला [को०] ।

उदभिज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदभिज्ज' ।

उदिभज्ज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वृक्ष, लता, गुल्म आदि जो भूमि फोड़कर निकलते हैं । वनरपति । विशेष—सृष्टि में ये चार प्रकार के प्राणियों में से हैं । मनु इत्यादि ने वृक्षों को अंत?सत्व कहा है अर्थात् उनमें ऐसी चेतना या संवेदना बतलाई है जिन्हें वे प्रकट नहीं कर सकते । आधुनिक वैज्ञानिकों का भी यही मत है ।

उदिभज्जँ
वि० भूमि फोड़कर बाहर निकलनेवाला (पौधा आदि) [को०] ।

उदभिद्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदिभिद' ।

उदभिद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वृक्ष, लता, गुल्म आदि जो भूमि फोड़कर निकलते हैं । वनस्पति । २. अँखुआ । कल्ला । ३. समुद्री नमक ।

उदभिद (२)
वि० उगनेवाला । उठने या निकलनेवाला । दे० 'उदभिज्ज२' [को०] ।

उदभिन्न
वि० [सं०] १. तोड़कर कई भागों में किया हुआ । फोड़ा हुआ । २. उत्पन्न । व्यक्त । खुला या निकला हुआ (को०) । ४. विकसित । खिला हुआ (को०) । ५. जिससे विश्वासवात किया गया हो (को०) ।

उदभुज पु
संज्ञा पुं० [सं० उदिभज] दे० 'उदभिज' । उ०—उदभुज सतेज जेरज अंड़ा, सुपनरुप बरतै ब्रह्तमंड़ा ।—दरिया० बानी, पृ० २७ ।

उदभूत
वि० [सं०] १. उत्पन्न । निकला हुआ । २. गोचर । य़ुक्त (को०) । ऊँचा । उच्च (को०) ।

उदभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. फोड़कर निकलना (पौधें के समान) । २. प्रकाशन । उदघाटन । ३. प्राचीनों के मत से एक काव्यालंकार जिसमें कौशल से छिपाई हुई किसी बात का किसी हेतु से प्रकाशित या लक्षित होना वर्णन किया जाय । जैसे—वातायन गत नारि प्रति नमस्कार मिस भान, सो कटाच्छ मुसुकान सो जान्यों सखी सुजान । जहाँ सूर्य को नमस्कार करने के बहाने से प्रिय को देखने के लिये नायिका खिड़की पर गई पर छिपाने की चेष्टा करने पर भी मुसकान और कटाक्ष द्वारा उसका गुप्त प्रेम प्रकट हो ही गया । ४. मूल । उत्स । स्रोत (कों) । ५. पुलक । रोमांच (कों) । ६. तोड़ना । खंडन (कों) ।

उदभेदन
संज्ञा पुं० [मं०][वि० उदभेदक, उदभेदनीय, उदिभन्न] १. तोड़ना । फोड़ना । २. फोड़कर निकलना । ऊपर आना । दे० 'उदभेद' ।

उदभ्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. चक्कर काटना । भूलभुलैया में पड़ जाना । चकराना । २. भ्रमण । पर्यटन ६. पशचात्ताप । ४. उद्धेग (कों) ।

उदभ्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. भ्रमण करना । घूमना । ३. उदित होना । उगना [को०] ।

उदभ्रांन (१)
वि० [स० उदभ्रान्त] १. घूमता हुआ । चक्कर मारना हुआ । २. भ्रांतियुक्त । भूला हुआ । ३. चकित । भौचक्का ।

उदभ्रांत (२)
संज्ञा पुं० तलवार के ३२ हाथों में से एक जिसमें ऊँचा हाथ करके तलवार चारों और घुमाते हैं । इससे दूसरे के किए हुए वार को रोकते या व्यर्थ करते हैं ।

उद्यत (१)
वि० [सं०] १. तैयार । तत्पर । प्रस्तुत । मुस्तैद । उतारू । उ०—प्रजा काजे राजा नित सुकृत पर उद्यत रहै ।—शकुंतला पृ० १५४ । यौ०.—वधोद्यत । गमनोद्यत । २. उठाया हुआ । ताना हुआ । ३. शिक्षित । अनुशासित (कों) । ४. श्रम करनेवाला । परिश्रमी (कों) ।

उद्यत (२)
संज्ञा पुं० १. संगीत में ताल । २. अध्याय । परिच्छेद । उल्लास (को०) ।

उद्यति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तैयारी । २. प्रयात्न । उद्योग । ३. उठाना [को०] ।

उद्यम
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्यत] १. प्रयास । प्रयत्न । उद्योग । मेहनत । उ०—बिफल होहिं सब उद्यत ताके । जिमि पर- द्रोह—निरत—मनसा के ।—मानस । ६ ।९१ । २. कामधंधा । रोजगार । व्यापार । उ०—किसी उद्यम में लगो तब रुपया मिलेगा । ३. उठाना (कों) । तैयारी (कों) । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

उद्यमी
वि० [सं० उद्यामिन्] मेहनती । उद्यम करनेवाला । यत्नशील (कों) ।

उद्यान
संज्ञा पुं० [सं०] १. बगीचा । उपवन । २. उद्देश्य । अभि- प्राय । (को०) । ३. भारत के उत्तर स्थित देश विशेष (कों) । ४. घूमना । टहलना (कों) । यौ०—उद्यानपाल, उद्यानपालक, उद्यानरक्षक = बगीचे की देख- भाल करनेवाला माली ।

उद्यानक
संज्ञा पुं० [सं०] बगीचा । उपवन [को०] ।

उद्यानकव्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यूह जिसके चारों अंग असहत हों ।

उद्यापन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी व्रत की समाप्ति पर किया जानेवाला कृत्य, जैसे, हवन, गोदान इत्यादि ।

उद्यापित
वि० पुं० [सं०] उद्यापन किया हुआ । विधिवत् पूर्ण किया हुआ [को०] ।

उद्याव
संज्ञा पुं० [सं०] १. मिलाना । मिश्रण करना । जोड़ना (को०) ।

उद्युक्त
वि० [सं०] १. उद्योग में रत । तत्पर । तैयार । मुस्तैद ।

उद्योग
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्योगी, उद्यृक्त] १. प्रयन्त । प्रयास । कोशिश । मिहनत । २. उद्यम । कामधंधा । यौ०—उद्योगधंधा = उत्पादक का कार्य । उत्पादन का काम । उद्योगपति = अनेक उद्योगों का स्वामी । कारखानें का मालिक । उद्योगश्ताला = उद्योग का स्थान । कारखाना ।

उद्योगी
वि० [सं० उद्योगिन्] [स्त्री० उद्योगिनी] उद्योग करनेवाला । प्रत्यनवान् । मेहनती ।

उद्योगीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] उद्योग के अभाव को दूर करने लिये उद्योग की स्थापना करना । आधुनिक ढंग के कल कारखाने चालू करना ।

उद्योत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदद्योत' । उ०—ज्ञान उद्योत करि हृदय गुरु वचन धरि जोग संग्राम के खेत आवै ।—गुलाल० बानी, पृ० १०९ ।

उद्योतन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्योतक, उद्योतनीय, उद्योतित] १. प्रकाशित करने या होने की क्रिया । चमकने या चमकाने का कार्य । २. प्रकट करने की क्रिया । व्यक्त करने का कार्य ।

उद्रंक, उद्रंग
संज्ञा पुं० [सं० उद्रङ्ग, उद्रङ्ग] १. के 'उदग्रंथ' तथा 'उदग्राह' (सारस्वत कोष) । २. वह अन्न जो राजा के अंश के रूप में गाँवों से इकट्ठा किया गया हो (बुहलर) ।

उद्र (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० उदर] १. दे० 'उदर' । उ०—भयो गाफिल भूलि माया, नहिं उद्र अघात ।—जग बानी, पृ० ५५ ।

उद्र (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलमाजरि ऊदबिलाव । २. जल [को०] ।

उद्रथ
संज्ञा सं० १. अरुणशिखा । मुर्गा । २. गाड़ी के पहिए की धुरी की किल्ली [को०] ।

उद्राव
संज्ञा पुं० [सं०] शोरगुल । हल्ला [को०] ।

उद्रिक्त
वि० [सं०] [संज्ञा स्त्री० उद्रिक्ति] १. बढ़ा हुआ । अधिक । अतिशय । २ स्पष्ट । प्रत्यक्ष [को०] । यौ०—उद्रिक्तचित्त, उद्रिक्तचेता = (१) उदारहृदय । उच्चाशय । (२) मादकता से प्रभाविंत ।

उद्रुज
वि० [सं०] १. विध्वंस करनेवाला । समूल नष्ट करनेवाला । २. तोड़ डालनेवाला [को०] ।

उद्रेक
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्रिक्त] १. वृद्धि । बढ़ती । अधिकता । ज्योदती । २. आरंभ । उपक्रम (को०) । ३. ऐश्वर्य (को०) । एक काव्यालंकार जिसमें कई, सजातीय वस्तुओं की किसी एक जातीय या विजातीय वस्तु की अपेक्षा तुच्छता दिखाई जाय अर्थात् जिसमें वस्तु के कई गुणों या दोषों का किसी एक गुण, या दोष के आगे मंद पड़ जाना वर्णन किया जाय । विशेष—इसके चार भेद हो सकते हैं—(क) जहाँ गुण से गुणों की तुच्छता दिखाई जाय । उ०—जयो नृपति चालुक्य को, नयो बंगपति कंध । परगहि अठ सुलमतान सथ, किय अपूर्व जयचंद । यहाँ जयचंद का आठ सुलतानों को साथ पकड़ना, चालुक्य और बंगदेश के राजाऔं को जीतने की अपेक्षा बढ़कर दिखाया गया है । २. जहाँ गुण से दोषों की तुच्छता दिखाई जाय । उ०—बैठत जल, पैठत पुहुमि ह्वै निसि अन उद्योत । जगत प्रकाशकता तदपि रवि में हानि न होत । यहाँ जल में बैठ जाने और रात में प्रकाशरहित रहने की अपेक्षा सूर्य में जगत् को प्रकाशित करने के गुण की अधिकता दिखाई गई है । ३. जहाँ दोष से दोषों की तुच्छता दिखाई जाय । उ०—निरखत बोलत हँसत नहिं नहिं आवत पिय पास । भो इन सबसों अधिक दुख, सौतिन के उपहास । ४. जहाँ दोष से गुणों की तुच्छता दिखाई जाय । उ०—गिरि हरि लोटत जंतु लों पूर्ण पतालहि कीन्ह । परग्यो गौरव सिंधु को मुनि इक अंजुलि पीन्ह । यहाँ समुद्र में विष्णु और पर्वत के लोटने और पाताल को पूर्ण करने के गुणों की अपेक्षा उसके अगस्त्य मुनि द्वारा पिए जाने के दोष का उद्रेक है ।

उद्रेका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बकायन । महानिंब [को०] ।

उद्रेचक
वि० [सं०] बहुत आधिक बढ़ा देनेवाला । अत्याधिक वृद्धि करनेवाला [को०] ।

उद्वत्सर
संज्ञा पुं० [सं०] साल । वर्ष [को०] ।

उद्वपन
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिलाकर गिराना । उड़ेलना । २. दान [को०] ।

उद्वर्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उबटन । २. उबटन लगाने का कार्य । ३. बचा हुआ या अतिरिक्त अंश । ४. अतिशयता । प्राचुर्य । अधिक्य । ५. विनाश काल । प्रलय काल [को०] ।

उद्वर्त (२)
वि० अतिरिक्त । शेष । फालतू [को०] ।

उद्वर्तक
वि० [सं०] १. उबटन लगानेवाला । मालिश करनेवाला । २. उठानेवाला ।

उद्वर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी वस्तु को शरीर में लगाने की क्रिया । व्यवहार । अभ्यंग । जैसे—तेल लगाना, चंदन लगाना, उबटन लगाना । २. उबटन । ३. उद्दंडता । उजड्डपन (को०) । ४. ऐश्वर्य अभ्युदय (को०) । ५. तार खींचने का काम । तारकशी (को०) । ६. चूर्ण करना । पीसना (को०) ।

उद्वर्तित
वि० [सं०] १. जिसकी मालिश की गई हो । जिसे उबटन लगाया गया हो । उठाया हुआ । ३. बहिष्कृत । निकाला हुआ । ४. सुगंधित [को०] ।

उद्वर्धन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बढ़ाव । वृद्धि । २. धीमी या दबाई हुई हँसी [को०] ।

उद्वर्हित
वि० [सं०] १. आकर्षित । खींचा हुआ । २. नष्ट किया हुआ । उन्मूलित [को०] ।

उद्वस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] जनशून्य स्थान [को०] ।

उद्वस (२)
वि० १. समाप्त । २. गत । गया हुआ । लुप्त । ३. जिससे शहद निकल लिया गया हो (छत्ता) । ४. खाली । शून्य [को०] ।

उद्वह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] (स्त्री० उद्वहा) १. पुत्र । बेटा । यौ०—रघूद्वह । २. सात वायुओं में से एक जो तृतीय स्कंध पर है । ३. उदान वायु जिसका स्थान कंठ में माना गया है । वि० दे० 'उदान' ।४. ब्याह । विवाह । ५. अग्नि की एक जिह्वा (को०) । ६. परिवार या घर का प्रधान व्यक्ति (को०) ।

उद्वह (२)
वि० १. ले जानेवाला । २. निरंतर चालू रहनेवाला । [को०] ।

उद्वहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऊपर खिंचना । उठना । २. विवाह । ३. ऊपर उठाना या उठा ले जाना । (को०) । ४. चढ़ना । सवार होना (को०) । ५. युक्त होना । सपत्र होना (को०) । ६. रक्षण । सँभालना (को०) ।

उद्वहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कन्या । पुत्री ।

उद्वांत (१)
संज्ञा पुं० [सं० उद्वान्त] १. वमन । कै ।

उद्वांत (२)
वि० उगला हुआ । कै किया हुआ । वमित ।

उद्वान
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्निस्थान । चूल्हा । २. वमन [को०] ।

उद्वाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. खेती फसल । विशेष—चंद्रगुप्त से समय में राज्य का यह नियम था कि यदि कृषक खेती न करे तो उनको राज्यकर इकट्ठा करनेवाले समाहर्ता के करिदे बाध्य करते थे कि वे गरमी की फसल तैयार करें । २. दूर करना । हटाना । फेकना (को०) । ३. मुंडन कराना (को०) । ४. ऊपर उठाना या खींचना (को०) ।

उद्वापन
संज्ञा पुं० [सं०] (अग्नि को) बुझावने या शांत करने की क्रिया ।

उद्वास
संज्ञा पुं० [सं०] १. निकाल बाहर करना । २. भगा देना । ३. त्याग । ४. मारने के लिये जाना । ५. वध । ६. छोड़ देना [को०] ।

उद्वासन
संज्ञा पुं० [सं०][वि० उद्वासनीय, उद्वासक, उद्यासित, उद्वा्स्य] १. स्थान छुड़ाना । हटाना । भगाना । खदेड़ना । २. उजाड़ना । वासस्थान नष्ट करना । ३. मारना । वध । ४. एक संस्कार । यज्ञ के पहले आसन बिछाने, यज्ञपात्रों को साफ करके यथास्थान रखने और उनमें धृत आदि डाल रखने का काम । ५. प्रतिमा की प्रतिष्ठा के एक दिन पहले उसे रात भर ओषधि मिले हुए जल में डाल रखना ।

उद्वाह
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्वाहक, उद्वाहिक, उद्वाहित, उद्वाही, उद्वाह्य] १. विवाह । २. उठाना । सँभालना (को०) ।

उद्वाहन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्वाहक, उद्वाहनीय, उद्वाही, उद्वांहित, उद्वाह्य] १. ऊपर ले जाना । ऊपर चढ़ाना । उठाना । २. ले जाना । हटाना । ३. विवाह करना । ४. एक बार जोते हुए खेत को फिर से जोतना । एक बाँह जोते हुए खेत को दूसरी बाँह जोतना । चास लगाना । ५. व्यग्रता । चिंता । परेशानी (को०) ।

उद्वाहती
संज्ञा स्त्री० (पुं०) १. रस्सी । उबहनी या उबहन जिसे धड़े में बाँधकर कुँए से पानी जाता है । २. कोड़ा [को०] ।

उद्वाहर्क्ष
संज्ञा पुं० [सं०] वे नक्षत्र जिनमें विवाह होते हैं, जैसे तीनों उत्तरा, रेवती, रोहिणी, मूल, स्वाती, मृगशिरा, मघा, अनुराधा और हस्त ।

उद्वाहिक
वि० [सं०] उद्वाह से संबंधित । वैवाहिक [को०] ।

उद्वाही
वि० [सं० उद्वाहिन्] १. ढोनेवाला । २. दूर ले जानेवाला । ३. उपर ले जानेवाला । ४. विवाहेच्छु (पुरुष) [को०] ।

उद्विग्न
वि० [सं०] १. उद्वेगयुक्त । आकुल । घबराया हुआ । २. व्यग्र । ३. आतंकित [को०] ।

उद्विग्मता
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकुलता । घबराहट । व्यग्रता ।

उद्विद्ध
वि० [सं०] १. क्षुव्ध । २. ऊपर उठा हुआ । उछलता हुआ [को०] ।

उद्वोक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऊपर देखना । २. दृष्टि । आँख । ३. अवलोकन । देखना ।

उद्वोजन
संज्ञा पुं० [सं०] पंखा डुलाना । पंखा झलना [को०] ।

उदवृत्त
वि० [सं०] १. असभ्य । २. आभिमानी । ३. वृद्धिप्राप्त । ४. क्षोप से भरा हुआ । ५. उठा हुआ [को०] ।

उद्वेग
संज्ञा पुं० [वि० उद्विग्न] १. चित्त की आकुलता । घबराहट । २. मनोवेग । चित्त की तीव्र वृत्ति । आवेश । जोश । जैसे,—मन के उद्वेंगों को दबाए रखना चाहिए । ३. झोंक जौसे,—क्रोध के उद्वेग में उसने यह काम किया है । ४. रस की दस दशाऔं में से एक । वियोग समय की वह व्याकुलता जिसमें चित्त एक जगह स्थिर नहीं रहता । ५. विस्मय, आश्चर्य (को०) । ६. भय । डर । (को०) । ७. सुपारी । पुँगीफल (को०) ।

उद्वेग
वि० १. शांत । २. धैर्यवान् । धीर । ३. दे० 'उद्वाहु' । ४. शीघ्र जानेवाला । ५. आरोहणकर्ता [को०] ।

उद्वेगजनक
वि० उद्वेग पैदा करनेवाला । बैचेन करनेबाला ।

उद्वेगी
वि० [सं० उद्वेगिन्] १. पीड़ा या कष्ट में प़ड़ा हुआ । दु?खी । २. चिंताजनक [को०] ।

उद्वेजक
वि० [सं०] उद्वेग करनेवाला । उद्वेगजनक ।

उद्वेजन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उद्वेजक, उद्वेजनीय, उद्वेजित]उद्वेग में होने या करने की क्रिया । आकुल होने या करने का काम । घबराना ।

उद्वेजयिता
वि० [सं०उद्वेजयिजु] उद्वेग उत्पन्न करनेवाला । क्षोमकारी [को०] ।

उद्वेप
संज्ञा पुं० [सं०] कँपकँपी । कंपन [को०] ।

उद्वेल
वि० [सं०] नट या किनारा छापकर बहनेवाला । मर्यादा का अतिक्रमण करनेवाला । अतिशय । उ० —उदवेल हो उठो भाटे से, बढ़ जाऔ घाटो घाटे से ।—आराधना, पृ० २ ।

उद्वेलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उकान । किनारा लाँघकर बहना । २. मर्यादा लाँघ जाना [को०] ।

उद्वेलित
वि० [सं०] १. अमर्यादित । २. बाँध लया तट को पारकर बहता हुआ [को०] ।

उद्वेल्लित
वि० [सं०] उफनता हुआ । सीमा को लाँघकर बहता हुआ [को०] ।

उद्वेष्टन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाढ़ या धेरा । २. घेरने की क्रिया या भाव । ३. पीठ की ओर होनेवाला दर्द [को०] ।

उद्वेष्टनीय
वि० [सं०] खोलने योग्य । मुक्त करने योग्य [को०] ।

उद्वेष्टित
वि० [स०] घिरा हुआ [को०] ।

उद्वोढा
संज्ञा पुं० [सं० उद्वोढृ] पति । भर्ता [को०] ।

उधड़ना
क्रि० अ० [सं० उद्दरण = उन्मूलन, उखड़ना] खुलना । उखड़ना । बिखरना, तितर बितर होना । जैसे,—(क) कुछ दिन में इस कपड़े का सूत उधड़ जायगा । (ख) इस पुस्तक के पन्ने पन्ने उधड़ गए । यौ०—सिलाई उधड़ना = सिलाई का टाँका टुट जाना या खुल जाना । २. उचड़ना । पर्त से अलग होना जैसे,—पानी में भीगने से दफ्ती के ऊपर का कागज उधज़ गया । यौ०—चमड़ा उधड़ना = शरीर से चमड़े का अलग होना । जैसे,—ऐसी मार मारेंगे कि चमड़ा उधड़ जायगा ।

उधम पु
संज्ञा पुं० (हिं० ऊधम) दे० 'ऊधम' ।

उधर
क्रि० वि० [सं० उतर अथवा पुं० हिं० ऊ (वह)+घर (प्रत्य० सं० त्रल्)] उस और । उस तरफ । दूसरी तरफ । जैसे,—उधर भूलकर भी मत जाना ।

उधरना पु (१)
क्रि० अ० [सं० उद्वरण] १. उद्वार पाना । मुक्त होना । छुटकारा पाना । उ० —साधु जन संसार में शीतल चंदन वास, दादु केते उधरे जे आए उन पास ।—दादू० बानी, पृ० २९१ । २. दे० 'उधड़ना' ।

उधरना (२)
क्रि० स० उद्धार करना मुक्त करना ।—उ० —सोक कनक— लोचन, मति छोनी । हरी विमल गुन गन जग जोनी । भरत बिबेक बराह बिसाला । अनायास उधरी नेहि काला ।— मानस, । २ । २९६ । (ख) छीर समुद्र मध्य ते यों कहि दीरध वचन उचारा हो । उधरों धरनि असुर कुल मारौं धरि नर तनु अवतारा हो ।—सूर—(शब्द०) ।

उधराना पु
क्रि० अ० [सं० उद्वरण] १ हवा के कारण छित- राना । खंड खंड होकर इधर इधर उड़ना । तितर बितर होना । बिखराना । जैसे,—(क) ऱूई हवा में मत रखो, उधरा जायगी । उ० —मन कैं भेद नैन गए भाई । लुब्धे जाइ श्याम सुंदर—रस करीन कछू भलाई । व्याकृल फिरति भवन बन जहँ तहँ तूल आक उधराई ।—सूर०, १० । २८४७ । २. मदांध होना । ऊधम मचाना । सिर पर दुलिया उठाना ।

उधाड़
संज्ञा पुं० [सं० उद्वार] कुश्ती का एक पैंच । उखाड़ । विशेष—जब दानों लड़नेवालों के हाथ दानों की कमर पर रहते है और पेंच करनेवाले की गर्दन विपक्षी के कधे पर होती है, जब वह (पैंच करनेवाला) अपना बाँया हाथ अपनी गरदन पर से ले जाता है और उससे विपक्षी का लंगोट पकड़ता है और दाहिना पैर बढ़ाकर उसको बगल में फेंक देता है । इस पेंच को उधाड़ या उखाड़ कहते हैं ।

उधार (१)
संज्ञा पुं० [सं० उद्वार = बिना ब्याज का ऋण] १. कर्ज । ऋण । जैसे,—उसमे मुझसे १००) उधार लिए । क्रि० प्र० —करना । जैसे,—वह १०) बनिए का उधार कर गया है ।—खाना = ऋण लेना । ऋण लेकर काम चलाना ।—देना ।—लेना । मुहा० —उधार खाए बैठना = (१) किसी अपने अनुकूल होनेवाली बात के लिये अत्यंत उत्सुक रहना । जैसे,—कभी न कभी रियासत हाथ आएगी, इसी बात पर तो वे उधार खाए बैठे हैं । २. किसी की मृत्यु के आसरे में रहना । किसी का नाश चाहना । जैसे,—वह बहुत दिनों से तुमपर उधार खाए बैठा है (महापात्र लोग इस आशा पर उधार लेते हैं कि अमुक धनी आदमी मरेगा तो खूब रुपया मिलेगा) । २. मँगनी । किसी एक वस्तु का दूसरे के पास केवल कुछ दिनों के व्यवहार के लिये जाना । जैसे,—हलवाई ने बरतन उधार लाकर दुकान खोली है । क्रि० प्र०—देना ।—पर लेना ।—लेना । ३. उद्धार । छुटकारा ।

उधारक पु
वि० [सं० उद्धारक] दे० 'उद्धारक' ।

उधारन पु
वि० [सं० उद्धार] उद्धार करनेवाला । उ०—सगर- सुवन सठ सहस परस जल मात्र उधारन ।—भारतेंदु ग्रं० भा० १, पृ० २८२ ।

उधारना पु
क्रि० सं० [सं० उद्धारण] उद्धार करना । मुक्त करना । छुटकार करना । निस्तार करना । उ०—माया तिमिर मिटाय कै खल कोटि उधारे ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ४४४ ।

उधारा पु
वि० [सं० उद्धारिन] [स्त्री० उधारिनी] उद्धारक । उद्धार करनेवाला ।

उधारो पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उधार' । उ०—द्रव्य कौ सौ न कार्य न होइ तोऊ उद्धारो लाइ कै करनो ।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २८७ ।

उधेड़ना
क्रि० स० [सं० उद्धारण = उन्मूलन, उखाड़ना] १. मिली हुइ पर्त को अलग करना । उचाड़ना । जैसे, मारते मारते चमड़ा उधेड़ लूँगा । २. टाँका खोलना । सिलाई खोलना । २. छितराना । बिखराना ।

उधेड़बुन
संज्ञा पुं० [हि० उधेड़ना+बुनना] १. सोचविचार । ऊहापोह । उ०—पड़ गए हो उधेड़बुन में क्यों ।—चुभते०, पृ० ४२ । २. युक्ति बाँधना । जैसे,—किस उधेड़बुन में हो जो कही हुई बात नहीं सुनते ।

उधेर पु
क्रि० सं० [हि०] दे० 'उधेड़' ।

उधेरना
क्रि० सं० [हि०] दे० 'उधेड़ना' ।

उनंत पु
वि० [सं० अनुन्रत या अवनत] झुका हुआ । नत । उ०— कोंप जस दारिंव दाखा । भई उनंत प्रेम कै साखा । —जायसी ग्रं०, पृ० २४ ।

उन
सर्व० [हि०] 'उस' का बहुवचन । विशेष—'वह' का किसी विभक्ति के साथ संयोग होने से 'उस' रूप हो जाता है ।

उनइस पु †
वि० [सं० ऊनविंश] दे० 'उन्नीस' ।

उनका
संज्ञा पुं० [अ० अन्का] एक पक्षी जिसे आज तक किसी ने नहीं देखा है । यह यथार्थ में एक कल्पित प्राणी है । यौ०—उनका सिफत = उनका की तरह कभी न दिखाई देनेवाला । जैसे, आप तो आज कल उनका सिफत हो रहै हैं । कभी आप की सूरत ही नहीं दिखाई पड़ती (शब्द०) ।

उनचास (१)
वि० [सं० एकोनपञ्चाशत्, प्रा० एखुणपंचास, पु उनचासया सं० उनपञ्चाशत्] चालीस और नौ । उ०—लाग ड़ाँट सम विसम तान उनचास कूटि बट ।—हम्मीर रा०, पृ० ३३ ।

उनचास (२)
संज्ञा पुं० चालीस और नौ की संख्या या अंक जो इस तरह लिखा जाता है—'४९' ।

उनतीस (१)
वि० [सं० एकोनत्रिंशत्, प्रा० अउणतीस या सं० ऊनत्रिंशत्] एक कम तीस । बीस और नौ ।

उनतीस (२)
संज्ञा पुं० बीस और नौ की संख्या या अंक जो इस तरह लिखा याता है— '२९' ।

उनदा पु
वि० [सं० उन्निद्र] उनींदा । नींद से भरा । उ०—पारयौ सोर सुहाग कौ इन विनही पिय, नेह, उनदी ही आँखियाँ ककै कै अलसौंहीं देह ।—बिहारी (शब्द०) ।

उनदौही पु
वि० स्त्री० [सं० अन्निद्र, हि० उनींदा, स्यो० 'उनदौंहीं'] नींद से भरा हुआ । ऊघता हुआ । उनींदा ।

उनविंसत पु
वि० [सं० ऊनविंशति] उन्नीस । उ०—सुनै जु कोऊ हरिचरित उनविंसत अध्याइ, पाप न परसै नंद तिहि पदमिनि दल जल न्याइ ।—नंद० ग्र०, पृ० २८८ ।

उनमत पु
वि० [सं० उन्मत] दे० 'उन्मत' । उ०—इहि विधि वँन धँन बूझि ढ़ूँढ़ि उनमत की नाई ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३४७ ।

उनमत पु
वि० [सं० उन्मत] १. उन्मत । मतवाला । मदमस्त । उ०—बाजत सुबैन रहै, उनमद मैन रहै, चित्त में न चैन रहै चातकी के रव सों ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १८७ ।

उनमन पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उन्मनी] दे० 'उन्मनी' । उ०—एता कीजै आपकों, तनमन उतमन लाइ । पंच समाधी राखिए, दूजा सहज सुभाइ ।—दादू० बानी, पृ० १५ ।

उनमना पु
वि० [सं० उन्मनस्क] [स्त्री० उनमनी] दे० 'अनमना' ।

उनमाथना पु
क्रि० सं० [सं० उदमथ या उन्मथन्] [वि० उनमाथी] मथना । विलोड़ना करना ।

उनमाथी पु
वि० [सं० उन्मथिन् या हिं० उनमाथना] मथनेवाला । विलोड़न करनेवाला । उ०—जल ते सुथल पर, थल ते सुजल पर उथल पथल जल पर उनमाथी को । बरस कितेक बीते जुगुति चली न कछु बिना दीनवंधु होत साँकरे में साथी को ? मन बच करम, पुकारत प्रगट 'बेनी' नाथन के नाथ औ अनाथन सनाथी को । बल करि हारे हाथा हाथी सब हाथी, तब हाथा हाथी हरखि उबारि लीनो हाथी को ।—बेनी (शब्द०) ।

उनमाद पु
संज्ञा पुं० [सं० उन्माद] दे० 'उन्माद' । उ०—आनंदघन लीला रस चाखें बढ़ै प्रेम उनमाद ।—घनानंद, पृ० ४३६ ।

उनमादना पु
क्रि० अ० [हि० उनमाद] उन्मत्त होना ।

उनमादी
वि० [सं० उनमाद+ई (प्रत्य०) या उन्मादिन्] पागल करनेवाला । उन्मत करनेवाला । उ०—कान्ह की बसुरिया है उनमादी खेलति रहै बारहमासी फाग ।—घनानंद, पृ० ४८५ ।

उनमान (१)पु
संज्ञा पुं० [सं०अनुमान] १. अनुमान । खयाल । ध्यान । समझ । उ०—(क) तीन लोक उनमान में चौया अगम अगाध, पँचम दिशा है अलख की जानैगा कोइ साध ।—कबीर (शब्द०) । (घ) कहिबे में न कछू सक राखी । बुधि विवेक उनमान आपने मुख आई सो भाखी ।—सूर (शब्द०) । २. अटकल । अंदाज । उ०—आगम निगम नेति करि गायो । शिव उनमान न पायो, सूरदास बालक रस लीला मन अभिलाख बढ़ायौ ।—सूर (शब्द०) ।

उनमान पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० उद्+मान या उन्मान] १. परिमाण । नाप । तौल । थाह । उ०—रूप समुद छबि रस भरो अति ही सरस सुजान, तामें तें भरि लेत दग अपने घट उनमान ।— रसनिधि (शब्द०) । २. शक्ति । सामर्थ्य । योग्यता । उ०—जो जैसा उनमान का तैसा तासों बोल, पोता को गाहक नहीं हीरा गाँठि न खोल ।—कबीर (शब्द०) ।

उनमान (३)पु
वि० [हि०] तुल्य । समान । उ०—तुव नासा पुट गात मुक्त फल अधरबिंब उनमान, गुंजा फल सबके सिर धारक प्रगटी मीन प्रमान ।—सूर (शब्द०) ।

उनमानना पु
क्रि० स० [हि० उनमान] अनुमान करना । खयाल करना । सोचना । समझना ।

उनमाना पु
क्रि० स० [सं० उन्मादन] १. उन्मत्त होना । २. मस्त- हो जाना । भावमुग्ध होना ।

उनमानी पु
वि० [हि०] दे० 'उनमान' (३) ।

उनमीलन पु
संज्ञा पुं० [सं० उन्मीलन] दे० 'उन्मीलन' ।

उनमुना पु †
वि० [सं० अन्यमनस्क; हि० अनमना] [स्त्री० उनमनी] मौन । चुप चाप । उ०—हँसै न बोलै उनमुनी चंचल मोल्या मार, कह कबीर अंतर बिधा सतगुरु का हथियार ।—कबीर (शब्द०) ।

उनमुनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उन्मनी] १. उन्मनी मुद्रा । उ०—निरा- काश औ लोक निराश्रय निर्णय ज्ञान विसेखा । सूक्ष्म वेद है उनमुनि मुद्रा उनमुन बानी लेखा ।—कबीर (शब्द०) । २. आत्मविस्मृति । मोहावस्था (को०) ।

उनमूलना पु
क्रि० स० [सं० उन्मूलन] उखाड़ना । उ०—(क) मंद परे रिपुगन तारा सम जन—भय—तम उनमूले ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २७२ । (ख) हरिचंद छबिरासि प्रिया- पिय दरसत ही जिय दुख उनमूले ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५०० ।

उनमेख पु
संज्ञा पुं० [सं० उन्मेष] १. आँख का खुलना । २. फूल का खुलना या खिलना । विकास । उ०—सखि, रघुबीर-मुख- छबि देखु । नयन सुखमा निरखि नागरि सुफल जीवन लेखु । मनहुँ बिधि जुग जलज बिरचे ससि सुपूरन भेखु । भृकुटि भाल विशाल राजत रुचिर कुंकुमि रेखु । भ्रमर है रवि किरन लाए करन जनु उनमेखु —तुलसी (शब्द०) । ३. प्रकाश ।

उनमेखना पु
क्रि० स० [हिं० 'उनमेख' से नाम०] १. आँख का खुलना । उन्मीलित होना । २. विकसित होना । (फूल आदि का) ।

उनमेद पु
संज्ञा पुं० [सं० उद् = जल+मेद = चरबी] पहली वर्षा से उठा हुआ जहरीला फेन जिसके के खाने से मछलियाँ मर जातीहैं । मांजा । उ०—थोरो जीवन बहुत न भारो । कियो न साधु समागम कबहुँ लिये न नाम तिहारो । अति उनमत्त मोह माया बस नहिं कफ बात बिचारो । करत उपाय न पूछत काहू गनत न खाए खारो । इंद्री स्वाद बिबस निसि वासर आपु अपुनपो हारयो । जल उनमेद मीन ज्यों बपुरो पाव कुहारो मारयो ।—सूर (शब्द०) ।

उनमोचन पु
संज्ञा पुं० [सं० उन्मोचन] छोड़ना । बंधन दूर कर देना ।

उनयना पु †
क्रि० अ० [हिं०] १. झुकना । लटकना । उ०—उनै रही केरा कै घोरी ।—जायसी ग्रं०, पृ० १३ । २. छा जाना । घिर आना । उ०—(क) उनई बदरिया परिगै साँझा, अनुआ भूले बनखँड़ माँझा ।—कबीर (शब्द०) । (ख) उनई घटा चहूँ दिसि आई, छूटहिं बान मेघ झरि लाई ।—जायसी (शब्द०) । (ग) उनई आइ घटा चहुँ फेरी, कंत उबारु मदन हौं घेरी । —जायसी (शब्द०) ।

उनरना पु
क्रि० अ० [सं० उन्ररण = ऊपर जाना या उन्नम्र या हि०] १. उठना । उमड़ना । उ०—अहिरिन हाथ दहेंड़ी सगुन लेइ आवइ हो, उनरत जोबन देखि नृपति मन भावइ हो ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४ । २. कूदते हुए चलना । उछलते हुए जाना । उ०—मेरो कहो किन मानती, मानिनि आपुह तें उतको उनरोगी ।—देव (शब्द०) ।

उनवना पु †
क्रि० अ० [सं० अवनवन प्रा० ओणम] १. झुकना । लटकना । २. छाना । घिर जाना । उ०—उनवत आव सैन सुलतानी, जानहु परलय आव सुलानी ।—जायसी (शब्द०) । ३. टूटना । ऊपर पड़ना । उ०—देखि सिंगर अनूप बिधि विरह चला सब भाग । काल कष्ट वह उनवा सब मोरै जिउ लाग ।—जायसी (शब्द०) ।

उनवर पु
वि० [सं० ऊन = क्रम+वर हि० (प्रत्य०)] न्यून । कम । तुच्छ । उ०—जहँ कटहर की उनवर पूछी, बर पीपर का बोलहिं छूछी ।—जायसी (शब्द०) ।

उनवान (१)
संज्ञा पुं० [सं० अनुमान, मि० उनमान] अनुमान । सोच । ध्यान । समझ ।

उनवान (२)
संज्ञा पुं० [अ०] शीर्षक । नाम [को०] ।

उनसठ (१)
वि० [सं० एकोनषष्ठि या ऊनषष्ठि, प्रा० अउमसटिठ] पचास और नौ ।

उनसठ (२)
संज्ञा पुं० अ० पचास और नौ की संख्या या अंक जो इस तरह लिखा जाता है—'५९' ।

उनसठि †
वि०, संज्ञा पुं० [सं० ऊनषष्ठि प्रा० अउणसटिठ] दे० 'उनसठ' ।

उनहत्तर (१)
वि० [सं० एकोनसप्तति, प्रा० अउणसत्तरि, अउणहत्तरि] साठ और नौ ।

उनहत्तर (२)
संज्ञा पुं० साठ और नौ की संख्या या अंक जो इस तरह लिखा जाता । है—'६९' ।

उनहत्तरि पु
वि०, संज्ञा पुं० [हि० उनहत्तर] दे० 'उनहत्तर' ।

उनहानि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उनुहरण] दे० 'उन्हानि' ।

उनहार पु
वि० [सं० अनुसार या अनुहार] सदृश । समान । उ०— अंगन में यौवन सुभग लसत कुसुम उनहार ।—शकुंतला, पृ० १५ ।

उनहारि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अनुहार] समानता । सादृश्य । एक- रूपता । उ०—(क) अपनी स्त्री की उनहारि सों हरिदास को पहिचाने ।— दो सौ बावन, भा० १, पृष्ठ २७० । (ख) गिरा गंग उनहरि काव्य रचना प्रेमाकर ।—श्रीभक्ति० पृ० ५५५ । (ग) रंचक कहि बलि पिय उनहारी ।—नंद० ग्रं०, पृ० १२८ ।

उनाना पु
क्रि० स० [सं० अव+नभ, प्रा० ओणम = नमाना, अवनत करना] १. झुकना । २. लगाना । मुहा०—कान उनाना = सुनने के लिये कान लगाना । उ०—पासा सरि कुअँर सब खेलहिं श्रीनंद गीत उनाहिं, चैन चाव तस देखा जनु गढ़ छेंका नाहिं ।—जायसी (शब्द०) । ४. आज्ञा मानना । कहने पर कोई काम करना ।

उनारना पु
क्रि० स० [हिं० उनरना] १. बढ़ाना । २. खिसकाना । ३. उठाना ।

उनासी पु
वि० [सं० ऊनाशिति] दे० 'उन्नासी' ।

उनि पु
सर्व० [हिं०] दे० 'उन' । उ०— नहि निकसत लाई बारा, उनि आवत ही फुफकारा ।—सुंदर० ग्रं० भा० १, पृ० १४२ ।

उनिहार पु
वि० [सं० अनुहार] दे० 'उनहार' । उ०—इनमें कृष्ण की उनिहार है ।—दो सौ बावन, भा० २, पृ० १३ ।

उनींदा
वि० [सं० उन्निद्र] [स्त्री० उनींदी] बहुत जागने के कारण अलसाया हुआ । नींद से भरा हुआ । नींद में माता हुआ । ऊँघता हुआ । उ०—(क) श्याम उनींदे जानि मातु रचि सेज बिछायो, तापै पौढ़ै लाल अतिह मन हरख बढ़ायो ।—सूर (शब्द०) । (ख) उठी सखी हँसि मिस करि कहि मृदु बैन, सिय रघुबर के भए उनींदे नैन ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २० । (ग) लटपटी पाग सिर साजत, उनींदे अंग द्विजदेव ज्यों त्यों कै सँभारत सबै बदन ।—द्विजदेव (शब्द०) ।

उनैना पु
क्रि० अ० दे० [सं० अवनमन या अवलम्बन] १. झुकना । २. छा जाना । उ०— आई उनै मुह में हँसी, कोहि तिया पुनि चाप सीहु भौंहु चढ़ाई ।—इतिहास, पृ० २५४ ।

उन्नईस पु
वि०, संज्ञा पुं० [सं० ऊनविंश, प्रा० अउणबीस] दे० 'उन्नीस' ।

उन्नत
वि० [सं०] १. ऊँचा । ऊपर उठा हुआ । २. वृद्धिप्राप्त । बढ़ा हुआ । समृद्ध । ३. श्रेष्ठ । बड़ा । महत् ।

उन्नतकोकिला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वाद्ययंत्र [को०] ।

उन्नतांश
संज्ञा पुं० [सं०] दूज के चंद्रमा का वह छोर जो दूसरे से ऊंचा हो । विशेष—फलित ज्योतिष में इसका विचार होता है कि चंद्रमा का बाँया छोर उन्नत है या दाहिना ।

उन्नति
संज्ञा स्त्री० [स>२. वृद्धि । समृद्धि । तरक्की । बढ़ती ।

उन्नतिशोल
वि० [सं०] उन्नति के लिये प्रयत्न करनेवाला । जिसके उन्नति करने की पूरी पूरी आशा हो [को०] ।

उन्नतोदर
संज्ञा पुं० [सं०] १. चाप या वृत्तखंड के ऊपर का तल । २. वह पदार्थ जिसका वृत्तखंड ऊपर की ओर उठा हुआ हो । जैसे, उन्नतोदर शीशा ।

उन्नद्ध
वि० [सं०] १. खूब बँघा हुआ । २. फूला हुआ । ३. बढ़ा हुआ । ४. अभिमानी । ५. अत्यंत [को०] ।

उन्नबी
संज्ञा पुं० [सं०] संकीर्ण राग का एक भेद ।

उन्नमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उठाने का कार्य । उठाना । ऊपर ले जाना । २. उन्नयन । उत्कर्ष । अभ्युदय [को०] ।

उन्नमित
वि० [सं०] १. उत्कर्षित । उन्नति किया हुआ । २. बढ़ाया हुआ । वर्धित [को०] ।

उन्नम्र
वि० [सं०] उठा हुआ । ऊँचा । उच्च [को०] ।

उन्नयन
वि० [सं०] १. आँखों ऊपर को करनेवाला । २. उन्नति— शील । नेतृत्व करनेवाला [को०] ।

उन्नस
वि० [सं०] ऊंची नासिकावाला । ऊँची नाकवाला [को०] ।

उन्नाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्कर्ष । विकास । उन्नति । २. ऊपर ले जाना । उठाना । ३. जोर का नाद या ब्द [को०] ।

उन्नहन
वि० [सं०] निबधि । अबाध [को०] ।

उन्नाब
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रकार का बेर जो अफगानिस्तान से सूखा हुआ आता है और हकीमी नुस्खों में पड़ता है ।

उन्नाबी
वि० [अ० उन्नाब+हिं० ई (प्रत्य०)] १. उन्नाब के रंग का । कालापन लिए हुए लाल । स्याही लिए हुए सुर्ख । सालो ।

उन्नाय
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उन्नाय] १. उच्चता । उत्थान । २. वितर्क । सोच विचार । ३. निष्कर्ष । परिमाण । ४. सादृश्य । सामान्यता । तद्रूपता [को०] ।

उन्नायक
वि० [सं०] [स्त्री० उन्नायिका] १. ऊँचा करनेवाला । उन्नत करनेवाला । २. बढ़ानेवाला । तरक्की देनेवाला ।

उन्नासी (१)
वि० [सं० ऊनाशीति, प्रा० अउणासीति] सत्तर और नौ । एक कम अस्सी ।

उन्नासी (२)
संज्ञा पुं० सत्तर और नौ की संख्या या अंक ।

उन्नाह
संज्ञा पुं० [सं० उत्—नह] १. उमार । अग्रभाग की ओर बढ़ाव । अतिवृद्धि । जैसे— स्तनोन्नाह । अतिशयता । आधिक्य । २. आगे की ओर निकला हुआ । ३. बाँधना । ४. अभिमान । घमंड । भांजी [को०] ।

उन्निद्र (१)
वि० [सं०] १. निद्रारहित । २. जिसे नींद न आई हो । जैसे— उन्निद्ररोग । ३. विकसित, खिला हुआ ।

उन्निद्र (२)
संज्ञा पुं० नींद न आने का रोग [को०] ।

उन्नीस (१)
वि० [सं० एकोनविंशति या उनविंष प्रा० एकोनवीसा, एकूनवीसा प्रा० अउणवीस] एक कम बीस । दस और नौ ।

उन्नीस (२)
संज्ञा पुं० दस और नौ की संख्या या अंक । मुहा०—उन्नीस बिस्वे (१) एक बीघे, बीस बिस्वे का उन्नीस भाग । (२) अधिकार बहुत अधिक संभव । उ०—उन्नीस बिस्वे तो उनके आने की आशा है । (३) अधिकांश । प्रायः, । जैसे, यह बात उन्नीस बिस्वे ठीक है । उन्नीस होना = (१) मात्रा में कुछ कम होना । थोड़ा घटना जैसे, उसका दर्द कल से कुछ उन्नीस अवश्य है । (मात्रा के संबंध में इस मुहावरे का प्रयोग केवल दशा सूचित करने के लिये होता है, जिसमें गुण का कुछ भाव आ जाता है ।) उन्नीस बीस होना = (१) मात्रा में कुछ कम होना । थोड़ा घटना । जैसे, कहिए इस दवा से आपका दर्द कुछ उन्नीस बीस है । (मात्रा के संबंध में इस मुहावरे का प्रयोग केवल दशा सूचित करने के लिये होता है जिसमें गुण का कुछ भाव आ जाता है) (२) गुण में घटकर होना । जैसे, यह कपड़ा उससे किसी तरह उन्नीस नहीं है । (२) आपत्ति आना । बुरी घटना का होना । ऐसी वैसी बात होना । भला बुरा होना । जैसे, क्यों पराए लड़के को अपने घर रखते हो कुछ उन्नीस बीस हो जाए तो मुश्किल हो । (दो वस्तुओं का परस्पर) उन्नीस बीस होना = एक का दूसरे से कुछ आच्छा होना । जैसे, मैंने दोनों धोतियाँ देखी हैं । कुछ उन्नीस बीस जरूर हैं । उन्नीस बीस का फर्क = बहुत ही थोड़ा अंतर ।

उन्नोसवाँ
वि० [हिं० उन्नीस+वाँ (प्र०)] गिनती में उन्नीस के स्थान पर पड़नेवाला । अठारहवें के बाद का ।

उन्नेता (१)
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञ करनेवाले सोलह श्रृत्विजों में से चौदहवाँ, जो तैयार सोमारस को ग्रहों या पात्रों में ढालता है ।

उन्नेता (२)
क्रि० १. उत्कर्ष या अद्भुदय करनेवाला या लानेवाला । २. ऊपर ले जानेवाला [को०] ।

उन्नैना पु
क्रि० अ० [सं० उन्नयन] झुकना । नत होना । उ०— लागि सुहाई हरफारचोरी । उन्नै रही केरा की घोरी ।— जायसी (शब्द०) ।

उन्मंथी
संज्ञा पुं० [सं० उन्मन्थ] कान का एक रोग जिसमें कान की लवें सूज आती हैं और उनमें खाज होती है । यह रोग कान के लव के छेद को आभूषण आदि पहनने के निमित्त बहुत बढ़ाने से हेता है ।

उन्मंथक (१)
वि० [सं० उन्मन्थक] १. मथनेवाला । २. गति देने— वाला [को०] ।

उन्मंथक (२)
संज्ञा पुं० कान का फूलना [को०] ।

उन्मंथक (३)
वि० १. मंथन करनेवाला । २. गति देनेवाला [को०] ।

उन्मकर
संज्ञा पुं० [सं०] मकर की आकृतिवाला कान का एक आभूषण [को०] ।

उन्मज्जक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का तपस्वी [को०] ।

उन्मज्जक (२)
वि० [सं०] पानी में डुबकी लगानेवाला । पानी से बाहर आनेवाला [को०] ।

उन्मज्जन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उन्मज्जनीय, उन्मज्जि] मज्जन या डूबने का उल्टा । निकलना । उठना ।

उन्मत्त (१)
वि० [सं०] [संज्ञा उन्मत्तता] १. मतवाला । मदांध । २. जो आपे में न हो । ३. पागल । बावला । सिड़ी । विक्षिप्त । यौ०—उन्मत्तप्रथलित, उन्मत्त प्रलाप = पागलों की बातचीत । अंडबंड और निरर्थक वचन ।

उन्मत्त (२)
संज्ञा पुं० १. धतूरा । २. मुचकुंद का पेड़ ।यौ०— उन्मत्त पंचक = धतूरा, बकुची, भाँग, जावित्रो और खस— खास इन पाँच मादक द्रव्यों का समुच्चय । उन्मत्तकस = पारा, गंधक, सोंठ, मिर्च और पीपल के संयोग से बनी हुई एक रसौषध जिसे नाक में नास देने से सन्निपात दूर होता है ।

उन्मत्तक
वि० [सं०] उन्मत्त । पागल [को०] ।

उन्मत्तकीर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] शिव । महादेव [को०] ।

उन्मत्तलिंगो
वि० [सं० उन्मत्तलिङ्गिंन्] उन्मत्त होना या पागलपन का बाहाना करनेवाला [को०] ।

उन्मत्तवेश
संज्ञा स० [सं०] शिव । रुद्र [को०] ।

उन्मत्तत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मतवालापन । पागलपन ।

उन्मथन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मथना । बिलोना । २. क्षुभित करना । ३. हिलना । ४. मारण । ५. फेंकना [को०] ।

उन्मथित
वि० [सं०] १. मथा हुआ । २. क्षुभित । ३. मिलाया हुआ । मिश्रित [को०] ।

उन्मद (१)
वि० [सं०] १. पागल करनेवाला । उन्मत्त बनानेवाला [को०] ।

उन्मद (२)
संज्ञा पुं० १. उन्माद । पागलपन । २. नशा [को०] ।

उन्मदन
संज्ञा पुं० [सं०] काम पीड़ित । प्रेम में मत्त । गंभीर प्रेम में अपने को बुला हुआ [को०] ।

उन्मदिष्णु
वि० [सं०] १. मत्त । मतवाला । २. मद चुआता हुआ (हाथी) [को०] ।

उन्मन
वि० [स०] अनमना । उदास । अन्यमनस्क ।

उन्मनस्क
वि० [सं०] १. खोए हुए मनवाला । अन्यमनस्क । २. व्याकुल । व्यग्र । ३. लालायित । ४. शोकमग्न [को०] ।

उन्मना
वि० स्त्री० [सं० उन्मनस्] दे० 'उन्मन' । उ०—शंकाएँ थां विकल करती काँपना था कलेजा, खिन्ना दीना परम मलिना उन्मना राधिका था—प्रिय०, पृ० ५१ ।

उन्मनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] खेचरी, भूचरी आदि हठयोग की पाँच मुद्राओं में से एक । इसमें दृष्टि को नाक की नोक पर गड़ाते हैं और भौं को ऊपर चढ़ाते हैं ।

उन्मयूख
वि० [सं०] चमकता हुआ । प्रकाशवान । तेजस्वी [को०] ।

उन्मर्द
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उन्मर्दन' [को०] ।

उन्मर्दन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मलना । २. रगड़ना । ३. एक सुगंधित द्रव्य जिसे शरीर में मलते हैं । ४. वायु का शुद्धिकरण [को०] ।

