हिन्दी-हिन्दी/जि

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जिं पु
सर्व [हिं० जिन] जिसने । जो । विशेष—'जिन' का यह रूप प्राचीन हिंदी काव्य में मिलता है ।

जिंक
संज्ञा स्त्री० [अं० जिंक] जस्ते का क्षार । विशेष—यह खार देखने में सफेद रंग का होता है और रंग रोगन और दवा के काम में आता है । यह क्लोराइड आफ जिंक, वा सलफेट आफ जिंक को सोडियम, बेरियम वा कैलसियम सलफाइड में घोलने या हल करने से बनता है । सलफाइड के नीचे तलछट बैठ जैती है जिसे निकालकर सुखाने के बाद लाल आँच में तपाकर ठंढे पानी में बुझा लेते हैं । इसके बाद वह खरल में पीसी जाती है और बाजारों में बिकती है । इसे सफेदा भी कहते हैं । गुलाबजल या पानी में घोलकर इसे आँखों में डालते हैं जिससे आँख की जलन और ददं दूर हो जाता है । यौ०—जिंक आक्साइड ।

जिंगनी
संज्ञा स्त्री० [सं० जिङ्गनी] जिगिन का पेड़ ।

जिंगिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० जिङ्गिनी] दे० 'जिंगनी' ।

जिंगी
संज्ञा स्त्री० [सं० जिङ्गी] मजीठ [को०] ।

जिंजर
संज्ञा पुं० [अं०] अदरख से बनी एक प्रकार की पेय । उ०—खन्ना ने जिंजर का ग्लास खाली करके सिगार सुल- गाई ।—गोदान, पृ० १२७ ।

जिंद (१)
संज्ञा पुं० [अ० जिन या जिन्न] भूत प्रेत । मुसलमान भूत । दे० 'जिन' ।

जिंद (२)
संज्ञा पुं० [हिं० जंद] दे० 'जंद' ।

जिंद (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'जिंदगी' । उ०—दे० गिरंद गिरँदा हूवा बे जिंद असाडी छीनी है ।—घनानंद, पृ० १८० ।

जिंदगानी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] जीवन । जिंदगी ।

जिंदगी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. जीवन । मुहा०—जिंदगी से हाथ धोना = जीने से निराश होना । २. जीवनकाल । आयु । मुहा०—जिंदगी का दिन पूरा करना वा भरना = (१) दिन काटना । जीवन बिताना । (२) मरने को होना । आसन्नमृत्यु होना । जिंदगी का दुश्मन होना = जिंदगी देना । मौत के मुँह में जाना । उ०—हाथी आया ही चाहता है क्यों जिंदगी के दुश्मन हो गए ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ८६ ।

जिंदा
वि० [फा़० जिंदह] १. जीवित । जीता हुआ । यौ०—जिंदादिल । जिंदावाद = अमर हो । २. सक्रिय । सचेष्ट (को०) । ३. हराभरा (को०) ।

जिंदादिल
वि० [फा़० जिंदहदिल] [संज्ञा जिंदादिली] खुश- मिजाज । हँसोड़ । दिल्लगीबाज । विनोदप्रिय ।

जिंदादिली
संज्ञा स्त्री० [फा़० जिंदहदिली] प्रसन्न रहने और मनो- विनोद करने का भाव ।

जिंदाबाद
अव्य० [फा़० जिंदहबाद] चिरंजीवी हो । जीवित हो । यौ०—इनकलाव जिंदाबाद = क्रांति चिरंजीवी हो ।

जिंस
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. प्रकार । किस्म । भाँति । २. वस्तु । द्रव्य । ३. सामग्री । सामान । ४. अनाज । गल्ला । रसद । यौ०—जिंसवार । ५. आभरण । गहना (को०) । ६. लिंग (को०) । ७. जाति (को०) । ८. परिवार (को०) । ९. वर्ग (को०) । १०. पण्य द्रव्य या व्यपारिक वस्तु (को०) । ११. असबाब (को०) । १२. व्यवहार गणित (अंकगणित) । यौ०—जिंसवाना = भंडारगृह ।

जिंसवार
संज्ञा पुं० [फा़०] पटवारियों का एक कागज जिसमें वे अपने हलके के प्रत्येक खेत में बोए हुए अन्न का नाम परताल करते समय लिखते हैं ।

जिँवाना
क्रि० स० [हिं० जेवना का सक० रूप] दे० 'जिमाना' ।

जि
संज्ञा पुं० [सं० जिः] पिशाच [को०] ।

जिअ पु
संज्ञा पुं० [सं० जीव, प्रा० जिअ] दे० 'जी' । उ०—राम भगति भूषित जिअ जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ।—मानस, १ ।९ ।

जिअन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जीवन' । उ०—मरन जिअन एही पँथ एही आस निरास । परा सो गया पतारहि तिरा सो गया कविलास ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २२६ ।

जिंसीलगान
संज्ञा पुं० [हिं० जिंसी + लगान] जिंस के रूप में ली जानेवाली लगान । फसल के रूप में ली जानेवाली लगान ।

जिअन पु
संज्ञा पुं० [सं० जीवन] जीवन । जीवन की पद्धति । उ०— जिअन मरन फलु दसरथ पावा । अंड अनेक अमल जसु छावा ।—मानस, २ ।१५६ ।

जिअना †
संज्ञा पुं० [सं० जीवन] जीवन ।

जिअना पु †
क्रि० अ० [हिं० जीना] दे० 'जीना' ।

जिआना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'जिलाना' । उ०—तासौं वैर कबहुँ नहि कीजै । मारे मरिय जिआए जीजै ।—तुलसी (शब्द०) ।

जिउँ पु
अव्य० [सं० यथा; अप० जिवै] दे० 'ज्यौं' या 'जिमि' । उ०—ऊँची चढ़ि चातृंगि जिउँ, मागि निहालइ मुघ्ध ।— ढोला०, दू० १६ ।

जिउ †
संज्ञा पुं० [सं० जीव] दे० 'जीव' ।

जिउका
संज्ञा स्त्री० [सं० जीविका] 'जीविका' ।

जिउकिया
संज्ञा पुं० [हिं० जीविका वा जिउका] १. जीविका करनेवाला । रोजगारी । २. पहाडी़ लोग जो दुर्गम जंगलों और पर्वतों से अनेक प्रकार की ब्यापार की वस्तुएँ, जैसे,— चँवर, कस्तूरी, शिलाजीत, शेर के बच्चे, तथा जडी़ बूटी आदि ले आकर नगरों में बेचते हैं ।

जिउ तंत पु
संज्ञा पुं० [सं० जीव + तत्त्व] जी का तत्व । जी की बात । उ०—जेति नारि हसि पूछहिं अमिय बचन जिउ- तंत ।—जायसी ग्रं०, पृ० १६४ ।

जिउतिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूतिया > सं० जीवितपुत्रिका] एक ब्रत जो आश्विन कृष्णाष्टमी के दिन होता है । दे० 'जिताष्टमी' । विशेष—इस ब्रत को वे स्त्रियाँ जिनके पुत्र होते हैं, करती हैं । इसमें गले में एक धागा बाँधा जाता है जिसमें अनंत की तरह गाँठें होती हैं । कहीं कहीं यह ब्रत आश्विन शुक्लाष्टमी के दिन किया जाता है ।

जिउनार
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेवनार' । उ०—भोजन श्वपच कीन्ह जिउनारा । सात बार घंटा झनकारा ।—कबीर मं०, पृ० ४६३ ।

जिउलेवा †
वि० [हिं० जीव + लेवा] दे० 'जिवलेवा' ।

जिकडी़
संज्ञा स्त्री० [देश०] ब्रज का एक लोकगीत, जिसमें दो दल बनाकर प्रश्नोत्तर होता है ।

जिकर
संज्ञा पुं० [हिं० जिकिर] दे० 'जिकिर' । उ०—फिरै गैब का छत्र जिकर का मुस्क लगाई ।—पलटू०, भा० १, पृ० १०९ ।

जिका पु †
सर्व० [हिं० जिसका या जिनका का संक्षिप्त रूप] दे० 'जिसका' । उ०—आवी सब रत आँमली, त्रिया करइ सिणगार । जिका हिया न फाटही, दूर गया भरतार ।—ढोला०, दू० ३०३ ।

जिक्र
संज्ञा पुं० [अं० जिक्र] १. चर्चा । बातचीत । प्रसंग । क्रि० प्र०—आना ।—करना ।—चलना ।—चलाना ।— छिड़ना ।—छेड़ना । यौ०—जिक्र मजकूर = बातचीत । चर्चा ।जिक्रे—खैर = कुशल- चर्चा । शुभ चर्चा उ०—अतः सबसे पहले क्यों न कविसम्मेलनों ही का जिक्रे खैर किया जाय ।—कुंकुम । (भू०), पृ० २ । २. एक प्रकार का जप (को०) ।

जग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'यज्ञ' । उ०—हण ताड़का निज ठहरां । जिग मांड आरंभ जाहरा ।—रघु० रू०, पृ० ६७ ।

जिगत्नु (१)
वि० [सं०] क्षिप्रगामी । तेज चलनेवाला [को०] ।

जिगत्नु (२)
संज्ञा पुं० प्राणवायु । श्वास [को०] ।

जिगन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जिगिन' ।

जिगमिषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जाने की इच्छा [को०] ।

जिगमिषु
वि० [सं०] जाने का इच्छुक [को०] ।

जिगर
संज्ञा पुं० [फा़० मि० सं० यकृत्] [वि० जिगरी] १. कलेजा । यौ०—जिगर कुल्फ = जिगर का ताला । हृदयरूपी ताला । उ०—मुसकानि ओ लटकीली बानि आनि दिल में डोलैं । अलकें रल्कें हलकें जिगर कुल्फ के जु खोलै ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ४१ । जिगर खराश = (१) जिगर को छीलनेवाला । (२) अप्रिय । दुःखदायी । जिगर गोशा । जिगरबंद = पुत्र (ला०) । जिगर- सोज = (१) दिल जलानेवाला । (२) दिल का जला । मुहा०—जिगर कबाब होना = (१) कलेजा पक जाना या जलना । (२) बुरी तरह कुढ़ना । जिगर के टुकडे होना = कलेजे पर सदमा पहुँचना । भारी दुःख होना । जिगर थामकर बैठना = असह्य दुःख से पीड़ित होना । २. चित्त । मन । जीव । ३. साहस । हिम्मत । ४. गूदा । सत्त ।सार । ५. मध्य । सारा भाग । जैसे, लकडी़ का जिगर । ६. पुत्र । लड़का (प्यार से) ।

जिगरकीडा़
संज्ञा पुं० [फा़०जिगर + हिं० कीडा] भेडों का रोग जिसमें उनके कलेजें में कीडे़ पड जाते हैं ।

जिगरा
संज्ञा पुं० [हिं० जिगर] साहस । हिम्मत । जीवट ।

जिगरी
वि० [फा़०] १. दिली । भीतरी । २. अत्यंत घनिष्ठ । अभिन्नहृदय । जैसे, जिगरी दोस्त ।

जिगिन
संज्ञा स्त्री० [सं० जिङ्गिनी] एक ऊँचा जंगली पेड़ । विशेष—इसके पत्ते महूए या तुन के पत्तों के समान होता हैं और टहनी में जोड़ के रूप इधर इधर लगते हैं । यह पहाड़ों और तराई के जंगलों में होता है । इसके फूल सफेद और फल बेर के बराबर होते हैं । वैद्यक में इसका स्वाद चरपरा और कसैला लिखा है । इसकी प्रकृति गरम बतलाई गई है और वात, व्रण, अतीसार, और हृदय के रोगो में इसका प्रयोग लाभकारी कहा गया है । इसकी दतवन अच्छी होती है और मुख की दुर्गँध को दूर करती है । पर्या०—जिंगिनी । झिंगिनी । झिंगी । सुनिर्यासा । प्रमोदिनी । पार्वती । कृष्णशाल्मली ।

जिगीषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जय की इच्छा । विजय प्राप्त करने की कामना । २. उद्योग । धंधा । व्यवसाय । ३. लड़ने की इच्छा । युद्ध करने की इच्छा । (को०) । ४. प्रतिस्पर्धा । लाग डाँट (को०) । ५. प्रमुखता (को०) ।

जिगीषु
वि० [सं०] १. युद्ध की इच्छा रखनेवाला । २. विजय का इच्छुक [को०] ।

जिगुरन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का चोटीदार चकोर जो हिमालय में गढ़वाल से हजारा तक मिलता है । विशेष—इसे जकी, सिंग मोनाल, और जेवर भी कहते हैं । इसकी मादा बादेल कहलाती है ।

जिघत्नु
वि० [सं०] बध की इच्छा रखनेवाला । शत्रु [को०] ।

जिघत्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भूख । खाने की इच्छा । २. प्रयास करना [को०] ।

जिघत्सु
वि० [सं०] भूखा । भोजन की इच्छा रखनेवाला [को०] ।

जिघांसक
वि० [सं०] मारनेवाला । वध करनेवाला [को०] ।

जिघांसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मारने की इच्छा । २. प्रतिहिंसा । उ०—जिघांसा की वृत्ति प्रबल हुई तो छोटी छोटी सी बातों पर अथवा खाली संदेह पर ही दूसरों का सत्यानाश करने की इच्छा होता ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १९० ।

जिघांसु
वि० [सं०] दे० 'जिघांसक' ।

जिघृत्क्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पकड़ने की इच्छा [को०] ।

जिघृत्क्षु
वि० [सं०] पकड़ने की इच्छा रकनेवाला [को०] ।

जिघ्र
वि० [सं०] १. संदेही । संदेह या शंका करनेवाला । २. सूँघनेवाला । ३. समझनेवाला [को०] ।

जिच
संज्ञा स्त्री० वि० [?] दे० 'जिच्च' ।

जिच्च (१)
संज्ञा स्त्री० [?] १. बेबसी । तंगी । मजबूरी । २. शतरंज में शाह की वह अवस्था जब उसे चलने का कोई घर न हो और न अर्दब में देने को मोहरा हो । ३. शतरंज के खेल की वह अवस्था जिसमें किसी एक पक्ष का कोई मोहरा चलने की जगह न हो ।

जिच्च (२)
वि० विवश । मजबूर । तंग ।

जिजमान पु †
संज्ञा पुं० [हिं० जजमान] दे० 'जजमान' । उ०—मनु तमगन लियो जीति चंद्रमा सौतिन मध्य बँध्यौ हैं । कै कबि निज जिजमान जूथ में सुंदर आइ बस्यौ है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४५ ।

जिजिया (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जीजी] बहन ।

जिजिया (२)
संज्ञा पुं० [अ० जिजियह्] १. कर । महसूल । २. वह कर या महसूल जो मुसललमानी असलदारी में उन लोगों पर लगता था जो मुसलमान नहीं होते थे ।

जिजीविषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीने की इच्छा [को०] ।

जिजीविषु
वि० [सं०] जीने की इच्छा रखनेवाला [को०] ।

जिज्ञापयिषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जताने या ज्ञापन की इच्छा [को०] ।

जिज्ञापयिषु
वि० [सं०] जनाने का इच्छुक [को०] ।

जिज्ञासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जानने की इच्छा । ज्ञान प्राप्त करने की कामना । २. पूछताछ । प्रश्न । परिप्रश्न । तहकीकात । क्रि० प्र०—करना ।

जिज्ञासित
वि० [सं०] जिसकी जिज्ञासा की गई हो । पूछा हुआ [को०] ।

जिज्ञासितव्य
वि० [सं०] जिज्ञासा योग्य । पूछने योग्य [को०] ।

जिज्ञास
वि० [सं०] १. जानने की इच्छा रखनेवाला । ज्ञान- प्राप्ति के लिये इच्छुक । खोजी । २. मुमुक्षु (को०) ।

जिज्ञासू
वि० [सं० जिज्ञासु] दे० 'जिज्ञासु' ।

जिज्ञास्य
वि० [सं०] जिसकी जिज्ञासा की जाय । जिसे जानना हो । जिसके संबंघ में पूछताछ की जाय ।

जिठाई †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेठाई' ।

जिठानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेठानी' ।

जिणि पु
सर्व० [हिं० जिन] दे० 'जिस' । उ०—जिणि देसे सज्जण वसइ, तिणि दिसि वाज्जउ वाउ । उआँ लगे मो लग्गसी, ऊ ही लाक पसाउ ।—ढोला०, दू० ७४ ।

जित्
वि० [सं०] जीतनेवाला । जेता । विशेष—इस अर्थ में शब्द समासंत में आता है । जैसे, इंद्रजित्, शत्रुजित्, विश्वजित् इत्यादि ।

जित (१)
वि० [सं०] जीता हुआ । पराजित । जिस दूसरे ने जीता हो ।

जित (२) †पु
क्रि० वि० [सं० यत्र] जिधर । जिस ओर । उ०—जात है जित बाजि केशौ जात हैं तित लोग ।—केशव (शब्द०) । यौ०—जित तित्त = जहाँ तहाँ । वि० दे० 'जहाँ' के मुहावरे । उ०—सम विषम विहर वन सघन घन तहाँ सथ्थ जित तित्त हुअ । भूल्यो सुसंग कवियन वनह और नहीं जन संग दुअ ।—पृ० रा०, ६ ।१३ । मुहा०—जित कित होकर जाना = अव्यवस्थित जाना । इधरउधर जाना । उ०—पसु अरु पसुप दवानल माहीं । चकित भए जित कित ह्नै जाही ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३१० ।

जितक
वि० [हिं० जित] दे० 'जितना' । उ०—अवतारी अवतार घरन अरू जितक बिभूती । इस सब आश्रय के आधार जग जिहिं की ऊती ।—नंद० ग्रं०, पृ० ४४ ।

जितना
वि० [हिं० जिस + तना (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० जितनी] जिस मात्रा का । जिस परिमाण का । जैसे,—जितना मैं दौड़ता हूँ उतना तुम नहीं दौड़ सकते । विशेष—संख्या सूचित करने के लिये बहुवचन रूप 'जितने' का प्रयोग होता है । 'जितना' के पीछे 'उतना' का प्रयोग संबंध पूरा करने के लिये किया जाता है । जैसे, जितना मीठा वह आम था उतना यह नहीं है ।

जितकोप, जितक्रोध
वि० [सं०] जिसने क्रोध को जीत लिया हो ।

जितनेमि
संज्ञा पुं० [सं०] पीपल का दंड या डंडा [को०] ।

जितमन्यु
वि० [सं०] दे० 'जितकोप' [के०] ।

जितरा †
संज्ञा पुं० [हिं० जिता] वह हलवाहा जिसे वेतन वा मजदूरी नहीं दी जाती बल्कि खेत जोतने के लिये हल बैल दिए जाते हैं ।

जितलोक
वि० [सं०] जिसने पुण्य कर्म से स्वर्गादि लोक प्राप्त किया हो ।

जितवना पु
क्रि० स० [सं० ज्ञात] जताना । प्रकट करना । उ०—चितवत जितवत हित हिए किए तिरीछे नैन । भीजे तन दोऊ कँपै क्यों हू जप निबरै न ।—बिहारी (शब्द०) ।

जितवाना
क्रि० स० [हिं० जीतना का प्रे० रूप] जीतने देना । जीतने में समर्थ या उद्यत करना । जीतने में सहायक होना ।

जितवार पु †
वि० [हिं० जीतना] जीतनेवाला । विजयी । उ०—जँहा हो ब्रजेशकुमार । रनभूमि को जितवार ।—सूदन (शब्द०) ।

जितवैया †
वि० [हिं० जीतना + वैया (पू० प्रत्य०)] १. जीतनेवाला । २. जितानेवाला । किसी को विजयी बनानेवाला ।

जितशत्रु
वि० [सं०] विजयी । जो सत्रु को पराजित कर चुका हो [को०] ।

जितश्रम
वि० [सं०] जो श्रम थकान का अनुभव न करता हो ।

जितसंग
वि० [सं० जितसङ्ग] आसक्ति या आकर्षण से मुक्त [को०] ।

जितस्वर्ग
वि० [सं०] पुण्य के प्रभाव से जो स्वर्ग जीत चुका हो [को०] ।

जिता (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० जोतना वा जीतना] वह सहायता जो किसान लोग खेत की जोताई बोआई में एक दूसरे को देते हैं ।

जिता (२)
वि० [हिं०] [वि० स्त्री० जिती] दे० 'जितना' ।

जितात्क्ष
वि० [सं०] जितेंद्रिय [को०] ।

जितात्क्षर
वि० [सं०] बढ़िया पढ़ने लिखनेवाला [को०] ।

जितात्मा
वि० [सं० जितात्मन्] जितेंद्रिय ।

जिताना
क्रि० स० [हिं० जीतना का प्रे० रूप] जीतने में समर्थ या उद्यत करना । उ०—ताही समै छैल छल कीन्हीं है छबीली संग, देव विपरीत बसि बूझत पहेली बात । पूछै जो पियारी ताहि जानत अजान पिय, आपु पूछी प्यारी को जताइ कै जिताई जात ।—देव (शब्द०) ।

जितार †
वि० [सं० जित्वर] १. जीतनेवाला । विजयी । २. बली । जो जीत सके । ३. अधिक । भारी । वजनी । विशेष—प्रायः पलडे़ पर रखी हुई वस्तु के संबंध में बोलते हैं ।

जितारि (१)
वि० [सं०] १. शत्रुजित् । २. कामादि शत्रुओं को जीतनेवाला ।

जितारि (२)
संज्ञा पुं० बुद्धदेव का नाम ।

जिताष्टमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिंदुओं का एक व्रत जिसे पुत्रवती स्त्रियाँ करती हैं । विशेष—यह व्रत अश्विन कृष्णाष्टमी के दिन पड़ता है । इस दिन स्त्रियाँ सायंकाल जलाशय में स्नान कर जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और भोजन नहीं करती । इस व्रत के लिये उदयातिथि ली जाती है । इसको जिउतिया भी कहते हैं ।

जिताहार
वि० [सं०] भूख पर विजय प्राप्त करनेवाला [को०] ।

जिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीत । विजय ।

जितिक पु †
वि० [हिं०] दे० 'जेतिक' । उ०—जितिक हुतीं ब्रज गो, बछ, बाछी । तेल हरद करि आछी काछी ।—नंद० ग्रं०, पृ० २३५ ।

जिती
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'जितिक' । उ०—ब्रह्मादिंक बिभूति जग जिती । अंड अंड प्रति दिखियत तिती ।—नंद० ग्रं०, पृ० २६७ ।

जितीक
वि० [हिं०] दे० 'जितिक' । उ०—पुनि जितीक गोपीजन भाई । ते रोहिनी सबहिं पहिराई ।—नंद० ग्रं०, पृ० २३५ ।

जितुम
संज्ञा पुं० [यू० डिडुमाई] मिथुन राशि ।

जितेंद्रिय
वि० [सं० जितेन्द्रिय] १. जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो । विशेष—मनुस्मृति में ऐसे पुरुष कौ जितेंद्रिय माना है जिसे सुनने, छूने, देखने, खाने सूँघने से हर्ष या विषाद न हो । २. शांत । समवृत्तिवाला ।

जिते पु
वि० [हिं० जिस + ते] जितने (संख्यासूचक) । उ०— कंत बिदेस रहे हो जिते दिन देहु तिते मुकुतानि की माला ।—पद्माकर (शब्द०) ।

जितेक पु
वि० [हिं० जिते] जितना । उ०—नगनि मध्य नग हुते जितके । लै लै ऊपर बैठे तितेक ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३१४ ।

जितै पु
क्रि० वि० [सं० यत्र, प्रा० यत्त] जिधर । जिस ओर । उ०—लाल जितै चितवै तिय पै, तिय त्यों त्यों चितौति सखीन की ओरी ।—देव (शब्द०) ।

जितैया
वि० [सं० जित् + ऐया (प्रत्य०)] जितवैया । जितवार । जेता । उ०—प्रबल प्रतीक सुप्रतीक के जितैया रैया रख भाव- सिंह तेरे दान के दुरद हैं ।—मति० ग्रं०, पृ० ४२७ ।

जितैला
वि० [हिं० जीत + ऐला (प्रत्य०)] जीतनेवाला । विजेता । उ०—जमींदार ने कहा, तुम किसी जमींदार काराज यों नहीं दे सकते । यह राज जितैला है । अगर ऐसा ही करना है तो उस जमींदार को बुला लाओ ।

जितो (१)पु †
वि० [हिं० जिस] जितना (परिमाणसूचक) । उ०— (क) बैठि सदा सतसंग ही में विष मानि विषय रस कीर्ति सदाहीं । त्यों पद्माकर झूठ जितो जग जानि सुज्ञानहि के अवगाहीं ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) नख सिख सुंदरता अवलोकत, कह्यो न परत सुख होत जितो री ।—तुलसी (शब्द०) । विशेष—संख्या सूचित करने के लिये बहुवचन रूप 'जिते' का प्रयोग होता है ।

जितो (२)
क्रि० वि० जिस मात्रा से । जितना ।

जितना पु
क्रि० स० [हिं० जीतना] दे० 'जीतना' । उ०— (क) द्वादस हथ्थ मयंद वर भिंडपाल लिय मारि । जब बहु कर सिंघिनि गहै को जित्तै नृप नारि ।—प० रासो, पृ० १४ । (ख) रहत अचौंकी नित ही ध्यान सु रावरो । अब मन लीनो जित्त भयो प्रीति सों बावरो ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ३८ ।

जित्तम
संज्ञा पुं० [यू० डिड्डमाइ] मिथुन राशि ।

जित्थूँ
अव्य० [पं०] जहाँ । उ०—अहो अहो घन आनँद जानी जित्थूँ तित्थूँ जाँदा है ।—घनानंद, पृ० १८१ ।

जित्य
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० जित्या] १. बडा़ हल । २. हेंगा । पटेला । सरावन (को०) ।

जित्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हींग । २. सरावन । पटेला (को०) ।

जित्वर
वि० [सं०] [वि० स्त्री० जित्वरी] जेता । जीतनेवाला । विजयी ।

जित्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] काशीपृरी का एक प्राचीन नाम [को०] ।

जिथनी पु
सर्व० [?] जिससे । जिसका । उ०—तुका सज्जन तिन सूँ कहिये जिथनी प्रेम दुनाय ।—दक्खिनी०, पृ० १०८ ।

जिद
संज्ञा स्त्री० [अ० जिद] [वि० जिद्दी] १. उलटी बात या वस्तु । विरूद्ध वस्तु या बात । २. वैर । शत्रुता । वैमनस्य । क्रि० प्र०—करना ।—बाँधना ।—रखना । ३. हठ । अड़ । हुराग्रह । क्रि० प्र०—आना ।—करना ।—बाँधना ।—रखना । मुहा०—जिद पर आना = हठ करना । अड़ना । जिद चढ़ना = हठ धरना । जिद पकड़ना = हठ करना ।

जिदियाना †
संज्ञा स्त्री० [अ० जिद से नामिक धातु] हठ करना । दुराग्रह करना । अड़ना । अड़ जाना ।

जिद्द †
संज्ञा स्त्री० [अ० जिद्द] दे० 'जिद' ।

जिद्दन
क्रि० वि० [अ०] जिद्द करते हुए । हठ करते हुए । जिद के कारण । [को०] ।

जिद्दी
वि० [अ० जुद्द + फा़० ई (प्रत्य०)] १. जिद करनेवाला । हठी । अड़नेवाला । जैसे, जिद्दी लड़का । २. दुराग्रही । दूसरे की वात न माननेवाला ।

जिधर
क्रि० वि० [हिं० जिस + धर (प्रत्य०)] जिस ओर । जहाँ । विशेष—समन्वय में इसके साथ 'उधर' का प्रयोग होता है । जैसे, जिधर देखता हुँ उधर तू ही तू है । यौ०—जिधर तिधर = (१) जहाँ तहाँ । इधर उधर । विशेष—अब इसका कम प्रयोग है । (२) बेठिकाने । बिना ठोर ठिकाने । मुहा०—जिधर चाँद उधर सलाम = अवसरवादिता । उ०—शर्मा जी डाँटते हैं, जिधर चाँद उधर सलाम ।—मैंला०, पृ० ३४४ ।

जिधाँ पु
अव्य० [देश०] जहाँ । उ०—पिद्दे चलथे थे दस भायाँ मिलाकर । जिधाँ पिछे वो जंगल बीच यकसर ।—दक्खिनी०, पृ० ३३८ ।

जिन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु । २. सूर्य । ३. बुद्ध । ४. जैनों के तीर्थंकर । यौ०—जिन सदन = जिनसद्म । जैन मंदिर ।

जिन (२)
वि० १. जीतनेवाला । जयी । २. राग द्वेष आदि जीतनेवाला । ३. वृद्ध [को०] ।

जिन (३)
वि० [सं० यानि] 'जिस' का बहुवचन ।

जिन (४)
सर्व० [हिं०] 'जिस' का बहुवचन ।

जिन (५)
संज्ञा पुं० [अ०] भूत । मुहा०—जिन का साया = जिन लगना । जिन चढ़ना, जिन सवार होना = क्रोध के आवेश में होना । क्रोधांध होना ।

जिन (६)
अव्य० [हिं० जनि] मत । उ०—सोच करो जिन होहु सुखी मतिराम प्रवीन सबै नरनारी । मंजुल बंजुल कुंजन में घन, पुंज सखी ससुरारि तिहारी ।—मति० ग्रं०, पृ० २९० ।

जिन (७)
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार की शराब । उ०—जिन का एक देग ।—वो दुनिया, पृ० १४२ ।

जिनगानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जिंदगानी] दे० 'जिंदगानी' ।

जिनगी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० जिंदगी । उ०—यकठोस दुल्हा के साथ किस तरह अपनी जिनगी काटेगी ।—नई०, पृ० २६ ।

जिनस पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० जिंस] १. प्रकार । जाति । किस्म । उ०—बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहि बनें ।—मानस, १ ।९३ । २. दे० 'जिंस' ।

जिना
संज्ञा पुं० [अ० जिना] व्यभिचार । छिनाला । क्रि० प्र०—करना । यौ०—जिनाकार । जिनाकारी । जिनाबिल्जब्र ।

जिनाकार
वि० [अ० जिना + फा़० कार] [संज्ञा जिनाकारी] व्यभिचारी ।

जिनाकारी
संज्ञा स्त्री० [अ० जिना + फा़० कारी] पर-स्त्री-गमन । व्यभिचार ।

जिनाबिज्जब्र
संज्ञा पुं० [अ०] किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा और सम्मति के विरूद्ध बलात् संभोग करना ।

जिनावर पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जानवर' । उ०—कहै श्री हरिदास पिंजरा के जिनावर सों, तरफराइ रहयो उड़िबे को कि/?/करि ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३९० ।

जिनि (१)
अव्य० [हिं० जनि] मत । नहीं । दे० 'जनि' । उ०—(क) यह उज्जल रसमाल कोटि जतनन कै पोई । सावधान ह्नै पहिरौ यहि तोरौ जिनि कोई ।—नंद० ग्रं०, पृ० २५ । (ख) जिनि कटार गर लावसि समुझि देखु मन आप । सकति जीउ जौ काटै महा दोष औ पाप । जायसी—(शब्द०) ।

जिनि (२)पु
सर्व० [हिं० जिन] जिन्होंने ।

जिनिस †
संज्ञा स्त्री० [अ० जिंस] दे० 'जिंस' ।

जिनिसवार †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जिंसवार' ।

जिनेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० जिनेन्द्र] १. एक बुद्ध । २. एक जैन संत [को०] ।

जिन्न
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'जिन' [को०] ।

जिन्नात
संज्ञा पुं० [अ० जिन का बहु व०] भूत प्रेतादि ।

जिन्नी (१)
वि० [अ०] जिन या भूत संबंधी [को०] ।

जिन्नी (२)
संज्ञा पुं० वह व्यक्ति जिसके वश में भूत प्रेत हो [को०] ।

जिन्ह (१)पु
सर्व० [हिं० जिन] दे० 'जिन' ।

जिन्ह (२)पु †
संज्ञा पुं० [अ० जिन्न] दे० 'जिन' (भूत प्रेत) ।

जिन्हार
अव्य० [फा़० जिनहार] हर्गिज । बिलकुल । उ०—कहे उस शर्त से ऐ नेक अतवार । खिलाफ इसमें न करना तुमें जिन्हार ।—दक्खिनी, पृ० ३२५ ।

जिप्सी
संज्ञा पुं० [अं०] १. एक घूमती फिरती रहनेवाली जाति— विशेष । २. उक्त जाति का व्यक्ति ।

जिबह
संज्ञा पुं० [अ० जब्ह] दे० 'जबह' । उ०—मुरगी मुल्ला से कहै, जिबह करत है मोहिं । साहिब लेखा माँगसी, संकट परिहै तोहिं ।—संतवाणी०, पृ० ६१ ।

जिब्भा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जिह्ना] दे० 'जिह्ना' ।

जिब्हा †
संज्ञा पुं० [सं० जिह्ना] दे० 'जिह्ना' ।

जिभला †
वि० [हिं० जीभ + ला (प्रत्य०)] चटोरा । चट्ठू ।

जिभ्या †पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जिह्ना] दे० 'जिह्ना' ।

जिम पु
अव्य० [हिं०] दे० 'जिमि' । उ०—ले धण एही संपजइ, तउ जिम ठल्लड जाइ ।—ढोला०, दू० ४५६ ।

जिमखाना
संज्ञा पुं० [अं० जिमनास्टिक का संक्षिप्त रूप जिम + हिं० खाना] वह सार्वजनिक स्थान जहाँ लोग एकत्र होकर व्यायामादि करते हैं । व्यायामशाला ।

जिमनार
संज्ञा स्त्री० [हिं० जिमाना] भोज । समष्टिभोज । उ०— जहाँ गए ब्रह्मभोज, साधु जिमनार यथेच्छ करते ।—सुंदर ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० १४२ ।

जिमनास्टिक
संज्ञा पुं० [अं०] वे कसरतें जो काठ के दोहरे बल्लों या छड़ों आदि के ऊपर की जाती हैं । अंग्रेजी कसरत ।

जिमाना
क्रि० स० [हिं० जीमना] खाना खिलाना । भोजन करना ।

जिमि पु
क्रि० वि० [हिं० जिस् + इमि] जिस प्रकार से । जैसे । यथा । ज्यों । उ०—कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।—मानस, ७ ।१३० । विशेष—समन्वय सूचित करने के लिये इस शब्द के आगे तिमि का प्रयोग होता है ।

जिमित
संज्ञा पुं० [सं०] भोजन [को०] ।

जिमींदार
संज्ञा पुं० [हिं० जमींदार] दे० 'जमींदार' ।

जिम्मा
संज्ञा पुं० [अ० जिम्महू] १. इस बात का भारग्रहण कि कोई बात या कोई काम अवश्य होगा और यदि न होगा तो उसका दोष भार ग्रहण करनेवाले के ऊपर होगा । किसी ऐसी बात के होने या होने का दोष अपने ऊपर लेने की प्रतिज्ञा जिसका संबंध अपने से या दूसरे से हो । उत्तरदायित्व- पूर्ण प्रतिज्ञा । जबाबदेही । जैसे,—(क) मैं इस बात का जिम्मा लेता हूँ कल आपको चीज मिल जाएगी । (ख) इस बात का जिम्मा मेरा है कि ये एक महीने के भीतर आप- का रुपया चुका देंगे । (ग) क्या रोज रोज खिलाने का मैने जिम्मा लिया है । क्रि० प्र०—करना ।—लेना । मुहा०—कोई काम किसी के जिम्मे करना=किसी काम को करने का भार किसी के ऊपर होना । किसी के जिम्मे रुपया आना, निकलना या होना=किसी के ऊपर रुपया ऋणस्वरूप होना । देना । ठहरना । जैसे,—हिसाब रुपया डालना= किसी के ऊपर ऋण या देना ठहराना । विशेष—जिम्मा और वादा में यह अंतर है कि वादा अपने ही विषय में किया जाता है और जिम्मा दूसरे के विषय में भी होता है । २. सुपुर्दगी । देखरेख । संरक्षा । जैसे,—ये सब चीजें मैं तुम्हारे जिम्मे छोड़ जाता हूँ, कहीं इधर उधर न होने पाएँ ।

जिम्मादार
संज्ञा पुं० [अं० जिम्मह् + फा० दार (प्रत्य०)] दे० 'जिम्मावार' ।

जिम्मादारी
संज्ञा स्त्री० [अ० जिम्मह् + दारी (प्रत्य०)] दे० 'जिम्मावारी' ।

जिम्मावार
संज्ञा पुं० [अं० जिम्मह् फा० + वार (प्रत्य०)] वह जो किसी बात के लिये प्रतिज्ञाबद्ध हो । जबाबदेह । उत्तरदाता ।

जिम्मावारी
संज्ञा पुं० [हिं० जिम्मावार + ई (प्रत्य०)] १. किसी बात को करने या किए जाने का भार । उत्तरदायित्व । जवाबदेही । २. सुपुर्दगी । सरंक्षा । उ०—हम इन चीजों को तुम्हारी जिम्मावारी पर छोड़ जाते हैं ।

जिम्मी
संज्ञा पुं० [अ० जिम्मी] इसलामी राज्य का वह कर जिसे गैर मुसलमान होने के कारण देना पड़ता था [को०] ।

जिम्मीजर
संज्ञा स्त्री० [फा० जमीं + जर] जर जमीन । उ०— पाखंड डंड रच्चै नहीं । जिम्मीजर कंकर बरा । संभरिय काल कटक हनौ ता पाछै गुज्जर धरा ।—पृ० रा०, १२ । १२८ ।

जिम्मेदार
संज्ञा पुं० [अ० जिम्मह् + फा़०दार (प्रत्य०)] दे० 'जिम्मावार' ।

जिम्मेदारी
संज्ञा स्त्री० [अं० जिम्मह् + फा़० दारी (प्रत्य०)] दे० 'जिम्मावारी' ।

जिम्मेवार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जिम्मावार' । उ०—जिस गाँव के ये हैं, वहाँ जमींदार जिम्मेवार होगा ।—काले०, पृ० ५ ।

जिम्मेवार
संज्ञा पुं० [अं० जिम्मह् + फा़० वार (प्रत्य०)] दे० 'जिम्मावार' ।

जिम्मेवारी
संज्ञा स्त्री० [अ० जिम्मह् + फा़० वारी (प्रत्य०)] दे० 'जिम्मावारी' ।

जिय †
संज्ञा पुं० [सं० जीव] मन । चित्त । जी । उ०—(क) अस जिय जानि सुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु पद सेव— करई ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) प्रसनं चंद सम जतिय दिन इक मंत्र इष्ट जिय । इह आराधत भट्ट प्रगट पंचास बीर बिय ।—पृ० रा०, ६ । २६ । यौ०—जियबधा=हत्या करनेवाला । जल्लाद ।

जियन पु
संज्ञा पुं० [हिं० जीवन] जीवन । जिंदगी ।

जियनि †
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन] १. जीवन । २. जीवन का ढंग । रहन सहन । आचरण ।

जियरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं० जीव] १. जीव । मन । चित्त । उ०— मेरो स्वभाव चितैबे को माई री लाल निहारि कै बंसी बाजाई । वा दिन तें मोहि लागी ठगोरी सी लोग कहैं कोउ बावरी आई । यौं रसखानि घिरयो सिरगो ब्रज जानत वे कि मेरो जियरा ई । जो कोउ चाहै भलो अपनो तो सनेह न काहू सो कीजिए माई ।—रसखान (शब्द०) । २. प्राण । उ०—जियरा जावगे हम जानी । पाँच तत्व को बनो है पिंजरा जिसमें वस्तु बिरानी । आवत जावत कोइ न देखा डूब गया बिन पानी ।—कबीर श०, भा०, पृ० ।

जियाँकार
वि० [फा़० जियाँकार] १. हानि पहुँचानेवाला । २. बदमाश । बुरा आचरण करनेवाला [को०] ।

जिया (१)
संज्ञा स्त्री० [अं० जिया] १. सूर्य का प्रकाश । २. चमक । आभा । कांति [को०] ।

जिया (२) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाई या धाय] दूध पिलानेवाली दाई ।

जिया (३) †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जो' और 'मन' ।

जिया (४) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जीजी या दीदी] बड़ी बहन ।

जियाजंतु †
संज्ञा पुं० [हिं० जीवजंतु] दे० 'जीवजंतु' ।

जियादत
संज्ञा स्त्री० [अ० जियादत] १. आधिक्य । अतिशयता । २. अत्याचार । जुल्म [को०] ।

जियादती
संज्ञा स्त्री० [अ० जियादत + हिं० ई (प्रत्य०)] दे० 'ज्यादती' ।

जियादा
वि० [अ० जियादह्] दे० 'ज्यादा' ।

जियान
संज्ञा पुं० [फा़० जियान] घाटा । टोटा । नुकसान । हानि । क्षति । क्रि० प्र०—उठाना ।—होना ।—करना ।

जियाना पु †
क्रि० स० [हिं० जीना] १. जिलाना । उ०—अबहूँ करि माया जिव केरी । मोहिं जियाव देहु पिय मोरी ।—जायसी (शब्द०) । २. पालना । पोसना । उ०—वाघ बछानि को गाय जियावत, बाधिनी पै सुरभी सुत चोषौ ।—गुमान (शब्द०) ।

जियोपोता
संज्ञा पुं० [हिं० जिलाना + पूत] पुत्रजीवा का पेड़ । पतजीव ।

जियाफत
संज्ञा स्त्री० [अं० जियाफ़त] १. अतिथ्य । मेहमानदारी । २. भोज । दावत । मुहा०—जियाफत करना=(१) आदर सत्कार करना । (२) खाना खिलाना । भोज देना ।

जियार (१) पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जियरा' । उ०—जावै बीत जियार, जेहल पछतावै जिके ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० १६ ।

जियार (२) †
वि० [हिं०] साहसी । हिम्मती । जीवटवाला ।

जियारत
संज्ञा स्त्री० [अ० जियारत] १. दर्शन । २. तीर्थदर्शन । क्रि० प्र०—करना । मुहा०—जियारत लगना =मेल लगना । दर्शन के लिये दर्शकों की भीड़ होना ।

जियारतगाह
संज्ञा पुं० [अ० जियारत + फा़० गाह] १. पवित्र स्थान । तीर्थ । २. दरबार । दरगाह । ३. दर्शकों की भीड़ या जमधट ।

जियारती
वि० [अ० जियारत + फ्रा० ई (प्रत्य०)] १. दर्शक । २. तीर्थयात्री ।

जियारा †
संज्ञा पुं० [हिं०] १. जिलाना । जीवित रखना । पालना पोसना । २. आहार । चारा । ३. जीविका । ४. साहस । हिसाव । क्रि० प्र०—डालना ।—देना ।

जियारी पु †
संज्ञा स्त्री० [?] १. जीवन । जिंदगी । उ०—उनको लै मान जियो याही में अमान भयो दयो जो पै जाइ तौ ही तौं जियारी है ।—प्रिया० (शब्द०) । २. जीविका । उ०— राका पति बाँका तिया बसै पुर पंडुर में उर में न चाह नेकु रीति कछु न्यारियै । करीन बीन करि जीविका नवीन करैं, धरै हरि रूप हिये, ताही सो जियारियै ।—प्रिया (शब्द०) । ३. जीवट । हृदय की दृढ़ता । साहस ।

जियास
संज्ञा पुं० [हिं० जी] विश्वास । धैर्य । उ०—सांम कमंधा सांपनौ उर अपनौ जियास ।—रा०, रू०, पृ० २९७ ।

जिरगा
संज्ञा पुं० [फा० जिरगह्] १. झुंड । गरोह । २. मंडली । ३. पठानों की पंचायत (को०) ।

जिरण
संज्ञा पुं० [सं०] जीरा [को०] ।

जिरह (१)
संज्ञा पुं० [अ० जरह] १. हुज्जत । खुचुर । २. फेर फार के प्रश्न जिनसे उत्तरदाता घबड़ा जाय और सच्ची बात छिपा न सके । ऐसी पूछताछ जो किसी से उसकी कही हुई बातों की सत्यता की जाँच के लिये की जाय । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—जिरह काढ़ना या निकालना=खोद बिनोद करना । बहुत अधिक पूछताछ करना । बात में बात निकालना । खुचुर निकालना । ३. वह सूत की डोरी जो बैसर में ऊपर वय के गाँछने के लिये लगी रहती है (जुलाहे) । ४. चीरा । घाव (को०) ।

जिरह (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० जिरह] लोहे की कड़ियों से बना हुआ कवच । वर्म । बकतर । यौ०—जिरहपोश=जो बकतर पहने हो । कवची ।

जिरही (१)
वि० [फा़० जिरही] जो जिरह पहने हो । कवचधारी ।

जिरही (२)
संज्ञा पुं० सौनिक [को०] ।

जिराअत
संज्ञा स्त्री० [अ० जिराअत] खेती । कृषि कर्म । क्रि० प्र०—करना । यौ०—जिराअत पेशा=खेतिहर । किसान । कृषक ।

जिरत †
संज्ञा स्त्री० [अ० जिराअत] दे० 'जिराअत' ।

जिराफ
संज्ञा पुं० [अ० जिराफ़ या जराफ़] घास के मैदानों का एक वन्य पशु । विशेष—यह अफ्रीका तथा दक्षिण अमरीका के घास के मैदानों में झुंड़ों में फिरा करता हैं । इसके पैरों में खुर होते हैं और इसका अगला धड़ पिछले से भारी होता है । गरदन इसकी ऊँट की सी लंबी होती है । यह अठारह फुट ऊँचा होता है । इसमें सिर पर दो छोटे छोटे सींग होते हैं जो रोएँदार चमड़े से ढके रहते हैं । इसकी आँखें सुंदर और उभड़ी होती हैं, जिनसे यह बिना सिर मोड़े पीछे देख सकता है । इसकी नाक की बनावट कुछ ऐसी होती है कि यह जब चाहे उसे बंद कर सकता हैं । जीभ इसकी इतनी लंबी होती है कि यह उसे मुँह से सत्रह इंच बाहर निकाल सकता है । इसकी शरीर पर हिरन के से रोएँ और बड़ी बड़ी चित्तियाँ होती हैं । यह ताड़ों और खजुरों की पत्तियाँ खाता हैं ।

जिरायत †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जिराअत' ।

जिरिया
संज्ञा पुं० [हिं० जीरा] एक प्रकार का धान जो जीरे की तरह पतला और लंबा होता है ।

जिलवा
वि० [अ० जल्वह्] आत्मप्रदर्शन । हावभाव । शोभा । उ०—नरेशों की संमान लालसा पग पग पर अपना जिलवा दिखाती थी ।—काया०, पृ० १७० ।

जिला (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. चमक दमक । ओप । पानी । मुहा०—जिला करना या देना=किसी वस्तु को माँजकर तथा रोगन आदि चढ़ाकर चमकाना । सिकली करना । जैसे,— हथियारों पर जिला देना, तलवार पर जिला देना । यौ०—जिलाकर=सिकलीगर । २. माँजकर तथा रोगन आदि चढ़ाकर चमकाने का कार्य । झलकाने की क्रिया । ओप देने का कार्य ।

जिला (२)
संज्ञा पुं० [अ० जिलअ] १. प्रांत । प्रदेश । २. भारतवर्ष में किसी प्रांत का वह भाग जो एक कलक्टर या डिप्टी कमिश्नर के प्रबंध में हो । ३. किसी इलाके का छोटा विभाग या अंश । यौ०—जिलादार । ४. किसी जमींदार के इलाके के बीच बना हुआ वह मकान जिसमें वह या उसके आदमी तहसील वसूल आदि के लिये ठहरते हों ।

जिला जज
संज्ञा पुं० [अ० जिलअ + अं० जज] जिले का प्रधान न्यायाधीश । जिलाधीश ।

जिलाट
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक बाजा जिसपर चमड़ा मढ़ा होता था और जो थाप से बजाया जाता था ।

जिलादार
संज्ञा पुं० [अ० जिलअ + फा़० दार (प्रत्य०)] १. सरबराहकार । सजावल । २. वह अफसर जिसे जमींदार अपने इलाके के किसी भाग में लगान वसूल करने के लिये नियत करता है । ३. वह छोटा अफसर जो नहर, अफीम आदि संबंधी किसी हलके में काम करने के लिये नियत हो ।

जिलादरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जिलादार + ई (प्रत्य०)] जिलेदार का काम या पद ।

जिलाधीश
संज्ञा पुं० [अं० जिलअ + सं० अधीश] दे० 'जिला मैजिस्ट्रेट' ।

जिलाना
क्रि० स० [हिं० जीना का सक रूप] १. जीवन देना । जी डालना । जिंदा करना । जीवित करना । जैसे, मुर्दा जिलाना । २. पालना । पोसना । जैसे, तोता जिलाना, कुत्ता जिलाना । विशेष—इस क्रिया का प्रयोग प्रायः ऐसे ही पशुओं या जीवों के लिये होता है जिनसे मनुष्य कोई काम नहीं लेता, केवल मनोरंजन के लिये पालता है । जैसे,—कुत्ता, बिल्ला, तोता शेर आदि । घोड़े, हाथी, ऊँट, गाय, बैल आदि के लिये इसका प्रयोग नहीं होता । ३. मरने से बचाना । मरने न देना । प्राणरक्षा करना । जैसे,— सरकार ने अकाल में लाखों आदमियों को जिला लिया । ४. धातु के भस्म को फिर धातु के रूप में लाना । मुर्छित धातु को पुनः जीवित करना ।

जीला बोर्ड
संज्ञा पुं० [अ० जिला + अं० बोर्ड] किसी जिले के करदाताओं के प्रतिनिधियों की वह सभा जिसका काम अपने अधीनस्थ ग्रामबोर्डों की सहायता से गाँवों की सड़कों की मरम्मत कराना, स्कूल और चिकित्सालय चलाना, चेचक के टीके और स्वास्थ्योन्नति का प्रबंध आदि करना है । विशेष—म्युनिसपैलिटी के समान ही जिलाबोर्ड के सदस्यों का भी हर तीसरे साल चुनाव होता है ।

जिला मैजिस्ट्रेट
संज्ञा पुं० [अ० + अं०] जिले के बड़ा हाकिम जो फौजदारी मामलों का फैसला करता है । जिला हाकिम । विशेष—हिंदुस्तान में जिले का कलक्टर और मैजिस्ट्रेट एक ही मनुष्य होता है जो अपने दो दो पदों के कारण दो नामों से पुकारा जाता है । मालगुजारी संबंधी कार्यों का अध्यक्ष (प्रधान) होने से कलक्टर और फौजदारी मामलों का फैसला करने के कारण वह मैजिस्ट्रेट कहलाता है ।

जिलासाज
संज्ञा पुं० [अ० जिला + फा़० साज] सिकलीगर । हथियारों पर ओप चढ़ानेवाला ।

जिलाह पु
संज्ञा पुं० [अ० जल्लाद?] अत्याचारी । उ०—ज्वाला की जलूसन, जलाक जंग जालन की, जोर की जमा है जोम जुलुम जिलाहे की ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २२८ ।

जिलिबदार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जिलेदार' । उ०—अर्जी लिखी फौजदार ले पौंचे जिलिबदार । जाके देव दरबार चोपदार के कहिने ।—दक्खनी०, पृ० ४६ ।

जिलेदार
संज्ञा पुं० [हिं० जिलादार] दे० 'जिलादार' ।

जिलेबी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जलेबी] दे० 'जलेबी' ।

जिलो पु
संज्ञा पुं०? अनुचर । उ०—अथा बादशाहओं बड़ा नामदार । जिलो में चले उसके कई ताजदार ।—दक्खिनी०, पृ० १९८ ।

जिल्द
संज्ञा स्त्री० [अ०] [वि० जिल्दी] १. खाल । चमड़ा । खलड़ी । २. ऊपर का चमड़ा । त्वचा । जैसे, जिल्द की बीमारी । ३. वह पट्ठा या दफ्ती जो किसी किताब की सिलाई जुजबंदी आदि करके उसके ऊपर उसकी रक्षा की लिये लगाई जाती है । क्रि० प्र०—बनाना ।—बाँधना । यौ०—जिल्दबंद । जिल्दसाज । ४. पुस्तक की एक प्रति । विशेष—इस शब्द का प्रयोग उस समय होता है जब पुस्तकों का ग्रहण संख्या के अनुसार होता है । जैसे,—दस जिल्द पद्मावत, एक जिल्द रामायण । ५. किसी पुस्तक का वह भाग जो पृथक् सिला हो । भाग । खंड । जैसे,—दादूदयाल की बानी दो जिल्दों में छपी हैं ।

जिल्दगर
संज्ञा पुं० [अ० जिल्द + फा़० गर (प्रत्य०)] जिल्दबंद ।

जिल्दबंद
संज्ञा पुं० [अ० जिल्द + फा़० बंद (प्रत्य०)] वह जो कितोबों की जिल्द बाँधता हो । जिल्द बाँधनेवाला ।

जिल्दबंदी
संज्ञा स्त्री० [अ० जिल्द + फा़० बंदी (प्रत्य०)] पुस्तकों की जिल्द बाँधने का काम । जिल्द साजी ।

जिल्दसाज
संज्ञा पुं० [अ० जिल्द + फा़० साज (प्रत्य०)] संज्ञा जिल्दसाजी] जिल्दबंद । जिल्द बाँधनेवाला ।

जिल्दसाजी
संज्ञा स्त्री० [अ० जिल्द + फा़० साजी (प्रत्य०)] जिल्दबंदी । किताबों पर जिल्द बाँधने का काम ।

जिल्दी
वि० [अ० जिल्द + फा़० ई (प्रत्य०)] त्वक संबंधी । त्वचा या चमड़े से संबंध रखनेवाला । जैसे, जिल्दी बीमारी ।

जिल्लत
संज्ञा स्त्री० [अ० जिल्लत] १. अनादर । अपमान । तिरस्कार । बेइज्जती । मुहा०—जिल्लात उठाना=१. अपमानित होना । २. तुच्छ होना । हेठा ठहरना । जिल्लत देना=(१) अपमानित करना । (२) लज्जित करना । हतक करना । हेठा ठहरना । जिल्लत पाना=अपमानित होना । २. दुर्गति । दुर्दशा । हीन दशा । जैसे, जिल्लत में पड़ना या फँसना ।

जिल्ली
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बाँस । विशेष—यह आसाम में होता है और घर की छाजन आदि में लगता है ।

जिल्वा
संज्ञा पुं० [अ० जल्वह्] दे० 'जल्पा' । उ०—एक दिन ऐसा—* आवेगा जब तमाम दुनिया में ईमान का जिल्वा होगा ।— भा० ग्रं०, भा०१, पृ० ५२९ ।

जिल्होर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो अगहन में काटा जाता है ।

जिव †
संज्ञा पुं० [सं० जीव] दे० 'जीव' ।

जिवड़ा पु
संज्ञा पुं० [सं० जीत्र + ड़ा (प्रत्य०)] दे० 'जीव' । उ०—ऐशा जिवड़ा न मिलाए जो फरक विछोर ।—कबीर मं०, पृ० ३२५ ।

जिवमार पु
वि० [हिं० जीव + मार] जान मारनेवाला । उ०— जल नहिं, थल नहिं, जीव और सृष्टि नहिं, काल जिवमार नहिं संसय सताय ।—कबीर रे०, पृ० ३३ ।

जवरिया पु
संज्ञा स्त्री० दे० 'जेवरी' । उ०—आदि अंत जौ कोउ न पावै । तनक जिवरिया कित फिरि आवै ।—नंद०, ग्रं०, पृ० २५० ।

जिवाँना
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० १. 'जिमना' । २. 'जिवाना' ।

जिवाजिव
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर पक्षी ।

जिवाना पु †
क्रि० स० [हिं० जीव (= जीवन)] जोवित करना । जिलाना । उ०—इहिं काँटै मो पाइ गड़ि लीनी मरति जिवाइ । प्रीति जनावति भीति सौं मीत जु काटयौ आइ ।—बिहारी र०, दो०६०५ ।

जिवारी पु
वि० [हिं० जिव] जिलानेवाली । उ०—सोभा समूह भई घनआनँद मुरति अंग अनंग जिवारी ।—घनानंद, पृ० १०६ ।

जिवाला पु
संज्ञा पुं० [मरा० जिवाला] जीवन । उ०—जिव का बी ओ जिवाला रूपों में रूप आला । सबके ऊपर है बाला नित हसत रस तू 'मीराँ' ।—दक्खिनी, पृ० ११० ।

जिवावना
क्रि० स० [जिवाना?] जिलाना । जियाना । उ०— आनंदघन अघ ओघबहावन सुदृस्टि जिवावन बेद भरत है मामी ।—घनानंद, पृ० ४१८ ।

जिवैया
वि० [हिं०] जीमनेवाला । खानेवाले । उ०—तुम्हारे सिंवाय और कोई जिवैया नहीं बैठा है ।—मान भा०, ५, पृ० २७ ।

जिष्ट पु
वि० [सं० ज्येष्ठ] दे० 'ज्येष्ठ' । उ०—ब्रंन अभूत सु उन्नत जिष्टं । वंदन भर कि बद्ध मनु पिष्टं ।—पृ० रा०, १ । २५७ ।

जिष्णु (१)
वि० [सं०] जीतनेवाला । विजय प्राप्त करनेवाला । विजयी ।

जिष्णु (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु । २. इंद्र । ३. अर्जुन । ४. सूर्य । ५. वस्तु ।

जिस (१)
वि० [सं० यस्य, प्रा० जस्स, हिं० जिस] 'जो' का वह रूप जो उसे विभक्तियुक्त विशेष्य के साथ आने से प्राप्त होता है । जैसे, जिस पुरुष ने, जिस लड़के को, जिस छड़ी से । जिस घोड़े पर, जिस घर में, इत्यादि ।

जिस (२)
सर्व० 'जो' का वह अंगरूप, विकारीरूप जो उसे विभक्ति लगने के पहले प्राप्त होता है । जैसे, जिसने, जिसको, जिससे, जिसका, जिस पर, जिनमें' ।विशेष—संबंध पूरा करने के लिये 'जिस' के पीछे 'उस' का प्रयोग होता है । जैसे,—जिसको देगे उससे लेंगे । पहले 'उस' के स्थान पर 'तिस' का प्रयोग होता था ।

जिसउ पु
वि० [देश०] जैसा । उ०—साल्ह कुँवर सुरपति जिमउ, रूपे अधिक अनूप । साखाँ बगसइ माँगया, लाख भँणा सिर भूप ।—ढोला०, दू० ९३ ।

जिसनू पु
संज्ञा पुं० [सं० जिष्णु] दे० 'जिष्णु'—३ । उ०—अहै भिर्कुटी धनुक समानू । है बरुनी जिसनू कै बानू ।—इंद्रा०, पृ० ९० ।

जिसा पु †
वि० [हिं०] दे० 'जैसा' । उ०—मोकु दोस न दीज्यौ कोई, जिसा करम भुगताऊँ सोई ।—रमानंद०, पृ० २९ ।

जिसिम
संज्ञा पुं० [अ० जिस्म] दे० 'जिस्म' ।

जिसौह पु
क्रि० वि, वि० [हिं० जिसउ] जैसा । उ०—नृपिंह विराजत सिंह जिसौह । विभीषन भा कयमास जिसौह ।—पृ० रा०, ५ । ३६ ।

जिस्का
वि० [हिं०] जिसका । दे० 'जिस' । उ०—उन्होंने ऐसा प्रेम लगाया जिस्का पारावार नहीं ।—श्यामा०, पृ० १२१ । विशेष—पुराने लेखक 'जिसका' को इसी प्रकार लिखते थे ।

जिस्ता (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जस्ता] दे० 'जस्ता' ।

जिस्ता (२)
सइम पुं० [हिं० दस्ता] दे० 'दस्ता' ।

जिस्म
संज्ञा पुं० [अ०] शरीर । देह ।

जिस्मानी
वि० [अ०] शरीर संबंधी । शारीरिक [को०] ।

जिस्मी
वि० [अ० जिस्म + फा़० ई (प्रत्य०)] दे० 'जिस्मानी' [को०] ।

जिह (१)
संज्ञा स्त्री० [फा० जद, सं०, ज्या] चिल्ला । रोदा । ज्या । धनुष की प्रत्यंचा । उ०—तिय कित कमनैती पढ़ी बिन जिह भौंह कमान ! चित चल बेझे चुकति नहिं बंक बिलोकनि बान ।—बिहारी (शब्द०) ।

जिह पु (२)
सर्व० [हिं०] दे० 'जिस' ।

जिहन
संज्ञा पुं० [अ० जिह्न] समझ । बुद्धि । धारण । मुहा०—जिहन खुलना = बुद्धि का विकास होना । जिहन लड़ना = बुद्धि का काम करना । बुद्धि पहुँचना । जिहन लड़ाना = सोचना । बुद्धि दौड़ना । ऊहापोह करना ।

जिहाज पु
संज्ञा पुं० [हिं० जहाज] मरुभूमि का जहाज अर्थात् ऊँट । उ०—ऊमर बिच छेती घणी, घाते गयउ जिहाज । चारण ढोलइ साँमुहउ, आइ कियउ सुमराज ।—ढोला०, दु० ६४३ ।

जिहाद्
संज्ञा पुं० [अ०] [वि० जिहादी] १. धर्म के लिये युद्ध । मजहबी लड़ाई । धार्मिक युद्ध । २. वह लड़ाई जो मुसलमान लोग अन्य धर्मावलंबियों से अपने धर्म के प्रचार आदि के लिये करते थे । मुहा०—जिहाद का झंडा = वह पताका जो मुसलमान लोग भिन्न धर्मवालों से युद्ध करने के लिये लेकर चलते थे । जिहाद का झंडा खड़ा करना = मजहब के नाम पर लड़ाई छेड़ना ।

जिहान पु (१)
संज्ञा स्त्री० [फ्रा० जहान] संसार । जहान । उ०—मेक सयत संमपत्त मै, पैंतीसै जसराज । मै हरिधाम जिहान तज, हिंदुसथान जिहान ।—रा० रू०, पृ० १७ ।

जिहान (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जाना । गमन । २. पाना । प्राप्त करना [को०] ।

जिहानक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रलय [को०] ।

जिहालत
संज्ञा स्त्री० [अ० जहालत] मूर्खता । अज्ञानता ।

जिहासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] त्याग करने की इच्छा ।

जिहासु
वि० [सं०] त्याग करने की इच्छा करनेवाला ।

जिहीर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरने की इच्छा । लेने की इच्छा । हरण करने की कामना ।

जिहीर्षु
वि० [सं०] हरण करने की इच्छा रखनेवाला ।

जिहेज
संज्ञा पुं० [अ० जिहेज] दे० 'जहेज' [को०] ।

जिह्म (१)
वि० [सं०] १. वक्र । टेढ़ । २. दुष्ट । क्रूर प्रकृतिवाला । ३. कुटिल । कपटी । ४. अप्रसन्न । खिन्न । ५. मंद । ६. पीला । पीतवर्ण का (को०) ।

जिह्म (२)
संज्ञा पुं० १. तगर का फूल । २. अधर्म । ३. कपट (को०) । ४. बेईमानी । मिथ्यात्व (को०) ।

जिह्मग (१)
वि० [सं०] १. कुटिल गतिवाला । टेढ़ी चाल चलनेवाला । २. मंद गति । धीमा । ३. कुटिल । कपटी । चालबाज ।

जिह्मग (२)
संज्ञा पुं० साँप ।

जिह्मगति (१)
वि० [सं०] टेढ़ा मेढ़ा चलनेवाला [को०] ।

जिह्मगति
संज्ञा पुं० साँप [को०] ।

जिह्मगामी
वि० [सं० जिह्मगामिन्] [वि० स्त्री० जिह्मगामिनी] १. टेढ़ा चलनेवाला । २. कुटिल । कपटी । चालबाज । ३. मंदगामी । सुस्त । धीमा ।

जिह्मता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. टेढ़ापन । वक्रता । २. मंदता । धीमापन । ३. कुटिलता । कपट । चालबाजी ।

जिह्ममेहन
संज्ञा पुं० [सं०] मेढक ।

जिह्मयोधी (१)
वि० [सं० जिह्मयोधिन्] कपट युद्ध करनेवाला [को०] ।

जिह्मयोधी (२)
संज्ञा पुं० भीम [को०] ।

जिद्मशल्य
संज्ञा पुं० [सं०] खैर । खदिर । कत्था ।

जिह्मात्क्ष
वि० [सं०] ऐंचा ताना [को०] ।

जिह्मित
वि० [सं०] घूमा हुआ । फिरा हुआ । चकित । विस्मित ।

जिह्मीकृत
वि० [सं०] झुकाया हुआ । टेढ़ा किया हुआ ।

जिह्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिह्वा । विशेष—इसका प्रयोग समस्त पदों में मिलता है । जैसे, द्विजिह्व । २. तगरमूल (को०) ।

जिह्वक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सन्निपात जिसमें जीभ में काँटे पड़ जाते हैं, रोगी से स्पष्ट बोला नहीं जाता, जीभ लड़खड़ाती है । विशेष—इसकी अवधि १६ दिन की है । इसमें श्वास कास आदिभी हो जाते हैं । इस रोग में रोगी प्रायः गूँगे या बहरे हो जाते हैं ।

जिह्वल
वि० [सं०] जिभला । चट्ट । चटोरा ।

जिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जीभ । २. आग की लपट (को०) । ३. वाक्य (को०) ।

जिह्वाग्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] जीभ की नोक । टूँड़ । मुहा०—जिह्वाग्र फरना = कंठस्थ करना । जबानी याद करना । किसी विषय को इस प्रकार रटना या घोखना कि उसे जब चाहे तब कह डाले । जिह्वाग्र होना = जबानी याद होना ।

जिह्वाग्र (२)
वि० याद रखनेवाला या वाली (चीज या ग्रंथ) ।

जिह्वाच्छेद
संज्ञा पुं० [सं०] जीभ काटने का दंड । विशेष—जो लोग माता, पिता, पुत्र, भाई, आचार्य या तपास्वियों आदि को गाली देते थे उनको यही दंड दिया जाता था ।

जिह्वाजय
संज्ञा पुं० [सं०] तंत्रानुसार एक प्रकार का जप जिसमें जिह्वा हिलने का विधान है ।

जिह्वानिर्लेखन
संज्ञा पुं० [सं०] जीमी [को०] ।

जिह्वानिर्लेखनिक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'जिह्वानिर्लेखन' ।

जिह्वाय
संज्ञा पुं० [सं०] वे पशु जो जीभ से पानी पिया करते हैं । जैसे, कुत्ते, बिल्ली, सिंह आदि ।

जिह्वामल
संज्ञा पुं० [सं०] जीभ पर बैठा हुआ मैल [को०] ।

जिह्वामूल
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० जिह्वामूलीय] जीभ की जड़ या पिछला स्थान ।

जिह्वामूलीय (१)
वि० [सं०] जो जिह्वा के मूल से संबंध रखता हो ।

जिह्वामूलीय (२)
संज्ञा पुं० वह वर्ण जिसका उच्चारण जिह्वामूल से हो । विशेष—शिक्षा के अनुसार ऐसे वर्ण अयोगवाह होते हैं और वे संज्ञा में दो हैं/?/क और/?/ख । क और ख के पहले विसर्ग आने से जिह्वामूलीय हो जातै हैं । कोई कोई वैयाकरण कवर्ग मात्र को जिह्वामूलीय मानते हैं ।

जिह्वारद्
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी ।

जिह्वारोग
संज्ञा पुं० [सं०] जीभ का रोग । विशेष—सुश्रुत के मत से यह पाँच प्रकार का होता है । तीन प्रकार के कंटक जो वात, पित्त और कफ के प्रकोप से जीभ पर पड़ जाते हैं, चौथा अलास जिसमें जिह्वा के नीचे सूजन हो जानी है और पाँचवाँ उपजिह्विका जिसमें जिह्वा के मूल में सूजन हो जाती है और टपकती हैं । इन पाँचों में अलास असाध्य है । इसमें जीभ के तले की सूजन बढ़कर पक जाती है ।

जिह्वालिह
संज्ञा पुं० [सं०] कुत्ता ।

जिह्वालौल्य
संज्ञा पुं० [सं०] चटौरापन । स्वादलोललुपता [को०] ।

जिह्वाशल्य
संज्ञा पुं० [सं०] खदिर । खैर का पेड़ । कत्था ।

जिह्वास्तंभ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का जिह्वारोग जिसमें वायु स्वरवाहिनी नाड़ियों में प्रवेश करके उन्हें स्तंभित कर देता है ।—माधव, पृ० १४२ ।

जिह्विका
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीभी ।

जिह्वोल्लेखनिका, जिह्वोल्लेखनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीभी [को०] ।

जींगन †
संज्ञा पुं० [सं० जृगण] खद्योत । जुगनू । उ०—बिरह जरी लखि जींगननि कही सुबह कै बार । अरी आउ उठि भीतरै बरसति आज अँगार ।—बिहारी (शब्द०) ।

जी
संज्ञा पुं० [सं० जीव] १. मन । दील । तबीयत । चित्त । उ०—(क) कहत नसाइ होइ हिअ नीकी । रीझत राम जानि जन जीकी । मानस, १ ।२८ । २. हिम्मत । दम । जीवट । ३. संकल्प । विचार । इच्छा । चाह । मुहा०—जी अच्छा होना=चित्त स्वस्थ होना । रोग आदि की पीड़ा या बेचैनी न रहना । नीरोग होना । जैसे,—दो तीन दिन तक बुखार रहा, आज जी अच्छा है । किसी पर जी आना=किसी से प्रेम होना । हृदय का किसी के प्रेम में अनुरक्त होना । जी उकताना=चित्त का उचाट होना । चित्त न लगना । एक ही अवस्था में बहुत काल तक रहते रहते परिवर्तन के लिये चित्त व्यग्र होना । तबीयत घबराना । जैसे,—तुम्हारी बातें सुनते सुनते तो जी उकता गया । जी उचटना=चित्त न लगना । चित्त का प्रवृत्त न होना । मन हटना । किसी कार्य, वस्तु या स्थान आदि से विरक्ति होना । जैसे,—अब तो इस काम से मेरा जी उचट गया । जी उठना=दे० 'जी उचटना' । जी उठना=चित्त हटाना । मन फेर लेना । विरक्त होना । अनुरक्त न रहना । जी उड़ जाना=भय, आशंका आदि से चित्त सहसा व्यग्र हो जाना । चित्त चंचल हो जाना । धैर्य जाता रहना । जी में घबराहट होना । जैसे,—उसकी बीमारी का हाल सुनते ही मेरा तो जी उड़ गया । जी उदास होना=चित्त खिन्न होना । जी उलट जाना=(१) मन का वश में न रहना । चित्त चंचल और अव्यवस्थित हो जाना । चित्त विंक्षिप्त हो जाना । होश हवास जाता रहना । (२) मन फिर जाना चित्त विरक्त होना । जी करना=(१) हिम्मत करना । हौसला करना । साहस करना (२) जी चाहना । इच्छा होना । जैसे,—अब तो जी करता हैं कि यहाँ से चल दें । जी काँपना= भय आशंका आदि से कलेजा धक धक करना । हृदय थर्राना । डर लगना । जैसे,—वहाँ जाने का नाम सुनते ही जी काँपता है । जी का बुखार निकालना=हृदय का उद्वेग बाहर करना । क्रोध, शोक, दुःख आदि के वेग को रोग कलपकर या बक झककर शांत करना । ऐसे क्रोध या दुःख को शब्दों द्वारा प्रकट करना जो बहुत दिनो से चित्त को संपन्न करता रहा हो । जी का बोझ या भार का हलका होना=ऐसी बात को दूर होना जिसकी चिंता चित्त में बराबर रहती आई हो । खटका मिटना । चिंता दूर होना । जी का अमान माँगना=प्राण रक्षा की प्रतिज्ञा की प्रार्थना करना । किसी काम के करने या किसी बात के कहने के पहले उस मनुष्य से प्राणरक्षा करने या अपराध क्षमा करने की प्रार्थना करना जिसके विषय में यह निश्चय हो कि उसे उस काम के होने या उस बात को सुनने से अवश्य दुःख पहुँचेगा । जैसे,—यदि किसी राजा से कोई अप्रिय बात करनी हुई तो लोग पहले यह कह लेते हैं कि 'जी का अमान पाऊँ तो कहुँ' । जी का आ लगना=प्राणों पर आबनना । प्राण बचना कठिन हो जाना । ऐसी भारी झंझट या संकट में फँस जाना कि पीछा छुड़ाना कठिन हो जाय । जी की निकलना=(१) मन की उमंग पूरी करना । दिल की हवस निकलना । मनोरथ पूरा करना । (२) हृदय का उदगार निकालना । क्रोध, दुःख, द्वेष आदि उद्वेग को बक झक कर शांत करना । बदला लेने की इच्छा पूरी करना । जी का जी में रहना = मनोरथों का पूरा न होना । मन में ठानी, सोची या चाही हुई बातों का न होना । जी की पड़ना=प्राण बचाने की चिंता होना । प्राण बचाना कठिन हो जाना । ऐसे भारी झंझट या संकट में फँस जाना कि पीछा छुड़ाना कठिन हो जाय । उ०—सब असबाब दाढ़ो मैं न काढ़ो तै न काढ़ो तैन काढ़ो जिय की परी सभारै सहन भंडार को ।—तुलसी (शब्द०) । जी का=जीवटवाला । जिगरेवाला । साहसी । हिम्मतवार । दमदार । उ०—धनी धरनी के नीके आपुनी अनी के संग आवैं जुरि जी के मो नजीके गरजी के सों ।—गोपाल (शब्द०) । (किसी के) जी को समझना = किसी की विषय में यह समझना कि वह भी जीव है, उसे भी कष्ट होगा । दूसरे के कष्ट को समझना । दूसरे को क्लेश न पहुँचाना । दूसरे पर दया करना । जी को मारना=(१) मन की इच्छाओं को रोकना । चित्त के उत्साहों को न पूरा करना । (२) संतोष धारण करना । जी को न लगना = (१) चित्त में अनुभव होना । हृदय में वेदना होना । सहानुभूति होना । जैसे,—दूसरों की पीड़ा आदि किसी के जी को नहीं लगती । (२) प्रिय लगना । भाना । अच्छा लगना । जी खट- कना = (१) चित्त में खटका या संदेह उत्पन्न होना । (२) हानि आदि की आशंका से (किसी काम के करने से) जी हिचकना । (किसी से या किसी के ओर से) जी खट्टा करना = मन फेर देना । चित्त में घृणा या विरक्ति उत्पन्न कर देना । चित्त विरक्त करना । हृदय में दुर्भाव उत्पन्न करना । जैसे,—तुम्हीं ने मेरी ओर से उनका जी खट्टा कर दिया है । (किसी से या किसी ओर से) जी खट्टा होना = चित्त हट जाना । मन फिर जाना या विरक्त होना । अनुराग न रहना । घृणा होना । जैसे,—उसी एक बात से उनकी ओर से मेरा जी खट्टा हो गया । जी खपाना = (१) चित्त तन्मय करना । (किसी काम में) जी लगाना । नितांत दत्त- चित्त होना । जी तोडकर किसी काम में लग जाना । (२) प्राण देना । अत्यंत कष्ट उठाना । जी खुलना = संकोच छूट जाना । धडक खुल जाना । किसी काम के करने में हिंचक न रह जाना । जी खोलकर = (१) बिना किसी संकोच के । बिना किसी प्रकार के भय या लज्जा के । बिना हिचके । बेधड़क । जैसे,—जो कृछ तुम्हें कहना हो, जी खोलकर कहो । (२) जितना जी चाहे । बिना अपनी ओर से कोई कमी किए । मनमाना । यथेष्ट । जैसे,—तुम हमें जी खोलकर गालियाँ दो, चिंता नहीं । जी गवाँना = प्राण देना । जान खोना । जी गिरा जाना = जी बैठा जाना । तबीयत सुस्त होती जाना । शिशिल- ता आती जाना । जी घबराना = (१) चित्त व्याकुल होना । मन व्यग्र होना । (२) मन न लगना । जी ऊबना । जी चलना = (१) जी चाहना । इच्छा होना । (२) जी आना । चित्त मोहित होना । जी चला = (१) वीर । दिलेर । बहादुर । शूर । शूरमा । (२) दानवीर । दाता । दानी । उदार । दान- शूर । (३) रसिक । सहृदय । जी चलाना = (१) इच्छा करना । मन दौड़ाना । चाह करना । (२) हिम्मत बाँधना । साहस करना । हौसला बढ़ाना । जी चाहना = मनोभिलाष होना । मन चलना । इच्छा होना । जी चाहे = यदि इच्छा हो । यदि मन में आवे । जी चुराना = किसी काम या बात से बचने के लिये हीला हवाली करना या युक्ति रचना । किसी काम से भागना । जैसे,—यह नौकर काम से जी चुराता है । जी छुपाना = (१) दे० 'जी चुराना' । जी छूटना = (१) हृदय की दृढ़ता न रहना । साहस दूर होना । ना उम्मेदी होना । उत्साह जाता रहना । (२) थकावट आना । शिथिलता आना । जी छोटा करना = (१) हृदय का उत्साह कम करना । (२) हृदय संकुचित करना । मन उदास करना । दान देने का साहस कम करना । उदारता छोड़ना । कंजूसी करना । जी छोड़ना = (१) प्राण त्याग करना । (२) हृदय का दृढ़ता खोना । साहस गँवाना । हिम्मत हारना । जी छोड़कर भागना = हिम्मत हारकर बडे़ बेग से भागना । एकदम भागना । ऐसा भागना कि दम लेने के लिये भी न ठहरना । जी जलना = (१) चित्त संतप्त होना । हृदय में संताप होना । चित्त में कुढ़न और दुःख होना । क्रोध आना । गुस्सा लगना (१) ईर्ष्या होना । डाह होना । जी जलाना = (१) चित्त संतप्त करना । हृदय में क्रोध उत्पन्न करना । कुढ़ाना । चिढ़ाना । (२) हृदय में दुःख उत्पन्न करना । रंज पहुँचाना । दुःखी करना । चित्त व्यथित करना । सताना (३) ईर्ष्या या डाह उत्पन्न करना । जी जानता है = हृदय ही अनुभव करता है, कहा नहीं जा सकता । सही हुई कठिनाई, दुःख या पीड़ा वर्णन के बाहर है । जैसे,—(क) मार्ग में जो जो कष्च हुए कि उसे जी ही जानता होगा । ('जी जानना होगा' भी बोला जाता है ।) जी जान से लगना = हृदय में प्रवृत्त होना । सारा ध्यान लगा देना । एकाग्र चित्त होकर तत्पर होना । जैसे,—वह जी जान से इस काम में लगा है । किसी को जी जान से लगी है = कोई हृदय से तत्पर है । किसी की घोर इच्छा या प्रयत्न है । कोई सारा ध्यान लगाकर उद्यत है । कोई बराबर इसी चिंता और उद्योग में है । जैसे,— उसे जी जान से लगी है कि मकान बन जाय । जी जान लड़ाना = मन लगाना । दत्त चित्त होना । जी जुगोना = (१) किसी तरह प्राणरक्षा करना । कठिनाई से दिन बिताना । जैसे, तैसे दिन काटना । (२) बचना । अलग रहना । तटस्थ रहना या होना । जी जोड़ना = (१) हिम्मत बाँधना या करना । (२) तैयार होना । उद्यत होना । जी टँगा रहना या होना = चित्त में ध्यान या चिंता रहना । जी में खटका बना रहना । चित्त चिंतित रहना । जैसे,—(क) जब तक तुम नहीं आओगे, मेरा जी टँगा रहेगा । (ख) उसका कोई पत्र नहीं आया, जी टँगा है । जी टूट जाना = उत्साह भंगहो जाना । उमंग या हौसला न रह जाना । नैराश्य होना । उदासीनता होना । जैसे,—उनकी बातों से हमारा जी टूट गया, अब कुछ न करेंगे । जी ठंढा होना = (१) चित्त शांत और संतुष्ट होना । अभिलाषा पूरी होने से हृदय प्रफुल्लित होना । चित्त में संतोष और प्रसन्नता होना । जैसे,—वह यहाँ से निकाल दिया गया; अब तो तुम्हारा जी ठंढा हुआ ? जी ठुकना = (१) मन को संतोष होना । चित्त स्थिर होना । (२) चित्त में दृढ़ता होना । साहस होना । हिम्मत बँधना । दे० 'छाती ठुकना' । जी डरना = शंका या आशंका होना । भय होना । जी डालना = (१) शरीर में प्राण डालना । जीवित करना (२) प्राणरक्षा करना । मरने से बचाना । (३) हृदय मिलाना । प्रेम करना (४) उत्साहित करना । बढ़ावा देना । जी डूबना = (१) बेहोशी होना । मूर्छा आना । चित्त विह्वल होना । (२) चित्त स्थिर न रहना । घबराहट और बेचैनी होना । चित्त व्याकुल होना । जी डोलना = (१) विचलित होना । चंचल होना । (२) लुब्ध होना । अनुरक्त होना । (३) मन न करना । न चाहना । जी ढहा जाना = दे० 'जी बैठा जाना' । जी तपना = चित्त क्रोध से संतप्त होना । जी जलना । क्रोध चढ़ना । उ०—सुनि गज जूह अधिक जिउ तपा । सिंह जात कहुँ रह नहिं छपा ।—जायसी (शब्द०) । जी तरसना = किसी वस्तु या बात के अभाव से चित्त ब्याकुल होना । किसी वस्तु की प्राप्ति के लिये चित्त अधीर या दुःखी होना । किसी बात की इच्छा पूरी न होने का कष्ट होना । जैसे,—(क) तुम्हारे दर्शन के लिये जी तरसता था । (ख) जब तक बंगाल में थे, रोटी के लिये जी तरस गया । जी तोड़ काम, परिश्रम या मिहनत करना = जान की बाजी लगाकर किसी काम को करना । जी तोड़ना = (१) दिल तोड़ना । निराश करना । हतोत्साह करना । (२) पूरी शक्ति से काम करना । काम करने में कुछ भी न उठा रखना । जी दह- लना = भय या आशंका से चित्त डाँवाडोल होना । डर से हृदय काँपना । डर के मारे जी ठिकाने न रहना । अत्यंत भय लगना । जी—दान = प्राण दान । प्राण रक्षा । जी दार = जीवटवाला । दृढ़ हृदय का । साहसी । हिम्मतवर । बहा- दुर । कडे़ दिल का । जी दुखना = चित्त को कष्ट पहुँचना । हृदय में दुःख होना । जैसे,—ऐसी बात क्यों बोलते हो जिससे किसी का जी दुखे । जी दुखाना = चित्त व्यथित करना । हृदय को कष्ट पहुँचाना । दुःख देना । सताना । जैसे,—व्यर्थ किसी का जी दुखाने से क्या लाभ ? जी देना = (१) प्राण खोना । मरना । (२) दूसरे की प्रसन्नता या रक्षा के लिये प्राण देने को प्रस्तुत रहना । (३) प्राण से बढ़कर प्रिय समझना । अत्यंत प्रेम करना । जैसे,—वह तुम पर जो देता है और तुम उससे भागे फिरते हो । जी दौड़ना = मन चलना । इच्छा होना । लालसा होना । जी धँसा जाना = दे० 'जी बैठा जाना' । जी धड़कना = (१) भय या आशंका से चित्त स्थिर न रहना । कलेजा धक धक करना । डर के मारे हृदय में घबराहट होना । डर लगाना । (२) चित्त में दृढ़ता न होना । साहस न पड़ना । हिम्मत न पड़ना । जैसे,—चार पैसे पास से निकालते जी धड़—* कता है । जी धकधक करना = कलेजे का भय आदि के आवेग से जोर जोर से उछलना । जी धड़कना = डर लगना । जी धकधक होना = दे० 'जी धकधक करना' । जी निकलना = (१) प्राण छूटना । प्राण निकलना । मृत्यु होना । (२) चित्त व्याकुल होना । डर लगना । प्राण सूखना । जैसे,— अब तो उधर जाते इसका जी निकलता है । (३) प्राणांत कष्ट होना । कष्टबोध होना । जैसे,—तुम्हारा रुपया तो नहीं जाता है, तुम्हारा क्यों जी निकलता है ? जी निढाल होना = चित्त का स्थिर न रहना । चित्त ठिकाने न रहना । चित्त विह्वल होना । हृदय व्याकुल होना । जी पक जाना = किसी अप्रिय बात को नित्य देखते देखते या सुनते सुनते चित्त दुखी हो जाना । किसी बार बार होनेवाली बात को चित्त को असह्य हो जाना । और अधिक सुनने का साहस चित्त में न रहना । जैसे,—नित्य तुम्हारी जली कटी बातें सुनते सुनते जी पक गया । जी पड़ना = (१) शरीर में प्राण का संचार होना । जैसे,—गर्भ के बालक को जी पड़ना । (२) मृतक के शरीर में प्राण संचार होगा । मरे हुए में जान आना । जी पकड़ लेना = कलेजा थामना । किसी असह्य दुःख के वेग को दबाने के लिये हृदय पर हाथ रख लेना । जी पकड़ा जाना = मन में संदेह पड़ जाना । माथा ठनकना । कोई भारी खटका पैदा हो जाना । चित्त में कोई भारी आशंका उठना । (स्त्रि०) । जैसे,—तार आते ही मेरा तो जी पकड़ा गया । जी पर आ बनना = प्राणों पर आ बनना । प्राण बचाना कठिन हो जाना । ऐसे भारी संकट या झंझट में फँस जाना कि पीछा छुड़ाना कठिन हो जाय । जी पर खेलना = प्राण को संकट में डालना । जान को आफत में डालना । जान पर जोखों उठाना । ऐसा काम करना जिसमें जान जाने का भय हो । जी पानी करना = (१) लहू पानी एक करना । प्राण देने और लेने की नौबत लाना । भारी आपत्ति खड़ी करना । (२) चित्त कोमल या दयार्द्र करना । जी पानी होना = चित्त कोमल या दयार्द्र होना । जी पिघलना = (१) दया से हृदय द्रवित होना । चित्त का दयार्द्र होना । (२) हृदय का प्रेमार्द्र होना । चित्त में स्नेह का संचार होना । जी पीछे पड़ना = दिल बहलाना । चित्त बँटना । मन का किसी ओर बँट जाना जिसमें दुःख की बात कुछ भूल जाय । (स्त्री०) जी फट जाना = हृदय मिला न रहना । चित्त में पहले का सा सदभाव या प्रेमभाव न रह जाना । प्रीति भंग होना । प्रेम में अंतर पड़ जाना । चित्त विरक्त होना । किसी की ओर से चित्त खिन्न हो जाना । जी फीर जाना = मन हट जाना । चित्त विरक्त हो जाना । चित्त अनुरक्त न रहना । हृदय में घृणा या अरुचि उत्पन्न हो जाना । जैसे,—जब किसी ओर से जी फिर जाता है तब फिर वह बात नहीं रह जाती । जी फिसलना = चित्त का किसी की ओर) आकर्षित होना । मन खिंचना । हृदय अनुरक्त होना । मन मोहित होना । मन लुभाना । जी फीका होना = दे० 'जी खट्टा होना' । जी बँटना = (१) चित्त का किसी ओर इस प्रकार लग जाना कि किसी प्रकार कीदुःख या चिंता की बात भूल जाय । जी बहलाना । (२) चित्त का एकाग्र न रहना । चित्त का एक विषय में पूर्ष रूप से न लगा रहना, दूसरी बातों की ओर भी चला जाना । ध्यान स्थिर न रहना । ध्यान भंग होना । मन उचटना । जैसे,—काम करते समय यदि कोई कुछ बोलने लगता है तो जी बँट जाता है । (३) एकांत प्रेम न रहना । एक व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरे व्यक्ति से भी प्रेम हो जाना । अनन्य प्रेम न रहना । जी बंद होना = दे० 'जी फिरना' । जी बढ़ना = (१) चित्त प्रसन्न या उत्साहित होना । हौसला बढ़ना । (२) साहस बढ़ना । हिम्मत आना । जी बढ़ाना = (१) उत्साह बढ़ाना । किसी विषय में प्रवृत्त करने के लिये उत्तेजित करना । प्रशंसा पुरस्कार आदि द्वारा किसी काम में रुचि उत्पन्न करना । हौसला बढ़ाना । जैसे,—लड़कों का जी बढ़ाने के लिये इनाम दिया जाता है । (२) किसी कार्य की सफलता की आशा बँधाकर अधिक उत्साह उत्पन्न करना । किसी कार्य में होनेवाली बाधा या कठिनाई के दूर होने का निश्चय दिलाकर उसकी ओर अधिक प्रवृत्ति उत्पन्न करना । साहस दिलाना । हिम्मत बँधाना । जी बहलना = (१) चित्त का किसी विषय में लगकर आनंद अनुभव करना । चित्त का आनंदपूर्वक लीन होना । मनोरंजन होना । जैसे,—थोड़ी देर तक खेलने से जी बहल जाता है । (२) चित्त के किसी विषय में लग जाने से दुःख या चिंता की बात भूल जाना । जैसे,—मित्रों के यहाँ आ जाने से कुछ जी बहल जाता है नहीं तो दिन रात उस बात का दुःख बना रहता है । जी बहलाना = (१) रुचि के अनुकूल किसी विषय में लगकर आनंद अनुभव करना । मनोरंजन करना । जैसे,—कभी कभी जी बहलाने के लिये ताश भी खेल लेते हैं । (२) चित्त को किसी ओर लगाकर दुःख या चिंता की बात भूल जाना । जी बिखरना = (१) चित्त ठिकाने न रहना । मन विह्वल होना । (२) मूर्छा होना । बेहोशी होना । जी बिगड़ना = (१) जी मचलना । मतली छूटना । कै करने की इच्छा होना । (२) भिटकना । घृणा करना । घिन मालूम होना । जी बुरा करना = कै करना । उलटी करना । वमन करना । (किसी की ओर से) । जी बुरा करना = किसी के प्रति अच्छा भाव न रखना । किसी के प्रति बुरी धारणा रखना । किसी के प्रति घृणा या क्रोध करना । (किसी की ओर से दूसरे का) जी बुरा करना = (१) दूसरे का ख्याल खराब करना । बुरी धारणा उत्पन्न करना । (२) क्रोध, घृणा या दुर्भाव उत्पन्न करना । जी बुरा होना = (१) कै होना । उलटी होना । (२) ख्याल खराब होना । (३) चित्त में दुर्भाव या घृणा उत्पन्न होना । जी बैठ जाना = (१) चित्त विह्वल होता जाना । चित्त ठिकाने न रहना । चैतन्य न रहना । मूर्छा सी आना । जैसे,—आज न जाने क्यों बड़ी कमजोरी जान पड़ती है और जी बैठा जाता है । (२) मन भरना । उदासी होना । जी भिटकना = चित्त में घृणा होना । घिन मालूम होना । जी भरना (क्रि० अ०) = (१) चित्त तुष्ट होना । तुष्टि होना । तृप्ति होना । मन अघाना । और अधिक की इच्छा न रह जाना । जैसे,—(क) अब जी भर गया और न खाएँगे । (ख) तुम्हारी बातों से ही जी भर गया, अब जाते हैं । (व्यंग्य) । (२) मन की अभिलाषा पूरी होने से आनंद और संतोष होना । जैसे,—लो, मैं, आज यहाँ से चला जाता हूँ, अब तो तुम्हारा जी भरा । (३) ऐसे गंदे बरतन में पानी पीते हो, न जाने कैसे तुम्हारा जी भरता है । जी भरकर = जितना और जहाँ तक जी चाहे । मनमाना । यथेष्ट । जैसे,—तुम हमें जी भरकर गालियाँ दो, कोई परवाह नहीं । जी भरना (क्रि० स०) = चित्त विश्वासपूर्ण करना । चित्त से किसी बात की बुराई या धोखा आदि खाने की आशंका दूर करना । खटका मिटाना । इतमीनान करना । दिलजमाई करना । जैसे,—यों तो घोडे़ में कोई ऐब नहीं है पर आप दस आदमियों से पूछकर अपना जी भर लीजिए । जी भर आना = हृदय का करुणा या शोक के आवेग से पूर्ण होना । चित्त में दुःख या करुणा का उद्रेक होना । दुःख या दया उमड़ना । हृदय में इतने दुःख या दया का वेग उठना कि आँखों में आँसू आ जाय । हृदय का करुणा से बिह्वल होना । जी भरभरा उठना = रोमांच होना । हृदय के किसी आकस्मिक आवेग से चित्त का विह्वल हो जाना । (अपना) जी भारी करना = चित्त खिन्न या दुखी करना । जी भारी होना = तबीयत अच्छी न होना । किसी रोग या पीड़ा आदि के कारण सुस्ती जान पड़ना । शरीर अच्छा न रहना । जी भुरभुराना = किसी की ओर चित्त आकर्षित होना । मन लुभाना । मन मोहित होना । जी मचलना = किसी वस्तु या या व्यक्ति की ओर आकृष्ट होना । जी मचलना = दे० 'जी मतलाना' । जी मतलाना = चित्त में उलटी या कै करने की इच्छा होना । वमन करने को जी चाहना । जी मर जाना = मन में उमंग न रह जाना । हृदय का उत्साह नष्ट होना । मन उदास हो जाना । जी मलमलाना = चित्त में दुःख या पछतावा होना । अफसोस होना । जैसे,—गाँठ के चार पैसे निकालते जी मलमलाता है । जी मारना = (१) चित्त की उमंग को रोकना । हृदय का उत्साह नष्ट करना । (२) संतोष धारण करना । सब्र करना । जी मिचलाना = दे० 'जी मतलाना' । (किसी से) जी मिलना = चित्त के भाव का परस्पर समान होना । हृदय का भाव एक होना । समान प्रवृत्ति होना । एक मनुष्य के भावों का दूसरे मनुष्य के भावों के अनुकूल होना । चित्त पटना । जी में आना = (१) मन में भाव उठना । चित्त में विचार उत्पन्न होना । (२) मन में इच्छा होना । जी चाहनाइरादा होना । संकल्प होना । जैसे,—तुम्हारे जो जी में आवे, करो । जी में घर करना = (१) मन में स्थान करना । हृदय में किसी का ध्यान बना रहना । (२) याद रहना । कोई बात या व्यव- हार मन में बराबर रहना । जी में गड़ना या खुभना = (१) चित्त में जम जाना । हृ्दय में गहरा प्रभाव करना । मर्म भेदना । (२) हृदय में अंकित हो जाना । चित्त में ध्यान बना रहना । उ०—माधव मूरति जी में खुभी ।—सूर (शब्द०) । जी में जलना = (१) हृदय में क्रोध के कारण संताप होना । मन में कुढ़ना । मन ही मन ईर्ष्या करना । डाह करना । जी में जी आना = चित्त ठिकाने होना । चित्त की घबराहट दूर होना । चित्त शांत और स्थिर होना । चित्त की चिंता या व्यग्रता दूर होना । किसी बात की आशंका या भय मिट जाना । जैसे,— जब वह उस स्थान से सकुशल लौट आया तब मेरे जी में जी आया । जी में जी डालना = (१) चित्त संतुष्ट और स्थिर करना । चित्त का खटका दूर कराना । चिंता मिटाना । (१) विश्वास दिलाना । इतमीनान करना । दिलजमई कराना । जी में डालना = मन में विचार लाना । सोचना । जैसे,—तुम्हारे साथ कोई बुराई करूँगा ऐसी बात कभी जी में न डालना । जी में धरना = (१) मन में लाना । चित्त में किसी बात का इसलिये ध्यान बनाए रहना जिसमें आगे चलकर कोई उसके अनुसार कार्य करे । ख्याल करना । जी में पैठना = (१) चित्त में जम जाना । हृदय पर गहरा प्रभाव करना । मर्म भेदना । (२) ध्यान में अंकित होना । बराबर ध्यान में बना रहना । चित्त से न हटना या भूलना । जी में बैठना = (१) मन में स्थिर होना । चित्त में निश्चय होना । चित्त में निश्चित धारणा होना । मन में सत्य प्रतीत होना । जैसे,—उन्होंने जो बातें कहीं वे मेरे जी में बैठ गई । (२) हृदय पर गहरा प्रभाव करना । (३) हृदय पर अंकित हो जाना । ध्यान में बराबर बना रहना । जी में रखना = (१) चित्त में विचार धारण करना । ख्याल बनाए रखना जिसमें आगे चलकर उसके अनुसार कोई कार्य करें । (२) मन में बुरा मानना । बैर रखना । द्वेष रखना । कीना रखना । जैसे,—उसे चाहे जो कहो वह कोई बात जी में नहीं रखता । (३) हृदय में गुप्त रखना । हृदय के भाव को बाहर न प्रकट करना । मन में लिए रहना । जैसे,—इस बात को जी में रखो, किसी से कहो मत । (किसी का) जी रखना = (किसी का) मन रखना । किसी के मन की बात होने देना । मन की अभिलाषा पूरी करना । इच्छा पूरी करना । उत्साह भंग न करना । प्रसन्न करना । संतुष्ट करना । जैसे,—जब वह बार बार इसके लिये कहता है तो उसका जी रख दो । जी रुकना = (१) जी घबराना । (२) जी हिचकना । चित्त प्रवृत्त न होना । जी लगना = चित्त तत्पर होना । मन का किसी विषय में योग देना । चित्त प्रवृत्त होना । दत्तचित्त होना । जैसे,—पढ़ने में उसका जी नहीं लगता । (किसी से) जी लगाना = चित्त का प्रेमासक्त होना । किसी से प्रेम होना । जी लगाना = चित्त तत्पर करना । किसी काम में दत्तचित्त बनना । जी लगा रहना या लगा होना = (१) चित्त में ध्यान बना रहना । (२) जी में खटका लगा रहना । चित्त चिंतित रहना या होना । जैसे,—बहुत दिनों से कोई पत्र नहीं आया, जो लगा है । (किसी से) जी लगाना = किसी से प्रेम करना । जी लटना = पस्त होना । हिम्मत टूटना । उ०—इस जगत का जीव वह है ही नहीं । लुट गए धन जी लटा जिसका नहीं ।—चोखे०, पृ० २२ । जी लड़ाना = (१) प्राण जाने की भी परवाह न करके किसी विषय में तत्पर होना । (२) मन का पूर्ण रूय से योग देना । पूरा ध्यान देना । सारा ध्यान लगा देना । जी लरजना = दे० 'जी काँपना' । जी ललचाना = (१) जी में लालच होना । चित्त में किसी बात के लिये प्रबल इच्छा होना । किसी वस्तु की प्राप्ति आदि की गहरी लालसा होना । (२) किसी चीज के पाने के लिये तरसना । जैसे,—वहाँ की सुंदर सुंदर वस्तुओं का देखकर जी ललच गया । (३) चित्त आकर्षित होना । मन लुभाना । मन मोहित होना । जी ललचाना = (१) (क्रि० अ०) दे० 'जी ललचना' । (२) (क्रि० स०) दूसरे के चित्त में लालच उत्पन्न करना । किसी बात के लिये प्रबल इच्छा उत्पन्न करना । किसी वस्तु के लिये जी तरसाना । जैसे,—दूर से दिखाकर क्यों उसका, जी ललचाते हो, देना हो तो दे दो । (३) मन लुभाना । मन मोहित करना । जी लुटना = मन मोहित होना । मन मुग्ध होना । हृदय प्रेमासक्त होना । जी लुभाना = (१) (क्रि० स०) चित्त आकर्षित करना । मन मोहित करना । हृदय में प्रीति उपजाना । सौंदर्य आदि गुणों के द्वारा मन खींचना । (२) (क्रि० अ०) चित्त आकर्षित होना । मन मोहित होना जैसे,—उसे देखते ही जी लुभा जाता है । जी लूटना = मन मोहित करना । जी लेना = जी चाहना । जी करना । चित्त का इच्छुक होना । जैसे,—वहाँ जाने के लिये हमारा जी नहीं लेता । (दूसरे का) जी लेना = प्राण हरण करना । मार डालना । जी लोटना = जी छटपटाना । किसी वस्तु की प्राप्ति या और किसी बात के लिये चित्त व्याकुल होना । चित्त का अत्यंत इच्छुक होना । ऐसी इच्छा होना कि रहा न जाय । जी सन हो जाना = भय, आशंका आदि से चित्त स्तव्ध हो जाना । जी घबरा जाना । डर के मारे चित्त ठिकाने न रहना । होश उड़ जाना । जैसे,—उसे सामने देखते ही जी सन हो गया । जी सनसनाना = (१) चित्त स्तव्ध होना । भय, आशंका, क्षीणता आदि से अंगो की गति शिथिल हो जाना । (२) चित्त विह्वल होना । जी साँय साँय करना = दे 'जी सनसनाना' । जी से = जी लगाकर । ध्यान देकर । पूर्ण रूप से । दत्तचित्त होकर । जैसे,—जी से जो काम किया जायगा वह क्यों न अच्छा होगा । (किसी वस्तु या व्यक्ति का) जी से उतर जाना = दृष्टि से गिर जाना । (किसी वस्तु या व्यक्ति की) इच्छा या चाह न रह जाना । किसी व्यक्ति पर स्नेह या श्रद्धा न रह जाना । (किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति) चित्त में विरक्त हो जाना । भला न जँचना । हेय या तुच्छ हो जाना । बेकदर हो जाना । जी से उतारना या जी से उतार देना = किसी वस्तु या व्यक्ति की उपेक्षा या अवहेलना करना कदर न करना । जी से जाना = प्राणविहिन होना । मरना । जान खो बैठना । जैसे,— बकरी अपने जी से गई, खानेवाले को स्वाद ही न मिला । जी से जीमिलना । (१) हृदय के भाव परस्पर एक होना = एक के चित्त का दूसरे के चित्त के अनुकूल होना । मैत्री का व्यवहार होना । (२) चित्त में एक दूसरे से प्रेम होना । परस्पर प्रीति होना । (किसी व्यक्ति या वस्तु से) जी हट जाना = चित्त प्रवृत्त या अनुरक्त न रह जाना । इच्छा या चाह न रह जाना । जैसे,—(क) ऐसे कामों से अब हमारा जी हट गया । (ख) उससे मेरा जी एकदम जी हट गया । जी हवा हो जाना = किसी भय, दुःख या शोक से सहसा उपस्थित होने पर चित्त स्तब्धहो जाना । चित्त विह्वल हो जाना । जी घबरा जाना । चित्त ब्याकुल हो जाना । (किसी का) जी हाथ में रखना = (१) किसी का भाव अपने प्रति अच्छा रखना । राजी रखना । मन मैला न होने देना । (२) जी मे किसी प्रकार का खटका पैदा न होने देना । दिलासा दिए रहना । जी हाथ में लेना = दे० 'जी हाथ में रखना' । जी हारना = (१) किसी काम से घबराना या ऊब जाना । हैरान होना । पस्त होना । (२) हिम्मत हारना । साहस छोड़ना । जी हिलना = (१) भय से हृदय काँपना । जी दहलना । (२) करुणा से हृदय क्षुब्ध होना । दया से चित्त उद्विग्न होना ।