उन्माद
सं० पुं० [सं० उद्+मद्, 'चितविश्रयी'] [वि० उन्मादक, उन्मादी] १. पागलपन । बावलापन । विक्षिप्तता । चित्त—विभ्रम । वह रोग जिसमें मन और बुद्धि का कार्यक्रम बिगड़ जाता है । विशेष— वैद्यक के रनुसार भाँग, धतूरा आदि मदक द्रव्यों तथा प्रकृतिविरुद्ध पदार्थों के सेवन तथा भय, हर्ष शोक, आदि की अधिकता से मन वातादि दोषयुक्त हो जाता है और उसकी धारण शक्ति जाती रहती है । बुद्धि ठिकाने न रहना, शरीर का बल घटना, दृष्टि स्थिर न रहना आदि उन्माद के पूर्वरूप कहे गए हैं । उन्माद के छह मुख्य भेद माने गए हैं—वातो—न्माद, पित्तोन्माद, सन्निपातोन्माद, शोकोन्माद और विषोन्माद । आधुनिक पाश्चात्य चिकित्सकों के अनुसार जीवन के झंझट, विश्राम के अभाव, मादक द्रव्यों के सेवन, कुत्सित भोजन, घोर व्याधि, अधिक संतानोत्पत्ति, अधिक विषय भोग, सिर की चोट आदि से उन्माद होता है । डाक्टरों ने उन्माद के दो विभाग किए हैं : एक तो वह मानसिक विपर्यय जो मस्तिष्क के अच्छी तरह बढ़कर पुष्ट हो जाने पर होता है; दूसरा वह जो मस्तिष्क की बाढ़ के रुकने के कारण होता है । उन्माद प्रत्येक अवस्था के मनुष्यों को हो सकता है; पर स्त्रियों को २५ और ३५ के बीच ओर पुरुषों को ३५ और ५० के बीच अधिक होता है । २. रस के ३३ संचारी भावों में से एक, जिसमें वियोग आदि के कारण चित्त ठिकने नहीं रहता । यौ०—उन्मादग्रस्त ।

उन्मादक
वि० [सं०] १. चित्तविभ्रम उत्पन्न करनेवाला । पागल करनेवाला । २. नशा करनेवाला ।

उन्मादन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उन्मत्त करने का कार्य । मतवाला करने की क्रिया । २. कामदेव के पाँच वाणों में से एक ।

उन्मागन (२)
वि० उन्मत्त करनेवाला [को०] ।

उनमादी
वि० [सं० उन्मादिन्] [वि० स्त्री० उन्मादिनी] जिसे उन्माद हुआ हो । उन्मत्त । पागल बावला ।

उन्मान पु (२)
संज्ञा पुं० दे० 'अनुमान' ।

उन्मार्ग (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उन्मार्गी] १. कुमार्ग । बुरा रास्ता । २. बुरा ढंग । बुरी चाल । निकृष्ट आचरण ।

उन्मार्ग (२)
वि० [सं०] कुमार्ग पर चलनेवीली । बुरे चाल चलनेवाला [को०] ।

उन्मार्गी
वि० [सं० उन्मार्गिन्] [स्त्री० उन्मार्गिनी,] कुमार्गी । बुरी राह पर चलनेवाला । बुरे चाल चलन का ।

उन्मार्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. रगड़कर साफ करना । २. किसी दाग या धब्बे को मिटाना [को०] ।

उन्मार्जित
वि० [सं०] १. रगड़कर साफ किया हुआ । २. मलकर और धोकर धब्बे मिटा हुआ । शुद्ध । साफ [को०] ।

उन्मित
वि० [सं०] २. तौला हुआ । २. जिसकी माप की गई हो [को०] ।

उन्मिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] नापा हुआ । २. तौला हुआ [को०] ।

उन्मिष (१)
वि० [सं०] १. खिला हुआ । विकसित । २. खुला हुआ (नेत्र) [को०] ।

उन्मिष (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खोलना (आंखो का) । २. विकसित होना । खुलना । (जैसे, समल के फूल का) । ३. उठना या उगना । ४. चमकना । उद्दीप्त होना [को०] ।

उन्मिषित
वि० [सं०] १. खुला हुआ । २. फूला हुआ । विकसित ।

उन्मीलन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उन्मीलक, उन्मीलनाय, उन्मीलित] १. खुलना (नेत्र का) । २. विकसित होना । खिलना ।

उन्मीलना पु
क्रि० सं० [सं० उन्मीलन] १. खोलना २. विकसित करना । खिलाना [को०] ।

उन्मीलित (१)
वि० [सं०] खुला हुआ ।

उन्मोलित (२)
संज्ञा पुं० एक काव्यालंकार जिसमें दो वस्तुओं के बीच इतना अधिक सादृश्य वर्णन किया जाय कि केवल एक ही बात के कारण उनमें भेद दिखाई पड़े । उ०—डीठि न परत, सयान— दुति कनकु कनक सैं गात । भूषन कर करकस लगत परसि पिछाने जात । बिहारी र०, दो० ३३३ । यहाँ सोने के गहने और सोने के ऐसे शरीर के बीच कावल छूने से भेद मालूम होता है ।

उन्मुक्त
वि० [सं०] खुला हुआ । अच्छी तरह मुक्त । स्वच्छंद ।

उन्मुख
वि० [सं०] [स्त्री० उन्मुखी] १. ऊपर मुँह किए । ऊपर ताकता हुआ । २. उत्कंठा से देखता हुआ । ३. उत्कंठित । उत्सुक । ४. उद्यत । तैयार । जैसे; गमनोन्मुख । प्रसवोन्मुख । ५. शब्द करता हुआ । ध्वनित (को०) । ६. मुख से बाहर आता हुआ [को०] ।

उन्मुखर
वि० [सं०] बहूत मुखर । बहुत शोर मचानेवाला । अति— बाचाल [को०] ।

उन्मुग्ध
वि० [सं०] १. अत्यंत आसक्त । २. अतिशय मूर्ख । ३. व्यग्र । व्याकुल [को०] ।

उन्मुद्र
वि० [सं०] १. मुद्रारहित । जिसपर मुहर न लगी हो । २. नियंत्रणविहीन । ३. खिला हुआ [को०] ।

उन्मूलक
[सं०] उखीड़नेवाला । समूल नष्ट करनेवाला । ध्वस्त करनेवाला । बरबाद करनेवाला ।

उन्मूलन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उन्मूलक, उन्मूलनीय, उन्मूलित] १. जड़ से उखाड़ना । समूल नष्ट करना । ध्वस्त करना । मटियामेट करना ।

उन्मूलनीय
वि० [सं०] १. उखाड़ने योग्य । २. नष्ट करने योग्य ।

उन्मूलित
वि० [सं०] १. उखाड़ा हुवा । २. नष्ट किया हुआ ।

उन्मृष्ट
वि० [सं०] १. रगड़कर साफ किया हुआ । २. मिटाया हुआ । ३. शुद्ध किया हुआ [को०] ।

उन्मेदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्थूलता । मोटापन [को०] ।

उन्मेष
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उन्मिषित] १. खुलना (आँख का) । २. विकास । खिलना । उ०—समस्त चराचर में सामान्य हृदय की अनूभूति का जैसा तीव्र और पूर्ण उन्मेष करुणा में होता है वैसा किसी और भाव में नहीं ।—चिंतामणि, भाग २, पृ० ५७ । ३. थोड़ा प्रकाश । थोड़ी रोशनी ।

उन्ह पु †
सर्व० [हिं०] दे० 'उन' उ०—ता मधि पूरी ऐसी सोभा मैनों भँवर लपटता, उन्ह मधि उड़ि परे रंग मँजीठे ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३६४ । (ख) उन हुत देखै पायाऊँ दरस गोसाई केर ।—जायसी ग्रं० पृ० ८ ।

उन्हाँलागम पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्णकालागम प्रा० उण्हाल+सं० आगम] ग्रीष्म ऋतु । जेठ और असाढ ।—डिं० ।

उन्हाँला पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्णकाल, प्रा० उण्हाल] दे० 'उन्हाला' [को०] ।

उन्हानि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० उनहारि] समता । बराबरी । उ० — इंदु, रवि, चंद्र न, फणीद्रं न, मुनींद्र न, नरेंद्र न, नगेंद्र गति जानै जग जैनी की । देव, ब्रज दंपति सुहाग भाग संपति की सुख की उन्हानि ये करै न एक रैनी की ।—इसलिये हुआ कि उस बालक की और तुम्हारी उन्हार बहुत मिलती है । शकुं०, पु० १४१ ।

उन्हारि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अनुहार] १. समता । तुल्यता । आकृति— गत एकता । २. किसी वस्तु या व्यक्ति के समान वनी हुई वस्तु या व्यक्ति [को०] ।

उन्हारी †
संज्ञा पुं० [बुंदेलखंडी— हिं० उण्हाला] फगुन, चैत पोर वैशाख में तैयार होनेबाली फसल, जिसे 'रबी' कहते हैं ।

उन्हाला पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्णकाल, प्रा० उण्हाल] गर्मीं का मौसम । ग्रीष्मकाल ।

उपग
संज्ञा पुं० [सं० उपाड्गया उप+अंग] १. एक प्रकार का बाजा । नसतरगं । उ० —(क) चंग उपंग नाद सुर तूरा । मुहर बंस बाजे भल तूरा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) उघटन स्याम नृत्यति नारि । धरे अधर उपंग उपजैं लेत हैं गिरिधारि ।— सूर० १० ।१०५६ । २. उद्धव के पिता ।

उपंत पु
वि० [सं० उत्पन्न, प्रा० उत्पन्न हिं० उपन] उत्पन्न, पैदा । उ० —तरवर झरहिं, झरहिं बन ढाखा । भई उपंत फूल कर साखा । । जायसी (शब्द०) ।

उपँद पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उपंग२' । उ० —हरि गोकुल की प्रीति चलाई, सुनई, सुनहु उपँग सुत मोहिं न बिसरत ब्रजबासी सुखदाई ।—सूर० १० ।३४२२ ।

उप
उप० [सं०] यह उपसर्ग जिन शब्दों के पहले लगता है उनमें इन अर्थों कि विशेषता करता है : समीपता, जैसे—उपकूल, उपनयन, उपगमन । सामर्थ्य (वास्तव में आधिक्य) जैसे— उपकार, गौणता या न्यूनता, जैसे—उपकीर्ण ।

उपइया †
संज्ञा पुं० [सं० उपाय—देश० उपैया या उपइया] ढंग । तरिका । उपाय ।

उपकंठ (१)
संज्ञा पुं० [सं० उपकण्ठ] १. समीपता । २. गांव का छोर । ३. घोड़े कि एक चाल, जेसे सरपट चाल कहते हैं । इस चाल में वेग की अधिकता और त्वरा दर्शनीय होती है । किसी दूरस्थ स्थान पर शीघ्र पहुँचने के लिये सवार घोड़े को इसी चाल से दौड़ाता है ।

उपकंठ (२)
वि० १. पास का । सामीप रहनेवाला । २. निकट [को०] ।

उपकथन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रत्युत्तर । किसी के कथन के उत्तर में कही गई बात । २. अपने पूर्वकथन के समर्थन में कही गई बात । ३. आलोचना [को०] ।

उपकथा
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसंगिक कथा । मुख्य कथा के प्रसंग में आ जनेवाली गौण कथा जो मुख्य कथा को और सजीवबना देने का कार्य करती है । २. लघु आख्यायिका । छोटी कहानी [को०] ।

उपकनिष्ठिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सवसे छोटी उँगली के पास की उँगली । अनामिका ।

उपकन्या
संज्ञा स्त्री० [स०] पुत्री की सखी ।

उपकन्यापुर
संज्ञा पुं० [सं०] अंतःपुर के समीप । जनानखाने के पास [को०] ।

उपकारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. साधक वस्तु । सामग्री । सामान । २. राजाओं के छत्र चँवर आदि राजचिह्न । ३. राजसेवक । राजा के नौकर चाकर (को०) ।४. दूसरे का हित करना । सेवा करना । सहायता देना (को०) । ५. उपकार या भलाई करना (को०) । ६. यंत्र । और (को०) ७ आजीविका । साधन (को०) ।८. राजा के छत्र चामर आदि (को०) । ९. राजा के सेवक या अनुचर (को०) ।

उपकरना पु
क्री० स० [सं०] उपकार करना । भलाई करना । उ० —(क) युक्ते साँठ गाँठ जो करे, साँकर परे सोइ उपकरे ।—जायसी (शब्द) । (ख) जहाँ परस्पर उपकरत तहाँ परस्पर नाम । बरनत सब ग्रंथनि भते कवि कोबिद मतिराम ।— मतिराम (शब्द०) ।

उपकर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सुनना [को०] ।

उपकर्ण (२)
क्रि० वि० कान के पास । कान में [को०] ।

उपकर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्रवण करना । २. कान देना [को०] ।

उपकर्णिका
संज्ञा पुं० [सं०] लोकावाद । जनश्रुति । अफवाह [को०] ।

उपकर्ता
संज्ञा पुं० [सं० उपकर्तृ] [स्त्री० उपकर्त्री] उपकार करने— वाला । भलाई करनेवाला ।

उपकर्म
संज्ञा पुं० [सं० उपकर्मन्] उपनयन संस्कार में बटु का सिर सूँ घने का शास्त्रविहित कृत्य [को०] ।

उपकर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपकार्या' [को०] ।

उपकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] समीप खींचना । पास लाना [को०] ।

उपकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] २. आभूषण ।२. धन संपत्ति । ३. सामग्री । साज सामान [को०] ।

उपकल्पन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बनाना । प्रस्तुत करना । २. तैयारी करना । आयोजन [को०] ।

उपकल्पना
संज्ञा स्त्री० [सं०] निश्चय करना । मन में स्थिर करना । २. बनाना । आविष्कार करना । ३. तैयार करना [को०] ।

उपल्पित
वि० [सं०] १. प्रस्तुत । तैयार । २. परिकल्पित । आयो— जित [को०] ।

उपकार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपकारक, उपकारी, उपकार्य, उपकृत] १. भलाई । हितसाधन । नेकी । क्रि० प्र०—करना, मानना = की हुई भलाई को याद रखना । कृतज्ञ होना । यौ०—कृतोपकार । परोपकार । २. लाभ । फायदा । जैसे—इस औषधि ने बड़ा उपकार किया (शब्द०) । ३. समारंभ । तैयारी (को०) । ४. आभूषण । अलं— कार (को०) । ५. पर्व या उत्सव के अवसर पर द्वारशोभा के लिये बंदनवार बनाना, विशेषतया फूलों और मालाओं द्बारा (को०) ।

उपकारक
वि० [सं०] [स्त्री० उपकारिका] १. उपकार करनेवाला । भलाई करनेवाला । २. लाभप्रद (को०) ।

उपकारिका (१)
वि० [सं०] उपकार करनेवाली ।

उपकारिका (२)
संज्ञा स्त्री० १. राजभवन । २. खेमा । तंबू । पटगृह । शिबिर । ३. उपकार करनेवाली स्त्री । ४. मिष्टान्न विशेष [को०] ।

उपकारिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भलाई । २. प्रयोजन की सिद्धि ।

उपकारी (१)
वि० [सं० उपकारिन्] [स्त्री० उपकारिणी] १. उपकार करनेवाला । भलाई करनेवाला । २. लाभ पहुँचानेवाला । फायदा पहुँचानेवाला । उ०—ससि संपन्न सोह महि कैसी । उपकारी कै सपति जैसी—मानस, ४ ।१५ ।

उपकारी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपकारिका' [को०] ।

उपकार्य
वि० [स०] [वि० स्त्रि० उपकार्या] उपकार किए जाने योग्य । जिसके साथ उपकार करना उचित हो ।

उपकार्या (१)
वि० [सं० उप—कार्या] जिस (स्त्री) के साथ उपकार करना उचित हो ।

उपकार्या (२)
संज्ञा स्त्री० १. खेमा । तंबू । पटगृह । २. राजभवन । शाही— महल [को०] ।

उपकिरण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विकिर्ण करना । फैलाना । छितरा देना । २. फेंक देना । ३. ढकना । ४. गढ़ना [को०] ।

उपकिरण (२)
क्रि० वि० किरणों के पास (को०) ।

उपकोर्ण
वि० [स०] १. ढका हुआ । २. फेका हुआ । विकिर्ण [को०] ।

उपकुंचि
संज्ञा स्त्री० [सं० उपकुञ्चि] दे० 'उपकुंचिका' [को०] ।

उपकुंचिका
संज्ञा पुं० [सं० उपकुञ्चिका] १. छोटी इलायची । २. कालाजीरा [को०] ।

उपकुर्वाण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्माचारियों के भेदों में से एक । वह ब्रह्मचारी जो स्वाध्याय पूरा कर गुरु दक्षिणा देकर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करे; अर्थात् यावज्जीवन ब्रह्माचारी न रहे ।

उपकुर्वाण (२)
वि० उपकार करनेवाला [को०] ।

उपकुल्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. खाई । परिखा । २. नहर । ३. पिप्पली या पीपारि [को०] ।

उपकुश
संज्ञा पुं० [सं०] मसूड़ीं का एक रोग, ज्समें दाँत हिलने लगते हैं, उनमें मंद मंद पीड़ा होती है ।

उपकूजित
वि० [सं०] १. प्रतिध्वनित । २. प्रतिध्वनिपूर्ण [को०] ।

उपकूप
संज्ञा पुं० [स०] छोटा कुँआ । वह कुँआ जो ईंट पत्थर से नहीं वँधा होता, कच्चा ही रहना है । पोंडा (देश०) [को०] ।

उपकूल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. किनारा । तट । २. तट के पास की भूमि । तीर के पास की जमीन ।

उपकूल (२)
क्रि० वि० तट पर स्थित । तट के पास [को०] ।

उपकृत
वि० [सं०] १. जिसके साथ उपकार किया गया हो । जिसके साथ भलाई की गई हो । उपकारप्राप्त २. कृतज्ञ । एहसान— मंद ।

उपकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपकार । भलाई ।

उपकृती
वि० [सं० उपकृतिन्] उपकारी । दूसरे का हित करने— वाला [को०] ।

उपक्रंता
वि० [सं० उपक्रन्तृ] शुरू करनेवाला । आरभं करनेवाला [को०] ।

उपक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्यारंभ की पहली अवस्था । प्रथमा— रंभ । अनुष्ठान । उठान । २. किसी कार्य को आरंभ करने के पहले का आयोजन । योजना । तैयारी । क्रि० प्र०—करना । ३. भूमिका । तमहीद । क्रि० प्र०—बाँधना । ४. चिकित्सा । इलाज । ५. समीप जाना (को०) । ६. प्रस्तावना । पूर्ववचन (को०) । ७ . शुश्रूषा (को०) ।८. सत्य का परीक्षण या सचाई की जाँच (को) । ९. वह संस्कार जो वेदारंभ के पूर्व किया जाता था [को०] ।

उपक्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उपक्रमणी] १. आरंभ । अनुष्ठान । २. आयोजन । तैयारी ३. भूमिका । तमहीद । ४. चिकित्सा । इलाज (को०) । ५. समीप जाना (को०) ।

उपक्रमणिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी पुस्तक के आदि में दी हुई विषयसूची । किसी पुस्तक के विषयों का संक्षिप्त विवरण । २. एक पुस्तक जिसमें वेद के मंत्रों और सूक्तों के ऋषि, छंद और देवता लिखे रहते हैं ।

उपक्रमणीय
वि० [सं०] १. पास जाने योग्य । २. आरंभ करने योग्य । ३. रोगी के परिचारक से संबंधिन । औषधि विषयक काम [को०] ।

उपक्रमिता
वि० [सं० उपक्रमितृ] उपक्रम करनेवाला । २. आरंभ करनेवाला । २. चिकित्सा करनेवाल । पास जानेवाला । ३. सत्यता की परख या मौलिकता की जाँच करनेवाला ।४. विहित संस्कार करनेवाला [को०] ।

उपक्रांत
वि० [सं० उपक्रान्त] २. शुरू किया हुआ । आरब्ध । २. जिसके पास जाया जा चुका है । ३. दया किया हुआ । चिकि— त्सित । [को०] ।

उपक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपकार । हित । भलाई [को०] ।

उपक्रीडा
संज्ञा स्त्री० [सं०] खेल का मैदान । खेलने का स्थान [को०] ।

उपक्रीत
वि० [सं०] पोष्य । पालन पोषण किया हुआ (पुत्र) ।

उपक्रुष्ट (१)
वि० [सं०] १. निंदित । २. झिड़की खाया हुग्र । फटकारा हुआ [को०] ।

उपक्रुष्ट (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक नीच जाति । २. बढ़ई [को०] ।

उपक्रोश
संज्ञा पुं० [सं०] १. निंदा । २. झिड़की [को०] ।

उपक्रोशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. निंदा करना । २. झिड़कना । कोसना [को०] ।

उपक्रोष्टा (१)
वि० [सं० उपक्रोष्टृ] निंदक । दोष लगनेवाला [को०] ।

उपक्रोष्टा (२)
संज्ञा पुं० गधा । गर्दभ [को०] ।

उपकिलन्न
वि० [सं०] १. भीगा हुआ । गीला । २. सडा हुआ [को०] ।

उपक्लेष
संज्ञा पुं० [सं०] १. बौद्ध धर्मनुसार लघु क्लेश । हलका दुःख । २. क्लेशों का कारण (को०) । उ०—इस प्रकार समाहित, परिशुद्ध, पर्यवदात निर्मल विगत उपक्लेश चित से पूर्वभय की अनुस्मृति का ज्ञान प्राप्त किया ।—हिंदू० सभ्यता—२४० ।

उपक्वण
संज्ञा पुं० [सं०] वीणा बाद्य की ध्वनि [को०] ।

उपक्वाण
संज्ञा पुं० [स०] देखो 'उपक्वण' [को०] ।

उपक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] धीरे धीरे होनेवाला क्षय । क्रमशः क्षीण होना [को०] ।

उपक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. अभिनय के आरंभ में नाटक के समस्त वृत्तांत का संक्षेप में कथन । २. आक्षेप । ३. आरंभ (को०) । ४. चर्चा (को०) । ५. फेंकना । उल्लेथ या चर्चा (को०) ।

उपक्षेपण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेंकने की क्रिया या भाव । २. आक्षेप या कटाक्ष करना । ३. संकेत । ४. उपेक्षा । ५. शूद्र का अन्न पकाने के लिये ब्राह्मण के घर देना [को०] ।

उपखंड
संज्ञा पुं० [सं० उपखण्ड] १. खंड का लघु खंड । २. किसी धारा अथवा उपधारा का छोटा भाग ।

उपखान पु
दे० 'उपख्यान' । उं—यह उपखान साँच है भाई ।— नंद० ग्र०, पु० १२७ ।

उपगंता
संज्ञा पुं० [सं० उपगन्तृ] १. पहुचनेवाला । २. स्वीकार करनेवाला । ३. जानकार । जाननेवाला । ४. ज्ञान रखनेवाला (को०) ।

उपगत
वि० [सं०] १. प्राप्त । उपस्थित । सामने आया हुआ । २. ज्ञात । जाना हुआ । ३. स्वीकार किया हुआ । अंगिकार किया हुआ ।४. जो हुआ हो । घटित (को०) । ५. मिला हुआ । प्राप्त (को०) । ६. गया हुआ (को०) ७. दिवंगत । मृत (को०) ।

उपगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्राप्ति । स्वीकार । २. ज्ञान ३. पास जाना । समीप गमन (को०) ।

उपगम
संज्ञा पुं० [सं०] १. पास जाना । २. परिचय । ज्ञान । ३. प्राप्ति । ४. संभोग । ५. साथ । समागम । ६. अनुभूति । ७. बचन । वादा । ८. स्वीकृति । ९. संपन्न करना [को०] ।

उपगमन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपगंतृ] १. पास जाना । २. स्वीकार । ३. ज्ञान । ४. जाना । गमन करना (को०) ।

उपगाता
संज्ञा पुं० [सं० उपगातृ] यज्ञ के ऋत्विजों में एक, जो गाने में उद्राता का साथ देता है ।

उपगामी
वि० [सं० उपगामिन्] जो उपगमन करे [को०] ।

उपगार पु
संज्ञा पुं० [सं० उपकार = सहायता, प्रा० उवायर, भलाई हित करना] दे० 'उपकार' उ०—दादू सतगुरु सहज मैं, कीया वह उपगार, निरधन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ।—दादू० पु० २ ।

उपगारी पु
वि० [सं० उपकारी, प्रा० उवापार] दे० 'उपकारी' [को०] ।

उपगिरि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बाहरी शृंखला या उपत्यका । बाह्य शृंखला । विशेष—इस चौड़ाई में फैले पहाड़ पहाड़ियाँ नीचे से ऊपर तीनदजों में बाँडे जाते हैं, जिन्हें क्रम से बाहारी शृंखला, भीतरी शृंखला और गर्मशृंखला अथवा उपत्यका, छोटा हिमालय और बड़ा हिमालय कहते हैं । हमारे पुरखे भी इस भेद को पहचानने थे और इन शृंखलाओं को क्रम से उपगिरि, बहिर्गिरि और अंतर्गिरि कहते थे ।—भारत० नि० पृ० ११० ।

उपगिरि (२)
क्रि० वि० [सं०] पर्वन के निकट [को०] ।

उपगीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आर्या छंद का एक भेद जिसके विषम पदों में १२ और सम पदों में १५ मात्रएँ होती हैं । अंत में एक गुरु होता है । विषम गणों में जराण न होना चाहिए । इसका दूसरा नाम 'गाहू' भी है । उ०—रामा रामा रामा आठौ जामा जपै रामा । छांड़ौ सारे कामा पैहौ अंतै सुविश्रामा । —छंद०, पु० ९६ ।

उपगुप्त
वि० [सं०] गुप्त किया हुआ । छिपाया हुआ [को०] ।

उपगुरु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सहायक अध्यापक [को०] ।

उपगुरु (२)
क्रि० वि० अध्यापक के पास या समीप [को०] ।

उपगूढ़ (१)
वि० [सं० उपगूढ़] १. दिया हुआ । २. आलिंगित । मिला हुआ ।३. पकड़ा हुआ । गृहीत ।४. दबाया हुआ [को०] ।

उपगूढ़ (२)
संज्ञा पुं० आलिंगन [को०] ।

उपगूहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. आलिंगन । उ०—तरंगों ने अपने हाथों में उपगूहन कर लिया ।—श्यामा०, पु० १४२ ।

उपग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. गिरफ्तारी । २. कैद । ३. बंधुआ । कैदी । ४. अप्रधान ग्रह । छोटा ग्रह । विशेष—ग्रहों की पुरानी गणना में राहु केतु आदि उपग्रह माने गए हैं । ५. फलित ज्योतिष में सूर्य जिस नक्षत्र के हों उससे पाँचवाँ (विद्युन्मुख), आठवाँ (शून्य), चाँदहवाँ (सान्निपात) अठारहवाँ (केतु), इक्कीसवाँ (निर्घात) नक्षत्र भी उपग्रह कहलाता है । ६. वह छोटा ग्रह जो अपने बड़े ग्रह के चारों ओंर घूमता है । जैसे,—पृथ्वी का उपग्रह चंद्रमा । ७. बहुयांत्रिक ग्रह जिसे राँकेट की सहायता से अंलरिक्ष में पहुँचाते हैं एवं जो पृथ्वी की आर्कषण शक्ति की सीमा के बाहर एक स्वतंत्र कक्षा में भ्रमण करने लगता है । ७. रार । पराजय (को०) । ८. कृपा । अनुग्रह (को०) ।९. बढ़ावा । प्रोत्साहन (को०) १०. कुश की राशि (को०) ।

उपग्रहण
संज्ञा० पुं० [सं०] १. हथेली में ली हुई चीज को गिरने या टपकने से बचाने के लिये उसके नीये दूसरी हथेली लगा देना । २. गिरफ्तार करना । कैद करना । ३. संस्कार पूर्वक अध्य- यन । पढ़ना । २. संभालने का कार्य (को०) ।

उपग्रहसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० उफ्ग्रह सन्धि] सर्वस्व देकर बिजेता से की जानेवाली संधि [को०] ।

उपग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपहार । २. उपहार या भेंट देना [को०] ।

उपग्राह्य
संज्ञा० पुं० [सं०] १. भेंट । उपहार । २. राजा अथवा किसी महापुरुष की दिया जानेवाला उपहार । नजराना [को०] ।

उपधान
संज्ञा० पुं० [सं०] [वि० अपधातक, उपघाती] १. नाश करने की क्रिया । २. इंद्रियों का अपने अपने काम में असमर्थ होना । अशक्ति । ३. रोग । व्याधि । ४. इन पाँच पातकों का समूह- उपपातक, जातिभ्रं शीकरण, संकरोकरण, अपात्रीकरण, अपात्रीकरण, मलिनीकरहणा ।—स्मृति । ५ । आघात । प्रहार (को०) । ६. आक्रमण । हमला (को०) ।

उपघातक
वि० [स०] [स्त्री० उपघातिका] १. नाशकारक । २. पीड़ा देनेवाला ।

उपघातो
वि० [सं० उपघातिन्] [स्त्री उपघातिनी] १. नाश— कारी । १. पीड़ा पहुँचानेवाला ।

उपघ्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. आश्रय । सहारा । २. शरण [को०] ।

उपच
संज्ञा स्त्री० दे० 'उपज१' । उ०—क्या आखिर हुआ क्या, फिर कोई उपच की ली । सैर०, पु० ९३ ।

उपचय
संज्ञा पुं [सं०] [वि० उपचयित, उपचित] १.वृद्धि । उन्नति । बढ़ती । २.संचय । जामा करना । ३.कुंढली में लग्न से तीसरा, छठा, दसवाँ या ग्याहरवाँ स्थान । ४.चुनना । चयन (को०) । ५.ढेर । राशि । अंबार (को०) ।

उपचर
संज्ञा पुं [सं०] उपचार । दवा । इलाज [को०] ।

उपचरण
संज्ञा पुं [सं०] [वि० उपचारित, उपचर्य] १. पास जाना । पहुँचना । २. सेवा पूजा करना । ३. चिकित्सा करना । शुश्रूषा करना (को०) ।

उपचारित
वि० [सं०] १. सेवित । पूजित । लक्षण से जाना हुआ ।

उपचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा (रोगी की) । २. चिकित्सा ।

उपचायी
वि० [सं० उपचायिन्] उपचय करनेवाला । बढ़ानेवाला । [को०] ।

उपचाय्य
पुं० [सं०] १. यज्ञ की अग्नि । यज्ञाग्नि के संग्रह करने का कुंड [को०] ।

उपचार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपचारक, उपचारी, उपचारित, औपचारिक] १. व्यवहार । प्रयोग । विधान । २. चिकित्सा । दवा । इलाज । उ०—ग्रह ह्रहीत पुनि बात बस, तेहि पुनि बीछी मार । ताही पियाइअ बारुनी, कहहु कौन उपचार ।— मानस, २ । दो० १८० । ३. सेवा । तीमारदारी । ४. धर्मा- नुष्ठान । ५. पूजन के अंग या विधान जो प्रधानतः सोलह माने गय हैं जैसे,—आवाहन, आसन, अर्घपाघ, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्राभरण, यज्ञोपवीत, गंध, (चदन), पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, परिक्रमा, बंदना । उ०—कै पूजन को उपचार लै चाहाति मिलन मन मोहुई ।—भारतेंदु ग्रं०, भाग १, पु० ४५५ । यौ०—षोड़ोशपचार । ६. किसी को संतुष्ट करने के लिये उसके मुहँ पर झूठ बोलना । खुशामद । ७. घूम । रिश्वत । ८. एक प्रकार की संधि जिसमें विसर्ग के स्थान पर श या स हो जाता है जैसे, —निःछल से निश्छल । निःसन्देह से निस्सदेह । ८. सामवेद का एक परिशिष्ट ।

उपाचारना पु
क्रि० सं० [सं० उपचार] १. व्यवहार में लाना । काम में लाना । २. विधान करना । उ०—घर घर तें आईब्रजसुंदरि मंगल साज सँवारे । हेम कलस सिर पर धारि पूरन काम मंत्र उपचारे ।—सूर० (शब्द०) ।

उपचारक (१)
वि० [स्त्री० उपचारिका] १. उपचार करनेवाला । सेवा करनेवाला । २. विधान करनेवाला । चिकित्सा करनेवाला । दवा करनेवाला ।

उपचारक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] आजिजी । वीनितता । नम्मता [को०] ।

उपचारच्छल
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय में विकल्प या विरुद्ध कार्य के निदार्शन द्वारा सद्भाव या अभिप्रेत अर्थ का निषेध करना । जैसे,—वादी ने कहा कि गद्दी से हुकुम हुआ'; इस पर प्रतिवादी कहे कि 'गद्दी जड़ है कैसे हुकुम दे सकती है?' तो यह उसका उपचारच्छल है ।

उपचारछल
संज्ञा पुं० [सं०] वादी के कहे वाक्य में जान बूझकर अभिप्रेत अर्थ से भिन्न अर्थ की कल्पना दूषण निकालना, जैसे,—किसी ने कहा कि 'ये नव (नौ) कंबल है' इसपर दूसरा कहे 'वाह ये नए कहा है?'

उपचारना पु
क्रि० सं० [सं० उपचार से नाम०] १. व्हवहार में लाना । काम में लाना । २. विधान करना । उ०—घर घर ते आई ब्रजसुंदरी मंगल साज सँवारे, हेम कलम सिर पर धरि पूरन काम मंत्र उपचारे ।—सूर (शब्द०) ।

उपचारी
वि० [सं० उपचारिन्] [वि० स्त्री उपचारिणी] १. उपचार करनेवाला । सेवा करनेवाला । २. चिकित्सा या इलाज करनेवाला ।

उपचार्य (२)
वि० [सं०] १. उपचार या सेवा के योग्य । २. चिकित्सा के योग्य ।

उपचार्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] चिकित्सा ।

उपचित (१)
वि० [सं०] १. बढ़ा हुआ । समृद्ध । २. संचित । इक़ट्ठा । ३. शक्तिमान् (को०) । ४. ढका हुआ । आवरण में लिपटा हुआ (को) । ४. जला हुआ । दग्ध (को०) ।

उपाचिति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संग्रह । राशि । २. वृद्धि । ३. प्रतिष्ठा । ४. लाभ [को०] ।

उपचित्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक वर्णर्ध समवृत जिसके विषम चरणों में तीन सगण और एक लघु तथा एक गुरु हो एवं सम चरणों में तीन भगण और दो गुरु हों । जैसे,— करुणानिधि माधव मोहना । दीनदयाल सुनो हमारी जू । कमलापति यादव सोहना । मैं शरणागत हौं तुम्हारी जू ।—छंद०, पु० २६९ ।

उपाचित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चित्रा नक्षत्र के पास के नक्षत्र, हस्त और स्वाती । दंती वृक्ष । ३. मूसाकानी का पौधा । ४. १६ मात्राऔं का एक छंद जिसमें आठ मात्रा के बाद एक गुरु होता है और अंत में भी गुरु होता है । यह एक प्रकार की चौपाई है । जैसे, मोरी सुनु चित दै रघुबीरा, करु दाया मो पै बलबीराँ ।—छंद०, पृ० ४५ ।

उपचूलन
संज्ञा पुं० [सं०] गर्म करना । जलाना [को०] ।

उपचेतन
संज्ञा पुं० [सं० उपवेतना] मन का एक भाग । चेतन और अचेतन से भिन्न मानस के बीच की एक अवस्था । उ०— यह क्षितिज पार के स्वर्ण स्वप्न, यह कला अछूती उपचेतन । कैसे जग को अपना सकती, कैसे उसके मन को जँचती ।— प्रलय सृजन पृ० १२ । विशेष—व्यक्त चेतना को दो भागें में विभाजित किया जाता है ।—केंन्द्रीय भाग और सीमांत भाग अथवा चेतना की कोर । सीमांत भाग या चेतना की कोर का ही नाम उपचेतन या अवचेतन है । इस भाग में विचार भाव और अनुभव रहते हैं । जिनके विषय में हमें अभी, इस स्थल पर तो कोई ज्ञान नहीं है, पर चेष्टा करते ही हमें उसका ज्ञान हो सकता है ।

उपचेतना
संज्ञा स्त्री० [सं०] अंतःसंज्ञा । अंतश्चेतना । ऊपरी चेतना के भीतर स्थित चेतन शक्ति [को०] ।

उपचेय
वि० [सं०] इकट्ठ करने योग्य । संग्रह योग्य करने योग्य [को०] ।

उपच्छंद
संज्ञा पुं० [सं० उपच्छेन्द] १. फुसलाना । बहकाना । २. मेल करना । ३. आवरण । ढक्कन । ४. प्रार्थना [को०] ।

उपच्छंदन
संज्ञा पुं० [सं० उपच्छदन] २. फुसलाने या बहलाने की क्रिया या भाव । २. निमंत्रित करना । ३. अपनी राय में मिलाना [को०] ।

उपच्छंदिन
वि० [सं० उपच्छन्दित] १. लालच दिखाकर फुसलाया हुआ । २. अपने मत में मिलाया हुआ [को०] ।

उपच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] ढक्कन । आवरण । चद्दर [को०] ।

उपच्छन्न
वि० [सं०] ढका हुआ । छिपाया हुआ [को०] ।

उपज
संज्ञा स्त्री० [सं० उत्त+पद् या उत्पाद्य प्रा० उप्पज्ज] १. उत्पत्ति । उद्भव । पैदावार । जैसे, इस खेत की उपज अच्छी है । विशेष—इसका प्रयोग बड़े जीवों के संबंध में नहीं होता, विशेषकर वनस्पति के संबंध में होता है । २. मन में आई नई बात । नई उक्ति । उदभावना । सूझ । जैसे, यह सब कवियों की उपज है । ३. मन में गढ़ी हुई बात । मनगढंन । मुहा०—उपज की लेना = नई उक्ति निकालना । ४. गाने में राग की सुंदरता के लिये उसमें बँधी हुई तानें के सिवा कुछ तान अपनी ओर से मिला देना । सितार बजानेवाले इसे मिजराब कहते हैं । उ०— धरे अधर उपंग उपजै लेत हैं गिरिधारि ।— सूर (शब्द) । क्रि० प्र०—लेना ।

उपजगती
संज्ञा स्त्री० त्रिष्टत् छंद का एक भेद या प्रकार, जिसके तीन चरणों में ग्यारह की जगह बारह वर्ण होते हैं [को०] ।

उपजत पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] उपज । पैदावार [को०] ।

उपजन
संज्ञा पुं० [सं०] २. वृद्धि । संवर्धन । २. अनुबंध । संबंध । ३. किसी शब्द के निर्माणार्थ एक अक्षर और जोड़ देना । ४. संयुक्त वर्णा । ५. शरीर देह [को०] ।

उपजनन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्पन्न करना । पैदा करना । प्रजनन [को०] ।

उपजना
क्रि० अ० [सं० 'उत्पद्यते,' विकरयुक्त 'उत्पद्य' से प्रा० उपज्ज, उपज्ज, उपज+ना] उत्पन्न होना । उगना । उ०— जेहि जल उपजे सकल सरिरा, सो जल भेद जान कबीरा । —कबीर (शब्द) । (ख) खेन में उपजै सब कोई खाय, घर में उपजे घर बहि जाय ।— पहेली (शब्द०) । बिनसइ उपजइ ज्ञान जिमि पाइ कुसंग सुसग ।— मानस । ४ । दो० १५ । विशेष—गद्य में इस शब्द का प्रयोग बड़े जीवो के लिये नहीं होता है । जड़ और वनस्पति के लिये होता है । पर पद्य में इसका व्यवहार सबके लिये होता है । उ०—जिमि कुपूत के उपजे कुल सद्धर्म नमाहिं ।— मानस, ४ । दो० १५ ।

उपजप्त
वि० [सं०] १. कानाफूसी से बहकाया हुआ । २. कान में धीरे से बुद्ध भेद की बात कहकर विद्रोह के लिये उकसाया गया [को०] ।

उपजाऊ
वि० [हिं० उपज+आऊ (प्रत्य०)] जिसमें अच्छी उपज हो । जिसमें पैदावार अच्छी हो । उर्वर । जरखेज । यौ०उपजाऊ भूमि ।

उपजाऊपन
संज्ञा पुं० [हिं० उपजाऊ+पन] उर्वरता । उपजाऊ होने का भाव [को०] ।

उपजात
वि० [सं०] १. उत्पन्न किया हुआ । २. क्रुद्ध किया हुआ । आविष्ट किया हुआ [को०] ।

उपजाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वे वुत्त जो इंद्रवज्रा और उपेंद्रवज्रा तथा इंद्रवंशा और वंशस्थ के मेल से बनते हैं । इंद्रवज्रा और उपेंद्रवज्रा के मेल से १४ वृत्त बनते हैं—कीर्ति, वाणी, माला शाला हँसी, माया, जाया, बाला, आर्दा, भद्रा, प्रेमा, रामा, ऋद्धि और सिद्धि । कहीं कहीं शार्दूलाविक्रीड़ित और स्रग्धरा के योग भी उपजाति बनती है ।

उपजाना
क्रि० सं० [हि० उपजना का सकर्मक रूप] उत्पन्न करना । पैदा करना । विशेष—गद्य में इसका प्रयोग विशेषतः जड़ और वनस्पति के लिये होता है, बड़े जीवों के लिये नहीं । पर पद्य सवके लिये होता है । उ०—(क) भलेउ पोच सब विधि उपजाए । मानस १ । दो० ६ । (ख) पिय पिय रटै पपिहुरा रे हिय दुख उपजाव ।—विद्यापति, पृ० ५४४ ।

उपजाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. रहस्य की बात जो धीरे धीरे कान में कही जाय । २. विरोध का बीज बोना । ३. भड़काना । ४. पृथक्त्व । अलगाव [को०] ।

उपजापक
वि० [सं०] १. नायक या नेता के कान में भेद की बात डालकर उसे विद्रोह के लिये भड़कानेवाला । २. देशद्रोही । विश्वासघात करनेवाला [को०] ।

उपजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जिह्वा के मूल में स्थित छोटी जिह्वा । लोला । लोकर । घंटी । जीभ का भीतरी या वर्धित भाग [को०] ।

उपजिह्विका
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपाजिह्वा' [को०] ।

उपजीवक
वि० [सं०] १. किसी उद्यम से जीविका उपार्जित करनेवाला । २. आश्रित । ३. अनुचर । सेवक [को०] ।

उपजीवन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपजीवी, उपजीवक] १. जीविका । रोजी । दूसरे का सहारा । निर्वाह के लिये दूसरे का अवलंब ।

उपजीविका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जीविका या साधन । उपजीवन । २. रोजी [को०] ।

उपजीवी
वि० [सं० उपजीविन्] [स्त्री० उपजीविनी] दूसरे के आधार पर रहनेवाला । दूसरे के सहारे पर गुजर करनेवाला ।

उपजीव्य (१)
वि० [सं०] १. जीविका या रोजी देनेवाला । २. संरक्षण देनेवाला [को०] ।

उपजीव्य (१)
संज्ञा पुं० १. आश्रयदाता । संरक्षक । २. आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने का साधन । ३. आश्रम । आधार [को०] ।

उपजुष्ट
वि० [सं०] १. प्राप्त । गृहीत । २. सेवित [को०] ।

उपजोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. इच्छा । २. प्रेम । ३. उपभोग । ४. सेवन [को०] ।

उपजोषण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपजोष' [को०] ।

उपजोषण (२)
क्रि० वि० [सं०] १. स्वेच्छया । इच्छानुसार ।२. हर्ष- पूर्वक । ३. चुपचाप [को०] ।

उपज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आत्मोपार्जित ज्ञान । सहज ज्ञान । प्रकृतिदत्त प्रतिभा । २. आविष्कार । ३. नए सिरे से किसी नई वस्तु का निर्माण [को०] ।

उपज्ञात
वि० [सं०] १. बिना किसी दूसरे के बताए स्वतः ज्ञात । अपने आप जाना हुआ । २. जिसे पहले जाना नहीं गया । नए सिरे से निर्मित । आविष्कृत [को०] ।

उपटन (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उबटन' ।

उपटन (२)
संज्ञा पुं० [सं० उत्पतन=ऊपर उठना] अंक या चिह्न जो आघात पहँचाने, दबाने या लिखने से पड़ जाय । निशान । साँट ।

उपटना
क्रि० अ० [सं० उत्पतन=ऊपर उठना] १. आघात, दाब या लिखने का चिह्न पड़ना । निशान पड़ना । साँच पड़ना । जैसे, (क) इस स्याही से लिखे अक्षर उपटे नहीं है । (ख) उसने ऐसा तमाचा मारा कि गाल पर उँगलियाँ (उँगालियों के चिह्न) उपट आई । २. उखड़ना । (ग) मनमोहन की बातियों में छुटी उपटी यह बेनी दिखा परी है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १०१ ।

उपटा (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० उत्पतन=ऊपर आना] १. पानी की बाढ़ । करार पर पानी का चढ़ना । २. ठोकर ।

उपटा (२)
क्रि० स० [सं० उत्पाटन] उखड़वाना । उखाड़ना । उ०— द्विरद को दंत उपटाय तुम लेत हौ उहै बल आज काहे न संभारयो २—सूर० (शब्द०) । विशेष—यह प्रयोग उन प्रयोगों में से है जहाँ सकर्मक रूप अक- र्मक के स्थान पर लाया जाता है ।

उपटाना पु
क्रि० स० [सं० उद्वर्तन, प्रा० उधद्दण] उबटन लगवाना ।

उपटारना पु
क्रि० स० [सं० उत्पाटन] उच्चाटन करना । उठाना । हटाना । उ०—कोकिल हरि को बोल सुनाव, मधुवन तें उपटारि श्याम को यह ब्रज लै करि आव ।—सूर (शब्द०) ।

उपट्टना पु
क्रि० अ० [सं० उत्पतन] ऊपर की और चढ़ना । ऊपर की ओर उठना । उ०—दोउ फौज निजर दिठाल मिल्लि, उपट्टै सिंधु, जनु, लहरि जल्लि ।—पृ० रा०, १ । ४४८ ।

उपड़ना
क्रि० अ० [सं० उत्पाटन प्रा० उप्पाडन] १. उखड़ना । २. उपटना । अंकित होना । निशान पड़ना । उ०—देखा कि उन चरण दिह्नों के पास एक नारी के पाँव भी उपड़े हुए है ।—लल्लू० (शब्द०) ।

उपढौकन
संज्ञा पुं० [सं०] उपहार । उ०—सकल को उपढौकन आदि ले, उचित है चलना मथुरापुरी ।—प्रि० प्र० १२ ।

उपड़ावाना †
क्रि० स० [हिं० 'उपड़ना' का प्रे० रूप] उखड़वाना । उत्पाटन कराना [को०] ।

उपड़ाना
क्रि० स० [हिं०'उपड़वा' क्रिया का प्रे० रूप] दे० 'उपड़वाना' [को०] ।

उपतपन
वि० [सं० उप+तपन] कष्टकारक । दुःख देनेवाला [को०] ।

उपतप्त
वि० [सं०] १. व्याथित । दुःखी । २. जला हुआ या झुलसा हुआ । ३. रोगी [को०] ।

उपतप्ता (१)
वि० [सं० उपतप्त] १. दुःख या व्यथा पहुँचानेवाला । २. जलानेवाला [को०] ।

उपतप्ता (२)
संज्ञा पुं० १. असाधारण गर्मी या उष्णाता । २. गर्मी या जलन का कारण । ३. एक प्रकार का रोग [को०] ।

उपतल्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. मकान का ऊपरी तल्ला । भवन की छत पर बना हुआ कक्ष या कमरा । २. बैठने की चौकी [को०] ।

उपताप
सं० पुं० [सं०] १. गर्मी । उष्णता । ऊमस । २. व्यथा । पीड़ा । मनस्ताप । ३. दुर्भाग्य । दुदैर्व । ४. बीमारी । आघात । चोट । ५. शीघ्रता । त्वरा [को०] ।

उपतापक
वि० [सं०] १. जलानेवाला । दुःखद । ३. कष्टसहिष्णु [को०] ।

उपतापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कष्ट पहुँचाना । २. ताप देना । तपाने की क्रिया [को०] ।

उपतापी
वि० [स० उपतापिन्] दे० 'उपतापक' [को०] ।

उपतारक
वि० [सं०] सीमा या तट को लाँघकर बहता हुआ [को०] ।

उपतिष्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. आश्लेषा नक्षत्र । २. पुनर्वसु नक्षत्र [को०] ।

उपतुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] वास्तु विद्या (घर बनाना) में खंभे के नौ बराबर भागों में तीसरा भाग ।

उपत्यका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पर्वत के पास की भूमि । तराई ।

उपदंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. गरमी । आतशक । फिरंग रोग । २. मद्य के ऊपर रुचनेवाली वस्तु । गजक । चाट । उ०— राधिका हरि अतिथि तुम्हारे, अधर सुधा उपदंश सींक, शुचि, बिधु—पूरन—मुखवास संचारे ।—सूर (शब्द०) । ३. वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का रोग जिसमें पुरुष की लिंगेंद्रिय पर नाखन या दांत लगने के कारण घाव हो जाता है ।

उपदंशित
वि० [सं०] प्रसंग । अवतरण । सप्रसंग कही गई (बात) [को०] ।

उपदंशी
वि० [सं० उपदंशिन] उपदंश रोग का रोगी । जिसे उपदंश हुआ हो [को०] ।

उपदर्शक
वि० [सं०] १. राह बतानेवाला । २. द्वाररक्षक । ३. साक्षी । देखनेवाला [को०] ।

उपदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] टीका । भाष्य । व्याख्या [को०] ।

उपदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भेट जो बड़े लोगों को दी जाय । नजर । २. घूस । उत्कोच (को०) ।

उपदाग्राहक
वि० [सं०] घूस लेनेवाला । रिशवत लेनेवाला । रिशवती । विशेष—चाणक्य ने लिखा है कि न्यायाधीश के चरित्र की परीक्षा के लिये खुफिया पुलिश का कोई आदमी उससे जाकर कहे कि एक मेरा मित्र राज्यपराध में फँस गया है । आप कृपाकर उसको छोड़ दिजिए और यह धन ग्रहण कीजिए । यदि वह उपदा ग्रहण कर ले तो राज्य उसको 'उपदाग्राहक' समझकर राज्य के बाहर निकाल दे (को०) ।

उपदाता
वि० [सं० उपदातृ] दान करनेवाला [को०] ।

उपदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेंट । २. घस । उत्कोच [को०] ।

उपदानक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपदान' [को०] ।

उपदानवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वृषपर्वा दानव की पुत्री और दुष्यंत कि माता का नाम ।२. वैश्वानर की कन्या का नाम [को०] ।

उपदिग्ध
वि० [सं०] १. दिया हुया । ढका हुआ । २. धब्वेदार [को०] ।

उपदिशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दो दिशाऔं की बीच की दिशा । कोण ।

उपदिष्ट
वि० [सं०] १. जिसे उपदेश दिया गया हो । २. जिसके विषय में उपदेश दिया गया हो । जिसके विषय में कुछ कहा गया हो । ज्ञापित । ३. जिसे दीक्षा दी गई हो (को०) । ४. निर्दिष्ट । निर्देश दिया हुआ (को०) ।

उपदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बंदाक । बाँदा नामक पौधा [को०] ।

उपदीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक लघु कीट । एक प्रकार का चींटा [को०] ।

उपदीक्षी
वि० [सं० उपदीक्षिन्] १. किसी आरंभ या अन्य धार्मिक कार्यों में संमिलित होनेवाला । २. निकट संबंधी [को०] ।

उपदृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दृश्य वस्तु । प्रत्यक्ष विषय [को०] ।

उपदेव
संज्ञा पुं० [सं०] यक्ष, गंधर्व किन्नर आदि छोटे देव [को०] ।

उपदेवता
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपदेव' [को०] ।

उपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपदेश्य, उपदिष्ट, उपदेशी, औपदेशिक] १. शिक्षा । सीख । नसीहत । हित की बात का कथन । २. दीक्षा । गुरुमंत्र ।

उपदेशक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उपदेशिका] उपदेश करनेवाला । शिक्षा देनेवाला । अच्छी बात बतलानेवाला । उ०—इकबाल बड़ा उपदेशक है, मन बातों से मोह लेता है । गुफ्तार का गाजी बन तो गया, किदरि का गाजी बन न सका ।— बाँगेदरा ।

उपदेशता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपदेश का भाव या अवस्था । २. सीख । ३. नियम या सिद्धांत [को०] ।

उपदेशन
संज्ञा पुं० [सं०] उपदेश की क्रीया । शिक्षा देना [को०] ।

उपदेशना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सिद्धांत या नियम । २. उपदेश । शिक्षा [को०] ।

उपदेशी
वि० [सं० उपदेशिन्] [वि० स्त्री० उपदोशिनी] उपदेश देनेवाला । शिक्षा देनावाला । उ०—कहाँ सो गुरु पाऊँ उदेशी, अग्रम पंथ कर होय संदेशी ।—जायसी (शब्द०) ।

उपदेश्य
वि० [सं०] १. उपदेश के योग्य । जिसे उपदेश देना उचित हो । २. जिस (बात) का उपदेश करना उचित हो । सिखाने योग्य (बात) ।

उपदेष्टा
संज्ञा पुं० [सं० उपदेष्टृ] [स्त्री० उपदेष्ट्री] उपदेश देनेवाला शिक्षक ।

उपदेस पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उपदेश' । उ०—लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिव बार बहु ।—मानस, ५१ ।