जी (२)
अव्य० [सं० जित् प्रा० जिव (= विजयो) या सं० (श्री) युत प्रा० जुक, हिं० जू] एक संमानसूचक शब्द जो किसी नाम या अल्ल के आगे लगाया जाता है अथवा किसी बडे़ के कथन, प्रश्न या संबोधन के उत्तर रूप में जो संक्षिप्त प्रतिसंबोधन होता है उसमें प्रयुक्त होता है । जैसे,— (क) श्री रामचंद्र जी, पंडितजी, त्रिपाठी जी, लाला जी इत्यादि । (ख) कथन—वे आम कैसे मीठे हैं । उत्तर—जी हाँ । बेशक । (ग) तुम वहाँ गए थे या नहीं ? उत्तर— जी नहीं ! (घ) किसी ने पुकारा- रामदास ? उत्तर—जी हाँ ? (या केवल) जी । विशेष—प्रश्न या केवल संबोधन में जी का प्रयोग बड़ों के लिये नहीं होता । जैसे किसी बडे़ के प्रति यह नहीं कहा जाता कि (क) क्यों जी ! तुम कहाँ थे ? अथवा (ख) देखो जी ! यह जाने न पावे । स्वीकार करने या हामी भरने के अर्थ में 'जी हाँ' के स्थान पर केवल 'जी' बोलते हैं, जैसे, प्रश्न—तुम वहाँ गए थे ? उत्तर—जी ! (अर्थात हाँ) । उच्चारण भेद के कारण जी से तात्पर्य पुनः कहने के लिये होता है । जैसे,— किसी ने पूछा— तुम कहाँ जा रहे हो ? उत्तर मिला 'जी' ? अर्थ से स्पष्ट है कि श्रोता पुनः सुनना चाहता है कि उससे क्या कहा गया है ।

जी (३)
वि० [ अ० जी] वाला । सहित । युक्त [को०] । यौ०—जीशऊर = शऊरवाला । तंमीजदार । (२) समझदार । जीशान = शानवाला ।

जीअ पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जी', 'जीव' ।

जीअन पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जीवन' ।

जीउ पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जिउ' । उ०—बिनु जल मीन तपी तस जीऊ । चात्रिक भई कहत पिउ पीऊ ।—जायसी ग्रं०, पृ० ३३४ ।

जीकाद
संज्ञा पुं० [अ० जीकाद] हिजरी सन् के ग्यारहवें महीने का नाम [को०] ।

जीको पु
सर्व० [हिं०] जिसका । उ०—ताहि जतावत मरम हिये को निपट मन मिलौ जीको ।—घनानंद०, पृ० ४९४ ।

जीगन पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतीरिङ्गण, देशी जोइंगण, हिं० जींगन] दे० 'जुगनू' । उ०—बिरह जरी लखि जीगननु कह्यौ न उहि कै बार । अरी आउ भजि भतरी बरसतु आज आँगार ।—बिहारी (शब्द०) ।

जीगा
संज्ञा पुं० [फ़ा० जीगह्] १. तुर्रा । सिरपेच । कलँगी ।२. पगड़ी में बाँधने का एक रत्नजटित आभूषण (को०) । ३. कोलाहल । शोर (को०) ।

जीजा
संज्ञा पुं० [हिं० जीजी] बड़ी बहिन का पति । बड़ा बहनोई ।

जीजी
संज्ञा स्त्री० [सं० देवी, हिं० देई, प्रा० दीदी अथवा देश०(= बड़ी बहिन)] उ०—कीजै कहा जीजी जू ! सुमित्रा परि पायँ कहै तुलसी सहावै विधि सोई सहियतु है ।—तुलसी (शब्द०) ।

जीजूराना
संज्ञा पुं० [देश०] एक चिड़िया का नाम ।

जीट †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] डींग । लंबी चौड़ी बात । मुहा०—जीट उड़ाना = डींग हाँकना उ०—अपनी तहसीलदारी की ऐसी जीट उड़ाई कि, रानी जी मुग्ध हो गई ।—काया, पृ० ५८ । जीट मारना = दे० 'गप मारना' ।

जीण पु
संज्ञा पुं० [सं० जीवन] जीवन । उ०—सरसति सामणी तूँ जग जीण । हँस चढ़ी लटकावै बीण ।—बी०, रासो, पृ० ४ ।

जीत (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० जिति, वैदिक जीति] १. युद्ध या लड़ाई में विपक्षी के विरुद्ध सफलता । जय । विजय । फतह । क्रि० प्र०—होना । २. किसी ऐसे कार्य में सफलता जिसमें दो या अधिक विरुद्ध पक्ष हों । जैसे, मकदमें में जीत, खेल में जीत, बाजी में जीत । ३. लाभ । फायदा । जैसे,—तुम्हारा तो हर तरह से जीत है, इधर से भी, उधर से भी ।

जीत (२)
संज्ञा स्त्री० [?] जहाज में पाल का बुताम ।—(लश०) ।

जीत (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जीति' ।

जीतनहार
वि० [हिं० जीत + हार (प्रत्य०)] जीतनेवाला । विजय करनेवाला । उ०—क्यों न फिरें सब जगत में करत दिग्बिजै मार । जाके दृग सामंत हैं कुवलय जीतनहार ।—मति० ग्रं०, पृ० ३९६ ।

जीतना
क्रि० स० [हिं० जीत + ना (प्रत्य०)] १. युद्ध या लड़ाई में विपक्षी के विरुद्ध सफलता प्राप्त करना । शत्रु को हराना । विजय प्राप्त करना । जैसे,—लड़ाई जीतना, शत्रु को जीतना । उ०—रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता अनुज सहित प्रभु आवत ।—मानस ७ । २ । २. किसी ऐसे कार्य में सफलता प्राप्त करना जिसमें दो या दो से अधिक परस्पर विरुद्ध पक्ष हों । जैसे, मुकदमा जीतना, खेल में जीतना, बाजी जीतना, जुए में रुपया जीतना ।

जीतव पु †
संज्ञा पुं० [सं० जीवितव्य] जीवन् । जीवित रहना ।उ—ताते लोमस नाम है मोरा । करौ समाध जीतव है थोरा ।—कबीर सा०, पृ० ४३ ।

जीता
वि० [हिं० जीना] [वि० स्त्री० जीती] १. जीवित । जो मरा न हो । २. तौल या नाप में ठीक से कुछ बढ़ा हुआ । जैसे,—जरा जीता तौलो ।

जीतालू
संज्ञा पुं० [सं० आलु] आरारोट ।

जीता लोहा
संज्ञा पुं० [हिं० जीना + लोहा] चुंबक । मेकतानीस ।

जीति (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक लता का नाम । विशेष—यह जमुना किनारे से नैपाल तक तथा अवध, बिहाऱ और छोटा नागपुर में होती है । इसके रेशे बहुत मजबूत होते हैं और रस्सी बनाने के काम आते हैं । इन रेशों को टोगुस कहते हैं । इन रेशों से धनुष की डोरी बनती है ।

जीति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विजय । उ०— जीति उठि जाइगी अजीत पंडु पूतनि की, भूप दुरजोधन की भीति उठि जाइगी ।—रत्नाकर, भा० २. पृ० १४२ । २. क्षय । हानि (को०) । ३. ह्रास की अवस्था । वृद्धावस्था (को०) ।

जीन (१)
संज्ञा पुं० [फा० जीन] १. घोडे़ की पीठ पर रखने की गद्दी । चारजामा । काठी । यौ०—जीनपोश । २. पलान । कजावा । २. एक प्रकार का बहुत मोटा सूती कपड़ा ।

जीन (२)
वि० [सं०] १. जीर्ण । पुराना । जर्जर । कटा फटा । २. वृद्ध । ३. क्षीण (को०) ।

जीन (३)
संज्ञा पुं० चमडे़ का थैला [को०] ।

जीनत
संज्ञा स्त्री० [अ० जीनत] १. शोभा । छबि । खूबसूरती । २. सजावट । शृंगार । क्रि० प्र०—देना = शोभा देना ।—बख्शना = शोभा या सोंदर्य बढ़ाना ।

जीनपोश
संज्ञा पुं० [फा० जीनपोश] जीन के ऊपर ढकने का कपड़ा । काठी का ढँकना ।

जीनसवारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जीन + सवारी] घोड़े पर जीन रखकर चढ़ने का कार्य । जैसे,—यह घोड़ा जीनसवारी में रहता है ।

जीनसाज
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जीनसाज] जीन बनानेवाला कारीगर चारजामा बनानेवाला ।

जीना
क्रि० स० [सं० जीवन] १. जीवित रहना । सजीव रहना । जिंदा रहना । न मरना । जैसे,—यह घोड़ा अभी मरा नहीं है जीता है । (ख) वह अभी बहुत दिन जीएगा । उ०—अरविंद सो आनन रूप मरंद अनंदित लोचन भृंग पिए । मन मों न बस्यो ऐसो बालक जो तुलसी जग में फल कौन जिए ?— तुलसी (शब्द०) । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना । २. जीवन के दिन बिताना । जिंदगी काटना । जैसे,—ऐसे जीने से तो मरना अच्छा । मुहा०—जीना भारी हो जाना = जीवन कष्टमय हो जाना । जीवन का सुख और आनंद जाता रहना । जीता जागता = जीवित और सचेत । भला चंगा । जीता लहू = देह से ताजा निकला हुआ खून । जीती मक्खी निगलना = (१) जान बूझकर कोई अन्याय या अनुचित कर्म करना । सरासर बेईमानी करना । जैसे,—उससे रुपया पाकर मैं कैसे इनकार करूँ ? इस तरह जीती मक्खी तो नहीं निगली जाती । (२) जान बूझकर बुराई में फँसना । जान बूझकर आपत्ति या संकट में पड़ना । जीते जी = (१) जीवित अवस्था में । जिंदगी रहते हुए । उपस्थिति में । बने रहते । आछत । जैसे,—(क) मेरे जीते जी तो कभी ऐसा न होने पाएगा । (ख) उसके जीते जी केई एक पैसा नहीं पा सकता । (२) जबतक जीवन है । जिंदगी भर । जैसे,—मैं जीते जी आपका उपकार नहीं भूल सकता । जीते जी मर जाना = जीवन में ही मृत्यु से बढ़कर कष्ट भोगना । किसी भारी विपत्ती या मानसिक आघात से जीवन भारी होना । जीवन का सारा सुख और आनंद जाता रहना । जीवन नष्ट होना । जैसे,—(क) पोते के मरने से तो हम जीते जी मर गए । (ख) इस चोरी से जीते जी मर गए । जीते जी मर मिटना = (१) बुरी दशा को पहुँचना । (२) अत्यंत आसक्त होना । उ०—मैं तो जीते जी मर मिटा यारो कोई तदबीर ऐसी बताओ कि विसाल नसीब हो जाय ।—फिसाना०, भा० १, पृ० ११ । जीते रहो = एक आशीर्वाद जो बड़ों की ओर से छोटों को दिया जाता है । जब तक जीना तब तक सीना = जिंदगी भर किसी काम में लगे रहबा । उ०—पेट के बेट वेगारहि में जब लौं जियना तब लौं सियना है ।—पद्माकर (शब्द०) । ३. प्रसन्न होना । प्रफुल्लित होना । जीते,—उसके नाम से तो वह जी उठता हो । संयो० क्रि०—उठना । मुहा०—अपनी खुशी जीना = अपने ही सुख से आनंदित होना ।

जीप
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की छोटी मोटर जो कार से़ अधिक मजबूत होती है तथा उसके चारो पहिए इंजन द्वारा संचलित होते हैं । उ०—बहुत जल्द में चाहता हूँ जीप का रास्ता निकाल दिया जाय ।—किन्नर०, पृ० ११ ।

जीपण पु
वि० [हिं० जीपना] जीतनेवाले । उ०—उदर सुमित्र लक्षण जीपण अरि, धरे शेष अवतार धुरंधर ।—रघु० रू०, पृ० ६० ।

जीपना
क्रि० स० [हिं० जीतना] जीतना । उ०—अवसांण आए छत्री पोरस सरसावै । यह लोक जीप परलोक मोख पावै ।— रा० रू०, पृ० ११४ ।

जीबना पु †
क्रि० अ० [हिं० जीवना] जीवित रहना । जीवन धारण करना । उ०—मैं गही तेग पति साह सों धरि जाहु- जौन जीबौ चहै । ह०, रासो, पृ० ८९ ।

जीबो पु †
संज्ञा पुं० [हिं० जीवना] दे० 'जीवन' । उ०—साहिन में सरजा समत्थ सिवराज, कवि भूषन कहत जीबो तेरोई सफल हैं ।—भूषन ग्रं०, पृ० ६३ ।

जीभ
संज्ञा स्त्री० [सं० जिह्वा, प्रा० जिब्भ] १. मुँह के भीतररहनेवाले लंबे चिपटे मासपिंड के आकार की वह इंद्रिय जिससे कटु, अम्ल, तिक्त इत्यादि रसों का अनुभव और शब्दों का उच्चारण होता है । जबान । जिह्वा । रसना । विशेष—जीभ मांसपेशियों और स्नायुओं से निर्मित है । पीछे की ओर यह नाल के आकार की एक नरम हड्डी से जुड़ी है जिसे जिह्वास्थि कहते हैं । नीचे की ओर यह दाढ़ के मांस से संयुक्त है और ऊपर के भाग अपेक्षा अधिक पतली झिल्ली से ढकी है जिसमें से बराबर लार छूटती रहती है । नीचे के भाग की अपेक्षा ऊपर का भाग अधिक छिद्रयुक्त या कोशमय होता है और उसी पर वे उभार होते हैं जा काँटे कहलाते हैं । ये उभार या काँटे कई आकार के होते हैं, कोई अर्धचंद्राकार कोई चिपटे और कोई नोक या शिखा के रूप के होते हैं । जिन माँसपेशियों और स्नायुओं के द्वारा यह दाढ़ के माँस तथा शरीर के और भागों से जुड़ी है उन्हीं के बल से यह इधर उधर हिल डोल सकती है । स्नायुओं में जो महीन महीन शाखा स्नायु होती है उनके द्वारा स्पर्श तथा शीत, उष्ण आदि का अनुभव होता़ है । इस प्रकार के सूक्ष्म स्नायुओं का जाल जिह्वा के अग्र भाग पर अधिक है इसी से वहाँ स्पर्श या रस आदि का अनुभव अधिक तीव्र होता है । इन स्नायुओं के उत्तेजित होने से ही स्वाद का बोध होता है । इसी से कोई अधिक मीठी या सुस्वादु वस्तु मुँह में लेकर कभी लोग जीभ चटकारते या दबाते हैं । द्रव्यों की संयोग से उत्पन्न एक प्रकार की रासायनिक क्रिया से इन स्नायुओं में उत्तेजना उत्पन्न होती है । १२८ अंश गरम जल में एक मिनट तक जीभ डुबोकर यदि उसपर कोई वस्तु रखी जाय तो खट्टे मीठे आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं होता । कई वृक्ष ऐसे हैं जिनकी पत्तियाँ चवा लेने से भी यह ज्ञान थोड़ी देर के लिये नष्ट हो जाता है । वस्तुओं का कुछ अंश काटों में लगकर और घुलकर छिद्रों के मार्ग से जब सूक्ष्म स्नायुओं में पहुँचता है तभी स्वाद का बोध होता है । अतः यदि कोई वस्तु सूखी, कड़ी है तो उसका स्वाद हमें जल्दी नहीं जान पडे़गा । दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि घ्राण का रसना का स्वाद से घनिष्ठ संबंध है । कोई वस्तु खाते समय हम उसकी गंध का भी अनुभव करते हैं । जिस स्थान पर जीभ लारयुक्त मांस आदि से जुड़ी रहती है वहाँ कई सूत्र या बंधन होते हैं जो जीभ की गति नियत या स्थिर रखते हैं । इन्हीं बंधनो के कारण जीभ की नोक पीछे की ओर बहुत दूर तक नहीं पहुँच सकती । बहुत से बच्चों की जीभ में यह बंधन आगे तक बढ़ा रहता है जिससे वे बोल नहीं सकते । बंधनो को हटा देने से बच्चे बोलने लगते हें । रसास्वादन के अतिरिक्त मनुष्य की जीभ का बड़ा भारी कार्य कंठ से निकले हुए स्वर में अनेक प्रकार के भेद डालना है । इन्हीं विभेदों से वर्णों की उत्पत्ति होती है जिनसे भाषा की विकास होता है । इसी से जीभ को वाणी भी कहते है । पर्या०—जिह्वा । रसना । रसज्ञा । रसाल । रसिका । साधुस्रवा । रसला । रसांक । ललना । मुहा०—जीभ करना = बहुत बढ़कर बोलना । ढिठाई से उत्तर देना । जीभ खलना = मुँह से कुछ बोलना । शब्द निकालना । जैसे,—अब जहाँ जीभ खोली कि पिटे । जीभ चलना = भिन्न- भिन्न वस्तुओं का स्वाद लेने लिये जीभ का हिलना डोलना । स्वाद के अनुभव के लिये जिह्वा चंचल होना । चटोरेपन की इच्छा होना । उ०—जीभ चलै बल ना चलै वहै जीभ जरि जाय ।—(शब्द०) । जीभ थोड़ी करना = कम बोलना । बकवाद कम करना । अधिक न बोलना । उ०—मेरो गोपाल तनक सो कहा करि जानै दधि की चोरी ।—सूर (शब्द०) । जीभ निकालना = (१) जीभ बाहर करना । (२) जीभ खींचना । जीभ उखाड़ लेना । जीभ पड़ना = बोलने न देना । बोलने से रोकना । जीभ बढ़ाना = चटोरपन की आदत होना । जीभ बंद होना = बोलना बंद करना । जबान न खोलना । चुप रहना । जीभ हिलाना = मुँह से कुछ न बोलना । छोटी जीभ = गलशुंडी । किसी के जीभ के निचे जीभ होना = किसी का अपनी कही हुई बात को बदल जाना । एक बार कही हुई बात पर स्थिर न रहना । २. जीभ के आकार की कोई वस्तु । जैसे,—निब । मुहा०—कलम की जीभ = कलम का वह भाग जो छीलकर नुकीला किया रहता है ।

जीभा
संज्ञा पुं० [हिं० जीभ] १. जीभ के आकार की कोई वस्तु जैसे, कोल्हू का पच्चर । २. चौपायों की एक बीमारी जिसमें उनकी जीभ के काँटे सूज या बढ़ जाते हैं और उनसे खाते नहीं बनता । बेरुखी । अवार । ३. बैलों की आँख की एक बीमारी जिसमें आँख का मांस बढ़कर लटक आता है ।

जीभी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जीभ] धातु की बनी एक पतली लचीली और धनुषाकार वस्तु जिससे जीभ छीलकर साफ करते हैं । २. मैल साफ करने के लिये जीभ छिलने की क्रिया । क्रि० प्र०—करना । ३. निब । ४. छोटी जीभ । गलशुंडी । ५. चौपायों का एक रोग । दे० 'जीभा' । ६. लगाम का एक भाग ।

जीभी चाभा
संज्ञा पुं० [हिं० जीभ + चाभना] चौपायों का एक रोग । दे० 'जीभा' ।

जीमट
संज्ञा पुं० [सं० जीमूत (= पोषण करनेवाला)] पेड़ों और पौधों के धड़, शाखा और टहनी आदि के भीतर का गूदा ।

जीमना
क्रि० स० [सं० जेमन] भोजन करना । आहार करना । खाना । उ०—काबा फिर काशी भया राम जो भया रहीम मोटा चुन मैदा भयो बैठि कबीरा जीम ।—कबीर (शब्द०) ।

जीमूत
संज्ञा पुं० [सं०] १. पर्वत । २.मेघ । बादल । ३. मुस्ता । मोथा । नागर मोथा । ४. देवताड़ वृक्ष । ५. इंद्र । ६. पोषण करनेवाला । रोजी या जीविका देनेवाला । ७. घोषा लता । ८. सूर्य । ९. एक ऋषि का नाम जिनका उल्लेख महाभारत में है । १०. एक मल्ल की नाम जो विराट की सभा में रहता था और भीम के द्वारा मारा गया था । ११. हरिवंश के अनुसार दशार्ह के पोत्र का नाम । १२. ब्रह्मांड पुराण मेंशाल्मली द्वीप के एक राजा जो वपुष्मत् के पुत्र थे । १३. शाल्मली द्वीप के एक वर्ष का नाम । १४. एक प्रकार का दंडक वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और ग्यारह रगण होते हैं । यह प्रचित के अंतर्गत है ।

जीमूतमुक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मेघ से उत्पन्न मोती । विशेष—रत्नपरीक्षा विषयक प्राचीन ग्रंथों में इस प्रकार के मोती का वर्णन है । वृहत्संहिता, अग्निपुराण, गरुडपुराण, युक्ति- कल्पतरु आदि ग्रंथो में भी इस मुक्ता का विवरण मिलता है, पर ऐसा मोती आजतक देखा नहीं गया । वृहत्संहिता में लिखा है कि मेघ से जिस प्रकार ओले उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार यह मोती भी उत्पन्न होता है । जिस प्रकार ओले बादल से गिरते हैं उसी प्रकार यह मोती भी गिरता है पर देवता लोग इसे बीच ही में उड़ा लेते हैं । सारंश यह है कि यह मुक्ता मनुष्यों को अलभ्य है । न देखने पर भी प्राचीन आचार्य लक्षण बतलाने से नहीं चूके हैं और उन्होंने इसे मुरगी कै अंडे की तरह गोल, ठोस और वजनी बतलाया है । इसकी कांति सूर्य की किरण के समान कही गई है । इसे यदि तुच्छ से तुच्छ मनुष्य कभी पा जाय तो सारी पृथ्वी का राज हो जाय ।

जीमूतवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र । २. शालिवाहक राजा का पुत्र । विशेष—अश्विन कृष्ण ८. को पुत्रकामनावाली स्त्रियाँ इनका पूजन करती हैं । ३. जीमूतकेतु राजा का पुत्र जो प्रसिद्ध नाटक नागानंद का नायक है । ४. धर्मरत्न नामक स्मृतिसंग्रहकार ।

जीमूतवाही
संज्ञा पुं० [सं० जीमूतवाहिन्] धूम । धुवाँ ।

जीय पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जीव', 'जी' । मुहा०—जीय धरना = दे०' जी में 'धरना' । उ०—माधव जू जो जन तें बिगरै । तउ कृपालु करुणामय केशव प्रभु नहिं जीय धरै ।—सूर (शब्द०) ।

जीयट
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जीवट' ।

जीयति पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जीना] जीवन । जिंदगी । उ०— तोहि सोहि आँखिनि सो आँखें मिली रहें जीयति को यहै लहा ।—हरिदास (शब्द०) ।

जीयदान
संज्ञा पुं० [सं० जीवदान] प्राणदान । जीवनदान । प्राणरक्षा । उ०—बालक काज धर्म जनि छाँड़ौ राय न ऐसी कीजै हो । तुम मानी वसुदेव देवकी जीयदान इन दीजै हो ।— सूर (शब्द०) ।

जीये पु
वि० [प्रा० जेव, जेम] दे० 'जिमि' या 'ज्यों' । उ०— जीये तेल तिलन्नि में जीये गंधि फुलिन्न ।—संतवाणी०, पृ० ८५ ।

जीर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जीरा । २. फूल का जीरा । केसर । उ०—रघुराज पंकज को जीर नहिं बेधै हरि धरौं किमि धीर पावै पीर मन मोर है ।—रघुराज (शब्द०) । ३.खडग् । तलवार । ४. अणु ।

जीर (२)
वि० क्षिप्र । तेज । जल्दी चलनेवाला ।

जीर (३)
संज्ञा पुं० [फ़ा० जिरह] जिरह । कवच । उ०— कुंडल के ऊपर कडाके उठैं ठौर ठौर, जीरन के ऊपर खड़ाके खड़गान के ।—भूषण (शब्द०) ।

जीर (४)पु
वि० [सं० जीर्ण] पुराना । जर्जर । उ०—मनहु मरी इक वर्ष की भयो तासु तन जीर । करषत कर महि पर गिरी गयो सुखाय शरीर ।—रघुराज (शब्द०) ।

जीरक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] जीरा ।

जीरक (२)
वि० [फ़ा० जीरक] १. प्रवीण । प्रतिभाशाली । २. होशियार । चालक ।

जीरण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] जीरा ।

जीरण पु (२)
वि० [सं० जीर्ण] दे० 'जीर्ण' ।

जीरह पु
संज्ञा पुं० [फ़ा० जिरह] अंगत्राण । सन्नाह । उ०— जान तणी साजति करउ । जीरह रंगावली पहहरज्यो टोप ।—बीसल० रास०, पृ० ११ ।

जीरा
संज्ञा पुं० [सं० जीरक, तुलनीय फ़ा० जीरह्] डेढ़ दो हाथ ऊँचा एक पौधा । विशेष—इसमें सौंफ की तरह फूलों के गुच्छे लंबी सीकों में लगते हैं । पत्तियाँ बहुत बारीक और दूब की तरह लंबी होती हैं । बंगाल और आसाम कतो छोड़ भारत में यह सर्वत्र अधि- कता से बोया जाता है । लोगों का अनुमान है कि यह पश्चिम के देशों से लाया गया है । मिस्र देश तथा भूमध्य सागर के माल्टा आदि टापुओं में यह जंगली पाया जाता है । माल्टा का जीरा बहुत अच्छा और सुगंधित होता है । जीरा कई प्रकार का होता है पर इसके दो मुख्य भेद माने जाते हैं— सफेद और स्याह अथवा श्वेत और कृष्ण जीरक । सफेद या साधारण जीरा भारत में प्रायः सर्वत्र होता है, पर स्याह जीरा जो अधिक महीन और सुगंधित होता है । काश्मीर लद्दाख, बलूचिस्तान तथा गढ़वाल और कुमाऊँ से आता है । काश्मीर और अफगनिस्तान में तो यह खेतों में और तृणों के साथ उगता है । माल्टा आदि पश्चिम के देशों से जो एक प्रकार का सफेद जीरा आता है वह स्याह जीरे की जाति का है और उसी की तरह छोटा और तीव्र गंध का होता है । वैद्यक में यह कटु, उष्ण, दीपक तथा अतीसार, गृहणी, कृमि और कफ वात को दूर करनेवाला माना जाता है । पर्या०—जरण । अजाजी । कणा । जीर्ण । जीर । दीप्य । जीरण । अजाजिका । बह्विशिख । मागध । दीपक । मुहा०—ऊँट के मुँह में जीरा = खाने की कोई चीज मात्रा में बहुत कम होना । २. जीरे के आकार के छोटे छोटे महीन और लंबे बीज । ३. फूलों का केसर । फूलों के बीज का महीन सूत ।

जीरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वंशपत्री नाम की घास ।

जीरी
संज्ञा पुं० [हिं० जीरा] एक प्रकार का धान जो अगहन में तैयार होता है । विशेष—इसका चावल बहुत दिनों तक रह सकता है । यहपंजाब के करनाल जिले में अधिक होता है । इसके दो भेद हैं—एक रमाली, दूसरा रामजमानी ।

जीरीपटन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का फूल ।

जीर्ण
वि० [सं०] १. बहुत बुड्ढा । बुढापे से जर्जर । २. पुराना । बहुत दिनों का । जैस, जीर्ण ज्वर । ३. जो पुराना होने के कारण टूट फूट गया हो । कमजोर हो गया हो । फटा पुराना । उ०—का क्षति लाभ जीर्ण धनु तोरे ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—जीर्ण शीर्ण = फटा पुराना । टूटा फूटा । ४. पेट में अच्छी तरह पचा हुआ । जठराग्नि में जिसका परिपाक हुआ हो । परिपक्व । जैसे,—अन्न, अजीर्ण ।

जीर्ण (२)
संज्ञा पुं० १. जीरा । २. बूढ़ा व्यक्ति (को०) । ३. वृक्ष (को०) । ४. शिलाजतु (को०) । ५. वृद्धावस्था । वार्धक्य (को०) ।

जीर्णक
वि० [सं०] प्रायः शुष्क या कुम्हालाया हुआ [को०] ।

जीर्णज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] पुराना बुखार । वह ज्वर जिसे रहते बारह दिन से अधिक हो गये हों । विशेष—किसी किसी के मत से प्रत्येक ज्वर अपने आरंभ के दिन से ७ दिन तक तरुण, १४ दिनों तक मध्यम और २१ दिनों के पीछे, जब रोगी का शरीर दूर्बल और रूखा हो जाय तथा उसे क्षुधा न लगे और उसका पेट सदा भारी रहे 'जीर्ण' कहलाता है ।

जीर्णता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुढ़ापा । बुढ़ाई । २. पुरानापन ।

जीर्णदारु
संज्ञा पुं० [सं०] वृद्धदारक वृक्ष । विधारा ।

जीर्णपत्र
संज्ञा सं० [सं०] पट्टिका लोध्र । विधारा ।

जीर्णपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कदंब का पेड़ । २. पुराना पत्ता (को०) ।

जीर्णर्फजी
संज्ञा स्त्री० [सं० जीर्णफञ्जी] विधारा [को०] ।

जीर्णबुध्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'जीर्णपर्ण' ।

जीर्णवज्र
संज्ञा पुं० [सं०] वैक्रांत मणि ।

जीर्णवस्त्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] फटा पुराना कपड़ा [को०] ।

जीर्णवस्त्र (२)
वि० जो फटे पुराने कपड़ों में हो [को०] ।

जीर्णवाटिका (१)
संज्ञा पुं० [सं०] खँडहर [को०] ।

जीर्णा (१)
वि० [सं०] वृद्धा । बुढ़िया ।

जीर्णा (२)
संज्ञा स्त्री० काली जीरी ।

जीर्णास्थिमृत्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] हड्डी को गला सड़ाकर बनाई हुई मिट्टी । विशेष—ऐसी मिट्टी बनाने की विधी शब्दार्थ चिंतामणि नामक ग्रंथ में इस प्रकार लिखी है,—जहाँ शिलाजीत निकलता हो वहाँ एक गहरा गड्ढा खोदे और उसे जानवरों और मनुष्यों की हड्डियों से भर दे । ऊपर से सज्जीखार नमक, गंधक और गरम जल ६ महिने तक डालता जाय । इसके पीछे फिर पत्थर की मिट्टी दे । तीन वर्ष में यह सब वस्तुएँ एक सिल के रूप में जम जायँगी । उस सिल को लेकर बुकनी कर डाले और उसका पात्र बनावे । ऐसे पात्र में भोजन करना बहुत अच्छा है । भोजन यदि विष आदि द्वारा दूषित होगा तो ऐसे पात्र में पता चल जायगा । यदि साधारण होगा तो उसमें छीटे आदि पड़ जायेँगे ।

जीर्णोद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] फटी पुरानी, टूटी फूटी वस्तुओं का फिर से सुधार । पुनःसंस्कार । मरम्मत । विशेष—पूर्वस्थापित शिवलिंग या मंदिर आदि के जीर्णद्धार की विधि आदि अग्निपुराण में विस्तार से दी हुई है ।

जीर्णोद्यान
संज्ञा पुं० [सं०] पुराना हो जाने से अथवा देखरेख के अभाव से शुष्कप्राय उजड़ा सा उद्यान [को०] ।

जील
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जीर] १. धीमा शब्द । मध्यम स्वर । नीचा सुर । २. तबले या ढोल का बायाँ । उ०—जात कहूँ ते कहूँ को चल्यो सुर टीप न लागत तान धरे की । आखर सो समुझे न परे मिलि ग्राम रहे जति जील परे की ।— रघुनाथ (शब्द०) ।

जीला †
वि० [सं० झिल्ली] [वि० स्त्री० जीली] १. झीना । पतला । २. महीन । उ०—झिल्ली ते रसीली जीली राँटेहूँ की रटलीली स्यारि तें सवाई भूतभावनी ते आगरी ।—केशव (शब्द०) ।

जीलानी (१)
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रकार का लाल रंग । विशेष—यह बबूल, झरबेरी, मजीठ, पतंग, और लाह को बराबर लेकर और पानी में उबालकर बनाया जाता है ।

जीलानी (२)
वि० जीलान नामक स्थान संबंधी [को०] ।

जीवंजीव
संज्ञा पुं० [जीवञ्जीव] १. चकोर पक्षी । २. एक वृक्ष का नाम ।

जीवंत (१)
संज्ञा पुं० [सं० जीवन्त] १. प्राण । जीवन । २. ओषधि । ३. जीवशाक ।

जीवंत (२)
वि० १. जीताजागता । सप्राण । प्राणवान् । २. दीर्घायु (को०) ।

जीवतंक
संज्ञा पुं० [सं० जीवन्तक] जीवशाक [को०] ।

जीवतंता
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन्त + ता (प्रत्य०)] सप्राणता का भाव । तेजस्विता ।

जीवंतिक
संज्ञा पुं० [सं० जीवन्तिक] १. चिड़ीमार । बहेलिया । २. जीवशाक [को०] ।

जीवंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन्तिका] १. एक प्रकार की बनस्पति या पौधा जो दूसरे पेड़ के ऊपर उत्पन्न होता है और उसी के आहार से बढ़ता है । बाँदा । २. गुरुच । गुडूची । ३. जीवशाक । ४. जीवंती लता । ५. एक प्रकार की हड़ जो पीले रंग की होती है । ६. शमी ।

जीवंती
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन्ती] १. एक लता जिसकी पत्तियाँ औषध के काम में आती हैं । विशेष—इसकी टहनियों में दूध निकलता है । फल गुच्छों में लगते हैं । यह तीन प्रकार की होती हैं—बृहज्जीवंती, पीली जीवंती और तिक्त जीवंती । तिक्त जीवंती को डोड़ी कहते हैं । २. एक ताल जिसके फूलों में मीठा मधु या मकरंद होता है । ३. एक प्रकार की हड़ जो पीली होती है ।विशेष—यह गुजरात कठियावाड़ की ओर से आता है । इसका गुण बहुत उत्तम माना जाता है । ४. बाँदा । ५. गुडूची । ६. शमा ।

जीव
संज्ञा पुं० [सं०] प्राणियों का चेतन तत्व । जीवात्मा । आत्मा । २. प्राण । जीवन तत्व । जान । जैसे,—इस हिरन में अब जीव नहीं है । ३. प्राणी । जीवधारी । इंद्रियविशिष्ट । शरीरी । जानदार । जैसे, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि । जैसे,— किसी जीव को सताना अच्छा नहीं । उ०— जे जड़ चेतन जीव जहाना ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—जीव जंतु = (१) जानवर । प्राणी । (२) कीड़ा मकोड़ा । ४. जीवन । ५. विष्णु । ६. बृहस्पति । उ०— पढौ विरंचि, मौन वेद जीव सोर छंडि रे । कुबेर, बेर के कही न यच्छ भीर मंडि रे ।—राम चं०, पृ० १११ । ७. अश्लेषा नक्षत्र । ८. बकायन का पेड़ । ९. जीविका । व्यवसाय (को०) । १०. एक मरुत् (को०) । ११. कर्ण का एक नाम (को०) । १२. लिंगदेह (को०) । १३. पुष्य नक्षत्र (को०) ।

जीवक
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राण धारण करनेवाला । २. आयुर्वेद के एक प्रसिद्ध आचार्य जो बौद्ध परपंरा के अनुसार ईस्वी पूर्व चौथी या तीसरी शताब्दी में थे । ३. क्षपणक । ४. सँपेरा । ५. सेवक । ६. ब्याज लेकर जीविका करनेवाला । सूदखोर । ७. पीतसाल का वृक्ष । ८. एक जड़ी या पौधा । विशेष—भावप्रकाश के अनुसार यह पोधा हिमालय के शिखरों पर होता है । इसका कद लहसुन के कंद के समान और इसकी पत्तियाँ महीन और सारहीन होती है । इसकी टहनियों में बारीक काँटे होते हैं और दूध निकलता है । यह अष्टवर्ग औषध के अंतर्गत है और इसका कंद मधुर, बलकारक और कामोद्दीपक होता है । ऋषभ और जीवक दोनों एक ही जाति के गुल्म हैं, भेद केवल इतना ही है कि ऋषभ की आकृति बैल की सींग की तरह होती है और जीवक की झाडू की सी । पर्या०—कूर्चशीर्ष । मधुरक । शृंग । ह्नस्वाँग । जीवन । दीर्घायु प्राणद । भृंगाह्व । चिरजीवी । मंगला । आयुष्मान् । बलद ।

जीवकोश
संज्ञा पुं० [सं०] लिंग शरीर [को०] ।

जीवगृह
संज्ञा पुं० [सं० जीवगृहम्] शरीर । काया । [को०] ।

जीवग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] वह बंदी जो जीवित गिरफ्तार किया गया हो [को०] ।

जीवधन
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा [को०] ।

जीवघाती
वि० [सं० जीवघातिन्] हिंसक । प्राणहारी [को०] ।

जीवज
वि० [सं०] जो सजीव या सप्राण पैदा हो [को०] ।

जीवजगत्
संज्ञा पुं० [सं०] प्राणधारी समुदाय [को०] ।

जीवजीव
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर पक्षी ।

जीवजीवक
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर पक्षी [को०] ।

जीवट
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवथ] हृदय की दृढ़ता । जिगरा । साहस । हिम्म्त । मरदानगी ।

जीवत्
वि० [सं०] [वि० स्त्री० जीवती जीवित] जिंदा । जीता हुआ [को०] ।

जीवतोका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसके बच्चे जीवित हों [को०] ।

जोवत्तोका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसकी संबति जीती हो । जीवत्पुत्रिका ।

जीवत्पति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति जीवित हो । सधवा स्त्री । सौभाग्यवती स्त्री ।

जीवत्पत्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'जीबत्पति' [को०] ।

जीवत्पितृक
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह जिसका पिता जिवित हो । विशेष— ऐसे मनुष्य के लिये अमास्नान, गयाश्राद्ध । दश्रिणमुख भोजन तथा मुछे मुड़ाने आदि का निषेध है । ऐसा मनुष्य यदि निरग्नि ब्राह्मण है तो उसे बृद्धि छोड़ और कोई श्राद्ध करने का अधिकार नहीं है । साग्निक जीवत्पितृक सब श्राद्ध कर सकता है ।

जीवत्पुत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह् स्त्री जिसका पुत्र जीवित हो । २. आश्विन कृष्ण अष्ठमी का व्रत [को०] ।

जीवत्पुत्रिका व्रत
संज्ञा पुं० [सं०] संतान की कल्याणकामना से स्त्रियों द्वारा अश्विन कृष्ण अष्ठमो को रखा जाने वाला व्रत ।

जीवथ (१)
संज्ञा [पुं० जीवथः] १. प्राण । २. सदगुण । ३. मयूर । ४. मेघ । ५. कछुआ ।

जीवथ (२)
वि० [सं० जीव + अथ] १. धार्मिक । २. दीर्घायु । चिरंजीवी ।

जीवद
संज्ञा पुं० [सं०] १. जीवनदाता । २. वैद्य । ३. जीवक पौधा । ४. जीवती । ५. शत्रु ।

जीवदया
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवों के प्राणरक्षार्थ की जानेवाली दया [को०] ।

जीवदशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मर्त्य जीवन [को०] ।

जीवदान
संज्ञा पुं० [सं०] अपने वश में आए हुए शत्रु को न मारने या छोड़ देने का कार्य । प्राणदान । प्राणरक्षा । उ०— खंग लै ताहि भगवान मारन चले रुक्मिणी जोरि कर विनय कीयो । दोष इन कियो मोहि क्षमा प्रभु कीजिए भद्र करि शीश जिवदान दीयौ ।— सूर (शब्द०) ।

जीवद्भर्तृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति जिवित हो ।

जीवद्वत्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पुत्र जीवित हो [को०] ।

जीवधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह संपत्ति जो जोवों या पशुओं के रूप में हो । जैसे, गाय, भैस, भेड़, बकरी, ऊँट आदि । २. जीवनधन । प्राणाप्रिय । प्यारा ।

जीवधानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सब जीवों की आधारस्वरूपा, पृथ्वी । धरती ।

जीवधारी
संज्ञा पुं० [सं० जीवधारिन्] प्राणी । जानवर । चेचन जंतु ।

जीवन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० जीवित] १. जीवीत रहने की अवस्था । जन्म और मृत्यु के बीच का काल । वह दशा दिसमें प्राणी आपनी इंद्रियों द्वारा चेतन व्यापार करते हैं । जिंदगी । जैसे,— अपने जीवन में ऐसी घटना मैंने कभी नहीं थीयौ०— जीवनचरित् । जीवनचर्या । मुहा०—जीवन भरना = जीवन ब्यतीत करना । जिंदगी के दिन काटना । २. जीवित रहने का भाव । जीने का व्यापार या भाव । प्राण- धारण । जैसे,— अन्न से ही तो मनुष्य का जीवन है । यौ०— जीवनदाता । जीवनधन । जीवनमूरि । ३. जीवित रखनेवाली वस्तु जिसके कारण कोई जाता रहै । प्राण का अवलंब । जैसे,— जल ही मनुष्य का जीवन है । ४. प्राणधार । परमप्रिय । प्यारा । ५. जल । पानी । उ०— जगत जीवन हेतु जीवन (जल) बिंदु की वर्षा होती ।— प्रेमघन०, भा०२, पृ० ३३४ । ७. मज्जा । ८. वात । वायु । ९. ताजा घी या मक्खन । १०. जीवक नामक औषघ । ११. पुत्र । १२. परमेश्वर । १३. गंगा । १४. क्षुद्र फल नाम का पौधा [को०] ।

जीवनक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आहार । खाद्य । २. अन्न [को०] ।

जीवनक (२)
वि० जीवित करनेवाला या रखनेवाला [को०] ।

जीवनक्रम
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + क्रम] रहन सहन का ढंग । जीवनपद्धति । जीवनप्रणाली [को०] ।

जीवनचरित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. जीवन का वृत्तांत । जीवन में किए हुए कार्यों आदि का वर्णान । जिंदगी का हाल । २. वह पुस्तक जिसमें किसी के जिवन भर का वृत्तांत हो ।

जीवनचरित्र
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + चरित्र] दे० 'जीवनचरित्' ।

जीवनचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन + चर्या] दे० 'जीवनक्रम' ।

जीवनतत्व
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + तत्व] जीवन का मर्म । जीवन का रहस्य ।

जीवनतरु
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + तरु] १. जीवन रूपी वृक्ष । २. वह वृक्ष जो प्राणधारण का कारण हो । उ०— राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ।— मानस, २ । २०० ।

जीवनतल
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + तल] जीवननिर्वाह का स्तर या स्थिति । उ०— और यहाँ की खनिज संपत्ति को निकालकर जनता के जीवनतल को ऊँचा उठाना चाहती है ।— किन्नर०, पृ० ६० ।

जीवनद
वि० [सं०] जीवनदाता [को०] ।

जीवनदर्शन
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + दर्शन] जीवन विषयक सिद्धांत उ०— गाँधी जी के जीवनदर्शन का मूलमंत्र असत्य पर सत्य, अंधकार पर प्रकाश तथा मृत्यु पर जीवन द्वारा विजय पाने का था ।— भारतीय०, पृ० १७५ ।

जीवनदान
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + दान] १. शत्रु या अपराधी के प्राण न हरण करना । प्राणदान । उ०— देना चाहते हो मोगलों को तुम जीवनदान ।—अपरा, पृ० ८२ । २. किसी ऊँचे उद्देश्य के लिये आजीवन कार्य करते रहने का व्रत पालन करना ।

जीवनधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जीवन का सर्वस्व । जीवन में सबसे प्रिय वस्तु या व्याक्ति । २. प्राणधार । प्यारा । प्राणप्रिय । उ०— सुकवि सरद नम उडुगन से । राम भगत जन जीवनधन से ।—तुलसी (शब्द०) ।

जीवनधर (१)
वि० [सं० जीवन + धर] जीवनरक्षक । जीवनदायक जीवनप्रद [को०] ।

जीवनधर (२)
संज्ञा पुं० जलधर । मेघ । बादल [को०] ।

जीवनबूटी
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन + हि० बूटी] १. एक पौधा या बूटी । संजीवनी । विशेष— इसके विषय में प्रसिद्ध है कि यह मरे हुए आदमी को भी जिला सकती है । २. आति प्रिय वस्तु या व्यक्ति ।

जीवनमरण
संज्ञा पुं० [सं०] जीवन और मरण । जिंदगी और मौत ।

जीवनमुक्त
वि० [सं०] जी जीवन में ही सर्वबंधनों से मुक्त हो चुका हो [को०] ।

जीवनमुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवनकाल में ही प्राप्त निर्बं- धता [को०] ।

जीवनमूरि
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन + मूल] १. संजीवनी नाम की जड़ी । २. अत्यंत प्रिय वस्तु या व्यक्ति । प्यारी । प्राणप्रिया ।

जीबनमूलि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवनमूल] संजीवनी बूटी । उ०— जीवन कों लै का करौं, पायौ जीवनमूलि । भक्ति कौ सार यह ।—नंद० ग्रं०, पृ०, १८८ ।

जीवनयापन
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + यापन] जीवननिर्वाह । जीवन व्यतीत करना ।

जीवनवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] जीवनचरित् । जीवनवृत्तांत । जीवनी ।

जीवनवृत्तांत
संज्ञा पुं० [सं० जीवनवृत्तांत] जीवनचरित । जिंदगी भर का हाल । जीवनी ।

जीवनवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० जीविका] जीवनोपाय । प्राणरक्षा के लिये उद्यम । रोजी ।

जीवनसंग्राम
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + संग्राम] जीवन की संघर्षमय परिस्थितियों का सामना । संघर्षों में जीवनयापन का प्रयत्न ।

जीवनहेतु
संज्ञा पुं० [सं०] जीवनरक्षा का साधन । जीविका । रोजी । विशेष—गरुड़पुराण में दस प्रकार की जीविका बतलाई गई है— विद्या, शिल्प, भृत्ति, सेवा, गौरक्षा, विपणि, कृषि, वृत्ति, भिक्षा और कुशीद ।

जीवनांत
संज्ञा पुं० [सं० जीवनन्त] जीवन की समाप्ति । मरण । मृत्यु [को०] ।

जीवना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. महौषध । २. जीवंती लता । उ०— जीवत मिरतक होइ रहै, तजै खलक की आस ।— संत- वाणी०, पृ०, ४८० ।

जीवना (२) पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'जीना' ।

जीवना (३) †
क्रि० स० दे० 'जीमना' ।

जीवनाघात
संज्ञा पुं० [सं०] विष । प्राणघाती जहर [को०] ।

जीवनाधार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] जीवन का अवलंब या सहारा [को०] ।

जीवनाधार (२)
वि० परम प्रिय । प्राणाधार [को०] ।

जीवनांतर
क्रि० वि० [सं० जीवनन्तर] जीवन के बाद ।

जीवनावास (१)
वि० [सं०] जल में रहनेवाला ।

जीवनावास (२)
संज्ञा पुं० १. वरुण । २. देह । शरीर ।

जीवनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवनी] १. संजीवनी बूटी । २. जिलानेवाली वस्तु । प्राणाधार । ३. अत्यंत प्रिय वस्तु । उ०— गहली गरब न कीजिए, समय सुहागिनि पाय । जिय की जीवनि जेठ सो, माह न छाँह सुहाय । —बिहारी (शब्द०) ।

जीवनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. काकोली । २. तिक्त जीवंती । ड़ीड़ी । ३. मेद । ४. महामेद । ५. लूही ।

जीवनी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवन + हिं० ई (प्रत्य०)] जीवन भर का वृत्तांत । जीवनचरित् । जिंदगी का हाल ।

जीवनीय (१)
वि० [सं०] १. जीवनप्रद । २. जीविका करने योग्य । बरतने योग्य ।

जीवनीय (२)
संज्ञा पुं० १. जल । २. जयंती वृक्ष । ३. दूध (ड़िं०) ।

जीवनीयगण
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में बलकारक औषधियों का एक वर्ग । विशेष— इसके अंतर्गत अष्टवर्ग पर्णिनी, जीवंती, मधूक और जीवन है । वाग्भट्ट के मत से जीबनीय गण ये हैं— जीवंती, काकोली, मेद, मुदगपर्णी, माषपर्णी, ऋषभक जीबक और मधूक ।

जीवनीया
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवंती लता ।

जीवनेत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] सैंहली वृक्ष ।

जीवनोत्तर
वि० [सं०] जीवन के बाद का ।

जीवनोत्सर्ग
संज्ञा पुं० [सं० जीवन + उत्सर्ग] जीवन की बलि । जीवन का दान । उ०— यौवन की मांसल, स्वस्य, गंध नव युग्यों का जीवनोत्सर्ग ।—युगांत, पृ० ४७ ।

जीवनोपाय
संज्ञा पुं० [सं०] जीवनरक्षा का उपाय । जीविका । वृत्ति । रोजी ।

जीवनौषध
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह औषध जिससे मरता हुआ भी जी जाय ।

जीवन्मुक्त
वि० [सं०] जो जीवित दश में ही आत्मज्ञान द्वारा सांसारिक मायाबंधन से छूट गया हो । विशेष—वेदांतसार में लिखा है कि जिंसने अखंड़ चैतन्य स्वरूप ज्ञान द्वारा अज्ञान का नाश करके आत्मरूप अखंड़ ब्रह्म का साक्षात्कार किया हो और जो ज्ञान तथा अज्ञान के कार्य, पाप पुण्य एवं संशय, भ्रम आदि के बंधन से निवृत्त हो गया हो वही जीवन्मुक्त है । सांख्य और योग के मत से पुरुष और प्रकृति के बीच विवेक ज्ञान होने से जीनन्मुक्ति प्राप्त होती है, अर्थात् जब मनुष्य को यह ज्ञान हो जाता है कि यह प्रकृति जड़, परिणा- मिनी और त्रिगुणामयी है और मैं नित्य और चैतन्यस्वरूप हुँ तब वह जीवन्मुक्त हो जाता हो ।

जीवन्मृत
वि० [सं०] जो जीते ही मरे के तुल्य हो । जिसका जीना और मरना दोनों बरावर हों । जिसका जीवन सार्थक और सुखमय न हो ।— उ०— यहाँ अकेला मानव ही रै चिर विषण्ण जीवन्मृत ।—ग्राम्या, पृ० १६ । विशेष— जो, अपने कर्तव्य से विमुख ओर अकर्मण्य हो, जो सदा ही कष्ट भोगता रहे, जो बड़ी कछिना से अपना पोषण कर सकता हो, जो आतिथि आदि का सत्कार न करता हो, ऐसा मनुष्य धर्मशास्त्र में जीवन्मृत कहलाता है ।

जीयन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा का मंत्र ।

जीवपति (१)
संज्ञा पुं० [सं०] धर्मराज ।

जीवपति (२)
संज्ञा स्त्री० वह स्त्री जिसका पति जीवित हो । सधवा स्त्री । सौभाग्यवती स्त्री । सुहागिनी स्त्री ।

जीवपत्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति जीवित हो । सधवा स्त्री ।

जीवपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] नया पत्ता [को०] ।

जीवपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवंती ।

जीवपितृक
वि० [सं०] जिसका पिता जीवित हो [को०] ।

जीवपुत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुत्रजीव वृक्ष । जियापोता का पेड़ । २. इंगुदी का वृक्ष ।

जीवपुत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पुत्र जीवित हो [को०] ।

जीवपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बृहज्जीवंती । बड़ी जीवंती ।

जीवप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरीतकी । हड़ ।

जीवबंद पु
संज्ञा पुं० [स० जीवबन्धु] दे० 'जीवबंधु' ।

जीवबंधु
संज्ञा पुं० [स० जीवबन्धु] गुल दुपहरिया । बंधुजीव । बंधूक ।

जीवबलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] पशु आदि की बलि [को०] ।

जीवबुद्धि
संज्ञा स्त्री० [स० जीव + बुद्धि] सामान्य प्राणियों की समझ । लौकिक बुद्धि । उ०— परि छिन एक में जीवबुद्धि सों बिगरि गई ।—दौ सौ० बावन०, भा०, १, पृ० १३५ ।

जीवभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवंती लता ।

जीवमंदिर
संज्ञा पुं० [स० जीवमन्दिर] देह । शरीर [को०] ।

जीवमातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुमारी, धनदा, नंदा, विमला, मंगला, बला और पद्मा नाम की सात देवियँ जो जीवों का पालन और कल्याण करती हैं । (विधान पारिजात) ।

जीवयाज
संज्ञा पुं० [सं०] पशुओं से किया जानेवाला यज्ञ ।

जीवयोनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] सजीव सृष्टि । जीवजंतु । जानवर ।

जीवरक्त
संज्ञा पुं० [सं०] स्त्रियों का रज जो गर्भधारण के उपयुक्त हुआ हो । विशेष— सुश्रुत के अनुसार यह पंचभौतिक होता है अर्थात् जिन पंचभूतों से जीवों को उत्पत्ति होती है वे इसमें होते हैं ।

जीवरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] जीव । प्राण । उ०— साई सेती चोरिया, चोरा सेती जुभक्त । तब जानेगा जीवरा मार परैगी तुभझ ।— कबीर (शब्द०) ।

जीवरि †
संज्ञा पुं० [स० जीव या जीवन] जीवन । प्राणाधारण की शक्ति । उ०— बी मन माली मदन चुर आलबाल बयो ।प्रेम पय सींच्यों पहिल ही सुभग जीवरि दयो ।—सूर— (शब्द०) ।

जीवल
वि० [सं०] १. जीवनमय । २. जीवनपूर्ण । ३. सजीव करनेवाला । सप्राण करनेवाला [को०] ।

जीवला
संज्ञा स्त्री० [स०] १. सेहली । २. सिंहपिप्पली ।

जीवलोक
संज्ञा पुं० [सं०] भूलोक । पृथ्वीतल । मर्त्यलोक ।

जीववत्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका बच्चा जीवित हो [को०] ।

जीववल्ली
संज्ञा संज्ञा [सं०] क्षीरकाकोली ।

जीवविज्ञान
संज्ञा पुं० [सं० जीव + विज्ञान] जीव जंतुओं विषयक शारीरिक विज्ञान [को०] ।

जीवविषय
संज्ञा [सं०] जीवा या जीवन का विस्तार [को०] ।

जीववृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीव का गुण या व्यापार । २. पशु पालने का व्यवसाय ।

जीवशाक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का शाक जो मालवा देश में अधिक हेता है । सुसना ।

जीवशुक्ला
संज्ञा स्त्री० [सं०] क्षीरकाकोली ।

जीवशेष
वि० [सं०] जिसका केवल प्राण बचा हो । प्राणशेष । [को०] ।

जीवशोणित
संज्ञा पुं० [सं०] सजीव या स्वस्थ रक्त [को०] ।

जीवश्रेष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवभद्रा [को०] ।

जीवसंक्रमण
संज्ञा पुं० [सं० जीवसङ्क्रमण] जीव का एक शरीर से दूसरे शरीर में गमन ।

जीवसंज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] कामवृद्धि वृक्ष ।

जीवसाधन
संज्ञा पुं० [सं०] धान्य । धान ।

जीवसुत
संज्ञा पुं० [सं० जीव + सुत] वह जिसका पुत्र जीवित हो [को०] ।

जीवसुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पुत्र जीता हो ।

जीवसू
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसकी संतति जीती हो । जीवत्तोका ।

जीवस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ जीव रहता है । मर्मस्थान । हृदय ।

जीवहत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्राणियों का वध । २. प्राणियों के वध का दोष ।

जीवहिंसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राणियों की हत्या । जीवों का वध ।

जीवहीन
वि० [सं०] १. मृत । जीवनरहीत । २. प्राणहीन । जहाँ कोई जीव न हो [को०] ।

जीवांतक
संज्ञा पुं० [सं० जीवान्तक] १. जोवों का वध करनेवाला । २. व्याध । वहेलिया ।

जीवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह सीधी रेखा जो किसी चाप के सिरे से दूसरे सिरे तक हो । ज्या । २. धनुष की ड़ोरी । ३. जीवंती । ४. बालवच । वचा । ५. भूमि । ६. जीवन । ७. जीवनोपाय । जीविका । ८. जीवन (को०) । ६. आभरण की खनक या झनक (को०) ।

जीवाजून †
संज्ञा पुं० [सं० जीवयोनि] जीवजंतु । प्रणीमात्र । पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि । उ०—पौ फाटी पगरा हुआ जागे जीवाजून । सब काहू को देत है चोंच समाना चूना ।—कबीर (शब्द०) ।

जीवाणु
संज्ञा पुं० [सं० जीव + अणु] अति सुक्ष्म जीव । क्षुद्रतम जीव । उ०— ऐसा होता है कि जीवाणु कई पुश्तों तक बिना विकसित हुए प्रवाहित रहैं ।—पा०, सा० सि०, पृ० ११२ ।

जीवातु
संज्ञा पुं० [सं०] १. खाद्य । आहार । २. जीवन । अस्तित्व । ३. पुनर्जीवन । ४. जीवनदायक औषध [को०] ।

जीवातुमत्
संज्ञा पुं० [सं०] आयुष्काम यज्ञ का एक देवता जिससे आयु की प्रार्थना की जाती है । (आश्वऔत सूत्र)

जीवात्मा
संज्ञा पुं० [जीवात्मन्] प्राणियों की चेतन वृत्ति का कारणस्वरूप पदार्थ । जीव । आत्मा । प्रत्यगात्मा । विशेष— अनेक धार्मिक और दार्शनिक मतों के अनुसार शरीर से भिन्न एक जीवात्मा है । इसके अनेक प्रमाण शास्त्रों में दिए गए हैं । सांख्य दर्शन में आत्मा की 'पुरुष' कहा है और उसे नित्य, त्रिगुणशून्य, चेतन स्वरूप, साक्षी, कूटस्थ, द्रष्टा । विवेकी, सुख—दुःख—शून्य, मध्यस्थ और उदासीन माना है । आत्मा या पुरुष अकर्ता है, कोई कार्य नहीं करता, सब कार्य प्रकृति करती है । प्रकृति के कार्य को हम अपना (आत्मा का) कार्य समझते हैं । यह भ्रम है । न आत्मा कुछ कार्य करता है, न सुख दुःखादि फल भोगता है । सुख दुःख आदि भोग करना बुद्धि का धर्म है । आत्मा न बद्ध होता है, न मुक्त होता है । कठोपनिषद में आत्मा का परिमाण अंगुष्ठमात्र लिखा है । इसपर सांख्य के भाष्यकार विज्ञानभिक्षु ने बतलाया है कि अंगुष्ठमात्र से आभिप्राय अत्यंत सूक्ष्म से है । योग और वेदांत दर्शन भी आत्मा को सुख दुःख आदि का भोक्ता नहीं मानती । न्याय, वैशेषिक और मीमांसा दर्शन आत्मा को कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता मानते हैं । न्याय वैशेषिक मतानुसार जीवात्मा नित्य, प्रति शरीरभिन्न और व्यापक है । शांकर वेदांत दर्शन में जीवात्मा और परमात्मा को एक ही माना गया है । उपाधियुक्त होने से ही जीवात्मा अपने को पृथक् समझता है, पूर्ण प्राप्त होने पर यह भ्रम मिट जाता है और जीवात्मा ब्रह्मास्वरूप हो जाता है । सांख्य, वेदांत योग आदि सभी जीवात्मा को नित्य मानते है । बौद्ध दर्शन के अनुसार जैसे सब पदार्थ क्षणिक हैं उसी प्रकार आत्मा भी । जीवात्मा एक क्षण में उत्पन्न होता है और दूसरे क्षण में नष्ट हो जाता है । अतः क्षणिक ज्ञान का नाम ही आत्मा है । जिसकी धारा चलती रहती है और एक क्षण का ज्ञान या विज्ञान नष्ट होता है । और दूसरा क्षणिक विज्ञान उत्पन्न होता है । इसे पूर्ववर्ती विज्ञानों के संस्कार और ज्ञान प्राप्त होते रहते हैं । इस क्षणिक ज्ञान के अतिरिक्त कोई नित्य या स्थिर आत्मा नहीं । माध्यमिंक शाखा के बौद्ध तो इस क्षणिक विज्ञान रूप आत्मा को भी नहीं स्वीकार, करते; सबकुछ शून्य मानते हैं । वे कहते हैं कि यदि कोई वस्तु सत्य होती तो सब अवस्थाओं में बनी रहती । योगाचार शाखा के बौद्ध आत्मा को क्षणिक विज्ञान स्वरूप मानते है और इस विज्ञान को दो प्रकार का कहते है । —एक प्रवृत्ति विज्ञान और दूसरा आलय विज्ञान । जाग्रत और सुप्त अवस्था में जो ज्ञान होता है उसे प्रवृत्ति विज्ञान कहते हैं और सुषुप्ति अवस्था में जो ज्ञान होता उसे आलय विज्ञान कहते है । यह ज्ञान आत्मा ही को होता है । जैन दर्शन भी आत्मा को चिर, स्थायी और प्रत्येक प्राणी में पृथक् मानता है । उपनिषदों में जीवात्मा का स्थान हृदय माना है पर आधुनिक परीक्षाओं से यह बात अच्छी तरह प्रगट हो चुकी है कि समस्त चेतन व्यापारों का स्थान मस्तिष्क है । मस्तिष्क को ब्रह्माड़ भी कहते हैं । दे० 'आत्मा' । पर्या०—पुनर्भवी । जीव । असु—मान् । सत्व । देहभृत् । चेतन ।

जीवादान
संज्ञा पुं० [सं०] बेहोशी । मुर्छा । संज्ञाशून्यता [को०] ।

जीवधार
संज्ञा पुं० [सं०] आत्मा का आश्रयस्थान । हृदय । विशेष— उपनिषदों में जीव का स्थान हृदय माना गया है ।

जीवाना †
कि० अ० दे० 'जिलाना' । उ०— तातों या वैष्णव को मरत ते जीवायो ।— दो सौ बावन०, भा० १, पृ० ३२३ ।

जीवानुज
संज्ञा पुं० [सं०] गर्गाचार्य मुनि, जो बृहस्पाति के दंश में हुए हैं । किसी के मत से ये बृहस्पति के भाई भी कहे जाते हैं । उ०— भाषत हम जीवानुज बानी । जा महं होइ सकल दुख हानी ।— गोपाल (शब्द०) ।

जीवास्तिकाय
संज्ञा पुं० [सं०] जैन दर्शन के अनुसार कर्म का करनेवाला, कर्म के फल को भोगनेवाला, किए, हुए कर्म के अनुसार शुभाशुभ गति में जानेवाला और सम्यक् ज्ञानादि के वश से कर्म के समूह को नाशा करनेवाला जीव । विशेष—यह तीन प्रकार का माना गया है,— अनादिसिद्ध, मुक्त और बद्ध । अनादिसिद्ध अर्हत् हैं जो सब अवस्थओं में अविद्या आदि के बंधन से मुक्त तथा अणिमादि सिद्धियों से संपन्न रहते हैं ।

जीविका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह वस्तु या व्यापार जिससे जीवन का निर्वाह हो । भरण पोषण का साधन । जीवनोपाय । वृत्ति । उ०—जीविका विहीन लोग सीद्यमान, सोच बस कहैं एक एकन सों कहाँ जाई का करी ?—तुलसी ग्रं० पृ०, २२१ । क्रि० प्र०—करना । यौ०— जोविकार्जन = जीवन निर्वाह के साधन का संग्रह । उ०— उसे अपने जीविकार्जन की एक मशीन बना रहा है ।— स० दर्शन पृ०, ८८ । मुहा०— जीविका लगना = भरण पोषण का उपाय होना । रोजी का ठिकना होना । जीविका लगाना = मरण पोषण का उपाय करना । जीवन निर्वाह का उपाय करना । रोजी का ठिकाना करना । २. जीवनदायी तत्व अर्थात् जल (को०) । ३. जीवन (को०) ।

जीवित (१)
वि० [सं०] १. जीता हुआ । जिंदा । सप्राण । उ०— उस समय सत्यगुरु का वेष जीवित साधु के समान था ।—कबीर मं०, पृ०, ८१ । २. जो जीव या प्राणयुक्त हो गया हो (को०) । १३. सजीव या सप्राण किया हुआ (को०) । ४. वर्तमान । उपस्थित (को०) ।

जीवित (२)
संज्ञा पुं० १. जीवन । प्राणधारण । यौ०— जीवितेश । २. जीवन अवधि । आयु (को०) । ३. जीविका । रोजी (को०) । ४. प्राणी (को०) ।

जीवितकाल
संज्ञा पुं० [सं०] जीवनकाल । जीवित रहने का समय । आयु [को०] ।

जीवितज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] धमनी [को०] ।

जीवितनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] पति [को०] ।

जीवितव्य (१)
वि० [सं०] जीवित रहने या रखने योग्य [को०] ।

जीवितव्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जीवन । २. जीवित रहने की संभावना । ३. पुनर्जीवित होने की संभावना ।

जीवितव्यय
संज्ञा पुं० [सं०] जीवनोत्सर्ग । जीवन की आहुति [को०] ।

जीवितसंशय
संज्ञा पुं० [सं०] जान का खतरा [को०] ।

जीवितांतक
संज्ञा पुं० [सं० जीवितान्तक] शिव । शंकर । महादेव [को०] ।

जीवितेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राणनाथ । प्यारा व्यक्ति । प्राणों से बढ़कर प्रिय व्यक्ति । २. यमराज । ३. इंद्र । ४. सूर्य । ५. देह में स्थित इड़ा और पिंगला नाडी । ६. एक जीवनदायिनी औषधि जो मृतक तो जीवित करनेवाली कही गई है (को०) ।

जीवितेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] शिव । महादेव [को०] ।

जीवी
वि० [सं० जीविन्] १. जीनेवाला । प्राणधारक । २. जीविका करनेवाला । जैसे— श्रमजीवी । शस्त्रजीवी । विशेष—सामान्यतया इसका प्रयोग समस्त पदों के अंत में होता है । जैसे,— बुद्धिजीवी ।

जीवेंधन
संज्ञा पुं० [सं० जीवेन्धन] जलती हुई लकड़ी या ईधन [को०] ।

जीवेश
संज्ञा पुं० [सं०] परमात्मा । ईश्वर ।

जीवोपाधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत इन तीनों अवस्थाओं को जीव की उपाधि कहते हैं ।

जीव्य
संज्ञा पुं० [सं०] जीवन [को०] ।

जीव्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीवनोपाय । जीविका [को०] ।

जीस्त
संज्ञा स्त्री० [फा० जीस्त] जिंदगी । जीवन । उ०— जीस्ते नहीं है सरासर बस सरगदानी वह है । —भारतेदु ग्रं०, भा०, २, पृ० ५६९ ।

जीह पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० जीभ, सं जिह्वा] जीभ । जबान । उ०— (क) जन मन मंजु कंजु मधुकर से । जीह जसोमति हर हलधर से ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार । तुलसी भीतर बाहरौ जो चाहसि उजियार ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) नाम जीह जपि जागहिं जोगी । तुलसी (शब्द०) ।

जीहि पु
संज्ञा स्त्री० [हि० जीह] दे० 'जीह' ।

जुंग
संज्ञा पुं० [सं० जुङ्ग] वृद्धदारक वृक्ष । विधारा ।

जुंगित (१)
संज्ञा पुं० [सं० जुङ्गित] परित्यक्त । बहिष्कृत [को०] ।

जुंगित (२)
वि० नीच जाति का व्यक्ति । चांड़ाल [को०] ।

जुंड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जुन्हरी', 'ज्वार' ।

जुंदर
संज्ञा पुं० [?] बंदर का बच्चा (कलंदरों की बोली) ।

जुंबाँ
वि० [फ़ा० जुंबाँ] कंपायमान । हिलता हुआ [को०] ।

जुंबिश
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जुंबिश] चाल । गति । हरकत । हिलना डोलना । मुहा०— जुंबिश खाना = हिलना डोलना ।

जुँआँ †
संज्ञा पुं० [सं० यूका] दे० 'जूँ' ।

जुँई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जुई' ।

जुँबली
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुंबा] एक प्रकार की पहाड़ी भेड़ ।

जु (१)पु
वि० [हिं०] दे० 'जो' । उ०— करत लाल मनुहारि, पै तू न लखति इहि ओर । ऐसो उर जु कठोर तौ उचिताहि उरज कठोर ।—माति० ग्र०, पृ० ४०८ ।

जु (२) पु
संज्ञा पुं० [हिं० जू] दे० 'जू' ।

जुअती पु
संज्ञा स्त्री० [सं० युवती] दे० 'युवती' ।

जुअल पु
वि० [सं० युगल, प्रा०, जुअल] दे० 'युगल' । उ०— एम कोप्पिअ सुनिअ सुरूतान, रोमञ्चिअ भुआ जुअल ।—कीर्ति०, पृ०, ६० ।

जुआँ
संज्ञा पुं० [सं० यूका, प्रा० जूआ] [स्त्री० अल्पा० जुई] एक छोटा कीड़ा जो मैलेपन के कारण सिर के बालों में पड़ जाता हैं । जूँ । ढील ।

जुआँरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० जुआँ] जूआँ । छोटी जुआँ ।

जुआँरी † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'ज्वार' ।

जुआ (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्यूत, पा० जूत] वह खेल जिसमें जीतनेवाले को हारनेवाले से कुछ धन मिलता है । रुपए पैसे की बाजी लगाकर खेल जानेवाला खेल । किसी घटना की संभावना पर हार जीत का खेल । द्यूत । उ०— आछो जनम अकारथ गायो । करी न प्रीति कमललोचन सों जन्म जुआ ज्यों हारयो—सूर (शब्द०) । विशेष— जुआ कौड़ा, पासे, ताश आदि कई वस्तुओं से खेला जाता है पर भारत में कोड़ियों से खेलने का प्रचार आजकल विशेष है । इसमें चित्ती कोड़ियों को लेकर फेकते हैं और चित्त पड़ी हुई कौड़ियों की संख्या के अनुसार दाँवों की हार जीत मानते हैं । सोलह चित्ती कौड़ियों से जो जुआ खेल जाता है उसे सोरही कहते हैं । क्रि० प्र०— खेलना ।—जीतना ।—हारना ।—होना ।

जुआ (२)
संज्ञा पुं० [सं० युज (= जोड़ना)] १. गाड़ी, छकड़े, हल आदि की वह लंकड़ी जो बैलीं के कंधे पर रहती है । २. जांते के चक्की या मूँठ ।

जुआ (३)
संज्ञा पुं० [हि० जुवा] दे० 'युवा' । उ०— बाल बुद्ध जुआ नर नारिन की एक संग । —प्रेमघन०, भा० १, पृ०, ८९ ।

जुआखाना
संज्ञा पुं० [हिं० जुआ + फ़ा० खाना] वह स्थान जहाँ जुआ खेला जाता हो । जुआ खेलने का अड्ड़ा ।

जुआचोर
संज्ञा पुं० [हि० जुआ + चोर] १. वह जुआरी जो अपना दाँव जीतकर खिसक जाय । २. धोखेबाज । धोखा देकर दूसरों का माल उड़ा लेनेवाला । ठग । वंचक ।

जुआचोरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुआ + चोरी] ठगी । धोखेबाजी । वंचकता । क्रि० प्र०— करना ।

जुआठ †
संज्ञा पुं० [हिं० जुआ + काठ] दे० 'जुआठा' ।

जुआठा
संज्ञा पुं० [सं० युग + काष्ठ] हल में लगनेवाला वह लकड़ी का ढाँचा जो बौलों के कंधों पर रहता है ।

जु्आड़ी
संज्ञा पुं० [हिं० जुआरी] दे० 'जुआरी' ।

जुआन †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जुवान' ।

जुआनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुआन + ई (प्रत्य०)] दे० 'जवानी' ।

जुआव पु
संज्ञा पुं० [फ्रा० जवाब] दे० 'जबाब' । उ०— आवे जाड़ जनावे तुषार, हिए बिरहानल जुआब भए की ।—हिंदी प्रेमा, पृ०, २७१ ।

जुआर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० ज्वार] दे० 'ज्वार' । उ०— जाएखने दितहु आलिंगन गाढ़ । जनि जुआर परुसे खेलपाढ़ ।— विद्यापति, पृ० ३४३ ।

जुआर पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० जुआ + आर (प्रत्य०)] जुआ खेलनेवाला व्यक्ति । जुआड़ी । उ०— संशय सावज शरीर महँ, संगहि खेल जुआर ।—कबीर बी०, पृ० ८८ ।

जुआर (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० ज्वार] दे० 'ज्वार' ।

जुआरदासी
संज्ञा स्त्री० [?] एक प्रकार का पौधा जो फूलों के लिये लगया जाता है ।

जुआर भाटा
संज्ञा [हिं० ज्वारभाटा] दे० 'ज्वार भाटा' ।

जुआरा
संज्ञा पुं० [हिं० जोतार] उतनी धरती जितनी एक जोड़ी बैल एक दिन में जोत सके ।

जुआरी
संज्ञा पुं० [हिं० जुआ] जुआ खेलनेवाला ।

जुइना †
[सं० यूनि (= बंधन या जोड़] घास या फूस की ऐंठकर बनाई हुई रस्सी जो बोझ बाँधने के काम में आती है ।

जुई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जू] १. छोटी जुआँ । २. एक छोटा कीड़ा जो मटर, सेम इत्यादि की फलियों में लगकर उन्हें नष्ट कर देता है ।

जुई (१)
संज्ञा स्त्री० [?] बरछी के आकार का काठ का बना वह पात्र जिससे हवन में घी छोड़ा जाता है । श्रुवा ।

जुई (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० यूथी, हिं० जुही] दे० 'जुही' ।

जुकति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] दे० 'जुगत' । उ०— उकति जुकति रसभरी उठाऊँ । भागमरी को हरष बढ़ाऊँ ।— घनानंद, पृ० २४२ ।

जुकाम
संज्ञा पुं० [हिं० जुड़ + घाम वा अ० जुकाम; तुलनीय सं० यक्ष्मनू, * जखम, > जुखाम] अस्वस्थाता या बीमारी जो सरदी लगने से होती है और जिसमें शरीर में कफ उत्पन्न हो जाने के कारण नाक और मुँह से कफ निकलता है, ज्वरांश रहता है, सिर भारी रहता और दर्द करता है । सरदी । क्रि० प्र०— होना । मुहा०— जुकाम बिगड़ना = जुकाम का सूख जाना । मेढ़की को जुकाम होना = किसी मनुष्य में कोई ऐसी बात होना जिसकीउसमें कोई संभावना न हो । कीसी मनुष्य का कोई ऐसा काम करना जो उसने कभी न किया हो या जो उसके स्वभाव या अवस्था के विरुद्ध हो ।

जुकुट
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुत्ता । २. मलय पर्वत [को०] ।

जुक्ति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] १. मिलनयोग । उ०—तन चंपक कुंदन मनो कै केसर रंग जुक्ति ।— पृ० रा०, ९ । ५४ । २. उपाय । यत्न । उ०—धृत मन बास पास मनि तेहि माँ, करि सो जुक्ति बिलगावा ।— जब्बानी, पृ० ४७ ।

जुग
संज्ञा पुं० [सं० युग] १. युग । मुहा०— जुग जुग = चिर काल तक । बहुत दिनों तक । जैसे,— जुग जुग जीऔ । २. दो । उभय । उ०— बाला के जुग कान मैं बाला सोभा देत ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३८८ । ३. जत्था । गुट्ट । दल । गोल । मुहा०—जुग टूटना = (१) किसी समुदाय के मनुष्यों का परस्पर मिला न रहना । अलग अलग हो जाना । दल टूटना । मंड़ली तितर बितर होना । जैसे —सामने शत्रु सेना के दल खड़े थे, पर आक्रमण होते ही वे इधर उधर भागने लगे और उनके जुग टूट गए । (२) किसी दल या मंड़ली में एकता या मेल न रहना । जुग फूटना = जोड़ा खंड़ित होना । साथ रहनेवाले दो मनुष्यों में से किसी एक का न रहना । ३. चौसर के खेल में दो गोटियों का एक ही कोठे में इकट्ठा होना । जैसे, छुग छूटा कि गोटी मरी । ४. वह डोरा जिसे जुलाई तारों को अलग अलग रखने के लिये ताने में ड़ाल देते हैं । ५. पुश्त । पीढ़ी ।

जुगजुगाना
क्रि० अ० [ हिं० जगन (= प्रज्वलित होना)] १. मंद मंद और रह रहकर प्रकाश करना । मंद ज्योति से चम- कना ।— टिमटिमाना । जैसे, तारों का जुगजुगाना । उ०— कोठरी के कोने में एक दिया जुगजुग रहा था । २. अवनत या हीन दशा से क्रमशः कुछ उन्नत दशा को प्राप्त होना । कुछ कुछ उभरना । कुछ कीर्ति या समृद्धि प्राप्त करना । कुछ बढ़ना या नाम करना । जैसे,— वे इधर कुछ जुगजुगा रहे थे कि चल बसे ।

जुगजुगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुगजुगाना] एक चिड़िया जिसे शकर- खोरा भी कहते हैं ।

जुगत (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] १. युक्ति । उपाय । तदबीर । ढंग । उ०— सब्द मस्कला करै ज्ञान का कुरँड़ लगावै । जोग जुगत से मलै दाग तब मन का जावै ।— पलटू०, भा०, १, पृ० २ । क्रि० प्र०— करना । मुहा०— जुगत भिड़ना या मिलाना या लगाना = जोड़ तोड़ बैठाना । ढ़ंग रचना । उपाय करना । तदबीर करना । २. व्यवहारकुशलता । चतुराई । हथकंड़ा । ३. चमत्कारपूर्ण उक्ति । चुटकुला ।

जुगति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] उपाय । तदबीर । उ०— जोग- जुगति सिखए सबै मनौ महामुनि मैन । चाहत पिय अदैतता काननु सेवत नेन । —बिहारी र०, दो० १३ ।

जुगती (१)
वि० [हिं० जुगत + ई (प्रत्य०)] उपायी । युक्ति- कुशल । जोड़ तोड़ बैठा लेने में कुशल ।

जुगती (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] युक्ति । उपाय । उ०— कोई कहे जुगती सब जानूँ कौइ कहे मैं रहती । आतम देव सों पारयी नाहीं यह सब झूठी कहनी ।—कबीर श०, भा० १, पृ० १०१

जुगनी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जीगना] दे० 'जुगनू' ।

जुगनी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का गाना जो पंजाब में गाया जाता है ।

जुगनी (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का आभूषण ।वि० दे० 'जुगन' २.' । उ०—गल में कटवा, कंठा, हँसली, उर मैं हुमेल कल चंपकली, जुगनी चौकी, मूँगे नगली ।—ग्राम्या०, पृ० ४० ।

जुगनू
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिरिङ्गण, प्रा०, जोड़ंगण अथवा हिं० जुग- जुगाना] १. गुबरैले की जाति का एक कीड़ा जिसका पिछला भाग आग की चिनगारी की तगह चमकता है । यह कीड़ा बरसात में बहुत दिखाई पड़ता है । खद्योत । पटबीजना । विशेष— तितली, गुबरैले, रेशम के कीड़े आदि की तरह यह कीड़ा भी ढोले के रूप में उत्पन्न होता है । ढोले की अवस्था में यह मिट्टि के घर में रहता है और उसमें से दस दिन के उपरांत रूपांतरित होकर गुबरैले के रूप में निकलता है । इसके पिछले भाग से फासफरस का प्रकाश निकलता है । सबसे चमकीले जुगनू दक्षिणी अमेरिका में होते हैं जिनसे कहीं कहीं लोग दीपक का काम भी लेते हैं । इन्हें सामने रखकर लोग महीन से महीन अक्षरों की पुस्तकें भी पढ़ सकते हैं । २. स्त्रियों का एक गहना जो पान के आकार का होता है और गले में पहना जाता है । रामनामी ।

जुगम पु
वि० [सं० युग्म] दे० 'युग्म' । उ०— ररो ममु जुगम औ अंक वाकी रह्या ।—रघु० रू०, पृ० ५७ ।

जुगल
वि० [सं० युगल] दे० 'जुगल' । उ०— लाल कंचुकी मैं उगे जोबन जुगल लखात ।—भारतेदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३८७ ।

जुगलस्वरूप पु
संज्ञा पुं० [सं० युगल + स्वरूप] १. नियामक प्रकृति पुरुष के रूप में मान्य युग्म विग्रह ।२. राधाकृष्ण ।उ०— तब युगाल स्वरूप ने वा कोठी में ही दरसन दीनो ।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ७८ ।

जुगलिया
संज्ञा पुं० [?] जैन कथाओं के आनुसार वह मनुष्य जिसके ४०९६ बाल मिलकर आजकल के मनुष्यों के एक बाल के बराबर हों ।

जुगवना
क्रि० सं० [सं० योग + अवना (प्रत्य०)] १. संचित रखना । एकत्र करना । जोड़ जोड़कर रखना कि समय पर काम आए । २. हिफाजत से रखना । सुरक्षित रखना ।यत्न और रक्षापूर्वक रखना ।