उपदेसना पु
क्रि० स० [सं० उपदेश] उपदेश करना । शिक्षा देना । नसीहत करना । उ०—द्विरदहिं बहुरि बुलाइ नरेसा, सौंपि गयद यूथ उपदेसा ।—सबल (शब्द०) ।

उपदेहिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीमक ।

उपदोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. गाय का थन । गाय की छीमी । २. वह पात्र जिसमें दूध दुहा जाता है [को०] ।

उपद्रव
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपद्रवी] १. उत्पात । आकस्मिक बाधा । हलचल । विप्लव । २. ऊधम । दंगा । फसाद । गड़बड़ । क्रि० प्र०—उठाना ।—करना ।—खड़ा करना ।—मचाना । ३. किसी प्रधान रोग के बीच में होनेवाले दूसरे विकार या पीड़ाएँ जैसे,—ज्वर में प्यास सिर की पीड़ा आदि । जैसे,— यह दवा दो, दाह, आदि सब उपद्रव शांत हो जायँगे ।

उपद्रवी
वि० [सं० उपद्रविन्] १. उपद्रव मचानेवाला । हलचल मचानेवाला । दंगा करनेवाला । ऊधम मचानेवाला । २. फसादी । बखेड़िया ।

उपद्रष्टा (१)
वि० [सं० उपद्रष्ट] देखनेवाला । दर्शन [को०] ।

उपद्रष्टा (२)
संज्ञा पुं० गवाह । साक्षी [को०] ।

उपद्रुत
वि० [सं०] १. उपद्रवग्रस्त । जहाँ या जिसपर उपद्रव हुआ हो । २. (ज्योतिष के अनुसार) ग्रहणयुक्त [को०] ।

उपद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] बड़े द्वार के अतिरिक्त बना हुआ छोटा दरबाजा । लघु द्वार [को०] ।

उपद्विप
संज्ञा पुं० [सं०] छोटा द्विप [को०] ।

उपधरना पु
क्रि० अ० [सं० उपधार, अपनी ओर खींचना] ग्रहण करना । अंगीकार करना । अपनाना । शरण में लेना । सहारा देना । उ०—जिनको साँई उपधरा, तिन्ह बाँका नहीं कोई । सब जग रूसा का करै राखन हारा सोई ।—दादू० (शब्द०) ।

उपधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] मुख्य धर्म के आतिरिक्त गौण या अमुख्य धर्म [को०] ।

उपधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] संज्ञा १. छल । कपट । २. राजा द्वारा मंत्री, पुरोहित आदि की परीक्षा । ३. व्याकरण में किसी शब्द के अंतिम अक्षर के पहले का अक्षर । ४. उपाधि ।

उपधातु
संज्ञा पुं० [सं०] २. अप्रधान धातु जो या तो लोहे, ताँबे आदि धातुओं के विकार या मैल हैं या उनके योग से बनी हैं अथवा स्वतंत्र खानें से निकलती हैं । विशेष—प्रधान धातुओं के समान उपधातु भी सात गिनाई गई है—सेनामक्खी, रूपामाखी, तूतिया, काँसा, मुर्दासंख, सिंदूर शिलाजतु या गेरू (भावप्रकाश) पर किसी किसी के मत से सात उपधातु ये हैं—सेनामाखी, नीलाथोथा, हरताल, सुरमा, अबरक, मेनसिल और खपरिया । २. शरीर के रस, रक्त आदि सात धातुओं से बने हुए दूध, चरबी, पसीना आदि पदार्थ ।

उपधान
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपहित] १. ऊपर रखना या ठहराना । २. वह जिसपर कोई वस्तु रखी जाय । सहारे की चीज । यौ०—पादोपधान । ३. तकिया गडुआ । बालिश । उ०—बिबिध बसन उपधान तुराई, छीर फेन सम विसद सुहाई ।—मानस, २ । ९१ । ४. मंत्र जो यज्ञ की ईंट रखते समय पढ़ा जाता है । ५. विशेषता । ६. प्रणय । प्रेम ।

उपधानक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बालिश । ताकिया । शिरोपधान । २. एक व्रत । ३. प्रेम । ४. विष [को०] ।

उपधानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पादपीठ । पैर रखने की चौकी । २. तकिया । ३. गद्दा [को०] ।

उपधानीय (१)
वि० [सं०] पास रखने योग्य [को०] ।

उपधानीय (२)
संज्ञा पुं० तकिया । उपवर्ह [को०] ।

उपधायी
वि० [सं० उपधायिन्] १. तकिया की भाँति प्रयुक्त । २. तकिया का व्यवहार करनेवाला [को०] ।

उपधारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऊपर रखी हुई किसी वस्तु को लग्गी आदि से खींचना । २. चिंतन । विमर्श (को०) ।

उपधावन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुगमन । २. विचारण । चिंतन । ३. भक्ति । पूजा । अनुगामी । अनुचर [को०] ।

उपधि
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० औपाधिक] १. जानबूझकर और का और कहना । छल । कपट । २. चक्रया पहिया (को०) । ३. (बोद्ध मत के अनुसार) आधार या नींव (को०) ।

उपाधिक
वि० (सं०) १. धूर्त । विश्वासधाती । २. झिड़की और धूर्तता से काम लेनेवाला [को०] ।

उपधियुक्त
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह माल जो असली या खालिस न हो । मिलावटी माल ।

उपधूपित
वि० [सं०] १ धूप के धुएँ से सुवासित । २. मृत्यु के निकट पहुँचा हुआ । ३. कठिन और असह्य पीड़ा से पीड़ित [को०] ।

उपधूमित योग
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में वह योग जिसमें यात्रा तथा और शुभ कर्मों का निषेध है, जैसे प्रत्येक दिन का पहला पहर ईशान कोण की यात्रा के लिये दूसरा पूर्व के लिये तीसरा अग्निकोण के लिये, चौथा दक्षिण के लिये उपधूमित है ।

उपधृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किरण । २. ग्रहण । पकड़ना [को०] ।

उपध्मान
संज्ञा पुं० [सं०] १. औठ । साँस लेना । मुह से फूँकना [को०] ।

उपध्मानी
वि० [सं० उपध्मानिन्] हवा करनेवाला । जोर से फूँकनेवाला [को०] ।

उपध्मानीय
संज्ञा [सं०] 'प' वर्ग अर्थात् प्, फ्, ब्, भ्, म्, के पहले आनेवाला महाप्राण विसर्ग जिसका उच्चारण ओठ से होता है [को०] । विशेष—'प्' और 'फ' के पहले आनेवाला विसर्ग महाप्राण हो जाता है, और ब्, भ्, म्, के पहले आनेवाला विसर्ग 'रेफ' या 'ओत्व' में बदल जाता है ।

उपध्वस्त
वि० [सं०] १. नष्ट या बरबाद किया हुआ । २. मिश्रित । घुला मिला [को०] ।

उपनंद
संज्ञा पुं० (सं० उपनन्द) १. व्रज के अधिकारी नंद के छोटें भाई । २. वसुदेव के एक पुत्र । ३. गर्गसंहिता के अनुसार वह जिसके पास पाँच लाख गाएँ हों ।

उपनक्षत्र
संज्ञा पुं० [सं०] सहायता नक्षत्र । गौड़ नक्षत्र या तारा [को०] ।

उपनख
संज्ञा पुं० [सं०] अँगुली के नखों में होनेवाला एक प्रकार का रोग । गलका [को०] ।

उपनगर
संज्ञा पुं० [सं०] नगर का बाहरी भाग । नगर के आसपास बसा हुआ हिस्सा [को०] ।

उपनत
वि० [सं०] १. पास आया हुआ । २. पास लाया हुआ । ३. प्राप्त । ४. उपस्थित । ५. विनत । नम्र । ६. (शरणागत के लिये) आश्रित । ७. पास का या संनिकट का (समय या स्थान) (को०) ।

उपनति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. समीप आना । २. नमन । नमस्कार । ३. प्रणय [को०] ।

उपनद्ध
वि० [सं०] बँधा हुआ । २. नधा हुआ । नद्ध ।

उपनना पु
क्रि० अ० [सं०] पैदा होना । उत्पन्न होना । उपजना । उ०—बन बन बृच्छ न चंदन होई, तन तन बिरह न उपनै सोई ।—जायसी (शब्द०) ।

उपनय
संज्ञा पुं० [सं०] १. समीप ले जाना । २. बालक को गुरु के पास ले जाना । ३. उपनयन संस्कार । ४. न्याय में वाक्य के चौथे अवयव का नाम । कोई उदाहरण लेकर उस उदाहरण के धर्म को फिर उपसंहार रूप से साध्य में घटाना । जैसे,—उत्पत्ति धर्मवाले अनित्य हैं, जैसे, घट (उत्पत्ति धर्मवाला होने से) अनित्य है; वैसे ही शब्द भी अनित्य हैं (उपनय) । उपनय वाक्य के चिह्न 'वैसे ही', 'उसी प्रकार' आदि शब्द हैं । 'उपनय' के 'उपनीति' भी कहते हैं ।

उपनयन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपनीत, उपनेता, उपनेतव्य] १. निकट लाना । पास ले जाना । २. यज्ञोपवीत संस्कार । व्रतबंध । जनेऊ ।

उपनहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह कपड़ा जिसमें कोई चीज बँधी हो । २. एक दुसरे को बंधनयुक्त करना [को०] ।

उपना पु
क्रि० अ० [सं० उत्पन्न, प्रा० उप्पण्ण] १. उत्पन्न होना । उ०—कुधर सहित चढ़ौ विसिष, बेगि पठयो सुनि हरि हिय गरब गूढ़ उपयो हौ ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३९८ । २. जन्म ग्रहण करना । जनमना ।

उपनागरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अलंकार में वृत्ति अनुप्रास का एक भेद जिसमें कान को मधुर लगनेवाले वर्ण आते हैं । इसमें ट ठ ड ढ को छोड 'क' से लेकर म तक सब वर्ण, तथा अनुसार रहित अक्षर रह सकते हैं । समास इसमें या तो न हों और हों भी तो छोटे छोटे । जैसे,—कंजन, खंजन, गंजन है अलि अंजन हूँ मन रंजनहारे ।—(शब्द०) ।

उपनामा पु
क्रि० स० [ही० 'उपना' का सक० रूप] उत्पादन करना । पैदा करना ।

उपनाम
संज्ञा पुं० [सं० उपनामन्] १. दूसरा नाम । प्रचलित नाम । २. पदवी । तखल्लुस । उपाधि ।

उपनाय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपनयन' [को०] ।

उपनायक
संज्ञा पुं० [सं०] नाटकों में प्रधान नायक का साथी या सहकारी ।

उपनायन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपनयन' ।

उपनायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नाटकों में वर्णित नायिका की प्रधान सखी और सहायिका [को०] ।

उपनासिक
संज्ञा पुं० [सं०] नासिका के पास का भाग । नाक का निकटवर्ती भाग [को०] ।

उपनाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. सितार की खूँटी जिसमें तार बँधे रहते हैं । २. फोड़े या घाव पर लगाने का लेप । मरहम । ३. आँख का एक रोग । बिलनी । गुहांजनी । ४. गठरी । बंडल (को०) ।

उपनाहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मरहम या लेप लगाना । २. पलस्तर करना [को०] ।

उपनिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. धरोहर । २. खुली धरोहर । ३. मुहरबंद धरोहर [को०] ।

उपनिधाता
वि० [सं० उपनिधातृ] धरोहर रखनेवाला [को०] ।

उपनिधान
संज्ञा पुं० [सं०] धरोहर रखना [को०] ।

उपनिधायक
वि० [सं०] दे० 'उपनिधाता' [को०] ।

उपनिधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० औपनिधिक] धरोहर । अमानत ।

उपनिधिभोक्ता
संज्ञा पुं० [सं० उपनिधिमोक्तृ] वह मनुष्य जिसने दूसरे की रखी धरोहर का स्वय प्रयोग किया हो । विशेष—चंद्रगुप्त के समय में ऐसे लोग देश काल के अनुसार उसका बदला या भोगवेतन देने के लिये बाध्य किए जाते थे ।

उपनिपात
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य मत से राजा, चोर, आग और पानी आदि से माल का खराब नष्ट होना । वि० दे० 'दोष' ।

उपनिपातन
संज्ञा पुं० [सं०] १. सहसा घट जाना । २. सहसा आक्रमण करना (को०) ।

उपनिबंधक
संज्ञा पुं० [सं० उपनिबन्धक] निंबंधक का सहायक । सहायक निबंधक [को०] ।

उपनियम
संज्ञा पुं० [सं०] १. नियम के अंतर्गत रहनेवाला छोटा नियम । २. गौण नियम [को०] ।

उपनिविष्ट
वि० [सं०] [संज्ञा उपनिवेश] दूसरे स्थान से आकार बसा हुआ ।

उपनिविष्ट (सैन्य)
वि० [सं०] सुशिक्षित और अनुभवी (सैन्य) । विशेष—कौटिल्य ने लिखा है कि उपनिविष्ट तथा समाप्त (एक ही ढंग की लड़ाई जाननेवाली) सेना में उपनिविष्ट सेना ही उत्तम है, क्योंकि उपनिविष्ट को भिन्न भिन्न स्थानों में लड़ना आता है और वह छावनी के आतिरिक्त भी लड़ाई कर सकती है ।

उपनिवेश
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपनिवेशित, उपनिविष्ट] १. एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा बसना । २. अन्य स्थान से आए हुए लोगों की बस्ती । एक देश के लोगों की दूसरे देश में आबादी । कालोनी (अँ०) ।

उपनिवेशित
वि० (सं०) दूसरे स्थान से आखार बसा बुआ ।

उपनिवेशी
वि० [सं० उपनिवेशिन्] १. उपनिवेश में निवास करनेवाला । २. विदेश में बस जानेवाला । ३. बसानेवाला [को०] ।

उपनिषद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पास बैठना । २. ब्रह्मविद्या की प्राप्ति के लिये गुरु के पास बैठना । ३. वैद की शाखाओं के ब्राह्मणों के वे अतिम भाग जिसमें ब्रह्माविद्या अर्थात् आत्मा, परमात्मा आदि का निरूपण रहता है । विशेष—कोई कोई उपनिषदें संहिताओं में भी मिलती है; जैसे ईश, जो शुक्ल यजुर्वद का ४० वाँ अध्याय माना जाता है । प्रधान उपनिषदें ये हैं—ईश या वाजसनेय, केन या तवल्कार, कठ, प्रश्न, मृुडक, मांडूक्य, तौत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्य । इनके अतिरिक्त कौषीतकी, मेत्रायणी, और श्वेताश्वतर भी आर्ष मानी जाती हैं । उपनिषदों की संख्या कोई १८, कोई, ३४, कोई ५२ और कौई १०८ तक मानते हैं पर इनमें से बहुत सी बहुत पीछे की बनी हुई हैं । ४. वेदव्रत ब्रह्मचारी के ४० संस्कारों में से एक जो गोदान अर्थात् केशांत संस्कार के पहले होता है । ५. निर्जन स्थान । ५. धर्म ।

उपनिषादी
वि० [सं० उपनिषादिन्] १. गुरु के पास रहनेवाला । २. वशीकृत । वश में लाया हुआ [को०] ।

उपनिष्कर
संज्ञा पुं० [सं०] राजपथ । सड़क [को०] ।

उपनिष्क्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाहर जाना । २. एक संस्कार जिसमें नवजात शिशु को पहले पहल घर के भीतर से बाहर निकालते हैं । ३. राजमार्ग । प्रधान सड़क [को०] ।

उपनिहित
वि० [सं०] उपधान या धरोहर के रूप में रखा हुआ [को०] ।

उपनीत
वि० [सं०] १. लाया हुआ । २. जिसका उपनयन संस्कार हो गया हो ।

उपनोति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपनयन' [को०] ।

उपनुन्न
वि० [सं०] वायु द्वारा धीरे धीरे प्रेरित । हवा से धीरे धीरे ले जाया गया [को०] ।

उपनृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] नृत्यशाला । नाचघर [को०] ।

उपनेत पु
वि० [हिं० उपन+ इत (प्रत्य०)] उत्पन्न । उ०—छकेई रहत रैनिद्यौस प्रेम प्यास आस, कीनी नेम धरम कहानी उपनेत है ।—घनानंद, पृ० ६० ।

उपनेता
वि० संज्ञा, पुं० [सं० उपनेतृ] [स्त्री० उपनेत्री] १. लानेवाला । पहुँचानेवाला । २. उपनयन करानेवाला । आचार्य । गुरु । ३. नेता का प्रधान सहायक (को०) ।

उपनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] चश्मा [को०] ।

उपन्न
वि० [सं० उत्पन्न; प्रा० उप्पण्ण] दे० 'उत्पन्न' । उ०—मारू देस उपन्नियाँ, ताँह का दंत सुसेत । कूँझ बचा गोरंगियाँ, खंजर जेहा नेत ।—ढोला०, दू०, ४५७ ।

उपन्ना (१) †
संज्ञा पुं० [सं०] [हिं० उपरना] दे० 'उपरना' ।

उपन्ना (२)
वि० [सं० उत्पन्न; प्रा० उप्पण्ण] उत्पन्न । उ०—सूचा मन साचु न मैला होई, आपे आय उपन्ना सोई ।—प्राण०, पृ० २२१ ।

उपन्यस्त
वि० [सं०] १. पास रखा हुआ । २. धरोहर रखा हुआ । अमानत रखा हुआ । ३. उल्लिखित । दर्ज । कहा हुआ ।

उपन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपन्यस्त] १. वाक्य का उपक्रम । बंधान । बात की लपेट । बात का लच्छा । २. कल्पित आख्यायिका । कथा । नावेल । ३. धरोहर । गिरवी । ४. प्रसादन (को०) । ५. प्रसंग । संदर्भ । संकेत (को०) । ६. प्रस्ता- वना । भूमिका । उपोदघात [को०] । ७. नियम । विधान (को०) ।

उपन्याससंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० उपन्याससंधि] वह संधि जो किसी कल्याणकारो कर्म की इच्छा से की जाय (कामंद०) ।

उपपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंधा । २. काँख । कुक्षि । ३. काँख का बाल [को०] ।

उपपति
संज्ञा पुं० [सं०] वह पुरुष जिससे कोई दूसरे को ब्याही हुई स्त्री प्रेम करे । जारे । यार । आशना ।

उपपतित
वि० [सं०] उपपातक करनेवाला । छोटा पाप करनेवाला [को०] ।

उपततिरस
संज्ञा पुं० [सं० उपपति+ रस] पर पुरुष का प्रेम । उ०—जौ कहौ उपपति—रस नहिं स्वच्छ, सब कोउ निंदत अरु अति तुच्छ ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३२१ ।

उपपत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हेतु द्वारा किसी वस्तु की स्थिति का निश्चय । २. प्राप्ति । सिद्धि । प्रतिपादन । घटना । चरितार्थ होना । मेल मिलना । संगति । ३. युक्ति । हेतु । ४. समाधान (को०) । ५. आश्रय । आधार (को०) । ६. सन्निकर्ष । संपर्क (को०) । ७. उचित होना । युक्तता (को०) । ८. साधन (को०) । ९. सिद्धांत (को०) । १०. प्रमाण । प्रक्रिया (गणित) (को०) । ११. समाधि [को०] । १२. संयोग (को०) ।

उपपत्तिसम
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय में दो कारणों की प्राप्ति । बिना वादी के कारण और निगमन आदि का खंडन किए हुए प्रतिपादन करना । प्रतिवादी का यह कहना कि जिस प्रकार वादी के दिए हुए कारण से वह बात हो सकती है; उसी प्रकार हमारे दिए हुए कारण से भी यह बात हो सकती है ।जैसे,—एक कहता है शब्द अनित्य है क्योंकि उसकी उत्पत्ति होती है । दूसरा कहता है जिस प्रकार उत्पत्ति धर्मवाला होने से शब्द अनित्य कहा जा सकता है उसी प्रकार स्पर्शवाला न होने से नित्य भी हो सकता है ।

उपपत्नो
संज्ञा स्त्री० [सं०] बिना विवाह किए ही जिस स्त्री को पत्नी के समान रख लिया जाय । रखेली (को०) ।

उपपथ
क्रि० वं० [सं०] सड़क के पास । राजमार्ग के समीप [को०] ।

उपपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहले कहा गया शब्द । वह शब्द जो पहले आ चुका है । २. स्थितिविशेष में लाना । ३. उपाधि । पदवी [को०] ।

उपपद समास
संज्ञा पुं० [सं०] वह समास जो नाम या संज्ञा के साथ कृदंत के मिलने से होता है । जैसे—स्वर्णकार, हलधर आदि [को०] ।

उपपन्न
वि० [सं०] १. पास आया हुआ । पहुँचा हुआ । २. शरण में आया हुआ । शरणागत । ३. प्राप्त । लब्ध । पाया हुआ । मिला हुआ । ४. युक्त । संपन्न । ५. उपयुक्त । मुनासिब । ६. पूर्ण (को०) । ७. संभव (को०) । ८. प्रमाणित । सिद्ध किया हुआ [को०] ।

उपपर्शुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अमुख्य पसली [को०] ।

उपपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. आप्रत्याशित घटना । २. दुर्घटना । विपत्ति । विनाश । [को०] ।

उपपातक
संज्ञा पुं० [सं०] छोटा पाप । उ०—जे पातक उपपातक अहहीं, करम बचन मन भव कवि कहहीं ।—मानस, २ ।१६७ । विशेष—मनु के अनुसार परस्त्रीगमन, गुरुसेवात्याग, आत्मविक्रय, गोवध आदि उपपातक हैं ।

उपपाद
संज्ञा पुं० [सं०] बड़े स्तंभ के उपर लगा हुआ उसका सहायक छोटा खंभा [को०] ।

उपपादक
वि० [सं०] १. सिद्ध करनेवाला । २. प्रकट करनेवाला । ३. अच्छी तरह विचारा हुआ [को०] ।

उपपादन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपपादक, उपपादित, उपपन्न, उपपादनीय, उपपाद्य] १. सिद्ध करना । साबित करना । ठहराना । प्रतिपादन । युक्ति देकर समर्थन करना । २. सपादन कार्य को पूरा करना ।

उपपादनीय
वि० [सं०] प्रतिपादनीय । सिद्ध करने योग्य । साबित करने योग्य ।

उपपादित
वि० [सं०] १. जिसका उपपादन या समर्थन किया गया हो । प्रतिपादित । सिद्ध किया हुआ । साबित किया हुआ । ठहराया हुआ । २. दिया हुआ । प्रदान किया हुआ [को०] । ३. चिकित्सा किया हुआ [को०] ।

उपपादुक (१)
वि० [सं०] १. जिसके पैर में पादुका हो । जूते पहना हुआ । २. जिसके पैरों में मालें लगी हों (घोड़ा आदि) ३. स्वतःसंभूत । स्वयंभू [को०] ।

उपपादुक (२)
संज्ञा पुं० परमात्मा । ईश्वर [को०] ।

उपपाद्य
वि० [सं०] प्रतिपादन के योग्य । सिद्ध किए जाने योग्य ।

उपपाप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपपातक' [को०] ।

उपपार्श्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंधा । २. बगल । विपरीत पक्ष । ४. छोटी पसली [को०] ।

उपपीड़न
संज्ञा पुं० [सं० उपपीड़न] १. दबाना । २. कष्ट देना । चोट पहुँचाना । ३. पीडा । कष्ट । मानसिक व्यथा [को०] ।

उपपीड़ित
वि० [सं० उपपीड़ित] १. दबाया हुआ । २. कष्ट पहुँचाया हुआ [को०] ।

उपपुर
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उपपुरी] नगर का बाहरी भाग । उपनगर [को०] ।

उपपुराण
संज्ञा पुं० [सं०] १८ मुख्य पुराणों के अतिरिक्त और छोटे पुराण । विशेष—ये भी गिनती में १८ हैं । (१) सनत्कुमार, (१) नारसिंह, (३) नारदीय, (४) शिव, (५) दुर्वासा, (६ कपिल, (७) मानव, (८) औशनस, (९) वरुण, (१०) कलिक, (११) शांब, (१२) नंदा, (१३) सौर, (१४) पराशर, (१५) आदित्य, (१६) माहेश्वर, (१७) भार्गव और (१८) वाशिष्ठ ।

उपपुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नगर का उपांत । नगर का परिवेश । परिसर [को०] ।

उपपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जँमाई ।२. पूरा मुँह खोलकर साँस लेना [को०] ।

उपपौरिक
वि० [सं०] [स्त्री० उपपौरिकी] नगर के उपांत में रहनेवाला । उपपुर का निवासी [को०] ।

उपप्रदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] संकेत करना । इंगित करना । निर्दशन । बताना [को०] ।

उपप्रदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. देना । सौंपना । २. घूस । रिश्वत । ३. भेंट [को०] ।

उपप्रधान
संज्ञा पुं० [सं०] प्रधान का सहायक । प्रधान का सहयोगी ।

उपप्रमुख
संज्ञा पुं० [सं०] उपाध्यक्ष ।

उपप्रश्न
संज्ञा पुं० [सं०] किसी बड़े और गंभीर प्रश्न के भीतर निकल आनेवाला छोटा प्रश्न । अप्रधान या अमुख्य प्रश्न [को०] ।

उपप्रेक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] उपेक्षा करना या परवाह न करना [को०] ।

उपप्रैष
संज्ञा पुं० [सं०] १. निमंत्रण । २. सूचनापत्र [को०] ।

उपप्लव
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपप्लवित, उपप्लवी, उपप्लव्य] [उपप्लुत] १. बाढ़ । २. उत्पात । हलचल । हंगामा । बलवा । ३. कोई प्राकृतिक घटना जैसे ग्रहण, भूकंप, आदि । ४. आँधी । तूफान । ५. भय । खतरा । ६. विघ्न । बाधा ७. राहु । ८. शिव (को०) । ९. संदेह । विचिकित्सा (बौद्ध) ।

उपप्लवी
वि० [सं० उपप्लविन्] [स्त्री० उपप्लविनी] १. उपद्रव मचानेवाला । हलचल मचानेवाला । आफत ढानेवाला । २. डुबानेवाला । तराबोर करनेवाला । ३. जिसपर या जहाँ पर आफत आई हो । ४. जिसपर ग्रहण लगा हो ।

उपप्लुत
वि० [सं०] १. भयंकर रूप से आक्रांत । २. ग्रस्त (राहु से) । ३. उत्पात से पूर्ण । ४. सींचा हुआ । जलप्लावित । ५. आँसू से भरी (आँखें) । ६. रौंदा हुआ । मसला हुआ (को०) ।

उपप्लुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का रोग [को०] ।

उपबंध
संज्ञा पुं० [सं० उपबन्ध] १. संबंध । २. कामशास्त्र के अनुसार एक आसन । ३. अनुबंध । प्रयोग [को०] ।

उपबरहन पु
संज्ञा पुं० [सं० उपबर्हण] दे० 'उपवर्हण' (को०) । उं—उपबरहन वर बरनि न जाहीं, स्रग सुगंध मनि मंदिर माहीं ।—मानस, १ ।३५६ ।

उपबर्ह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उफबर्हण' [को०] ।

उपबर्हण
संज्ञा पुं० [सं०] १. तकिया । २. दबाना । निपीड़न [को०] ।

उपबहु
वि० [सं०] थोड़े । अल्पसंख्यक [को०] ।

उपबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] पहुँचा । हाथ का कोहनी से नीचे का भाग [को०] ।

उपबृंहण
संज्ञा पुं० [सं०] परिवर्धित । बढ़ाना [को०] ।

उपबृंहित
वि० [सं०] आमिवर्धित । बढ़ाया हुआ । २. युक्त । सयुक्त [को०] ।

उपबृंही
वि० [सं० उपवृंहिन्] न्यूनता या कमी को पूरा करनेवाला । पूरक [को०] ।

उपबैन पु
संज्ञा पुं० [सं० उपवचन, पु उपबयन] उपवचन । उफकथन । उपवाक्य । उ०—जिस बाल उपबैन भूठे उचाहैं । धरे नाम छत्री न सस्त्रं पचारैं ।—पृ० रा०, १२ । ४७३ ।

उपभंग
संज्ञा पुं० [सं० उपभङ्ग] १. भागना । पीछे हटना । २. छंद का एक खंड या टुकड़ा [को०] ।

उपभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बोली । जनपदीय भाषा । प्रांतीय भाषा के क्षेत्र के अंतगंत किसी छोटे भूभाग में बोली जानेवाली जन- भाषा [को०] ।

उपभुक्त
वि० [सं०] १. जिसका भोग किया गया हो । व्यवहार किया हुआ । काम में लाया हुआ । बर्ता हुआ । २. जूठा । उच्छिष्ट । यौ०—उपभुक्त धन=वह जिसने अपने धन का उपयोग किया हो ।

उपभुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपभोग । २. ग्रह की दैनिक गति [को०] ।

उपभूषण
संज्ञा पुं० [सं०] हलका या छोटा गहना । लघु आभूषण [को०] ।

उपभृत
वि० [सं०] १. पास लाया हुआ । २. उपलब्ध [को०] ।

उपभेद
संज्ञा पुं० [सं०] प्रधान भेद या प्रकार के भीतर किए गए लघु प्रकार । शाखाभेद [को०] ।

उपभोक्तव्य
वि० [सं०] उपभोग के योग्य । उपभोगक्षम [को०] ।

उपभोक्ता
वि० [वि० उपभोक्तृ] [वि० स्त्री० उपभोक्तृ] उपभोग करनेवाला । व्यहार का सुख उठानेवाला । काम में लानेवाला ।

उपभोग
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपभोगी, उपभोग्य, उपभुक्त] १. किसी वस्तु के व्वहार का सुख । मजा लेना । २. व्यवहार । काम में लाना । बर्तना । सुख की सामग्री । विलास की वस्तु । ४. विषय भोग (को०) । ५. स्त्रीप्रसंग (को०) । ७. फलप्राप्ति (को०) ।

उपभोगी
वि० [सं० उपभोगिन्] उपभोग करनेवाला [को०] ।

उपभोग्य
वि० [सं०] उपभोग के योग्य । व्यवहार के योग्य ।

उपभोज्य (१)
वि० [सं०] १. खाने योग्य । २. व्यवहार में लाने योग्य । आनंद लेने योग्य [को०] ।

उपभोज्य (२)
संज्ञा पुं० भोजन । आहार [को०] ।

उपमंत्रण
संज्ञा पुं० [सं० उपमन्त्रण] १. संबोधन करना । आमंत्रण । २. अपनी राय में मिलना । खुशामद करना [को०] ।

उपमंत्री (१)
संज्ञा पुं० [सं० उप+मन्त्रिन्] १. वह मंत्री जो प्रधान मत्री के नीचे हो । २. दूत [को०] ।

उपमंत्री (२)
वि० १. आमंत्रण देनेवाला । २. अनुरोध करनेवाला । ३. स्वपक्ष में मिलाने का यत्न करनेवाला [को०] ।

उपमंथनी
संज्ञा स्त्री० [सं० उपमन्थनी] चलाने की लकड़ी या डंडा । वह लकड़ी जिससे आग को उलटा पलटा जाता है । [को०] ।

उपमथिता
वि० [सं० उपमन्थितृ] उपमंथन करनेवाला । (अग्नि को खुडेरनेवाला [को०] ।

उपमज्जन
संज्ञा [सं०] नहाना । स्नान । अवगाहन [को०] ।

उपमन्यु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] गोत्रप्रवर्तक एक ऋषि जो आयोदधौम्य के शिष्य थे ।

उपमन्यु (२)
वि० १. प्रतिभाशली । व्युत्पन्नमति । २. उद्योगी [को०] ।

उपमर्द
संज्ञा पुं० [सं०] १. मसलना । रगड़ना । २. विनाश । वध । ३. अपमान । भर्त्सना । ४. आरोप का खंडन । ५. हिलना । गति देना [को०] ।

उपमर्दक
वि० [सं०] १. नष्ट करनेवाला । २. आरोप का खंडन (को०) ।

उपमर्दन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दबाना । क्लेश देना [को०] ।

उपमा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० उपमान, उपमापक, उपमित, उपमेय] १. किसी वस्तु, व्यापार या गुण को दूसरी वस्तु, व्यापार या गुण के समान प्रकट करने की क्रिया । सादृश्य । समानता । तुलना । मिलान । पटतर । जोड़ । मुशाबहत । उ०—सब उपमा कबि रहे जुठारी । केहि पटतरौं विदेहकुमारी ।— मानस, १ । २३० । २. एक अर्थालंकार जिसमें दो वस्तुओं (उपमेय और उपमान) के बीच भेद रहते हुए भी उनका समान धर्म बतलाया जाता है । जैसे,—उसका मुख चंद्रमा के समान है । विशेष—उपमा दो प्रकार की होती है पूर्णोपमा और लुप्तोपमा । पूर्णोपमा वह है जिसमें उपमा के चारों अंग उपमान, उपमेय, साधारण धर्म, और उपमावाचक शब्द वर्तमान हों । जैसे,—'हरिपद कोमल कमल से' इस उदाहरण में 'हरिपद' (उपमेय), कमल (उपमान), कोमल (सामान्य धर्म) और 'से' (उपमासूचक शब्द) चारों आए हैं । लुप्तोपमा वह हे जिसमें उपमा के चारों अंगों में से एक दो, या तीन न प्रकट किए गए हों । जिसके एक अंग का लोप हो उसके तीन भेद हैं, धर्मलुप्ता, उपभानलुप्ता और वाचकलुप्ता जैसे,—(क) बिज्जुलता सी नागरी, सजल जलद से श्याम (प्रकाश आदि धर्मों का लोप) । (ख) मालतिसम सुंदर कुसुम ढूँढ़ेहु मिलिहै नहिं (उपमान का लोप) । (ग) नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन (उपमा- वाचक शब्द का लोप) । इसी प्रकार जिस उपमा के दो अंगो का लोप हौता है उसके चार भेद हैं—वाचकधर्मलुप्ता, धर्मोपमानलुप्ता, वाचकोपमेयलुप्ता, वाचकोपमानलुप्ता, जैसे,— (क) धरनधीर रन टरन नहीं करन करन अरि नाश । राजत नृप कुंजर सुभट यस तिहुँ लोक प्रकाश (सामान्य) धर्म आर वाचक शब्द का लोप । (ख) रे अलि मलिति सम कुसुम ढूँढेहु मिलिहै नाहिं (उपमान और धर्म का लोप) । (ग) अटा उदय हो तो भयो छविधरप पूरनचंद (वाचक और उपमेय का लोप) ।

उपमा (२)पु
संज्ञा स्त्री० [गु० उपमान=वर्णन, दृष्टांत] वर्णन । बयान । प्रशंसा । उ०—जो गई भैंसि पाई । या प्रकार सगरे ब्रजवासी बहू की उपमा करने लागे ।—दो० सौ बावन०, भा० २, पृ० ३ ।

उपमाता (१)
संज्ञा पुं० [सं० उपमातृ] [स्त्री० उपमात्री] उपमा देनेवाला । मिलान करनेवाला ।

उपमाता (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूध पिलानेवाली स्त्री । दाई । धाय [को०] ।

उपमाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. निवेदन । आग्रह । २. तुलना । ३. मारण [को०] ।

उपमाद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हर्ष । खुशी । २. उपभोग [को०] ।

उपमाद (२)
वि० खुश करनेवाला । हर्ष पहुँचानेवाला [को०] ।

उपमान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वस्तु जिससे उपमा दी जाय । वह जिसके समान कोई दूसरी वस्तु बतलाई जाय । वह जिसके धर्म का आरोप किसी वस्तु में किया जाय । जैसे,—'उसका मुख कमल के समान है' इस वाक्य में 'कमल' उपमान है । २. न्याय में चार प्रकार के प्रमाणों में से एक । किसी प्रसिद्ध पदार्थ के साधर्म्य से साध्य का साधन । वह निश्चय जो किसी वस्तु को किसी अधिक परिचित वस्तु के कुछ समान देखकर होता है । जैसे—'गाय नीलगाय की तरह होती है' इस बात को सुनकर यदि कोई जगल में गाय की तरह का कोई जानवर देखेगा तो समझेगा कि यह नील गाय है । वास्तव में उपमान अनुमान के अंतर्गत आ जाता है । इसी से योग में तीन ही प्रमाण माने गए है : प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द । ३. २३ मात्रायौं का एक छंद जिसमें १३ वीं मात्रा पर विराम होता है । उ०—अब बोलि ले हरिनामै, काल जात बीता । हाथ जोरि बिनती करौं, नाहिं जात रीता ।—छंद०, पृ० ५२ ।

उपमानलुप्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वि० दे० 'उपमा' ।

उपमाना पु
क्रि० स० [हिं०] समता करना । बराबरी दिखाना ।

उपमालिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वर्ण्णवृत का नाम [को०] ।

उपमित (१)
वि० [सं०] जिसकी उपमा दी गई हो । जो किसी वस्तु के समान बतलाया गया हो । जिसपर उपमा घटती हो । जैसे, 'उसका मुख कमल के ऐसा है' इसमें मुख उपमित है ।

उपमित (२)
संज्ञा पुं० कर्मधारय के अंतर्गत एक सामास जो दो शब्दों के बीच उपमावाचक शब्द का लोप करके बनता है । जैसे,— पुरुषसिंह, नरव्याघ्र, घनश्याम ।

उपमिता
वि० स्त्री० [सं०] दे० 'उपमित' ।

उपमिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपमा या सादृश्य से होनेवाला ज्ञान ।

उपमित्र
संज्ञा स्त्री० पुं० [सं०] बहिरंग साथी । साधारण मित्र [को०] ।

उपमेत
संज्ञा पुं० [सं०] साखू नाम का पेड़ । शालवृक्ष [को०] ।

उपमेय (१)
वि० [सं०] उपमा के योग्य । जिसकी उपमा दी जाय । वर्ण । वर्णनीय ।

उपमेय (२)
संज्ञा पुं० वह वस्तु जिसकी उपमा दी जाय । वह वस्तु जो किसी दूसरी वस्तु के समान बतलाई गई हो । जैसे, 'मुखकमल' में मुख उपमेय है ।

उपमेयोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह उपमा अलंकार जिसमें उपमेय की उपमा उपमान हो और उपमान की उपमेय । जैसे,— पूरनमासी सी तू उजरी अरु तोसी उजारी है पूरनमासी ।— देव (शब्द०) ।

उपयंता
संज्ञा पुं० [सं० उपयन्तृ] [स्त्री० उपयंत्री] वर । पति । वह जो अपमा विवाह करनेवाला हो ।

उपयंत्र
संज्ञा पुं० [सं० उपयन्त्र] वैद्य या जर्राहों का एक यंत्र जिससे देह में चुभकर रह जानेवाली काँटा आदि चीजें निकाली जाती हैं ।

उपयना पु
क्रि० अ० [सं० उत्+पद् प्रा० उप्पज्ज, हिं० उपयना]उत्पन्न होना । पैदा होना । उ०—सुनि हरि हिय गरब गूढ़ उपयो है ।—गीता०, ६ ।११ ।

उपयम
संज्ञा पुं० [सं०] १. विवाह । २. संयम । ३. आधार । आलंबन (को०) ।

उपयमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विवाह । २. संयम । ३. बटा हुआ कुश । ४. अग्नि के नीचे रखना (को०) । ५. अवलंबन । सहारा (को०) ।

उपयाचक
वि० [सं० उप+ याचक] १. माँगनेवाला । निवेदन करनेवाला । २. किसी युवती से विवाह की प्रार्थना करनेवाला । विवाहार्थी (को०) ।

उपपाचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. याचना करना । प्रार्थना करना । माँगना । मनौती [को०] ।

उपयाचना
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपयाचन' [को०] ।

उपयाचित (१)
वि० [सं०] माँगा हुआ । प्रार्थित । निवेदित [को०] ।

उपयाचित (२)
संज्ञा पुं० १. प्रार्थना । निवेदन । २. देवता की बलि । मनौती [को०] ।

उपयान
संज्ञा पुं० [सं०] १. पास आना । प्राप्त करना । प्राप्ति । उपल्ब्धि [को०] ।

उपयापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पास लाना । २. विवाह [को०] ।

उपयाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञपात्र विशेष । २. सोमरस निकालते समय पढ़े जानेवाले सूत्र वैदिक मंत्र । ३. विवाह [को०] ।

उपयायी
वि० [सं० उपयायिन्] १. समीप जानेवाला । २. किसी विशेष स्थिति या अवस्था को प्राप्त करनेवाला [को०] ।

उपयुक्त
वि० [सं०] १. योग्य । ठीक । २. उचित । वाजिब । मुनासिब । ३. संबंद्ध (को०) । ४. सहकारी आधिकारी (को०) । ५. उपयोग में लाया हुआ (को०) ।

उपयुक्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ठीक उतरने का भाव । यथार्थता । २. योग्यता । ३. औचित्य ।

उपयोग
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपयोगी, उपयुक्त] १. काम । व्यवहार । इस्तेमाल । प्रयोग । प्रयोजन । २. योग्यता । ३. फायदा । लाभ । ४. प्रयोजन । आवश्यकता । यौ०—उपयोगवाद ।

उपयोगवाद
संज्ञा पुं० [सं० उपयोग+ वाद] वह सिद्धांत जिसके अनुसार जीवन के सब कार्यों का उद्देश्य अधिक से अधिक प्राणियों को अधिक से अधिक सुख पहुँचाना है । यह १९ वीं शती के विचारक जॉन स्पुअर्ट मिल का सिद्धांत है । (अं० यूटिलिटेरियनिज्म) ।

उपयोगिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] काम में आने की योग्यता लाभका- रिता । उ०—अर्थशास्त्र यह नहीं बतलाता कि कौन कार्य करना उचित है और कौन अनुचित । वह तो केवल इतना ही बतलाता है कि जिस कार्य के करने से अधिक संतोष या उपयोगिता प्राप्त हो—चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा— उसको ही करना चाहिए ।—अर्थ०, पृ० २६ ।

उपयोगितावाद
संज्ञा पुं० [सं०] अधिकाधिक लोगों के अधिकाधिक हित का सिद्धांत । यह जान बेंथम द्वारा प्रतिपादित हुआ था । उ०—व्यक्तिवादी राज्य को उपयोगितावादी तर्क द्वारा भी उचित बताया गया था ।—राजनीति० विचार, पृ० ६९ ।

उपयोगितावादी
वि० [सं० उपयोगितावादिन्] १. उपयोगितावाद के सिद्धांत को माननेवाला । २. उपयोगितावाद के सिद्धांत का प्रवर्तक ।

उपयोगी
वि० [सं० उपयोगिन्] [वि० स्त्री० उपयोगिनी] १. काम देनेवाला । काम में आनेवाला । प्रयोजनीय । मसरफ का । २. लाभकारी । फायदेमंद । उपकारी । ३. अनुकूल । मुवाफिक ।

उपयोष
संज्ञा पुं० [सं०] आनंद । सुख [को०] ।

उपरंग पु
संज्ञा पुं० [सं० उपराग, उपरङ्ग,] २. ग्रहण । २. निंदा । परीवाद । ३. व्यसन । ४. ग्रहों की हलचल । उ०— अखर अभंगा सब उपरंगा नाहिन लंघा आधारम् ।—राम० धर्म०, पृ० २३० ।

उपरंजक (१)
वि० [सं० उपरञ्जक] [स्त्री० उपरंजिका] १. रँगनेवाला । २. प्रभाव डालनेवाला । असर डालनेवाला ।

उपरंजक (२)
संज्ञा पुं० सांख्य में वह वस्तु जिसका आभास उसकी पासवाली वस्तु पर पड़ता है । वह वस्तु जिसके प्रभाव से उसके निकट की वस्तु अपने असली रूप से कुछ भिन्न दिखाई पड़ती है । उपाधि । जैसे, लाला कपड़ा जिसके कारण उसपर रखा हुआ स्फटिक लाल दिखाई पड़ता है ।

उपरंजन
संज्ञा पुं० [सं० उपरन्जन] [वि० उपरंजक, उपरंजनीय, उपरंजित, उपरंज्य] २. रँगना । २. प्रभाव डालना । असर डालना ।

उपरंजनीय
वि० [सं० उपरञ्जनीय] १. रँगने लायक । २. जिसपर प्रभाव डाला जा सके ।

उपरंज्य
वि० [सं० उपरञ्ज्य] १. रँगने लायक । २. जिसपर प्रभाव पड़े ।

उपरंध्र
संज्ञा पुं० [सं० उपरन्ध्र] १. छोटा छेद । २. घोड़े की पसलियों के बीच का भाग जो गुड्ढेनुमा दिखाई पड़ता है । [को०] ।

उपर
अव्य० [सं० उपरि] दे० 'ऊपर' । उ०—(क) पुत्र सनेह मई रसमई । माया जननि उपर फिरि गई ।—नंद० ग्रं०, पृ० २४३ । (ख) तब वह ब्राह्मन उपर कै घर खोलिकै आप नीचे रह्यौ ।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ७० ।

उपरक्त
वि० [सं०] १. जिसमें ग्रहण लगा हो । राहुग्रस्त । २. भोगविलास में फैसा हुआ । विषयासक्त । ३. उपरंजक या उपाधि की सन्निकटता के कारण जिसमें उसका गुण आ गया हो ।

उपरक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चौकी । पहरा । २. फौजी तैयारी । सैनिक तैयारी (डिं) ।

उपरत
वि० [सं०] १. विरक्त । उदासीन । हटा हुआ । २. मरा हुआ । मृत ।

उपरति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विषय से विराग । विरति । त्याग । २. उदासीनता । उदासी । ३. मृत्यु । मौत ।

उपरत्न
संज्ञा पुं० [सं०] घाटिया रत्न । कम दाम के रन्न या पत्थर । विशेष—वैद्यक ग्रंथों के अनुसार वैक्रांतमणि, मोती का सीप, रक्षस, मरकत मणि, लहसुनिया, लाजा, गारुड़िमणि (जहर- मोहरा), शंख और स्फटिक मणि ये नव उपरत्न माने गए हैं ।

उपरना (१)
संज्ञा पुं० [हिं० ऊपर+ ना (प्रत्य०)] ऊपर से औढ़ने का वस्त्र । दुपट्टा । चद्दर । उ०—पिअर उपरना काखा सोती ।—मानस, १ । ३२७ ।

उपरना (२) †
क्रि० स० [सं० उत्पाटन] उखड़ना ।

उपरनो †
संज्ञा स्त्री० [हिं० उपरना] दे० 'उफरना' । उ०—झीने पट की धोकती, उपर उफरनी झीन ।—माधवानल०, पृ० १९२ ।

उपरफट
वि० [हिं० ऊपर+ फट (प्रत्य०)] ऊपरी । इधर उधर का । व्यर्थ का । निष्प्रेयोजन । उ०—मेरी बाँह छाँड़ि दै राधा करत उपरफट बातैं । सूर स्याम नागर नागरि सौं करत प्रेम की बातैं ।—सूर०, १० । १२९९ ।

उपरफट्टू
वि० [हिं० ऊपर+ फट्टू (प्रत्य०)] १. ऊपरी । बालाई । नियमित के अतिरिक्त । बँधे हुए कि सिवाय । जैसे—नौकरी के सिवाय उन्हें उपरफट्टू काम भी बहुत मिलते हैं । २. इधर उधर का । बांठिकाने का । व्यर्थ का । फजूल । निष्य्रयोजन । जैसे, वह उपरफट्टू बातों में बहुत रहा करता है, अपना काम नहीं देखता है ।

उपरम
संज्ञा पुं० [सं०] १. विरति । वैराग्य । उदासीनता । चित्त का हटना । २. विवृत्ति (को०) । ३. मृत्यु (को०) । ४. मेधा (को०) । बुद्धि (को०) ।

उपरमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. विषय भोग से विरत हो जाना । २. वैधिक क्रियाऔं से विराग या उदासीनता । ३. विश्रांति [को०] ।

उपरवार (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० ऊपर+वार (प्रत्य०)] बाँगर जमीन । ऐसी भूमि जिसपर वर्षा का जल अधिक न ठहरे ।

उपरवार (२)
वि० ऊपर स्थित (को०) ।

उपरस
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में पारे के समान गुण करनेवाले पदार्थ । विशेष—गंधक, ईंगुर, अभ्रक, मैनसिल, सुर्मा, तूतिया, लाजवर्द, पत्थर, चुंबक, पत्थर, फिटकरी, शंख, खड़िया, मिट्टी, गेरू, मुल्तानी मिट्टी, कौड़ी, कसीम और बालू इत्यादि उपरस कहलाते हैं ।

उपरहित †
संज्ञा पुं० [सं० पुरोहित, पु उपरोहित] दे० 'पुरोहित' ।

उपरहिती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० उपरहित] दे० 'पुरोहिती' ।

उपराँठा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पराँठा' ।

उपरांत
क्रि० वि० [हिं० ऊपर+ सं० अन्त] अनंतर । पीछे । विशेष—इस शब्द का प्रयोग काल के ही संबंध में होता है ।

उपरा †
संज्ञा पुं० [सं०] उपला । कंड़ा । गोहरा । उ०—और नाँतरु उपरा थापूँगी ।—दो सौ बागन०, भा० १, पृ०, १६४ ।

उपराग †
संज्ञा पुं० [सं०] १. रंग । २. किसी वस्तु पर उसके पास की वस्तु का आभास पड़ना । अपने टिकट की वस्तु के प्रभाव से किसी वस्तु का अपने असल रूप से भिन्न रूप में दिखाई पड़ना । जैसे,—लाल कपड़े के ऊपर रखा हुआ स्फटिक लाल दिखाई पड़ता है । उपाधि । विशेष—सांख्य में बुद्धि के उपराग या उपधि से पुरुष (आत्मा) कर्ता समझ पडता है, वास्तव में है नहीं । ३. विषय में अनुरक्ति । वासना । ४. चंद्र या सूर्य ग्रहण । उ०—भएउ परब बिनु रबि उपरागा ।—मानस, ६ । १०१ ।

उपराचढ़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० ऊपर+चढ़ना] किसी काम को करने या किसी चिज को लेने के लिये कई आदामियों का यह कहना कि हमीं करें या हमीं लें, दूसरा नहीं । एक ही वस्तु के लिये कई आदमियों का उद्योग । अहमहमिका स्पर्धा । उ०—एक पारिषद् ने हँसकर कहा—'महाराज' यदि बहुत आदमी जाने को प्रसुत हैं तो बहुत अच्छी बात है । इस उपराचढ़ी में आपकी सेना का व्यय कम होगा ।—गदाधरसिंह (शब्द०) ।

उपराज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] राजप्रतिनिधि । वाइसराय । गवर्नर जनरल ।

उपराज (२)पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० उपार्जन] उपज । पैदावार ।

उपराजना
क्रि० स० [सं० उपार्जन] १. पैदा करना । उत्पन्न करना । जनमाना । उ०—प्रथम जोति विधि ताकर साजी, औ तेहि प्रेति सिहिट उपराजी ।—जायसी ग्रं०, पृ० ४ । २. रचना । बनाना । मानुष साज लाख मन साजा । होई सोई जो विधि उपराजा ।—जायसी ग्रं०, पृ० ११९ । ३. उपार्जन करना । कमाना । उ०—घटै बढै सौ शिला सदा ही, उपराजै धन दिन प्रति ताही ।—रघुराज (शब्द०) ।

उपराजा
संज्ञा पुं० [सं० उप+ राजन्] प्राचीन काल में राजसभा के एक अधिकारी का पद जिसे उपसभापति कहते हैं ।

उपराठना पु
क्रि० स० [सं० उपरक्त या उपरत; प्रा० उवस्त; उवरय या देशज] पीठ फेरना । विमुख होना । उ०—(क) सखि हे राजिंद चालियउ पल्लाणियाँ दमाज । किहिं पुनवंती साँमहउ, ह्याँ उपराठउ आज ।—ढोला० दू०, ३५० । (ख) प्री मारुवणी मामुहउ, म्हाँ उपराठउ अज्ज ।—ढोला० दू० ३६३ ।

उपराना (२) †
क्रि० अ० [हिं० ऊपर] १. ऊपर आना । उठना । २. प्रकट होना । जाहित होना । ३. उतराना ।

उपराना (२)
क्रि० स० ऊपर करना । उठाना ।

उपराम
संज्ञा पुं० [सं०] १. त्याग । उदासीनता । विराम । उ०— साधन सहित कर्म सब त्यागै, लखि विषसम विषयन तें भागै । नारी लखे होय जिय ग्लाना यह लक्षण उपराम बखाना ।— (शब्द०) । २. आगाम । विश्राम । उ०—नियमकाल तजि तित प्रचि होई, राति दिवस उपराम न सोई ।—शं०, दि० (शब्द०) । ३. निवृत्ति । छुटकारा ।