जुगाड़ †
संज्ञा पुं० [देश० अथवा सं० योग (= जोयन) + हिं० आड़ (प्रत्य०)] १. व्यवस्था । कार्यसाधन का मार्ग ।२. युक्ति । क्रि० प्र०— करना । बैठाना ।

जुगादरी
वि० [सं० युगान्तरीय] बहुत पुराना । बहुत दिनों का ।

जुगाना †
क्रि० सं० [हिं० जुगवना] दे० 'जुगवना' । उ०—जस भुवंगम मणि जुगावे अस शिष्य गुरू आज्ञा गहे ।— कबीर सा० पृ० २१२ ।

जुगर †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'जुगली' उ०— बैठे हिरन सुहाव ने जिन पै करत जुगर ।—शकुतला, पृ० ११९ ।

जुगलना
क्रि० अ० [सं० अदिगलन (= उगलना)] सींगवाले चौपायों का निगले हुए चारे को थोड़ा थोड़ा करके गले से निकाल मुँह में लेकर फिर से धोरे धोरे चबाना । पागुर करना ।

जुगलो
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुगलना] सींगवाले चौपायों की निगले हुए चारे को गले से थोड़ा थोड़ा निकाल निकाल फिर से चबाने की क्रिया । पागुर । रोमंथ । क्रि० प्र०— करना ।

जुगी (१) पु
संज्ञा पुं० [सं० योगी] योग करनेवाला । जोगी । उ०— रिषि संत जनी जगम जुती रहहिं ध्यान आरंभ मह ।—पृ० रा०, १२ ।८९ ।

जुगी (२)पु
वि० [हिं० युगी] युग से संबंध रखनेवाला । युग का । विशेष— इसका प्रयोग समास में ही मिलता है । जैसे सतयुगी, कलयुगी ।

जुगुत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] दे० 'जुगत' ।

जुगुति
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] दे० 'जुगत' । उ०— हीत डमरू कर लौआ संख । जोग जुगुति गिम भरल माथ ।—विद्यापति, पृ०, ३९७ ।

जुगुप्सक
वि० [सं०] व्यर्थ दूसरे की निंदा करनेवाला ।

जुगुप्सन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० जुगप्स, जुगुप्सित] निंदा करना । दूसरे की बुराई करना ।

जुगुप्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. निंदा । गर्हणा । बुराई ।२. अश्रद्बा । घृणा । विशेष—साहित्य में यह बीभत्स रस का स्थायी भाव है और शांत रस का व्यभिचारी । पतंजलि के अनुसार शौच या शुद्धि लाभ कर लेने पर अपने अंगों तक से जो घृणा हो जाती है और जिसके कारण सांसारिक प्राणियों तक का संसर्ग अच्छा नहीं लगता, उसका नाम 'जुगुप्सा' है ।

जुगुप्सित
वि० [सं०] निदित । घृणित ।

जुगुप्सु
वि० [सं०] निंदक । बुराई करनेवाला ।

जुगुप्सू
वि० [सं०] दे० 'जुगुप्सु' ।

जुग्त
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्ति] दे० 'युक्ति' । उ०— जोग जुग्त ते भरम न छूटै जब लग आपन सूझै । कहै कबीर सोइ सतगुरु पूरा जो कोइ समझै बूझै ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ५२ ।

जुग्म
वि० [सं०युग्म] दे० 'युग्म' ।—अनेकार्थ०, पृ० ३३ ।

जुज (१)
संज्ञा पुं० [अ० जुज, मि० सं० युज्] १. कागज के ८ पुष्ठों या १६ पुष्ठों का समूह । एक फारम । यौ०— जुजबंदी । २. अंश । टुकड़ा । उ०— जुज से कुल कतरे से दरिया बन जावे । अपने को खोये तब अपने को पावे ।— भारतेंदु ग्रं०, भा०, २, पृ० ५६८ ।

जुज (२)
अव्य० [फ़ा० जुज] ...को छोड़कर ।...के सिवा । बिना । बगैर [को०] ।

जुजदान
संज्ञा पुं० [अ० जुज + फ़ा० दान] बस्ता । वह थैला जिसमें लड़के पुस्तकें आदि रखते हैं ।

जुजबंदी
संज्ञा पुं० [अ० जुज + फ़ा० बंदी] किताब की सिलाई जिसमें आठ आठ वा सोलह सौलह पन्ने एक साथ सिए जाते है । क्रि० प्र०— करना ।

जुजरस
वि० [अ० जुजरस] १. सूक्ष्मदर्शी । तीव्र बुद्धिवाला । २. मितव्ययी । ३. कंजूस । कृपण [को०] ।

जुजरसी
संज्ञा स्त्री० [अ० जुजरसी] १. सूक्ष्मदर्शिता । २. मित- व्यायिता [को०] ।

जुज व कुल
संज्ञा पुं० [अ० जुज व कुल] अंश और संपूर्ण । सपूर्ण । कुल [को०] ।

जुजवी
वि० [अ० जुज्वी] १. बहुत में से कोई एक । बहुत कम । कुछ थोड़े से । २. बहुत छोटे अंश का । जैसे, जुजवी हिस्सेदार ।

जुजाम
संज्ञा पुं० [अ० जजाम] कुष्ठ रोग । कोढ़ । उ०— फिल फोर हुआ है उसके जुजाम । जीने से किया उसके नाकाम ।—दक्खिना०, पृ० २२६ ।

जुजीठल पु
संज्ञा पुं० [सं० युधिष्ठिर] राजा युधिष्ठिर । (ड़िं०) ।

जुज्झ पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० युद्ध, प्रा०, जुज्झ] युद्ध । लड़ाई । उ०— छमा तरवार से जगत को बसि करे, प्रेम की जुज्झ मैदान होई ।— पलटू०, भा० २, पृ० १५ ।

जुझवाना पु †
क्रि० स० [हिं० जुझाना] १. लड़ने के लिये प्रोत्साहित करना । लड़ा देना । २. लड़ाकर मरवा डालना ।

जुझाऊ
वि० [हिं० जुज्झ, जूझ + आऊ (प्रत्य०)] १. युद्ध का । युद्ध संबंधी । जिसका व्यवहार रणक्षेत्र में हो । लड़ाई में काम आनेवाला । उ०— बाजे बिहद जुझाऊ बाजैं । निरतैं मग तुरंग गज गाजै ।— हम्मीर०, पृ० ५१ । २. युद्ध के लिये उत्साहित करनेवाला । जैस, जुझऊ बाजा, जुझाऊ राग । उ०— बाजहिं ढोज निसान जुझाऊ । सुनि सुनि होय भटन मन चाऊ ।—तुलसी (शब्द०) ।

जुझाना
क्रि० सं० [सं० युद्ध प्रा०, जुज्झ] १. लड़ा देना । युद्ध के लिये प्रेरित करना । २. युद्ध में मरवा डालना ।

जुझार पु †
वि० [हिं० जुज्झ + आर (प्रत्य०)] लड़ाका । सूरमा । वीर । बाँकुरा । बहादुर । उ०— सकल सुरासुर जुराहिं जुझारा । रामहिं समर को जीतनहारा ।—तुलसी (शब्द०) ।

जुझावर
वि० [हिं० जुज्झ + आवर (प्रत्य०)] जुझनेवाला । उ०— जहँ बजै जुझवर बाजा, सब कारण उठि उठि भाजा ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० २० ।

जुट
संज्ञा स्त्री० [सं० युक्त, प्रा० जुत्त अथवा सं० √ जुट? ] १. दोपरस्पर मिली हुई वस्तुएँ । एक साथ के दो आदमी या वस्तु । जोड़ी । जुग । २. एक साथ बँधी या लगी हुई वस्तुओं का समूह । लाट । थोक । ३. गुट । मंड़ली । जत्था । दल । ४. ऐसे दो मनुष्य जिनमें खूब मेल हो । जैसे,— उन दोनों की एक जुट हैं । ५. जोड़ का आदमी या वस्तु ।

जुटक
संज्ञा पुं० [अ०] १. जटा । २. गुंथी । चोटी । जूड़ा [को०] ।

जुटना
क्रि० अ० [सं० युक्त प्रा०, जुत्त + ना (प्रत्य०) या/?/सं० जुड़् बाँधना] १. दो या अधिक वस्तुओं का परस्पर इस प्रकार मिलना कि एक का कोई पार्श्व या अंग दूसरे के किसी पार्श्व या अंग के साथ दृढ़तापूर्वक लगा रहे । एक वस्तु का दूसरी वस्तु के साथ इस प्रकार सटना कि बिना प्रयास या आघात के अलग न हो सके । दो वस्तुओं का बँधने, चिपकने, सिलने या जड़ने के कारण परस्पर मिलकर एक होना । संबद्ध होना । संश्लिष्ट होना । जुड़ाना । जैसे,— इस खिलौने का टूटा सिर गोंद से नहीं जुटता, गिर गिर पड़ता है । संयो० क्रि०— जाना । विशेष— मिलकर एक रूप हो जानेवाले द्रव या चूर्ण पदार्थो के संबंध में इस क्रिया का प्रयोग नहीं होता । २. एक वस्तु का दूसरी वस्तु के इतने पास होना कि दोनों के बीच अवकाश न रहे । दो वस्तुओं का परस्पर इतने निकट होना कि एक का कोई पार्श्व दूसरे के किसी पार्श्व से छू जाय । भिड़ना । सटना । सटना । लगा रहना । जैसे,— मेज इस प्रकार रखो कि चारपाई से जुटी न रहे । ३. लिपटना । चिमटना । गुथना । जैसे— दोनों एक दूसरे से जुटे हुए खूब लात घूँसे चला रहे हैं । ४. संभोग करना । प्रसंग करना । ५. एक ही स्थान पर कई वस्तुओं या व्याक्तियों का आना या होना । एकत्र होना । इकट्ठा होना । जमा होना । जैसे,— भीड़ जुटना, आदमियों का जुटना, सामान जुटना । ६. किसी कार्य में योग देने के लिये उपस्थित होना । जैसे,— आप निश्चिंत रहें, हम मौके पर जुट जायैगे । ७. किसी कार्य में जी जान से लगना । प्रवृत्त होना । तत्पर होना । जैसे,—ये जिस काम के पीछे जुटते हैं उसे कर ही के छोड़ते हैं । ८. एकमत होना । अभिसंधि करना । जैसे, —दोनों ने जुटकर यह उपद्रव खड़ा किया है ।

जुटली
वि० [सं० जूट] जूड़ेवाला । जिसे लंबे लंबे बालों की लट हो । उ०— सखी री नंदनंदनु देखु । धूरि धूसर जटा जुटली हरि किए हर भेषु ।—सूर (शब्द०) ।

जुटाना
क्रि० सं० [हं० जुटना] १. दो या अधिक वस्तुओं को परस्पर इस प्रकार मिलाना कि एक का कोई पार्श्व या अंग दूसरे के किसी पार्श्व या अंग के साथ दृढ़तापूर्वक लगा रहे । जो़ड़ना । संयो क्रि०— देना । २. एक वस्तु तो दूसरे के इतने पास करना कि एक क कोई भाग दूसरे के किसी माग से छू जाय । भिड़ाना । सटाना । ३. इक्टठा करना । एकत्र करना । जमा करना ।

जुटाव
संज्ञा पुं० [हिं० जुट + आव (प्रत्य०)] जमाव । बटोर ।

जुटिका
संज्ञा स्त्री० [स्त्री०] १. शिखा । चुंदी । चुटैया । २. गुच्छा । लट । जुड़े । जु़ड़ी । ३. एक प्रकार का कपूर ।

जुट्टा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जुटना] १. घास, पत्तियों या टहनियों का एक में बँधा पूला । आँटी । २. एक समूह या जुट में उगनेवाली घास जाति ती कोई वनस्पति । जैसे, सरपत का जुट्टा काँस का जुट्टा ।

जुट्टा (१)
वि० परस्पर मिला या सटा हुआ ।

जुट्टी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०जुटना] १. घास, पत्तियों या टहनियों का एक में बँधा हुआ छोटा पूला । आँटिया । जूरी । जैसे, तंबाकू की जुट्टी, पुदीने की जुट्टी । २. सूरन आदि के नए कल्ले जो बँधे हुए निकलते हैं । ३. तले ऊपर रखी हुई एक प्रकार की कई चिपटी (पत्तर या परत के आकार की) वस्तुओं का समूह । गड्डी । जैसे, रोटियों की जुट्टी, रुपयों की जुट्टी, पैसों की जुट्टी । †४. एक पकवान जो शाक या पत्तों को बेसन, पीठी आदि में लपेटकर तलने से बनता है ।

जुट्टी (२)
वि० जुटी या मिली हुई । जेसे, जुट्टी र्भौं ।

जुठारना
क्रि० स० [हि० जूठा] १. खाने पीने की किसी वस्तु को कुछ खाकर छोड़ देना । खाने पीने की किसी वस्तु में मुँह लगाकर उसे अपवित्र या दूसरे के व्यबहार के अयोग्य करना । उच्छिष्ट करना । विशेष— हिंदू आचार के अनुसार जूठी वस्तु का खाना निषिद्ध समझा जाता है । संयो० क्रि० —ड़ालना । देना । २. किसी वस्तु को भोग करके उसे किसी दूसरे के व्यवहार के अयोग्य कर देना ।

जुठिहारा
संज्ञा पुं० [हिं० जूठा + हारा] [स्त्री० जुठिहारी] जूठा खानेवाला । उ०— सूरदास प्रभु नंदनंदन कहैं हम ग्वालन जुठिहारे ।— सूर— (शब्द०) ।

जुठैल †
वि० [हिं० जूठा + ऐल(प्रत्य०)] उच्छिष्ठ । जूठा ।

जुठौला
संज्ञा स्त्री० [देश०] छोटे पैरोंवाली बादामी रंग की एक चिड़िया जो समूह में रहती है ।

जुड़ँगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुड़ना + अंग] अति निकट का संबंध । अंग और अंगी जैसी घनिष्ठता ।

जुड़ना
क्रि० अ० [हिं० जुटना या सं०, जुड़ (= बाँधना)] १. दो या अधिक वस्तुओं का परस्पर इस प्रकार मिलना कि एक का कोई पार्श्व या अंग दूसरे के किसी पार्श्व या अंग के साथ दृढ़तापूर्वक लगा रहे । दो वस्तुओं का बँधने, चिपकने, सिलने, या जड़े जाने के कारण परस्पर सिलकर एक होना । संबद्ध होना । संश्लिष्ट होना । संयुक्त होना । क्रि० प्र०—जाना । २. संयोग करना । संभोग करना । प्रसंग करना । †३. इकट्ठा होना । एकत्र होना । ४. किसी काम में योग देने के लियेउपस्थित होना । ५. उपलब्ध होना । प्राप्त होना । मिलना । मयस्सर होना । जैसे, कपड़े लत्ते जुड़ना । उ०— उसे तो चने भी नहीं जुड़ते । ६. गाड़ी आदि में बैल लगाना । जुतना ।

जुड़ापित्ती
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूड़ + पित्त] शीत और पित्त से उत्पन्न एक रोग जिसमें शरीर में खुजली उठती है और बड़े बड़े चकत्ते पड़ जाते हैं ।

जुड़वाँ (१)
वि० [हिं० जुड़ना] जुड़े हुए । यमल । गर्भकाल से ही एक में सटे हुए । जैसे, जुड़वाँ बच्चें । विशेष—इस शब्द का प्रयोग गर्भजात बच्चों के लिये ही हीता है ।

जुड़ावाँ (२)
संज्ञा पुं० एक ही साथ उत्पन्न दो या अधिक बच्चे ।

जुड़वाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुड़वाना] दे० 'जोड़वाई' ।

जुड़वाना (१) †
क्रि० स० [हिं० जूड़] १. ठंढा करना । सुखी करना । जैसे, छाती जुड़वाना ।

जुड़वाना (२) †
क्रि० स० [हिं० जो़ड़वाना] दे० 'जोड़वाना' ।

जुड़ाई (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़ाई] दे० 'जोड़ाई' ।

जुड़ाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हि० जुड़ाना] ठंढक । शीतलता । जाड़ा । उ०— जौ करि कष्ट जाइ पुनि कोई । जातहिं नींद जुड़ाई होई ।—मानस, १ । ३९ ।

जुड़ाना (१) †
क्रि० अ, [हिं० जूड़] १. ठंढ़ा होना । शीतल होना । २. शांत होना । तृप्त होना । प्रसन्न होना । संतुष्ट होना । संयो० क्रि०— जाना ।

जुड़ाना (२)
क्रि० सं० १. ठंढा करना । शीतल करना । २. शांत और संतुष्ट करना । तृप्त करना । प्रसन्न करना । उ०— खोजत रहेउ तोहि सुतघाती । आजु निपति जुड़ाबहुँ छाती ।—तुलसी (शब्द०) । संयो० क्रि०—ड़ालना ।—देना । —लेना ।

जुड़ाना (३)
क्रि० सं० [हिं० जुड़ाना का क्रि० सं० रूप] जो़ड़ने का काम किसी और से कराना ।

जुड़ावना †
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'जुड़ाना' ।

जुड़ावाँ
वि०, संज्ञा पुं० [हिं० जुडवाँ] दे० 'जुड़वा' ।

जुड़ीशल
वि० [अं०] दीवानी या फौजदारी संबंधी । न्याय संबधी ।

जुत पु
वि० [सं युत ] दे० 'युत' । उ०—(क) जानी जानी नारिन दवारि जुत बन में । —मतिराम (शब्द०) । (ख) जननद जुत नरवर लई अरु उज्जैन अपार । दब्बोहा पारेछ लइ, रैयत करी पुकार ।—प० रासो, पृ०, ८८ ।

जुतना
क्रि० अं० [सं० युक्त प्रा० जुत्त] १. बैल, घोडे आदि का गाड़ी में लगना । नधना । २. किसी काम में परिश्रमपूर्वक लगना । किसी परिश्रम के कार्य में तत्पर संलग्न होना । जैसे—वह दिन भर काम में जुता रहता है । ३. लड़ाई में लगना । गुथना । जुटना । ४. जोता जाना । हल चलने के कारण जमीन का खुदकर भुरभुरी ही जाना । जैसे,—यह खेत दिन भर में जुत जायग ।

जुतवाना
क्रि० स० [हिं० जोतना] १. दूसरे जोतने का काम करवाना । दूसरे से हल चलवाना । जैसे, जमीन जुतवाना, खेत जुतवाना । संयो० क्रि०— देना । २. बैल, घोड़े को गाड़ी, हल आदि में खींचने के लिये लगवाना । नधवान । विशेष— इस क्रिया का प्रयोग जो पशु जोते जाते हैं तथा जिस वस्तु में जोते जाते हैं । दोनों के लिये होता है । जैसे, घोड़े जुतवाना, गाड़ी जूतवाना । संयो० क्रि०—देना ।

जुताई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोताई' ।

जुताना
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'जोताना' ।

जुतियाना
क्रि० स० [हिं० जूता से नामिक धातु] १. जूता मारना । जूतों से मारना । जूते लगाना । २. उत्यंत निरादर करना । अपमानित करना ।

जुतियौअल
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुतियाना + औवल (प्रत्य०)] परस्पर जूतों की मार । क्रि० प्र०— होना ।

जुत्थ पु
संज्ञा पुं० [सं० यूथ] दे० 'यूथ' ।

जुथौली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक छोटी चिड़िया । विशेषे— इसकी छाती और गरदन का कुछ अंश सफेद और बाकी भूरा होता है ।

जुदा
वि० [फ़ा०] [स्त्री० जुदी] १. पृथक् । अलग । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०— जुदा करना = नौकरी से छुड़ाना । काम से अलग करना २. भिन्न । निराला । ३. अन्य । दूसरा (को०) । ४. विरही । विरहग्रस्त (को०) ।

जुदाई
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] बिछोह । वियोग । दो व्यक्तियों का एक दूसरे से अलग होने का भाव । विरह । क्रि० प्र०—होना ।

जुदागाना
क्रि० वि० [फ़ा० जुदागानह्] अलग अलग । पृथक् पृथक् । उ०— हर मुल्क की चाल चलन, लिबास, पोशाक और रस्मी रिवाज जुदागाना होता है ।— प्रेमघन, भा० २, पृ० १५७ ।

जुदी
वि० स्त्री० [फ़ा० जुदी] दे० 'जुदा' ।

जुद्ध
संज्ञा पुं० [सं० युद्ध] दे० 'युद्ध' । उ०— साहव दी सुरतनां आइ गज जुद्ध निरष्षिय ।— पृ० रा०, १९ । १०२ ।

जुध पु
संज्ञा पुं० [सं० युद्ध] दे० 'युद्ध' । उ०— हौं ब्रह्म राय जुध करन जोग । जुध भाजि जाउ तौ परै सोग ।—पृ०, रा०, १ ।४४५ ।

जुधवान् पु
संज्ञा पुं० [सं० युद्ध + हिं० वान (प्रत्य०)] योद्धा । युद्ध करनेवाला व्यक्ति ।

जुनब्बी पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० जनब] जनब नगर की निर्मित तलवार । उ०— जगि जोर जुनब्बैँ फहरत फब्बैं सुंड़नि गब्बै फर पाटै ।— पद्माकर ग्रं० पृ० २७ ।

जुना †
वि० [हिं० जूना] दे० 'जीर्ण' । उ०— जो जुने थिगले सिया है इस बजा । कुछ अजब तेरी कदर है औ कजा ।—दक्खिनी०, पृ० १७५ ।

जुनारदार
वि० [अ० जुन्नार + फ़ा० दार] १. ब्राह्मण । २. जनेऊ धारण करनेवाला । उ०— केसोदास मारू मरि हरम कमठ कटी जैन खाँ जुनारदार मारे इक नौर के ।—अकबरी० पृ० ११६ ।

जुनिपर
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रकार का अंग्रेजी फूल जो कई रंगों का होता है ।

जुनूँ
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'जुनून' । उ०— जंजीर जुनूँ कड़ी न पड़ियो । दीवाने का पाँव दरमियाँ है ।— प्रेमघन, भा० २, पृ०, ४०६ ।

जुनून
संज्ञा पुं० [अ०] पागलपन । सनक । झक । उन्माद ।

जुनूनी
वि० [अं०] विक्षिप्त । सनकी । उन्मत्त [को०] ।

जुनूब
संज्ञा पुं० [अ० जुनूब] दक्षिण । दक्खिन [को०] ।

जुन्नार
संज्ञा पुं० [अ०] यज्ञोपवीत । जनेऊ । उ०— बा तजरबये तसबीहो जुन्नार झुका ।— कबीर मं०, पृ० ४६८ ।

जुन्हरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० यवनाल] ज्वार नाम का अन्न ।

जुन्हाई †
संज्ञा [सं० ज्योत्स्ना, प्रा०, जोन्हा] १. चाँदनी । चंद्रिका । उ०— सुमन बास स्फुटत कुसुम निकर तैसी है शरद जैसी रैन जुन्हाई ।—अकबरी०, पृ०, ११२ । २. चंद्रमा ।

जुन्हार †
संज्ञा स्त्री० [सं० यवनाल] ज्वार नाम का अन्न ।

जुन्हैया †
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योत्स्ना, प्रा० जोन्हा, हिं० जोन्ही + ऐया (प्रत्य०)] १. चाँदनी । चंद्रिका । चंद्रमा का उजाला । २. चंद्रमा । उ०— अहित अनैसी ऐसी कौन उपहास याते सोचन खरी मैं परी जोवति जुन्हैया को ।— पद्माकर (शब्द०)

जुफ्त
संज्ञा पुं० [फ्रा० जुफ्त] १. युग्म । जोड़ा । २. सम संख्या जो दो से बँट जाय । ३. जूता [को०] ।

जुबक पु
संज्ञा पुं० [सं० युवक] दे० 'युवक' । उ०— प्रात समय नित न्हाय जुबक जोधा जित आए ।— प्रेमघन०, भा०, १, पृ० २३ ।

जुबति पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'युक्ति' । उ०— अवलि निम्न जातीय जुबति जन जुरि जहँ जाहीं ।— प्रेमघन०, पृ०, ४८ ।

जुबन पु
संज्ञा पुं० [सं० यौवन] दे० 'यौवन' । उ०— जुबन रूप सँग सोभा पावै । सोइ कुरूप सँग बदन दुरावै ।—नंद० ग्रं०, पृ० ११७ ।

जुबराज पु
संज्ञा पुं० [सं० युवराज] दे० 'युवराज' ।

जुबली
संज्ञा स्त्री० [अ० या इबरानी योबल] किसी महत्वपूर्ण घटना का स्मारक महोत्सव । जश्न । बड़ा जलसा ।

जुबा पु
संज्ञा पुं० [सं० युवन] युवावस्था । उ०— बालपना भोले गयो, और जुबा महमंत ।—कबीर सा०, पृ० ७९ ।

जुबाद पु
संज्ञा पुं० [अ० जबाद] एक प्रकार का गंधद्रव्य जो गंध- मार्जार से निकाला जाता है [को०] ।

जुबान
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जबान] दे० 'जबान' ।

जुबानी
वि० [फ़ा० जबानी] दे० 'जबानी' ।

जुब्बन पु
संज्ञा पुं० [सं० यौवन, प्रा० जुत्वण] दे० 'यौवन' । उ०— जुब्बन क्यों बसि होई छक्क मैमंत की ।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ३६३ ।

जुब्वा
संज्ञा पुं० [अ० जुब्बह्] फकीरों का एक प्रकार का लंबा पहनावा । झुब्वा । लंबा अँगरखा । चोगा । उ०—जो एक सोजन कू लाओ होर तागा । सिओ मेरे जुब्बे में यक दो टाँका ।—दक्खिनी०, पृ० ११५ ।

जुमकना †
क्रि० अ० [हिं० जमना] १. जमकर खड़ा होना । अड़ना । २. एकत्र होना । जोम में आना । उ०—जीतत जुमकि पौन भग संगनि ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ९ ।

जुमना (१)
संज्ञा पुं० [देश०] खेत में पाँस या खाद देने का एक ढंग जिसके अनुसार कटी हुई झाड़ियों और पेड़ पौधों का खेत में बिछाकर जला देते हैं और बची हुई राख को मिट्टी में मिला देते हैं ।

जुमना पु (२)
क्रि० अ० [अ० जोम] जोश में आना । अड़ना । उ०— ज्वानी जुमी जमाल सूरति देखिए थिर नाहिं बे ।—रै० बानी, पृ० ३२ ।

जुमला (१)
वि० [अ० जुम्लह्] सब । कुल । सबके सब ।

जुमला (२)
संज्ञा पुं० वह पूरा वाक्य जिससे पूरा अर्थ निकलता हो । २. जोड़ (को०) ।

जुमहूर
संज्ञा पुं० [अ० जुम्हूर] जनता । जनसाधारण । सर्वसाधारण [को०] ।

जुमहूरियत
[अ० जुम्हूरियत] गणतंत्र । जनतंत्र । प्रजातंत्र [को०] ।

जुमहूरी
वि० [अ० जुम्हूर + फ़ा० ई (प्रत्य०)] सार्वजनीन । लोकसंचालित [को०] ।

जुमहूरी सल्तनत
संज्ञा स्त्री० [अ० जुम्हूर + फ़ा० ई (प्रत्य०) + अ०] सल्तनत गणतंत्र राज्य । जनतंत्र शासन । प्रजातंत्र राष्ट्र [को०] ।

जुमा
संज्ञा पुं० [अ० जुमअ] शुक्रवार । यौ०—जुमा मसजिद ।

जुमा मसजिद
संज्ञा स्त्री० [अ० जुमअ मस्जिद] वह मसजिद जिसमें जमा होकर मुसलमान लोग शुक्रवार के दिन दोपहर की नमाज पढते है ।

जुमिल
संज्ञा पुं० एक प्रकार का घोड़ा । उ०—गुर्रा गुंठ जुमिल दरियाई । रघुनाथ (शब्द०) ।

जुमिला पु †
वि० [अ० जुम्लह्] सब । समस्त । संपूर्ण । उ०— श्री नयपाल जुमिला के छितिपाल ।—भूषण ग्रं०, पृ० ८२ ।

जुमिल्ला
संज्ञा पुं० [?] वह खूँटा जो लपेटन का बाई ओर गड़ा रहता है और जिसमें लपेटन लगी रहती है । (जुलाहों की बोली) ।

जुमुकना
क्रि० अ० [सं० यमक] १. निकट आ जाना । पास आ जाना । २. जुड़ना । इकट्ठा होना ।

जुमेरात
संज्ञा स्त्री० [अ० जुमअरात] बृहरूपतिवार । गुरुवार । बीफै ।

जुमेराती
वि० [अ० जुमअरात + फ़ा० ई (प्रत्य०)] जो जमेरात को पैदा हुआ हो । विशेष—मुसलमानों में इस प्रकार के नाम जुमेरात को पैदा बच्चों के रखे जाते हैं ।

जुम्मा (१)
संज्ञा पुं० [अ० जुमअ] दे० ' जुमा' ।

जुम्मा (२)
संज्ञा पुं० [अ० जिम्मह] दे० 'जिन्मा' ।

जुम्मा (३)
वि० [अ० जमअ] कृल । सब । संपूर्ण । मुहा०—जुम्मा जुम्मा आठ दिन = (१) थोडे दिन । कुछ दिन । चंदरोज । (२) कुल मिलाकर आठ दिन । कुल मिलाकर चुने गिने दिन ।

जुयांग
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की जंगली जाति । विशेष—इस जाति के लोग सिंहभूमि के दक्षिण उड़ीसा में पाए जाते हैं और कोलों से मिलते जुलते हैं ।

जुर पु †
संज्ञा दे० [सं० ज्वर] दे० 'ज्वर' । उ०— अपने कर जु बिरह जुर ताते । मति झुरि जाहि डरति तिय याते ।—नंद० ग्रं०, पृ० १३२ ।

जुरअत
संज्ञा स्त्री० [अ० जुर्अत] साहस । हिम्मत । हियाव । जबहा ।

जुरझुरी †
संज्ञा स्त्री० [ सं० ज्वर या जूर्ति + हिं० झरझरना] १. हलकी गरमी जो ज्वर के आदि में जान पड़ती है । ज्वरांश । हरारत । २. ज्वर के आदि की कँपकँपी । शीत कंप ।

जुरना पु †
क्रि० स० [हिं० जुडना] दे० 'जुड़ना' । उ०— (क) पाँव रोपि रहै रण माहिं रजपूत कोऊ हय गज गाजत जुरत जहाँ दल है ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० १०८ । (ख) दृग अरुझत टूटत कुटुम जुरत चतुर चित प्रीति । परति गाँठि दुरजन हिए दई नई यह रीति ।—बिहारी (शब्द०) ।

जुरबाना †
संज्ञा पुं० [हिं० जुरमाना] दे० 'जुरमाना' ।

जुरमाना
संज्ञा पुं० [अ० जुर्म, फ़ा० जुर्मानह्] अर्थदंड । धनदंड । वह दंड जिसके अनुसार अपराधी को कुछ धन देना पडे । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—लेना ।—लगना ।—होना ।

जुरर पु
संज्ञा पुं० [हिं० जुर्रा] दे० 'जुर्रा' । उ०— जुरर बाज बहु कुही कुहेल ।—प० रासो, पृ०, पृ० १८ ।

जुररा पु
संज्ञा पुं० [हिं० जुर्रा] दे० 'जुर्रा' । उ०— जुररा सिकार तीतर घटेर । षेलंत सरित तह भइ अबेर ।—पृ० रा०, ५ ।१६ ।

जुराना पु † (१)
क्रि० अ० दे० 'जुड़ाना' । उ०— कंत चौक सीमंत की बैठी गाँठ जुराइ । पेखि परौसी कों, पिया घूँघुट में मुसिक्याइ ।—मति ग्रं०, पृ० ४४४ ।

जुराना पु † (२)
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'जुटाना' ।

जुराफा
संज्ञा पुं० [अ० जिराफ़] अफरीका का एक जंगली पशु । विशेष—इसके खुर बैल के से, टाँगे और गर्दन ऊँट की सी लंबी, सिर हिरन का सा, पर बहुत छोटे छोटे और पूँछ गाय की सी होती है । इसके चमडे़ का रंग नारंगी का सा होता है जिसपर बडे़ बडे़ काले धब्बे होते हैं । संसार भर में सबसे ऊँचा पशु यही है । १५ या १६. फुट तक ऊँचाई तक के तो सब ही होते हैं पर कोई कोई १८ फुट तक की ऊँचाई के भी होते हैं । इसकी आँखें ऐसी बड़ी और उभरी हुई होती हैं कि बिना सिर फेरे हुए ही यह अपने चारों ओर देख सकता है । इसी से इसका पकड़ना या शिकार करना बहुत कठिन है । इसके नथुनों की बनावट ऐसी विलक्षण होती है जब यह चाहे उन्हें बंद कर ले सकता हैं । इसकी जीभ १७ इंच तक लंबी होती हैं । यह प्रायः वृक्षों की पत्तियाँ खाता हैं और मैदानों में झुँड बाँधकर रहता है । चरते समय झुंड के चारों ओर चार जुराफे पहरे पर रहते हैं जो शत्रु के आने की सूचना तुरंत झुंड को दे देते हैं । शिकारी लोग घोड़ों पर सवार होकर इसका शिकार करते हैं, परंतु बहुत निकट नहीं जाते, क्योंकि इसके लात की चोट बहुत कड़ी होती है । इसका चमड़ा इतना सख्त होता है की उसपर गोली असर नहीं करती । इसका मांस खाया जाता है । यह पशु झुंड बाँधकर परिवारिक रीति से रहता है, इसी से हिंदी कवियों ने इसके जोडे़ में अत्यंत प्रेम मानकर इसका काव्य में उल्लेख किया है परंतु समझने में कुछ भ्रम हुआ है और इसको पशु की जगह पक्षी समझा है । जैसे,—(क) मिलि बिहरत बिछुरत मरत दंपति अति रसलीन । नूतन विधि हेमंत की जगत जुराफा कीन ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) जगह जुराफा ह्वै जियत तज्यो तेज निज भानु । रूप रहे तुम पूस में यह घौं कोन सयानु ।—पद्माकर (शब्द०) ।

जुराब
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुर्राब] दे० ' जुर्राब' । उ०— उसकी ऊनी जुराब में एक छेद हो जाय ।—अभिशप्त, पृ० १३८ ।

जुरावना पु †
क्रि० स० [हिं० जुड़ावाना] दे० 'जुड़ाना' ।

जुरावरी पु
वि० फा० [जोरावरी] दे० 'जोरावरी' । उ०— सुंदर काल जुरावरी ज्यों जाणै त्यों लेइ । कोटि जतन जौ तूँ करै तोहूँ रहन न देइ ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७०३ ।

जुरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० जूर्ति (= ज्वर)] धीमा ज्वर । हरारत ।

जुरी (२)
वि० [हिं० जुटना] १. जुटी । जुटाई हुई ।२. प्राप्त । उ०—जो निबाहो नेह के नाते न तुम जो न रोटी बाँटकर खाओ जुरा ।—चुभते०, पृ० ३५ । यौ०— जुरी कुरी = (१) अंर्जित या प्राप्त संपूर्ण राशि । २. परिजन और कुल ।

जुर्म
संज्ञा पुं० [अ०] अपराध । वह कार्य जिसके दंड का बिधान राजनियम के अनुसार हो । क्रि० प्र०—करना ।—होना । यौ०— जुर्म खफीफ = छोटा या सामान्य अपराध ।जुर्म शहीद = गंभीर अपराध । भारी अपऱाध ।

जुर्माना
संज्ञा पुं० [फा० जुर्मानह्] अर्थदंड । वह रकम जो किसी अपराध के दंड में चुकानी पडे़ ।

जुर्रत
संज्ञा स्त्री० [अ० जुरअत] दे० 'जुरअत' [को०] ।

जुर्रा
संज्ञा पुं० [फ़ा०] नर बाज । उ०— वृक्षों पर जुर्रे, बाज, बहरी इत्यादि ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २० ।

जुर्राब
संज्ञा स्त्री० [अ०] मोजा । पायताबा ।

जुर्री
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुर्रा] बाज । मादा बाज ।

जुल
संज्ञा पुं० [सं० छल ?] धोखा । दम । झाँसा । पट्टी । छल छंद । चकमा । क्रि० प्र०—देना ।—में आना । यौ०—जुलबाज । जुलबाजी ।

जुलकरन पु
संज्ञा पुं० [अ० जुल्क़र्नैन] सम्राट सिकंदर की उपाधि जिसके दोनों कंधो पर बालों की लटे पड़ी रहती थीं । उ०—भये मुरीद जुलहा के आई । तबही जुलकरन नाम धराई ।—कबीर सा०, पृ० १५१ ।

जुलकरनैन
संज्ञा पुं० [अ० जुल्कर्नैन] सुप्रसिद्ध यूनानी बादशाह सिकंदर की एक उपाधि जिसका अर्थ लोग भिन्न भिन्न प्रकार से करते हैं । कुछ लोगों के मत से इसका अर्थ दो सींगोंवाला है । वे कहते हैं की सिकंदर अपने देश की प्रथा के अनुसार दो सींगोवाला टोपी पहनता था । इसी प्रकार कुछ लोग 'पूर्व और पश्चिम दोनों कोनों को जीतनेवाला', कुछ लोग '२० वर्ष राज्य करनेवाला' और कुछ लोग 'दो उच्च ग्रहों से युक्त' अर्थात् भाग्यवान भी अर्थ करते हैं ।

जुलना
क्रि० स० [हिं० जुड़ना] १. मिलना अर्थात् संमिलित होना । २. मिलना अर्थात् भेंट करना । विशेष— यह क्रिया अबब अकेली नहीं बोली जाती है । जैसे,— (क) मिल जुलकर रहो । (ख) जिससे मिलना हो, मिल जुल आओ ।

जुलफ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुल्फ] दे० 'जुल्फ' । उ०—जुलफ मैं कुलुफ करी है मति मेरी छलि, एरी अलि कहा करों कल ना परति हैं ।—दीन० ग्रं०, पृ० १० ।

जुलफिकार
संज्ञा पुं० [अ० जुल्फ़क़ार] मुसलमानों के चौथे खलीफा अली की तलवार का नाम [को०] ।

जुलफी †
संज्ञा पुं० [हिं० जुल्फ] दे० 'जुल्फ' । उ०—दाढ़ी झारत कोऊ, कोऊ जुलफीन सँवारत ।—प्रेमघन० भा० १, पृ० २३ ।

जुलबाज
वि० [हिं० जुल + फ़ा० बाज] धेखेबाज । छली । धूर्त । चालाक ।

जुलबाजी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुलबाज] धोखेबाजी छल । धूर्तता । चालाकी ।

जुलवाना पु †
वि० [अ० जुल्म + फा० आनह्] अत्याचारी । जुल्मी । क्रूर । उ०— जम का फौज बड़ा जुलबाना पकरि मरोरे काला ।—सं० दरिया, पृ० १५२ ।

जुलम †
संज्ञा पुं० [हिं० जुल्म] दे० 'जुल्म' । उ०—जुलम के हेत हलकारे, मनी मगरूर मतवारे । पकड़ जम जूतियों मारे, बहुर बिलकुल नरक डारे ।—संत तुरसी०, पृ० २९ ।

जुलहा †
संज्ञा पुं० [हिं० जुलाहा] दे० 'जुलाहा' । उ०—चार वेद ब्रह्मा ने ठाना । जुलहा भूल गया अभिमाना ।—कबीर सा०, पृ० ८१४ ।

जुलाई
संज्ञा स्त्री० [अ०] एक अंगरेजी महीना जो जेठ या अषाढ़ में पड़ता है । यह अँगरेजी का सातवाँ महीना है और ३१ दिनों का होता है । इस मास की १३ वीं या १४वीं तारीख को कर्क की संक्रांति पड़ती है ।

जुलाब
संज्ञा पुं० [अ० जुल्लाब, फा० जुलाब] १. रेचन । दस्त । क्रि० प्र०—लगना । २. रेचक औषध । दस्त लानेवाली दवा । क्रि० प्र०—देना ।—लेना । मुहा०—जुलाब पचना = किसी दस्त लानेवाली दवा का दस्त न लाना वरन् पच जाना जिससे अनेक दोष उत्पन्न होते हैं । विशेष—विद्वानों का मत है कि यह शब्द वास्तव में फ़ा० गुलाब से अरबी साँचे में ढालकर बना लिया गया है । गुलाब दस्तावर दवाओं में से है ।

जुलाल
वि० [अ०] मीठा पानी । स्वच्छ पानी । निथरा हुआ जल । उ०—के डोने में जूँ है औ फूलों की फाल । यों काँसे में जूँ है आबे जुलाल ।—दक्खिनी०, पृ० १५० ।

जुलाहा
संज्ञा पुं० [फ़ा० जौलाह] १. कपड़ा बुननेवाला । तंतुवाय । तंतुकार । विशेष— भारतवर्ष में जुलाहे कहलानेवाले मुसलमान है । हिंदू कपड़ा वुननेवाले कोली आदि भिन्न भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं । मुहा०— जुलाहे का तीर = झूठी बात । जुलाहे की सी दाढ़ी = छोटी या नोकदार दाढ़ी । २. पानी पर तैरनेवाला एक कीड़ा । ३. एक बरसाती कीड़ा जिसका शरीर गावदुम और मुँह मटर की तरह गोल होता है ।

जुलित पु
वि० [सं० ज्वलित] जलता हुआ । उ०—जुलित पावकं तेज लोचंन भारी । सकै दिष्ट को देव दानं सहारी ।—पृ० रा०, १० ।१९० ।

जुलुफ †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुल्फ] दे० 'जुल्फ' । उ०— जुलुफ निसैनी पै चढे़ दृग धर पलकैं पाइ ।—स० सप्तक, पृ० १८५ ।

जुलुफी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुल्फ] दे० 'जुल्फ' ।

जुलुम †
संज्ञा पुं० [हिं० जुल्म] दे० 'जुल्म' । उ०— जोर जुलुम अकस आवै तोहिं को बचावे ।—गुलाल०, पृ० ११७ ।

जुलुमी †
वि० [हिं० जुल्मी] १. जुल्म करनेवाला । १. अत्याधिक प्रभावित या मोहित करनेवाला ।

जुलूस
संज्ञा पुं० [अ०] १. सिंहसनारोहण । क्रि० प्र०—करना ।—फरमाना । २. राजा या बादशाह की सवारी । ३. उत्सव और समारोह की यात्रा । धूमधाम की सवारी । ४. बहुत से लोगों का किसी विशेष उद्देश्य के लिये जत्था बनाकर निकलता । क्रि० प्र०—निकलना ।—निकलना ।

जुलोक पु
संज्ञा पुं०[सं० द्युलोक] बैकुंठ । स्दर्ग ।

जुल्फ
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जुल्फ़] सिर के वे लंबे बाल जो पीछे की ओर लटकते हैं । पट्टा । कुल्ले ।

जुल्फी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जुल्फ] जुल्फ । पट्टा ।

जुल्म
संज्ञा पुं० [अ० जुल्म] [वि० जुल्मी] १. अत्याचार । अन्यांय । अनीति । जबरदस्ती । अंधेर । क्रि० प्र०—करना ।—होना । यौ०—जुल्मदोस्त = अत्याचार पसंद करनेवाला । जुल्मपसंद = अत्याचारी । जुल्मरसीदा = अत्याचार पीडित । जुल्मोसितम = अत्याचार । मुहा०—जुल्म टूटना = आफत आ पड़ना । जूल्म ढाना = (१) अत्याचार करना । (२) कोई अद्भुत काम करना । जुल्म- तोडना = अत्याचार करना । ३. आफत ।

जुल्मत
संज्ञा स्त्री० [अ० जुल्मत] अंधकार की कालिमा । अँधेरा । अंधकार । उ०— इस हिंद से सब दूर हुई कुफ्र की जुल्मत ।—भारतेंदु ग्रं०, पृ० ५३० ।

जुल्मात
संज्ञा पुं० [अ० जुल्मात] [ जुल्मत का बहुव०] १. गंभीर अँधेरा । उ०— डूब्या जाके मगरिब के जुल्मात में । लगे दीपने ज्यों दिवे रात में । —दक्खिनी०, पृ० ८३ । २. वह घोर अंधकार जो सिकंदर को अमृतकुंड तक पहुँचने में पड़ा था (को०) ।

जुल्मी
वि० [अ० जुल्म + फ़ा० ई (प्रत्य०)] अत्याचारी ।

जुल्लाब
संज्ञा पुं० [अ० जुलाब] १. रेचन । दस्त । क्रि० प्र०—लगना । २. रेचक औषध । वि० दे० 'जुलाब' । क्रि० प्र०—देना ।—लेना ।

जुव (१) पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'युवक' । उ०—बाहर से फगुहार जुरे जुव जन रस राते ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ३८३ ।

जुव पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'युवती' । उ०— परम मधुर मादक सुनाद जिहि ब्रज जुव मोही ।—नंद०, ग्रं०, पृ० ४० ।

जुवती
संज्ञा स्त्री० [सं०युवती] दे० 'युवती' । —अनेकार्थ०, पृ० १०४ ।

जुवराज पु
संज्ञा पुं० [सं० युवराज] दे० 'युवराज' । उ०—जाइ पुकारे ते सब बन उजार युवराज । सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ।—मानस, ५ ।२८ ।

जुवा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्यूत, हिं० जुआ] दे० 'जुआ' । उ०— जुवा खेल खेलन गई जोषित जोबन जोर । क्यों न गई तैं मति भई सुन सुरही के सोर ।—स० सप्तक, पृ० ३६४ ।

जुवा पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० युवा] दे० 'युवती' । उ०—साजि साज कुंजन गई लख्यौ न नंदकुमार । रही ठौर ठाढ़ी ठगी जुवा जुवा सी हार ।—स० सप्तक, पृ० ३८८ ।

जुवा पु (३)
वि० [हिं० जुदा] दे० 'जुदा' । उ०— मन मिलिमोड़ा तिकाँ माढ़वाँ, जीभ करै खिण माँह जुवा ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० १०३ ।

जुवा (४)
वि० [हिं०] दे० 'युवा' । उ०—गावति गीत सबै मिलि सुंदरि, बेद जुरि विप्र पढ़ाहीं ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १५९ ।

जुवाड़ी
संज्ञा पुं० [हिं० जुआरी] दे० 'जुआरी' । उ०—चोर, डाकू, जुवाड़ी वा दुष्ट हो ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १८६ ।

जुवान †
संज्ञा पुं० [सं० युवन्, हिं० जवान] दे० 'जवान' ।

जुवानी †
संज्ञा पुं० [हिं०जवानी] दे० 'जवानी' ।

जुवान्
संज्ञा पुं० [सं० युवन्, हिं० जुवान] तरुण । जवान । उ०— लखि हिय हँसि कह कृपानिधान् । सरिस स्वान मधवान जुवान् ।—मानस, २ ।३०१ ।

जुवाबा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जवाब' । उ०— ता पत्र का जुवाब श्री गुसाई जी ने वा बैष्णव को कृपा करिकै यह लिख्यौ ।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २६१ ।

जुवार †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'ज्वार' । उ०—लह लह जोति जुवार की अरु गँवारि की होति ।—मति० ग्रं०, पृ० ४४४ ।

जुवारी
संज्ञा पुं० [हिं० जुआरी] दे० 'जुआरी' । उ०—गृंथ गँवाइ ज्यों चलै जुवारी ।—हिं० क० का०, पृ० २१४ ।

जुष
वि० [सं०] १. भोग करनेवाला । चाहनेवाला । २. जोनेवाला । ग्रहण करनेवाला । पहुँचनेवाला । विशेष—समस्त पदों के अंत में इसका प्रयोग मिलता है । जैसे, परलोकजुष, रजोकुष ।

जुष्कक
संज्ञा पुं० [सं०] भात का रसा या जूस [को०] ।

जुष्ट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] उच्छिष्ट । जूठन [को०] ।

जुष्ट (२)
वि० १. तृप्त । तुष्ट । २. सेवित । भुक्त । ३. समन्वित । युक्त । ४. इष्ट । वांछित । ५. पूजित । ६. अनुकूल [को०] ।

जुष्य (१)
वि० [सं०] पूजनीय । सेवनीय [को०] ।

जुष्य (२)
संज्ञा पुं० सेवा [को०] ।

जुसाँदा
संज्ञा पुं० [हिं० जोशाँदा] दे० 'जोशाँदा' ।

जुस्तजू
संज्ञा स्त्री० [फा़०] तलाश । खोज । उ०—गरचे आज तक तेरी जुस्तजू खासो खाम सब किया किए । —भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० १९९ ।

जुहना †पु
क्रि० अ० [हिं० जूह (= यूथ) से नामिक धातु] दे० 'जुड़ना' । मिलना । उ०—कहौ कहुँ कान्ह जुहे तुम संग ।—पृ० रा०, २ । ३५७ ।

जुहाना
क्रि० स० [सं० यूथ, प्रा० जूह + हिं० आना (प्रत्य०)] १. एकत्र करना । २. संचित करना । जोड़ जोड़कर एक जगह रखना । संयो० क्रि०—देना । लेना ।

जुहार
संज्ञा स्त्री० [सं० अवहार (= युद्ध का रुकना या बंद होना?)] राजपूतों या क्षत्रियों में प्रचलित एक प्रकार का प्रणाम । अभिवादन । सलाम । बंदगी ।

जुहारना
क्रि० स० [सं० अवहार (= पुकार या बुलावा)] १. किसी से कुछ सहायता माँगना । किसी का एहसान लेना । २. सलाम या बंदगी करना । उ०— यदि कोई मिलै भी तो बुलाने पर भी मत बोलना । जुहारै तो सिर भर हिला देना ।—श्यामा०, पृ० ९९ ।

जुहावना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'जुहाना' ।

जुही
संज्ञा स्त्री० [सं० यूथी] एक छोटा झाड़ या पौधा जो बहुत घना होता है और जिसकी पत्तियाँ छोटी तथा ऊपर नीचे नुकीली होती है । दे०'जूही' । उ०— खिली मिलि जूथन जूथ जुही ।—घनानंद, पृ० १४६ । विशेष— यह अपने सफेद सुगंधित फूलों के लिये बगीचों में लगाया जाता है । ये फूल बरसात में लगते हैं । इनकी सुगंध चमेली से मिलती जुलती बहुत हलकी और मीठी होती है ।

जुहुराण (१)
संज्ञा पुं० [सं० जुहुराणः] चंद्रमा [को०] ।

जुहूराण (२)
वि० [सं०] वक्र बनानेवाला । वक्रतापूर्वक कार्य करनेवाला [को०] ।

जुहुवान
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्नि । २. वृक्ष । ३. कठोर हृदय— वाला व्यक्ति । क्रूर व्यक्ति [को०] ।

जुहू
संज्ञा पुं० [सं०] १. पलाश की लकड़ी का बना हुआ एक अर्ध- चंद्राकार यज्ञपात्र जिससे घृत की आहुति दी जाती हैं । २. पूर्व दिशा । ३. अग्नि की जिह्वा । अग्निशिखा (को०) ।

जुहूरा
संज्ञा पुं० [अ० जुहूर] प्रकट होना । जाहिर होना । आवि- र्भाव । उत्पत्ति । उ०—यह माहूद ठीका जो पूरा हुआ । तो यमजाल का फिर जुहूरा हुआ ।—कबीर मं०, पृ० १३४ ।

जुहूराण
संज्ञा पुं० [सं०] १. अध्वर्यु । २. अग्नि । ३. चंद्रमा [को०] ।

जुहूवाण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'जुहूराण' [को०] ।

जुहूवान्
संज्ञा पुं० [सं०जुहूवत्] पावक । अग्नि [को०] ।

जुहोता
संज्ञा पुं० [सं० जुहूवत्] यज्ञ में आहुती देनेवाला ।

जूँ (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० यूका] एक छोटा स्वदेज कीड़ा जो दूसरे जीवों के शरीर के आश्रय से रहता है । विशेष—ये कीडे़ बालों में पड़ जाते हैं औऱ काले रंग के होते हैं । आगे की ओर इनके छह पैर होते हैं और इनका पिछला भाग कई गंडो में विभक्त होता है । इनके मुँह में एक सूँड़ी होती है जो नोक पर झुकी होती है । ये कीडे़ उसी सूँड़ी को जानवरों के शरीर में चुभोकर उनके शरीर से रक्त चूसकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं । चीलर भी इसी की जाति का कीड़ा है पर वह सफेद रंग का होता है और कपड़ों में पड़ता है । जूँ बहुत अंढे देती हैं । ये अंडे बालों में चिपके रहते हैं और दो ही तीन दिन में पक जाते और छोटे छोटे कीडे़ निकल पड़ते हैं । ये कीडे़ बहुत सूक्ष्म होते हैं और थोडे़ ही दिनों में रक्त चूसकर बडे़ हो जाते हैं । भिन्न भिन्न आदमियों के शरीर पर की जूँ भिन्न भिन्न आकृति औऱ रंग की होती हैं । लोगों का कथन है कि कोढ़ियों के शरीर पर जूँ नहीं पड़ती । क्रि० प्र०—पड़ना । यौ०— जूँ मुहाँ । मुहा०— कानों पर जूँ रेँगना = चेत होना । स्थिति का ज्ञान होना । सतर्कता होना । होश होना । कानों पर जूँ न रेंगना = होश न आना । बात ध्यान में न आना । जूँ की चाल = बहुत धीमी चाल । बहुत सुस्त चाल ।

जूँ पु (२)
अव्य० [हिं०] दे० 'ज्यू' । उ०— मारू सायर लहर जूँ हिवडे़ द्रव काढ़ंत ।—ढोला०, दू० ६१२ ।

जूँठ पु
वि०, संज्ञा पुं० [हिं० जुष्ट, हिं० जूठ] दे० 'जूठा' ।

जूँठन
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूठन] दे० 'जूठन' । उ०— तब से रेडां सगरी श्री गुसाईँ जी की टहल करे और महाप्रसाद श्री गुसाईँ जी की जूँठन लेई ।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ६२ ।

जूँठा
वि०, संज्ञा पुं० [सं० जुप्ट, हिं० जूठा] दे० 'जूठा' ।

जूँड़िहा
संज्ञा पुं० [हिं० झुंड] वह बैल जो बैलों के झुंड के आगे चलता है ।

जूँदन
संज्ञा पुं० [देश०] [स्त्री० जूँदनी] बंदर । (मदारी) ।

जूँमुँहाँ
वि० [हिं० जूँ + मुँह] वह जो देखने में सीधा सादा पर वास्तव से बडा धूर्त हो ।

जू (१)
अव्य० [सं० (श्री) युक्त] १. एक आदरसूचक शब्द जो ब्रज, बुंदेलखंड, राजपूताना आदि में बडे़ लोगों के नाम के साथ लगाया जाता है । जी । जैसे, कन्हैया जू । २. संबोधन का शब्द । दे०' जी ' ।

जू (२)
अव्य० [देश०] एक निरर्थक शब्द जो बैलों या भैसों को खड़ा करने के लिये बोला जाता है ।

जू (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सरस्वती । २. वायुमंडल । वायु । ३. बैल या घोडे़ के मस्तक पर का टीका ।

जू (४)
वि० [वै० स०] तेज । वेगवान् [को०] ।

जूआ (१)
संज्ञा पुं० [सं० युग] १. रथ या गाड़ी के आगे हरस में बाँधी या जड़ी हुई वह लकड़ी जी बैलों के कंधे पर रहती है । क्रि० प्र०—बाँधना । †२. जुआठा । ३. चक्की में लगी हुई लकड़ी जिसे पकड़कर वह फिराई जाती है ।

जूआ (२)
संज्ञा पुं० [सं० द्यूत, प्रा० जूआ] वह खेल जिससे जीतनेवाले को हारनेवाले से कुछ धन मिलता है । किसी घटना की संभावना पर हार जीत का खेल । द्यूत । वि० दे० 'जुआ' । क्रि० प्र०—खेलना ।—जीतना ।—हारना ।—होना ।

जूआखाना
संज्ञा पुं० [हिं० जूआ + फा़० खानह्] वह अड्डा, घर या स्थान जहाँ लोग जूआ खेलते हैं ।

जूआघर
संज्ञा पुं० [हिं० जूआ + घर] दे० 'जूआखाना' ।

जूआचोर
संज्ञा पुं० [हिं० जूआ + चोर] दे० 'जुआचोर' ।

जूक
संज्ञा पुं० [यूना ज्यूक्स] तुला राशि ।

जूग पु
संज्ञा पुं० [सं० युग] दे० 'युग' । उ०— तोहे जज्ञो परे हीत उदासिन जूग पलटि न गेल ।—विद्यापति, पृ० ३२४ ।

जूजी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कर्णपाली । कान की ललरी या लौर । उ०— कोई अपनी जूजी छेदकर कड़ा पहन लेता और कोई उसको काट कर फेंक देता है ।—कबीर मं०, पृ० ३६१ ।

जूजू
संज्ञा पुं० [अनु०] एक कल्पित भयंकर जीव जिसका नाम लोग लड़कों को डराने के लिये लेते हैं । हाऊ ।

जूझ
संज्ञा स्त्री० [सं० युद्ध, प्रा० जुज्झ] युद्ध । लड़ाई । झगड़ा ।उ०— (क) पाई नहीं जूझ हठ किन्हे । जे पावा ते आपुहि चीन्है ।—जायसी (शब्द०) । (ख) कोने परा न छूटिहे सुन रे जीव अबूझ । कबिर माँड़ मैदान में करि इंद्रन सों जूझ ।—कबीर (शब्द०) ।

जूझना †पु
क्रि० अ० [सं० युद्ध या हिं० जूझ] १. लड़ना । २. लड़कर मर जाना । युद्ध में प्राणत्याग करना । उ०— जूझे सकल सुभट करि करनी । बंधु समेत परच्यो नृप धरनी ।— तुलसी (शब्द०) ।

जूट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जटा की गाँठ । जूड़ा । २. लट । जटा । ३. शिव की जटा ।

जूट (२)
संज्ञा पुं० [अं०] १. पटसन । २. पटसन का बना कपड़ा । यौ०— जूट मिल = वह मिल जहाँ पटसन के रेशों या धागों से बोरे, टाट आदि बनते हैं । चटकल ।

जूटना पु (१)
क्रि० स० [हिं० जुटना] मिलाना । जोड़ना । जुटाना ।

जूटना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० जुटना] १. प्रवृत्त होना । लग जाना । २. एकत्र होना । उ— जवना हार थई रण जूटे । फिरियौ सेख नगारे फूटे ।—रा० रू०, पृ० २५९ ।

जूटि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जुड़] १. मेल । २. संधि । ३. जोड़ी ।

जूटी †
वि० स्त्री० [सं० जुष्ट] दे० 'जूठी' । उ०—चाट रहे हैं जूठी पत्तल कभी सड़क पर पडे़ हुए ।—अपरा, पृ० ६९ ।

जूठ †
वि० [सं० जुष्ट] १. दे० 'जूठन' । २. दे० 'जूठा' ।

जूठन
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूठ] १. वह खाने पीने की वस्तु जिसे किसी ने खाकर छोड़ दिया हो । वह भोजन जिसे किसी ने खाकर छोड़ दिया हो । वह भोजन जिसमें से कुछ अंश किसी ने मुँह लगाकर खाया हो । किसी के आगे का बचा हुआ भोजन । उच्छिष्ट भोजन । क्रि० प्र०— खाना । २. पह पदार्थ जिसका व्यवहार किसी ने एक दो बार कर लिया । हो । भुक्त पदार्थ । दे० 'जूठा' ।

जूठा (१)
वि० [सं० जुष्ट, प्रा० जुट्ठ] [वि० स्त्री० ' जूठी' । क्रि० जुठारना] १. (भोजन) जिसे किसी ने खाया हो । जिसमें किसी ने खाने के लिये मुँह लगाया हो । किसी के खाने से बचा हुआ । उच्छिष्ट । जैसे,— जूटा अन्न, जूठा भात, जूठी पत्तल । उ०— विनती राय प्रवीन की, सुनिए साह सुजान । जूठी पातारि भखथ हैं बारी, बायस स्वान ।—(शब्द०) । विशेष— हिंदु आचार के अनुसार जूठा भोजन खाना निषिद्ध है । २. जिसका स्पर्श मुँह अथवा किसी जूठे पदार्थ से हुआ हो । जैसे, जूठा हाथ, जूठा बरतन । मुहा०— जूठे हाथ से कुत्ता न मारना = बहुत अधिक कंजूस होना । ३. जिसे किसी ने व्यवहार करके दूसरे के व्यवहार के अयोग्य कर दिया हो । जिसे किसी ने अपवित्र कर दिया हो । जैसे, जुठी स्त्री ।

जूठा (२)
संज्ञा पुं० खाने पीने की वह वस्तु जिसे किसी ने खाकर छोड़ दिया हो । वह भोजन जिसमें से कुछ किसी ने मुँह लगाकर खाया हो । किसी के आगे के बचा हुआ भोजन । जूठन । उच्छिष्ट भोजन । क्रि० प्र०—खाना ।—चाटना ।

जूठियाना †
क्रि० स० [हिं० जूठ + इयाना (प्रत्य०)] १. जूठा कर देना । उ०— माखी काहु के हाथ न आवे । गंध सुगंध सबे जुठियावे । —सं० दरिया, पृ० ६ ।

जूठी
वि०, संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जूठा' ।

जूड़ (१) †
वि० [सं० जड] [क्रि० जुड़ाना, जुड़वाना] ठंढा । शीतल । उ०— ओझा डाइन उर से डरपैं जहर जूड़ हो जाई । विषधर मन में कर पछित वा बहुरि निकट नहिं आई ।— कबीर श०, भा० २, पृ० २८ ।

जूड़ (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० जूड़ा] दे० 'जूड़ा' ।

जूड़न †
संज्ञा पुं० [देश०] पहाड़ी बिच्छु जो आकार में बड़ा और काले भूरे रंग का होता है ।

जूड़ा (१)
संज्ञा पुं० [सं० जूट अथवा सं० चूडा] १. सिर के बालों की वह गाँठ जिसे स्त्रियाँ अपने बालों को एक साथ लपेटकर अपने सिर के ऊपर बाँधती है । उ०— काको मन बाँधत न यह जूड़ा बाँधनहार । —श्यामा०, पृ० २९ । विशेष— जटाधारी साधु लोग भी जिन्हें अपनी बालों की सजावट का विशेष ध्यान नहीं रहता अपने सीर पर इस प्रकार बालों को लपेटकर गाँठ बनाते हैं । क्रि० प्र०— बाँधना ।—सोलना । २. चोटी । कलँगी । जैसे, कबूतर या बलबुल का जूड़ा । ३. पगड़ी का पिछला भाग । ४. मूँज आदि का पूला । गुँजारी । ५. पानी के घडे़ के नीचे रखने की घास आदि की लपेटकर बनाई हुई गडरी ।

जूड़ा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० जूड़] [स्त्री० जूड़ी] बच्चों का एक रोग जिसमें सरदी के कारण साँस जल्दी जल्दी चलने लगती है और साँस लेते समय कोख में गड्ढा पड़ जाता है । कभी कभी पेट में पीड़ा भी होती है और बच्चा सुस्त पड़ा रहता है ।

जूड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूड़] एक प्रकार का ज्वर जिसमें ज्वर आने के पहले रोगी को जाड़ा मालूम होने लगता है और उसका शरीर घटों काँपा करता है । उ०— जो काहू की सुनहिं बड़ाई । स्वास लेहिं जमु जूड़ी आई । —तुलसी (शब्द०) । विशेष— यह ज्वर कई प्रकार का होती है । कोई नित्य आता है, कोई दूसरे दिन, कोई तीसरे दिन और कोई चौथे दिन आता है । नित्य के इस प्रकार के ज्वर को जूड़ी, दूसरे दिन आनेवाले को अँतरा, तीसरे दिन आनेवाले को तिजरा और चौथे दिनवाले को चौथिया कहते हैं । यह रोग प्रायः मलेरिया से उत्पन्न होता है । क्रि० प्र०—आना ।

जूड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुड़ना] जुँट्टी ।

जूड़ी (३)
वि० [हिं० जूड़] ठंडी । शीतल । उ०— किंतु बँगले केकमरे में घुसते ही सीतल जूड़ी छाया ने अपना असर किया ।—किन्नर०, पृ० ७ ।

जूण पु
संज्ञा स्त्री० [सं० योनि] दे० 'योनि' ।

जूत (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जूता] १. जूता । २. बड़ा जूता ।

जूत (२)
वि० [सं०] १. आग्रह किया हुआ । २. खींचा हुआ । ३. दिया हुआ । प्रदत्त । ४. गया हुआ । गत [को०] ।

जूता
संज्ञा पुं० [सं० युक्त, प्रा० जुत्त] चमडे़ आदि का बना हुआ थैली के आकार का वह ढाँचा जिसे दोनो पैरों में लोग काँटे आदि से बचने के लिये पहनते है । जोड़ा । पनही । पादत्राण । उपारह । विशेष—जूता दो या दो से अधिक चमडे़ के टुकड़ों को एक में सीकर बनाया जाता है । वह भाग जो तलवे के नीचे रहता है तला कहलाता है । ऊपर के भाग को उपल्ला कहते हैं । तले का पिछला भाग एंडी या एँड़ और अगला भाग नोक यो ठोकर कहलाता हैं । उपल्ले के वे अंश जो पैर के दोनो ओर खडे़ उठे रहते हैं, दीवार कहलाते हैं । वह चमडे़ की पट्टी जो एँड़ी के ऊपर दोनों दिवारों के जोड़ पर लगी रहती है, लंगोट कहलाती है । देशी जूते कई प्रकार के होते हैं । जैसे,— पंजाबी, दिल्लीवाल, सलीमशाही, गुरगावी, घेतला, चट्टी इत्यादि । अंग्रेजी जूतों के भी कई भेद होते हैं । जैसे, बूट, स्लिपर, पंप इत्यादि । महाभारत के अनुशासन पर्व में छाते और जूते के आविष्कार के संबंध में उपाख्यान है । युधिष्ठिर ने भीम से पुछा कि श्राद्ध आदि कर्मों में छाता और जूता दान करने का जो विधान है उसे किसने निकाला । भीष्म जी ने कहा कि एक बार जमदग्नि ऋषि क्रिड़ावश धनुष पर बाण चढ़ा चढ़ाकर छोड़ते थे और उनकी पत्नी रेणुका फेके हुए बाणों को ला लाकर उन्हें देती थी । धीरे धीरे दोपहर हो गई और कड़ी धुप पड़ने लगी । ऋषि उसी प्रकार बाण छोड़ते गए । पतिब्रता रेणुका जब बाण लाने गई तब धूप से उसका सिर चकराने लगा और पैर जलने लगे । वह शिथिल होकर कुछ देर तक एक वृक्ष की छाया के नीचे बैठ गई । इसके उपरांत वह बाणों को एकत्र करके ऋषि के पास लाई । ऋषि कुद्ध होकर देर होने का कारण बार बार पूछने लगे । रेणुका ने बस ब्यवस्था ठीक ठीक कह सुनाई । तब तो जन्मदग्नि जी सूर्य पर अत्यंत कुद्ध हुए और धनुष पर बाण चढाकर सूर्य को मार गिराने पर तैयार हुए । इसपर सूर्य ब्राम्हण के वश में ऋषि के पास आए और कहने लगे सूर्य ने आपका क्या बिगाड़ा है जो आप उन्हें मार गिराने को प्रस्तुत हुए हैं । सूर्य से लोक का कितना उपकार होता है ? जब इसपर भी ऋषि का क्रोध शांत न हुआ तो ब्राम्हण वेशधारी सूर्य ने कहा कि सूर्य तो सदा वेग के साथ चलते रहते हैं । आप का लक्ष्य ठीक कैसे बैठेगा ? ऋषि ने कहा जब मध्यान्ह में कुछ क्षण विश्राम के लिये वे ठहर जाते हैं तब मैं मारूँगा । इसपर सूर्य ऋषि की शरण में आए । तब ऋषि ने कहा कि 'अच्छा' ? अब कोई ऐसा उपाय बतलाओ जिसमें हमारी पत्नी को धूप का कष्ट न हो । इस पर सूर्य ने एक जोड़ा जूता और एक छाता देकर कहा कि मेरे ताप से सिर और पैर की रक्षा के लिये ये दोनों पदार्थ हैं, इन्हें आप ग्रहण करें । तब से छाते औऱ जूते का दान बड़ा फलदायक माना जाने लगा । यौ०—जूतोखोर । मुहा०— जूता उठाना = मारने के लिये जूता हाथ में लेना । जूता मारने के लिये तैयार होना । (किसी का) जूता उठाना = (१) किसी का दासत्व करना । किसी की हीन से हीन सेवा करना । (२) खुशामद करना । चापलूसी करना । जूता उछालना या चलना = (१) जूतों से मारपीट होना । (२) लड़ाई दंगा होना । झगड़ा होना । जूता खाना = (१) जूतों की मार खाना । जूतों का प्रहार सहना । २. बुरा भला सुनना । ऊँचा नीचा सुनना । तिरस्कृत होना । जूता गाँठना = (१) फटा हुआ जूता सीना । (२) चमार का काम करना । नीचा काम करना । जूता चाटना = अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान न रखकर दूसरे की शुश्रूषा करना । खुशामद करना । चापलुसी करना । जूता जड़ना = जूता मारना । जूता देना = जूता मारना । जूता पड़ना = (१) जूतों की मार पड़ना । उपनाह प्रहार होना । (२) मुँहतोड़ जबाब मिलना । किसी अनुचित बात का कड़ा और मर्मभेदी उत्तर मिलना । ऐसा उत्तर मिलना कि फिर कुछ कहते सुनते न बने । (३) घाटा होना । नुकसान होना । हानि होना । जैसे,— बैठे बैठाए (१०) का जूता पड़ गया ।जूता पहनना = (१) पैर में जूता डालना । (२) जूता मोल लेना । जूता पहनना = । (१) दूसरे के पैर में जूता ड़ालना । (२) जूता मोल ले देना । जूता खरीद देना । जूता बरसना = दे० 'जूता पड़ना' (१) । जूता बैठना = जूते की भार पड़ना । दे० 'जूता पड़ना' । (२) जूता मारना = (१) किसी अनुचित बात का ऐसा कड़ा उत्तर देना कि दूसरे से फिर कुछ कहते सुनते न बने । मुँह तोड़ जबाब देना । (२) जूते से मारना । जूता लगना = (१) जूते की मार पड़ना । (२) मुँहतोड़ जबाब मिलना । (३) किसी अनुचित कार्य का बुरा फल प्राप्त होना । जैसा बुरा काम किया हो तत्काल वैसा ही बुरा फल मिलना । किसी अनुचित कार्य का तुरंत ऐसा परिणाम होना जिससे उसके करनेवाले को लज्जित होना पड़े । (४) अतिशय हानि उठाना । जूता लगाना = जूते से मारना । जूते का आदमी = ऐसा आदमी जो बिना जूता खाए ठीक काम न करे । बिना कठोर दंड़ या शासन के उचित ब्यवहार न करने वाला मनुष्य । जूते से खबर लेना = जूते से मारना । जूतों दाल बँटना = आपस में लड़ाई झगड़ा होना । परस्पर बैर विरोध होना । अनबन होना । जूतों से आना = जूते से मारना । जूने लगाना । जूते से मारे के लिये तैयार होना । जूतों से बात करना = जूते से मारना । जूता लगाना ।

जूताखोर
वि० [हिं० जूता + फा़० खोर ] १. जो जूता खाया करै । २. जो निर्लज्जता के कारण मार या गाली की कुछ परवाह न करे । निर्लज्ज । बेहया ।

जूति
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेग । तेजी । २. अग्रसर होना । आगे बढ़ना(को०) । ३. अबाध गति या प्रवाह (को०) । ४. उत्तेजना । प्रेरणा (को०) । ५. प्रवृत्ति । झुकाव (को०) । ६. मन की एकाग्रता (को०) ।

जूतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक तरह का कपूर [को०] ।

जूती
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूता ] १. स्त्रियों का जूता । २. जूता । यौ०— जूतीकारी । जूतीखोर । जूतीपैजार । उ०— जूती पैजार और लाठी डंड़ो तक की नौबत आती है ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३४५ । मुहा०— जूतियाँ उठाना = नीच सेवा करना । दासत्व करना । जूती की नोक पर मारना = कुछ न समझना । तुच्छ समझना । कुछ परवाह न करना । जैसे,— ऐसा रुपया मैं जूती की नोक पर मारता हूँ । जूती की नोक खफा हौना = परवा न करना । फिक्र न करना । उ०— खफा़ काहे को होती हो बेगम ? हमारी जूती की नोक खफा हो ।—सैर कु०, भा० १, पृ २१ । जूती की नोक से = बला से । कुछ परवाह नहीं । (स्त्री०) । उ०— वह यहाँ नहीं आती है तो मेरी जूती की़ नोक से । जूती के बराबर = अत्यंत तुच्छ । बहुत नाघोज । (किसी की) जूती के बराबर न होना = किसी की अपेक्षा अत्यंत तुच्छ होना । किसी के सामने बहुत नाचीज होना । (खुशामद या नम्रता से कभी कभी लोग इस वाक्य का प्रयोग करते हैं । जैसे,— मैं तो आपके जूती के बराबर भी नहीं हूँ) । जूती चाटना = खुशामद करना । चापलूशी करना । जूती दाल बँटना = दे० 'जूतियों दाल बँटना' । उ०— छेड़खानी करती हैं, आओ पड़ोसन हम तुम लड़ें । दूसरी बोली लड़ें मेरी जूती । उसने कहा जूती लगे तेरे सर पर । वह बोली, तेरे होते सोर्तों पर । चलो बस जूती दाल बटने लगी ।—सैर कु० भा० १, पृ० ३८ । जूती देना = जूती से मारना । जूती पर जूती चढ़ना = यात्रा का आगम दिखाई पड़ना । (जब जूती पर जूती चढ़ने लगती है तब लोग यह समझतें हैं कि जिसकी जूती है उसे कहीं यात्रा करनी होगी) । जूती पर मारना = दे० 'जूती की नोक पर मारना' । जूती पर रखकर रोटी देना = अपमान के साथ रोटी देना । निरादार के साथ रखना या पालना । जूती पहनना = (१) जूती में पैर ड़ालना । (२) नया जूता मोल लेना । जूती पहनना = (१) किसी के पैर में जूती ड़ालना । (२) नया जूता मोल ले देना । जूती से = दे० 'जूती की नोक से' । जूतियाँ खाना = (१) जूतियों से पिटना । (२) ऊँचा नीचा सुनना । भला बुरा सुनना । कड़ी बातें सहना । (३) अपमान सहना । जूतियाँ गाँठना = (१) फटी हुई जूतियों को सीना । (२) चमार का काम करना । अत्यंत तुच्छ काम करना । निकृष्ट व्यवसाय करना । जूतियाँ चटकाते फिरना = (१) दीनतावश इधर- उधर मारा मारा फिरना । दुर्दशाग्रस्त होकर घूमना । (फटें पुराने जूतें को घसीटने से चट चट शब्द होता हैं) । (२) व्यर्थ इधर उधर घूमना । जूतिर्यों दाल बँटना = आपस में लड़ाई झगड़ा होना । बैर विरोध होना । फूट होना । जुतियाँ पड़ना = जुतियों की मार पड़ना । जुतियाँ बगल में दबाना = जूतियाँ उतारकर भागना जिसमें पैर की आहट न सुनाई दे । चुपचाप भागना । धीरे से चलता बनना । खिसकना । जूतियाँ मारना = (१) जूतियों से मारना । (२) कड़ी बातें कहना । अपमानित करना । तिरस्कृत करना । (३) कड़ा उत्तर देना । मुँह तोड़ जवाब देना । जूतियाँ लगना = जूतियों से मारना । जूतियाँ सीधी करना = अत्यंत नीच सेवा करना । दासत्व करना । जूतियों का सदका = चरणों का प्रमोंप (विनम्र कृतज्ञता ज्ञापन) ।

जूतीकारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूती + का] जूतों की मार । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

जूतीखोर
वि० [हिं० जूती + फा़० खोर] १. जो जूतों की मार खाया करे । २. जो निर्ल्लज्जता से मार और गाला की परवाह न करे । निर्ल्लज्ज । बेहया ।

जूती छुपाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूती + छुपाना] १. विवाह में एक रस्म । विशेष— स्त्रियाँ कोहबर से वर के चलते समय वर का जूता छिपा देती है और तबतक नहीं देती हैं जबतक वह जूते के लिये कुछ नेग न दे । यह काम प्रायः वे स्त्रियाँ करती है जो नाते में वधू की बहन होती है । २. वह नेग जो वर स्त्रियाँ को जूती छुपाई में देता है ।

जूती पैजार
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूती + फ़ा० पैजार] १. जूतों की मार पीट । धौल धप्पड़ । २. लड़ाई दंगा । कलह । झगड़ा । क्रि० प्र०— करना ।

जूथ पु
संज्ञा पुं० [सं० यूथ] दे० 'यूथ' । भयो पंक अति रंग को तामै गज को जूथ फँसोरी ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५०४ । यौ०— जूथ जूथ = झुंड़ का झुंड़ । समूहबद्ध । उ०— जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि । निज छबि निदरहिं मदन विलासिनी ।—मानस, १ । ३४५ ।

जूथका †
संज्ञा स्त्री० [सं० यूथिका] दे० 'यूथिका' ।

जूथिका †
संज्ञा स्त्री० [सं० यूथिका] दे० 'यूथिका' ।

जूद (१)
वि० [अ०] शीघ्र । त्वरित । तुरंत । जल्दी । यौ०— जूदफ़हम = कोई बात तुरंत समझनेवाला । तीव्रबुद्धि ।

जूद (१)
वि० [फ़ा०] तेज । द्रुत [को०] ।

जून (२) †
संज्ञा पुं० [सं० धुवन् = सूर्य अथवा देश०] समय । काल । बेस्रा ।

जून (३)
संज्ञा पुं० [सं० जूर्ण (= पुराना)] पुराना । उ०— का छाति लाभ जून धनु तोरे । देखा राम नये के भोरे । —तुलसी (शब्द०) ।

जून (४)
संज्ञा पुं० [सं० (जूर्ण=एक तृण)] तृण । घास । तिनका ।

जून (५)
संज्ञा पुं० [अं०] अँगरेजी वर्ष का छठा महीना जो जेठ के लगभग पड़ता है ।

जून (६)
संज्ञा पुं० [सं० यवन ?] एक जाति जो सिंधु और सतलज के बीच के प्रदेशों में रहती है और गाय बैल, ऊँट आदि पालती है ।

जूना (१)
संज्ञा पुं० [सं० जूर्ण (= एक तृण)] १. घास या फूस को बटकर बनाई हुई रस्सी जो बोझ आदि बाँधने के काम में आती हैं । २. घास फूस का लच्छा या पूला जिससे बरतन माँजते या मलते हैं । उसकन । उबसन । उ०— रंग ज्यादा गोरा तो नहीं, साँवले से कुछ निखरा हुआ है । हाथ में जूना है और बरतन माँजते माँजते वह खीझ उठी ।—दहकते०, पृ० ६३ ।

जूना (२)
वि० [सं० जीर्ण] [वि० स्त्री० जूनी] दे० 'जीर्ण' । उ०— जूना गीत दोहा चारणां भी के सुनाया भी कै सुनाया ।—शिखर०, पृ० ४२ ।

जूनि †
संज्ञा स्त्री० [सं० योनि] दे० 'योनि' । उ०— सतगुरु ते जोगी जोगु पाया । अस्थिर जोगी फिरि जूनि न आया ।—प्राण०, पृ० १११ ।

जूनियर
वि० [अ०] काल क्रम में पिछला । जो पीछे का हो । छोटा । यौ०—जूनियर हाई स्कूल = वह हाई स्कूल जिसमें कक्षा छह से आठ तक पढ़ाई होती है । पूर्व माध्यमिक विद्यालय ।

जूनी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूना] दे० 'जूना' । उ०— जूनी ले कनांतां तेल सींची आगि जालि ।—शिखर०, पृ० ५२ ।

जूनी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० योनि] दे० 'योनि' । उ०— फिर फिर जूनी संकट आवै । गर्भवास में बहु दुख पावै ।—सहजो०, पृ० ८ ।

जूप (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्यूत, प्रा० जूआ या जूव] १. जूआ । द्यूत । उ०— जैसे, अंध रूप, बिनु गाँठ धन जूप की ज्शों हिन गुण आश है न कूप जाल पान की ।—हनुमान (शब्द०) । २. विवाह में एक रीति जिसमें वर और बधू परस्पर जूआ खेलते हैं । पासा । उ०— कर कंपै कंगन नाहिं छूटै । खेलत जूप जुगल जुवतिन में हारे रघुपति जीति जनक की ।—सूर (शब्द०) ।

जूप (२)
संज्ञा पुं० [सं० यूप] दे० 'यूप' ।

जूम †
संज्ञा पुं० [देश०] थूक । पीक । उ०— सुरती का जूम पिच से जमीन पर गिरा ।—नई०, पृ० ३० ।

जूमना (१) पु
क्रि० अ० [अ० जमा] इकट्ठा होना । जुटना । एकत्र होना । उ०— (क) लागो हुतो हाट एक मदन धनी को जहाँ गोपिन को वृंद रह्यो जूमि चहुँधाई में । —देव (शब्द०) । (ख) गिरिधरदास भूमि जूमि आसु वदि, बाज लौं दराज लेहिं परन दबाय के ।—गोपाल (शब्द०) ।

जूमना (२) †
क्रि० अ० [हिं० झूमना] दे० 'झूमना' ।

जूर पु
संज्ञा पुं० [हिं० जुरना] जोड़ । संचय । उ०— दान आहि सब दरबक जूरू । दान लाभ होई बाँचै मूरू ।—जायसी (शब्द०) ।

जूरना (१)पु
क्रि० स० [हिं० जोड़ना] जोड़ना । उ०— अवध में संतन रहु दूरि । बंधु सखा गुरु कहत राम को नाते बहुतेक जूरि ।—देव स्वामी (शब्द०) ।

जूरना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० जाड़ना] इकट्ठा होना । जुटना ।

जूरर
संज्ञा पुं० [अ०] पंच । न्यायसभ्य । जूरौ का सदस्य ।

जूरा †
संज्ञा पुं० [हिं० जूड़ा] दे० 'जूड़ा' ।

जूरिस्ट
संज्ञा पुं० [अ०] वह व्यक्ति जो कानून, विशेषकर दीवानी कानून में पारंगत हो । व्यवहार—शास्त्र—निपुण ।

जूरिस्डिक्शन
संज्ञा पुं० [अ०] वह सीमा या विभाग जिसके अंदर शक्ति या अधिकार का उपयोग किया जा सके । जैसे, वह स्थान इस हाई कोर्ट के जूरिस्डिक्शन के बाहर है ।

जूरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुरना] १. घास, पत्तों या टहनियों का एक बँधा हुआ छोटा पूला । जुट्टी । जैसे, तमाखू की जूरी । २. सूरन आदि के नए कल्ले जो बँधे हुए निकलते हैं । ३. एक पकवान जो पौधों के नए बंधे हुए कल्लों को गीले बेसन में लपेटकर तलने से बनता है । ४. एक प्रकार का पौधा या झाड़ जिससे क्षार बनता है । विशेष— यह पौधा गुजरात, कराची आदि के खारे दलदलों में होता है ।

जूरी (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] वे कुछ व्यक्ति जो अदालत में जज के साथ बैठकरक खून, डाकाजनी, राजद्रोह, षडयंत्र आदि से संगीन मामलों को सुनते और अंत में अभियुक्त या अभियुक्तों के अपराधी या निरपराध होने के संबंध में अपना मत देते हैं । पंच । सालिस । जैसे,— जूरी ने एकमत होकर उसे चोर बताया तदनुसार जज ने उसे छोड़ दिया । विशेष— जूरी के लोग नागरिकों में से चुने जाते हैं । इन्हें वेतन नहीं मिलता । खर्च भर मिलता है । इन्हें निष्पक्ष रहकर न्याय करने की शपथ करनी पड़ती है । जब तक किसी मामले की सुनवाई नहीं हो लेती, इन्हें बराबर अदालत मे उपस्थित होना पड़ता है । और देशों में जज इनका बहुमत मानने को बाध्य है और तदनुसार ही अपना फैसला देता है । पर हिंदुस्तान में यह बात नहीं है । हाई कोर्ट और चीफ कोर्ट को छोड़कर, जिले के दौरा जज जूरी का मत मानने के लिये बाध्य नहीं है । जूरि से मतैक्य न होने की अवस्था में वे मामले हाई कोर्ट या चीफ कोर्ट भेज सकते हैं ।

जूरीमैन
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'जूरी' ।

जूरू
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जूर' ।

जूर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का तृण । पर्या०—उलूक । उलप ।

जूर्णाख्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. तृणाविशेष । २. कुश । दर्भ [को०] ।

जूर्णाह्वय
संज्ञा पुं० [सं०] देवधान्य ।

जूर्णि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वेग । २. आदित्य । ३. देह । ४. ब्रह्मा । ५. क्रोध । ६. स्त्रियों का एक रोग । ७. आग्नेयास्त्र (को०) ।

जूर्णि (२)
वि० १. वेगगुक्त । वेगवान । तेज । २. द्रवित । गला हुआ । ३. ताप देनेवाला । ४. स्तुति करने में कुशल ।

जूर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ज्वर । २. ताप । गरमी (को०) ।

जूलाई
संज्ञा स्त्री० [अं० जुलाई] दे० 'जुलाई' ।

जूवल †
संज्ञा पुं० [देश०] पैर । उ०— इम पतसाह मुणे अकुलायौ । अहिजाणे जुबल तल आयौ ।—रा० रू०, पृ० ९४ ।

जूवा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जूआ] दे० 'जुआ' । उ०— टाँड़ा तुमने लादा भारी । बनिज किया पूरा बेपारी । जूवा खेला पूँजी हारी । अब चलने की भई तयारी ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ६ ।

जूवा (२)पु
वि० [हिं०] दे० 'जुदा' । उ०— नामरूप गुन जूवा जूवा पुनि ब्यवहार भिन्न ही ठाट । —सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ७३ ।

जूष
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी उबाली या पकाई हुई वस्तु का पानी । झोल । रसा । २. उबाली या पकाई हुई दाल का पानी ।

जूषण
संज्ञा पुं० [सं०] घाय नामक पेड़ जो फूलों के लिये लगाया जाता है ।

जूस (१)
संज्ञा पुं० [सं० जूष] १. मूँग अरहर आदि की पकी हुई दाल का पानी जो प्रायः रोगियों को पथ्य रूप में दिया जाता है । मुहा०— जूस देना = उबली हुई दाल का पानी पिलाना । जूस लेना = (१) उबली हुई दाल का पानी पीना । (२) रोगी का सशक्त होकर खाने पीने लायक होना । २. उबली हुई चीज का रस । रसा । क्रि० प्र०—काढ़ना । निकालना ।

जूस (२)
संज्ञा पुं० [फ़ा० जुफ्त़, तुलनीय सं० युक्त] १. युग्म संख्या । सम संख्या । ताक का उलटा । जैसे,— २, ४, ६, ८ । यौ०—जूस ताक ।

जूस ताक
संज्ञा पुं० [हिं० जूस + फा़० ताक] एक प्रकार का जुआ जिसे लड़के खेलते हैं । विशेष— एक लड़का अपनी मुट्ठी में छिपाकर कुछ कौड़ियाँ ले लेता है और दूसरे से पूछता है— 'जूस कि ताक ?' अर्थात् कौड़ियों की संख्या सम है या विषम ? यदि दूसरा लड़का ठीक बूझ लेता है तो जीत जाता है और यदि नहीं बूझता तो उसे हारकर उतनी ही कौड़ियाँ बुझानेवाले को देनी पड़ती है जितनी उसकी मुट्ठी में होती हैं ।

जूस ताख †
संज्ञा पुं० [हिं० जूस + फा़० ताक] दे० 'जूस ताक' । उ०— बसन के दाग धोवै, नखछत एक टोवै, चूर लै चुरी को खेलै एक जूस ताख है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० १६१ ।

जूसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूस] वह गाढ़ा लसीला रस जो ईख के पकते रस को गुड़ के रूप में ठोस होने के पहले उतारकर रख देने से उसमें से छूटता है । खाँड़ का पसेव । चोटा । छोबा ।

जूह पु
संज्ञा पुं० [सं० यूथ, प्रा० जूह] झुंड । समूह । उ०— (क) डह डह बज्जै डमरु, जूहु जुगिनि जुरि नाची ।—हम्मीर०, पृ० ५८ । (ख) एकहि बार तासु पर छाडैन्हि गिरि तरु जूह ।—मानस, ६ ।६५ ।

जूहर
संज्ञा पुं० [फा० जौहर या हिं० जीव + हर] राजपूतों की एक प्रथा जिसके अनुसार दुर्ग में शत्रु का प्रवेश निश्चित जान स्त्रियाँ चिता पर बैठकर जल जाती थी और पुरुष दुर्ग के बाहर लड़ने के लिये निकल पडते थे । वि० दे० 'जौहर' ।

जूहारना पु
क्रि० स० [हिं० जुहारना] दे० 'जुहारना' । उ०— सासू जूहारवा चाल्यो छइ राई ।—बी० रासो, पृ० २६ ।

जूहीया
वि० [हिं० जूही + इया (प्रत्य०)] जूही जैसी । उ०— हेमंती ओस की जूहिया नमी भीतर पहुंच रही थी ।—नई०, पृ०४२ ।

जूही (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० यूथी] १. फैलनेवाला एक झाड़ या पौधा जो बहुत घना होता है और जिसकी पत्तियाँ छोटी तथा ऊपर नीचे नुकीली होती है । उ०— जाही जूही बगुचन लावा । पुहुप सुदरसन लाग सुहावा ।—जायसी ग्रं०, पृ० १३ । विशेष— यह हिमालय के अंचल में आपसे आप उगता है । यह पौधा फुलों के लिये बगिचों में लगाया जाता है । इसके फूल सफेद चमेली से मिलते जुलते पर बहुत छोटे होते हैं । सुगंध इसकी चमेली ही की तरह हलकी मीठी और मनभावनी होती है । ये फूल बरसात में लगते हैं । जूही को कहीं कहीं पहाड़ी चमेली भी कहते हैं । पर जूही का पौधा देखने में चमेली से नहीं मिलता, कुंद से मिलता है । चमेली की पत्तियाँ सीकों के दोनों ओर पंक्तियों में लगती है पर इसकी नहीं । जूही के फूल का अतर बनता है । २. एक प्रकार की आतशबाजी जिसके छूटने पर छोटे छोटे फूल से झड़ते दिखाई पड़ते हैं ।

जूही (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० यूक] एक प्रकार का कीड़ा जो सेम, मटर आदि की फलियों में लगता है । जूई ।

जृंभ
संज्ञा पुं० [सं० जृम्भ] [स्त्री० जृंभा, वि० जृंभक] १. जँभाई । जमुहाई । २. आलस्य । ३. प्रस्फुटन । विकास । खिलना (को०) । ४. विस्तार । फैलाव (को०) । ५. एक पत्ती (को०) ।

जृंभक (१)
वि० [सं०जृम्भक] जंभाई लेनेवाला ।

जृंभक (२)
संज्ञा पुं० १. रुद्र गणों में एक । २. एक अस्त्र जिसके चलाने से शत्रु निद्राग्रस्त होकर लड़ाई छोड़ जँभाई लेने लगते, सो जाते या शिथिल पड़ जाते थे । विशेष— जब राम ने ताड़का आदि को मारा था तब विश्वमित्र ने प्रसन्न होकर मंत्र सहित यह अस्त्र उन्हें दिया था । विश्वा- मित्र को यह अस्त्र घोर तपस्या के उपरांत अग्नि से प्राप्त हुआ था ।

जृंभकास्र
संज्ञा पुं० [सं० जृम्भकास्व] दे० 'जृंभक' (२) ।

जृंभण (१)
संज्ञा पुं० [सं० जृम्भण] १. जँभाई लेना । २. अंगों को फैलाना (को०) । ३. खिलना । विकास (को०) ।