उपराला पु †
संज्ञा पुं० [हिं० उपर+ ला (प्रत्य०)] पक्षग्रहण । सहायता । रक्षा । उ०—चहुँ दिसि घेरि कोटरा लीनौ । जूझ लतीफ मास द्वै कीनो । उपराला करि सक्यो न कोई । संकित भयो लतीक गढ़ोई ।—लाल (शब्द०) ।

उपरावटा पु
वि० [सं० उपरि+ आवर्त्त या प्रा० उयल्ल (अध्यासित, आरूढ़)]+ हिं० आवटा (प्रत्य०)] तना हुआ । अक्ड़ा हुआ । जो अपना सिर गर्व से ऊँचा किए हो । उ०—कहा चलत उपरावटे अजहूँ खिसी न गात । कंस सौंह दै पूछिए जिन पटेक हैं सात ।—सूर (शब्द०) ।

उपराह पु †
क्रि० वि० [हि० ऊपर] दे० 'उपराही' । उ०—बदन उघारा है पुहुप, अली भँवहिं उपराहँ । की समुझत पति झार कों, अहै छिपी पट माहँ ।—इंद्रा०, पृ० ४८ ।

उपराहना पु
क्रि० स० [हिं०] प्रशंसा करना । सराहना ।

उपराहाँ पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० उपराही' उ०—लै मोती दोउ हाथ न माहाँ, झारू रतन सीर उपराहाँ ।—इंद्रा०, पृ० ५ ।

उपराही (१)पु
क्रि० वि० [हि० ऊपर] ऊपर । उ०—(क) छाड़हि बान जाहिं उपराहीं । गर्ब केर सिर सदा तराहीं ।—जायसी (शब्द०) । (ख) सेंदुर आग सीस उपराहीं । पहिया तरवन चमकत जाहीं ।—जायसी (शब्द०) ।

उपराहीं (२)पु
वि० बढ़कर । बेहतर । श्रेष्ठ । उ०—(क) वह सुजोति हीरा उपराही । हीरा जाति सो तेहिं परछाहीं ।—जायसी ग्रं०, पृ० ४४ । (ख) कहँ अस नारि जगत उपराहिं । कहँ अस जीव मिलन सुख छाहीं ।—जायसी (शब्द०) । (ग) आम जो फरि कै नवै तराहीं, फल अमृत भा सब उपराहीं ।— जायसी (शब्द०) ।

उपरि
क्रि० वि० [सं०] ऊपर । यौ०—उपर्यक्त ।

उपरिक
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल में बड़े अधिकारी के लिये प्रयुक्त पदवी । राज्यपाल । गवर्नर । उ०—हर्ष के ताम्रपत्रोंमें राजस्थानीय, कुमारामात्य तथा उपरिक शब्द मिले हैं । यह कहना उचित है कि ये तीनों पदवियाँ गवर्नर के लिये प्रयुक्त की जाती थीं ।—पूर्व म० भा०, पृ० ११७ ।

उपरिकर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कर जो उन किसानों से लिया जाता था जिनका जमीन पर मौरूसी या अन्य किसी प्रकार का हक नहीं होता था ।

उपरिचर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक वस्तु का नाम । २. दे० 'चोदिराज' । पक्षी । ४. वस्तुओं में से एक [को०] ।

उपरिचर (२)
वि० ऊपर चलनेवाला (जैसे पक्षी) [को०] ।

उपरिचित
वि० ऊपर एकत्र किया हुआ । ऊपर संगृहीत [को०] ।

उपरितन
वि० [सं०] और ऊपर का । और ऊँचा [को०] ।

उपरिष्ठा
संज्ञा पुं० [स०] पराँठा । परौंठा । पराँवठा । उपराँठा ।

उपरिसद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं का वर्गविशेष [को०] ।

उपरिसद (२)
वि० ऊपर लेटा हुआ । २. ऊपर बैठा हुआ [को०] ।

उपरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० उपला] दे० 'ऊपरी' और 'उपली' ।

उपरीउपरा
संज्ञा पुं० [हिं० ऊपर] १. एक ही वस्तु के लिये कई आदमियों का उद्योग । चढ़ाउपरी । उपराचढ़ी । २. एक दूसरे से बढ़ जाने की इच्छा । स्पर्धा । उ०—(क) कटकटात भट भालु बिकट मर्कट करि केहरि नाद । कूदत करि रघुनाथ सपथ उपरीउपरा करि बाद ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) विरुझे बिरदैत जे खेत अरे न टरे हठि बैर बढ़ावन के । रन रारि मची उपरीउपरा भले बीर रघुप्पति रावन के ।— तुलसी ग्रं०, पृ० १९१ ।

उपरीतक
संज्ञा पुं० [सं०] रतिबंध विशेष, जिसमें कामी अपना एक पैर जाँघ पर और दूसरा कंधे पर रखकर कामिनी के साथ केतिक्रीड़ा करता है [को०] ।

उपरुद्ध (१)
वि० [सं०] १. रोक दिया गया । बाधित । २ अवरुद्ध । घेरे में ले लिया गया । अवरुद्ध । बंदीकृत । कैद । ३. छिपाया हुआ । ४. रक्षित [को०] ।

उपरुद्ध (२)
संज्ञा पुं० बंदी । कैदी [को०] ।

उपरुद्धसैन्य
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु के द्वारा रोकी हुई सेना । विशेष—कौटिल्य ने लिखा है कि उपरद्धु हुथा परिक्षिप्त (सब ओर से घिरी हुई) सेना में उपरुद्ध अच्छी है, क्योकि वह किसी एक और से निकलकर युद्ध कर सकती है । परिक्षिप्त सब और से घिर जाने के कारण ऐसा नहीं कर सकती ।

उपरूढ़
वि० [सं०] १. बदला हुआ । २. (व्रण्) भरा हुआ या अच्छा हुआ [को०] ।

उपरूप
संज्ञा पुं० [सं०] आयुर्वेद के अनुसार रोग का यक्तिचित् लक्षण । रोग का आरंभिक लक्षण [को०] ।

उपरूपक
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक के भेदों में दूसरा भेद । छेटा नाटक । इसके १८ भेद हैं—(१) नाटिका, (२) त्रोटक, (३) गोष्ठी, (४) सट्टक, (५) नाटयरासक, (६) प्रस्थानक, (७) जल्लाप्य, (८) काव्य, (९) प्रेंखण, (१०) रासक, (११) संलापक, (१२) श्रीगदित (श्रीरासिका,) (१३) शिल्पक, (१४)विलासिका, (१५) दुर्मल्लिका, (१६) प्रकर- णिका । (१७) हल्लीश, (१८) भाणिका ।

उपरेना पु †
संज्ञा पुं० [हि० उपरना] दे० 'उपरना' । उ०—पाछे श्री गुसाई जी स्नान करि धोती उपरेना पहरि अपरस की गदी पर विराजि कै संखचक्र धरत हते ।— दो सौ बाबन० भा० १, पृ० ९ ।

उपरैना
संज्ञा पुं० [हि० ऊपर +ना (प्रव्य०)] दुपट्टा । चद्दर । उ०— सीस मोर सुकुट लकुट कर लीने ओढ़े पीत उपरैना जामै टँक्यों चारु गोखरू ।—भारतोंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८२६ ।

उपरैनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] औढ़नी । उ० धोखे उपरैना के जो ओढ़े उपरैनी रहे ताही को लै दियो सोतो तबै लै अली गई । फूलन को हार लिए रही तासी मारि फेरि हाथन पसारि कै सरापत चली गई ।— रघुनाथ (शब्द०) ।

उपरोक्त
वि० [हि० ऊपर+सं० उक्त अथवा सं० उपर्य़ुक्त] ऊपर कहा हुआ । पहले कहा हुआ ।

उपरोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोक । अटकाव । २. आड़ । आच्छादन । ढ़कना ।

उपरोधक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोकनेवाला । बाधा डालनेवाला । २. भीतर की कोठरी । गर्भागर । वासगृह ।

उपरोधक (२)
वि० उपरोध करनेवाला । बाधक [को०] ।

उपरोधन
संज्ञा पुं० [सं०] रुकावट । अटकाव । अड़चन ।

उपरोधी
संज्ञा पुं० [सं० उपरोधन्] [स्त्री० उपरोधिनी] रोकनेवाला । बाधा डालनेवाला ।

उपरोहित †
संज्ञा पुं० [सं० पुरोहित] दे० 'पुरोहित' । उ०—तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया । हरि आनब मैं करि निज माया ।— मानस १ ।१६९ ।

उपरोहिती †
संज्ञा स्त्री० [हि० उपरोहित] दे० 'पुरोहितो' । उ०— उपरोहिती करम अति मंदा । बेद पुरान सुमृति कर निंदा ।— मानस, ७ । ४८ ।

उपरौंछा
क्रि, वि० [हि० ऊपर+द्यौंछा (प्रत्य०)] १. ऊपर की ओर । २. ऊपर का ।

उपरौटा
संज्ञा पुं० [हि० ऊपर+औटा (प्रत्य०)] (किसी वस्तु के) ऊपर का पल्ला । आतरौटा का उलटा ।

उपरौठा †
वि० [हि० ऊपर औठा (प्रत्य०)] ऊपर की और का । ऊपरवाला । जैसे—उपरौठो कौठरी ।

उपरौना पु
स्त्री० पुं० [हिं०] दे० 'उपरना' ।

उपर्युपरि
क्रि० वि० [स० उपरि+उपरि] ऊपर ऊपर । उ०— उपर्युपरि लेखक भी आशान्वित जान पड़ता है ।—यौ० उ० सा० पृ०, ६७ ।

उपलंभ
संज्ञा पुं० [सं० उपलम्भ] १. अनुभव । २. प्राप्ति । लाभ । ३. ध्वनि [को०] ।

उपलंभक
वि० [सं० उपलम्भक] १. जानने या अनुभव करनेवाला । २. प्राप्त करनेवाला । लाभ उठानेवाला [को०] ।

उपलंभन
संज्ञा पुं० [सं० उपलम्भन] १. अनुभव । २. लाभ । प्राप्ति [को०] ।

उपल
संज्ञा पुं० [सं०] १. पत्थर । २. ओला । उ०—जिमि हिय उपल कृषी दलि गरहीं ।—मानस १ । ४ । ३. रत्न । ४. मेघ । बादल । ५. बालू । चीनी ।

उपलक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपलक्ष्य' ।

उपलक्षक (१)
वि० [सं०] १. उदभावना करनेवाला । २. अनुमान करनेवाला । ताड़नेवाला । लखनेवाला ।

उपलक्षक (१)
संज्ञा पुं० वह शब्द जो उपादान लक्षण से अपने वाच्य या अर्थ द्बारा निर्दिष्ट वस्तु के अतिरिक्त प्रायः असी कोटि की ओर वस्तुओं का भी बोध कराए । जैसे 'कौऔं से अनाज को बचाना' इस वाक्य में लक्षण द्बारा 'कौओं' शब्द से और पक्षी भी समझ लिए गए ।

उपलक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपलक्षक, उपलक्षित] १. बोध करानेवाला चिह्न । संकेत । २. शब्द की वह शक्ति जिससे उसके अर्थ से निर्दिष्ट वस्तु के अतिरिक्त प्रायः उसी की कोटि की और और वस्तुओं का भी बोध होता है । यह एक प्रकार की अजहत्स्वार्था लक्षणा है । जैसे 'खेत को कौओं से बचाना' इस बाक्य में कोओं शब्द से और और पक्षी भी समझ लिए गए ।

उपलक्षित
वि० [सं०] १. अनुमानित । २. लक्ष्य किया हुआ । ३. संकेत से बताया हुआ ।४. शब्द की लक्षण शक्ति द्वारा उदभावित [को०] ।

उपलक्ष्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. संकेत । चिह्न । २. दृष्टि । उद्देश्य । यौ०— उपलक्ष्य में=दृष्टि से । विचार से । बदले में । एवज में । उ०—पंड़ित जी को हिंदी के सुलेखक होने के उपलक्ष्य में एक एड़्रेस भी दीया गया था ।—सरस्वती (शब्द०) ।

उपलधिप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] चमर नामक मृग, जिसे बालधि अर्थात् पूँछ प्रिय होती है [को०] ।

उपलब्ध
वि० [सं०] १. पाया हुआ । प्राप्त । २. जाना हुआ ।

उपलब्धा
वि० [सं० उपलब्धृ] १. प्राप्त करनेवाला । लाभ उठानेवाला । २. अनुभव करनेवाला । जाननेवाला [को०] ।

उपलब्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्राप्ति । २. बुद्धि । जान ।

उपलब्धिसम
संज्ञा पुं० [सं०] न्यायदर्शन के अनुसार एक प्रकार का हेत्वाभास रूप तार्किक खंड़न । जैसे, यह कहना कि 'शब्द अनित्य है क्योंकि इनकी उत्पात्ति यत्नपूर्वक होती है' ।

उपलभ्य
वि० [सं०] १. प्रात्प । प्राप्त हो सकने योग्य । २. आदर- णीय । संमान के योग्य [को०] ।

उपला
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री०, अल्पा० उपली] ईंधन के लिये गोबर के सुखाए हुए टुकड़े । कंड़ा । गोहरा ।

उपलाभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राप्ति । २. ग्रहण [को०] ।

उपलालन
संज्ञा पुं० [सं०] दुलराना । प्यार करना [को०] ।

उपलालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्यासा । तृषा । २. उत्पीड़न । ३. कुशसन । [को०] ।

उपलिंग
संज्ञा पुं० [सं० उपलिंङ्ग] उपलिङ्ग । १. अरिष्ट । उप्तात । २. दुर्लक्षण । भावी अमंगल का सूचक चिह्न [को०] ।

उपलिप्त
वि० [सं०] लीपा हुआ । लेप किया हुआ [को०] ।

उपलिप्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राप्त करने की इच्छा । पाने की ख्वाहिश [को०] ।

उपली
संज्ञा स्त्री० [हिं० उपला का उल्पा० रूप] छोटा उपला । गोहरी । कंड़ी । चिपड़ी ।

उपलेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी वस्तु से लीपना । किसी वस्तु की ऊपरी तह में कोई गीली चीज पोतना । २. गाय के गोबर से लीपना । ३. वह वस्तु जिससे लेप करें ।

उपलेपन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपलेपित, उपलेप्य, उपलिप्त] लीपना । लीपने का कार्य ।

उपलेपी
वि० [सं० उपलेपिन्] १. लीपने या पोतने का काम करनेवाला । २. बाधक । बाधा विघ्न डालनेवाला [को०] ।

उपलोह
संज्ञा पुं० [सं०] एक गौण घातु [को०] ।

उपलौह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपलोह' [को०] ।

उपल्ला
संज्ञा पुं० [प्रा० उपरिल्ल=ऊपर का या हि० ऊपर+ला (प्रत्य०)] [स्त्री० अल्प उपल्ली] १. ऊपर की पर्त । वह तह जो ऊपर हो । किसी वस्तु का ऊपरवाला भाग ।

उपवंग
संज्ञा पुं० [सं० उपडङ्ग] बंगाल से सटा हुआ एक प्राचीन जनपद [को०] ।

उपवक्ता (१)
संज्ञा पुं० [सं० उपवक्तृ] १. यज्ञ का पुरोहित । २. ऋत्विक् [को०] ।

उपवक्ता (२)
वि० प्रेरित या उत्साहित करनेवाला प्रेरक [को०] ।

उपवट
संज्ञा पुं० [सं०] प्रियासाल नाम का वृक्ष । चिरौंजी का पेड़ [को०] ।

उपवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाग बगीचा । कुंज । फुलवारी । २. छोटे छोटे जंगल । पुराणों में २४ उपवन गिनाए गए हैं ।

उपवना पु
क्रि० अ० [सं० उप्तादन, प्रा० उप्पायण] १. उदय होना । उगना । २. उपजना । पैदा होना । उ०— मोद भरी गोद लिए लालति सुमित्रा देखि देव कहैं सबके सुकृत उपवियौ है ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २७३ ।

उपवर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] सूक्ष्म या विस्तृत वर्णन [को०] ।

उपवर्णन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपवर्ण' [को०] ।

उपवर्ण्य
संज्ञा पुं० [सं०] उपमान । वह जिससे उपमा दी जाय । उ०—जहँ प्रसिद्ध उपवर्त के पलटि कहत उपमेय । बरनत तहाँ प्रतीप हैं कविजन जगत अजेय ।—(शब्द०) ।

उपवर्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऊँची विशिष्ट संख्या [को०] ।

उपवर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यायामशाला । अभ्यास स्थली । २. बसा हुआ या उजड़ा हुआ स्थान । ३. जिला या परगना । ४. राज्य । ५. दलदलीवाला भूमि [को०] ।

उपवर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेंदात के प्रधान भाष्यकारों या आचार्यों में से एक । २. शंकर स्वामी के एक पुत्र का नाम । इन्होंने मीमांसा दर्शन पर अनेक ग्रंथ प्रस्तुत किए [को०] ।

उपवल्गित
वि० [सं०] १. सूजा या फूला हुआ सूजनवाला । २. अश्रुपूर्णा । आँसू से डबडबाया हुआ [को०] ।

उपवल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अमृतश्रवा नाम की लता [को०] ।

उपवसथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. गाँव । वस्ती । २. यज्ञ करने के पहले का दिन जिसमें व्रत आदि करने का विधान है ।

उपवसथोय
वि० [सं०] १. उपवसथ के लिये चुना हुआ (दिन) । २. उपवसथ सबंधी [को०] ।

उपवसथ्य
वि० [सं०] दे० 'उपवसथीय' [को०] ।

उपवसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्रत । उपवास करना । २. पास रहने की अवस्था [को०] ।

उपवस्त
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत । उपवास [को०] ।

उपवस्ता
वि० (सं० उपवस्तु) उपवास करनेवाला । व्रती [को०] ।

उपवस्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवन का अवलंब । जीने का सहारा । जैसे, भोजन, निद्रा आदि [को०] ।

उपवहन
संज्ञा पुं० [सं०] ऊँचे स्वर में स्पष्ट गायन आरंभ करने के पहले मंद और अस्पष्ट स्वर में गुनगुनाना [को०] ।

उपवाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बातचीत करना । संबोधित करना । २. प्रशंसा करना । ३. इंद्रयव नामक धान्य [को०] ।

उपवाक्य
संज्ञा पुं० [सं०] वाक्यखंड़ । किसी प्रधान वाक्य के भीतर आया वह वाक्यखंड जिसमें कोई समापिका क्रिया हो [को०] ।

उपवाजन
संज्ञा पुं० [सं०] पंखा । व्यजन [ को०] ।

उपवाद
संज्ञा पुं० [सं०] अपवाद । निंदा ।

उपवादी
वि० [सं० उपावादिन्] निंदा करनेवाला । लांछन लगनेवाला [को०] ।

उपवास
संज्ञा पुं० [सं०] १. भोजन का छूटना । फाका । जैसे, आज इन्हें तीन उपवास हुए । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. वह व्रत जिसमे भोजन छोड़ दीया जाता है । ३. वे नीच जाती के लोग जिनकी गाँव के मामलों में विशेष अधिकार न हो । वि० दे० 'ग्रामिक' । ४. समीप रहना (को०) । ५. यज्ञाग्नि जलाना (को०) । यज्ञकुंड़ (को०) ।

उपवासक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत । उपवास [को०] ।

उपवासक (२)
वि० उपवास करनेवाला । व्रती [को] ।

उपमासी (१)
वि० [सं० उपवासिन्] (वि० स्त्री० उपवासिनी) उपवास करनेवाला । निराहर रहनेवाला ।

उपवासी (२)
संज्ञा पुं० नीच जाती का ग्रामीण, जिसे गाँव में विशेष अधिकार प्राप्त नहीं रहता [को०] ।

उपवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] पास ले जाना [को०] ।

उपवाही
वि० (सं० उपवाहिन्) बहनेवाला प्रवाहित होनेवाला [को०] ।

उपवाह्य (१)
वि० [सं०] पास ले जाने योग्य । वहन करने या ढोने के योग्य [को०] ।

उपवाह्य (२)
संज्ञा पुं० १. राजा की सवारी के काम अनेवाला हाथी । २. राजवाहनरथ, घोड़ा हाथी आदि [को०] ।

उपविक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] चोरों से या संदेह की स्थिति में किसी माल का खरीदा या बेचा जाना । विशेष—बृहस्पति के अनुसार घर के भीतर, गाँव के बाहर या रात में किसी नीच जाति के अदमी से कम दाम में कोई वस्तु खरीदना उपविक्रय के अंतर्गत है । ऐसा माल खरीदनेवाला अपराधी होता था । पर यदि वह खरीदने के पहले राज्य के सूचना दे देता था तो अपराधी नहीं होता था । (नारद) ।

उपविचार (१
. संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिवेश । पड़ोस [को०] ।

उवविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गौण विद्या । साधारण व्यवहार में आनेवाली विद्या । २. लौकिक विद्या या लोकज्ञान [को०] ।

उपविष
संज्ञा पुं० [सं०] हलके विष । कम तेज जहर । जैसे, अफीम, धतूरा इत्यादि । एक मत से उपविष पाँच हैं—(१) मदार का दूध, (२) सेंहुँड़ का दूध, (३) कलिहारी या करियारी, (४) कनेर, (५) धतूरा; दूसरे मत से सात हैं—(१) मदार, (२) सेहुँड़, (३) धतूरा, (४) कलिहारी या करियारी, (५) कनेर, (६) गुजां, (७) अफीम ।

उपविष प्रणिधि
संज्ञा पुं० [सं०] विष या यंत्र मंत्र आदि द्वारा मनुष्यों को गुत्त रूप से मारनेवाला । विशेष—कौटिल्य के समय में ऐसे गुप्तचर उन लोगों के वध के लिये नियुक्त किए जाते थे जिनसे राजा असंतुष्ट होता था, या जो बागी समझे जाते थे ।

उपविषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अतीस ।

उपविष्ट
वि० [सं०] बैठा हुप्रा ।

उपविष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] आयुर्वेद के अनुसार वह गर्भस्थ भ्रूण, जो समय पूरा हो जाने पर भी गर्भ में टिका रहता है [को०] ।

उपवीणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वीणा वाद्य की बड़ी तूँबीवाला निचला भाग [को०] ।

उपवीणित
संज्ञा पुं० [सं०] वंशी पर गान करना [को०] ।

उपावोत
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपवीति] १. जनेऊ । यज्ञसूत्र । २. उपनयन संस्कार । उ०— करणबेध, चूड़ाकरण श्री रघुबर उपवीत, समय सकल कल्यानंमय मंजुल मंगल गीत ।— तुलसी (शब्द०) ।

उपवीतक
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञोपवीत । जनेऊ [को०] ।

उपावीती
वि० [सं० उपवीतिन्] यज्ञसूत्र या जनेऊ पहननेवाला [को०] ।

उपवीर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का दैत्य [को०] ।

उपवृंहण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपबृंहण' [को०] ।

उपवेद
संज्ञा पुं० [सं०] विद्याएँ जो वेदों से निकली हुई कही जाती है । ये चार हैं—(१) धनुर्वद—जिसे विश्वामित्र ने यजुर्वेद से निकाला । (२) गंधर्व वेद— जिसे भरतमुति ने सामवेद से निकाला । (३) आयुर्वेद—धन्वंतारि ने ऋर्ग्वद से निकाला । (४) स्थापत्य—जिसे विश्वकर्मी ने अथर्ववेद से निकाला ।

उपवेधक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो रास्ते चलते लोंगों को तंग करे या लूटे । गुंड़ा । बदमाश [को०] ।

उपवेश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपवेशन' [को०] ।

उपवेशन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपवेशित, उपवेशी, उपवेश्य, उपाविष्ट] १. बैठना । २. स्थित होना । जमना । ३. हार मान लेना [को०] ।

उपवेशित
वि० [सं०] बैठाया हुआ ।

उपवेशी
वि० [सं०] [उपवेशिन्] १. बैठानेवाला । २. अपने को लगा देनेवाला [को०] ।

उपवेष्टन
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्णातया लपेट देना । आवरितकरना । कपड़े में बाँध देना । (पुस्तक आदि) [को०] ।

उपवेष्टित
वि० [सं०] लपेटा हुआ । बेठन में बँधा हुआ [को०] ।

उपवैणव
संज्ञा पुं० [सं०] दिन के तीन भाग, प्रमात, मध्याह्न और संध्याकाल । त्रिसंध्य [को०] ।

उपाव्याघ्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक छोटा शिकारी चीता [को०] ।

उपव्रज
क्रि० वि० [सं०] व्रज या चौपायों के रहने के स्थान के पास [को०] ।

उपशम
संज्ञा पुं० [सं०] १. वासनाओं को दबाना । इंद्रियनिग्रह । निवृत्ति । शंति । उ०— राम भलाई आपनी भल कियो न काकी । चितवत भाजन कर लियो उपशम समता को ।— तुलसी (शब्द०) । २. निवारण का उपाय । इलाज । चारा । उ०—कामानल को ताप यह हिय जारैगा तोहि । वृथा जरो, उपशम कछू मूझत नाहीँ मोहिं । —रत्नावली (शब्द०) ।

उपशमक
वि० [सं०] उपशमन करनेवाला [को०] ।

उपशमन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपशमनीय, उपशामित, उपशम्य] १. शांति रखना । दबाना । २. निवारण । उपाय से दूर करना ।

उपशय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी वस्तु के व्यवहार से क्लेश का घटना या बढ़ना देखकर रोग का अनुमान । यह रोगज्ञान के पाँच उपायों में से एक है । निदान । २. सूख या आराम देनावाली वस्तु या उपाय । अनुकुल औषध या पथ्य । मुआफिक इलाज । ३. पास सोना (को०) । ४. सहसा आक्रमण करने के लिये एकांत स्थान [को०] ।

उपशय (२)
वि० १. पास सोनेवाला । सांत्वना देनेवाला [को०] ।

उपशया
संज्ञा स्त्री० [सं०] काम में लाने के लिये तैयार की हुई गीली मिट्टी [को०] ।

उपशल्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. नगर के आसपास की भूमि । २. गाँव का सिवान । ३. भाला ।

उपाशंति
संज्ञा स्त्री० [सं० उपशान्ति] १. वासना का त्याग । इंद्रिय- निग्रह । २. विश्रांति । ३. पोड़ा की निवृति । ४. उपचार । इलाज [को०] ।

उपशाखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी शाखा । टहनी [ को०] ।

उपशामक
वि० [सं०] १. शांत करनेवाला । २. (बाधा विघ्न का) निवारण करनेवाला [को०] ।

उपशाय
संज्ञा पुं० [सं०] पहरे आदि के लिये कई व्यक्तियों का बारी बारी से सोना [को०] ।

उपशायक
वि० [सं०] क्रमानुसार सोनेवाला । अपनी बारी आने पर सोनेवाला [को०] ।

उपशायी
वि० [सं० उपशयोन्] दे० 'उपशायक' [को०] ।

उपशाल
संज्ञा पुं० [सं०] गाँव का चौपाल जहाँ बैठकर पंचायत होती थी या गाँव भर के लोग उत्यव आदि मनाते थे । आए हुए साधु संन्यासी इसी में बैठकर उपदेश देते तथा व्यास लोग कथा सुनाते थे [को०] ।

उपशिंधन
संज्ञा पुं० [सं० उपशिङ्गन] १. सूँघना । १. सूँघने की वस्तु [को०] ।

उपशिंधन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपशिघन' [को०] ।

उपशिक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] सहायक अध्यापक । नायब मुदर्रिस [को०] ।

उपशिष्य
संज्ञा पुं० [सं०] शिष्य का शिष्य । चेले का चेला ।

उपशीर्षक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रोग जिसमें सिर में छोटी छोटी फुंसियोँ निकल आती हैं । चाईचूई । २. एक विशेष प्रकार का मोतियों का हार, जिसके बीच में समान आकार के पाँच बडे मोती गुँथे होते हैं (को०) । मुख्य या प्रधान शीर्षक के अंतर्गत आनेवाले छोटे शीर्षक (को०) ।

उपशोभन
संज्ञा पुं० [सं०] सज्जित या अलंकृत करन । सजाना [को०] ।

उपशोभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अलंकरण । साज सज्जा । सजावट [को०] ।

उपशोभिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपशोभा' [को०] ।

उपशोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुखाना । २. सूखना [को०] ।

उपशोषण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपशोषण' [को०] ।

उपश्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऊपर से ढँक लेनेवाली कोई वस्तु [को०] ।

उपश्रुत
वि० [सं०] १. सुना हुआ । २. प्रतिज्ञा किया हुआ । प्रतिज्ञात । राजी [को०] ।

उपश्रुति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुनना । २. श्रवण सीमा जहाँ तक सुना जा सके । ३. स्वीकृती । ४. रात में सुनी जानीवाली दिव्य वाणी जिसे देवता द्वारा भविष्यकथन करना कहा जाता है । ५. भविष्यकथन । ६. प्रतिज्ञा । वाग्दान । ७. अफवाह । लोकचर्चा । जनरव । ८. अंतर्भाव । ९. एक देवी का नाम [को०] ।

उपश्रोता
वि० [सं० उपश्रोतृ] सुननेवाला । श्रोता । पास से सुनने वाला [को०] ।

उपश्लाघा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शेखी । डींग । बढ़ चढ़कर बातें करना । अभिमान [को०] ।

उपश्लिष्ट
वि० [सं०] १. पास रखा हुआ । २. मिला हुआ । ३. समीवपर्ती [को०] ।

उपश्लेष
संज्ञा पुं० [सं०] १. संपर्क । २. आलिंगन [को०] ।

उपश्लेषण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपश्लेष' [को०] ।

उपश्लोक
संज्ञा पुं० [सं०] दशम मनु ब्रह्मासावर्णि के पिता का नाम [को०] ।

उपसंक्रांत
वि० [सं० उपसड़्कान्त] दूसरी ओर घूमा या मुड़ा हुआ [को०] ।

उपसंख्यान
संज्ञा पुं० [सं०] १. योग । २. योग जो पूरक का काम करे । विशेष—वर्तिककार कात्यायन के वार्तिकों पर प्रयुक्त एक पारि- भाषिक शब्द 'उपसंख्यान' है । इन वार्तिकों कं रचना पाणिनी के सूत्रों में न आनेवाले नियमों या विधियों के विधान के लिये हुई है । से उन सूत्रों के आगे जोड़ दिए गए है, जिनमें शब्दसिद्धि के नयमों का अभाव है ।

उपसंग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसन्न रखना । २. रक्षा करना । ३. एकत्र करना । ४. प्रणतिपूर्वक नमस्कार । चरणा छूकर नमस्कार करना । ५. विनम्रता के साथ भाषण । ६. स्वीकार करना (पत्नी के रूप में) । ७. तकिया । उपधान [को०] ।

उपसंगत
वि० [सं० उपसङ्गत] १. मिला हुआ । संमिलित । २. संय़ुक्त (मैथुन क्रिया के लिये) [को०] ।

उपसंगमन
संज्ञा पुं० [उपसङ्गमन] १. एकत्र होना । सामूहिक रूप में ईकटठा होना । २. संभोग । रतिक्रिया [को०] ।

उपसंगृहीत
वि० [सं० उपसङ्गृहीत] १. संग्रह किया हुआ । २. अधिकृत । अधिकार में लाया हुआ [को०] ।

उपसंघात
संज्ञा पुं० [सं० उपसङ्घात] इकटठा करना । जुटाना [को०] ।

उपसंचार
संज्ञा पुं० [सं०उपसञ्चार] प्रवेश । पैठ [को०] ।

उपसंधान
संज्ञा पुं० [सं० उपसन्धान] १. जोड़ना । युक्त करना । २. मिलाना [को०] ।

उपसंध्य
क्रि० वि० [सं० उपसन्ध्य] संध्या के आसपास । सायंकाल के कुछ पहले ।

उपसंन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] १. लेटना । २. त्याग [को०] ।

उपसंपत्
संज्ञा स्त्री० [सं० उपलम्पत्, उपसम्पद्] बौद्ध धर्म की दीक्षा [को०] ।

उपसंपत्ती
संज्ञा स्त्री० [सं० उपसम्पत्ती] १. पास पहुँचना । २. अवस्था- तर में प्रवेश करना [को०] ।

उपसंपदा
संज्ञा पुं० [सं० उपसम्सदा] बोद्धधर्म की दीक्षा ग्रहण करना [को०] ।

उपसंपन्न
वि० [सं० उपसम्पन्न] १. पाया हुआ । लाभान्वित । २. पहुँचा हुआ । ३. उपचित । संचित किया हुआ । ४. परिचित । ५. पर्याप्त । काफी ।

उपसंपादक
संज्ञा पुं० [सं० उपलम्पादक] [ स्त्री० उपसंपादिका] किसी कार्य में मुख्य कर्ता का सहायक या उसकी अनुपस्थिति में उसका कार्य करनेवाला व्यक्ति । २. किसी पत्र या पत्रिका के संपादक का सहायक ।

उपसंभाष
संज्ञा पुं० [सं० उपसम्भाष] १. बातचीत । वाणी द्वारा भावों और विचारों का आदान प्रदान । २. मित्रतापूर्ण अनुरोध [को०] ।

उपसंभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं० उपसम्भाषा] दे० 'उपसंभाष' [को०] ।

उपसंयत
वि० [सं०] १. बिल्कुल मिला हुआ या संयुक्त । २. निरुद्ध [को०] ।

उपसंयम
संज्ञा पुं० [सं०] १. नियंत्रण । निरोध । २. विश्वसंहार प्रलय [को०] ।

उपसंयोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. गौण संबंध । २. रूपातरण । रूप में परिवर्तन या सुधार कर देना [को०] ।

उपसंरोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. साथ साथ बढ़ाना । सहवर्धन । २. शोषण । सोखना [को०] ।

उपसंवाद
संज्ञा पुं० [सं०] समझौता । ऐकमत्य [को०] ।

उपसंवीत
वि० [सं०] १. ढका हुआ । २. लपेटा हुआ । [को०] ।

उपसंव्यान
संज्ञा पुं० [सं०] भीतरी पहनावा । अंतर्वस्त्र [को०] ।

उपसंस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रमुख संस्कारों के अतिरिक्त किए जानेवाले गौण संस्कार ।२. सज्जित करना । सजाना ३. पवित्र करना [को०] ।

उपसंस्कृत
वि० [सं०] १. प्रस्तुत । तैयार । २. सज्जित । सजा हुआ । ३. भरा हुआ [को०] ।

उपसंहरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. पीछे हटाना । २. अस्वीकार करना । नामंजूर करना । ३. अलग करना । ४. आक्रमण करना । चढ़ाई करना [को०] ।

उपसंहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. हरण । परिहार २. समाप्ति । खातमा । जैसे—गुरु जी कृपाकर हमारे भ्रम का उपसंहार किजिए । ३. किसी पुस्तक का अंतिम प्रकरण । किसी पुस्तक के अंत का अध्याय जिसमें उसका उद्देश संक्षेप में बतलाया गया हो । ४. सारांश । निचोड़ । ५. किसी दाँवपेंच या हथियार की रोक । संहार । ६. किसी पुस्तक या लेख का अंतिम अंश (को०) । ७. विनाश । ध्वंस । नाश (को०) । ८. समाप्ति । अंत (को०) ।

उपसंहारी (१)
वि० [सं० उपसंहारिन्] १. उपसंहार करनेवाला । २. ग्रहण किया हुआ । ३. समझा हुआ । ४. पृथक किया हुआ । [को०] ।

उपसंहारी (२)
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय शास्त्र के अनुसार एक हेतु ।

उपसंहित
वि० [सं०] १. मिला हुआ । संयुक्त । २. संबंद्ध । ३. घिरा हुआ [को०] ।

उपसंहृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. समझ । बुद्धि । पहम । २. ग्रहण । ३. अंत । परिपूर्णता । ४. निवृत्ति [को०] ।

उपस †
संज्ञा स्त्री० [सं०अप+बास=महँक] दुर्गध । बदबू ।

उपसक्त
वि० [सं० उप+सक्त] १. लगा हुआ । संलग्न । २. आसक्त [को०] ।

उपसत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संबंध । मेल । २. सेवा । ३. पूजा । ४. पारितोषिक । भेंट । ५. सूचना [को०] ।

उपसना
कि० स० [हि० उपस+ना (प्रत्य०) १. दुर्गंधित होना । २. सड़ना ।

उपसम पु
संज्ञा पुं० [सं० उपशम] दे० 'उपशम' । उ०—नेह न देह गेह सन कबहूँ । उपसम चितन समता सबुहूँ ।— नंद० ग्र०, पृ० २१२ ।

उपसयना पु
क्रि० अ० [सं० अप+सर् या उप+सद् हिं०] हटना । गायब होना । उ०—बहुरी न जानौं दहुँ का भई, दहुँ कविलास कि कहुँ उपसई । — जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २५७ ।

उपसर
संज्ञा पुं० [सं०] १. (गाय की तरह) जाना । गाय के पाससाँड़ का गर्भ धारण कराने के लिये जाना । २. गाय का पहली बार गर्भ धारण करना [को०] ।

उपसरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी के पास यां किसी की तरफ । जाना । २. वह जिसके पास शरण पाने या रक्षा करने के लिये जाया जाय । ३. (बीमारी की हालत रक्त में) का हृदय की ओर तेजी से बहना [को०] ।

उपसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह शब्द या अव्यय जो केवल किसी शब्द के पहले लगता है और उसमें किसी अर्थ की विशेषता ला देता है । जैसे अनु, अव, उद् इत्यादि । २. अशकुन । ३. उपद्रव । दैवी उत्पात । ४. योगियों के योग में होनेवाला विघ्न, जो पाँच प्रकार का कहा गया है—प्रतिभ श्रावण, देव, भ्रम ओर आवर्तक । (मार्कंड़ेय पुराण०) । ५. ग्रहण (को०) । ६. मृत्यु का लश्रण (को०) । ७. भूत प्रेत आदि दुष्ट आत्माओं का आधिकार (को०) ८. दुःख । व्यया (को०) ।

उपसर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. ढ़ालना । २. दैवी उत्पात । उपद्रव । ३. अप्रधान वस्तु । गौण वस्तु । ४. त्याग ।

उपसवना पु
क्रि० अ० [सं० अप+सादन या अप+ √ सुव्] हट जाना । दुर चला जाना । उ०— पवन बाँधि उपसवहि अकासाँ । मनसहिं जहाँ जाहिं तेहि पासाँ ।—जायसी ग्रं० (गृप्त), पृ० ३२८ ।

उपसागर
संज्ञा पुं० [सं०] छोटा समुद्र का एक भाग । खाड़ी ।

उपसादन
संज्ञा पुं० [सं०] १. आदर । श्रद्धा । २. आदरपूर्वक पास जाना । ३. जिम्मेदारी लेना । भार ग्रहण करना ।

उपसाना
क्रि० स० [हि० उपसना] बासी करना । सड़ाना ।

उपसिक्त
वि० [सं०] सींचा हुआ । भींग हुआ । आर्द्र [को०] ।

उपसीर
संज्ञा पुं० [सं०] खेत जोतने का हल [को०] ।

उपसुंद
संज्ञा पुं० [सं०उपसुन्द] सुंद नामक दैत्य का छोटा भाई और निकुंभ दैत्य का पुत्र [को०] ।

उपसूतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] धाय । धाई । धात्री [को०] ।

उपसूर्थक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का भौंरा । २. जुगनू । ३. सूर्यमंड़ल [को०] ।

उपसृष्ट
वि० [सं०] १. लिया हुया । प्राप्त २. प्रेत, भूत आदि दुष्ट आत्माओं द्वारा पराभूत या अधिकृत । ३. ग्रहण किया हुआ । ग्रस्त [को०] ।

उपसेक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सींचना । २. छिड़काव । छिड़कना । ३. रस । जूस [को०] ।

उपसेचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. सींचना या भिगोना । पानी छिड़कना । २. गोली चीज । रसा । ३. वह गोली चिज जिससे रोटी या भात खाया जाय । जैसे, दाल, कढ़ी, सालन इत्यादि ।

उपसेवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पूजा करना । पूजन । २. सेवा करना । ३. व्यवहार में लाना । आनंद लेना ४. अनुभव करना [को०] ।

उपसेवी
वि० [सं० उपसेविन्] १. अभ्यास करनेवाला । २. सेवा करनेवाला [को०] ।

उपस्कर
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिसा कंरना । चोट पहुँचाना । २. दाल या तरकारी में ड़ालने का मसाला । ३. घर का सामान या सजावट की सामग्री । ४. वस्त्राभूशणादि । ४. जीवननिर्वाह के लिये आवश्य़क पदार्थ । रसद या सामान (को०) ।

उपस्करण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सजाना । शृंगार करना । २. निंदा । ३. विकार । ४. ढेर । समूह । ४. वध करना । आघात पहुँचाना [को०] ।

उपस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] १. पूरक । किसी वस्तु में ओर जोड़ देना । २. अध्याहार । व्यंजना । ३. शृंगार करना । सजावट । ४. आभूशण । ४. आघात । प्रहार । ३. संग्रह । समूह । ढेर । ७. उपस्कार [को०] ।

उपस्कृत
वि० [सं०] १. प्रस्तुत । तैयार । २. निंदित । लंछित । ३. मारा हुआ । हत । ४. एकत्र किया हुआ । संगृहित । ४. सज्जित । शृंगरित । ६. अध्याह्वत । पूरित [को०] ।

उपस्कृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पूर्ति । २. सजावट [को०] ।

उपस्तंभ
संज्ञा पुं० [सं० उपस्तम्भ] सहारा । अवलंबन । २. जीवन का आश्रय (भोजन, निद्रा, आदि) ३. प्रोत्साहन । उत्साह बढ़ाना ४. आश्रय । आधार [को०] ।

उपस्तंभन
संज्ञा पुं० [सं० उपस्तभ्भन] दे० 'उपस्तंम' [को०] ।

उपस्तब्ध
वि० [सं०] १. जिसे सहारा दिया गया हो । आश्रित । २. रोका हुआ [को०] ।

उपस्तरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेखेरना । छितराना । २. बिस्तर । ३. फैली हुई वस्तु । ४. (यज्ञ की अग्नि के चारों ओर) घास फैलाना [को०] ।

उपस्तीर्ण
वि० [सं०] फेला हु्प्रा । बिखरा हुआ [को०] ।

उपस्त्री
संज्ञा पुं० [सं०] उपपत्नी । रखेली । बिना । ब्याह के पत्नी के समान रख ली जानेवाली स्त्री० [को०] ।

उपस्थ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीचे या मध्य का भाग । २. पेड़ । ३. पुरुषचिह्वन । लिंग । ३. स्त्रीचिहन । भग । यौ०—उपस्थेंद्रिय । ४. गोद । क्रोड ।

उपस्थ (२)
वि० निकट बैठा हुआ ।

उपस्थदल
संज्ञा पुं० [सं०] पीपल का वुक्ष [को०] । विशेष—इस बृक्ष का नाम 'उपस्यदल' इसलिये पड़ा । क्योंकि इसके पत्ते स्त्री जाननेंद्रिय के आकार के होते है ।

उपस्थनिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रियदमन । कामवासना पर अधिकार रखना [को०] ।

उपस्थपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपस्थदल' [को०] ।

उपस्थल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नितंव । चूतड़ । २. कूल्हा । ३. पेड़ ।

उपस्थली
संज्ञा पुं० [सं०] १. कूह्ला । कटि । २. नितंब ३. पेड़ ।

उपस्थाता (१)
संज्ञा पुं० [सं० उपस्थातृ] १. अनुचर । दास । सेवक । २. उज्ञपुरोहित । ऋत्विक् [को०] ।

उपस्थाता (२)
वि० १. आश्रित । उपनत । समय का पालन करनेवाला । ठीक समय पर आनेवाला [को०] ।

उपस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपस्थानीय, उपस्थित] १. निकट आना । सामने आना । २. अभ्यर्थना या पूजा के लिये निकट आना । ३. खड़े होकर स्तुति करना । खड़े होकर पूजा करना । उ०—दै दिनकर को अर्घ्य मंत्र पढ़ि परस्थान पुनि कीन्हों । गायत्री को जपन लगे पुनि ब्रह्म बीज मन दीन्हें ।— रघुराज (शब्द०) । विशेष—इस प्रकार का विधान प्राय? सूर्य ही री पूजा में है । ४. पूजा का स्थान । कोई पावित्र स्थान । ४. समा । समाज । ६. प्रस्तुत राज्जकर इकट्ठा करना ओर पुराना बाकी वसूल करना । ७. अखाड़ा । मल्लशाला (को०) । ८. स्मृति । याददाश्त (को०) ९. प्राप्ति (को०) । १०. स्वीकृति । समझीता करना (प्रेमी की भाँति) (को०) ।

उपस्थानशाला
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध घर्मानुसार प्रार्थनाभवन । विहार का प्रार्थनाकक्ष [को०] ।

उपस्थापक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो विषय को विचार ओर स्वीकृति के लिये सभा में उपस्थित करता हो । २. स्मृति को जगानेवाला । ३. व्याख्याता । पढ़ानेवाला । सिखानेवाला [को०] ।

उपस्थापन
संज्ञा पुं० [सं०] पास रखना । २. तैयार करना । प्रस्तुत करना । ३. स्मृति का जागरण । याद आना । ४. सेवा [को०] ।

उपस्थापना
संज्ञा स्त्री०[सं०] दीक्षित करना । (जैन मत के क्षपणक के रूप में) [को०] ।

उपस्थायक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दास । नोकर । २. बोद्ध धर्म को माननेवाला ।

उपस्थायी
वि० [सं० उपस्थायिन्] १. पास खड़ा हुआ ।२. प्रतीक्षा करनेवाला । ३. पास आनेवाला [को०] ।

उपस्थित (१)
वि० [सं०] १. समीप बैठा हुआ । सामने या पास आया हुआ । विद्यमान । मौजूद । हाजिर । क्रि० प्र०—करना=(१) हाजिर करना । सामने लाना । (२) पेश करना । दायर करना, जैसे, — अमियोग अपस्थित करना । होना=(१) आ पड़ना । जैसे,—बड़ा संकट उपस्थित हुआ । (२)ध्यान में लाया हुआ । स्मरण किया हुआ । याद । जैसे —हमें वह सूत्र उपस्थित नहीं है ।

उपस्थित (२)
संज्ञा पुं० १ द्बारपाल । दरवान । २. सेवा । ३. प्रार्थना । ४. आसनविशेष [को०] ।

उपस्थिता
संज्ञा पुं० [सं०] एक वर्णापृत्त का नाम । ईम बृत्त के प्रत्येक चरण णें एक तगण, जे जगण ओर अंत में एक गृरु होता है । त, ज, ज, ग = ऽऽ।, ।ऽ।, ।ऽ।, ऽ। उ०—तीजी जग पावन कंस को । दै मुक्ति पठावत धाम को । बाकी लखि रानि उपस्यिता । दै जान करी सुख साजिताष—छंद० पृ, १४१ ।

उपस्थिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विद्यमानता । मौजूदगी । हाजिरी । २. प्राप्ति । ३. पूति । ४. स्मृति । स्मरण शक्ति । सेवा । ६. समीपता । निकटता [को०] ।

उपस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] गीला करना । आर्द्र करना [को०] ।

उपस्नेहता
संज्ञा स्त्री० [सं०] गीलापन । आर्द्रता [को०] ।

उपस्पर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. छूना । २. मेल । संपर्क । ३. स्नान । ४. आचमन [को०] ।

उपस्पर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपस्पर्श' [को०] ।

उपस्मृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटे या गोण स्मृतिग्रंथ । ये संख्या में अठारह है, जो इस प्रकारप है—(१) व्यास स्मृति, (२) सनत्कुमार स्मृति, (३) कश्यप स्मृति, (४) स्कंद स्मृति, (५) जाबालि स्मृति, (६)कात्यायन स्मृति, (७) कपिंजल स्मृति, (८) जनक स्मृति, (९) नाचिकेत स्मृति, (१०) व्याघ्र स्मृति, (११) जातूकर्ण स्मृति, (१२) शतर्जु स्मृति, (१३) लोगाक्षि स्मृति, (१४) विश्रामित्र स्मृति, (१५) कणाद स्मृति, (१६) बौधायन स्मृति, आदि [को०] ।

उपस्रवण
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्त्री का मासिक स्राव । २. प्रवाह । धारा । [को०] ।

उपस्वत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. जमीन या किसी जायदाद की पैदावार या आमदनी का हक । २. मालगुजारी [को०] ।

उपस्वेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. पसीना । २. नमी । आर्द्रता । ३. ऊष्मा । गर्मी [को०] ।

उपहंता
वि० [सं० उपहन्तु] १. बिपरीत प्रभाववाला । बाधक । २. आवेश में लानेवाला । ३. नष्ट करनेवाला (को०) ।

उपहंत
वि० [सं०] १. नष्ट किया हुआ । बरबाद किया हुआ ।२. बिगड़ा हुआ । दूषित । ३. पिड़ित । संकट में पड़ा हुआ । ४. किसी अपवित्र वस्तु के संसर्ग से अशुद्ध । ५. बज्रपात से आहत (को०) ।६. अनादृत । तिरस्कृत (को०) ।

उपहतक
वि० [सं०] अभागा । भाग्यहीन (को०) ।

उपहतात्मा
वि० [सं० उपहत+आत्मन्] विकृत मास्तिष्कवाला । जिसका दिमाग ठीक न हो [को०] ।

उपहति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रहार । आघात । चोट । २. हत्या । वध (को०) ।

उपहत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. औंखों की चकाचौंध । २. आखों द्बारा व्यक्त विकारी प्रेम [को०] ।

उपहरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाना । उठाकर लाना । २. पकड़ना । ग्रहण करना ।३. देवता अथवा सामान्य व्यक्ति को भेंट या नजर देना । ४. शिकार की भेंट करना । ५. भोजन या खाद्य पदार्थ परोसना [को०] ।

उपहव
संज्ञा पुं० [सं०] १. निमंत्रण । बुलाना । २. सूचना देना । ३. प्रार्थना करना [को०] ।

उपहसित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हास के छह भेदों से चौथा । नाक फुलाकर आँखें टेढी़ करते ओर गर्दन हिलाते हुए । हँसना ।२. ब्यंग्य से भरा हास । उपहास (को०) ।

उपहसित (२)
वि० जिसका उपहास किया गया हो [को०] ।

उपहस्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पान रखने का डब्वा । पानदान । पनडब्बा । २. बदुआ [को०] ।

उपहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेंट । नजर । नजराना । उ०—(क) धरि धरि सुंदर बेष चले हरषित हिए । चँवर चीर उपहारहार मणि गण लिए ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) आए गोप भेंट लै लै कै भूषण बसन सोहाए । नाना विधि उपहार दूध दधि अगे धरि सिर नाए ।—(शब्द०) । (ग) दीह दीह दिग्गजन के केशव मनहु कुमार । दीन्हे राजा दशरथहि दिगपालन उपहार ।—केशव (शव्द०) । २. शँवों की उपासना के नियम जो छह हैं—हसित, गीत, नृत्य हुड़ुक्कार, नमस्कार ओर जप ।

उपहारक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बलि । देवता का उपहार । नैबेद्य । २. भेंट । नजर [को०] ।

उपहारसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० उपहारसंधि] वह संधि जिसमें संधि करने के पूर्व एक पक्ष को दूसरे को कुछ उपहार में देना पड़े । (कामंद०) ।

उपाहारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपहारक' [को०] ।

उपहारी
वि [सं० उपहारिन्] १. भेंट देनेवाला । २. लानेवालों । ३. बलि देनेवाला [को०] ।

उपहार्य
संज्ञा पुं० [सं०] भेंट । नजर [को०] ।

उपहालक
संज्ञा पुं० [सं०] कुंतल देश का प्राचीन नाम [को०] ।

उपहास
संज्ञा पुं० [सं०] [पि० उपहास्य] हैसी ठट्ठा । दिल्लगी । २.निंदा । बुराई । उ०—पैहहिं सुख मुनि सुजन जत, खल यो०—उपहासजनक । उपहासार्ह ।

उपहासक (१)
वि० [सं०] दूसरों का उपहास करनेवाला । दिल्लिनीबाज । मजाकिया [को०] ।

उपहासक (२)
संज्ञा पुं० १. विदूषक । २. भंड । भाँड़ ३. नट [को०] ।

उपहासास्पद
वि० [सं०] १ उपहास के योग्य । हँसी उड़ाने के लायक । २. निंदनीय ।

उपहासी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उपहास] हँसी । ठट्ठा । निदा उ०—सब नृप भए जोग उपहासी—मानस, १ष २५१ ।

उपहास्य
वि [सं०] उपहास के योग्य । हँसी का पात्र । जिसकी मूढ़ता की हँसी उड़ाई जा सके [को०] ।

उपहास्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] हँसी उड़ाई जाने की पात्रता या योग्यता । उपहास भाजनता [को०] ।

उपहित
वि० [सं०] १. ऊपर रखा हुआ । स्थापित । २. घारण किया हुआ । ३. समीप लाय़ हुआ । हवाले किया हुआ । दिया हुआ । ४. संम्मिलित । मिला हुआ । ५. अपाधिय़ुक्त । ६. कुछ लाभकारी [को०] ।

उपहिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ऊपर रखान । २. आत्मसमर्पण [को०] ।

उपही पु
संज्ञा पुं० [सं०उद्+पथिन्, प्रा० उत्पाहि । ऊपर जानेवाले] अपरिचित व्याक्ति । बाहरी या विदेशी आदमी बायबी । अजनबी । उ०—(क) ये उपही कोउ कुँप्रर अहेरी । स्याम गोर धनुबान तूनधर बित्रकूट अब आय रहे री । —तुलसी ग्रं० पृ, ३४४. । (ख) जानि पहिचानि बितु आपु ते आपुने हुबे प्रानहु तें प्य़ारे प्रियतम उपही ।—तुलसी ग्र० पृ० ३४२ ।

उपहूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आमंत्रण । आह्वान । पुकारना । २. लड़ने के लिये ललकार या चुनौती [को०] ।

उपह्वत
वि० [सं०] १ भेंट किया हुआ । २. पास लाय हुआ । ३ परसा हुआ । ४. बलि दिया हुआ [को०] ।

उपह्लार
संज्ञा पुं० [सं०] १. एकांत या निर्जन स्थान । २. पास । अंतिक । ३. समीपता । ४. सोमपात्र का देढ़ा आकार । ५. रथ [को०] ।

उपह्लान
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुकारना । २. निमंत्रित करना । ३. नाम लेकर पुकारना । अनिमंत्रित करना [को०] ।

उपांग
संज्ञा पुं० [सं० उपाङ्ग०] १. अंग का भाग । अवयव । २. वह वस्तु जिससे किसी वस्तु के अंगों की पूर्ति हो । जैसे, वेद के उपांग, जो चार है—पुराण, न्याय, मीमांसा ओर धर्मशास्त्र । ३. तिलक । टीका । ४. प्राचिन काल का एक बाजा जो चमड़ा मद़कर बनाया जाता था ।

उपांगगीत
संज्ञा पुं० [सं०उपाङ्गगीत] एक प्रकार का गीत [को०] ।

उपांगललिता
संज्ञा स्त्री० [सं० उपाङ्गललिता] एक देवी जिनका व्रत अश्विन मास की शुक्ला पंचमी को रखा जाता है [को०] ।

उपांजन
संज्ञा पुं० [सं० उपाञ्जन] १. गोबर से धरती को लीपना । २. चूने से सफेदी करना ।

उपांत (१)
संज्ञा पुं० [सं० उपान्त] [वि० उपांत्य] १. अंत के समीप का भाग । २. प्रांत भाग । आसपास का हिस्सा । ३. छोर । किनारा ।

उपांत (२)
वि० अंतिम के पासवाला । अंतवाले से एक पहला [को०] ।

उपातिक (१)
वि० [सं० उपान्तिक] पासवाला । समीपवर्ती । पड़ोसी [को०] ।

उपांतिक (२)
संज्ञा पुं० निकटता । समीपता । संनिघान । अंतरहिनता [को०] ।

उपांतिम
वि० [सं०उपान्तिम] अंतवाले के समीपवाला । उपांत्य । उ०—'ज्ञानस्वरेदय' उनकी उपांतिम रचना थी । —सं० दरिया, पृ० ४१ ।

उपांत्य (१)
वि० [सं० उपान्त्य] १. अंतवाले के समीपवाला । अंतिम से पहले का ।

उपांत्य (२)
संज्ञा पुं० १. आँख का कोना । २. समीपता [को०] ।

उपांशु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मंद स्वर में मंत्र का जप । २. मौन । ३. सोमरस के उपहार का नाम [को०] ।

उपांशु (२)
कि० वि० १. मंद स्वर में । धीरे धीरे । २. व्याक्तिगत रूप में । रहस्यात्मक ढंग से [को०] ।

उपांशुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] मौनता [को०] ।

उपाइ पु
संज्ञा पुं० [सं०उपाय] दे० 'उपाय' उ०— (क) तौ सब दरसी सुनिय प्रभु करौ सी बेगि उपाइ ।— मानस, १५९ । (ख) श्रीमद करि जु अंध ह्वै जाइ । दरिद अंजन बढौ़ उपाइ ।—नंद० ग्रं०, पृ० २५२ ।

उपाउ पु
संज्ञा पुं० [सं० उपाय] दें 'उपाय' । उ०—रूँधहु करि उपाउ बर बारी । —मानस, २ ।१७ ।

उपाकरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. योजना । उपक्रम । तैयारी । अनुष्ठान ।२. यज्ञ में वेद पाठ । ३. यज्ञ के पशु का एक संस्कार । ४. कार्य आरंभ करने के लिये निमंत्रण या बुलावा (को०) ।

उपाकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] संस्कारपूर्वक वेद का ग्रहण । वेदपाठ का आरंभ । विशेष—यह वैदिक कर्म समस्त औषधियों के जम जाने पर आबण मास की पूर्णिमा की, या श्रवण—नक्षत्र—युक्त दिन को या हस्त- नक्षत्र-युक्त पंचमी को गहासुत्र में कही विधि से किया जाता है । उत्सर्ग का उलटा । २. वेदाध्ययन आरंभ करने के पहले किया जानेवाला वैदिक कर्म

उपाकृत (१)
वि० [सं०] १. पास लाया हुआ । २. बुलाया हुआ । प्रैष मंत्रों के उच्चारण द्बारा निमंत्रित । ३. यज्ञ मेंहत (बलि पशु) । ४. अमंगलजनक । ५.मंत्रों द्बारा पवित्र किया हुआ । ६. प्रस्तुत या तैयार किया हुआ [को०] ।

उपाकृत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ का बलिपशु, जो विहित प्रार्थना- ज्ञाठ के समय मारा जाता है । २. दुर्दैव । अंमगल । ३. आरंभ । ४. यज्ञपशु का विहित संस्कार । ५. निमंत्रण आह्लान । बुलावा [को०] ।

उपाख्यान
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरानी कथा । पुराना वृत्तांत । २. किसी कथा के अतर्गत कोई ओर कथा ३. वृत्तांत । हाल । ४. दूसरे से सुनी गई कथा य आख्यायिका को कहना (को०) ।

उपाख्यानक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपाख्यान' [को०] ।

उपागत
वि [सं०] १. आया हुआ । २. घटित । लौटा हुआ । ४. प्रतिज्ञा किया हुआ । ५. अनुभूत । ६. सहा हुआ [को०] ।

उपागम
संज्ञा पुं० [सं०] १. आगमन । आना । २. घटना । ३. प्रतिज्ञा । ४. समझौता । बचन बद्धता । ५. स्वीकृति । ६. पीड़ा । कष्ट । ७. अनुभूति [को०] ।

उपाग्निका
संज्ञा स्त्री० [सं०] समुचित ढंग से विवाहित पत्नी [को०] ।

उपाग्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंतिम के पासवाला भाग । २. गौरा या अनुमुख्य सदस्य का व्याक्ति [को०] ।

उपाग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उपाकर्म' ।

उपाटना पु
क्रि० स० [सं० उत्पाटन, प्रा० उत्पाडण] उखाड़ना । उ०—लीन्ह एक तेहि सैल उपाटी, रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी । मानस, ६ । ६७ ।

उपा़ड़ †
संज्ञा पुं० [प्रा० उपाड़, हि० उपड़ना=उभरना] किसी तीव्र ओषध आदि के कारण शरीर की खाल का उड़ने लगना । मुहा०—उपाड़ करना=किसी दवा का शरीर पर छाले डालना यां वहाँ की खाल उड़ाना ।

उपाड़ना
क्रि० स० [सं० उत्पाटन, प्रा० उत्पाड़ण] दे० 'उपाटना' । उ० (क) जोबण छत्र उपाड़ियउ राज न बइसऊ कांइ ।— ढोला० दू० २७ । (ख) सो पिंजरे में ते काड़ उपाड़ उसके पर ।—दक्खिनी० पृ० ८८ ।

उपाती
संज्ञा स्त्री० [उपात्ति, प्रा० उत्पात्ति] उत्पात्ति । पैदाइश । उ०— सुन्नहि तैं है सुन्न उपाती । सुन्नाहि तें उपजेहिंबहु भाँती । जायसी (शब्द०) ।

उपात्त (१)
वि० [सं०] १. प्राप्त । उ०— इन्हें उपादि कहते हैं क्योंकि यह आलय से उपात्त है ।—संपूर्णा०, आभि० ग्रं० पृ० ३०१ । २. युक्तियुक्त (को०) । ३. उनुभूत (को०) । ४. समाविष्ट (को०) । ५. अंतर्गत (को०) । ६. अंतर्गणित (को०) । ७. प्रतिसंह्लत (को०) ।८. वर्णित (को०) ।

उपात्त (२)
संज्ञा पुं० मदहीन हाथी [को०] ।

उपात्यय
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रचलित रूढ़िया परंपरा का परित्याग । २. अशिष्टता । अभद्र आचरण [को०] ।

उपादान
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपादेय] १. प्राप्ति । ग्रहण । स्वीकार । २. ज्ञान । परिचय । बोध । ३. अपने अपने विषयों ले हंद्रियों की निवृत्ति । ४. वह कारण जो स्वयं कार्य रूप में परिणत हो जाय । सामग्री जिससे कोई वस्तु तैयार हो । जैसे, घड़े का उपादान कराण मिट्टी है । वैशेषिक में इसी को समवायिकरण कहते हैं । सांख्य के मत से उपादान और कार्य एक ही है । ५. सांख्य की चार आध्यात्मिक तुष्टियों में से एक, जिसमें मनुष्य एक ही बात से पूरे फल की आशा करके ओर प्रयत्न छोड़ देता है । जैसे, 'संन्यास, लेने से ही विवेक हो जायगा; यह समझकर कोई संन्यास ही लेकर संतोष कर ले और विवेकप्राप्ति के लिये ओर यत्न न करे ।

उपादि
संज्ञा स्त्री० [सं० उपाधि] दे० 'उपाधि' ।

उपादेय
वि० [सं०] १. ग्रहण करने योग्य । अंगीकार करने योग्य । लेने योग्य । २. उत्ताम । श्रेष्ठ । अच्छा ।

उपाधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ओर वस्तु को और बतलाने का छल । कपट ।२. वह जिसके संयोग से कोई वस्तु ओर की और अथवा किसी विशेष रूप में दिखाई दे । जैस,आकाश अपरिमित ओर निराकार पदार्थ है, पर घड़े ओर कोठरी के भीतर परिमित ओर जुदा रूपों में जान पड़ता है । विशेष—सांख्य़ में बुद्धि की उपाधि से ब्रह्म करता देख पड़ता है । वास्तव में है नहीं । इसी प्रकार वेदांन में माया के संबंध ओर असंबंध से ब्रह्म के दो भेद माने गए है—सोपाधि ब्रह्म । (जीव) और निरुपाधि ब्रह्म । ३. उपद्रव । उत्पात । ४. कर्मव्य का विचार । धर्मचिंता । ५. प्रतिष्ठासूचक पद । खिताब ।

उपाधी
वि० [सं० उपाधि (लाक्ष०)] [वि० स्त्री० उपाधिन] उपद्रवी । उत्पात करनेवाला । —जो तू लंगर ढीठ उपाधी ऊधम रूप भयो । भारतेंदु ग्र० भा० २. पृ० ३७६ ।

उपाध्या †
संज्ञा पुं० [सं०उपाध्याय] दे० 'उपाध्याय ।

उपाध्याय
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उपाध्याया, उपाध्यायानी, उपाध्यायी ।] १. वेद वेदांग का पढ़ानेवाला २ उध्यापक । शिक्षक । गृरु । ३. ब्राह्मणों का एक भेद ।

उपाध्याया
संज्ञा स्त्री० [सं०] उध्यापिका । पढ़ानेवाली ।

उपाध्यायानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपाध्याय की स्त्री । गुरुपत्नी ।

उपाध्यायीनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपाध्याय की स्त्री । गृरुपत्नी ।

उपाध्यायी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपाध्याय की स्त्री । गुरुपत्नी । २. अध्यापिका । पढ़ानेवाली स्त्री ।

उपाध्व
संज्ञा पुं० [सं० उपाध्वन्] खेतों में जानेवाली पगडंड़ी । ड़ाँड़ । मेंड़ [को०] ।

उपाध्वा
संज्ञा पुं० [सं०उपाध्वन्] दे, 'उपाध्व' [को०] ।

उपान
संज्ञा स्त्री० [प्रा० उप्पायण=ऊँचा जाना या ऊपर जाना अथवा हि० ऊपर+आन (प्रत्य०)] १. इमारत की कुर्सी । २. खंभे के नीचे की वह चौकी जिसपर खंभा बैठाया जाता है । पदस्तल ।

उपानत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. जूता । पनहीँ । २. खड़ाऊँ ।

उपानत
संज्ञा पुं० [सं० उपानत्] दे, 'उपानत्' । उ० —(क) बिरचि उपानत बेचन करई । आधो धन संतन कई, भरई ।— रघुराज (शब्द०) । (ख) लघु लघु लसत उपानत लघु पद लघु धनुही कर माहीं । —रघुराज (शब्द०) ।

उपानद
संज्ञा पुं० [सं०] हिड़ोल राग रा पुत्र या भेद ।

उपानना पु
क्रि० स० [हिं०] उत्पन्न करना । पैदा करना ।

उपानह
संज्ञा पुं० [सं० उपानह] जूता । पनहीं । उ०— धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पायँ उपानह को नहीं सामा । इतिहास, पृ० २०० ।

उपाना पु
क्रि० अ० [सं० उत्पादन, पा० उत्पादन, प्रा० उत्पायण] १. उत्पन्न करना । पैदा करना । उ०—(क) जेहि सुष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा । —मानस, १ ।१८९ । (ख) अमृत की आपगा उपाई करतार है ।—श्यामा० पृ० २९ । २. करना । संपादन करना । उ०— (क) तबहिं० स्याम, इक युक्ति उपाई ।—पूर (शब्द०) । (ख) धर्मपुत्र जब जज्ञ उपायों, द्बिज मुख ह्लै पन लीन्हौं—सूर (शब्द०) ।

उपानी
संज्ञा स्त्री० [सं०उत्पन्न, प्रा० उप्पण, उत्पन्न] उत्पात्ति । सुष्टि । उ०—वलसी चंद सूर पुनि चलसी, चलसी सबै उपानी ।—दादू० पृ० ५७२ ।

उपाप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्राप्ति । २. पहुँच [को०] ।

उपाबर्न्य पु
संज्ञा पुं० [सं० उपवर्ण्य] दे० 'उपवर्ण्य' उ०— जहाँ अनादर आन को उपावर्न्य उपमेय । वरनत तहाँ प्रतीप है कोऊ सुकबि अजेय । —मातिराम ग्रं० पृ० ३७३ ।

उपाय
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपायी, उपेय] १. पास पहुँचना । निकट आना । २. वह जिससे अभीष्ठ तक पहुँचे । साधन । युक्ति तदबीर । ३. राजनीति में शुत्र पर विजय पाने की सुक्ति । ये चार हैं, साम (मैत्री), भेद (फूट ड़ालना), दंड़ (आक्रमण) और दान (कुछ जेकर राजी करना) । ४. श्रंगार के दो साधन साम ओर दान ।

उपायन
संज्ञा पुं० [सं०] १. भैंट उपहार । नजराना । सौगात । २. पास आना (को०) । गृरु के पास जाना । शिष्य होना (को०) । ४. आरंभ (को०) ५. अध्यवसाय (को०) ।६. प्रवृत्ति (को०) ।

उपायिक
वि० [सं०] १. उन्नति करनेवाला । २. बढ़ाने या वृद्बि करनेवाला [को०] ।

उपायी
वि० [सं० उपायिन्] १. उपाय करनेवाला । य़ुक्ति रचनेवाला ।२. पास जानेवाला (को०) । ३. सुरत के लिये पास जानेवाला (को०) ।

उपायें पु †
क्रि० वि० [सं० उपायेन] उपाय से । उ०—सी श्रम जाइ न कोटि उपायों ।—मानस, १ ।११ ।

उपारंभ
संज्ञा पुं० [सं० उपारम्भ] आरंभ । शुरुप्रात [को०] ।

उपार
संज्ञा पुं० [सं०] १. निकटता । समीपता । २. भूल । ३. अपराध । ४. पाप [को०] ।

उपारत
वि० [सं०] १. प्रसन्न । खुश । २. लौटाया हुआ । ३. लगा हुआ । तल्लीन । ४. बार बार होनेवाला । ५. त्यक्त । अयुक्त [को०] ।

उपारना पु
क्रि० स० [सं० उत्पाटन, प्रा० उप्पाड़ण] दे० 'उपाटना' । उ०—(क) खाएसि फल अरु बिटप उपारे ।—मानस, ५ ।१८ । (ख) सिआर का जञों सींग जनमए गिरि उपारब चाह ।— बिघापति पृ० ३५० ।

उपार्जक
वि० [सं०] उपार्जन करनेवाला । कमानेवाला । पैदा करनेवाला [को०] ।

उपार्जन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उर्पाजनीय, उपार्जित] कमाना पैदा करना । लाभ करना । प्राप्त करना । उ०—प्राप कुछ उपार्जन किया ही नहीं, जो था वह नाश हो गया । —भारतेंदु ग्रं० भा० १, पृ० २६५ । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

उपार्जना
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपार्जन' [को०] ।

उपार्जनीय
वि० [सं०] १. संग्रह करने योग्य । एकत्र करने लायक । २. प्राप्त करने योग्य ।

उपार्जित
वि० [सं०] कामाया हुआ । प्राप्त किया हुआ । संगहीत ।

उपार्थ
वि० [सं०] कम कीमत का । अल्प मूल्य का [को०] ।

उपालंभ
संज्ञा पुं० [सं० उपाल्भ] [वि० उपाल] ओलाहना । शिकायत । निंदा । उ०—यह उपालंभ आपको शोभा नहीं देता; करनेवाला सब दूसरा है ।—भारतेंदु ग्रं० भा० १. पृ० १८७ ।

उपालंभन
संज्ञा पुं० [सं० उपालम्भन] [वि० उपालंभनीय, उपालंभित, उपालंभ्य, उपालब्ध] १. ओलाहना देना । २. निंदा करना । रक्षा के लिये जाना । बचाने के लिये जाना (को०) ।

उपालि
संज्ञा पुं० [सं०] गोतम बुद्ध के एक प्रधान शिष्य का नाम, जो पहले जाति का नाई था [को०] ।

उपाव पु †
संज्ञा पुं० [सं० उपाय] दे० 'उपाय' । उ०—करत उपाय पूछत काहू, गुनत न खाटौ खारौ ।—सूर० १ । १५२ ।

उपावणाहार
वि० [सं० उत्पादन, प्रा० उप्पावण+हि० हार (प्रत्य०)] उत्पन्न करनेवाला । उ०—(क) अरे मेरा अमर पावणहार रै खालिक आसिक तेरा ।—संतबाणी० भा० २. पृ० ९५ । (ख) दादू सब जग मरि मरि जात है अमर उपावणहार ।—दादू०, पृ० ३९५ ।

उपावर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. लौटना । २. चारों ओर चक्कर काटना । ३. पास आना ।४. रुक जाना । त्याग देना [को०] ।

उपावृत्त
वि० [सं०] १. लौटा हुआ । आया हुआ । २. विरत । ३. योग्य । उचित । ४. चक्कार खाया हुआ ।

उपाव्याध
संज्ञा पुं० [सं०] अरक्षित स्थान । वह स्थान जहाँ रक्षा का कोई उपाय या साधन न हो [को०] ।

उपाशंसनीय
वि० [सं०] १. प्रतीक्षा के योग्य । २. अपेक्षा करने के योग्य [को०] ।

उपाश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. आश्रय । शरण । २. विश्रामस्थान । वह जगह जहाँ आराम किया जाय । ३. ग्राहक जन । ४. तकिया । मसनद [को०] ।

उपश्रित
वि० [सं०] १. आश्रित । २. आधरित । आदधृत । ३. परोक्षत? आश्रित ४. तकिया लगाया हुआ [को०] ।

उपास पु †
संज्ञा पुं० [सं० उपवास] [वि० उपासा] खाना पीना छूटना । लंघन । फाका । उ०—(क) बैठ सिंहासन र्गूं जै सिंह चरै नहि घास । जब लग मिरग न पावै भोजन करै उपास । (शब्द०) । (ख) बहुत कुसुम मधुवान पिप्तासल जाएत तुअ उपासे ।— विघापति० पृ० ४२९ ।

उपासक (१)
वि० [सं० ] [स्त्री० उपासिका] पूजा करनेवाला । आराधना करनेवाला । भक्त । सेवक ।

उपासक (२)
संज्ञा पुं० १. अनुचर । दास । सेवक । २. शूद्र । ३. भिक्षु । भिक्खु (बौद्ध) ।

उपासकदशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैन धर्मग्रंथ के एक अंग का नाम [को०] ।

उपासन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपासी, उपासित, उपासनीय, उपास्य़] १. पास बैठना । २. सेवा में उपस्थित रहना । सेवा करना । पूजा करना । आराधना करना । ३. अभ्यास के लिये बाण चलाना । तीरंदाजी । शराभ्यास । ४. गार्हपत्या । अग्नि ।

उपासना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पास बैठने की क्रीया । २. सेवा । आराधना । पूजा । टहल । परिचर्या ।

उपासना (२)पु
क्रि सं० [सं०] उपासना करना । पूजा करना । सेवा करना । भजना । उ०— गौड देश पाखंड़ मोटि कियो भजन परायन । करुनसिंधु कुतज्ञ भए अगतिन गति दायन । दशधा रस आक्रांत महत जन चरण उपासे । नाम लेत निष्पाप दुरित तिहि नर के नासे ।— —प्रिया (शब्द०) ।

उपासना (३)
क्रि० ग्र० [सं० उपत्रास, पु उपास] १. उपावास करना । भूखा रहना । अन्न छोड़ना । २. निराहार व्रत रहना ।

उपासनोय
वि० [सं०] सेवा करने योग्य । अराधनीय । पूजनीय ।

उपासा † (१)
वि० [हिं० उपास+आ(प्रत्य०)] उपवास या व्रत करनेवाला । भूखा ।

उपासा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा । टहल । २. भक्ति । पूजा । उपासना । ३. धार्मिक चिंतन [को०] ।

उपासित
वि० [सं०] १. जिसकी उपासना को गई हो । सेक्ति । पूजित । २. पूजा करनेवाला । उपासक [को०] ।

उपासिता
वि० [सं० उपासितु] उपासक । आराधक । भजन पूजन करनेवाला [को०] ।

उपासी
वि० [सं० उपासिन्] [वि० स्त्री० उपासिनी] उपासना करने वाला । सेवक । भक्त । उ०—प्रानँदघन ब्रजमंड़ल मंड़न बट संकेतउपासी ।—घनानंद, पृ० ४८५ ।

उपास्तमन
संज्ञा पुं० [सं० उप+ अस्तमन] सूर्यास्त [को०] ।

उपास्तमय
क्रि० वि० [सं०] सूर्यास्त के आसपास । सूर्य के अस्त होने से कुछ पहले [को०] ।

उपास्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा । २. देवपूजा । ३. आराधना । उपासना [को०] ।

उपास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] छोटा हथियार । छोटा या लघु अस्त्र [को०] ।

उपास्थित
वि० [सं०] १. चढ़ा हुआ । २. खडा़ हुआ । ३. संतोष- जनक [को०] ।

उपास्य
वि० [सं०] पूजा के योग्य । आराध्य । जिसकी सेवापूजा की जाती हो । यौ०—उपास्यदेव ।

उपाहार
संज्ञा पुं० [सं०] जलपान । नाश्ता ।

उपाहित
वि० [सं०] १. परस्पर की संमति से किया हुआ । २. जिसका आरोप किया गया हो । आरोपित । ३. पहला या धारण किया हुआ । ४. रखा हुआ [को०] ।

उपेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० उपेन्द्र] १. इंद्र के छोटे भाई, वामन या विष्णु भगवान् । कृष्ण ।

उपेंद्रवज्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० उपेन्द्रवज्रा] ग्यारह वर्णो की एक वृत्ति जिसमें क्रमशः जगण, तगण,जगण और अंत में दो गुरु होते हैं । जैसे—अकंप धूम्राक्षहि जानि जूझ्यो । महोदरै रावण मंत्र बूझ्यो । सदा हमारे तुम मंत्रवादी । रहे कहा ह्वै अति ही विषादी ।—केशव (शब्द०) ।

उपेक्षक
वि० [सं०] १. उपेक्षा करनेवाला । विरक्त होनेवाला । २. घृणा करनेवाला ।

उपेक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपेक्षणीय, उपेक्षित, उपेक्ष्य] १. त्याग करना । छोड़ना । विरक्त होना । उदासीन होना । दूर रहना । किनारा खींचना । २. घृणा करना । ३. आसन नीति का एक भेद । अवज्ञा प्रदर्शित करते हुए आक्रमण न करना ।

उपेक्षणोय
वि० [सं०] १. त्यागने योग्य । दूर करने योग्य । २. घृणा करने योग्य ।

उपेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उदासीनता । लापरवाही । विरक्ति । चित्त का हटना । २. घृणा । तिरस्कार ।

उपेक्षायान
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु से छुट्टी पाकर उसके सहायक मित्रों पर चढ़ाई (कामंद०) ।

उपेक्षासन
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु की उपेक्षा करते हुए चुपवाप बैठे रहना, उसपर चढ़ाई आदि न करना (कामदं०) ।

उपेक्षित
वि० [सं०] जिसकी उपेक्षा की गई हो । जिसकी परवा न की गई हो । तिरस्कृत ।

उपेक्ष्य
वि० [सं०] उपेक्षा के योग्य । दूर करने या त्यागने योग्य । घृणा के योग्य ।

उपेखना पु
क्रि० स० [सं० उपेक्षण] उपेक्षा करना । अनादर करना । तिरस्कार करना ।

उपेत
वि० [सं०] युक्त । सहित । उ०—राधा पद अंकित बिराजि रही मही महा, श्रीपति निवास हू तें दीपति उपेत है ।— घनानंद, पृ० २७ ।

उपेय
वि० [सं०] उपायसाध्य । जो उपाय से सिद्ध हो । जिसके लिये उपाय करना उचित हो ।

उपैना (१)पु
वि० [देशी] [स्त्री० उपैनी] खुला हुआ । नंगा । आच्छादन- रहित । उ०—जनु ता लगि तरवारि त्रिविक्रम, धरि करि कोप उपैनी ।—सूर, ९ ।११ ।

उपना (२)
क्रि० अ० [हिं०] उड़ना । लुप्त हो जाना । उ०—देखत दुरै कपूर ज्यौं उपै जाइ जिन लाल । छिन छिन जाति परी खरी छीन छबीली बाल ।—बिहारी र०, दो० ८९ ।

उपोढ़ (१)
वि० [सं० उपोड] १. लाया हुआ । २. घनीभूत । दृढ । ३. एकत्र किया हुआ । एकत्रित । ४. व्यूह में रचित । ५. आरंभ किया हुआ [को०] ।

उपोढ़ (२)
संज्ञा पुं० व्यूह [को०] ।

उपोत
वि० [सं०] १. ढका हुआ । आच्छादित (कवच से) २. आवरण में रखा हुआ [को०] ।

उपोती
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूतिका नाम का पौधा [को०] ।

उपोदक (१)
वि० [सं०] पानी के पासवाला । जल का समीपवर्ती । जल के पास [को०] ।

उपोदक (२)
संज्ञा पुं० जल की निकटता । पानी का पड़ोस [को०] ।

उपोदका
संज्ञा स्त्री० [सं०] जल के समीप होनेवाला पूतिका नाम का एक पौधा [को०] ।

उपोदकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपोदका' [को०] ।

उपोदिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उपोदका' [को०] ।

उपोदीका
संज्ञा स्त्री० [संय] दे० 'उपोदका' [को०] ।

उपोद्ग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] अंतर्दृष्टि । ज्ञान [को०] ।

उपोदघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पुस्तक के आरंभ का वक्तव्य । प्रस्तावना । भूमिका । २. नव्य न्याय में छह संगतियों में से एक । सामान्य कथन से भिन्न निर्दिष्ट या विशेष वस्तु के विषय में कथन ।

उपोदबलन
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्टि । समर्थन । ताईद [को०] ।

उपोषण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उपोषणीय, उपोषित, उपोष्य] उपवास । निराहार व्रत ।

उपोषित (१)
वि० [सं०] १. उपवास किया हुआ । जिसने उपवास किया है । २. भूखा [को०] ।

उपोषित (२)
संज्ञा पुं० उपवास । व्रत [को०] ।

उपोसथ
संज्ञा पुं० [सं० उपवसथ, प्रा० उपोसथ] निराहर व्रत । उपवास । विशेष—यह शब्द जैन और बौद्ध लोगों का है ।

उप्पम
संज्ञा स्त्री० [देश०] मदरास प्रांत के तिनावली और कोयंबटूर जिलों में उत्पन्न होनेवाली एक प्रकार की कपास ।

उप्पर पु †
वि० [सं० उपर अथवा उपरि] दे० 'ऊपर' । उ०—दक्षिण उरु उप्परय प्रथम बांमहि पग आनय ।—सुंदर० ग्रं०, भा०१, पृ० ४२ ।

उफ
अव्य० [अ० उफ] आह । ओह । अफसोस । यौ०—उफ ओह = विस्मयसूचक शब्द । क्रि० प्र०—न करना । विशेष—यह शब्द प्रायः शोक और पीड़ा के अवसरों पर अनायास मुँह से निकलता है ।

उफड़ना पु
क्रि० अ० [हं० उफनना] उबलना । उफान खाना । जोश खाना । उ०—काचा उछरई उफड़ई काया हाँडी माँहि । दादू पर कामिलि रहहिं, जीव ब्रह्म होइ नाहिं ।—दादू (शब्द०) ।

उफताद
संज्ञा स्त्री० [फा० उफताद] १. आपत्ति । मुसीबत । २. आरंभ । शुरुआत । ३. घटना । संयोग [को०] ।

उफतदा
वि० [फा० उफ्तादह] १. परती पड़ा हुआ (खेत) । २. गिरा हुआ (को०) । ३. दीन । दुखी । दलित (को०) ।

उफनना पु
क्रि० अ० [सं० उत्+फेन या उत्+फण = गमन, या सं० उत्+हिं० फाल = गति चलना] १. उबलना । उठना । आँच या गरमी से फेन के साथ होकर ऊपर उठना । उ०—(ख) उफनत छीर जननि करि व्याकुल, इहि विधि भुजा छड़ायो ।—सूर०, १० ।९६० । (ख) उफनत दूध न धरयो उतारि । सीझी थूली चूल्हे दारि ।—सूर (शब्द०) । २. उमड़ना । उ०—अनुराग के रंगन रूपं तरंगन अंगन रूप मनो उफनी । (शब्द०) ।

उफनाना
क्रि० अ० [सं० उत्+फेन या उत्+फण् = गतौ] १. उबलना । किसी तरह की आँच या गरमी पाकर फेन के सहित ऊपर उठना । उ०—आँच पय उफनात सीचत सलिल ज्यों सकुचाइ । तुलसी ग्रं०, पृ० ४२७ । २. पानी आदि का ऊपर उठना । हिलोर मारना । उमड़ना ।—भौंर भरी उफनात खरी सु उपाव की नाव तरेरति तोरति ।—घनानंद, पृ० १५ ।

उफान
संज्ञा पुं० [सं० उत्+फेन या उत्+फण्] किसी वस्तु का आँच या गरमी पाकर फेन के सहित ऊपर उठना । उबाल ।

उबकना
क्रि० अ० [हिं० ओकना या उबाक] कै करना ।

उबका
संज्ञा पुं० [सं० उदबाहक, पा उब्बाहक] डोरी का वह फंदा जिसमें लोटे या गगरे का गला फँसाकर कुँए से पानी निकालते हैं । अरिवन ।

उबकाई पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० ओकाई] उबांत । मतली । कै । क्रि० प्र०—आना । लगना ।

उबछना †
क्रि० स० [सं० उत्प्रेक्षण, प्रा० उप्पोक्खन, उप्पोच्छन] १. पछा़ड़ना । पछाड़कर धोना । २. सिंचाई के लिये पानी खींचना ।

उबट (१)
संज्ञा पुं० [सं० उद्+वर्त्म>उव्वट = चलना फिरना] अटपट मार्ग । बुरा रास्ता । विकट मार्ग ।

उबट (२)
वि० ऊबड़ खाबड़ । ऊँचा नीचा । अटपट ।—(क) जोरि उबट भुइँ परी भलाई । कि मरि पंथ चलै नहिं जाई । (ख) सायर उबट सिखिर की पाटी । चढ़ी पानि पाहन हिय काटी ।—जायसी (शब्द०) ।

उबटन
संज्ञा पुं० [सं० उद्वर्तन, प्रा० उब्बट्टन] १. शरीर पर मलने के लिये सरसों, तिल और चिरौंजी आदि का लेप । बटना । अभ्यंग । उ०—तब महरि बाँहि गहि आनै । लै तेल उबटनौसानै ।—सूर०, १० ।८०१ । (ख) उबटन उबटि अंग अन्हवाइ । पठए, पट भूखननि बनाई ।—नंद० ग्रं०, पृ० २५६ ।

उबटना
क्रि० अ० [सं० उद्वर्तन, प्रा० उब्बट्टण] बटना लगाना । उबटन मलना । उ०—(क) जननि उबटि अन्हवाइ कै अतिक्रम सों लीनो गोद । पौढ़ाएँ पट पालने शिशु निरखि जननि मन मोद ।—सूर (शब्द०) । (ख) भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए । छरस असन अति हेतु जेंवाए ।—मानस, १ ।३३६ ।

उबना (१)पु
क्रि० अ० [सं० उदय>प्रा० उअअ, उवय] १. दे० 'उगना' ।

उबना (२)पु
क्रि० अ० [हिं० ऊबना] दे० 'ऊबना' ।

उबरना
क्रि० अ० [सं० उद्+वृ; प्रा० उब्वर] १. उद्धार पाना । निस्तार पाना । मुक्त होना । उ०—(क) आपुहि मूल फूल फुलवारी, आपुहि चुनि चुनि खाई । कहैं कबीर तेई जन उबरे जेहि गुरु लियो जगाई ।—कबीर (शब्द०) । (ख) भवसागर जो उबरन चाहे साई नाम जिन छोड़े ।— (शब्द०) । २. छूटना । बचना । उ०—धरी न काहूँ धीर सबके मन मनसिज हरे । जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महु ।—मानस, १ ।८५ । ३. शेष रहना । बाकी बचना । उ०—(क) फोरे सब बासन घर के दधि माखन खायो जो उबरयो सो डारयो रिस कारिकै ।—सूर (शब्द०) । (ख) देव दनुज मुनि नाग मनुज नहिं जाँचत कोउ उबरयो ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५०५ ।

उबरा (१) †
वि० [हिं० उबरना] [वि० स्त्री० उबरी] १. बचा हुआ । फालतू । यौ०—उबरा—पबरा = बचा हुआ । २. जिसका उद्धार हुआ हो ।

उबरा (२)
संज्ञा पुं० बोने से बचा हुआ बीज जो हलवाहों और मजदूरों को बाँट दिया जाता है । बिबरा । मुठिया ।

उबरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अपवारिका, प्रा० उव्वरिआ] दे० 'ओबरी' ।

उबरी (२)
संज्ञा स्त्री० [प्रा० उब्बूर = विषमोन्नत प्रदेश या हिं० उबरना] एक प्रकार की काश्तकारी ।

उबरी
वि० स्त्री० [हिं० उबरना] १. मुक्त । जिसका उद्धार हुआ हो । २. बची हुई । शेष ।

उबलना
क्रि० [सं० उद् = ऊपर+वलन = जाना अथवा हिं० उ (सं० उत्) + बल (= सं० ज्वल्>हिं० जल, बल] १. ऊपर की ओर जाना । आँच या गरमी पाकर पानी, दूध आदि तरल पदार्थों का फेन के साथ ऊपर उठना । उफनाना । जैसे,— दूध जब उबलने लगे तब आग पर से उतार लो । २. उमड़ना । वेग से निकलना । जैसे,—सोते से पानी उबल रहा है ।

उबसन
संज्ञा पुं० [सं० उद्वसन = ऊपर की छाल,] खर या नारियल की कूटी हुई जटा जिससे रगड़कर बरतन माँजते हैं । गुझना । जूना ।

उबसना †
क्रि० सं० [सं० उद्धसन] १. बरतन माँजना । दे० 'उपासना' । २. उजड़ना । अपना निवासस्थान छोड़कर अन्यत्र जा बसना ।

उबहन †
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्वहन, प्रा० उब्बहण,] कुएँ से गगरी या लोटा खींचने की रस्सी । पानी निकालने की डोरी ।

उबहना (१)पु
क्रि० स० [सं० उद्वहन, पा० उब्बहना+ऊपर उठाना] १. हथियार खींचना । (हथियार) म्यान से निकालना । शस्त्र उठाना । उ०—(क) पुनि सलार कादिम मत माहाँ । खांडै दान उबह नित बाहाँ ।—जायसी (शब्द०) । (ख) रघुराज लखे रघुनायक तो महा भीम भयानक दंड गहे । सिर काटन चाहत ज्यौं अबहीं करवाल कराल लिए उबहे ।—रघुराज (शब्द०) । २. पानी फेंकना । उलीचना ।

उबहना (२)पु
क्रि० अ० ऊपर की ओर उठना । उभरना । उ०— जावत सबै उरेह उरेहे, भाँति भाँति नग लाग उबेहे ।—जायसी

उबहना (३)पु
क्रि० स० [सं० उद्वहन=जोतना] जोतना । उ०—स्वारथ सेवा कोजिए । तातें भला न कोय । दादू उसर बहि उकरि कोठा भरै न कोय । दादू (शब्द०) ।

उबहना (४)
वि० [देशज, मि० हिं० उबेना] बिना जूते का । नंगा । उ०—रथ तें उतरि पायन । चलि भे रहहिं हरहिं चित चायन । पद्माकर (शब्द०) ।

उबहनि †, उबहनी
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्वहन, अव० उबहनि='रस्सी'] पानी खींचने की रस्सी । उ०—गगरिया मोरी चित सों उतरि न जाय । इक कर दरवा एक कर उबहनि, बतिया कहौं अरथाय ।—जग० बानी, पृ० ४८ । (ख) जब जल से भर भारी गागर खींचती उबहनी वह, बरबस ।—ग्राम्या, पृ० १८ ।

उबांत पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्वान्त] उलटी । वमन । कै । उ०— कस तुम महा प्रसाद न पायो । अब कहि करि उबांत दरसायो ।—रघुराज (शब्द०) ।

उबाना (१)
संज्ञा पुं० [हिं० उबहना=नंगा अथवा उ=नहीं+बाना] वह जो कपड़ा बुनने में राछ के बाहर रह जाता है । उ०— पाई करि कै भरना लीन्हों वे बाँधे को रामा । वे ये भरि तिहुँ लोकहिं बाँधै कोई न रहे उबाना ।—कबीर (शब्द०) ।

उबाना (२)
वि० बिना जूते का । नंगे पैर । उ०—मो हित मोहन जेठ की धूप में आए उबाने परे पग छाले ।—बेनी (शब्द०) ।

उबाना (३)
क्रि० स० [हिं० ऊबना] १. तंग करना । नाकों दम कर देना । २. उबाने का कारण होना या बनना ।

उबार
संज्ञा पुं० [सं० उद्वार] १. उद्धार । निस्तार । छुटकारा । बचाव । रक्षा ।उ०—मन तेवान कै राघो झूरा । नाहिं उबार जीउ डर पूरा ।—जायसी ग्रं०,पृ० २०४ । (ख) गहत चरन कह बालि कुमारा । मम पद गहे न तोर उबारा ।—मानस, ६ ।३१ ।२. †ओहार । ३. †बचत ।

उबारना
क्रि० स० [सं० उद्वारण] उद्धार करना । छुड़ाना । निस्तार करना । मुक्त करना । रक्षा करना । बचाना । उ०—तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहि अवसर को हमहिं उबारा ।— मानस, ५ ।२६ ।

उबारा
संज्ञा पुं० [सं० उद् (सं० उदक)=जल+वाण=रोक] वह जल का कुंड जो कुओं पर चौपायों के जल पीने के लिये बना रहता है । निपान । चँवर । अँहरी ।

उबाल
संज्ञा पुं० [हिं० उबलना] १. आँच पाकर फेन के सहित ऊपर उठना । उफान । जोश । क्रि० प्र०— आना ।—उठना ।२. जोश । उद्वैग । क्षोभ । जैसे,—से देखते ही उनके जी में ऐसा उबाल आया कि वे उसकी ओर दैड़ पड़े ।

उबालना
क्रि० स० [हिं० उबलना] १. पानी, दूध, या और किसी तरल पदार्थ को आग पर रखकर इतना गरम करना कि वह फेन के साथ ऊपर उठ आवे । खौलाना । चुराना । जोश देना । जैसे,—दूध उबालकर पीना चाहिए । २. किसी वस्तु को पानी के साथ आग पर चढ़ाकर गरम करना । जोश देना । उसिनना । जैसे—आलू उबाल डालो ।

उबासी
सं० स्त्री० [सं० उच्छ्वास] जँभाई ।

उबाहना पु
क्रि० स० [हिं० उबहना] दे० 'उबहना' ।

उबिठना
क्रि० स० क्रि० अ० [हिं०] दे० 'उबीठना' ।

उबीछना †
क्रि० स० [देशी] उलीचना । पानी फेंकना ।

उबोठना (१)
क्रि० स० [सं० अव, पा० ओ+ सं० इष्ट पा० इट्ठ= औइट्ठ] जी भर जाने के कारण अच्छा न लगना । चित्त से उतर जाना । अधिक व्यवहार के कारण अरुचिकर हो जाना । उ०—(क) सुठि मोती लाड़ मीठे, वै खात न कबहू उबीठे ।— सूर०, १० ।८०१ । (ख) वंचक विषय विविध तनु धरि अनुभवे, सुने अरु डीठे । यह जानतहु हृदय अपने सपने न अघाइ उबीठे ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५४३ । विशेष—इस शब्द का प्रयोग यद्यपि देखने में कर्त्तुप्रधान की तरह है पर वास्तव में है कर्मप्रधान । संयो० क्रि०—जाना ।

उबीठना (२)
क्रि० अ० ऊबना । घबराना । उ०—देव समाज के, साधु समाज के लेत निवेदन नाहिं उबीठे ।—(शब्द०) ।

उबीधना पु
क्रि० अ० [सं० उद्विद्ध, प्रा० उबिद्ध] १. फँसना । उलझना । २. धँसना । गड़ना ।

उबीधा
वि० [सं० उद्विद्ध] [स्त्री० उबीधो] १. धँसा हुआ । गड़ा हुआ । उ०—गरबीली गुनन लजीली ढीली भौंहन के ज्यों ज्यों नई त्यों नई नेह नेह नित ही । बीधी बात बानत, समीधी गात गातन, उबीधी परजंक में निसंक अंक हित ही ।—देव (शब्द०) । २. छेदनेवाला । गड़नेवाला । काँटों से भरा हुआ । झाड़ झंखाड़ वाला । उ०—कहुँ शीतल कहुँ उष्ण उबीधो । कहुँ कुटिल मारग कहुँ सीधो ।—शं० दि० (शब्द०) ।

उबेना पु †
वि० [हिं०] नंगा । बिना जूते का । उ०—तबलों मलीन हीन दीन सुख सपने न जहाँ तहाँ दुखी जन भाजन कलेस को । तबलो उबेने पाएँ फिरत पेट खलाए बाए मुँह सहत पराभौ देस को ।—तुलसी (शब्द०) ।

उबेरना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उबारना' । उ०—अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करो उबेरा ।—कबीर (शब्द०) ।

उब्बहिका
संज्ञा स्त्री० [सं० उदवाहिका, प्रा० उध्वाहिका] जूरी । निर्णय में सलाह देनेवाले व्यक्ति । उ०—सभ्यों का काम उब्बहिका या जूरी का रह गया था ।—भा० इ० रू०, पृ० १०१० ।

उभइ पु
वि० [सं० उभय] दे० 'उभय' ।

उभचुभ †
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] डूबने उतारने की स्थिति, क्रिया या भाव । क्रि० प्र०— होना । उ०—वह अथाह अंधकार के समुद्र में उभचुभ हो रही थी ।—कंकाल, पृ० १५९ ।

उभटना †
क्रि० अ० [हिं० उभरना] १. अहकार करना । अभिमान करना । शेखी करना । २. रुक जाना । अड़ना ।—रथ को चतुर चलावन हारो । खिन हाँकै खिन उभटैं राखै नहीं आन को सारो ।—रै० बानी, पृ० ४२ ।

उभड़ना
क्रि० अ० [सं० उदिभदन, अथवा उदभरण, प्रा० उब्भरण] १. किसी तल वा सतह का आसपास की तरह से कुछ ऊँचा होना । किसी अंश का इस प्रकार ऊपर उठना कि समूचे से उसका लगाव बना रहे । उकसना । फूलना । जैसे—गिलटी उभड़ना । फोड़ा उभड़ना । उ०—नारंगी के छिलके पर उभड़े हुए दाने होते हैं । २. किसी वस्तु का इस प्रकार ऊपर उठना कि वह अपने आधार से लगी रहे । ऊपर निकलना । जैसे—तभी तो खेत में अँखुए उभड़ रहे हैं । ३. आधार छोड़कर ऊपर उठना । उठना । जैसे—मेरा तो पैर ही नहीं उभड़ता चलूँ कैसे ? ४. प्रकट होना । उत्पन्न होना । पैदा होना । जैसे—दर्द उभड़ना, ज्वर उभड़ना । ५. खुलना । प्रकाशित होना । जैसे—बात उभड़ना । ६. बढ़ना । अधिक होना । प्रबल होना । जैसे—आजकल इसकी चर्चा खूब उभड़ी है । ७. वृद्धि को प्राप्त होना । समृद्ध होना । प्रतापवान् होना । जैसे—मरहठों के पीछे सिख उभड़े । ८. चल देना । हट जाना । भागना । उ०—अब यहाँ से उभड़ो । ९. जवानी पर आना । उठना । १०. गाय, भैसं आदि का मस्त होना ।

उभय
वि० [सं०] दोनों ।

उभयचर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कछुवा । २. मेढक [को०] ।

उभयचर (२)
वि० जल और स्थल दोनों में समान रूप से रह सकने वाला (जीव) [को०] ।

उभयतः
क्रि० वि० [सं० उभयतस्] दोनों ओर से । दोनों तरफ से ।

उभयतोदंत
वि० [सं० उभयोदन्त] जिसके दोनों ओर दो दाँत निकले हों जैसे—हाथी सूअर आदि ।

उभयतोमुख
वि० [सं०] दोनों ओर मुँह रखनेवाला । दोमुँहा [को०] ।

उभयतोमुखी
वि० स्त्री० [सं०] दोनों ओर मुँहवाली । यौ०—उभयतोमुखी गौ = ब्याती हुई गाय, जिसके गर्भ से बच्चे का मुँह बाहर निकल आया हो । ऐसी गाय के दान का बड़ा माहात्म्य लिखा है ।

उभयोतनर्थापद
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार ऐसी स्थिति जिसमें दो ही मार्ग हों और दोनों अनिष्टकर हो ।

उभयतोभागी
संज्ञा पुं० [सं० उभयतोभागिन्] कौटिल्य मत से वह राजा जो अमित्र तथा आसार (साथी) दोनों का साथ ही उपकार करे ।

उभयतोर्थापद
संज्ञा पुं० [सं०] जिधर लाभ की संभावना दिखाई पड़ती हो, उधर ही शत्रु की बाधा । ऐसा करते हैं तो भी बाधा, और वैसा करते हैं तो भी (को०) ।

उभयत्र
क्रि० वि० [सं०] १. दोनों जगह । २. दोनों ओर । ३. दोनों विषयों में [को०] ।

उभयथा
क्रि० वि० [सं०] दोनों प्रकार से [को०] ।

उभयपदी
वि० [सं० उभयपदिन्] वह धातु जो परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों रूप धारण करती है ।

उभयवादी पु
वि० [सं० उभयवादिन्] स्वर और दोनों का बोध करानेवाला (बाजा, जैसे बीणा) ।

उभयविपुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] आर्या छंद का एक भेद । जिस आर्या के दोनों दलों के प्रथम तीन गणों में पाद पूर्ण होते हैं उसे उभयविपुला कहते हैं ।

उभब्यंजन
संज्ञा पुं० [सं० उभब्यञ्जन] नपुंसक । क्लीब । स्त्री और पुरुष दोनों के चिह्न धारण करनेवाला व्यक्ति [को०] ।

उभयसंभव
संज्ञा पुं० [सं० उभयसम्भव] संदेह । विकल्प [को०] ।

उभयसुगधगण
संज्ञा पुं० [सं० उभयसुगन्धगण] वे महकनेवाली वस्तुएँ, जिसकी सुगंध जलाने पर बी फैलती है, जैसे—चंदन सुगंधवाला, अगरू, जटामासी, नख, कपूर, कस्तुरी इत्यादि ।

उभयहस्ति
क्रि० वि० [सं०] दोनों हाथों में समा सकने योग्य परिमाणवाला । अंजली भर [को०] ।

उभया
क्रि० वि० [सं०] दोनों प्रकार से [को०] ।

उभयात्मक
वि० [सं० उपय+ आत्मक] १. दोनों प्रकार की विशेषता लिए हुए । २. दोनों से रचित [को०] ।

उभयान्वयी
वि० [सं० उभयान्वयिन्] व्याकरण के नियमानुसार (पद और वाक्य) दोनों से मिला हुआ । दोनों संबंधित [को०] ।

उभयायी
वि० [सं० उभयायिन्] १. इस लोक और परलोक दोनों के लिये उपयोगी हो । १. जो दोनों लोकों से संबंद्ध [को०] ।

उभयार्थ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दोनों अर्थ [को०] ।

उभयार्थ (२)
वि० १. दो अर्थ रखनेवाला । २. जो विस्पष्ट न हो [को०] ।

उभयालंकार
संज्ञा पुं० [सं० उभयालङ्कार] वह अलंकार जिसमें शब्दगत और अर्थगत दोनों प्रकार का चमत्कार हो । विशेष—इसके दो प्रकार होते हैं—(१) संस्सृष्टि और संकर । जहाँ शब्दलंकार और अर्थालंकार तिलतंडुल न्याय से पृथक् अस्तित्व रखते हुए एकत्र स्थित होते हैं वहाँ संस्मृष्टि और जहाँ नीरक्षीर न्याय से एक दूसरे से एक दुसरे से घुलमिल जाते हैं वहाँ संकर नामक उभयालंकार होता है ।

उभयाविमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह राजा या राष्ट्रनायक जो परस्पर संघर्षरत दो राजाओं में से किसी एक का भी पक्ष ग्रहण नहीं करता ।

उभयेद्यु
क्रि० वि० [सं० उभयेद्युस्] १. दोनों दिन । २. लगातार दो दिन [को०] ।

उभयोन्नतोदर
वि० [सं०] जिसका पेटा दोनों ओर को निकला हो ।

उभरना पु
क्रि० अ० [सं० उदभरण] दे० 'उभड़ना' । उ०—ओ उभरल, इ गेल सुखाए । नाह बलोह मेघे भरि जाए ।— विद्यापति, पृ० ४५९ ।

उभरौंहा
वि० [हिं० उभार+ औहा (प्रत्य०)] उभार पर आया हुआ । उभरा हुआ । उ०—भावुक उमरौंहा भयो, कछुक परयो भरुआइ । सीप हरा कै मिसि हियौ निसि दिन हेरत जाइ ।—बिहारी र०, दो०, २५२ ।

उभाँखरा पु
वि० [सं० उदभावन, गुज० ऊभूँ+हिं० खरा=खड़ा] खड़े रहनेवाले । कहीं न टिकनेवाले । भ्रमणशील । जिनका एक जगह निवास न हो । उ०—पहिरण—ओढ़ण कंवला, साठे पुरसे नीर । आपण लोक उभाँखरा गाडर छाली खीर ।— ढोला० दू०, ६६२ ।

उभाड़
संज्ञा पुं० [सं० उदभेद या उदभरण हिं० उभरना] १. उठान । ऊँचापन । ऊँचाई । २. ओज । वृद्धि ।

उभाड़दार
वि० [हिं० उभाड़+ फा० दार (प्रत्य०)] उठा हुआ । उभरा हुआ । सतह से ऊँचा । फूला हुआ । जैसे—उस बरतन पर की नक्काशी उभाड़दार है । २. भड़कीला । जैसे—इस जेवर की बनावट ऐसी उभाड़दार है कि लागत तो दस ही रुपए की है, पर सौ का जँचता है ।

उभाड़ना
क्रि० स० [हिं० उभड़ना] १. किसी जमी वा रखी हुई भारी वस्तु को धीरे धीरे उठाना । उकसाना । जैसे—पत्थर जमीन में धँस गया है, इसको उभाड़ो । २. उत्तेजित करना । इधर उधर की बातें करके किसी बात पर उतारू करना । बहकाना । जैसे—उसी के उभाड़ने से तुमने यह सब उपद्रव किया है । ३. जगह से उठाना ।

उभाना पु
क्रि० अ० [हिं०अभुआना, हबुआना] अभुआना । सिर हिलाना और हाथ पैर पटकना जिससे सिर पर भूत का आना समझा जाता है । उ०—घूमन लगे समर में घेहा । मनहुँ उभात भाव भरि भैंहा ।—लाल (शब्द०) ।

उभार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उभाड़' ।

उभारदार
वि० [हिं०] दे० 'उभाड़दार' ।

उभारना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उभाड़ना' ।

उभासना पु
क्रि० अ० [सं० उदभासन, प्रा० उव्भासण,] प्रकाशित होना । घोषित होना । चमकना । उ०—दीप के तेज में दीपक दोलत हीरे के तेज तें हीरो उभासै । तैसे हि सुंदर आतम जानहुँ आपु के तेज से आपु प्रकासै ।—सुंदर ग्रं०, भा०२, पृ० ६१९ ।

उभिटना पु
क्रि० अ० [सं० उदभिदन, प्रा० उब्भिडन] ठिठकना । हिचकना । भिटकना । उ०—जाहु नहीं अहो जाहु चले हरि, जात जितै दिन हीं बिन बागे । देखि कहा रहे धोखे परे उभिटे कैसे देखिबो देखहु आगे ।—केशव (शब्द०) ।

उभियाना †
क्रि० स० [हिं० उभना] खड़ा करना । ऊपर उठाना ।

उभेष पु
संज्ञा पुं० [सं० उभयस्थ?] सदेह । अनिश्चय । उ०—ऐसा अदभुत मेरे गुरि कथ्या, मै रह्या उभेषै । मुसा हस्ती सौं लड़ैं, कोई विरला पेषै ।—कबीर ग्रं० पृ० १४१ ।

उभै
वि० [सं० उभय] दे० 'उभय' ।

उभौ पु
वि० [सं० उभय] दे० 'उभय' । उ०—भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महा धुनि गर्जा ।—मानस, ४ ।८ ।

उमंग
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्=ऊपर+मङ्ग=चलना अथवा सं० उन्म- दाङ्ग, प्रा० * उम्मअंग अथवा देशी०] १. चित्त का उभाड़ । सुखदायक मनोवेग । जोश । मौज । लहर । आनंद । उल्लास ।जैसे—आज उनका चित्त बड़े उमंग में है । उ०—बसे जाय आनंद उमंग सों गैया सुखद चरावें ।—सूर (शब्द०) । २. उभाड़ । अधिकता । पूर्णता । उ०—आनंद उमंग मन, जोबन उमंग तन, रूप के उमंग उमगत अंग अंग है— तुलसी (शब्द०) ।

उमंगना पु
क्रि० अ० [हिं० उमंग+ ना (प्रत्य०)] दे० 'उमगना' ।

उमंड
संज्ञा पुं० [सं० उद्=ऊपर+मण्ड=माँड़ (या मण्डन) या वा फेन] १. उठान । २. चित्त का उबाल । वेग । जोश ।

उमंडना
क्रि० अ० [हिं० उमंड+ना (प्रत्य०)] दे० 'उमड़ना' । उ०—जलज अचल डेरा दए सिंह सुजान उमंडि । निभै ह्वै कूरम नृपति पाछै चल्यो घुमंडि—सुजान, पृ० ३९ ।

उम
संज्ञा पुं० [सं०] १. नगरी । नगर । पुरी । २. घाट । तन । घाट पर बनी हुई रक्षा चौकी [को०] ।

उमंत पुं
वि० [सं० उन्मत्त प्रा० उम्मत्त अथवा सं० उन्मन्त्र=मंत्रहीन] विचाररहित । मंत्ररहित । उन्मत्त । उ०—ए सामंत उमंत झुडझ देषत विरुझाने ।—पृ० रा० ६६ ।४३७ ।

उमकना † (१)
क्रि० अ० [देश०] उखड़ना ।

उमकना (२)पु
क्रि० अ० [हिं० उमगना] दे० 'उमगाना' । उ०—वहदत फसरत एकै रंग । ज्यों जल से जल उमकि तरंग ।—प्राण०, पृ० १३ ।

उमग पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० उमंग] दे० 'उमंग' ।

उमगन पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उ+ मङ्न] आनंद । हर्ष । खुशी । प्रसन्नता ।

उमगना पु
क्रि० अ० [हिं० उमंग+ ना] १. उभड़ना । उमड़ना । भरकर ऊपर उठना । बढ़ चलना । उ०—ऋधि, सिधि, संपति नदी सुहाई । उमगि अवध अंबुधि पहँ आई ।—तुलसी (शब्द०) । २. उल्लास में होना । हुलसना । जोश में आना ।

उमगा पु
वि० पुं० [सं० उ+ मङ्ग [स्त्री० उमगी] उमड़ा । उत्साहित हुआ । सीमा से बाहर हुआ । हद्द से निकला हुआ । सीमोल्लंघित ।

उमगाना
क्रि० स० [हिं० उमगना] उत्साहित होना । जोश में भर जाना । उमगने कारण होना ।

उमगावन पु
वि० [हि० उमगन] उमंग भरनेवाला । आनंदित करनेवाला । उ०—सोकहरन आनँदकरन, उमागावन सब गात ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ४८२ ।

उमचना पु
क्रि० अ० [हिं० उन्मञ्चन] १. किसी वस्तु पर तलवों से अधिक दाव पहुँचान के लिये भटके के साथ शरीर के ऊपर उठाकर फिर नीचे गिराना । हुमचना । २. चौंक पड़ना । चौकन्ना होना । सजग होना ।—सुनहु सखी मोहन कहा कीन्हो । उमचि जाति तब ही सब सकुचति बहुरि मगन ह्वै जाति । सूर श्याम सों कहौ कहा यह कहत न बनत लजाति ।— सूर (शब्द०) ।

उमड़
संज्ञा स्त्री० [सं० उन्मण्डन्] १. बाढ़ । बढ़ाव । भराव । २. घिराव । घिरन । छाजन । ३. धावा । यौ०—उमड़ घुमड़ ।

उमड़ना
क्रि० अ० [हिं० उमंडना] १. पानी या और किसी द्रव वस्तु का अधिकता या बाहुल्य के कारण ऊपर उठना । भरकर ऊपर आना । उतराकर बह चलना । जैसे—बरसात में नदी नाले उमड़ते हैं । उ०—नदियाँ नद लौं उमड़ी लतिका तरु डारन पै गुरवान लगीं ।—सेवक (शब्द०) । २. उठकर फैलना । छाना । घेरना । जैसे—बादल उमड़ना, सेना उमड़ना । उ०—(क) घनघोर घटा उमड़ी चहुँ ओर सों मेह कहै न रहौं बरसौं ।—कोई कवि (शब्द०) । (ख) अनी बड़ी उमड़ी लखैं असि बाहक भट भूप ।—बिहारी (शब्द०) । यौ०—उमड़ना घुमड़ना = घूम घूमकर फौलना वा छाना । उ०— उमड़ि घुमड़ि घन बरसन लागे, इत्यादि ।—(शब्द०) । ३. किसी आवेश में भरना । जोश में आना । क्षुब्ध होना । जैसे—इतनी बातें सुनकर उसका जी उमड़ आया । संयो० क्रि०—आना ।—चलना ।—जाना ।—पड़ना ।

उमड़ाना
क्रि० अ० [हिं० उमड़ना का प्रे० रूप] १. उमड़ने का कराण होना २. दे० 'उमड़ना' ।

उमत पु
संज्ञा स्त्री० [अ० उम्मत] दे० 'उम्मत' । उ०—मेरी उमत करै हकतायत ।—सं० दरिया, पृ० २२ ।

उमत्त पु
वि० [सं० उन्मत्त प्रा० उम्मत्त] मत्त । मतवाला । उ०— बढि सामंत ससूर करै उच्छव उमत्त पर ।—पृ० रा०, २४ ।३५७ ।

उमदगी
संज्ञा स्त्री० [अ०] अच्छापन । उत्तमता । खूबी ।

उमदना पु
क्रि० अ० [सं० पा० उन्मत्त प्रा० उम्मत्त] १. उमंग में भरना । मस्त होना । २. उमगना । उमड़ना । उ०—बद्दल उमद्द जैसे जलद्द । गोली बर बूँदे परि बिहद्द ।—सूदन (शब्द०) ।

उमदा
वि० [अ० उमदग्] [स्त्री० उमदी] अच्छा । उत्तम । बढ़िया ।

उमदाना पु
क्रि० अ० [सं० उन्मद] १. मतवाला होना । मद में भरना । मस्त होना । मस्त होकर किसी ओर झुकना । उ०—(क) हँसि हँसि हेरति नवल तिय मद के मद उमदाति ।—बिहारी० र०, दो,० १७९ । (ख) जोबन के मद उनमद मदिरा के मद मदन के मद उमदात बरबस पर ।— देव (शब्द०) । (ग) माइ बाप तजि धी उमदानी हरषत चलो खसम के पास ।—सुंदर ग्र०, भा०२, पृ० ५४१ । २. उमंग में आना । आवेश में आना । जोश में आना । उ०—बहु सुभट बढ़ि कै प्रान त्यागे विष्णु पुरते जात भे । सो देखि संगर करन महँ सब सुभट अति उमदात भे ।— गोपाल (शब्द०) ।

उमर (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० उम्र] १. अवस्था । वय । २. जीवनकाल । आयु । यौ०—उमरदराज = लंबी उमरवाला ।

उमर (२)
संज्ञा पुं० [अ०] बगदाद का एक खलीफा । हरत मुहम्मद के बाद दूसरा खलीफा ।

उमरती
संज्ञा स्त्री० [सं० अमृतिका] एक प्रकार का बाजा । दे० 'अँबिरती' । उ०—बाज उमरती अति कहकहे । (पाठांतर) बाज उँबरती अति गह गहे ।—जायसी (शब्द०) ।

उमरा
संज्ञा पुं० [अ० अमीर का बहु व०] प्रतिष्ठित लोग । सरदार । उ०— लिखी पत्रि चारिहुँ दिसि धाए । जहँ तक उमरा बेगि बुलाए ।—जायसी (शब्द०) ।

उमराऊ पु
संज्ञा पुं० [अ० उमरा] दे० 'उमराव' । उ०—चार प्रधान सात उमराऊ । प्रोहित दोय हिए भाऊ ।—कबीर सा०, पृ० ५६३ ।

उमराय पु
संज्ञा पुं० [अ० उमरा] दे० 'उमराव' ।—अरे ते गुसुलखाने बीच ऐसे उमराय, लै चले मनाय महाराज शिवराज को ।—भूषण ग्रं०, पृ० ६ ।

उमराव पु †
संज्ञा पुं० [अ० उमरा] प्रतिष्ठित लोग । सरदार । दरबारी । रईस ।—महा महा जे, सुभट दैत्यबल बैठे सब उमराव । तिहूँ भुवन भरि गम है मेरो, मो सम्मुख को आव ?—सूर (शब्द०) ।

उमरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] एक पौधा जिसे जलाकर सज्जीखार बनाते हैं । यह मदरास, बंबई तथा बंगाल में खारी मिट्टी के दलदलों के पास होता है । मचोल ।

उमस
संज्ञा स्त्री० [सं० उष्म] गरमी । वह गरमी, जो हवा पतली पड़ने या न चलने पर मालूम होती है ।

उमहना पु
क्रि० अ० [सं० उन्मथन, प्रा० उम्महण अथवा सं० उद्+मह = उभाड़ना] १. उमड़ना । भरकर ऊपर आना । उमगना । फूट चलना । उ०—(क) सोने सो जाको स्वरूप सबै कर पल्लव कांति महा उमही है ।—देव (शब्द०) । (ख) कान्ह भले जू भले समझयहौ मोह समुद्र को जो उमह्यो है ।—केशव आपने मानिक सो मन हाथ पणए दे कौने लह्यौ है ।—केशव (शब्द०) । २. छाना घेरना । चारों ओर से टूट पड़ना । उ०—सघन विमान गगन भरि रहे । कौतुक देखन अम्मर उमहे ।—सुर (शब्द०) । ३. उमंग में आना । जोश में आना । उ०—गाँव धवावति ही नँदलाल सों ऐठि उमेठन रंग भरी सी । चारु महाकवि की कविता सी लसै रस में दुलही उमही सी ।—(शब्द०) ।

उमहाना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उमाहना' ।

उमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हिमालय की पुत्री । शिव की स्त्री पार्वती । विशेष—कालिका पुराण में लिखा है कि जब पार्वती शिव के लिये तप कर रही थीं उस समय उनकी माता मेनका ने उन्हें तप करने से रोको था इसी से पार्वती का नाम उमा पड़ा, अर्थात् उ (हे), मा (मत) । २. दुर्गा । ३. हलदी । ४. अलसी । ५. कीर्ति । ६. कांति । ७. ब्रह्मविद्या । ब्रह्मज्ञान । ८. चंद्रकांत मणि । ९. रात । रात्रि (को०) । यौ०—उमाकंतत । उमागुरु = उमाचतुर्थी । उमाजनक । उमानाथ । उमाधव । उमासहाय = शिव । उमासुत ।

उमाकट
संज्ञा पुं० [सं०] तीसी के फूल की धूल या पराग । अलसी के फूल का मकरंद [को०] ।

उमाकना †
क्रि० स० [देसज] उखाड़ना । खोदकर फेंक देना । नष्ट करना ।

उमाकांत
संज्ञा पुं० [सं० उमाकांत] पार्वती के प्रिय पति या शिव [को०] ।

उमाकिनी पु †
वि० [हिं० उमाकना] उखाड़नेवाली । खोदकर फेंक देनेवाली । उ०—माया मोह नाशिनी उमाकिनी अविद्या मूल पापन की त्रासिनी है ज्ञान रस रासिनी ।—रघुराज (शब्द०) ।

उमागुरु
संज्ञा पुं० [सं०] उमा के पिता हिमवान् । हिमालय [को०] ।

उमाचतुर्थी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्येष्ठ मास की शुक्ल चतुर्थी । जेठ सुदी चौथ [को०] ।

उमाचना पु †
क्रि० स० [सं० उन्मञ्चन = ऊपर उठाना] १. उभा- ड़ना । ऊपर उठाना । २. निकालना । उ०—लाज बस बाम छाम छाती पैछली के, मानो नाभि त्रिबली तें दूजी नलिनि उमाची है ।—(शब्द०) ।

उमाट्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उमाकट' [को०] ।

उमाद पु
संज्ञा पुं० [सं० उन्माद] दे० 'उन्माद' ।

उमाधव
संज्ञा पुं० [सं० उमा+ धवपति] शिव । उमापति [को०] ।

उमाधी पु
संज्ञा पुं० [सं०उमाधव] पार्वती के पति । महादेव । शिव । उ०—हरो पीर मेरी रमाधो उमाधो । प्रबोधो उदो देहि श्री बिंदुमाधो ।—केशव (शब्द०) ।

उमापति
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव । शंकर । शिव ।

उमामहेश्वरव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] एक विशेष व्रत का नाम जिसमें पार्वती और शिव की कृपा के लिये उपासक अनुष्ठान या व्रतोपवास आदि करता है [को०] ।

उमावन
संज्ञा पुं० [सं०] बाणपुर नामक नगर । शोणितपुर । देवीकोट [को०] ।

उमासुत
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय । २. गणेश [को०] ।

उमाह
संज्ञा पुं० [सं० उद्+मह् = उप्तगाना, उत्साहित करना] उत्साह । उमंग । जोश । चित्त का उद्गगार । उ०—(क) आयो सुबाहु उमाह भरो रन जो सुरनाह को दान देवैया ।—रघुराज (शब्द०) । (ख) जान देहु सब और चित के मिलि रस करन उमाहु । हरीचंद सूरत तो अपनी बारक फेरि दिखाहु ।—हरिश्चंद्र (शब्द०) ।

उमाहना (१)पु
क्रि० अ० [हिं० उमहना] १. उमड़ना । उमगना । भरकर ऊपर आना । उ०—अंगन अंगन माहिं अनंत के तुंग तरंग उमाहत आवैं ।—पद्माकर (शब्द०) । २. उमंग में आना । उदगार से भरना । उ०—तैसहि राज समाज जोरि जन धावै हरख उमाहे ।—रघुराज (शब्द०) ।

उमाहना (१)
क्रि० स० उमड़ाना । उमगाना । वेग से बढ़ाना । उ०— झलझलात रिस ज्वाल बदन सुत चहुँ दिसि चाहिय । प्रलय करन त्रिपुरारि कुपित जनु गंग उमाहिय ।—सूदन (शब्द०) ।

उमाहल पु
वि० [हिं० उमाह+ ल (प्रत्य०)] उमंग से भरा । उत्साहित । उ०— ब्रज घर घर अति होत कुलाहल । जहँ तहँ ग्वाल फिरत उमँगे सब अति आनंद भरे जु उमाहल ।—सूर १० ।८२६ ।

उमिरिया पु †
स्त्री० [हिं० उमार>उमिर+इया (अल्पा० प्रत्य०)] दे० 'उम्र' । उ०—हमरी उमिरिया होरी खेलन की, पिय मोसों मिलि के बिछुरि गयो री ।—धरम०, पृ० ५९ ।

उंमेठन
संज्ञा स्त्री० [सं० उद्धेष्ठन] ऐंठन । मरोड़ । पेंच । बल ।

उमेठना
क्रि० स० [सं० उद्धेष्ठन] ऐंठना । मरोड़ना ।

उमेठवाँ
वि० [हिं० उमेठना] ऐंठना । ऐंठनदार । घुमावदार । मुरेरवाँ ।

उमेड़ना
क्रि० स० [हिं० उमेठना] दे० 'उमेठना' ।

उणाहउ पु
संज्ञा पुं० [हिं० उमाह+ उ (प्रत्य०)] दे० 'उमाह' । उ०—आज उमाहउ मो धड़उ, ना जाणू किव केण ।— ढोला० दु० ५१८ ।

उमेद
संज्ञा स्त्री० [फा० उम्मेद] उम्मीद । आशा । उ०—रावरे अनुग्रह का मेह बारसायो आय़, एकौ बीज उग्यो नाहिं भाग यों दिखायतु । हा हा नटनागर उमेद फलफूल की थी प्यारे मीति खेत में तो रेत न लखायतु ।—नट०, पृ० ८६ ।

उमेदवार
संज्ञा पुं० [फा० उम्मेदवार] दे० 'उम्मेदवार' ।

उमेदवारी
संज्ञा स्त्री० [फा० उम्मेदवारी] दे० 'उम्मेदवारी' ।

उमेलना पु
क्रि० स० [सं० उन्मीलन] १. खोलना । उघाड़ना । २. प्रकट करना । ३. वर्णन करना । उ०—पद्मावल जगरूप मनि कहँ लग कहौं उमेल । ते समुंद महँ खोयों हौ का जियों अकेल ।—जायसी (शब्द०) ।

उमैना पु
क्रि० अ० [हिं० उमहना] मनपाना आवरण करना । उमंग में आना । उमड़ना ।

उम्दगी
संज्ञा स्त्री० [फा०] अच्छापन । भलापन । खूबी ।

उम्दा
वि० [अ० उम्दह्] अच्छा । भला । उतम । श्रेष्ठ । बढ़िया ।

उम्म
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. जन्म देनेवाली माता । २. जड़ । मूल [को०] ।

उम्मट
संज्ञा पुं० [देशी] एक देश का नाम । उ०—उम्मट के हबपान जंगली जात अलाई ।—सुजान०, पृ० ८ ।

उम्मत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. किसी मत के अनुपायियों की मंडली । उ०—कबीर सोई हुकुम हरम की उम्मत निबाहै जंत । पैगंबर हुकम हरम क, बड़ शरम की बात ।—कबीर० (शब्द०) । २. जमाअत । समिति । समाज । फिरका । ३. औलाद । संतान (व्यंग्य) । ४. पैरोकार । समर्थक । अनुयायी ।

उम्मस †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'उमस' ।

उम्मी
संज्ञा स्त्री० [सं० उम्बी] १. गेहूँ या जौ की कच्ची बाल जिसमें से हरे दाने निकलते हैं । २. आग की लपट में जौ गेहूँ की बालों को भूनकर खाने के लिये बनाई गई स्वादिष्ट वस्तु ।

उम्मीद
संज्ञा स्त्री० [फा०] दे० 'उम्मेद' । उ०—कत्हे पंजाब से सब हिंद की उम्मीद हुई ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ५४२ । मुहा०—उम्मीद बर आना = आकांक्षापूर्ति होना । अभीष्ठ प्राप्ति होना । उ०— कोई उम्मी बर नहीं आती । कोई सूरत नजर नहीं आती ।—......?

उम्मेद
संज्ञा स्त्री० [फा०] आशा । भरोसा । आसार । क्रि० प्र०—करना ।—बाँधना । होना । मुहा०—उम्मेद होना—संतान की आशा होना । गर्भ के लक्षण दिखाई देना । जैसे—इन दिनों लाला साहब के घर कुच उम्मेद है; देखें लड़का होता है कि लड़की । उम्मेद से होना = गर्भवती होना । जैसे—उनकी स्त्री उम्मेद से है ।

उम्मेदवार
संज्ञा पुं० [फा०] १. आशा करनेवाला । आसरा रखनेवाला । २. नौकरी पाने की आशा करनेवाला । ३. काम सीखने के लिये और नौकरी पाने की आसा से किसी दफ्तर में बिना तनख्वाह काम करनेवाला आदमी । वह जो किसी स्थान या पद के लिये अपने को उपस्थित करता या किसी के द्वारा किया जाता है । ४. निर्वाचन में चुने जाने के लिये खड़ा होनेवाला । जैसे—(क) । वे व्यवस्थापिका परिषद की मेंबरी के लिये उम्मेदवार है । (ख) वे बनारस डिवीजन से कौंसिल के लिये उम्मीदवार खड़े किए गए हैं ।

उम्मेदवारी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. आशा । आसरा । २. काम सीखने के लिये नौकरी पाने की आशा से बिना तनख्वाह किसी दफ्तर में काम करना ।

उम्र
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. अवस्था । व्यस । २. जीवनकाल । आयु । क्रि० प्र०—काटना ।—गुजारना ।—बिताना । मुहा०—उम्र टेरना = किसी प्रकार जीवन के दिन पूरे करना । किसी तरह दिन काटना ।

उयना पु
क्रि० अ० [सं० उदय प्रा० उअअ] उदय होना । उगना । उ०—उयेउ अरुन अवलोकहु ताता ।—मानस, १ ।२३८ ।

उयबाना †
क्रि० अ० [देशी०] जँभाना । जँभाई लेना । उ०— उतनी कहत कुँअरि उयबानी । सहचरि दौरि उसीसी आनी ।—नंद० ग्रं०, पृ० १४१ ।

उरंग
संज्ञा पुं० [सं० उरङ्ग] १. साँप । २. नागकेसर ।

उरंगम
संज्ञा पुं० [सं० उरङ्गम] साँप ।

उरः
संज्ञा पुं० [सं०] 'उरम' का समास में प्रयुक्त रूप ।

उरःकपाट
संज्ञा पुं० [सं०] कपाट के समान चौ़ड़ा, दृढ़ वक्ष [को०] ।

उरःक्षत
संज्ञा पुं० [सं०] वक्ष का रोग [को०] ।

उरःक्षतकास
संज्ञा पु० [सं०] क्षयकारक खाँसी [को०] ।

उरःक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] क्षय रोग । यक्ष्मा [को०] ।

उरःशूल
संज्ञा पुं० [सं०] छाती का रोग ।

उरःशूली
वि० ]सं० उरःशूलिन्] जिसे उर शूल हो [को०] ।

उरःसूत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छाती पर स्थित रहनेवाल मोतियों का हार [को०] ।

उरःस्तंभ
संज्ञा पुं० [सं० उरःस्तम्भ] दमा [को०] ।

उरःस्थल
संज्ञा पुं० [सं०] वक्ष । छाती [को०] ।

उर
संज्ञा पुं० [सं० उरस्] १. वक्षस्थल । छाती । यौ०—उरोज । मुहा०—उर आनना वा लाना = छाती से लगाना । आलिंगन करना । उ०—(क) दिन दस गए बालि पहँ जाई । पूछेहुकुशल सखा उर लाई ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) ताप सरसानी, देखै अति अकुलानी, जऊ पति उर आनी तऊ सेज में बिलानी जात ।—पद्माकर (शब्द०) । २. हृदय । मन । चित्त । उ०—करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—उर आनना वा लाना = मन में लाना । ध्यान करना । विचारना । समझना । उ०—उर आनहु रघुपति प्रभुताई ।— तुलसी (शब्द०) । उर धरना = ध्यान में रखना । ध्यान करना । उ०—बंदि चरण उर धरि प्रभुताई । अंगद चलेउ सबहिं सिर नाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

उरई †
संज्ञा स्त्री० [सं० उशरी अथवा देश०] उशीर । खस ।

उरकना पु
क्रि० अ० [हिं० रुकना या उढ़कना] रुकना । ठहरना । उ०—राघव चेतन चेतव महा । आइ उगकि राजा पहँ रहा ।—जायसी (शब्द०) ।

उरग
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उरगी] १. साँप । २. पेट के बल चलनेवाला जीव । यौ०—उरगराज । उरगस्थान । उरगाशन । उरगारि । उरगाराति ।

उरगड्डी
संज्ञा स्त्री० [सं० उर+ हिं० गाड़ना] एक खूँटी जिससे जुलाहे पृथिवी में ताना गाड़ने के लिये सूराख करते हैं ।

उरगना
क्रि० स० [सं० उरी कृत्>*हिं० उसक>उरग] स्वीकार करना । अंगीकार करना । अँगेजना । उ०—प्राय भरस्थ कहा धौं करै जिय माँहि गुनै । जो दुःख देइ तौ लै उरगौ यह बात सुनौ ।—केशव (शब्द०) ।

उरगभूषण
संज्ञा [सं०] शिव [को०] ।

उरगयव
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का यव । २. एक प्रकार का मान [को०] ।

उरगराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. वासुकि । २. शेषनाग [को०] ।

उरगलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागवल्ली । पान ।

उरगसारचंदन
संज्ञा पुं० [सं० उरगसारचन्दन] एक प्रकार का चंदन [को०] ।

उरगस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] पाताल [को०] ।

उरगाद
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ ।

उरगाय पु
संज्ञा पुं० [सं० उरुगाय] दे० 'उरुगाय' ।

उरगारि
संज्ञा पुं० [सं०] १. गरुड़ । २. मोर [को०] ।

उरगाशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. गरुड़ । २. मोर [को०] ।

उरगास्य
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की कुदाल [को०] ।

उरगिनी पु
संज्ञा पुं० [सं० उरगी] सर्पिणी । नागिनी । उ०— घूमत हौ मनो प्रिया उरगिनी नव विलास श्रम से जड़ से हो । काजर अधरनि प्रगट देखियत नाग बेलि रँग निपट लसे हो ।—सूर (शब्द०) ।

उरज पु
संज्ञा पुं० [सं० उरोज] कुच । स्तन । उ०—बाढ़त तो उर उरज भर भर तरुनई विकास । बोझनि सौतिनि के लिए आवतु रूँध उसास ।—बिहारी (शब्द०) ।

उरजात
संज्ञा पुं० [सं० उरस+ जात] कुच । स्तन । उ०—प्रति सुंदर उर में उरजात । सोभा सर में जनु जलजात ।—केशव (शब्द०) ।

उरझना पु
क्रि० अ० [हिं० उलझना] दे० 'उलझना' । उ०— ज्यौं ज्यौं सुरझि भज्यौ चहत त्यौं त्यौं उरझत जात ।—बिहारी र०, दो०, ६७१ ।

उरझाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उलझाना' । उ०—स्मृति शास्त्र पुराण बखाना । तामें सकल जीव उरझाना ।—कबीर सा०, पृ० ४४ ।

उरझेट
संज्ञा सं० [हिं० उलझना] उलझन । उ०—बरी कि कब ना बरी परी हिए उरझेट ।—शकुंतला, पृ० ९६ ।

उरझेटा †
संज्ञा पुं० [हिं० उरझना] दे० 'उलझेड़ा' ।

उरझेर पु
संज्ञा पुं० [हिं० उरझना] १. उरझेटा । उलझन । उ०—इस्क अजब उरझेर, परयो आनि सों सिर पसरि ।— नट० पृ० १४९ । २. बवंडर । उ०—पानी कौ सौ घेरि किधौं पौन उर झेर किधौं चक्र कौ सौ फेरि कोऊ कैसें कै गहत हैं ।—सुंदर ग्रं०, भा०२, पृ० ४५० ।

उरझेरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] 'उलझेड़ा' । उ०—शुभ अरु अशुभ का करे निबेरा । मेंटों काल सकल उरझेरा ।—कबीर सा०, पृ० ८०५ ।

उरझेरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० उर+ झेरी] हृदय की ज्वाला । मन की उलझन । व्याकुलता । उलझेड़ा । उ०—आनँदघन रस- पियन जियन कौं प्रान पपीहा तरफरात है उरझेरी सौं ।—घनानंद, पृ० ३३२ ।

उरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेड़ा । मेढ़ा । २. एक असुर (को०) । ३. युरेनस नामक ग्रह । विशेष—पृथ्वी से बहुत अधिक दूर होने के कारण एक धूमिल स्थिर तारे या नक्षत्र के समान जान पड़ता है । पृथ्वी से सूर्य जितनी दूरी पर है, उसकी अपेक्षा यह प्रायः १९ गुनी अधिक दूरी पर है । यद्यपि प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों को बहुत दिनों पहले इसका ज्ञान था, तथापि पाश्चात्य ज्योतिषियों में से हर्शल ने १७८१ ई० में इसका पता लगाया था । इसकी परिधि ३१००० मील हैं । प्रायः ८४ वर्ष और १ सप्ताह में इसका परिक्रमण होता है । इसके चार उपग्रह हैं, जिनमें से दो इतने छोटे हैं कि बिना बहुत अच्छी दूरबीन से दिखाई नहीं देते । युरेनस ।

उरणक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेष । मेढ़ा । २. मेघ । बादल [को०] ।

उरणकवत्स
संज्ञा पुं० [सं०] मेंमना [को०] ।

उरणाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] द्रद्रुघ्न नाम का पौधा [को०] । पर्या०—उरणाक्षक । उरणाख्य । उरणाख्यक ।

उरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भेड़ [को०] ।

उरद
संज्ञा पुं० [सं० ऋद्धि, प्रा, उद्द*उरद्ध] [स्त्री० अल्पा० उरदी] एक प्रकार का पौधा जिसकी फलियों के बीज और दानों की दाल होती है । विशेष—इसके एक एक सींके में सेम की तरह तीन पत्तियाँ होती हैं । बैगनी रंग के फूल खिलते हैं । फलियाँ ३-४ अंगुल की होती हैं और गुच्छों में लगती हैं । फलियों के भीतर५-६ लंबे गोल होते हैं जिनके मुँह पर सफेद बिंदी होती है । उरद दो प्रकार का होता है, एक काला और एक हरा । यह भादों क्वार में बोया जाता है और अगहन पूस में काटा जाता है । इसके लिये बलुई मिट्टी और थोड़ी वर्षा चाहिए । इसकी दाल खाई जाती है और पीठी से बड़े पापड़, पकौड़ी आदि बनती हैं । पर्या०—माष । कुरुविंद । मांसल । मुहा०—उरद के आटे की तरह ऐंठना = (१) बिगड़ना । नाराज होना । जैसे, क्यों उरद के आटे की तरह ऐंठते हो अपनी चीज ले लो । (२) घमंड करना । इतराना । ठसक दिखाना । उ०—क्षुद्र लोग थोड़े ही धन में उरद के आटे की तरह ऐंठ जाते हैं । उरद पर सफेदी = बहुत कम । नाम मात्र को । दाल में नमक । जैसे—उनमें विद्या उतनी ही है जैसे उरद पर सफेदी । विशेष—उरद का बीज काला हरा होता है केवल उसके मुँह पर बहुत छोटी सी सफेद बिंदी होती है ।

उरदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उरद का अल्पा० रूप] १. उरद की एक छोटी जाति । विशेष—यह असाढ़ महीने में ज्वार, बाजरा, अरहर आदि के साथ बोई जाती है और क्वार कार्तिक में काटी जाती है । इसके बीज या दाने काले हाते हैं । एक प्रकार की तिनपखिया उरदी होती है जो तीन पक्ष अर्थात् डेढ़ ही महीने में तैयार हो जाती है । २. वह गोल चिह्न जो पीतल की थाली के बीच में बना रहता है । ३. लोहे का एक ठप्पा जिससे थाली में उरदी बनाते हैं ।

उरदू
संज्ञा स्त्री० [तुं० उर्दू] दे० 'उर्दू' । उ०—'इंदर सभा' उरदू में एक प्रकार का नाटक है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ७८९ ।

उरधंत पु
वि० [सं० उर्ध्व+ अन्त] ऊपर । 'ऊर्ध्व' । उ०—अरधंत कवल उरधंत मध्ये प्राण पुरिस का बासा ।—गोरख०, पृ० २९ ।

उरध पु
क्रि० वि० [सं० ऊर्ध्व] दे० 'ऊर्ध्व' । उ०—अरध उरध के मध्य निरंतर सुखमन चउक पुराई हो ।—केशव अमी०, पृ० ७ ।

उरधमुख पु
वि० [सं० ऊर्ध्वमुख] ऊपर की ओर मुँहवाला । उ०— सुरति डोर अमृत भरै, जहाँ कूप उरधमुख । उलटै कमलहिं गगन में, तब मिलै परम सुख ।—पलटू भा०३, पृ०१ ।

उरधारना
क्रि० स० [हिं० उधाड़ना] बिखराना । उधेड़ना । उ०— उरधारी लटैं छूटी आनन पर भीजीं फुलेनन सों आली संग केलि ।—सूर (शब्द०) ।

उरन पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उरण] भेड़ । उ०—ज्यों कोउ उरन पूँछ कर धारे । तरयों चहैं सठ सिंधु अपारे ।—नद० ग्रं०, पृ० ३०७ ।

उरना पु
क्रि० अ० [हिं० उराना] दे० 'उराना' । उ०—प्रेमनीर नयन बरसन लागे लोकन सूँ सब लाज उरी हो ।—दक्खिनी०, पृ० १३२ ।

उरपतरप पु, उरपतिरप पु
संज्ञा पुं० [हिं० उपड़] नृत्य का एक भेद । उड़प । उ०—ततथेई ततथेई सबद सकल घट उरप- तिरप मानो पद की पटक ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३६९ ।

उरबसी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उर्वश्वी] १. एक अप्सरा । २. वक्षःस्थल पर पहना जानेवाला एक गहना । उ०—तो पर वारौं उरबसी, सुनि राधिके सुजान । तु मोहन कै उरबसी है उरबसी समान ।—बिहारी०, र०, दो०, २५ ।

उरबिज पु
संज्ञा पुं० [सं० उर्वी=पृथ्वी+ज=उत्पन्न] भौम । मंगल ग्रह । उ०—जौ उरबिज चाहसि झटित तौ करि घटित उपाय । सुमनस—अरि—अरि—बर—चरन सेवन सरल सुभाय ।—तुलसी (शब्द०) ।

उरबी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उर्वी] दे० 'उर्बी' ।

उरभ्र
संज्ञा पुं० १. भेड़ । २. एक बिसैला कीड़ा (को०) । ३. दद्रुघ्न का पोधा (को०) ।

उरभ्रसारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक जहरीला कीड़ा [को०] ।

उरमना †पु
क्रि० अ० [सं० अवलम्बन, प्रा० ओलंबण] लटकना । उ०—फूलन के बिबिध हार घोड़िलनि उरमत उदार बिच बिच मणि श्याम हार उपमा शुक भाषी ।—केशव (शब्द०) ।

उरमाना †पु
क्रि० स० [हिं० उरमना] लटकाना । टाँगना । उ०— कटि के तट हार लपेट लियो कल किंकिणि लै उर में उमराई ।—केशव (शब्द०) ।

उरमाल
संज्ञा पुं० [फा० रूमाल] रूमाल । उ०—लघु ढालैं लघु लघु करवालैं, लघु लघु कर उरमालैं ।—रघुराज (शब्द०) ।

उरमी
वि० [सं० ऊर्मिन्] शोक मोह आदि षट् उर्मियों से युक्त । अस्तित्व की, शरीर, मन, जीवन, संबंधी शीत, ताप, लोभ, भ्रम क्षुधा, पिपासा आदि लहरों से युक्त । उ०—जी भोजन नरमी खावै खुरमी अनमथ करमी अति उरमी ।—सुंदर० ग्रं० भा०१, पृ० २३६ ।

उरल (१)
संज्ञा पुं० [सं० उरण=भेड़] पच्छिमी पंजाब और हजारा की एक भेड़ जिसे दाढ़ी होती है ।

उरल (२)
वि० [सं० उदार; प्रा० उराल, उरल; राज० उरलो] विश्रव्ध । शांत । उ०—बाबा बालू देसड़ उ, जिहाँ डूँगर नहिं कोइ । तिणि चढ़ि, मुकँउ धाहड़ी, दीयउ उरलउ होइ ।— ढोला० दु०, ३८६ ।

उरला (१)
वि० [सं० अपर, अवर+ हिं० ला (प्रत्य०)] पिछला । उत्तर । पीछे का ।

उरला (२)
वि० [सं० उदार, प्रा० उराल=सुंदर अदभुत] बिरला । सौ में एक । निरला । उ०—ब्रह्मा बेद सही किया शिव योग पसारा हो । विष्णु माया उत्पन्न किया उरला व्यवहारा हो ।— कबीर (शब्द०) ।

उरवारु †पु
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'वार' । उ०—(क) गुरु के शब्दि रत्ता जनु तेरा । उरवारु पार सभ उसही केरा ।—प्राण०, पृ० ९८ । (ख) नामक सचे नामु बिणु नाँ उरवारु न पार ।—प्राण० पृ० २०७ ।

उरश्छद
संज्ञा पुं० [सं०] छाती पर बाँधने का कवच [को०] ।

उरस (१)पु
वि० [सं० कुरस] फीका । कुरस । नीरस । बेस्वाद का । उ०—चलो लाल कछू करो बियारी । बेसन मिले उरस मैदा सों अति कोमल पूरी है भारी ।—सूर (शब्द०) ।

उरस (२)
संज्ञा पुं० [सं० उरस्] १. छाती । वक्षस्थल । २. हृदय । चित्ता ।

उरस (३)
वि० [सं०] १. चौड़ी छातीवाला २. सर्वश्रेष्ठ [को०] ।

उरस (४) †पु
संज्ञा पुं० [फा,० अर्श] आकाश । उ०—भारथ गज थाँटा भिड़ै, अड़ै भुजाँ उरसाँह ।—बाँकी० ग्रं०, भा०१, पृ० १ ।

उरसना †पु
क्रि० स० [हिं० उड़सना] ऊपर नीचे करना । हिलाना । उथल पुथल करना । उ०—यशोदा मदन गोपाल मोआवै । स्वास उदर उरसति यों मानो दुग्ख सिंधु छबि पावै ।— सूर (शब्द०) ।

उरसा †पु
संज्ञा पुं० [हिं० होरसा] दे० 'होरसा' । उ०—नाम तेरो आसन नाम तेरो उरसा नाम तेरो केसरि लै छिड़का रे—रै० बानी, पृ० ६९ ।

उरसिज
संज्ञा पुं० [सं०] स्तन । छाती ।

उरसिसह
संज्ञा पुं० [सं०] कुच । स्तन । उरोज [को०] ।

उरसिल
वि० [सं०] विशाल वक्षःस्थलवाला । चौड़ी छातीवाला [को०] ।

उरस्क
संज्ञा पुं० [सं०] छाती । वक्षस्थल ।

उरस्त्र, उरस्त्राण
संज्ञा पुं० [सं०] छाती का कवच [को०] ।

उरस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का अग्र भाग । विशेष—कौटिल्य ने लिखा है कि पक्ष कक्ष तथा उरस्थ में पाँच धनुष का अंतर होना चाहिए । व्यूहरचना के प्रसंग में पक्ष, कक्ष तथा उरस्थ में भिन्न भिन्न प्रकरा की सेनाओं के रखने के नियम बताए गए हैं ।

उरस्थ (१)
वि० [सं०] १. वक्ष से संबंध रखनेवाला । २. वक्ष से आने या होनेवाला । ३. जिसमें छाती का बल लगाया जाय । ४. सबल वक्षवाला । ५. अपने द्वारा पैदा । अपना उत्पादित । ६. अपना जन्मा । आत्मज (संतान) ।

उरस्य (२)
संज्ञा पुं० १. पुत्र । २. सेना का अग्रभाग । ३. कुच । स्तन । ४. व्याकरण में 'ह' वर्ण और विसर्ग' ।

उरस्वान्
वि० [सं० उरस्वत्] चौड़ी छातीवाला [को०] ।

उरहन पु
संज्ञा पुं० [सं० उपालम्भ, हिं० उलाहना] दे० 'उलाहना' । उ०—(क) उरहन के मिस नंद निकेत । आवत मूख छबि देखत हेत ।—नंद० ग्रं०, पृ० २४५ । (ख) सब ब्रजनारी उरहन आई ब्रजरानी के आगे । मै नाही दधि खायो याको शिशु ह्वै रोवन लागे ।—सूर (शब्द०) ।

उरहना पु
संज्ञा पुं० [सं० उपालंभ प्रा० उवलंभ] उलहना । शिकायत । उ०—इनके लिये खेलिबो छाँडयो तऊ न उबरन पावहिं । भाजन फोरि बोरि कर गोरस देन उरहनो आवहिं ।—तुलसी ग्रं०,पृ० ४३२ । क्रि० प्र०—करना । देना ।

उरहाना †
वि० [देशी०] नंगा । खुला । उवारा । उ०—तब श्री गुसाई जी वाही समै स्नान करि........ उरहाने पाईँन पधारे ।—दो सौ बावन०, भा०२, पृ० ११ ।

उरा (१)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उर्वी] पृथिवी ।

उरा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] भेड़ [को०] ।

उराउ (३) पु
संज्ञा सं० [हिं० उरात्र] दे० 'उराव' ।

उराट पु
संज्ञा पुं० [सं० उरस्थल, > प्रा०* उरट्ठ > हिं० उराठ] छाती । (डिं०) ।

उराण
वि० [सं०] चौड़ा या विस्तृत करनेवाला । फैलानेवाला [को०] ।

उराना †पु
क्रि० अ० [हिं० ओर+ आना (प्रत्य०)] समाप्त होना । खतम होना । वि० दे० 'ओराना' । उ०—देखत उरै कपूर ज्यों उपै जाइ जनि लाल । छिन छिन जाति परी खरी छीन छबीली बाल ।— बिहारी (शब्द०) ।

उरमाथी
वि० [सं०] भेड़ को मारनेवाला (भेड़िया) [को०] ।

उराय
संज्ञा पुं० [हिं० उराव] दे० 'उराव' ।

उरारा पु
वि० [सं० प्रा० उराल] विस्तुत । विशाल । उ०—रूप भरे भारे अनूप अनियारे दृग कोरनि उरारे कजरारे बूँद ढरकनि । देव अरूनाई अरू नई रिसि की छबि सुधा मधुर अधर सुधा मधुर पलकनि ।—देव (शब्द०) ।

उराव
संज्ञा पुं० [सं० उरस्+ आव (प्रत्य०)] चाव । चाह । उमंग । उत्साह । हौसला । उ०—(क) जे पद कमल सुरसरी परसे तिहूँ भुवन यश छाव । सूर श्याम पद कमल परसिहैं मन अति बढयो उराव ।—सूर (शब्द०) । (ख) तुलसी उराव होत सम को सुझाव सुनि को न बलि जाइ नि बिकाइ बिन मोल को ।— तुलसी (शब्द०) । (ग) अति उराव महाराज मगन अति जान्यो जात न काला ।—रघुराज (शब्द०) ।

उराह
संज्ञा पुं० [सं०] पीले रंग का एक घोड़ा जिसका पैर काला हो ।

उराहना
संज्ञा पुं० [सं० उपालम्भ] १. उपालंभ । शिकायत । उ०— (ख) भए बटाऊ नेह तजि बाद बकति बेकाज । अब अलि देत उराहनौ, उर उपजति अति लाज ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) काहे को काहु को दीजै उराहनो आवै इहाँ हम आपनी चाडैं ।—देव (शब्द०) ।

उरणि पु †
वि० [सं० उऋण] दे० 'उऋण' ।

उरिन पु
वि० [सं० उऋण] दे० 'उऋण' । उ०—अब ह्वैहौं दै माथ उरिन तिहारे लौन सौं,—हम्मीरक०, पृ० ४७ ।

उरिष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] रीठा । रीठी । फेनिल ।

उरी
अव्य [देशी०] दे० 'अरे' । उ०—भजो हो सतगुर नाम उरी ।—कबीर० श०, भा०१, पृ० ३८ ।

उरुंजिरा
संज्ञा स्त्री० [सं० उरुञ्जिरा] विपाश नदी का नाम [को०] ।

उरु (१)
वि० [सं०] १. विस्तीर्ण । लंबा चौडा़ । २. विशाल । बड़ा । ३. श्रेष्ठ । बड़ा । महान् । ४. प्रचुर (को०) । ५. बहुल (को०) । ६. मूल्यवान् । कीमती (को०) ।

उरु (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० उरु] जंघा । जाँघ ।

उरुकाल, उरुकालक
संज्ञा पुं० [सं०] एक लता । महाकाल नाम की लता [को०] ।

उरुकीर्ति
वि० [सं०] प्रसिद्धि । यशस्वी । अत्यंत नामी [को०] ।

उरुकृत्
वि० [सं०] विस्तीर्ण या अधिक करनेवाला [को०] ।

उरुक्रम (१)
वि० [सं०] १. बलवान् । पराक्रमी । २. लंबे लंबे पाँव बढ़ानेवाला । लंबे डग भरनेवाला ।

उरुक्रम (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु का वामन अवतार । २. सूर्य । ३. शिव (को०) । ४. लंबा डग (को०) ।

उरुक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] विस्तीर्ण निवास या वासस्थान [को०] ।

उरुगव्यूति
वि० [सं०] विस्तृत क्षेत्र या स्थानवाला [को०] ।

उरुगाय (१)
वि० [सं०] १. जिसका गान किया जाय । २. प्रशंसित । ३. जिसके डंग लंबे हों । फैला हुआ ।

उरुगाय (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु । २. सूर्य । ३. स्तुति । प्रशंसा । ४. इंद्र (को०) । ५. सोम (को०) । ६. अश्विनीकुमार (को०) । ७. प्रशस्त स्थान (को०) ।

उरुगुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] सर्प । साँप [को०] ।

उरुचक्षा
वि० [सं० उरुचक्षस्] दूरदर्शी [को०] ।

उरुचक्र
वि० [सं०] चौड़े चक्के या पहियोंवाली (गाड़ी) [को०] ।

उरुजना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'उरझना' ।

उरुजन्मा
वि० [सं० उरुजन्मन्] अच्छे कुल या वंश में उत्पन्न [को०] ।

उरुज्रयस्
वि० [सं०] विशाल पथ में गमन करनेवाला । विस्तृत क्षेत्र में फैलनेवाला (अग्नि और इंद्र) [को०] ।

उरुझना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'उरझना' ।

उरुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विशालता । विस्तार [को०] ।

उरुताप
संज्ञा पुं० [सं०] अधिक गरमी या ऊष्मा [को०] ।

उरुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. विस्तीर्णता । २. विशालता [को०] ।

उरुधार
वि० [सं०] १. चौड़ी धारा देनेवाला । २. अधिकता से बहनेवाला [को०] ।

उरुपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का पौधा [को०] ।

उरुबिल
वि० [सं०] चौड़े मुँहवाला; जैसे घड़ा [को०] ।

उरुबिल्ब
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ बुद्ध को सम्यक् बुद्ध या बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी । आजकल इस स्थान को बुद्ध गया कहते हैं ।

उरुमार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] विशाल पथ या राजमार्ग [को०] ।

उरुरात्रि
संज्ञा स्त्री० [सं०] रात का अंतिम या उत्तर भाग [को०] ।

उरुवा
संज्ञा पुं० [सं० उलूक, प्रा० उलूक] उल्लू की जाति की एक चिडि़या । रुरुआ ।

उरुविक्रम
वि० [सं०] बलशाली । पराक्रमी [को०] ।

उरुवु
संज्ञा पुं० [सं०] रेंड का वृक्ष । २. लाल एरंड [को०] ।

उरुव्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] विस्तार [को०] ।

उरुव्रज
वि० [सं०] विस्तृत स्थानावाला । विस्तृत [को०] ।

उरुशंस
वि० [सं०] बहुप्रशंसित । जिसकी प्रशंसा बहुत लोग करें [को०] ।

उरुस (१) †
संज्ञा पुं० [हिं०] खटमल । उड़स ।

उरुस (२)पु
संज्ञा पुं० [अ० उर्स] दे० 'उर्स' । उ०—रोजा करै निमाज गुजारै, उरुस करै और आतम मारै ।— मलूक०, पृ० २२ ।

उरुसत्व
वि० [सं०] उदार [को०] ।

उरुस्वान्
वि० [सं०] जिसकी आवाज ऊँची हो । ऊँची आवाजवाला [को०] ।

उरुहार
संज्ञा पुं० [सं०] बहुमुल्य हार [को०] ।

उरूक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का उल्लू [को०] ।

उरूज
संज्ञा पुं० [अ०] १. ऊपर उठना । चढ़ना । २. बढ़ती । वृद्धि । उन्नति । यौ०—उरूजोजवाल = (१) उन्नति-अवनति । (२) लाभ-हानि । वृद्धि—ह्रास ।

उरूणास
वि० [सं०] चौड़ी नाकवाला [को०] ।

उरूसी (१)
संज्ञा पुं० [?] एक वृक्ष जो जापान में होता है । इसके धड़ से एक प्रकार का गोंद निकाला जाता है जिससे रंग और वारनिश बनती है ।

उरूसी (२)पु
संज्ञा स्त्री० [पुं० उरूस] दुलहन । उ०—जब इस बज्म छब की उरूसी दिखाय, तो जोहर को ज्यों दिप मने जल्वा गाय ।— दक्खिनी०, पृ० १३८ ।

उरे †पु
क्रि० वि० [वै० सं० अवार=निकट, इधर, सं० अवर] १. परे । आगे । दूर । ३. इधर । निकट उ०—(क) श्री जगन्नाथराय जी तें उरे कोस बीस कोस पर एक ग्राम है । दौसौबावन०, भा०२, पृ० १३ (ख) घरतें चलिकै दिल्ली के उरे को चल्यो ।—दो सौ बावन, भा०१, पृ० १९५ ।

उरेखना (१)पु
क्रि० स० [हिं० अवरेखना] दे० 'अवरेखना' । उ०— अबर पीत लसै चपला छवि अंबुद मेचक अंग उरेखे ।— मतिराम ग्रं०, पृ० ३३० ।

उरेखना (२)पु
क्रि० स० [सं० उल्लखन या अवरेखन] 'उरेहना' । उ०—यूसुफ मूरत हिएँ उरेखै, धरै ध्यान निज आगे देखै ।—हिंदी प्रेमा०, पृ० २६६ ।

उरेझा †पु
संज्ञा पुं० [हिं० उलझन] दे० 'उलझन' । उ०—परे जहाँ तहँ मुरझि भूप सब उरझि उरेझा ।—नंद० ग्रं०, पृ० २१० ।

उरेह †पु
संज्ञा पुं० [सं० उल्लेख] चित्रकारी । नक्काशी । उ०— (क) कीन्हेसि अगिनि पवन जल खेहा, कीन्हेसे बहुतै रंग उरेहा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) जावँत सबै उरेह उरेहे । भाँति भाँति नग लाग उबेहे ।—जायसी (शब्द०) ।

उरेहना †पु
क्रि० स० [सं० उल्लेखन] १. खींचना । लिखना । रचना । उ०—काह न मुठ भरी वह देही, अस मूरति के दैव उरेही ।—जायसी (शब्द०) । २. सलाई से लकीर करना । रँगना । लगाना । उ०—खेह उड़ानी जाहि घर हेरत फिरत सो खेहु, पिय आवहि अब दिष्ट तोहि अंजन नयन उरेहु ।—जायसी (शब्द०) ।

उरेड़ना पु †
क्रि० अ० [हिं० उडेलना] दे० 'उडेलना' । यौ०—उरैड़ाउरैंड़ी = उड़ेला उँडेली । छीनाझपट्टी में गिराने का काम । उ०—आँनदधन सों मिलि चलि दामिन नातर मचि है दधि की उरैड़ाउरैड़ी ।—घनानंद, पृ० ५२९ ।