जृंभण (२)
वि० १. जँभाई लेनेवाला [को०] ।

जृंभमान
वि० [सं० जृम्भमत्] १. जँभाई लेता हुआ या जँभाई लेनेवाला । २. प्रकाशमान । खिलता हुआ । विकासमान ।

जृंभा
संज्ञा स्त्री० [सं० जृम्भा] १. जंभाई । २. आलस्य या प्रमाद से उत्पन्न जड़ता । ३. एक शक्ति का नाम । ४. खिलना । विकास (को०) ५. विस्तार । फैलाव (को०) ।

जृंभिका
संज्ञा स्त्री० [सं० जृम्भिका] १. आलस्य । २. जृंभा । ३. एक रोग जिससे मनुष्य शिथिल पड़ जाता है और बार बार जँभाई लिया करता है । विशेष— यह रोग निद्रा का अवरोध करने से उत्पन्न होता है ।

जृंभिणी
संज्ञा स्त्री० [सं० जृम्भिणी] एलापर्णी लता [को०] ।

जृंभिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० जृम्भिणी] एलापर्ण लता ।

जृंभित (१)
वि० [सं० जृम्भित] १. चेष्टित । २. प्रवृद्ध । फैला या फैलाया हुआ । ४. जिसने जँभाई ली हो [को०] ।

जृंभित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रंभा । २. स्फोटन । ३. स्त्रियों की ईहा या इच्छा ।

जृंभी
वि० [सं० जृम्भिन्] १. जँभाई लेनेवाला । २. खिलनेवाला [को०] ।

जेंटिलमैन
संज्ञा पुं० [शं०] सभ्य पुरुष । भद्रजन । संभ्रांत ब्यक्ति

जेंटू
संज्ञा पुं० [?] १. हिंदु । २. हिंदुओं की भाषा । विशेष— पहले पहल पुर्तगालियों ने भारत के मूर्तिपूजकों के लिये इस शब्द का प्रयोग किया था । बाद ईस्ट इंड़िया कंपनी के समय अँगरेज लोग उक्त अर्थ में इस शब्द का प्रयोग करने लगे ।

जेंताक
संज्ञा पुं० [सं० जेन्ताक] रोगी के शरीर में पसीना लाकर दूषित अंश और विकार आदि निकालने की एक क्रिया । भफारा ।

जेँगना पु
संज्ञा पुं० [प्रा० जोइंगण] दे० 'जुगुगू-१' । उ०—सुंदर कहत एक रवि के प्रकास बिनु जेँगना की ज्योति, कहा रजनी बिलात है ।—संत वणी०, भा० २, पृ० १२३ ।

जेँगरा †
संज्ञा पुं० [देश०] उर्द, मूँग, मोथी, ज्वार, बाजरे आदि के ड़ंठल जो दाना निकाल लेने के बाद शेष रह जाते हैं । जँगरा ।

जेँण †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'जहाँ' । उ०—चाल सखी तिण मंदिरइँ, सज्जण रहियउ जेंण । कोइक मीठउ बोलड़इ, लागो होसइ तेंण । ढोला०, दू० ३५९ ।

जेना
क्रि० स० [सं० जेमनम्] दे० 'जेँवना' ।

जेँवन †
संज्ञा पुं० [हिं० जेवना] भोजन । खाने की वस्तु ।

जेँवना (१)
क्रि० स० [सं० जेमन] भोजन करना । खाना । भक्षण करना । उ०— (क) जो प्रभु निगम अगम करि गाए । जेँवन मिस ते हम पै आए ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०४ । (ख) आनँद- घन ब्रज जीवन जेंवत हिलमिलि ग्वार तोरि पतानि ढांक ।—धनानंद, पृ० ४७३ ।

जेँवना (२)
संज्ञा पुं० भोजन । भोजन । खाने का पदार्थ । वह जो कुछ खाया जाय ।

जेँवनार
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेवनार' । उ०—चहुँ प्रकार जेंवनार भई बहु भाँतिन्ह ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ६० ।

जेँवाना †
क्रि० स० [हिं० जेंवना] भोजन कराना । खिलाना । जिमाना ।

जे †पु (१)
सर्व० [सं० ये] १.'जो' का बहुबचन । २. दे० 'जो' । उ०—जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़चेतन जीव जहाना ।—मानस, १ ।३ ।

जे पु (२)
सर्व० [सं० एतत्] यह का बहुबचन । उ०—माई, जे दोऊ, कौन गोप के ढोटा । इनकी बात कहा कहौ तोसौं, गुनन बड़े, देखन के छोटा ।—नंद ग्रं०, पृ० ३४१ ।

जे (३) पु
सर्व० [सं० इदम्] यह । उ०— आगामिनी जामिनी जुग ही । ब्रजभामिनीन सौं जे कही ।—नंद ग्रं०, पृ० ३१७ ।

जेईँ पु †
सर्व० [हिं०] दे० 'जो' । उ०— हनिवँत बीर लंक जेइँ जारी । परंबत ओहि रंहा रखवारी ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २५९ ।

जेइ पु †
सर्व० [हिं०] दे० 'जो' ।

जेउँ
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'ज्यो (१)' । उ०— टपकै महुव आँसु तस परई । होई महुवा बसंत जेउँ झरई ।—जायसी ग्रं०, पृ० २५६ ।

जेउ, जेऊ पु †
सर्व० [हिं०] दे० 'जो' ।

जेज पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झेर] देर । विलंब । उ०— जन रामा अब जेज न कीजे सतगुर ज्ञान जगावै हो ।—राम० धर्म०, पृ० २४८ ।

जेझ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झेर] विलंब । देरी । उ०— धरी बात धांखा जेझ बिसरी जिण सायत ।—रा० रू०, पृ० ३३९ ।

जेट (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० यूथ] १. समूह । यूथ । ढेर । २. रोटियों की तही । ३. मिट्टी के बरतनों का वह समूह जिसमें वे एक दूसरे के ऊपर रखे हों । ४. गोद । कोरा ।

जेट (२)
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का वायुयान ।

जेटी
संज्ञा स्त्री० [अं०] नदी या समुद्र के किनारे पर बना हुआ वह बड़ा चबूतरा जिसपर से जहाजों का माल चढ़ाया और उतारा जाता है ।

जेठंस †
संज्ञा पुं० [सं०ज्येष्ठ + अंश] पैतृक संपत्ति में बड़े़ भाई का बड़ा हिस्सा ।

जेठंसो †
वि० [सं० ज्येष्ठांशिन्] पैतृक संपत्ति में बड़े भाई की हैसियत से बड़े हिस्से के अधिकारी ।

जेठ
संज्ञा पुं० [सं० ज्येष्ठ] १. एक चांद्र मास जो बैशाख और असाढ़ के बीच में पड़ता है । विशेष— जिस दिन इस मास की पूर्णिमा होती है उस दिन चंद्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में रहता है, इसी से इसे ज्येष्ठ या जेठ कहते हैं । यह ग्रीष्म ऋतु का पहला और संवत् का तीसरा मास है । सौर मास के हिसाब से जेठ वृष संक्रांति से आरंभ होकर मिथुन संक्रांति तक रहता है । २. [स्त्री० जेठानी] पति का बड़ा भाई । भसुर ।

जेठ (१)
वि० अग्रज । बड़ा । उ०—जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

जेठउत
संज्ञा पुं० [हिं० जेठ + उत (प्रत्य०)] पति का बड़ा भाई ।

जेठरा †
वि० [हिं० जेठ + रा(प्रत्य०)] दे० 'जेठ' (वि०) ।

जेठरैत (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जेठरा + एत (प्रत्य०)] गाँव का मुखिया ।

जेठरैत †
वि० ज्येष्ठ । बड़ा ।

जेठरैयत
संज्ञा पुं० [हिं० जेठ + अ० रैयत] गाँव का मुखिया, जिसकी संमति के अनुसार गाँव के सब लोग कार्य करते हों ।

जेठवा
संज्ञा पुं० [हिं० जेठ] एक प्रकार की कपास जो जेठ में तैयार होती है । इसे झुलवा भी कहते हैं । वि० दे० 'झुलवा' ।

जेठा
वि० [सं० ज्येष्ठ] [वि० स्त्री० जेठी] १. अग्रज । बड़ा । २. सबसे उत्तम । सबसे अच्छा ।मुहा०—जेठा रंग = वह रंग जो कई बार की रंगाई में सबसे अंतिम बार रँगा जाय ।

जेठाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जेठा] जेठ होने का भाव या दशा । बड़ाई । जेठापन ।

जेठानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जेठ] जेठ की स्त्री । पति के बड़े भाई की स्त्री ।

जेठी (१)
वि० [हिं० जेठ + ई (प्रत्य०)] १. जेठ संबंधी । जेठ का । जैसे, जैठी धान । जेठी कपास । २. बड़ी । पहली ।

जेठी (२)
संज्ञा स्त्री० १. एक प्रकार की कपास जो जेठ में पकती और फूटती है । विशेष—इसे बरार या विदर्भ में टिकड़ी या जूड़ी और कठिया- वाड़ में गँगरी कहते हैं । २. जेठानी । उ०— जेठी पठाई गई दुलही हँसि हेरि हरै मतिराम बुलाई ।—इतिहास, पृ० २५४ ।

जेठी (३)
संज्ञा पुं० बोरो नाम का धान जो चैत में नदियों के किनारे बया और जेठ में काटा जाता है ।

जेठी मधु
संज्ञा स्त्री० [सं० यष्टिमधु] मुलेठी ।

जेठुआ †
वि० [हिं०] दे० 'जेठी' ।

जेठौत
संज्ञा पुं० [सं० ज्येष्ठ + पुत्र] [स्त्री जेठौती] १. जेठ का लड़का । पति के बड़े भाई का पुत्र । जेठानी का पुत्र । २. पति का बड़ा भाई । भसुर ।

जेठौता
संज्ञा पुं० [हिं० जेठौत] दे० 'जेठौत' ।

जेत †
वि० [हिं०] दे० 'जितना' । उ०— जेत बराती औ असवारा । आए मोर सब चाल निहारा ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० ३११ ।

जेतक पु
वि० [हिं०] दे० 'जितना' । उ०— जेतक नेम धऱम किए री मैं बहु बिधि अंग अंग भई मैं तो स्रवन मई री ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३४५ ।

जेतना पु †
वि० [हिं० जितना] दे० 'जितना' । उ०— बिधु महि पूर मयूखन्हि रवि तप जेतनेहि काज । मागे वारिद देहि जल रामचंद्र के राज ।—मानस, ७ ।२३ ।

जेतवारु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जैतवार' ।

जेता (१)
वि० [सं० जेतृ] १. जीतनेवाला । विजय करनेवाला । विजयी ।

जेता (२)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु ।

जेता (३)पु
क्रि० वि० [सं० यावत्] जितना ।

जेता पु (४)
वि० [हिं० जिस + तना (प्रत्य०)] जिस मात्रा का । जिस परिमाण का । जितना । उ०—सकल दीप मइँ जेती रानी । तिन्ह महँ दीपक बारह वानी ।—जायसी (शब्द०) ।

जेतार पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जेता' ।

जोति पु †
वि० [हिं० जितना] जितना । उ०— हहूँ रंग बहु जानति लहरै जोति समुंद । पै पिय को चतुराई सकिउँ न एकौ बुंद । जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० ३४१ ।

जोतिक पु † (१)
क्रि० वि० [हिं० जितना] जितना । जिस कदर । जिस मात्रा में । जिस परिणाम में ।

जेतिक (२)
वि० दे० 'जिंतना' । उ०— जेतिक भोजन ब्रज तै आयौ । गिरि रूपी हरि सिगरौ खायौ ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०७ ।

जेती पु †
वि० स्त्री० [हिं० जेता] जितनी । उ०— जेती लहर समुद्र की तेती मन की दौर । सहजै हीरा नीपर्जै जो मन आवै ठौर ।—कबीर सा०, पृ० ५५ ।

जेतो (१)पु †
क्रि० वि० [हिं०] जितना । जिस कदर । उ०— धीरज ज्ञान सयान सबै, गँग जेतोई सारत तेतोई ढाहै ।—गंग०, पृ० ७७ ।

जेतो (२)
वि० दे० 'जितना' ।

जेतौ (१)
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'जेतौ' ।

जेतौ (२) †
वि० दे० 'जितना' । उ०— अरु वह रूप अनूपम जेतौ । नैननि गह्यौ गयो नहीं तेतौ ।—नंद० ग्रं०, पृ० १२८ ।

जेन केन पु
क्रि० वि० [सं० येन + केन] जैसे तैसे । उ०— जेन केन परकार होइ अति कृष्ण मगन मन । अनाकर्ण चैतन्य कछु न चितवै साधन तन ।—नंद० ग्रं०, पृ० ४६ ।

जेनरल (१)
वि० [अ०] १. आम । सामान्य । यौ०— जेनरल इलेक्शन = आम चुनाव । साधराण निर्वाचन । जेनरल मर्चेंट = सामान्य उपयोग के सामान का विक्रेता । २. बड़ा । प्रधान । यौ०— जेनरल सेक्रेटेरी = संस्था, संस्थान या विभाग का प्रधान मंत्री । जेनरल स्टाफ = सेनापति का सहकारी मंडल ।

जेनरल (२)
संज्ञा पुं० [अँ०] फौजी अफसर का एक पद जो सेनापति के अधीन होता है [को०] ।

जेना †
क्रि० स० [सं० जेमन] दे० 'जीमना' ।

जेन्य
वि० [सं०] १. अभिजात । कुलीन । २. असली । सच्चा । ३. विजेता [को०] ।

जेन्यावसु
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र । २. अग्नि ।

जेपाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक औषधोपयोगी पौधा । जैपाल । जमाल- गोटा [को०] ।

जेप्लिन
संज्ञा पुं० [जर्मन] एक विशेष प्रकार का बहुत बड़ा हवाई जहाज । विशेष—इसका आविष्कार जर्मनी के काउंट जेप्लिन साहब ने किया था । इसका ऊपरी भाग सिगार के आकार का लंबोतरा होता है जिसके खानों में गैस से भरी हुई बहुत बड़ी बड़ी थैलियाँ होती हैं । बडे़ लंबोतरे चौखटे में नीचे की ओर एक या दो संदूक लटकते हुए लगे रहते हैं जिनमें आदमी बैठते हैं और तोपें रखी जाती है । सब प्रकार के आकाशयानों से इसका आकार बहुत बड़ा होता है ।

जेब (१)
संज्ञा पुं० [अ०] पहनने के कपड़ों (कोट, कुरते, कमीज, अंगे आदि) में बगल या सामने की ओर लगी वह छोटी थैली या चकती जिसमें रुमाल, कागज आदि चीजे रखते है । खीसा । खरीता । पाकेट । क्रि० प्र०— कतरना । —काटना । यौ०— जेबकट । जेबखर्च । जेबघड़ी ।मुहा०— जेब कतरना = जेब काटकर रुपए पैसे का अपहरण । जेब खाली होना = पास में पैसा न होना । जेब भरी होना = पास में काफी रुपया होना ।

जेब (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० जेब] शोभा । सौंदर्य । फबन । मुहा०— जेब तन बदलना = पहनना । धारण करना । जेब देना = शोभित होना । यौ०— जेबदाद = तर्जदार । अच्छा । सुंदर ।

जेबकट
संज्ञा पुं० [फा० जेव + हिं० काटना] वह मनुष्य जो चोरी से दूसरों के जेब से रुपया पैसा लेने के लिये जेब काटता हो । जेबकतरा । गिरहकट ।

जेबकतरा
संज्ञा पुं० [हिं० जेब + कतरना] दे० 'जेबकट' ।

जेवखर्च
संज्ञा पुं० [फा० जेबखर्च] वह धन जो किसी को निज के खर्च के लिये मिलता हो और जिसका हिसाब लेने का किसी को अधिकार न हो । भोजन, वस्त्र आदि के व्यय से भिन्न, निज का और ऊपरी खर्च ।

जेबखास
संज्ञा पुं० [फा़० जेब + अ० खास] राज्यकोष से राजा या बादशाह के निजी खर्च के लिये दिया जानेवाला धन ।

जेबघड़ी
संज्ञा स्त्री० [फा० जेब + हिं० घड़ी] वह छोटी घड़ी जो जेब में रखी जाती है । जेबी घड़ी । वाच ।

जेबदार
वि० [फा० जेबदार] सुंदर । शोभायुक्त ।

जेबरा
संज्ञा पुं० [अं० जेबरा] जबरा नाम की जंगली जानवर । दे० 'जबरा' ।

जेबा
वि० [फा़० जेबा] सुंदर । मनोरम । शोभनीय । ललित [को०] । मुहा०— जेबा देना = शोभा देना । सुंदर लगना ।

जेबी
वि० [फा़०] १. जेब में रखने योग्य । जो जेब में रखा जा सके । जैसे, जेबी घड़ी । २. बहुत छोटा ।

जेबोजीनत
संज्ञा स्त्री० [फा़० जेब + अ० जीनत] बनाव सिंगार । वेश भूषा । ठाट बाट । शृंगार । सजावट [को०] ।

जेमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. भोजन करना । जीमना । २. आहार । खाद्य (को०) ।

जेय
वि० [सं०] जोतने योग्य । जो जोता जा सके ।

जेर (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] आँवल । वह झिल्ली जिसमें गर्भगत बालक रहता और पुष्ट होता है ।

जेर (२)
अव्य० [फा़० जेर] नीचे । तले [को०] ।

जेर (३)
वि० [फा़० जेर] [देश० जेरबरी] १. परास्त । पराजित । २. जो बहुत दिक किया जाय । जो बहुत तंग किया जाय । क्रि० प्र०—करना = हराना । पछाडना ।

जेर (४)
संज्ञा स्त्री० [फा० जेर] अरबी और फारसी के अक्षरों के नीचे लगनेवाले एक संकेत चिन्ह जो इ, ई, और ए की मात्राओं का सूचक होता है ।

जेर (५)
संज्ञा पुं० [देश०] एक पेड़ । विशेष— यह सुंदरबन में अधिकता से होता है । इसके हीर की लकड़ी लाली लिए सफेद होती है ओर मजबूत होने के कारण इसकी लकड़ी से मेज, कुरती, आलमारी इत्यादि बनती हैं ।

जेरजामा
संज्ञा पुं० [फ़ा० जेरजामह्] १. अधोवस्त्र । कटिवस्त्र । २. घोड़े की जान के नीचे पीठ पर डाला जानेवाला कपड़ा [को०] ।

जेरतजवीज
वि० [फ़ा० जेर + अ० तज्वीज] विचाराधीन [को०] ।

जेरदस्त
वि० [फ़ा० जेरदस्त] अधिन । वशीभूत । असहाय [को०] ।

जेरनजर
क्रि० वि० [फ़ा० जेर + अ० नजर] आँखों में । दृष्टि में । क्रि० प्र०—प़डना ।—होना ।

जेरना पु
क्रि० स० [हिं० जेर] तंग करना । सताना । उत्पीड़ित करना ।

जेरपाई
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० जेरपाई] १. स्त्रियों के पहनने की जूती । स्लीपर । २. साधारण जूता ।

जेरपेच
संज्ञा पुं० [फ़ा० जेरपेच] पगड़ी के नीचे पहनी जानेवाली छोटी पगड़ी या टोपी [को०] ।

जेरबंद
संज्ञा पुं० [फा़० जेरबार] घोडे़ की मोहरी में लगा हुआ वह कपड़ा या चमड़े का तस्मा जो तंग में फँसाया जाता है ।

जेरबार
वि० [फा़० जेरबार] १. जो किसी विशेष आपत्ति के कारण बहुत तंग और दुःखी हो । आपत्ति या दुःख की बोझ से लदा हुआ । २. क्षतिग्रस्त । जिसकी बहुत हानि हुई हो ।

जेरबारी
संज्ञा स्त्री० [फा़० जेरबारी] १. आपत्ति या क्षति के कारण बहुत दुखी होने की क्रिया । तंगी । २. हैरानी । परेशानी । क्रि० प्र०—होना ।—सहना ।

जेरिया
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेरी' २. और ३. ।

जेरी
संज्ञा स्त्री० [?] १. दे० 'जेर (१)' । २. वह लाठी जो चरवाहे कँटीली झाड़ियाँ इत्यादि हटाने या दबाने के लिये सदा अपने पास रखते है । उ०— उतहि सखा कर जेरी लीन्हें गारी देहि सकुच तोरी की । इतहि सखा कर बाँस लिए बिच मारु मची झोरा झोरी की ।—सूर (शब्द०) । ३. खेती का एक औजार जो फरुई के आकार का काठ का होता है । इसका व्यवहार अन्न दाँवने के समय पुआल हटाने में होता है । सिचाई के लिये दौरी चलाने में भी यह काम में आता है ।

जेरेखाक
क्रि० वि० [फा़० जेरेखाक] १. मिट्टी के नीचे । २. कब्र में [को०] । क्रि० प्र०—जाना ।—होना ।

जेरें नजर
क्रि० वि० [फा़० जेर + अ० नजर] दे० 'जेरनजर' ।

जेरेसाया
वि० [फा़० जेरेसायह्] किसी का आश्रित । किसी की छाया में [को०] ।

जेरे हिरासत
वि० [फ़ा० जेरे + अ० हिरासत] गिरफ्तारी में पडा़ हुआ [को०] । क्रि० प्र०— होना ।

जेरे हुकूमत
वि० [फ़ा० जेर + अ० हुकूमत ] शासन के अधीन । मातहत देश [को०] ।

जेरोजबर
क्रि० वि० [फ्रा० जेरोजबर] नीचे ऊपर उथल पुथल । अस्तव्यस्त (को०) । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

जेल (१)
संज्ञा पुं० [अ०] वह स्थान जहाँ राज्य द्वारा दंडित अपराधी आदि कुछ निश्चित समय के लिये रखे जाते हैं । कारगार । बंदी गृह । मुहा०— जेल काटना, जाना या भोगना = जेल में रहकर दंड भोगना ।

जेल (२)
संज्ञा पुं० [फा़० जेर] जंजाल । हैरानी या परेशानी का काम । उ०— खेलत खेल सहेलिन में पर खेल नवेली को जेल सों लागै ।—मतिराम (शब्द०) ।

जेलखाना
संज्ञा पुं० [अं० जेल + फ्रा० खानह्] कारागार । वि० दे० 'जेल' ।

जेलर
संज्ञा पुं० [अं०] जेलखाने का अध्यक्ष । जेल का अफसर ।

जेलाटीन
संज्ञा स्त्री० [अ०] जानवरों विशेषतः कई प्रकार की मछलियों के मांस, हड्डी खाल आदि को उबालकर तैयार की हुई एक बहुत साफ और बढ़िया सरेस जिसका व्यवहार फोटोग्राफी और चिट्टियों आदि की नकल करने के लिये पैड बनाने में होता है । विशेष—यह पशुओं को खिलाई भी जाती है । पर इसमें पोषक द्रव्य बहुत ही थोडे़ होते हैं । खूब साफ की हुई जेलाटीन से औषधों की गोलियाँ भी बनाई जाती हैं ।

जेली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जेरी] घास या भूसा इकट्ठा करने का औजार । पाँचा ।

जेली (२)
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की विदेशी मिठाई या गाढी़ मीठी चटनी जो फलों आदि द्वारा चीनीं के साथ उबालकर बनाई जाती है । इसे गाढ़ा या कड़ा कर देते हैं ।

जेवड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेवरी' ।

जेवना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'जीमना' ।

जेवनार
संज्ञा स्त्री० [हिं० जेवना] १. बहुत से मनुष्यों का एक साथ बैठकर भोजन करना । भोज । २. रसोई । भोजन ।

जेवर (१)
संज्ञा पुं० [फा़० जेवर] धातु या रत्नों आदि की बनी हुई वह वस्तु जो शोभा के लिये अंगों में पहनी जाती है । गहना । आभूषण । अलंकार । आभरण ।

जेवर (२)
पुं० [देश०] एक प्रकार का महोख पक्षी जिसे जघी या सिंध मोनाल भी कहते हैं । विशेष—यह शिमले में बहुत पाया जाता है ।

जेवर (३) †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जेवरी' ।

जेवरा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योरा' ।

जेवरात
संज्ञा पुं० [फा़० जेवरात] जेवर का बहुवचन ।

जेवरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवा] रस्सी ।

जेष्ठ (१)
संज्ञा पुं० [सं० ज्येष्ठ] १. जेठ मास । २. जेठ । पति का बड़ा भाई ।

जेष्ठ (२)
वि० [सं० ज्येष्ठ] अग्रज । जेठा । बडा़ ।

जेष्ठा
संज्ञा स्त्री० [ सं ज्येष्ठा] दे० 'ज्येष्ठा' ।

जेह
संज्ञा स्त्री० [फ्रा० जिह (= चिल्ला), तुलनीय सं० ज्या] १. कमान की डोरी में वह स्थान जो आँख के पास लगाया जाता है और जिसकी सीध में निशान रहता है । चिल्ला । उ०—तिय कत कमनैती पढ़ी बिन जेह भौह कमान । चित चल बेधे चुकति नहिं, बंक बिलोकनि बान ।—बिहारी (शब्द०) २. दीवार में नीचे की ओर दो तीन हाथ की ऊँचाई तक पलस्तर या मिट्टी आदि का वह लेप जो कुछ अधिक मोटा और उसके तल से अधिक उभरा हुआ होता है । उ०— गदा, पदम औ चक्र संख असि, पंचतत्व सूचक समुझन । अरु, इन पाँचन की गति हरि के बस यही जगत की जेह । भस्म गंग लोचन अहि डमरू पंचतत्व अरु भौरू, हर के बस पाँचड़ यह पँवरू जिनसे पिंड डरेह ।—देवस्वामी (शब्द०) । क्रि० प्र०—उतारना ।—निकालना ।

जेहड़
संज्ञा स्त्री० [हिं० जेट + घट] एक पर एक रखे हुए पानी से भरे हुए बहुत से घडे़ ।

जेहन
संज्ञा पुं० [अ० जेह्न] [वि० जहीन] बुद्धि । धारणाशक्ति ।

जेहबदार
वि० [अ० जेह्न + फ्रा० दार (प्रत्य०)] धारणा शक्ति— वाला । बुद्धिमान [को०] ।

जेहर †
संज्ञा स्त्री० [?] पैर में पहनने का घूँघरूदार पाजेब नाम का जेवर ।

जेहरि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जेहर] दे० 'जेहर' । उ०— (क) पग जेहरि बिछियन की झमकनि चलत परस्पर बाजत ।—सूर (शब्द०) । (स) पग जेहरि जंजीरनि जकन्यो यह उपमा कछु पावै ।—सूर (शब्द०) । (ग) अमिल सुमिल सीढ़ी मदन सदन की कि जगमगैं पग युग जेहरि जराय की ।—केशव (शब्द०) ।

जेहल (१) †
संज्ञा स्त्री० [अ० जहल] [वि० जेहली] हठ । जिद ।

जेहल (२) †
संज्ञा पुं० [अं० जेल] दे० 'जेल' ।

जेहलखाना
संज्ञा पुं० [हिं० जेलखाना] दे० 'जेलखाना' या 'जेल' ।

जेहली
वि० [अ० जेहल] जो समझाने से भी किसी बात की भलाई बुराई न समझे और अपनी हठी न छो़डे । हठी । जिद्दी ।

जेहि पु †
सर्व० [सं० यस्य, प्रा० जस्स, जिस, जेहि] जिसको । उ०—जेहि सुमिरत सिधि होय गण—नायक करिवर वदन ।—तुलसी (शब्द०) ।

जेह्न
संज्ञा पुं० [अ० जेह्न] बुद्धि । धारणा शक्ति ।

जैंता †
संज्ञा पुं० [सं० जयन्ती] जैत का पेड़ ।

जै (१)पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जय' ।

जै (२)पु
वि० [सं० यावत्, प्रा० जाव] जितने । जिस संख्या में ।

जैकरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जयकारी' ।

जैकार पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जयकार' ।

जैकारा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जयकार' ।

जैगीषव्य
संज्ञा पुं० [सं०] योगशास्त्र के वेत्ता एक मुनि का नाम । विशेष— महाभारत में इनकी कथा विस्तार से लिखी है । असित देवल नामक एक ऋषि आदित्य तीर्थं में निवास करते थे । एक दिन उनके यहाँ जैगीषव्य नामक एक ऋषि आए और उन्हीं के यहाँ से निवास करने लगे । थोडे़ ही दिनों में जैगिषव्य योग साधन द्वारा परम सिद्ध हो गए और असित देवल सिद्धिलाभ न कर सके । एक दिन जैगीषव्य कहीं से घूमते फिरते भिक्षुक कै रूप में देवल के पास आकर बैठे । देवल यथाविधि उनकी पूजा करने लगे । जब बहुत दिन तक पूजा करते हो गए और जैगीषव्य अटल भाव से बैठे रहे, कुछ बोले वाले नहीं तब देवल ऊंबकर आकाश पथ से स्नान करने चले गए । समुद्र के किनारे उन्होंने जाकर देखा तो जैगीषव्य को स्नान करते पाया । आश्चर्य से चकित होकर जल्दी से आश्रम को लौट आए । वहाँ पर उन्होंने जैगीषव्य को उसी प्रकार अटल भाव से बैठे पाया । इसपर देवल आकाश मार्ग में जाकर उनकी गति का निरिक्षण करने लगे । उन्होंने देखा कि आकाशचारी अनेक सिद्ध जैगीषव्य की सेवा कर रहें हैं, फिर देखा कि वे नान मार्गों में स्वेच्छा- पूर्वक भ्रमण कर रहे हैं । ब्रम्हलोक, गोलोक, पतिब्रत लोक इत्यादि तक तो देवल पीछे गए पर इसके आगे वे न देख सके की जैगीषव्य कहाँ गए । सिद्धों से पूछने पर मालूम हुआ की वे सारस्वत ब्रम्हलोक में गए हैं जहाँ कोई नहीं जा सकता । इस पर देवल घर लौट आए । वहाँ जैगिषव्य को ज्यों का त्यों बैठे देख उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । इसके बाद वे जैगीषव्य के शिष्य हुए और उनसे योगशास्त्र की शिक्षा ग्रहण करके सिद्ध हुए ।

जैचँद पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जयचंद' ।

जैजैकार
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जयजयकार' ।

जैजैवंती
संज्ञा स्त्री० [सं० जयजयवंती] भैरव राग की एक रागिनी जो सबेरे गाई जाती है ।

जैढक
संज्ञा पुं० [सं० जय + ढक्का] एक प्रकार का बड़ा ढोल । विजय ढोल । जंगी ढोल ।

जैत (१)पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० जैत्र] विजय । जीत । फतह ।

जैत (२)
संज्ञा पुं० [अ०] जैतून वृक्ष । २. जैतून की लकड़ी ।

जैत (३)
संज्ञा पुं० [सं० जयन्ती] अगस्त की तरह का एक पेड़ । विशेष— इसमें पीले फूल और लंबी फलियाँ लगती हैं । इन फलियों की तरकारी होती है । पत्तियाँ और बीज दवा के काम में आते हैं ।

जैतपत्र पु
संज्ञा पुं० [सं० जयति + पत्र] जयपत्र । जीत की सनद ।

जैतवार पु †
वि० [हिं० जैत + वार (प्रत्य०)] जीतनेवाला । विजयी । विजेता । उ०— सत्ता को सपूत राव सगर को सिंह सोहै, जैतवार जगत करेरी किरवान को ।—मति० ग्रं०, पृ० ३७७ ।

जैतश्री
संज्ञा स्त्री० [सं० जयतिश्री] एक रागिनी ।

जैती
संज्ञा स्त्री० [सं० जयन्तिका] एक प्रकार की घास जो रबी की फसल में खेतों में आप से आप उगती है ।

जैतून
संज्ञा पुं० [अ०] एक सदाबहार पेड़ । विशेष— यह अरब शाम आदि से लेकर युरोप के दक्षिणी भागों तक सर्वत्र होता है । इसकी ऊचाँई अधिक से अधिक ४० फुट तक होती है । इसका आकार ऊपर गोलाई लिए होता है । पत्तियाँ इसकी नरकट की पत्तियों से मिलती जुलती, पर उनसे छोटी होती है । ये ऊपर की ओर हरी ओर नीचे की ओर सफेदी लिए होती है । फूल छोटे—छोटे होते हैं और गुच्छों में लगते हैं । फल कचरी के से होते है । पश्चिम की प्राचीन जातियाँ इसे पवित्र मानती थी । रोमन और यूनानी विजेता इसकी पत्तियों की माला सिर पर धारण करते थे । अरबवाले भी इसे पवित्र मानते थे जिसमें मुसलमान लोग अबतक इसकी लकड़ी की तसवीह (माला) बनाते हैं । इस पेड के फल और बीज दोनों काम में आते हैं । फल पकने पर नीलापन लिए काले होते हैं ।कच्चे फलों का मुरब्बा और अचार पड़ता हैं । बीजों से तेल निकलता है । लकडी़ सजावट के सामान बनाने के काम में आती है । इसकी लकडी़ धूप से चिटकती नहीं ।

जैत्र (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० जैत्री] १. विजेता । विजयी । उ०— चारु चल चक्र चित्रित परम जगत विजयी जयति कृष्ण को जैत्र रथ ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४४७ । यौ०—जैत्ररथ = विजयी । २. सर्वोच्च (को०) ।

जैत्र (२)
संज्ञा पुं० १. पारा । २. औषध । ३. विजयी व्यक्ति । विजेता पुरुष (को०) । ४. विजय (को०) । ५. सर्वोच्चता (को०) ।

जैत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] जयंती वृक्ष । जैत का पेड़ ।

जैन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिन का प्रवर्तित धर्म । भारत का एक धर्म संप्रदाय जिसमें अहिंसा का परम धर्म माना जाता है और कोई ईश्वर या सृष्टिकर्ता नहीं माना जाता । विशष—जैन धर्म कितना प्राचीन है ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । जैन ग्रंथो के अनुसार महावीर या वर्धमान ने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था । इसी समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं । उनके अनुसार यह धर्म बौद्ध धर्म के पीछे उसी के कुछ तत्वों को लेकर औऱ उनमें कुछ ब्राह्मण धर्म की शैली मिलाकर खडा़ किया गया । जिस प्रकार बौद्धों में २४ बुद्ध है उसी प्रकार जैनों में भी २४ तीर्थकार है । हिंदू धर्म के अनुसार जैनों ने भी अपने ग्रंथों को आगम, पुराण आदि में विभक्त किया है पर प्रो० जेकोबी आदि के आधुनिक अन्वेषणों के अनुसार यह सिद्ध किया गया है की जैन धर्म बौद्ध धर्म से पहले का है । उदयगिरि, जूनागढ आदि के शिलालेखों से भी जैनमत की प्राचीनता पाई जाती है । ऐसा जान पडता है कि यज्ञों के हिंसा आदि देख जो विरोध का सूत्रपात बहुत पहले से होता आ रहा था उसी ने आगे चलकर जैन धर्म का रूप प्राप्त किया । भारतीयों ज्योतिष में यूनानियों की शैली का प्रचार विक्रमीय संवत् से तीन सौ वर्ष पीछे हुआ । पर जैनों के मूल ग्रंथ अंगों में यवन ज्योतिष का कुछ भी आभास नहीं है । जिस प्रकार ब्रह्मणों की वेद संहिता में पंचवर्षात्मक युग है और कृत्तिका से नक्षत्रों की गणना है उसी प्रकार जैनों के अंग ग्रंथों में भी है । इससे उनकी प्राचीनता सिद्ध होती है । जैन लोग सृष्टिकर्ता ईश्वर को नहीं मानते, जिन या अर्हत् को ही ईश्वरमानते हैं । उन्हीं की प्रार्थना करते हैं और उन्हीं के निमित्त मंदिर आदि बनवाते हैं । जिन २४ हुए हैं, जिनकी नाम ये हैं—ऋषभदेव, अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, सुविधिनाथ, शीतलनाथ, श्रेयांस- नाथ, वासुपूज्य स्वामी, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत स्वामी, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी । इनमें से केवल महावीर स्वामी ऐतिहासिक पुरुष है जिनका ईसा से ५२७ वर्ष पहले होना ग्रंथों से पाया जाया है । शेष के विषय में अनेक प्रकार की अलौकीक और प्रकृतिविरुद्ध कथाएँ हैं । ऋषभदेव की कथा भागवत आदि कई पुराणों में आई है और उनकी गणना हिंदुओं के २४ अवतारों में है । जिस प्रकार काल हिंदुओं में मन्वंतर कल्प आदि में विभक्त है उसी प्रकार जैन में काल दो प्रकार का है— उत्सिर्पिणी और अवसर्पिणी । प्रत्येक उत्सिर्पिणी और अवसर्पिणी में चौबीस चौबीस जिन तीर्थंकर होते हैं । ऊपर जो २४ तीर्थंकर गिनाए गए हैं वे वर्तमान अवसर्पिणी के हैं । जो एक बार तीर्थ कर हो जाते हैं वे फिर दूसरी उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में जन्म नहीं लेते । प्रत्येक उत्सिर्पिणी या अवसर्पिणी में नए नए जीव तीर्थंकर हुआ करते हैं । इन्हीं तीर्थंकरों के उपदेशों को लेकर गणधर लोग द्वादश अंगो की रचना करते हैं । ये ही द्वादशांग जैन धर्म के मूल ग्रंथ माने जाते है । इनके नाम ये हैं—आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग, समवायांग, भगवती सूत्र, ज्ञाताधर्मकथा, उपासक दशांग, अंतकृत् दशांग, अनुत्तोरोपपातिक दशांग, प्रश्न व्याकरण, विपाकश्रुत, हृष्टिवाद । इनमें से ग्यारह अंश तो मिलते हैं पर बारहवाँ हृष्टिवाद नहीं मिलता । ये सब अंग अर्धमागधी प्राकृत में है और अधिक से अधिक बीस बाईस सौ वर्ष पुराने हैं । इन आगमों या अंगों को श्वेताबंर जैन मानते हैं । पर दिगंबर पूरा पूरा नहीं मानते । उनके ग्रंथ संस्कृत में अलग है जिनमें इन तीर्थ करों की कथाएँ है और २४ पुराण के नाम से प्रसिद्ध हैं । यथार्थ में जैन धर्म के तत्वों को संग्रह करके प्रकट करनेवाले महावीर स्वामी ही हुए है । उनके प्रधान शिष्य इंद्रभूति या गौतम थे जिन्हें कुछ युरोपियन विद्वानों ने भ्रमवश शाक्य मुनी गोतम समझा था । जैन धर्म में दो संप्रदाय है — श्वेतांबर और दिगंबर । श्वेतांबर ग्यारह अंगों को मुख्य धर्म मानते हैं और दिगंबर अपने २४ पुराणों को । इसके अतिरिक्त श्वेतांबर लोग तीर्थ करों की मूर्तियों को कच्छु या लंगोट पहनाते हैं और दिगंबर लोग नंगी रखते हैं । इन बातों के अतिरिक्त तत्व या सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । अर्हत् देव ने संसार को द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि बताया है । जगत् का न तो कोई हर्ता है और न जीवों को कोई सुख दुःख देनेवाला है । अपने अपने कर्मों के अनुसार जीव सुख दुःख पाते हैं । जीव या आत्मा का मूल स्वभान शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदमय है, केवल पुदगल या कर्म के आवरण से उसका मूल स्वरुप आच्छादित हो जाता है । जिस समय यह पौद्गलिक भार हट जाता है उस समय आत्मा परमात्मा की उच्च दशा को प्राप्त होता है । जैन मत स्याद्वाद के नाम से भी प्रसिद्ध है । स्याद्वाद का अर्थ है अनेकांतवाद अर्थात् एक ही पदार्थ में नित्यत्व और अनित्यत्व, साद्य्श्य और विरुपत्व, सत्व और असत्व, अभिलाष्यत्व और अनभिलाष्यत्व आदि परस्पर भिन्न धर्मों का सापेक्ष स्वीकार । इस मत के अनुसार आकाश से लेकर दीपक पर्यंत समस्त पदार्थ नित्यत्व और अनित्यत्व आदि उभय धर्म युक्त है । २. जैन धर्म के अनुयायी । जैनी ।

जैनी
संज्ञा पुं० [हिं० जैन] जैन मतावलंबी ।

जैन पु †
संज्ञा पुं० [हिं० जेवना] भोजन । आहार । उ०—इहाँ रहौ जहँ जूठनि पावै ब्रजबासी के जैनु ।—सूर (शब्द०) ।

जैपत्र पु
संज्ञा पुं० [सं० जयपत्र] दे० 'जयपत्र' ।

जैपाल
संज्ञा पुं० [सं०] पालगोडा ।

जैबो, जैबौ †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'जाना' । उ०— बनत नहीं जमुना कौ पेधौ । सुंदर स्याम घाट पर ठाढे़, कहौ कौन विध जैबौ ।—सूर०, १० । ७७९ ।

जैमंगल
संज्ञा पुं० [सं० जयमङ्गल] १. एक वृक्ष जिसकी लकडी़ मजबूत होती है । विशेष— इसकी लकडी़ से मेज, कुरसी आदि सजावट की चीजें बनाई जाती है । २. खास राजा की सवारी की हाथी । ३. संगीत में एक ताल (को०) । ४. जयकार (को०) ।

जैमाल पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जयमाल] दे० 'जयमाल' ।

जैमाला पु
संज्ञा स्त्री० [सं० जयमाला] दे० 'जयमाल' ।

जैमिनि
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्वमीमांसा के प्रवर्तक एक ऋषि जो व्यास जी के४ मनुष्य शिष्यों में से एक थे । विशेष—कहते हैं, इनकी रची एक भारतसंहिता भी थी जिसका अब केवल अश्वमेध पर्व ही मिलता है । यह अश्वमेध पर्व व्यास के अश्वमेध पर्व से बडा है, पर कई नई बातों के समावेश के कारण इसकी प्रामाणिकता में संदेह है ।

जैमिनीय (१)
वि० [सं०] १. जैमिनि संबंधी । २. जैमिनि प्रणीत । ३. जैमिनि का अनुयायी [को०] ।

जैमिनीय (२)
संज्ञा पुं० १.जैमिनिकृत ग्रंथ ।

जैयट
संज्ञा पुं० [देश०] महाभाष्य के तिलककार कैयट के पिता ।

जैयद
वि० [अ०] १. बडा़ भारी । घोर । बहुत बडा़ । जैसे, जैयद बेवकूफ । जैयद आलिम । ३. बहुत धनी । भारी मालदार । जैसे, जैयद असामी ।

जैल (१)
संज्ञा पुं० [अ० जैल] १. दामन । २. नीचे का स्थान । निम्न भाग । ३. पंक्ति । सफ । समूह । ४. इलाका । हलका । यौ०—जेलदार ।

जैल (२)
अव्य० नीचे ।

जैलदार
संज्ञा पुं० [अ० जैल + फा० दार (प्रत्य०)] वह सरकारी ओहदैदार जिसके अधिकार में कई गाँवों का प्रबंध हो ।

जैव (१)
वि० [सं०] १. जीव संबंधी । २. बृहस्पति संबंधी ।

जैव (२)
संज्ञा पुं० १. बृहस्पति के क्षेत्र में धनु राशि और मीन राशि । २. पुष्य नक्षत्र । ३. जीव अर्थात् बृहस्पति के पुत्र कच [को०] ।

जैवातृक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कपूर । २. चंद्रमा । ३. औषध । ४. किसान (को०) । ५. पुत्र (को०) ।

जैवातृक (२)
वि० १. [वि० स्त्री० जैवातृकी] दीर्घायु । २. दुबला पतला ।

जैवात्रिक पु
संज्ञा पुं० [सं० जैवातृक] दे० 'जैवातृक' ।

जैविक
वि० [सं०] दे० 'जैव' ।

जैवेय
संज्ञा पुं० [सं०] जीव अर्थात् बृहस्पति के पुत्र कच [को०] ।

जैस †
वि० [हिं० जैसा] दे० 'जैसा' । उ०— (क) धरतिहि जैस गगन सो नेहा । पलहि आव बरषा ऋतु मेहा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) कोई भल जस धाव तुखारा । कोई जैस बैल गरिआरा । —जायसी ग्रं०, (गुप्त) पृ० २२६ ।

जैसन पु †
वि० [हिं० जैसा] दे० 'जैसा' । उ०— भय भाजु काज न राज ग्राम सों, बससि निजपुर जैसनं । —द० सागर, पृ० १७ ।

जैसवार
संज्ञा पुं० [हिं० जायस + वाला] कुरमियों और कलवारों का एक भेद ।

जैसा (१)
वि० [सं० याद्य्श, प्रा० जारिस० पैशाची जइस्सो वि० स्त्री० जैसी] १. जिस प्रकार का । जिस रूप रंग, आकृति या गुण का । जैसे,— (क) जैसा देवता वैसी पूजा । (ख) जैसा राजा वैसी प्रजा । (ग) जैसा कपडा़ है वैसी सिलाई भी होनी चाहिए । मुहा०—जैसा चाहिए = ठीक । उपयुक्त । जैसा उचित हो । जैसा तैसा = दे० 'जैसे तैसे' । जैसे,—काम जैसा तैसा चल रहा है । जैसे का तैसा = ज्यों का त्यों । जिनमें किसी प्रकार की घटती बढ़ती या फेरफार आदि न हुआ हो । जैसा पहले था, वैसा ही । जैसे—(क) दरजी के यहाँ अभी कपडा़ जैसे का तैसा रखा है, हाथ भी नहीं लगा है । (ख) खाना जैसे का तैसा पडा़ है, किसी ने नहीं खाया । (ग) वह साठ वर्ष का हुआ पर जैसे का तैसा बना हुआ है । जैसे को तैसा = (१) जो जैसा हो उसके साथ वैसा ही व्यवहार करनेवाला । (२) जो जैसा हो उसी प्रकृति का । एक ही स्वभाव या प्रकृति का । उ०— जैसे को तैसा मिलै, मिलै नीच को नीच । पानी में पानी मिलै, मिलै कीच में कीच ।—(शब्द०) । २. जितना । जिस परिमाण का या मात्रा का । जिस कदर । (इस अर्थ में केवल विशेषण के साथ प्रयुक्त होता है ।) जैसे,— जैसा अच्छा यह कपडा़ है, वैसा वह नहीं है । विशेष—संबंध पूरा करने के लिये जो दूसरा वाक्य आता है वह वैसा शब्द के साथ आता है । ३. समान । सदृश । तुल्य । बराबर । जैसे,— उस जैसा आदमी ढूँढे न मिलेगा ।