उरै पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'उरे' । उ०—छगन मगन बारे कन्हैया, नैंकु उरै धौं आई रे ।—नंद० ग्र०, पृ० ३३९ ।

उरो
संज्ञा पुं० [सं०] 'उरस' का समास प्राप्त रूप ।

उरोगम
संज्ञा पुं० [सं०] सर्प । साँप [को०] ।

उरोग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] पार्श्व शूल [को०] ।

उरोघात
संज्ञा पुं० [सं०] छाती का दर्द [को०] ।

उरोज
संज्ञा पुं० [सं०] स्तन । कुच । छाती ।

उरोबृहती
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक छंद का नाम [को०] ।

उरोभूषण
संज्ञा पुं० [सं०] छाती पर धारण किया जानेवाला एक अलंकार [को०] ।

उरोरुह
संज्ञा पुं० [सं०] उरोज । कुच । उ०—नयनों में निःसीम व्योम, औ उरोरुहों में सुरसरि धार ।—पल्लव, पृ० ३९ ।

उरोविबंध
संज्ञा पुं० [सं० उरोबिबंध] श्वास रोग । दमा [को०] ।

उरोहस्त
संज्ञा पु० [सं०] बाहुयुद्ध या मल्लयुद्ध का एक भेद [को०] ।

उर्जित
वि० [सं०] १. वर्धित । शक्तिशाली । बलवान् । २. त्यक्त । छोड़ा हुआ । ३. गर्वी । अभिमानी । घमंडी [को०] ।

उर्झैरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उपझेरा' । उ०—तीन सौ साठ पैठ उझेंरा । कैसे हसन लेब उबेरा ।—कबीर सा०, पृ० ८०४ ।

उर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ऊर्ण' ।

उर्णनाभ
संज्ञा पुं० [सं०] मकड़ा ।

उर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ऊर्णा' ।

उर्द †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उरद' ।

उर्दपर्णी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उर्द+ सं० पर्णी] माषपर्णी । बन उर्दी ।

उर्दू (१)
संज्ञा पुं [तुं०] लश्कर । छावनी ।

उर्दु (२)
संज्ञा स्त्री० [तुं०] वह हिंदी जिसमें अरबी, फारसी भाषा के शब्द अधिक मिले हों और जो फारसी लिपि में लिखी जाय । विशेष—तुर्की भाषा में इस शब्द का अर्थ लश्कर, सेना का शिविर है । शाहजहाँ के समय से इस शब्द का प्रयोग भाषा के अर्थ में होने लगा । उस समय बादशाही सेना में फारसी, तुर्क और अरब आदि भरती थे और वे लोग हिंदी में कुछ फारसी, तुर्की, अरबी आदि के शब्द मिलाकर बोलते थे । उनको इस भाषा का व्यवहार लश्कर के बाजार में चीजों के लेनदेन में करना पड़ता था । पहले उर्दु एक बाजारू भाषा समझी जाती थी पर धीरे धीरे वह साहित्य की भाषा बन गई । यौ०—उर्दु ए मुअल्ला=प्रशस्त या उच्च कोटि की उर्दू जिसमें अरबी फारसी शब्दों का अधिकतम प्रयोग हो । उर्दू बेगनी= बाजार में खरीदी हुई स्त्रियाँ जो लड़ाई के वक्त अमीरों की बेगम का काम करती थी ।—राज० इति०, पृ० ७६६ ।

उर्दूबाजार
संज्ञा पुं० [तुं० उर्दू+ बाजार] १. लश्कर का बाजारा । छावनी का बाजार । २. वह बाजार जहाँ सब चीजें मिले ।

उर्द्ध पु
वि० [सं० ऊर्ध्व] दे० 'ऊर्ध्व' । उ०—अध को अधर धरा पै धरयो । उर्द्ध अधर जलधर मै करयौ ।—नंद० ग्रं०, पृ० २६० ।

उर्द्र
संज्ञा पुं० [सं०] ऊदबिलाव [को०] ।

उर्ध पु
वि० [सं० ऊर्ध्व] दे० 'ऊर्ध्व' ।

उर्धबाहु पु
संज्ञा पुं० [सं० ऊर्ध्ववाहु] जिसकी बाँह ऊपर उठी हो । उ०—कोइ उर्धबाहु कर रहै उठाई ।—जग० श०, पृ० ६६ ।

उर्धमुख पु †
वि० [सं० उद्धर्वमुख] ऊपर की ओर मुँहवाला । जिसका मुँह ऊपर की ओर हो । उ०—हमरे देसवा उर्धमुख कुइयाँ साँकर वाकी खोरिया ।—धरम० श०, पृ० ३५ ।

उर्फ
संज्ञा पुं० [अ० उर्फ] चल्तू नाम । पुकारने का नाम ।

उर्मि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ऊर्मि] दे० 'ऊर्मि' ।

उर्मिला
संज्ञा स्त्री० [सं० उर्मिला] १. सीता जी की छोटी बहिन जो लक्षमण जी से ब्याही थी । उ०—(क) मांडवी श्रुतिकीर्ति उर्मिला कुँअरि लई हँकारि कै ।—तुलसी (शब्द०) । २. एक गंधर्वी जिसकी पुत्री सोमदा से ब्रह्मदत्त उत्पन्न हुआ जिसने कपिला नगरी बसाई ।

उर्वट
संज्ञा पुं० [सं०] १. बछड़ा । २. वर्ष [को०] ।

उर्वर
वि० [सं०] उपज या पैदाकरनेवाला [को०] ।

उर्वरक
संज्ञा पुं० [सं० उर्वर+ क] खाद जो खेतों की उपज बढ़ाने के लिये रासायनिक ढंग से तैयारी की जाती है ।

उर्वरता
संज्ञा स्त्री० [सं० उर्वर+ता (प्रत्य०)] १. उर्वर होने की स्थिति । उपाजाऊपन । २. अधिक उपजाऊ होना ।

उर्वरा (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपजाऊ भूमि ।२. पृथ्वी । भूमि । ३. एक अप्सरा । ४. सूत या ऊन आदि की ढेरी या गड्ढी (को०) । ५. घुँघराले बाल (हास परिहा में) (को०) ।

उर्वरा (२)
वि० स्त्री० उपजाऊ । जरखेज । यौ०—उर्वरा शक्ति ।

उर्वराजित्
वि० [सं०] उपजाऊ भूमि को अधिकार में करनेवाला [को०] ।

उर्वरापति
संज्ञा पुं० [सं०] खड़ी खेती या फसल का स्वामी [को०] ।

उर्वरित
वि० [सं०] १. बहुत । अत्यधिक । २. अवशिष्ट । मुक्त [को०] ।

उर्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह पत्नी जौ बहुत सी अन्य स्त्रियों के साथ वरण के लिये दी गई हो । २. श्रेष्ठ स्त्री । ३. सूत या रेशा जो चरखे से निकाला गया हो [को०] ।

उर्वर्य
वि० [सं०] उपाजऊ भूमि से संबंध रखनेवाला [को०] ।

उर्वशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एत दिव्य अप्सरा । स्वर्ग की अप्सरा । यौ०—उर्वशीतीर्थ । उर्वशीरमण, उर्वशीवल्लभ, उर्वशीसहाय= पुरुरुवा नरेस का नाम ।

उर्वशीतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत में वर्णित एक तीर्थ का नाम ।

उर्वारु
संज्ञा पुं० [सं०] १. खरबूजा । २. ककड़ी ।

उर्वारुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. खरबूजा । २. ककड़ी । ३. कद्दू (को०) ।

उर्विजा पु
संज्ञा पुं० [सं० उर्वी+ जा] दे० 'उर्वीजा' ।

उर्वी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथिवी । यौ०—उर्वीजा । उर्वीतल । उर्वीधव, उर्वीपति, उर्वीभृत, उर्वीश । उर्वीश्वर = नरेश । राजा ।

उर्वीजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी से उत्पन्न सीता ।

उर्वीतल
संज्ञा पुं० [सं०] पृथ्वी का तल । धरातल [को०] ।

उर्वीधर
संज्ञा पुं० [सं०] १. शेष । २. पर्वत ।

उर्वीरुह
संज्ञा पुं० [सं०] वृक्ष, पौधा आदि वनस्पति समूह [को०] ।

उर्स
संज्ञा पुं० [अ०] १. मुसलमानों के मत के अनुसार किसी साधुमहात्मा, पीर आदि के मरने के दिन का कृत्य । २. मुसलमान साधुओं की निर्वाण तिथि ।

उलंग
वि० [सं० उन्नग्न] नंगा । उ०—दास गरीब उलंग छबि अधर डाक कूदंत ।—कबीर मं०, पृ० ५८८ ।

उलंगना †पु
क्रि० स० [सं० उल्लङ्घन] दे० 'उलंघना' । उ०—व इब्लीस भुँई पर थे हमला किया । व सातों तवक सूँ उलँग कर गया ।—दक्खिनी०, पुं० ३२८ ।

उलंगन पु
संज्ञा पुं० [सं० उल्लङ्घन] दे० 'उलंघन' ।

उलंघना पु † उलँघना
क्रि० स० [सं० उल्लंघन प्रा० उल्लंघण= लाँघना] १. नाँघना । डाँकना । फाँदना । उल्लंघन करना । उ०—(क) ऊँचा चढ़ि असमान को मेरु उलंभी ऊड़ि । पशु पंक्षी जीव जंतु सब रहा मेरु में गूडि ।—कबीर (शब्द०) । या भव पारावार को उलँघि पार को जाय, तिय छबि छाया ग्राहिनी गहै बीच ही आय ।—बिहारी (शब्द०) । २. न मानना । अवहेलना करना । अवज्ञा करना । उ०—सतगुरु सबद उलंघि करि जो कोई शिष जाय । जहाँ जाय तहँ काल है कह कबीर समुझाय—कबीर (शब्द०) ।

उलका पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उल्का] दे० 'उल्का' । उ०—मुख में उलका लए फिरति हैं कुशिवा कारी ।—श्यामा० (भू०), पृ० ५ ।

उलकैयाँ बिलुकैया †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] जाईँ । झासापट्टी । दमपट्टी । लुकाछिपी । क्रि० प्र०—देना । उ०—राजा तो उकैलयाँ बिलकैया दै के निकरि आयौ ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १०६ ।

उलगट †
संज्ञा स्त्री० [हिं० उल्लङ्घ+ट (प्रत्य०)] कूद । फाँद ।

उलगना †
क्रि० अ० [सं० उल्लंघन] कूदना । लाँघना ।

उलगाना †
क्रि० स० [सं० उल्लंघन] [संज्ञा उलगट] कुदाना । फँदाना ।

उलचना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उलीचना' ।

उलछना पु †
क्रि० स० [हिं० उलचना] १. हाथ से छितराना । बिखराना । २. उलीचना ।

उलछा †
संज्ञा पुं० (हिं० उलचना) हाथ से छितराकर बीज बोने की रीति । छींटा । बखेरना । पबेरा । विशेष—इसका उलटा सेव या गुल्ली है ।

उलछार †
संज्ञा पुं० [हिं०] छींटने या बखेरने की क्रिया । २. ऊपर या अगल बगल फेंकना । ३. हुल आना । कै मालूम होना ।

उलछारना पु् †
क्रि० स० [हिं० उलछना या उछाल] १. ऊपर या अलग उछलना या फेंकना । २. कोई गुप्त बात सब पर प्रकट कर देना । ३. आरोप करना । इलजाम लगाना । ४. निंदा करना । बुराई करना ।

उलझन
संज्ञा पुं० [सं० अवरुन्धन, 'अवरुन्धते' के रहित भाग 'ते' से पा० ओरुज्झन] १. अटकाव । फँसान । गिरह । गाँठ । २. बाधा । जैसे,—तुम सब कामों में उलझन डाला करते हो । क्रि० प्र०—डालना ।—पड़ना । ३. पेच । चक्कर । समस्या । व्यग्रता । चिंता । तरददुद । मुहा०—उलझन में डालना = झंझट में फँसाना । बखेड़ें में डालना । जैसे,—तुम क्यों व्यर्थ अपने को उलझन में डालते हो । उलझन में पड़ना = फेर में पड़ना । चक्कर में पड़ना । आगा पीछा करना ।

उलझना
क्रि० अ० [हिं० उलझन] १. फँसना । अटकना । किसी वस्तु से इस तरह लगना कि उसका कोई अंग घुस जाय और छुड़ाने से जल्दी न छूटै । जैसे, काँटे मे उलझना । (उलझना का उलटा सुलझना) । संयो० क्रि०—जाना । २. लपेट में पड़ना । गुथ जाना । (किसी वस्तु में) पेंच पड़ना । बहुत से घुमावों के कारण फँस जाना । जैसे,—रस्सी उलझ गई है, खुलती नहीं है । संयो० क्रि०—जाना । ३. लिपटना । उ०—मोहन नवल शृंगार विटप सों उरझी आनंद बेल ।—सूर (शब्द०) । संयो० क्रि०—जाना । ४. किसी काम में लगना । लिप्त होना । लीन होना । जैसे,—(क) हम तो अपने काम में उलझे थे इधर उधर ताकने नहीं थे । (ख) इस हिसाब में क्या है जो घंटो से उलझे हो । संयो० क्रि०—जाना । ५. प्रेम करना । आसक्त होना । जैसे,—वह लखनऊ मेंजाकर एक रंडी से उलझ गया । संयो० क्रि०—जाना । ६. विवाद करना । तकरार करना । लड़ना—झगड़ना । छेड़ना । जैसे,—तुम जिससे देखो उसी से उलझ पड़ते हो । संयो० क्रि०—जाना ।—पड़ना । ७. कठिनाई में पड़ना । अड़चन में पड़ना । ८. अटकना । रुकना । जैसे,—वह जहाँ जाता है वहीं उलझ रहता है । मुहा०—उलझना सुलझना=फँसना और खुलना । उझलनाः पलकना=बुरी तरह फँसना और निखारने में और फँसते जाना । उ०—यह संसार काँट की गाड़ी उलझ पलझ मर जाता है ।—कबीर श०, भा०१, पृ० २१ । उलझना पुलझना = अच्छी तरह फँसना । उ०—ब्राह्मण गुरु हैं जगत के करम भरम का खाहिं । उलझि पुलझि के मारि गए चारिउ बेदन माहिं ।—कबीर (शब्द०) । उलझा सुलझा = टेढ़ा सीधा । भला बुरा । उ०—बेसुरी बे ठेकाने की उलझी सुलझी तान सुनाऊँ ।—इंशाअल्ला (शब्द०) । उलझना उलझाना = बात बात में दखल देना । उ०—जब तक लाला जी लिहाज करते हैं, तब तक ही उनका उलझना उलझाना बन रहा है ।—परीक्षागुरु (शब्द०) ।

उलझा (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उलझन' ।

उलझा (२)पु †
संज्ञा पुं० [देश०] १. हूल । २. शूल । पीड़ा । उ०—बीर वियोग के ये उलझा निकासै जिन रे जिकरा हियरा तें ।—ठाकुर०, पृ० ४ ।

उलझाना (१)
क्रि० स० [हिं० उलझाना] १. फँसाना । अटकाना । २. लगाए रखना । लिप्त रखना जैसे ।—वह लोगों को घंटों बातों ही में उलझा रखता है । ३. लकड़ी आदि में बल डालन या टेढ़ा करना ।

उलझाना (२)पु
क्रि० अ० [हिं० उलझाना] उलझना । फँसना । उ०—जीव जंजालौं मढ़ि रहा उलझानों मन सुत । कोइ एक सुलझे सावधौं गुरु वाह अवधूत ।—कबीर (शब्द०) ।

उलझाव
संज्ञा पुं० [हिं० उलझ+ आव (प्रत्य०)] १. अटकाव । फँसाव ।२ . झगड़ा । बखेड़ा । झंझट । ३. चक्कर । फेर ।

उलझेड़
संज्ञा पुं० [हिं० उलझ+ एड़ (प्रत्य०)] उलझन । उ०— इसको दा लझेड़ न सुलझेगा ज्यानी बड़े ।—नट० पृ० १२७ ।

उलझेड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० उलझेड़] १. अटकाव । फँसान । २. झगड़ा बखेड़ा । झंझट ।३. खींचातानी ।

उलझौहाँ
वि० [हिं० उलझ+ औंहा (प्रत्य०)] १. अटकानेवाला । फँसानेवाला । २. वश में करनेवाला । लुभानेवाला । उ०—होत सखि ये उलझाँहे नैन । उरझि परत सुरभ्यो नहिं जानत सोचन समुजत है न ।—हरिश्चंद्र (शब्द०) ।

उलटकंबल
संज्ञा पुं० [देश०] एक पौधा या झाड़ी जो हिंदुस्तान के गरम भागों में पनीली भूमि में होती है । विशेष—इसकी रेशेदार छाल पानी में सड़ाकर या यों ही छीलकर निकाली जाती है । छाल सफेद रंग की होती हैं । पौधे से साल में दो तीन बार छह या सात फुट की डालियाँ छाल के लिये काटी जाती हैं । छाल को कूटकर रस्सी बनाते हैं । जड़ की छाल प्रदर रोग में दी जाती है ।

उलटकटेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उष्ट्रकंट] ऊँटकटारा । ऊँटकटाई ।

उलटन
संज्ञा पुं० [हिं० उलटना] लौटने का कार्य या स्थिति । उ०—दुरि भुरि भगन बचावत छबि सों आवन उलटन सोहै ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३८१ ।

उलटना
क्रि० अ० [सं० उलण्ठन या अवलुण्ठन] १. ऊपर नीचे होना । ऊपर का नीचे और नीचे का ऊपर होना । औंधा होना । पलटना । जैसे, यह दावात कैसे उलट गई । संयो० क्रि०—जाना । २. फिरना । पीछे मुड़ना । घूमना । पलटना । जैसे—मैने उलटकर देखा तो वहाँ कोई न था । उ०—जेहि दिसि उलटै सोई जनु खावा । पलटि सिंह तेहि ठाऊँ न आवा ।— जायसी (शब्द०) । संयो० क्रि०—पड़ना । विशेष—गद्य में पूर्वकालिक रूप में 'पड़ना' के साथ संयुक्त रूप ही में यह क्रिया अधिक आती है । ३. उमड़ना । टूट पड़ना । उलझ पड़ना । एकबारगी बहुत संख्या में आना या जाना । जैसे—तमाशा देखने के लिये सारा शहर उलट पड़ा । उ०—नयन बाँक सर पूज न कोऊ मन समुद्र अस उलटहिं दोऊ ।—जायसी (शब्द०) । विशेष—गद्य में इस अर्थ में इस क्रिया का प्रयोग अकेले नहीं होता, या तो 'पड़ना' के साथ होता है अथवा 'आना' और 'जाना' के साथ केवल इन रूपों में—'उलटा जा रहा है', 'उलटा चला आ रहा है', 'उलटा जा रहा है' और 'उलटा' चला जा रहा है ।' ४. इधर का उधर होना । अंडबंड होना । अस्त व्यस्त होना । क्रमविरुद्ध होना । जैसे,—यहाँ तो सब प्रबंध ही उलट गया है । उ०—जाने प्रात निपट अलसाने भूखन सब उलटाने । करत सिंगार परस्पर दोऊ अति आलस सिथिलाने ।— सूर (शब्द०) । संयो० क्रि०—जाना । ५. विपरीत होना । विरुद्ध होना । और का और होना । जैसे—आजकल जमाता ही उलट गया है । संयो० क्रि०—जाना । ६. फिर पड़ना । क्रुद्ध होना । विरुद्ध होना । जैसे,— मै तो तुम्हारे भले के लिये कहता था तुम मुझपर व्यर्थ ही उलट पड़े । संयो० क्रि०—पड़ना । विशेष—केवल 'पड़ना' के साथ इस अर्थ में यह क्रिया आती है । ७. ध्वस्त होना । उखड़ना पुखड़ना । बरबाद होना । नष्ट होना । बुरी गति में पहुँचाना । जैसे,—एक ही बार ऐसा घाटा आया कि वे उलट गए । उ०—इसकी बातों से तो प्राण मुँह को आते हैं और मालूम होता है कि संसार उलटा जाता है—हरिश्चंद्र (शब्द०) । संयो० क्रि०—जाना । विशेष—केवल 'जाना' के साथ इस अर्थ में यह क्रिया आती है । ८. मरना । बेहोश होना । बेसुध होना । जैसे,—(क) वह एक ही डंडो में उलट गया । (ख) भाँग पीते ही वह उलट गया । संयो० क्रि०—जाना । विशेष—केवल 'जाना' के साथ इस अर्थ में यह क्रिया आती है । ९. गिरना । धरती पर पड़ जाना । जैसे,—हवा से खेत के धान उलट गए । संयो० क्रि०—जाना । १०. घमंड करना । इतराना । जैसे,—थोड़े ही से धन में इतने उलट गए । विशेष—केवल 'जाना' के साथ इस अर्थ में यह क्रिया आती है । ११. चौपायों का एक बार जोड़ा खाकर गर्भ धारण न करना और फिर जोड़ा खाना । १२. (किसी अंग का) मोटा या पुष्ट होना । जैसे, —चार ही दिनों की कसरत से उसका बदन या उसकी रान उलट गई ।

उलटना (२)
क्रि० स० १. नीचे का भाग ऊपर और ऊपर का भाग नीचे करना । औंधा करना । लौटना । पलटना । फेरना । जैसे—यह घड़ा उलटकर रख दो । २. औंधा गिराना । ३. पटकना । दे मारना । गिरा देना । फेंक देना । जैसे, —पहले पहलवान ने दूसरे को हाथ पकड़ते ही उलट दिया । ४.किसी लटकती हुई वस्तु को समेटकर ऊपर चढ़ाना । जैसे, — परदा उलटा दो । ५. इधर का उधर करना । अंडबंड करना । अस्त व्यस्त करना । घालमेल करना । जैसे, —तुमने तो हमारा किया कराया सब उलट दिया । ६. विपरीत करना । और और का करना । जैसे, —(क) उसने तो इस पद का सारा अर्थ उलट दिया । (ख) कलक्टर ने तहसील के इंतजाम को उलट दिया । संयो० क्रि०—देना । ७. उत्तर प्रत्युत्तर करना । बात दोहराना । जैसे, —(क) बड़ों की बात मत उलटा करो । उ०—आवत गारी एक है उलटत होय अनेक । कहै कबीर नहिं उलटिए वही एक की एक ।—कबीर (शब्द०) । ८. खोदकर फेंकना । उखाड़ डालना । खोदना । खोदकर नीचे ऊपर करना । जैसे,—यहाँ की मिट्टी भी फावड़े से उलट दो । उ०—बेगि देखाउ मूढ न तु आजू । उलटौं महि जहँ लगि तब राजू ।—तुलसी (शब्द०) । संयो० क्रि०—देना । ९. बीज मारे जाने पर फिर से बोने के लिये खेत को जोतना । १०. बेसुध करना । बेहोश करना । जैसे, —माँग ने उलट दिया है, मुँह से बोला नहीं जाता है । संयो० क्रि०—देना । ११. कै करना । वमन करना । जैसे, —खाया पीया सब उलट दिया । १२. उँडेलना । अच्छी तरह डालना । ऐसा ढालना कि बरतन खाली हो जाय । जैसे, —उसने सब दवा गिलास में उलट दी । संयो क्रि०—देना ।—लेना । १३. बरबाद करना । नष्ट करना । जैसे, —लड़की के ब्याह के खर्च ने उन्हें उलट दिया । १४. रटना । जपना । बार बार कहना । जैसे,—तू रात दिन क्यों उसी का नाम उलटती रहती है । विशेष—माला फेरने या जपने को 'माला उलटना' भी बालते हैं; इसी से यहा मुहावरा बना है ।

उलटना पलटना (१)
क्रि० स० [अवलुण्ठन परिलुण्ठन प्रा०, उल्लढ्ढ पलट्ठ] १. इधर उधर फेरना । नीचे ऊपर करना । जैसे,— (क) सब असबाब उलट पलट कर दोखो, घड़ी मिल जायगी । उ०—उलटा पलटा न उपजे ज्यों खेतन में बीज ।—कबीर (शब्द०) । (२) अँडबंड करना । अस्त व्यस्त करना । २. और का और करना । बदल डालना । जैसे,—नए राजा ने सब प्रबंध ही उलट पलट दिया ।

उलटना पलटना (२)
क्रि० अ० इधर उधर पलटा खाना । घूमना फिरना । उ०—(क) आप अपुनपो भेद बिनु उलटि पलटि अरुसाइ, गुरू बिनु मिटइ न दुगदुगी अनबनियत न नसाइ ।— कबीर (शब्द०) । (ख) उलटि पलटि कपि लंका जारी ।— (शब्द०) ।

उलट पलट (१)
संज्ञा पुं० [हिं० उलट+ पुलट] १. हेर फेर । अदल- बदल । फेर फार । परिवर्तन । २. अव्यवस्था । गड़बड़ी ।

क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

उलट पलट (२)
वि० १. परिवर्तित । बदला हुआ । २. इधर का उधर किया हुआ । अंड बंड । अव्यवस्थित । ग़ड़बड़ । अस्त व्यस्त । क्रि० प्र०—करना ।—जाना ।—देना ।—होना ।

उलट पुलट
संज्ञा पुं०, [हिं० वि०] दे० 'उलट पलट' ।

उलट फेर
संज्ञा पुं० [हिं० उलटना+ फेर] परिवर्तन । अदल बदल । हेर फेर । जैसे,—(क) समय का उलट फेर । (ख) इन दो तीन महीनों के बीच न जाने कितने उलट फेर हो गए ।

उलवाँसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटा+सं० वाशी या वासी=बोली] सीधे न कहकर घुमा फिराकर या उलटकर कही हुई बात या व्यंजना । जैसे,—फील रबाबी बलदु पखावज कौआ ताल बजावै । पहिरि चोलना गदहा नाचै भैंसा भगति करावै ।— कबीर ग्रं०, पृ० ३०७ ।

उलटा (१)
वि० [हिं० उलटना] [स्त्री० उलटी] १. जो ठीक स्थिति में न हो । जिसके ऊपर का भाग नीचे और नीचे का भाग ऊपर हो । औंधा । जैसे—उलटा घड़ा । (ख) बैताल पेड़ से उलटा जा लटका । मुहा०—उलटा तवा=अत्यंत काला । काला कलूटा । जैसे, —उसका मुह उलटा तावा है । उलटा लटकना=किसी वस्तु के लिये प्राण देने पर उतारू होगा । जैसे, तुम उलटे लटक जाओ तो भी तुम्हे वह पुस्तक न देंगे । उलटी टाँगें गले पड़ना=(१) अपनी चाल से आप खराब होना । आपत्ति मोल लेना । लेने के देने पड़ना । (२) अपनी बात से आप ही कायल होना । उलटी साँप चलना=साँस का जल्दी जल्दी बाहर निकलना । दम उखड़ना । साँस का पेट में समाना । मरने का लक्षण दिखाई देना । उलट साँस लेना=जल्दी जल्दी साँस खींचना । मरने के निकट होना । उलटे मुँह गिरना=दूसरे की हानि करने कि निकट में स्वयं हानि उठाना । दूसरे की नीचा दिखाने के बदले स्वयं नीचा देखना । २. जो ठिकाने से न हो । जिसके आगे का भाग पीछे अथवा दागिनी ओर का भाग बाईं ओर हो । इधर का उधर । क्रम विरुद्ध । जैसे, —उलटी टोपी । उलटा जूता । उलटा मार्ग । उलटा हाथ । उलटा परदा (अँगरेखे का) । उ०—उलटा नाम जपत जग जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना । तुलसी (शब्द०) । मुहा०—उलटा घड़ा बाँधना=और का और करना । मामले को फेर देना । ऐसी युक्ति रचना कि विरुद्ध चाल चलनेवाले की चाल का बुरा फल घूमकर उसी पर पड़े । उलटा फिरना या लौटना=तुरंत लौट पड़ना । बिना छड़ भर ठहरे पलटना । चलते चलते घूम पड़ना । जैसे, —तुम्हें घर न पाकर वह उलटा फिरा, दम मारने के लिये भी न ठहरा । उलटा हाथ= बाँया हाथ । उलटी गंगा बहना=अनहोनी बात होना । उलटी गंगा बहाना=जो कभी नहीं हुआ हो, उसको करना । विरुद्ध रीति चलाना । उलटी माला फेरना=मारण या उच्चाटन के लिये जप करना । बुरा मानना । अहित चाहना । उलटे काँटे तौलना=कम तैलना । (डाँड़ी मारना) । उलटे छुरे से मूँड़ना= उल्लू बनाकर काम निकालना । बेवकूफ बनाकर लूटना ।झँसना । उलटा पाँव फिरना=तुरंत लौट पड़ना । बिना क्षण भर ठहरे पलटना । चलते चलते घूम पड़ना । उलटे हाथ का दाँव=बाएँ हाथ का खेल । बहुत ही सहज काम । ३. कालक्रम में जो आगे का पीछे और पीछे का आगे हो । जो समय से आगे पीछे हो । जैसे, —उसका नहाना खाना सब उलटा । ४. अत्यंत असमान । एक ही कोटि में सबसे अधिक भिन्न । विरुद्ध विपरीत । खिलाफ । बरअक्स । जैसे—हमने तुमसे जो कहा था उसका तुमने उल्टा किया । ५. उचित के विरुद्ध । जो ठीक हो उससे अत्यंत भिन्न । अंडबंड । अयुक्त । और का और । बेठीक । जैसे, —उलटा जमाना । उलटी समझ । उलटी रीति । उ०—सहित विषाद परस्पर कहहीं, बिधि करतब सब उलटे अहहीं ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—उलटा जमाना=वह समय जब भली बात बुरी समझी जाय और कोई नियत अवस्था न हो । अंधेर का समय । उलटा सीधा=बिना क्रम का । अंडबड । बेसिर पैर का । बिना ठीक ठिकाने का । अव्यवस्थित । भला बुरा । जैसे, —(क) उन्होंने जो उलटा सीधा बतलाया वही तुम जानते हो । (ख) हमसे जैसा उलटा सीधा बनेगा, हम कर लेंगे । उलटी खोपड़ी का=औंधी समझ का । जड़ । मूर्ख । उलटी पट्टी पढ़ाना= टेढ़ी सीधी समझाना । और की और सुझाना । भ्रम में डालना । बहकाना । उलटी सुनना=जैसा न हो वैसा सुनना । विपरीत सुनना । उ०—आपने जो बात सुनी है उलची ही सुनी है ।—सैर०, पृ० १६ । उलटी सीधी सुनना=भला बुरा सुनना । गाली खाना । जैसे,—तुम बिना दम पाँच उलटी सीधी सुने न मानोगे । उलटी सीधी सुनाना=खटी खोटी सुनाना । भला बुरा कहना । फटकारना ।

उलटा (२)
क्रि० वि० १. विरुद्ध क्रम से । और तौर से । बेठिकाने । ठीक रीति से नहीं । अंडबंड । २. जैसा होना चाहिए उससे और ही प्रकार से । विपरीत व्यवस्था के अनुसार । विरुद्ध न्याय से । जैसे, —(क) उलटा चोर कोतवाल को डाँटै । (ख) तुम्हीं ने काम बिगाड़ा, उलटा मुझे दोष देते हो ।

उलटा (३)
संज्ञा पुं० १. एक पकवान । पपरा । पोपरा । विशेष—यह चने या मचर के बेसन से बनाया जाता है । बेसन को पानी में पतला घोलते हैं, फिर उसमें नमक हल्दी, जिरी आदि मिलाते हैं । जब तवा गरम हो जाता है तब उपसपर घी या तेल डालकर घोले हुए बेसन को पतला फैला देते हैं । हैं । जब यह सुखकर रोटी की तरह हो जाता है तब उलटकर उतार लेते हैं । २. एक पकवान । गोझा । विशेष—यह आटे और उरद की पीठी से बनता है । आटे का चकवा बनाते हैं फिर उसमें पीठी भरकर दोमड़ देते हैं । इससे पानी की भाप से पकाते हैं । ३. विपरीत ।

उलटाना पु †
क्रि० स० [हिं० उलटना] १. पलटना । लौटाना । पीछे फेरना । उ०—बिहारीलाल, आवहु, आई छाकि । भई अबार गाइ बहुरावह उलटावहुँ दै हाँक ।—सूर (शब्द०) । (ख) जो शोक सों भई मातुगन की दिशा सो उलटा इहैं ।—हरिश्चंद्र (शब्द०) । २. और का और करना या कहना । अन्यया करना या कहना । उ०—हरि से हितू सों भ्रम भूल हु न कीजे मान हाँतो करि हियहू सों होत हिय हानिए । लोक में अलोक आन नीकहू लगावत हैं सीता जु को दूत गीत कैसे उर आनिए । आँखिन जो देखियत सोई सीँची केशवराइ कानन की सुनी साँची कबहूँ न मानिए । गोकुल की कुलटी ये यों ही उलटावति हैं आज लौं तो वैसी ही है काल्हि कहा जानिए ।—केशव (शब्द०) । ३. फेरना । दूसरे पक्ष मे करना । इ०—(क) अब लखहु करि छल कलह नृप सों भेद बुद्धि उपाइ कै । परबत जनन सों हम बिगारत राक्षसहि उलटाइ कै ।—हरिश्चंद्र (को०) ।

उलट पलटा
वि० [हिं० उलटा+ पलटना] इधर का उधर । अंडबंड । बेसिर पैर का । बिना ठीक ठिकाने । बेतरतीब ।

उलटा पलटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटा+पलटी=पलटने या फेरने का कार्य] १. फेर फार करना । अदल बदल । इधर का उधर होना । नीचे ऊपर होना । उ०—थहरात उऱोजन के उपरा हियाहार करै उलटा पलटी (प्रत्य०) ।

उलटा पुलटा †
वि० [हिं० उलटा+पुलटा] दे० 'उलटा पलटा' ।

उलटा पुलटी् †
वि० [हिं० उलटा+पुलटी] [पलटने या फेरने का कार्य] दे० 'उलटा पुलटा' । उ०—(क) उलटा पुलटी बजै सो तार । काहुहि मारै काहुहि उबार ।—कबीर (शब्द०) । (ख) सखी तुम बात कही यह साँची । तमुहीं उलटी कहौं, तुमहिं पुलटी कहौं तुमहिं रिस करति मैं कछु न जानौं ।—सूर (शब्द०) ।

उलटामाँच
संज्ञा पुं० [हिं० उलटा+ माँच < अं० मार्च] जहाज का पीछे की ओर हटना या चलना ।

उलटाव
संज्ञा पुं० [हिं० उलट+ आव (प्रत्य०)] १. पलटाव । फेर । २. घुमाव । चक्कर ।

उलटावसी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटवाँसी] दे० 'उलटवाँसी' । उ०—उलटावसी जो कही कबीरा । रमज रेखता में मत धीरा ।—घट०, पृ० २४७ ।

उलटासुलटा
वि० [हिं० उलटा+ सुलटा] उलटा सीधा । क्रमरहित । बेतरतीब । उ०—उलटे सुलटे बचन कै, सिष्य न मानै दुक्ख । कहै कबीर संसार में, सो कहिये गुरुमुक्ख ।—कबीर सा० सं०, भा० १, पृ० १६ ।

उलटी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटना] १. वमन । कै । २. मालखंभ की एक कसरत जिसमें खिलाड़ी की पीठ मालखंभ की ओर और सामना देखनेवालों की ओर रहता है । खिलाड़ी दोनों पैरों को पीछे फेंककर मालखंभ में लिपटता है और ऊपर चढ़ता उतरता है । कलैया ।

उलटी (२)
वि० स्त्री० [हिं० उलटा का स्त्री० रूप] १. विपरीत । विरुद्ध ।

उलटी (३)
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'उलटा' । उ०—सने की गाँठ भिगाने से उलटी कड़ी होती है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ३७९ ।

उलटी काँगसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटी+ देश० काँगसी] मालखंभ की एक कसरत जिसमें पंजा उलटकर उँगलियाँ फँसाई जाती हैं ।

उलटी खड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटी+ खड़ी] मालखंभ की एक कसरत जिसमें खड़े होकर दोनों पैरों को आगे से सिर पर उड़ाते हुए पीठ ले जाते है और फिर उसी जगह पर लाते हैं जहाँ सै पैर उड़ाते हैं ।

उलटी चीन
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटा+ चेन=चुनना] नैचा बाँधने का एक भेद जिसमें कपड़े की मुड़ी हुई पट्टी नर पर लपेटते हैं ।

उलटी बगला
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटी+बगली] मुगदल की एक कसरत जो बल अंदाजने के लिये की जाती है । इसमें पीठ पर से छाती पर मुगदल आता है तो भी मुट्ठी ऊपर ही रहती है ।

उलटी रुमाली
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटी+ फा० रुमाल] मुगदल भाँजने का एक भेद । विशेष—यह प्रकार की रुमाली है, भेद केवल यह है कि इसमें मुगदलों की झोंक आगे की होती है । रुमाली के समान इसमें भी मुगदल की मुठिया उलटी पकड़नी चाहिए ।

उलटी सरसों
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटी+ सरसों] वह सरसों जिसकी फलियों का मुँह नीचे होता है । यह जादू टोना, मंत्र तंत्र के काम आती है । टेरो ।

उलटी सवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलटी+ सवाई] वह जंजीर जिससे जहाज की अनी या नोक के नीचे सबदरा बँधा रहता है ।

उलटे
क्रि० वि० [हिं० उलटा] विरुद्ध क्रम से । और क्रम से । बेठिकाने । ठीक ठिकाने के साथ नहीं । उ०—करु विचार चलु सुपथ मग आदि मध्य परिनाम । उलटे जपे जरा मरा सूधे राजा राम ।—तुलसी (शब्द०) । २. विपरीत व्यवस्था- नुसार । विरुद्ध न्याय से । जैसे होना चाहिए उससे और ही ढंग से । जैसे,...(क) उलटे चोर कोतवाल को डाँटे । (ख) उसने उलटे अपने ही पक्ष की हानि की । विशेष—क्रियाविशेषण में भी 'उलटा' ही का प्रयोग अधिकतर होता है । 'अ' कारांत विशेषण के 'आ' को क्रि० वि० में 'ए' कर देने के भी नियम का पालन खड़ी बोली में कभी कभी नहीं होता पर पूर्वीया प्रांत की भाषाओं में बराबर होता है । जैसे,— 'अच्छा' का क्रि० वि० 'अच्छे' खड़ी बोली में नहीं होता पर पूर्वीया भाषा में बराबर होता है ।

उलट्टना पु
क्रि० आ० [हिं० उलटना] दे० 'उलटना' । उ०—मारू चाली मंदिराँ चदउ बादल माँहि । जाँणे गयँद उलट्टियउ कज्जल बन मँहि जाँहि ।...ढोला० दू०, ५३८ ।

उलठ पलठ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० उलट पलट] दे० 'उलट पलट' ।

उलठना पु
क्रि० अ० और स० [हिं० उलटना] दे० 'उलटाना' ।

उलठाना पु
क्रि० स० [हिं० उलटाना] दे० 'उलटाना' ।

उलथना (१) †पु
क्रि० अ० [हिं० उलटना] ऊपर नीचे होना । उथल पुथल होना । उलटना । उ०—उलथहिं सीप मोति उरतराहीं । चुगहिं हंस औ केलि कराही ।—जायसी ग्रं०, पृ० १२ ।

उलथना (२)पु †
क्रि० स० उपर नीचे करना । उलट पुलट करना । मथना । उलट फेर करना ।

उलथा
संज्ञा पुं० [हिं० उलटना] १. एक प्रकार का नृत्य । नाचने के समय ताल के अनुसार उछलना । क्रि० प्र०—मारना । २. कलाबाजी । कलैया । ३. गिरह मारकर कलाबाजी के साथ पानी में कूदना । उलटा । उड़ी । क्रि० प्र०—मारना ।—लेना । ४. एक स्थान पर बैठे बैठे इधर उधर अंग फेरना । करवट बदलना । क्रि० प्र०—मारना ।—लेना । जैसे,—भैंस पानी में पड़ी पड़ी उलथा मारा करती है । दे० 'लल्था' ।

उलथाना पु
क्रि० अ० [हिं० उलथना] दे० 'उलथना' । उ०— लहरें उठी समुँद उलथना । धुला पंथ सरग नियराना ।— जायसी (शब्द०) ।

उलद पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० अव+ द्रव (ण) अथवा हिं० उलदना] प्रस्रवण । झड़ी । वर्षण । उ०—देख्यो गुजरेठी ऐसे प्रात ही गली में जात स्वेद भरयो गात भात घन की उलद से ।—रघुराज (शब्द०) ।

उलदना (१)पु †
क्रि० स० [सं० अवद्रवण अथवा हिं० उलटना] १. उड़ेलना । उझिलना । ढालना । गिराना । बरसाना । उ०— (क) गाज्यो कापि गाज ज्यों विराज्यों ज्वाल जाल जुत, भाजे धीर बीर अकुलाइ उठ्यो रावनो । धावो धावो धरो सुनि धाए जातुधान धारि बारि धार उलदैं जलद ज्यों न सावनों ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) उलदत मद, अनुमद ज्यों जलधि जल, बल हद भीम कद काहू के न आह के ।—भूषण (शब्द०) । (ग) लै तुंबा सरजू जल आनी । उलदत मुँहरैं सब कोइ जानी । रघुराज (शब्द०) ।

उलदना (२)पु
क्रि० स० [प्रा० उल्लदिय=लादा हुआ या आक्रांत] लादना । ऊपर लादना । उ०—मन ही में लादै उलदै अनत न जाय । मनहिं की पैदा मनहिं में खाय ।—पलटू०, भा०३, पृ० ५४ ।

उलप
संज्ञा पुं० [सं०] १. कोमल घास का एक प्रकार या भेद । २. विस्तीर्ण लता [को०] ।

उलपराजि, उलपराजिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] घास की ढेरी [को०] ।

उलपराजी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उलपराजि' [को०] ।

उलपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उलप' [को०] ।

उलपी
संज्ञा पुं० [सं० उलपिन्] शिशुमार । सूँस [को०] ।

उलप्य (१)
वि० [सं०] वि० स्त्री० उलप्या घास संबंधी या उलप घास में रहनेवाला [को०] ।

उलप्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] रुद्र [को०] ।

उलफत
संज्ञा स्त्री० [अ० उल्फत] प्रेम । मुहब्बत । प्यार । प्रीति ।

उलमना पु †
क्रि० अ० [सं० अवलम्बन न० पा० प्रा० ओलम्बन= लटकना] लटकना । झुकना । उ०—अँगुरिन उचि भरु भीत दै उलमि चितै चख लोल । रुचि सों दुदूँ दुहून के चूमे चारु कपोल ।—बिहारी (शब्द०) ।

उलमा
संज्ञा पुं० [अ० आलिम का बहु० व०] आलिम लोग । विद्वज्जन । उ०—मजहब के मामले में उलमा के सिवा और किसी को दखल देने का मजाज नहीं है ।—काया०, पृ० ४७ ।

उलमाय पु
संज्ञा पुं० [अ० उलमा] दे० 'उलमा' । उ०—उलमाय फकीरान की तकरीर में देखो ।—कबीर मं०, पृ० ४६७ ।

उलरना (१)पु †
क्रि० अ० [सं० उद्+लर्व = डोलना, या उल्ललन, प्रा० उल्लर=ऊपर को चलना] १. कदमा । उछलना । उ०— बिनहिं लहे फल फल भूल सों उलरत हुलसत । मनहुँ पाइ रवि रतन तारिहैं सो निज कुल सत (शब्द०) । २. नीचे ऊपर होना । ३. झपटना । उ०—कह गिरिधर कविराय बाज पर उलरै धुधुकी । समय समय की बात बाज कहँ धिरवै फुदकी ।—गिरिधर (शब्द०) ।

उलरना †पु (२)
क्रि० अ० [प्रा० ओल्लरण] पड़ जाना । सो जाना । उ०—इक दिन पाँव पसारि उलरना, समुझि देखि निश्चै करि मरना ।—सुदंर ग्रं०, भा०१, पृ० ३३४ ।

उलरुआल
संज्ञा पुं० [हिं० उलरना] बैलगाड़ी के पीछे लटकती हुई एक लकड़ी जिससे गाड़ी उलार नहीं होती अर्थात् पीछे की ओर नहीं दवती ।

उललना पु
संज्ञा क्रि० अ० [हिं० उलड़लना] १. ढरकना । ढलना । २. उलटना । पलटना । इधर उधर होना ।

उलवा पु
संज्ञा पुं० [सं० उलूक, हिं,० उल्लू] दे० 'उल्लू' । उ०— उलवा मारै काग कौं काकु सु हनै उलूक । सुदंर बैरी परस्पर सज्जन हंस कहूँक ।—सुंदर ग्रं०, भा०२, पृ० ७४६ ।

उलवी
संज्ञा स्त्री० [सं० उद+ वी] एक प्रकार की मछली जिसके पर वा पाँख का व्यापार होता है । इसके पर से एक प्रकार की सरेस निकलती है ।

उलसना पु †
क्रि० अ० [सं० उल्लसन] शोभित होना । सोहना । उ०—छबि उलसी तुलसी की माल । बनि रही पदपर्जत विशाल ।—नंद० ग्रं०, पृ० २६७ ।

उलहना (१) †पु
क्रि० अ० [सं० उल्लसन] १. उथड़ना । निकलना । प्रस्फुटित होना । उ०—(क) दोष वसंत को दीजे कहा उलही न करीला की डारन पाती ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) उलटे महि अंकुर मंजु हरे । बगरी तहँ इंद्रबधू गन ये । (शब्द०) । २. उमड़ना । हुलसना । झूलना । उ०—(क) केलि भवन नव बेलि सी दुलही उलही कंत, बैठि रही चुप चंद लखि तुमहिं बुलावत कंत, उ०—पद्माकर (शब्द०) । (ख) काजर भीनी कामनिधि दीठ तिरीछी पाय भरयो । मंजरिन तिलक तरु मनहुँ रोम उलहाय ।—हरिशचंद्र (शब्द०) ।

उलहना (२)पु †
क्रि० स० [सं० उपलम्भ० प्रा,० उवालंभ, उवालेभ] दे० 'उलहना' ।

उलहना (१)
संज्ञा पुं० [सं० उल्लसन] उल्लासित करना । बढ़ाना । उ०— मनो कुलहा रघुवंस को चारु दुरयो जिय उहलता उलहावै ।—उत्तर०, पृ० १८ ।

उलहाना (२)पु
क्रि० अ० उल्लसित होना । उभड़ना । बढ़ना । उ०— दुष्ट सुभाव वियोग खिस्याने संग्रह कियो सहाई । सूखी लकरी बायु पाई कै चलौ अग्नि उलहाई ।—भारतें ग्रं०, भा०२, पृ० ५४२ ।

उलाँक
संज्ञा पुं० [हिं० लाँधना, सं० उत् √ लङ्घ प्रा० उल्लंघ] १. चिट्ठी पत्री आने जाने का प्रबंध । डाक । २. पटेला नाव ।

उलाँकपत्र †
संज्ञा पुं० [हिं० उलाक+ सं० पत्र] पोस्टकार्ड या चिट्ठी ।

उलाँकी
संज्ञा पुं० [हिं० उलाँक] डाक का हरकारा ।

उवलाँघना पु †
क्रि० स० [सं० उल्लंघन, प्रा० उल्लंघण] १. लाँघना । डाँकना । फाँदना । २. अवज्ञा करना । न मानना । विरुद्ध आचरण करना । ३. चाबुक सवारों की बोली में पहले घोड़े । पर चढ़ना ।

उला पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उरण या सं० उरभ्र प्रा० उरब्भ] भेड़ का बच्चा । मेनना ।—डिं० ।

उलाक
वि० [सं० उल्लंघन] चंपत । रफूचक्कर । उ०—नाक ह्वै निकाम जाको देखत उलात होत नाक सुख खोय गिरे नरक गटाक दे ।—राम० धर्म०, पृ० ८४ ।

उलाटना †
क्रि० स० [हिं० उलटना] दे० 'उलटना' ।

उलाथना पु
क्रि० अ० [हिं०] उलथना । हटना । दूर जाना । उल- टना । उतरना । उ०—आजुणँउ घन दीहणउ साहिब कउ मुख दिट्ठ, माथा भार उलाथ्थियउ आँख्याँ अभी पयट्ठ ।—ढोला०, दू० ५३१ ।

उलार
वि० [हिं० ओलरना = लेटना] जिसका पिछला हिस्सा भारी हो । जो पीछे की ओर झुका हो । जिसके पीछे की ओर बोझ अधिक हो । विशेष—इस शब्द का प्रयोग गाड़ी आदि के संबंध में होता है । जब गाड़ी में आगे की अपेक्षा पीछे अधिक बोझ हो जाता है तब वह पीछे की ओर झुक जाती हा और नहीं चलती । इसी को उलार कहते हैं ।

उलारना (१) †
क्रि० स० [हिं०, उलरना] उछालना । नीचे ऊपर फेंकना । उ०—दीन्हें शकुनी अक्ष उलारी । किंकर भए धरम- सुत हारी ।—सबल (शब्द०) ।

उलारना (२)
क्रि० स० [हिं० ओलरना] दे० 'ओलारना' ।

उलारा
संज्ञा पुं० [हिं० उलरना] वह पद चौताल के अंत में गाया जाता है ।

उलाह पु
संज्ञा पुं० [सं० उल्लास] उल्लास । उमंग । जोश । उत्साह । उ०—कैसो मिलाप लियौ इन मानि मिले मग आनि अनेक उलाहू ।—घनानंद०, पृ० ११८ ।

उलाहना (१)
संज्ञा पुं० [सं० उपालंभ, प्रा, उवालंभ, ओलंभ] १. किसी की भूल या अपराध को उइसे दुःखपूर्वक जताना । किसी से उसकी ऐसी भूल चूक के विषय में कहना सुनान जिससे कुछ दुःख पहुँचा हो । शिकायत । गिला । जैसे, —जो हम उनके यहाँ न उमरेंगै तो वे जब मिलेंगे तब उलाहना देंगें ।— क्रि० प्र०—देना । २. किसी के दोष या अपराध को उससे संबंध रखनेवाले किसी और आदमी से कहना । शिकायत । जैसे,—लड़के ने कोई नटखटी की है तभी ये लोग उसके बाप के पास उलाहना लेकर आए हैं । क्रि० प्र०—देना ।—लाना ।—लेकर आना ।

उलाहना (२)पु †
क्रि० स० [हिं० उलाहना] १. उलाहना देना । गिला करना । २. दोष देना । निंदा करना । उ०—मोंहि लगावत दोष कहा है । तें निज लोचन क्यों न उलाहै ।—प्रताप- नारायण (शब्द०) ।

उलिद
संज्ञा पुं० [सं० उलिन्द] १. शिव । एक देश [को०] ।

उलिंगण पु †
वि० [सं० अलग्न] दे० 'अलग' । बाहर गया हुआ । मुसाफिर । युद्ध पर गया हुआ । उ०—जिण सिरजई उलिगण धर नारि, जाइ डिहाड़उ झूरिताँ ।—बी० रासो, पृ० १ ।

उलिचना †पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उलीतना' ।

उलीचना
क्रि० स० [सं० अवनेजन, उल्लुंचन, पा० ओणेजन] १. पानी फेंकना । हाथ वा बरतन से पानी उछालकर दूसरी ओर डालना । जैसे,—नाव से पानी उलीचना । उ०— (क) पेंड़ काटि तैं पालव सींचा । मीन जियन हित वारि उलीचा ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) पानी बाढ़ो नाव में घर में बाढ़ो दाम, दोऊ करन उलीचिए यही सयानों काम ।— गिरिधर (शब्द०) । (ग) दै पिचकी भजी भीजी तहाँ परे पीछे गोपाल गुलाल उलीची ।—पद्माकर (शब्द०) ।

उलुंबा
संज्ञा स्त्री० [सं० उलुम्बा] हरी पकी बालवाले जौ या गेहूँ का भूना हुआ पौधा । उंबी । ऊमी ।

उलुप
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उलप' [को०] ।

उलुपी
संज्ञा पुं० [सं० उलुपिन्] दे० 'उलपी' [को०] ।

उलुप्य
वि० [सं०] दे० 'उलप्य' [को०] ।

उलू पु
संज्ञा पुं० [सं० उलूक] दे० 'उलूक' । उ०—हैरे गयो दुमाय जो कोई । उलू मिला जो सरबस खोई ।—हिंदी० प्रेमा०, पृ० २६६ । (ख) कर तोर पुरुष रैनि को राऊ । उलू न जान दिवस कर आऊ ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० १७७ ।

उलूक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उल्लू । २. इंद्र । ३. दुर्योधन का एक दूत । यह उलूक देश के राजा कितव का पुत्र था और और महा— भारत में कौरवों की ओर था । ४. उत्तर पर्वत का एक प्राचीन देश जिसका वर्णन महाभारत में आया है । ५. कणाद मुनि का एक नाम । यौ०—उलुकदर्शन = कणाद मुनि का वैशेषिक दर्शन ।

उलूक (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० उल्का] लूक । लौक । उ०—जोरि जो धरी है बेदरद द्वारे होरी तौन मेरी बिरहाग की उलूकनि लो लाय आव ।—पद्माकर (शब्द०) ।

उलूखल
संज्ञा पुं० [सं०] १. ओखली । २. खल । खरल । चट्टू । ३. गुग्गुल ।

उलूखलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. छोटी ओखली । २. गुग्गुल ।

उलूत
संज्ञा पुं० [सं०] अजगर की जाति का एक साँप ।

उलूप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उलप' [को०] ।

उलूपी
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऐरावतवंशी कौरव्य नाम की कन्या जिससे अर्जुन ने अपने १२ वर्ष के वनवास में विवाह किया था । इसी का पुत्र वभ्रु वाहन था । २. मछली । सूस (को०) । ३. दे० 'उलपी' [को०] ।

उलेखना †पु
क्रि० अ० [हिं० उल्लेख] पहचानना । जानना । उ०—कै बहुतै कै एक जहँ, एक वस्तु को देखि । बहु विधि करि उल्लेख हैं, सो उलेख उल्लेखि ।—भूषण ग्रं०, पृ० १४ ।

उलेटना †
क्रि० स० [हिं० उलटना] दे० 'उलटना' ।

उलेटा †
वि० [हिं० उलटा] दे० 'उलटा' ।

उलेड़ना पु †
क्रि० स० [हिं० उड़ेलना] ढरकाना । उड़ेलना । ढालाना । उ०—गारी होरी देत देवावत, ब्रज में फिरत गोपि— कन गावत । रुकि गए बाटन नारे पैड़े, नव केसर के माट उलै़डे । सूर (शब्द०) ।

उलेल (१)पु
संज्ञा [सं० उद्—लाल, प्रा० उल्लल] १. उमंग । जोश । तेजी । उछलकूद । उ०—(क) ठठके सब जड़ से भए मरि गई हिय की उलेल । प्राननाथ के बिनु रहे माटी के सी खेल ।— काष्ठजिह्वा (शब्द०) । (ख) क्यों याके ढिग भाव ताव भाषत उलेल को । सुकवि कहत यह हँसत आचमनकारि फुलेल को ।—व्यास (शब्द०) । २. बाढ़ ।

उलेल (२)पु
वि० [हिं०] बेपरवाह । अल्हड़ । अनजान ।

उलैड़ना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उलेड़ना ।

उल्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लूक । लुआठा । यौ०—उल्कामुख । उल्काजिह्वा । ३. मशाल । दस्ती । ३. दिया । चिराग । ४. एक प्रकार के चमकीले पिंड जो कभी कभी रात को आग की लकीर के समान आकाश में एक ओर से दूसरी ओर को वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए दिखाई पड़ते हैं । विशेष—इनके गिरने को 'तारा टूटना' या 'लूक टूटना' कहते हैं । उल्का के पिंड प्रायः किसी विशेष आकार के नहीं होते । कंकड़ या झाँवे की तरह ऊबड़खाबड़ होते हैं । इनका रंग प्रायः काला होता है और उनके ऊपर पालिश या लूक की तरह चमक होती है । ये दो प्रकार के होते हैं—एक धातुमय और दूसरे पाषाणमय । धातुमय पिंड़ों की परीक्षा करने से उनमें विशेष अंश लोहे का मिलता है, जिसमें निकल भी मिला रहता है । कभी कभी थोड़ा ताँबा और राँगा भी मिलता है । इनके अतिरिक्त सोना, चाँदी आदि बहुमूल्य धातुएँ कभी नहीं पाई जातीं । पाषाणमय पिंड यद्यपि चट्टान के समान होते हैं, तथापि उनमें भी प्रायः लोहे के बहुत महीन कण मिले रहते हैं । यद्यपि किसी किसी में उज्जन या उद्जन (हाइड्रोजन) और आक्सिजन के साथ मिला हुआ कारबन भी पाया जाता है जो सावयव द्रव्य (जैसे, जीव और वनस्पति) के नाश से उत्पन्न कारबन से कुछ मिलता है । पर ऐसे पिंड केवल पाँच या छह पाए गए हैं, जिनमें किसी प्रकार की वनस्पति की नसों का पता नहीं मिला है । धातुवाले उल्का कम गिरते देखे घए हैं । पत्थरवाले ही अधिक मिलते हैं । उल्कापिंड मे कोई ऐसा तत्व नहीं है जो इस पृथ्वी पर न पाया जाता हो । उनकी परीक्षा से यह बात जान पड़ती है कि वे जिस बड़े पिंड से टूटकर अलग हुए होंगे, उनपर न जीवों का अस्तित्व रहा होगा, न जल का नामानिशान रहा होगा । वे वास्तव में 'तेजसंभव' हैं । ये कुछ कुछ उन चट्टान या धातु के टुकड़ों से मिलतेजुलते हैं जो ज्वालामुखी पर्वतों के मुहँ से निकलते हैं । भेद इतना ही होता है कि ज्वालामुखी पर्वत से निकलते टुकड़ों में लोहे केअँश मोरचे के रूप में रहते हैं और उल्कापिड़ों मे धातु के रूप में । उल्का का वेग प्रति सेकेंड दस मील से लेकर चालीस पचास मील तक का होता है । साधारण उल्का छोटे छोटे पिंड हैं जो अनियत मार्ग पर आकाश में इधर उधर फिरा करते हैं । पर उल्काओं का एक बड़ा भारी समूह है जो सूर्य के चारों ओर केतुओं की कक्षा में घूमता है । पृथ्वी इस उल्का क्षेत्र मे से होकर प्रत्येक तैंतीसवें वर्ष कन्या राशी पर अर्थात् १४ नवंबर के लगभग निकलती है । इस समय उल्का की झड़ी देखी जाती है । उल्काखंड जब पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर आते हैं तब वायु की रगड़ से वे जलने लगते हैं और उनमें चमक आ जाती है । छोटे छोटे पिंड तो जलकर राख हो जाते हैं और घड़घड़ाहट का शब्द भी होता है । जब उल्का वायुमंडल के भीतर आते है और उनमें चमक उत्पन्न होती है तभी वे हमें दिखाई पड़ते हैं । उल्का पृथ्वी से अधिक से अधिक १०० मील के ऊपर अथवा कम से कम ४० मील के ऊपर से होकर जाते दिखाई पड़ते हैं । पृथ्वी के आकर्षण से ये नीचे गिरते हैं । गिरने पर इनके ऊपर का भाग गरम होता है । लंदन, पेरिस, बरलिन, वियना आदि स्थानों में उल्का के बहुत से पत्थर रखे हुए हैं । ६. फलित ज्योति में गौरी जातक के अनुसार मंगला आदि आठ दशाओं मे से एक । यह छह वर्षों तक रहती है ।

उल्काचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्पात । विघ्न । २. हलचल ।

उल्काचिह्ल
संज्ञा पुं० [सं०] एक राक्षस का नाम ।

उल्काधारी
संज्ञा पुं० [सं० उल्काधारिन्] मशालची । मशाल दिखाने वाला व्यक्ति [को०] ।

उल्कापात
संज्ञा पुं० [सं०] तारा टूटना । लूक गिरना । २. उत्पात । विघ्न बाधा ।

उल्कापाती
वि० [सं० उल्कापातिन्] [वि० स्त्री० उल्कापातिनी] दंगा मचानेवाला । हलचल करनेवाला । उत्पाती । विघ्नकारी ।

उल्कापाषाण
संज्ञा पुं० [सं०] पत्थर या धातु का वह ठोस पिंड जो उल्का के रूप में आकाशमार्ग से होता हुआ धरती पर आ गिरता है [को०] ।

उल्कामाली
संज्ञा पुं० [सं० उल्कामालिन्] भगवान शंकर के एक गण का नाम [को०] ।

उल्कामुख
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० उल्कामुखी] १. गीदड़ । २. एक प्रकार का प्रेत जिसके मुँह से प्रकाश या आग निकलती है । अगिया बैताल ।

उल्कुषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उल्का । लूक । २. मशाल [को०] ।

उल्था
संज्ञा पुं० [हिं० उलथना] भाषांतर । अनुवाद । तरजुमा । उ०—उसमें यह शंका न करना कि मैने किसी मत की निंदा के हेतु यह उल्था किया है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ५० ।

उल्ब
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह झिल्ली, जिसमें गर्भस्थ शिशु लिपटा रहता है । २. गर्भाशय । ३. गुफा । कंदरा [को०] ।

उल्बण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] नृत्य के समय की हाथों की एक मुद्रा । २. गर्भाशय । आँवल [को०] ।

उल्बण (२)
वि० १. प्रचुर । पुष्कल । अत्यधिक । २. दृढ़ । शक्तिमान । बलिष्ठ [को०] ।

उल्बण (३)
क्रि० वि० जोरों से । प्रबल रूप में [को०] ।

उल्ब्य (१)
पुं० संज्ञा [सं०] १. त्रिदोष । बात, पित्त और कफ में किसी एक का आधिक्य या दोष । २. विपत्ति [को०] ।

उल्ब्य (२)
वि० गर्भाशय में रहनेवाला [को०] ।

उल्मुक
संज्ञा पु० [सं०] १. अंगार । अँगार । २. लुआठ । उल्का । ३. एक यादव का काम । ४. महाभारत में आया हुई एक महारथी राजा ।

उल्लंघन
संज्ञा पुं० [सं० उल्लङ्घन] १. लाँघना । डाँकना । अतिक्रमण । २. विरुद्ध आचरण । न मानना । पालन न करना । जैसे,—बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन न करना चाहिए ।

उल्लंघन पु
क्रि० स० [सं० उल्लङ्घन] दे० 'उलँघना' ।

उल्लंघित
वि० [सं० उल्लङ्घित] १. लाँघा हुआ । तोड़ा हुआ । २. अतिक्रमण किया हुई [को०] ।

उल्लंफन
संज्ञा पुं० [सं० उल्लम्फन] कूदना । कुदान [को०] ।

उल्लंबित
वि० [सं० उल्लम्बित] खड़ा हुआ । उठा हुआ [को०] ।

उल्लक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की मदिरा [को०] ।

उल्लकसन
संज्ञा पुं० [सं०] रोमांच होना । रोएँ खड़े हो जाना [को०] ।

उल्लल
वि० [सं०] १. हिलता हुआ । काँपता हुआ । अस्थिर । २. रोएँदार । ३. अनेक रोगों से पीड़ित या ग्रस्त [को०] ।

उल्ललित
वि० [सं० उत्+ ललित] १. कंपित । क्षुब्ध किया हुआ । २. खड़ा किया हुआ । उठाया हुआ [को०] ।

उल्लस
वि० [सं० उत्+ लस] १. दमकता हुआ । चमकीला । २. प्रसन्न । हर्षित । बाहर होता हुआ । प्रकट होता हुआ [को०] ।

उल्लसन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उल्लसित, उल्लासी] १. हर्ष करना । खुशी करना । २. रोमांच ।

उल्लसित
वि० [सं०] १. प्रसन्न । हर्षित । २. चमकत हुआ । ३. बाहर निकाला हुआ (खंग) । ४. हिलता हुआ । आंदोलित । कंपित [को०] ।

उल्लाघ (१)
वि० [सं०] १. रोग से छुटकारा पाता हुआ । २. चतुर । कुशाग्रबुद्धि । कौशली । ३. पवित्र । ४. प्रसन्न । हर्षयुक्त । ५. दुष्ट । ६. काला [को०] ।

उल्लाघ (२)
संज्ञा पुं० काली मिर्च [को०] ।

उल्लाघता
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वस्थता । स्वास्थ्य [को०] ।

उल्लाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. काकूक्ति । २. आर्तनाद । कराहना । बिललाना । ३. दुष्टवाक्य । ४. संकेत । इशारा (को०) । ५. आवेग में स्वर का परिवर्तन (को०) ।

उल्लापक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० उल्लापिका] खुशामदी । ठकुरसुहाती करनेवाला ।

उल्लापन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उल्लापक] खुशामद । ठकुरसुहाती । उपचार । तोषामोद ।

उल्लापिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] ऊपरी स्तर । ऊपर की तह [को०] ।

उल्लापिक (२)
वि० १. खुशामद करनेवाला । २. बतानेवाला । प्रकट करनेवाला [को०] ।

उल्लापी
वि० [सं० उल्लापिन] उल्लाप करनेवाला । खुशामदी [को०] ।

उल्लाप्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपरूपक का एक भेद । यह एक अंक का होता है । २. सात प्रकार के गीतों में एक । जब सामगान में मन न लगे तब इसके पाठ का विधान है (मिताक्षरा) ।

उल्लाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक मात्रिक अर्धसम छंद जिसके पहले और चीसरे चरण में १५ मात्राएँ और दुसरे और चौथे चरण में १३ मात्राएँ होती हैं । जैसे—यह कवित कहा बिन रुचिर मति । मति सो कहा विनही बिरति । कह बिरतिउ लाल गोपाल के । चरननि होय जु प्रीति अति (शब्द०) ।

उल्लाला
संज्ञा पु० [सं० उल्लाल] एक मात्रिक छंद जिसके प्रत्येक चरण में १३ मात्राएँ होती है । इसे चंद्रमणि भी कहते हैं । जैसे, —सेवहु हरि सरसिज चरण, गुणगण गावहु प्रेमकर । पावहु मन में भक्ति को, और न इच्छा जानि यह (शब्द०) ।

उल्लास
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उल्लासक, उल्लासित] १. प्रकाश । चमक । झलक । २. हर्ष । मुख । आनंद । ३. ग्रंथ का एक भाग । पर्व । ४. एक अलंकार जिसमें एक के गुण या दोष से दूसरे में गुण या दोष दिखलाया जाता है इसके चार भेद हैं—(क) गुण से गुण होना । जैसे—न्हाय संत पवन करैं, गंग धरैं यह आश (शब्द०) । (ख) दोष से दोष होना । जैसे, —जरत निरखि परस्पर घसन सों, बाँस अनल उपजाय । जरत आप सकुटुंब अन, बन हू देत जराय (शब्द०) । (ग) गुण से दोष होना । जैसे—करन ताल मदवश करी, उड़वत अलि अबलीन । ते अलि विचरहिं सुमनवन, है करि शोभा- हीन (शब्द०) । (घ) दोष से गुण होना । जैसे,—सूँघ चुप अरु चाट झट, फेंक्यों बानर रत्न । चंचलता वश जिन बरयो जेहि फोरन को यत्न (शब्द०) । विशेष—कोई कोई (क) और (ख) को हेतु अलंकार या सम अलंकार और (ग) और (घ) को विचित्र या विषम अलंकार मानते हैं ।—उनके मत से यह अलंकारंतर है ।

उल्लासक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० उल्लासिका] आनंद करनेवाला । आनंदी । मौजी ।

उल्लासना पु
क्रि० स० [सं० उल्लासन] १. प्रकाशन करना । प्रकट करना । २. प्रसन्न करना । उ०—(क) प्रबल तेज तिहिं जगत जीव रक्षा उल्लासिय । —मतिराम ग्रं०, पृ० ४१३ । (ख) चंद्र उदय सागर उल्लासा । होहिं सकल तम केर विनासा ।—शंकर दिग्विजय (शब्द०) ।

उल्लासित
वि० [सं०] १. खुश । हर्षित । मुदित । प्रसन्न । २. उद्धत । २. स्फुरित ।

उल्लासी
वि० [सं० उल्लासिन्] [वि० स्त्री० उल्लासिनी] आनंदी । सुखी । मौजी ।

उल्लिंगित
वि० [सं० उल्लिङ्गित] प्रख्यात । मशहूर [को०] ।

उल्लिखित
वि० [सं०] १. खोदा हुआ । उत्कीर्ण । २. छीला हुआ । खरादा हुआ । ३. ऊपर लिखा हुआ । ४. खींचा हुआ । चित्रित । नकश किया हुआ । लिखित ।

उल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] संघ । गिरोह [को०] ।

उल्लोढ
वि० [सं०] १. रग़डकर साफ किया हुआ । खराद पर चढा़या हुआ । २ पालिश किया हुआ [को०] ।

उल्लुंचन
संज्ञा पुं० [सं० उल्लुञ्चन] १. उखाड़ना । २. काटना । ३. बाल नोचना या खींचना [को०] ।

उल्लुंठन
संज्ञा पुं० [सं०उल्लुण्ठन] १. कुढ़कना । २. आक्षेप । करना । व्यंग्य करना [को०] ।

उल्लुंठा
संज्ञा स्त्री० [सं० उल्लुण्ठा] १. लुढ़कन । २. आक्षेप । काकूक्ति । व्यंग्य [को०] ।

उल्लुंठित
वि० [सं० उल्लुण्ठित] रगडा हुआ । घर्षित [को०] ।

उल्लू
संज्ञा पुं० [सं०उलूक] १. दिन में न देखनेवाला एक पक्षी । कुचकुचवा । कुम्हार का डिंगरा । खूसट । विशेष—यह प्रायः भूरे रंग का होता है । इसका सिर बिल्ली की तरह गोल और आँखें भी उसी की तरह बडी़ और चमकीली होती हैं । संसार में इसकी सैकडों जातियाँ हैं, पर प्रायः सब की आँखों के किनारे पर भौंरी के समान चारों और ऊपर को फिरे होते हैं । किसी किसी जाति के उल्लू के सिर पर चो़टी होती है और किसी किसी के पैर में अँगुलियों तक पर होते हैं । ५ इंच से लेकर २ फुट तक ऊँचे उल्लू संसार में होते हैं । उल्लू की चोंच कँटिए की तरह टेढी और नुकीली होती है । किसी किसी जाति के कान के पास के पर ऊपर को उठे होते हैं । सब उल्लुओं के पर नरम और पंजे दृढ़ होते हैं । ये दिन को छिपे रहते हैं और सूर्यास्त होते है उड़ते हैं और छोटे बडे़ जानवरों और कीडे़ मकोडों को पकड़कर अपना पेट भरते हैं । इसकी बोली भायवनी होती है और यह प्रायः ऊजड़ स्थानों में रहता है । लोग इसकी बोली बुरा समझते हैं और इसका घर में या गाँव में रहना अच्छा नहीं मानते । तांत्रिक लोग इसके मांस का प्रयोग उच्चाटन आदि प्रयोगों में करत हैं । प्रायः सभी देश और जातिवाले इसे अभक्ष्य मानते हैं । मुहा०—उल्लू का गोश्त खिलाना= बेवकूफ बनाना । मूर्ख, बनाना । विशेष—लोगों की धारण है कि उल्लू का मांस खाने से लगो मूर्ख हो जाते या गूँगे बहरे हो जाते हैं । उल्लू बनाना= किसी को बेवकूफ साबित करना । उ०— हम तुम मिल जाय तो पौ बारह है । इनको मिल के उल्लू बनाओ ।— फिसाना०, पृ० १६५ । उल्लू बोलना= उजाड़ होना । उजड़ जाना । उ०— किसी समय यहाँ उल्लू बोलेंगे (शब्द०) । २. निर्बुद्धि । बेवकूफ । मूर्ख । क्रि० प्र०—करना ।— बनना ।—बनाना । —होना ।

उल्लेख
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० उल्लेखक, उल्लेखनीय, उल्लेखित, उल्लेख्य] १. लिखना । लेख । २. वर्णन । चर्चा । जिक्र । जैसे,—इस बात का उल्लेख ऊपर हो चुका है ।क्रि० प्र०—करना । होना । ३. एक काव्यालंकार जिसमें एक ही वस्तु का अनेक रूपों में दिखाई पड़ना वर्णन किया जाय । विशेष—इसके दो भेद हैं, प्रथम और द्वितीय । प्रथम— जहाँ अनेक जन एक ही वस्तु को अनेक रूपों में देखें वहाँ प्रथम भेद हैं, जैसे,— वारन तारन वृद्ध तिय, श्रीपति जुवतिन झूमि । दर्शनीय बाला जनन लखे कृष्ण रंगभूमि (शब्द०) । अथवा जानत सौति अनीति है, जानत सखी सुनिती । गुरुजन जानत लाल है, प्रीतम जानत प्रीति (शब्द०) । पहले उदाहरण में एक ही कृष्ण को वृद्धा स्त्रियों ने हाथी का उद्धार करनेवाला और युवतियों ने लक्ष्मी के साथ रमण करनेवाला देखा और दूसरे उदाहरण में एक ही नायिका को सौत ने अनीति रूप में और गुरुजनों ने लज्जा रूप में देखा । पहला उदाहरण शुद्ध उल्लेख का है क्योंकि उसमें और अलंकार का आभास नहीं है, पर दूसरा उदाहरण संकीर्ण उल्लेख का है क्योंकि एक ही नायिका में सुनीति और लज्जा आदि कई अन्य वस्तुओं का आरोप होने के कारण उसमें रूपक अलंकार भी मिल जाता है । द्वितीय— जहाँ एक ही वस्तु को एक ही व्यक्ति कई रूपों में देखें वहाँ द्वितीय भेद होता है । जैसे,— कंजन अमलता, में, खंजन चपलता में, छलता में मीन, कलता में बडे़ ऐन के ।— यामें झूठी है न प्यारे ही में आह लागिबे में प्यारी जू के नैन ऐन तीखे बान मैन के (शब्द०) ।

उल्लेखन
संज्ञा पुं० [सं०] १. लिखना । उल्लेख करना । २. चित्रकारी करना । ३. रेखाएँ खींचना । ४. रगड़ना । खरोंचना । ५. वमन करना । ६. गाड़ना ७. खडा़ करना । ऊपर उठाना [को०] ।

उल्लेखनीय
वि० [सं०] लिखने योग्य । उल्लेख योग्य ।

उल्लेखी
वि० [सं० उल्लेखिन्] १. विदीर्ण करनेवाला । फाड़ने— वाला । २. वेग से चलनेवाला ।

उल्लेख्य
वि० [सं० ] १. उल्लेख करने योग्य । लिखने योग्य । २. कहने योग्य । कथनीय । बताने योग्य[को०] ।

उल्लोच
संज्ञा पुं० [सं०] १. वितान । चंद्रातप । चँदोवा । २. आच्छादन । व्यवधान [को०] ।

उल्लोल (१)
वि० [सं०] जोरों से हिलता या काँपता हुआ । अतिशय चंचल [को०] ।

उल्लोल (२)
संज्ञा पुं० ऊँची लहर । कल्लोल । हिलोरा । हिल्लोल [को०] ।

उल्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. झिल्ली जिसमें बच्चा बँधा हुआ पैदा होता है । आँवला । अँवरी । २. गर्भाशय ।

उल्वण (१)
वि० [सं०] अदभूत । विलक्षण । उ०— उल्वण, दारुण, घोर अरु उत्कट, उग्र, कराल ।— नंद० ग्रं० पृ०,१११ ।

उल्वण (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आँवल । वह हल्की झिल्ली, जो बच्चे को, जब वह माँ के गर्भ में रहता है, चारो और से घेरे रहती है । उल्व । अँवरी २. वशिष्ठ के एक पुत्र का नाम ।

उल्हना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उलहना' । उ०— नंददास ज्यों स्याम तमालहि, कनकलता उल्हए । — नंद० ग्रं०, पृ० ३४८ ।

उल्हवण पु
वि० [सं० उत्+लस] उल्लसित करनेवाला । उ०— चंदन देह कपूर रस सीतल गंगं प्रवाह, मनरंजन तन उल्हवण कदे मिलेसी नाह । — ढोला०, दू० १६१ ।

उल्हास पु
संज्ञा पुं० [सं० उल्लास] उल्लास । आनंद । उ०— सद्गगुरु बहुत भाँति समझायौ भक्ति सहित यह ज्ञान उल्हास ।— सुंदर ग्रं०, भा०१, पृ० १५७ ।

उवठान पु
संज्ञा पुं० [सं० उपस्थान, प्रा० उवट्ठाण] बैठने का कार्य या स्थिति । एक स्थान में विशेष रूप से स्थित रहना । उ०— इंद्रावति मन मों बसी, की मन सो उवठान । है तैसो वह की नहीं, जैसो कहेउँ बखान ।— इंद्रा०, पृ० ६९ ।

उवना (१)पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'उअना', 'उगना' । उ०—गढ़ गाँजर तै कूच कर, बीचहि सिवर कराय । दिनकर उवत सो चलिवा, सायागढ़ कहँ आय । —प० रा०, पृ० १४६ ।

उवना (२)पु
क्रि० अ० [सं० उदय, प्रा० उभ्रअ] दे० 'ऊभना' । उ०— पियहि निरखि ब्रजबाल उवीं सब एकहि काला । ज्यों प्रानन्हि कै आए उझकहि इंद्रिय जाला । नंद ग्रां० पृ० ४५ ।

उवनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० उवना] उदय । प्रकाश । उ०— चंद से बदन भानु भई वृषभानु जाई उवनि लुनाई की लवनि की सी लहरी ।— दव (शब्द०) ।

उवानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० अवानी] आगमन । उ०— जबई सरद उवानी जानी । कुँवरि सहचरी तन मुसुकानी ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३४ ।

उवारा
संज्ञा पुं० [हिं० उबारना] रक्षा । हिफाजत । देखभाल । उ०—इन कहीं सौंप दीन्ह जिव भारा । सब जीवन कौ करै उवारा । — कबीर सा० पृ०९९६ ।

उवारी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कर । महसूल । मालगुजारी । उ०— बारमल में निकट का सारा इलाका 'दासपल्ला' कहलाता था जो एक धनिक जमींदार के अधीन था । यह जमींदार मराठों को कोई उवारी नहीं देता था । — शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ०११६ ।

उशत्
वि० [सं०] १. सुंदर । नेत्ररंजन । २. प्रिय । मनचाहा । ३. पवित्र । निर्मल । निष्पाप । ४. अपवित्र । अश्लील [को०] ।

उशती (१)
वि० स्त्री० [सं०] दे० 'उशत्' ।

उशती (२)
संज्ञा स्त्री० १. कडवी बात । ऐसी उक्ति जिससे श्रोता के मन को चोट पहुँचे । अशुभ कथन [को०] ।

उशना
संज्ञा पुं० [सं० उशनस्] शुक्राचार्य का एक नाम ।

उशबा
संज्ञा पुं० [अ०] एक पेड़ जिसकी जड़ रक्तशोधक है । हकीम लोग इसका व्यवहार करते हैं ।

उशाना
संज्ञा स्त्री० [वै० सं०] १. इच्छा । अभिलाषा । चाहना । २. सोमलता जिससे सोमरस निकला जाता है । ३. रुद्र की एक पत्नी का नाम [को०] ।

उशिज
संज्ञा पुं० [सं०] कक्षीवान् के पिता का नाम [को०] ।

उशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] इच्छा । कामना । ख्वाहिश [को०] ।

उशीनर
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन भारत के अंतर्गत एक राज्यका नाम । गांधार देश या मध्यदेश । उशीनर देश का निवासी (को०) ।

उशीनरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] उशीनर देश की रानी । उशीनरवासियों की शासिका [को०] ।

उशीर
संज्ञा पुं० [सं०] खस । गाँडर या कतरे की जड़ । यौ०—उशीर बीज= हिमालय का एक खंड ।

उशीरक
संज्ञा पुं० [सं०] उशीर । खस ।

उशीरिक
वि० [सं०] खस बेचनेवाला । उशीर का व्यापारी [को०] ।

उशीरी (१)
संज्ञा स्त्री०[सं०] छोटे प्रकार की घास [को०] ।

उशीरी (२)
वि० उशीर रखनेवाला [को०] ।

उश्न पु
वि०[सं० उष्ण] गरम । तापमय । जलता हुआ । उ०— उश्न शीत नाँही तहि घामा । सूर्ज जपत नहीं तहिं कामा ।— प्राण०, पृ० २६८ ।

उश्वास पु
संज्ञा पुं० [सं० उच्छवास] दे० 'उच्छवास' । उ०—श्वास उश्वासा सुमिरले दादू नाम कबीर ।— कबीर मं०, पृ० ४१३ ।

उश्शाक
संज्ञा पुं० [अ० उश्शाक; आशिक का बहुत०] प्रेमी लोग । प्रेम करनेवाले । उ०— फौज उश्शाक देख हर जानिब । नाजनी साहब दिमाग हुआ । — कविता गौ०, भा० ४, पृ०६ ।

उष
संज्ञा पुं० [सं०] १. पांशुज लवण । खारी मिट्टी से निकाला हुआ नमक । २. गुग्गुल । ३. रात्रिशेष, । प्रभात । सबेरा । दिन । ४. कामी पुरुष । ५. खारी मिट्टी [को०] ।

उषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. काली मिर्च । मरीच । २. पिप्पलीमूल । पीपर [को०] ।

उषणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पीपर । पिप्पलीमूल । २. सोंठ । शुंठ [को०] ।

उषती
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उशती' [को०] ।

उषना
क्रि० अ० [सं० उष='गरम होना'] तपना । उ०— ते उस्वास अगिनि की उषी । कुँवरि क देवी ज्वालामुखी ।— नंद० ग्रं०, पृ० १३४ ।

उषप
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. अग्नि । ३. चित्रक [को०] ।

उषर्बुध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्नि । २. चीते का पेड़ । ३. चीता (को०) । ४. बच्चा । शिशु (को०) ।

उषर्बुध (२)
वि० प्रातःकाल जागनेवाला । उषा वेला में निद्रा त्याग कर उठ जानेवाला (को०) ।

उषस्
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'उषा' ।

उषसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिनांत । संध्या । द्वाभा [को०] ।

उषसुत
संज्ञा पुं० [सं०] पांशुज लवण । नोनी मिट्टी से निकाला हुआ नमक ।

उषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रभात । वह समय जब दो घंटे रात रह जाय । व्राह्म वेला । २. अरुणोदय की लाली । ३. बाणासुर की कन्या जो अनिरुद्ध को ब्याही गई थी । यौ०—उषाकाल । उषापति ।

उषाकल
संज्ञा पुं० [सं०] मुर्गा । कुक्कुट [को०] ।

उषाकाल
संज्ञा पुं० [सं०] भोर । प्रभात । तड़का ।

उषापति
संज्ञा पुं० [सं०] अनिरुद्ध ।

उषारमण
संज्ञा पुं० [सं०] अनिरुद्ध [को०] ।

उषित (१)
वि० [सं० ] १. जला हुआ या दग्ध । २. बसा हुआ । आबाद । ३. जो ताजा या टटका न हो । बासी । ४. फुर्तीला तेज [को०] ।

उषित (२)
संज्ञा पुं० बस्ती या आबादी [को०] ।

उषीर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उशीर' [को०] ।

उषीरक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उशीर' [को०] ।

उषीरक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उशीर' [को०] ।

उषीरक (३)
वि० [सं०] उशीरविक्रेता । खस बेचनेवाला [को०] ।

उषेश
संज्ञा पुं० [सं०] अनिरुद्ध [को०] ।

उष्टर पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्ट्र] दे० 'उष्ट्र' । उ०— सूकर श्वान सियाल रासभा उष्टर जानो । हरि बेमुख मति अंध काल भख उनही मानो । — राम० धर्म०, पृ० २४५ ।

उष्ट्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऊँट । क्रमेलक । २. रथ । ३. डिल्ल या ककुदवाला साँड़ । ४. महिष । भैंसा । ४. बैलगाडी़ [को०] ।

उष्ट्रकांडी
संज्ञा स्त्री० [सं० उष्ट्रकाण्डी] १. उटाँटी नाम का पौधा । २. रक्तपुष्पी [को०] ।

उष्ट्रगीव
संज्ञा पुं० [सं०] अर्श नामक रोग । बवासीर का मर्ज ।

उष्ट्रपादिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] मदनमाली नामक पुष्प या लता [को०] ।

उष्ट्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० ] १. ऊँटनी । २. शराब रखने का एक बर्तन [को०] ।

उष्ट्री
संज्ञा स्त्री० [सं० ] ऊँटनी । मादा ऊँट [को०] ।

उष्ण (१)
वि० [सं०] १. तप्त । गरम । २. तासीर में गरम । उ०— यह औषध उष्ण है । ३. सरगरम । फुर्तीला । तेज । आलस्यरहित ।

उष्ण (२)
संज्ञा पुं० १. ग्रीष्म ऋतु । २. प्याज । ३. एक नरक का नाम ।

उष्णक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ग्रीष्म काल । २. ज्वर । बुखार ।

उष्णक (२)
वि० १. गरम । तप्त । २. ज्वर युक्त । ३. तेज । फुरतीला ।

उष्णकिटिबंध
संज्ञा पुं० [सं० उष्ण कटिबन्ध] पृथ्वी का वह भाग जो कर्क और मकर रेखाओं के बीच में पड़ता है । इसकी चौडा़ई ४७ अंश है अर्थात् भूकम्प रेखा से २३ १/२ अंश उत्तर और २३ १/२ अंश दक्षिण । पृथ्वी के इस भाग में गरमी बहुत पड़ती है ।

उष्णकर
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

उष्णघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] छाता । छतरी । आतपत्र ।

उष्णता
संज्ञा स्त्री० [सं०] गरमी । ताप ।

उष्णत्व
संज्ञा पुं० [सं०] गरमी ।

उष्णनदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैतरणी नामक नदी [को०] ।

उष्णवारण
संज्ञा पुं० [सं०] छत्र । छाता । छतरी [को०] ।

उष्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गरमी [को०] ।

उष्णालु
वि० [सं०] १. ताप से पीडि़त । गरमी खाया हुआ । २. गरमी सहन न कर सकनेवाला [को०] ।

उष्णासह
संज्ञा पुं० [सं०] जाडा़ । जाडे़ की ऋतु [को०] ।

उष्णिक
संज्ञा पुं० [सं० उष्णिह] एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में सात अक्षर होते हैं । यह बैदिक छंद है । प्रस्तार से इसके १२८ भेद होते हैं ।

उष्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. माँड़ जो भात के पक जाने पर उससे गाढे़ पानी के रूप में निकाला जाता है । २. लप्सी । उ०— मध्यम वर्ग यवागू (४ ।२ ।१३६ लप्सी) भी खाता था । इसी का दूसरा नाम उष्णिका (५ ।२ ।७१) था । — संबूर्णा० अभि० ग्रं०, पृ० २४९ ।

उष्णिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० उष्मिमन्] गरमी । उष्णता [को०] ।

उष्णीष
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पगडी़ । साफा । २. मुकुट । ताज । ३. महल का गुंबद । प्रासादशिखर [को०] ।

उष्णीषी (१)
वि० [सं० उष्णीसिन्] उष्णीष या मुकुट धारण करनेवाला [को०] ।

उष्णीषी (२)
संज्ञा पुं० १ शिव का नाम । २. एक चक्राकार भवन [को०] ।

उष्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. गर्मी । ताप । २. धूप । ३. गरमी की ऋतु । वसंत (को०) । ५. क्रोध (को०) ।

उष्मक
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रीष्म ऋतु । गरमी का मौसम [को०] ।

उष्मज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] छोटे छोटे कीडे़ जो पमीने, मैल और सडी़ गली चीजों से पैदा हो जाते हैं । जैसे,— खटमल, मच्छर, किलनी, जूँ, चीलर इत्यादि ।

उष्मज (२)
वि० ग्रमी या पसीने के कारण उत्पन्न होनेवाले [को०] ।

उष्मप
संज्ञा पुं, [सं०] १. भृगु के पुत्र का नाम । २. पितृदेव । श्राद्ध ग्रहण करनेवाला । पितृपितामहादि [को०] ।

उष्मस्वेद
संज्ञा पुं० [सं०] वाष्पस्नान । गरम किए हुए जल में स्नान [को०] ।

उष्मा
संज्ञा स्त्री० [सं० उष्मन्] १. गर्मी । ग्रीष्म ऋतु । २. धूप । ३. रिस । क्रोध । ४. उष्म वर्ण श् ष् स्, ह अक्षर [को०] ।

उष्मागम
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रीष्म ऋतु [को०] ।

उष्मान्वित
वि० [सं०] क्रुद्ध । क्रोध में भरा हुआ [को०] ।

उस
सर्व० उभ० [सं० अमुष्य> प्रा० अमुस्स, अउँस्स अथवा सं० * अवस्य] यह शब्द 'वह' शब्द का वह रूप है जो विभक्ति लगने पर बनता है; जैसे, उसने, उसको, उससे, इसमें इत्यादि ।

उसकन
संज्ञा पुं० [सं० उत्कर्षण= खींचना, रगड़ना अथवा देशी (वै० रू० उकसन)] घास पात या पयाल का वह पोटा जिसमें बालू आदि लगाकर बरतन माँजते हैं । उबसन ।

उसकना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'उकसना' ।

उसकाना पु
क्रि० स० [ हिं०] दे० 'उकसाना' ।

उसकारना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'उकसाना' । उ०— टेढी़ पाग बाँधि बार बार ही मुरेरै मूँछ बाँह उसकारै अति धरत गुमांन है । — सुंदर०, ग्रं०, भा० २, पृ० ४२२ ।

उसन पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्ण] उष्ण । गरम । उ०— सीतर हुत सो गा तुम्ह संगा, रहो उसन मम दाहत अंगा । —चित्रा० पृ०१६७ ।

उसनना
क्रि० स० [सं० उष्ण] १. उबालना । पानी के साथ आग पर चढा़कर गरम करना । २. पकाना ।

उसनाना
क्रि० स० [हिं० उसनना का प्रेरणा०] उबलवाना । पकवाना ।

उसनीस पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्णीष] दे० 'उष्णीष' ।

उसनोदक पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्णोदक] दे० 'उष्णोदक' । उ०— अष्टगंध उसनोदर सों असनान कराए । — नंद० ग्रं०, पृ० २०४ ।

उसमा †
संज्ञा पुं० [अ० वसमह्] उबटन । बटना ।

उसमान
संज्ञा पुं० [अ०] मुहम्मद के चार सखाओं में से एक ।

उसरना (१)
क्रि० अ० [सं० उत्+ सरण (जाना), प्रा० उस्सर] १. हटना । टलना । दूर होना । स्थानांतरित होना । उ०— (क) कर उठाय घूँघु़ट करत उसरत पट गुझगौट । सुख मोटै लूटी ललन लखि ललना की लोट ।— बिहरी (शब्द०) । (ख) उसरि बैठि कुकि कागरे जो बलबीर मिलाय । तौ कंचन के कागरे पालूँ छीर पिलाय ।— स० सप्तक०, पृ० २५४ । (ग) उनका गुण और फल नित्य के कामों में ऐसे अधिक विस्तार से पाया जाता है कि जिसका ध्यान से उतरना असंभव का है ।— गोल विनोद (शब्द०) । २. बीतना । गुजरना । उ०— सधन कुंज ते उठे भोर ही श्यामा श्याम खरे । जलद नबीन मिली मनो दामिनि बरषि निशा उसरे । —सूर (शब्द०) ।

उसरना (२)
क्रि० स० [सं० विस्मरण] विस्मृत होना । भूलना । याद न रहना ।

उसर्बुध पु
संज्ञा पुं० [सं० उषर्बुध] दे० 'उषर्बुध' । उ०— पावक, वह्यिन दहन, ज्वलन, शिखी, धनंजय, होइ । सक, उसर्बुध, वायुसख वीर्तहोत्र पुनि सोई ।— नंद० ग्रं०, पृ० ९४ ।

उसरौडी़
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. एक चिडि़या । २. ऊसर से उगने वाली एक प्रकार की घास जो सूख जानेपर कडी़ हो जाती है और पैरों में चुभती है ।

उसलना पु
क्रि० अ० [सं० उत्+सरण, प्रा० उस्सर] १. दे० 'उसरना (१)' । उ०— ऐल फैल मैल खलक में गैल गैल गजन की ठेल पेल सैल उसलत है । तारा सो तरनि धूरि धारा में लगत जिमि थारा पर पारा परावार यों हलत है०— भूषण ग्रं० पृ० ८८ । २. तरना । उतरना । पानी के भीतर से ऊपर आना । उ०— टिग बूडा़ उसला नहीं, यही अँदेशा मोहिं । सलिल मोह की धार में, क्या निंद आई तोहि । —कबीर (शब्द०) ।

उसवास पु
संज्ञा पुं० [सं० उच्छवास, प्रा० उस्सास= ऊँची साँस] १. उद्वेग । आवेश । चित्त की चंचलता । उ०— जन जीवन उसवास मिटिगा, दरस सतगुरु पायो ।— जग० बानी, पृ० ४५ । २. दुःख । उ०— कर उसवास मनै में देखे यह सुगंध धौं कहां बसाना । — कबीर (शब्द०) ।

उससना पु
क्रि० स० [सं० उत्+सरण] १. खिसकना । टलना । स्थानांतरित होना । उ०— (क) गोरे गात उससत जो अमित पट और प्रगट पहिचानै । नैन निकट ताटंक की शोभा मंडल कबिन बखानै ।— सूर० (शब्द०) । (ख) वैसिये सु हिलि मिलि, वैसी पिय संग, अंग मिलत न कैहूँ मिस, पीछेउससति जाति ।— रसकुसुमाकर (शब्द०) । २. साँस लेना । दम लेना । उ०— एक उसास ही के उससे सिगरेई सुगंध बिदा कर दीन्हे । —केशव (शब्द०) । तैयारी करना । बनाना । उ०—कूप उसास्यो कुंभ मैं पानी भरयौ अटूट । सुंदर तृषा सबै गई धाए चारयो षूट । — सुंदर० ग्रं०, भा२, पृ० ७६० ।

उसाँस पु
संज्ञा पुं० [सं० उछ्वास, पु उसाँस]दे० 'उसास' ।

उसाना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'ओसाना' ।

उसारना पु
क्रि० स० [सं० उद्+सरण (जाना)] १. उखाड़ना । हटाना । टालना । उ०— (क) बिहँसि रूप वसुदेव निहारै । कोटि जामिनी तिमिर उसारै ।— लाल (शब्द०) । (ख) रछी कपि झुंडन के मुंडन उतारों कहो कोटले उसारों पै न हारौं रहौं टेक ही ।— हनुमान (शब्द०) । २. मकान अथवा दीवार आदि खडी़ करना ।

उसारा पु
संज्ञा पुं० [सं० उपशालाअव] दे० 'ओसारा' ।

उसरि
संज्ञा स्त्री० [सं० उपशालाअव, प्रा० ओसार] दे० 'ओसारा' । उ०— कहा चुनावै अडि़याँ, लंबा भीति उतारि । घर तो साढे़ तीन हाथ, घना तो पौने चार ।— कबीर सा०, पृ० १५ ।

उसालना पु
क्रि० स० [स० उत्+सारण] १. उखाडना । २. हटाना । टलना । ३. भगाना । उ०— अपने बरणधर्म प्रति पालों । साहन के दल दौरि उसालों ।—लाल (शब्द०) ।

उसास
संज्ञा स्त्री० [हिं० उ+सास (सं० श्वांस)] १. लंबी साँस । ऊपर को चढती हुई साँस । उ०— (क) विथुरयो जावक सौति वग, निरखि हँसी गही गाँस । सलज हँसौंही लखि लियो, आधी हँसी उसास ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) अजब जोगिनी सी सबै, झुकी परत चहुँ पास । करिहैं काय प्रवेश जनु, सब मिलि ऐंचि उसास । — (शब्द०) । २. साँस । श्वास । उ०— पल न चलैं जकि सी रही, थकि सी रही उसास । अब ही तन रितयों कहा, मन पठयो केहि पास ।—बिहारी (शब्द०) । क्रि० प्र०— छोडना ।—भरना ।—लेना । ३. दुःखसूचक या शोकसूचक श्वास । ठंढी साँस ।

उसासी
संज्ञा स्त्री० [हिं० उसास] दम लेने की फुरसत । अवकाश । छुट्टी । उ०— केहू नहिं गिरिराजहीं धारा । हमरै सुत भारू कह ठहरा । लेहु लेहु अब ते कोइ लेहू । लालाहि नेकु उसासी देहू । — विश्राम (शब्द०) ।

उसिनना †
क्रि० स० [सं० उष्ण] दे० 'उसनना' ।

उसिर पु
संज्ञा पुं० [सं० उशीर] दे० 'उशीर' । — उसिर, गुलाब नीर, करपूर परसत, बिरह अनल ज्वाल जालन जगतु है ।— मति० ग्रं०, पृ० २९५ ।

उसीर पु
संज्ञा पुं० [सं० उशीर] दे० 'उशीर' । उ०— (क) हे प्रियंबदा तू किसके लिये उसीर का लेप और नालसहित कमल पत्ते लिए जाती है ।— शकुंतला, पृ० ४३ । (ख) चंदन लेप, उसीर रस उलटो जारत गात । — भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३८७ ।

उसीला पु
संज्ञा पुं० [अ० वसीलह] दे० 'वसीला' ।

उसीस पु
संज्ञा पुं० [सं० उत्शीर्षक] तकिया । उपधान [को०] ।

उसीसा पु
संज्ञा पुं० [सं० उत्+शीर्ष+क] १. सिरहाना । २. तकिया ।

उसीसी
संज्ञा स्त्री० [सं० उत्शीर्षक, प्रा० उस्सीसक, प्रा० उस्सीस= 'तकिया'] तकिया । उ०— उतनी कहत कुँवरि उयबानी । सहचरि दौरि उसीसी आनी ।— नंद० ग्रं०, पृ० १४१ ।

उसीसो
संज्ञा पुं० [सं० उद्+शीर्ष] तकिया । उ०— उपबर्हन, उपधान पुनि कंदुक सोई छीन । मृदुल उसीसो उठँगि कै, बैठी तिय रिस नीय । — नंद० ग्रं०, पृ० ८१ ।

उसूल
संज्ञा पुं० [अ०] १. सिद्धांत । उ०— सब बातें काम के पीछे अच्छी लगती हैं जो सब तरह का प्रबंध बँध रहा हो, काम के उसूलों पर दृष्टि हो, भले बुरे काम और भले बुरे आदमियों की पहचान हो, तो अपना काम किए पीछे घडी़ की दिल्लगी में कुछ बिगाड़ नहीं है ।— श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १०९ । २. दे० 'वसूल' ।

उसूली (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० वसूली] उगाहना । मालगुजारी या अन्य कर अथवा ऋण दिया हुआ धन वसूल करना ।

उसूली (२)
वि० सिद्धांतवादी । वसूल का पक्का ।

उसेना पु
क्रि० स० [सं० उष्ण] उबालना । उसनना । पकाना ।

उसेय
संज्ञा पुं० [देश०] खसिया और जयंतिया की पहाडि़यों पर होनेवाला एक प्रकार का बाँस जिसकी ऊँचाई ५०-६० फुट, घेरा ५-६ इंच और दल की मोटाई एक इंच से कुछ कम होती है, इससे दूध या पानी रखने के चोंगे बनाते हैं ।

उस्तति पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० उ(आदिस्वरागम)+सं० स्तुति] प्रार्थना । विनय । स्तुति । उ०— मेरी यह इच्छा है जो सतिगुरु जी की उस्तति सुणाईए जी । —प्राण०, पृ० २२० ।

उस्तरा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे०. 'उस्तुरा' ।

उस्तवार
वि० [फा़०] दृढ़ । पक्का । उ०— खुदा सूँ जो कोई निपट है, उस्तबार । सो उन पर खुदा धरता है प्यार ।— दक्खिनी०, पृ० २९२ ।

उस्ताद (१)
संज्ञा पुं० [फा०] [स्त्री० उस्तानी] गुरु । शिक्षक । अध्यापक । मास्टर ।

उस्ताद (२)
वि० १. चालाक । छली धूर्त । गुरुघंटाल । उ०— वह बडा़ उस्ताद है, उससे बचे रहना । २. निपुण । प्रवीण । विज्ञ । दक्ष । जैसे,— इस काम में वह उस्ताद है । उ०— तब उसको वे अपने उस्ताद के निकट ले गए । — कबीर सा०, पृ० ९८२ ।

उस्तादी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. गुरुआई । शिक्षक की वृत्ति । मास्टरी । २. चतुराई । निपुणता । ३. विज्ञता । ४. चालाकी । धूर्तता ।

उस्तानी
संज्ञा पुं० [फा०] १. गुरुआनी । गुरुपत्नी । २.जो स्त्री किसी प्रकार की शिक्षा दे । ३. चालाक स्त्री । ठगिन ।

उस्तुरा
संज्ञा पुं० [फा०] छुरा । अस्तुरा । बाल बनाने का औजार ।

उस्तरस्मि पु
संज्ञा पुं० [सं० उष्णरश्मि] सूर्य । उ०— मिहिर तिमिर हर प्रभाकर उस्नरस्मि तिम्मंस । अनेकार्थ०, पृ० १०२ ।

उस्साक पु
संज्ञा पुं० [अ० उश्शाक, इश्क का बहुब०] १. प्रेंमी लोग । २. राग के एक स्थान का नाम जो दो घडी़ दिन रहतेगाया जाता है । उ०— गोरे दे ना लयारदी बातैं दिन उस्साक दुखाँदा कातूँ ।— नट०, पृ० १२८ ।

उस्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. किरण । मरीचि । रश्मि । २. साँड़ । वृषभ । ३ देव । ४. सूर्य । ५. दिन । ६. दो अश्विनी- कुमार [को०] ।

उस्त्र (२)
वि० १. प्रभावान् । तेजस्वी । चमकीला । २. प्रभात संबंधी [को०] ।

उस्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रातःकाल । उषाकाल । २. प्रकार । ३. चमकीला तारा । ४. गाय [को०] ।

उस्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बछडा़ । छोटा बैल । २. बूढा़ बैल [को०] ।

उस्त्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाय [को०] ।

उस्त्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. बैल । २. देवता [को०] ।

उस्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गाय । २. प्रभा । ३. बछडा़ । ४. दूध [को०] ।

उस्वाँस पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'उसाँस' । उ०— स्वाँस उस्वाँस का प्रेम, प्याला, प्रिया, गगन गरजै जहाँ बजै तूरा । — कबीर श०, भा० १, पृ० ६३ ।

उस्वास पु
संज्ञा पुं० [सं० उच्छवास] दे० 'उच्छवास' । उ०— स्वास उस्वास उठैं सब रोम चलै दृग नीर प्रखंडित धारा । सुंदर कौन फरै नवधा विधि छाकि परयो रस पी मतवारा । — सुंदर ग्रं०,भा० १, पृ० २५ ।

उस्सास
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'उच्छवास' । उ०— नाम ते अज्जपा जाप ओऊँ । नाम तें सास उस्सास सोऊँ । राम० धर्म०, पृ० १२९ ।

उस्सीस
संज्ञा पुं० [सं० उपशीर्षक, पु उसीस] दे० 'उसीसा' । उ०— नर धर वर मसनंद सीस उस्सीस धराइअ ।— सुजान०, पृ० २३ ।

उहु पु † (१)
सर्व० [हिं०] दे० 'वह' । उ०— उहै ब्रह्म गुरु संत उह वस्तु विराजत येक । बचन बिलास बिभाग त्रय बधन भाव विवेक ।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ४ ।

उह (२)पु
सर्व० [हिं०] दे० 'उस' । उ०— सो वह लरिकिनी कौ दुःख देखि कै श्रीनाथ जी ने श्रीकुसाँई जी सो कह्यो, जो —वह बनिया बैष्णव की बेटी उह गाँव में है । सो बाकौ दुःख मो तें सह्यो जात नाहीं । —दो सौ बावन०, भा०२, पृ० ३८ ।

उहदा †
संज्ञा पुं० [हिं० ]दे० 'ओहदा' ।

उहदेदार †
संज्ञा पुं० [हिं०] 'ओहदेदार' ।

उहवाँ †
क्रि० वि० [हिं० वहाँ] वहाँ । उस जगह । उस स्थान पर । उ०—चित चोखा मन निर्मला, दयावंत, गंभीर । सोई उहवाँ विचरई, जेहि सतगुरु मिलै कबीर । —कबीर सा० सं०, पृ० १० ।.

उहाँ पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'वहाँ' । उ०— तब नारायनदास उहांई स्नान करे । — दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १०६ ।

उहार पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ओहार' । उ०— नारि उहार उधारि दुलहिनिन्ह देखहिं । नैन लाहु लहि जनम सफल करि लेखहिं ।—तु—लसी ग्रं०, पृ० ६३ ।

उहासना पु
क्रि० अ० [सं० उल्लासन] प्रसन्न होना । प्रमुदित होना । उ०— जब क्रीड़त जल केलि चित्त कैमास उहासै ।—पृ० रा०, ५८ ।२ ।

उहि †
सर्व० [हिं०] दे० 'वह' । उ०— सखि सौं कह सखि उहि गृह अंतर । अब ते हौं सोऊँ न सुतंतर ।—नंद० ग्रं०, पृ० १४८ ।

उही †
सर्व० [हिं०] दे० 'वही' ।

उहूल पु
संज्ञा स्त्री० [सं० उल्लोल] तरंग । लहर । मौज ।—डिं० ।

उहै †
सर्व [हिं०] दे० 'वही' ।

उह्ल
संज्ञा पुं० [सं०] वृषम । साँड़ । अनड्वान [को०] ।