जैसा (२)
क्रि० वि० [हिं०] जितना । जिस परिमाण या मात्रा में । जैसे,—जैसा इस लड़के को याद है वैसा उस लड़के को नहीं ।

जैसी
वि० [हिं०] 'जैसा' का स्त्री० । दे० 'जैसा' ।

जैसे
क्रि० वि० [हिं० जैसा] जिस प्रकार से । जिस ढँग से । जिस तरीके पर । मुहा०—जैसे जैसे = जिस क्रम से । ज्यों ज्यों । उ०— जैसे जैसे रोग कम होता जायगा वैसे ही वैसे शरीर में शक्ति भी आता जायगी । जैसे तैसे = किसी प्रकार । बहुत यत्न करके । बडी़ कठिनता से । उ०— खैर जैसे तैसे उनको यहाँ ले आना । जैसे बने, जैसे हो = जिस प्रकार संभव हो । जिस तरह हो सके । उ०— जैसे बने वैसे कल शाम तक चले आओ । जैसे कंता घर रहे वैसे रहे विदेश = जिसके रहने या न रहने से काम में कोई अंतर न पडे़ । निरर्थक व्यक्ति । जैसे मिया काठ, वैसी सन की दाढी़ = अनुपयुक्त व्यक्ति के लिये अनुपयुक्त वस्तु ही उपयुक्त होती है ।

जैसो (१)पु
वि० [हिं०] दे० 'जैसा' । उ०— अब कैसै पैयत सुख माँगे । जैसोइ बोइयै तैसोइ लुनिए कर्मन भोग अभागे । —सूर०, १ । ९१ ।

जैसो (२)
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'जैसा' ।

जोँग
संज्ञा पुं०[सं० जोङ्ग] अगर । अगुरु ।

जोंगक
संज्ञा पुं० [सं० जोङ्गक] दे० 'जोंग' ।

जोंगट
संज्ञा पुं० [सं० जोङगट] दे० 'दोहद' [को०] ।

जोंताला
संज्ञा स्त्री० [सं० जोन्ताला] देवधान्य । पुनेरा ।

जोँ
क्रि० वि० [हिं० ज्यों] ज्यों । जैसे । जिस प्रकार से । जिस तरह से । जिस भाँति । विशेष— दे०'ज्यों' ।

जोँक
संज्ञा स्त्री० [सं० जलौक्स्] १. पानी में रहनेवाले एक प्रसिद्ध कीडा़ जो बिलकुल थैली के आकार का होता है और जीवों के शरीर में चिपककर उनका रक्त चूसता है । विशेष— इसकी छोटी बडी अनेक जातियाँ है जिनमें से अधिकांश तालाबों और छोटी नदियों आदि में, कुछ तर घासों में और बहुत थोडी जातियाँ समुद्र में होती है । साधराण जोँक डेढ़ दो इंच लंबी होती है पर किसी किसी जाति की समुद्री जोंक ढाई फुट तक लंबी होती है । साधारणतः जोंक का शरीर कुछ चिपटा और कालापन मिले हरे रंग का या भूरा होता है जिनपर या तो धारियाँ या बुँदकियाँ होती है । आँखें इसे बहुत सी होती है, पर काटने और लहू चूसने की शक्ति केवल आगे, मुँह की ओर ही होती है । आकार के विचार से साधारण जोंक तीन प्रकार की मानी जोती है — कागजी, मझोली और भैसिंया । सुश्रुत ने बारह प्रकार की जोंके गिनाई है—कृष्णा, अलपर्द्दा, इंद्रायुधा, गोचंदना, कर्बुरा और सामुद्रिक ये छह प्रकार की जोंके जहरीली और कपिला, पिंगला, शँकुमुखी, मूषिका, पुँडरीक- मुखी और सावरिका ये छह प्रकार की जोंके बिना जहर की बतलाई गई हैं । जोंक शरीर के किसी स्थान में चिपककर खून चूसने लगती है और पेट में खून भर जाने के कारण खूब फूल उठती है । शरीर के किसी अंग में फोडा फुंसी या गिलटीआदि हो जाने पर वहाँ का दूषित रक्त निकाल देने के लिये लोग इसे चिपका देते हैं और जब वह खूब खून पी लेती है तब उसे उँगलियों से खूब कसकर दुह लेते है जिससे सारा खून उसकी गुदा के मार्ग से निकल जाता है । भारत में बहुत प्राचीन काल से इस कार्य के लिये इसका उपयोग होता आया है । कभी कभी पशुओं के जल पीने के समय जल के साथ जोंक भी उनके पेट में चली जाती है । पर्या०—रक्तपा । जलूका । जलोरगी । तीक्ष्णा । बमनी । वेधनी । जलसर्पिणी । जलसूची । जलाटनी । जलाका । पटालुका । वेणीवेधनी । जलात्पिका । क्रि० प्र०—लगाना ।—लगवाना । २. वह मनुष्य जो अपना काम निकालने के लिये बेतरह पीछे पड़ जाय । वह जो बिना अपने काम निकाले पिंड न छोडे़ । ३. सेवार का बनाया हुआ एक प्रकार का छनना जिससे चीनी साफ की जाती है ।

जोँकी
संज्ञा स्त्री०[हिं० जोंक] १. वह जलन जो पशुओं के पेट में पानी के साथ जोंक उतर जाने के कारण होती है । २. लोहे के एक प्रकार का काँटा जो दो तख्तों को मजबूती के साथ जोड़ने के काम में आता है । ३. एक प्रकार का लाल रंग का कीडा़ जो पानी में होता है । ४. दे० 'जोंक' ।

जोँ जोँ
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'ज्यों ज्यों' ।

जोँ तोँ †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'ज्यों त्यों' । मुहा०—जों तों करके = बडी़ कठिनाई से । उ०— गरज जों तों करके दिन तो काटा ।—लल्लू (शब्द०) ।

जोँदरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] 'जोंधरी' ।

जोँदरी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोंधरी' ।

जोँधरा †
संज्ञा पुं० [सं० जूर्ण] १. बडे़ दानों का ज्वर । २. जोंघरी का सूखा डंठल । करपी । लकठा ।

जोँधरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० जूर्ण] १. छोटी ज्वार । छोटे दानों की ज्वार । २. बाजरा (क्वचित्) ।

जोँधैया
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योत्सना, हिं० जोन्हैया] चाँदनी । चंद्रिका ।

जो (१)
सर्व० [सं० य?] एक संबंधवाचक सर्वनाम जिसके द्वारा कही हुई संज्ञा या सर्वनाम के वर्णन में कुछ और वर्णन की योजना की जाती है । जैसे,—(क) जो घोडा़ आपने भेजा था वह मर गया । (ख) जो लोग कल यहाँ आए थे, वे गए । विशेष—पुरानी हिंदी में इसके सान 'सो' का व्यवाहार होता था । अब भी लोग प्रायः इसके साथ 'सो' बोलते हैं पर अब इसका व्यवहार कम होता जा रहा है । जैसे,— जो बोवैना सो काटेगा । आजकल बहुधा इसके साथ 'वह' या 'वे' का प्रयोग होता है ।

जौ (२)पु
अव्य० [सं० यद्] १. यदि । अगर । उ०—(क) जो करनी समुझे प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कल्प शत कोरौ ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) जो बालक कछु अनुचित करहीं । गुरु, पिंतु मातु मोद मन भरहीं ।—तुलसी (शब्द०) । विशेष— इस अर्थ में इसके साथ 'तो' का व्यवहार होता है । जैसे,— इसमें पानी देना हो तो अभी दे दो । २. यद्यपि । अगरचे । (क्व०) । उ०— पौरि पौंरि कोतवार जो बैठा । पेमक लुबुध सुरंग होइ पैठा ।—जायसी (शब्द०) ।

जोअंडा पु
संज्ञा पुं० [सं० युवन्] जवान । युवा । उ०— जोअंडा धावहि तुरय रणचावहि बोलहि गाढिम बोला ।—कीर्ति० पृ० ९४ ।

जोअण पु
संज्ञा पुं० [सं० योजन, प्रा० जोअण] दे० 'योजन' । उ०— सिंधु परइ सत जोअणी, खिवियाँ बीजलियाँह । सुरहउ लोद्र महक्कियाँ, भीनी ठोवडि़याँह ।—ढोला०, दू० १९० ।

जोअना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'जोवना' ।

जोइ (१)पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० जाया] जोरु । पत्नी । भार्या । स्त्री । उ०—विरध अरु विभाग हू को पतित जो पति होइ । जऊ मुरख होइ रोगी तजै नाहीं जोइ ।—सूर (शब्द०) ।

जोई † (२)
सर्व० [हिं०] दे० 'जो' । यौ०—जोइ सोइ = जो सो । जो जी में आए । उ०—जसोदा हरि पालनै झुलाबै । हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै ।—सूर०, १० ।६६१ ।

जोइ पु † (३)
वि० [सं० योग्य, प्रा० जो० जोअ, जोव] योग्य । उचित । उ०—राजा राणी नूं कहइ, बात विचारउ जोइ ।—ढोला०, दू० ७ ।

जोइन पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० योनि, हिं० जोनी] दे० 'योनि' । उ०— तीन लोक जोइन औतारा । आवागमन में फिरि फिरि पारा ।—कबीर सा०, पृ० ८०९ ।

जोइसी †
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिषी] दे० 'ज्योतिषी' । उ०—चित पितु मारक जोग गनि भये सुत सोगु । फिरि हुलस्यौ जिय जोइसी समुझें जारज जोग ।—बिहारी (शब्द०) ।

जोउ
सर्व [हिं०] दे० 'जों' ।

जोक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोंक] दे० 'जोंक' ।

जोक (२)पु
संज्ञा पुं० [अ० जौक] उ०— मँगे जीव तो घर बुला भेज उसूँ । करे जोक फूलाँ सूँ, भर सेज कूँ ।—दक्खिनी०, पृ० ८७ । २. रुझान । चस्का । उ०— खुशियाँ इशरताँ जोक दायम सो नित नित शहा के मंदिर में टिमटिम्याँ बजाय ।— दक्खिनी०, पृ० ७३ ।

जोख †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] जोखने का कार्य या भाव । तौल ।

जोखता †
संज्ञा स्त्री० [सं० योषिता] स्त्री । लुगाई ।

जोखना (१)
क्रि० स०[सं० जुष (= जाँचना)] तौलना । वजन करना ।

जोखना (२) †
क्रि० अ० [सं० जुष = जाँचना] विचार करना । सोचना । उ०— काहू साथ न तन गा, सकति मुए सब पोखी । ओछ पूर तेहि जानब जो थिर आवत जोखि ।—जायसी (शब्द०) ।

जोखम †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोखिम' ।

जोखा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जोखना] १. लेखा । हिसाब । विशेष—इस अर्थ में इसका व्यवहार बहुधा यौगिक में ही होता है । जैसे, लेखा जोखा । †२. तौलने का काम करनेवाला आदमी ।

जोखा (२) †
संज्ञा स्त्री० [सं० योषा] स्त्री । लुगाई ।

जोखाई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोखना] १. जोखने का काम । तौलाई । २. जोखने या तेलने का भाव । ३. तौलने की मजदूरी ।

जोखिऊँ †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोखिम] दे० 'जोखिम' । उ०—तुम सुखिया अपने घर राजा । जोखिउँ एत सहहु केहि काजा ।— जायसी (शब्द०) ।

जोखिम
संज्ञा स्त्री० [?] १. भारी अनिष्ट या विपत्ति की आशंका अथवा संभावना । झोंकी । जैसे,— इस काम में बहुत जोखिम है । मुहा०— जोखिम उठाना या सहना = ऐसा काम करना जिसमें भारी अनिष्ट की आशंका हो । जोखिम में पड़ना = जोखिम उठाना । जान जोखिम होना = प्राण जाने की भय होना । २. वह पदार्थ जिसके कारण भारी विपत्ती आने की संभावना हो, जैसे, रुपया, पैसा, जेवर आदि । जैसे,—तुम्हारी यह जोखिम हम नहीं रख सकते ।

जोखुआ †
संज्ञा पुं० [हिं० जौखना + उआ (प्रत्य०)] तौलनेवाला । बया ।

जोखुवा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोखुआ' ।

जोखोँ †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोखिम' । मुहा०— जान जोखों होना = प्राण संकट में होना ।

जोगंधर
संज्ञा पुं० [सं० योगन्धर] एक युक्ति जिसके द्वारा शत्रु के चलाए हुए अस्त्र से अपना बचाव किया जाता है । यह युक्ति श्री रामचंद्र जी को विश्वामित्र ने सिखलाई थी । उ०— पद्मनाभ अरु माहानाभ दोउ द्वंदहु सुनाभा । ज्योति निकृंत निराश विमल युग जोगंधर बड़ आभा ।—रघुराज (शब्द०) ।

जोग (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योग' । यौ०— जोगमुद्रा = योग की मुद्रा । जोग समाधि = योग की समाधि ।

जोग (२)
अव्य० [सं० योग्य] १. के लिये । वास्ते । उ०—अपने जोग लागि अस खेला । गुरु भएउँ आपु कीन्ह तुम चेला ।—जायसी (शब्द०) । २. कौ । के निकट । (पु० हिं०) । विशेष— इस शब्द का प्रयोग बहुधा पुरानी परिपाटी की चिट्ठियों के आरंभिक वाक्यों में होता है । जैसे,—'स्वस्ति श्री भाई परमानंद जी जोग लिखा काशी से सिताराम का राम राम बाँचना ।' बहुधा यह द्वितीया और चतुर्थी विभक्ति के स्थान पर काम में आता है । जैसे,— इनमें से एक साडी़ भाई कृष्ण- चंद्र जी जोग देना ।

जोगडा़
संज्ञा पुं० [हिं० जोग + डा़ (प्रत्य०)] बना हुआ योगी । पाखंडी । जैसे,—घर का जोगी जोगडा़ आन गाँव का सिद्द । (कहा०) ।

जोगता †पु
संज्ञा स्त्री० [सं० योग्यता] दे० 'योग्यता' ।

जोगन †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोगिन' ।

जोगनिया (१) †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोगिनी (१)' ।

जोगनिया (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोगिनिया (२)' ।

जोगमाया
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'योगमाया' ।

जोगवना
क्रि० स० [सं० योग + अवना (प्रत्य०)] १. किसी वस्तु को यत्न से रखना जिसेमें वो नष्ट भ्रष्ट न हो पाए । रक्षित रखना । उ०— जिवन मुरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ।—तुलसी (शब्द०) । २. संचित करना । बटोरना । ३. लिहाज रखना । आदर करना । उ०— ता कुभातु को मन जोगवत ज्यों निज तन मर्म कुभाउ ।—तुलसी (शब्द०) । ४. दर गुजर करना । जाने देना । कुछ ख्याल न करना । उ०— खेलत संग अनुज बालक नित जोगवत अनट अपाउ ।—तुलसी (शब्द०) । ५. पूरा करना । पूर्ण करना । उ०—काय न कलेस लेस लेत मानि मन की । सुमिरे सकुचि रुचि जोगवत जन की ।—तुलसी (शब्द०) ।

जोगसाधन पु
संज्ञा पुं०[सं० योगसाधन] तपस्या ।

जोगा
संज्ञा पुं० [देश०] अफीम का खूदड़ । वह मैल जो अफीम को छानने से बच रहती है ।

जोगानल पु
संज्ञा स्त्री० [सं० योगानल] योग से उत्पन्न आग । उ०— हर विरह जाइ बहोरि पितु के जग्य जोगानल जरी— तुलसी (शब्द०) ।

जोगिंद पु †
संज्ञा पुं० [सं० योगिन्द्र] १. योगिराज । योगिश्रेष्ठ । २. महादेव (डिं०) ।

जोगि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० योगी] दे० 'योगी' ।

जोगिन
संज्ञा स्त्री० [सं० योगिनी] १. जोगी की स्त्री । २. विरक्त स्त्री । साधुनी । ३. पिशाचिनी । ४. एक प्रकार की रणदेवी जो रण में कटे मरे मनुष्यों के रुंड मुंडों को देखकर आनं- दित होती है और मुंडों को गेंद बनाकर खेलती है । ५. एक प्रकार का झाडी़दार पौधा जिसमें नीले रंग के फूल लगते हैं । ६. दे०'योगिनी' ।

जोगिनिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. लाल रंग की एक प्रकार की ज्वार । २. एक प्रकार का आम । ३. एक प्रकार का धान जो अगहन में तैयार होता है । विशेष— इसका चावल वर्षों ठहर सकता है ।

जोगिनी (१)
संज्ञा [सं० जोगिनी] १. दे० 'योगिनी' । उ०—भूमि अति जगमगी जोगिनी सुनी जगी सहस फन शेष सो सीस काँधो ।—सूर (शब्द०) । २. दे० 'जोगिन' ।

जोगिनी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योतिरिङ्गण, प्रा० जोइगण] जुगनूँ । खद्योत ।

जोगिया (१)
वि० [हिं० जोगी + इया (प्रत्य०)] १. जोगी संबंधी । जोगी का । जैसे, जोगिया भेस । २. गेरू रंग में रँगा हुआ । गैरिक । ३. गेरु के रंग का । मटमैलापन लिए लाल रंग का ।

जोगिया (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० १.'जोगडा़' । दे०'जोगी' । ३. एक रागिनी ।

जोगींद्र पु †
संज्ञा पुं० [सं० योगींन्द्र ] १. योगिराज । बडा़ योगी । योगिश्रष्ठ । २. शिव । महादेव ।

जोगी
संज्ञा पुं० [सं० योगिन्] १. वह जो योग करता हो । योगी । २. एक प्रकार के भिक्षुक जो सारंगी लेकर भर्तृ हरि के गीत गाते और भीख माँगते हैं । इनके कपडे़ गेरुए रंग के होते हैं ।

जोगीडा़
संज्ञा पुं० [हिं० जोगी + डा़ (प्रत्य०)] १. एक प्रकार का चलता गाना जो प्रायः बसंत ऋतु में ढोलक पर गाया जाता है । २. गाने बजानेवालों का एक समाज । विशेष— इस समाज मे एक गानेवाला लड़का, एक ढोलक बजानेवाला और दो सारंगी बजानेवाले रहते हैं । इनमें गानेवाले लड़के का भेस प्रायः योगियों का सा होता है औऱ वह कुछ अलंकार आदि भी पहने रहता है । इसका गाना देहांतों में सुना जाता है । ३. इस समाज का कोई आदमी ।

जोगीश्वर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योगीश्वर' ।

जोगीस्वर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योगीश्वर' । उ०—जोगी स्वरन के ईस्वर राम । बहुरच्यो जदपि आत्माराम ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३२१ ।

जोगेश्वर
संज्ञा पुं० [सं० योगेश्वर] १. श्रीकृष्ण । २. शिव । ३. दोवहोत्र के पुत्र का नाम । ४. योग का अधिकारी । योग का ज्ञाता । सिद्ध योगी ।

जोगेसर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योगेश्वर' । उ०— यूँ कँमघज्ज धरे धू अंबर । ज्यूँ गंगा मेले जोगेसर ।—रा० रू०, पृ० ७६ ।

जोगेस्वर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योगेश्वर' । उ०— जोग मार्ग जोगेंद्र जोगि जोगेस्वर जानें । —पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३८४ ।

जोगोटा (१)पु
वि० [हिं० जोगी] जोग या योग करनेवाला ।

जोगोटा (२)पु
संज्ञा पुं० [हिं० जोगौटा] दे० 'जोगौटा' ।

जोगौटा पु
संज्ञा पुं० [सं० योगपट्ट] १. योग का वस्त्र । कौपीन । लँगोट । २. झोली । उ०— मेखल सिंगी चक्र घँघारी । जोगौटा रुद्राख अधारी । कंथा पहिरि डंड कर गहा । सिद्ध होइ कहँ गोरख कहा ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २०५ ।

जोग्य पु
वि० [हिं०] दे० 'योग्य' ।

जोजन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योजन' । उ०—कह मुनि तात भएउ अँधियारा । जोजय सत्तरि नगरु तु्श्हारा ।—मानस, १ ।१५९ ।

जोजनगंधा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'योजनगंधा' ।

जोट (१)पु †
संज्ञा पुं०[सं० योटक] १. जोडा़ । जोडी़ । २. साथी । सँघाती ।

जोट (२)
वि० समान । बराबरी का । मेल का ।

जोटा पु †
संज्ञा पुं०[सं० योटक] १. जोडा़ । युग । उ०—(क) ए दोऊ दशरथ के ढोटा । बाल मरननि के कल जोटा ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लखन सघन वन ओटा ।—तुलसी (शब्द०) । २. टाट का बना हुआ एक बडा़ दोहरा थैला जिसमें अनाज भरकर बैलों पर लादा जाता है । गौना । खुरजी ।

जोटिंग
संज्ञा पुं० [सं० जोटिंङ्ग] १. महादेव । शिव । २. अत्यंत कठिन तपस्या करनेवाला साधक [को०] ।

जोटी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोट] १. जोडी़ । युग्मक । उ०— काँचो दूध पियावत पचि पचि देत न माखन रोटी ।—सूरदास चीरजीवहु वोऊ हरि हलधर जाटी ।—सूर (शब्द०) । २. बराबरी का । जोड़ का । समान । ३. जो गुण आदि में किसी दूसरे के समान हो । जिसका मेल दूसरे के साथ बैठ जाता हो ।

जोड़
संज्ञा पुं० [सं०] बंधन [को०] ।

जोड़
संज्ञा पुं० [सं० योग] १. गणित में कई संख्याओं का योग । जोड़ने की क्रिया । २. गणित में कई संख्याओं का योगफल । वह संख्या जो कई संख्याओं को जोड़ने से निकले । मीजान । ठीक । टोटल । क्रि० प्र० —देना ।—लगाना । ३. वह स्थान जहाँ दो या अधिक पदार्थ या टुकडे़ जुडे़ अथवा मिले हों । जैसे, कपडे़ में सिलाई के कारण पड़नेवाला जोड़, लोटे या थाली आदि क जोड़ । मुहा०—जोड़ उखडना = जोड़ का ढीला पड़ जाना । संधि स्थान में कोई ऐसा विकार उत्पन्न होना जिसके कारण जुडे़ हुए पदार्थ अलग हो जायँ । ४. वह टुकडा़ जो किसी चीज में जोडा़ जाय । जैसे,—यह चाँदनी कुछ छोटी है इसमें जोड़ लगा दो । ५. वह चिन्ह जो दो चीजों के एक में मिलने के कारण संधि स्थान पर पड़ता है । ६. शरीर के दों अवयवों का संधि स्थान । गाँठ । जैसे, कंधा, घुटना, कलाई, पोर आदि । मुहा०—जोड़ उखाड़ना = किसी अवयव के मूल का अपने स्थान से हट जाना । जोड़ बैठना = अपने स्थान से हटे हुए अवयव के मूल का अपने स्थान पर आ जाना । ७. मेल । मिलान । ८. बराबरी । समानता । जैसे,— तुम्हारा और उनका कौन जोड़ है ? विशेष—प्रायः इस अर्थ में इस शब्द का रुप जोड़ का भी होता है । जैसे,—(क) यह गमला उसके जोड़ का है । (ख) इसके जोड़ का एक लंप ले आओ । ९.एक ही तरह की अथवा साथ साथ काम में आनेवाली दो चीजें । जोडा़ । जैसे, पहलवानों का जोड़, कपडों (धोती और दुपट्टे) का जोड़ । मुहा०— जोड़ बाँधना = (१) कुश्ती के लिये बराबरी के दो पहलवानों को चुनना । (२) किसी काम पर अलग अलग दो दो आदमियों को नियत करना । (३) चौपड़ से दो गोटियाँ एक ही घर में रखना । १०. वह जो बराबरी का हो । समान धर्म या गुण आदिवाला । जोड़ । ११. पहनने के सब कपडे़ । पूरी पोशाक । जैसे,— उनके पास चार जोड़ कपडे हैं । १२. किसी वस्तु या कार्य में प्रयुक्त होनेवाली सब आवश्यक सामग्री । जैसे, पहनने के सब कपड़ों या अंग प्रत्यंग के आभूषणों का जोड़ । १३. जोड़ने की क्रिया या भाव । १४. छल । दाँव । यौ०—जोड़ तोड़ = (१) दाँव पेंच । छल कपट । (२) किसी कार्य विशेष युक्ति । ढंग । विशेष—बहुधा इस अर्थ में इसके साथ 'लगाना' । 'भिड़ना' क्रियाओं का व्यवहार होता है । १५. 'जोड़ा' ।

जोड़ती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़+ती (प्रत्य०)] १. गणित में कई संख्याओं का योग । जोड़ । २. गणना । गिनती । शुमार ।

जोड़न
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़] १. जोड़ने की क्रिया या भाव । २. वह पदार्थ जो दही जमाने के लिये दूध में डाला जाता है । जावन । जामन ।

जोड़ना
क्रि० स० [सं० जुड़ (= बाँधन) या सं० युक्त, प्रा० जुह] १. दो वस्तुओं को सीकर, मिलाकर, चिपकाकर अथवा इसी प्रकार के किसी और उपाय से एक करना । दो चीजों को मजबूती से एक करना । जैसे, लंबाई बढा़ने के लिये कागज या कपडा़ जोड़ना । २. किसी टुटी हुई चीज के टुकड़ों को मिला कर एक करना । ३. द्रव्य या सामग्री को क्रम से रखना, लगाना या स्थापित करना । जैसे, अक्षर जोड़ना, इंट या पत्थर जोड़ना । ४. एकत्र करना । इकट्ठा करना । संग्रह करना । जैसे, रुपए जोड़ना । कुनबा जोड़ना, सामग्री जोड़ना । ५. कई संख्याओं का योगफल निकालना । मीजान लगाना । ६. वाक्यों या पदों आदि की योजना करना । वर्णन प्रस्तुत करना । जैसे, कहानी जोड़ना, कविता जोड़ना, बात जोड़ना तूमार या तूफान जोड़ना (= झूठा दोषारोपण करना) । ७. प्रज्वलित करना । जलाना । जैसे, आग जोडना, दीआ जोड़ना । ८. संबंध स्थापित करना । ९. संबंध करना । संबंध उत्पन्न करना । जैसे, दोस्ती जोड़ना । † १०. जोतना । संयो० क्रि०—देना ।

जोड़ला †
वि० [हिं० जोडा़ + ला (द्रत्य०)] एक ही गर्भ से एक ही समय में जन्म हुए दो बच्चे । यमज ।

जोड़वाँ
वि० [हिं० जोडा़ + वाँ (प्रत्य०)] वे दो बच्चे जो एक समय में और एक ही गर्भ से उत्पन्न हुए हों । यमज ।

जोड़वाई
संज्ञा पुं० [हिं० जोड़वाणा] १. जोड़वाने की क्रिया । २. जोड़वाने का भाव । ३. जोड़वाने की मजदूरी ।

जोड़वाना
क्रि० स० [हिं० जोड़ना का प्रे० रूप] दूसरे को जोड़ने मे प्रवृत्त करना । जोड़ने का काम दूसरे से कराना ।

जोडा़
संज्ञा पुं० [हिं० जोड़ना] [स्त्री० जोडी़] दो समान पदार्थ । एक ही सी दो चीजें । जैसे, धोतियों का जोडा़, तस्वीरों का जोडा़, गुलदानों का जोडा़ । क्रि० प्र०—लगाना । विशेष— जोडे़ में का प्रत्येक पदार्थ भी एक दूसरे का जोड़ा कहलाता है । जैसे, किसी एक गुलदान को उसी तरह के दूसरे गुलदान को जोडा़ कहेंगे । २. दोनों पैरों में पहनने के जूते । उपनाह । ३. एक साथ या एक मेल में पहने जानेवाले दो कपडे़ । जैसे, अंगे और पैजामे का जोडा़, कोट और पतलून का जोड़ा, लहुँगे और ओढ़नी का जोड़ा । ४. पहनने के सब कपडे़ । पूरी पोशाक । जैसे,—(क) उनके पास चार जोड़े कपडे हैं । (ख) हम तो घोडे़ जोडे़ से तैयार है, तुम्हारी ही देर थी । यौ०— जोडा़ जामा = (१) वे सब कपडे़ जो विवाह में वर पह — नता है । (२) पहनने के सब कपडे़ । पूरी पोशाक । क्रि० प्र०—पहनवा ।—बढा़ना ।ं०[सं० योटक] १. जोडा़ । युग । उ०—(क) ए दोऊ दशरथ के ढोटा । बाल मरननि के कल जोटा ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लखन सघन वन ओटा ।—तुलसी (शब्द०) । २. टाट का बना हुआ एक बडा़ दोहरा थैला जिसमें अनाज भरकर बैलों पर लादा जाता है । गौना । खुरजी ।

जोटिंग
संज्ञा पुं० [सं० जोटिंङ्ग] १. महादेव । शिव । २. अत्यंत कठिन तपस्या करनेवाला साधक [को०] ।

जोटी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोट] १. जोडी़ । युग्मक । उ०— काँचो दूध पियावत पचि पचि देत न माखन रोटी ।—सूरदास ५. स्त्री और पुरुष । जैसे, वर कन्या का जोड़ा । ६. नर और मादा (केवल पशु और पक्षियों आदि के लिये) । जैसे, सारस का जोड़ा कबूतर का जोड़ा, कुत्तों का जोड़ा । विशेष—अंक ५ और ६ के अर्थों में स्त्री और पुरुष अथवा नर और मादा में से प्रत्येक को भी एक दूसरे का जोड़ा कहते हैं । क्रि० प्र०—मिलाना ।—लगाना । मुहा०—जोड़ा खाना = संभोग करना । मैथुन करना । जोड़ा खिलाना = संभोग से प्रवृत्त करना । मैथुन कराना । जोड़ा लगाना = नर और मादा को मैथुन में प्रवृत्त करना । ७. वह जो बराबरी का हो । जोड़ा । ८. दे० 'जोड़' ।

जोड़ाई
संज्ञा स्त्री [हिं० जोड़ना + आई (प्रत्य०)] १. दो या अधिक वस्तुओं को जोड़ने की क्रिया या भाव । २. जोड़ने की मदजूरी । ३. दीवार आदि बचाने के लिये ईंटों या पत्थरों के टुकडों को एक दूसरे पर रखकर जोड़ने की क्रिया । ४. धातुओं, पीतल, ताँबा, लोहा आदि जोड़ने का काम ।

जोड़ासंदेश
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकरा की बंगला मिठाई जो छेने से बनती है ।

जोड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़ा ] १. दो समान पदार्थ । एक ही सी दो चिजें । जोड़ा । जैसे, शाल की जोड़ी, तस्बीरों की जोड़ी, किवाड़ों की जोड़ी, घोड़ों या बैलों की जोड़ी । क्रि० प्र०—मिलाना ।—लगाना । यौ०—जोड़ीदार = जोड़वाला । जो किसी के साथ में हो । (किसी काम पर एक साथ नियूक्त होनेवाले दो आदमी परस्पर एक दूसरे को अपना जोड़ीदार कहते हैं ।) विशेष—जोड़ी में प्रत्येक पदार्थों को भी परस्पर एक दूसरे की जोड़ी कहते हैं । जैसे,—किसी एक तसबीर को उसी तरह की दूसरी तसबीर की 'जोड़ी ' कहेंगे । २. एक साथ पहनने के सब कपड़े । पूरी पोशाक । जैसे,—उनके पास चार जोड़ी कपड़े हैं । ३. स्त्री और पुरुष । जैसे वर बधू की जोड़ी । ४. नर और मादा (केवल पशुओं और पक्षियों के लिये) । जैसे, घोड़ों की जोड़ी, सारस की जोड़ी, मोर की जोड़ी । विशेष—अंक ३ और ४ के अर्थ में स्त्री और पुरुष अथवा नर और मादा में से प्रत्येक को एक दूसरे की जोड़ी कहते हैं । ५. दो घोड़ों या दो बैलों की गाड़ी । वह गाड़ी जिसे दो घोड़े या दो बैल खींचते हो । जैसे,—जब से ससुराल का माल आपको मिला है तबसे आप जोड़ी पर निकलते हैं । ६. दोनों मुगदर जिनसे कसरत करते हैं । क्रि० प्र०—फेरना ।—भाँजना ।—हिलाना । यौ०—जोड़ी की बैठक = वह बैठकी (कसरत) जो मुगदरों की जोड़ी पर हाथ टेककर की जाती है । मुगदरों के अभाव में दो लकड़ियों से भी काम लिया जाता है । ७. मजीरा । ताल । यौ०—जोड़ीवाल = जो गाने बजानेवालों के साथ जोड़ी या मँजीरा बजाता हो । ८. वह जो बराबरी का हो । समान धर्म या गुण आदि वाला । जोड़ ।

जोड्आ †
संज्ञा पुं० [हिं० जोड़ा + उआ (प्रत्य०)] पैर में पहनने का चाँदी का एक प्रकार का गहना । विशेष—इसमें एक सिकरी में छोटे बड़े दो छल्ले लगे रहते हैं । बड़ा छल्ला अँगूठे में और छोटा सबसे छोटी उँगली में पहना जाता है । सिकरी बीच की उँगलियों के ऊपर रहती है ।

जोड़
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोरू' ।

जोत (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोतना अथवा सं० योकत्र, प्रा० जोत] १. वह चमड़े का तस्मा या रस्सी जिसका एक सिरा घोड़े, बैल आदि जोते जानेवाला जानवरों के गले में और दूसरा सिरा उस चीज में बँधा रहता है जिसमें जानवर जोते जाते हैं । जैसे, एक्के की जोत, गाड़ी की जोत, मोट या चरसे की जोत । क्रि० प्र०—बाँधना ।—लगाना । २. वह रस्सी जिसमें तराजू की डंडी से बंधे हुए उसके पल्ले लटकते रहते हैं । ३. वह छोटी सी रस्सी या पगही जिसमें बैल बाँधे जाते हैं और जो उन्हें जोतते समय जुआठे में बाँध दी जाती है । ४. उतनी भूमि जितनी एक असामी को जोतने बोने के लिये मिली हो । ५. एक क्रम या पलटे में जितनी भूमि जोती जाय ।

जोत † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योति] १. दे०' ज्योति' । २. दे०' जोति' ।

जोत † (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] समतल पहाड़ी । उ०—यद्यपि वहाँ पहुँचने के लिये कुल्लू से दो जबर्दस्त जोते पार करनी पड़ेंगी ।—किन्नर०, पृ० ९४ ।

जोत पु (४)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषी' । उ०—अलग पुहवै नरेस ब्यास जग जोत बुलाइय । लगन लिद्धि अनुजा सुत नाम चिन्ह चक्क चलाइय ।—पृ० रा०, १ । ६८९ ।

जोतक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषी' । उ०—माता पूछे पंडिता जोतक पढ़हि अनेक । जो बिधि ने लिख पाया को बूझै न ज्ञान विवेक ।—प्राण०, पृ० २११ ।

जोतखी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषी' । उ०—जोतखी जी ठीक कहते है । गाँव के ग्रह अच्छे नहीं है ।—मैला०, पृ० २९ ।

जोतगी पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषि' । उ०—तब बुलाय सब जोतगी, कही सुपनफल सत्य । दिवस पंच के अंतरे, होय सु दिल्लीपत्त ।—पृ० रा०, ३ । ११ ।

जोतड़िया पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोत] दे० 'ज्योति' । उ०—ऊँची पउड़ी लै गगनंतरि चढ़ीआ । अनहंद बीचारु चमकी जोतड़िया ।—प्राण०, पृ० २२३ ।

जोतदार
संज्ञा पुं० [हिं० जोत + फा० दार (प्रत्य०)] वह असामी जिसे जोतने बोने के लिये कुछ जमीन (जोत) मिली हो ।

जोतना
क्रि० स० [सं० योजन, प्रा० युक्त, प्रा० जुत्त + हिं० ना (प्रत्य०)] १. रथ, गाड़ी, कोल्हू, चरसे आदि को चलाने के लिये उसके आगे बैल, घोड़े आदि पशु बाँधना । जैसे,—घोड़ा जोतना । २. गाड़ी या रथ आदि को उनमें घोड़े बैल आदि को जोतकर चलने के लिये तैयार करना । जैसे, गाड़ी जोतना । ३. किसी को जबरदस्त किसी काम में लगाना । ४. हल चलाकर खेती के लिये जमीन की मिट्टी खोदना । हल चलाना जैसे, खेत जोतना ।

जोतनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोत या जोतना] १. वह छोटी रस्सी जो जुए में जुत हुए जानवर के गले के नीचे दोनों ओर बँधी होती है । २. जुताई । जोतने का काम ।

जोतसी †
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिषी] दे० 'ज्योतिषी' ।

जोताँत
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोतना] खेत की मिट्टी की ऊपरी तह । (कुम्हार) ।

जोता
संज्ञा पुं० [हिं० जोतना] १. जुआठे में बँधी हुई वह पतली रस्सी जिसमें बैलों की गरदन फँसाई जाती है । २. जुलाहों की परिभाषा में वे दोनों डोरियाँ जो करघे पर फैलाए हुए ताने के अंतिम सिरे पर उसके सूतों को ठीक रखनेवाली कमाँची या भँजनी के दोनों सिरों पर बँधी हुई होती हैं । इन दोनों डोरियों के दूसरे सिरे आपस में भी एक दुसरे से बँधे और पीछे की ओर तने होते हैं । ३. करघे में सूत की वह डोरी जो बरौंछी में बँधी रहती है । ४. वह बहुत बड़ी धरन या शहतीर जो एक ही पंक्ति में लगे हुए कई खंभो पर रखी जाती है और जिसके ऊपर दीवार उठाई जाती है । ५. वह जो हल जोतता हो । खेती करनेवाला । जैसे, हरजोता ।

जोताई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोतना + आई (प्रत्य०)] १. जोतने का काम । २. जोतने का भाव । ३. जोतने की मजदूरी ।

जोतात
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोताँत' ।

जोति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योति] १. घी का वह दिया जो किसी देवी या देवता आदि के आगे अथवा उसके उद्देशय से जलाया जाता है । क्रि० प्र०—जलाना ।—बारना । यौ०—जोतिभोग = किसी देवता के सामने जोति जलाने और भोग लगाने आदि की क्रिया । २. दे० 'ज्योति' ।

जोति पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोतना] जोतने बोने योग्य भूमि । उ०—एपै तजि देबो क्रिया देखि जग बुरो होत जोति बहु दई दाम राम मति सानिए ।—प्रिया० (शब्द०) ।

जोतिक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिष' । उ०—विद्या पढ़ेउँ करन संगीता । सामुद्रिक जोतिक गुन गीता ।—माधवानल०, पृ० २०८ ।

जोतिखी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषी' ।

जोतिग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] १. ज्योतिष शास्त्र । उ०—न इहु बात जोतिग घटै मनस धूअ थिरताव ।—पृ० रा०, ३ ।१३ । २. ज्यौतिषी । उ०—जोगनैर जोतिग कहै, प्रभु सु होय प्रथुराव । पृ० रा०, ३ ।१३ ।

जोतिमय पु
वि० [हिं०] दे० 'ज्योतिर्मय' । उ०—रतनपुत्र नृपनाथ रतन जिमि ललित जोतिमय ।—मति० ग्रं०, पृ० ४१४ ।

जोतिलिंग
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिर्लिंग' ।

जोतिवंत पु
वि० [सं० ज्योतिवत्] ज्योतियुक्त । चमकदार । उ०—पावक पवन मणि पन्नग पतंग पितृ जेते जोतिवंत जग ज्योतिषिन गाए हैं ।—केशव (शब्द०) ।

जोतिष †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिष' ।

जोतिषटोम
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिष्टोम] दे० 'ज्योतिष्टोम' ।

जोतिषी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषी' ।

जोतिस पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिष' ।

जोतिस्ना पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'ज्योत्स्ना' ।—अने०, पृ० १०१ ।

जोतिहा †
संज्ञा पुं० [हिं० जोतना] जोतनेवाला किसान । जोता ।

जोती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. दे० 'ज्योति' । उ०—बदन पै सलिल कन जामगास जोती । इंदु सुधा तामें मतों अमी मय मोती ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३४७ । २. दे० 'जोति (१)' ।

जोती (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोतना] १. तराजू के पल्लों की डोरी जो डाँड़ी से बँधी रहती है । जोत । २. घोड़े की रास । लगाम । ३. चक्की में की वह रस्सी जो बीच की कीली और हत्थे में बँधी रहती है । इसे कसने या ढीली करने से चक्की हलकी या भारी चलती है और चीज मोटी या महीन पिसती है । ४. वे रस्सियाँ जिनसे खत में पानी खींचने की दौरी बँधी रहती है ।

जोत्सना
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योत्स्ना] दे० 'ज्योत्स्ना' ।

जोध पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योद्धा' । उ०—कबि लक्खन अबला कहत, सबला जोध कहंत ।—हम्मीर रा०, पृ० २७ ।

जोधन
संज्ञा स्त्री० [सं० योग + धन] वह रस्सी जिससे बैल के जुए की ऊपर नीचे की लकड़ियाँ बँधी रहती हैं ।

जोधा (१)पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'योद्धा' । उ०—(क) प्रगट कपाट बड़े दीने है बहु जोधा रखवारै ।—सूर (शब्द०) । (ख) सुर प्रभु सिंह ध्वनि करत जोधा सकल जहाँ तहँ करन लागे लराई ।—सूर (शब्द०) ।

जोधा (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] जोता नाम की रस्सी जो जुआठे में बंधी रहती है और जिसमें बैलों के सिर फँसाए जाते हैं ।

जोधार पु †
संज्ञा पुं० [सं० योद्धा] योद्धा । शूर । उ०—नकं कुंड में ना पडूं जीतू मन जोधार । ऐसौ मुझ उपदेश दौ सतगुर कर उपकार ।—राम० धर्म०, पृ० ३१३ ।

जोन †
संज्ञा स्त्री० [सं० योनि] दे० 'योनि' ।

जोनराज
संज्ञा पुं० [देश०] राजतरंगिणी के द्धितीय लेखक जिन्होंने सं० १२०० के बाद का हाल लिखा है । इनका लिखा हुआ 'पृथ्वीराजविजय' नामक एक ग्रंथ और 'किरातार्जूनीय' की एक टीका भी है ।

जोनरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] ज्वार नामक अन्न ।

जोना पु
क्रि० स० [हिं०] देखना । उ०—रइबारी ढोलउ कहइ करहउ आछउ जोइ ।—ढोला०, दू० ३०६ । (ख) प्रेम के पंथ सु प्रीति की पैठ में पैठत ही है दसा यह जो लै ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १७३ ।

जोनि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० योनि] दे० 'योनि' । उ०—जेहि जेहि जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं ।—मानस, २ ।२४ ।

जोनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'योनि' । उ०—कवन पुरुष जोनी बिना कवन मौत बिना काल ।—रामानंद०, पृ० ३३ ।

जोन्ह पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्यौत्स्ना, प्रा० जोण्ह] १. जुन्हाई । चंद्रिका । चाँदनी । ज्योत्स्ना । २. चंद्रमा ।

जोन्हरी †
संज्ञा स्त्री० [देशी जोण्णलिआ] ज्वार नामक अन्न ।

जोन्हाई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योत्स्ना, प्रा० जोण्हा] १. चंद्रिका । चाँदनी । चंद्रज्योति । २. चंद्रमा ।

जोन्हार †
संज्ञा पुं० [हिं०] ज्वार नामक अन्न ।

जोप पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'यूप' ।

जोपै पु
अव्य० [हिं० जो + पर अथवा सं० यद्यपि] १. यदि । अगर । २. यद्यपि । अगरचे ।

जोफ
संज्ञा [अ० जोफ] १. बुढ़ापा । वृद्धावस्था । २. सुस्ती । निर्बलता । कमजोरी । नाताकती । यौ०—जोफ जिगर = (१) जिगर का ठीक ठीक काम न करना । (२) जिगर या यकृत की कमजोरी । जोफ दिमाग = दिमाग की कमजोरी । जोफ मेदा = पाचन की कमजोरी । मंदाग्नि । अजीर्ण ।

जोबन
संज्ञा पुं० [सं० यौबन] १. युवा होने का भाव । यौवन । उ०—धन जोबन अभिमान अल्प जल कहैं कूर आपुनी बोरी । सूर (शब्द०) । मुहा०—जोबन लूटना = (किसी स्त्री की) युवावस्था का आनंद लेना । २. सुंदरता, विशेषतः युवावस्था अथवा मध्यकाल की सुंदरता । रूप । खूबसूरती । क्रि० प्र०—छाना ।—पर आना । मुहा०—जोबन उतरना = युवावस्था समाप्त होना । जोबन चढ़ना = युवावस्था का सौंदर्य आना । जोबन ढलना = दे० 'जोबन उतरना' । ३. रौनक । बहार । ४. कुच । स्तन । छाती । उ०—जूध दुहूँ जोबन सों लागा ।—जायसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—उठना ।—उभरना ।—ढलना । ५. एक प्रकार का फूल ।

जोबना पु †
क्रि० स० [हिं० जोबना] दे० 'जोबना' ।

जोम
संज्ञा पुं० [अ० जोम] १. उमंग । उत्साह । २. जोश । उद्धेग । आवेश । ३. अहंकार । अभिमान । घमंड । क्रि० प्र०—दिखाना । ४. घारणा । खयाल (को०) । ५. प्रबलता (को०) । ६. समूह (को०) ।

जोय (१) †
संज्ञा स्त्री० [सं० जाया] जोरू । स्त्री । पत्नी ।

जोय
सर्व० पु० [हिं०] जो । जिस ।

जोयना पु †
क्रि० स० [हिं० जोड़ना (जैसे, दीया जोड़ना)] १. बालना । जलाना । उ०—चौसठ दीवा जोय कै चौदह चंदा माँहि । तिहि धर किसका चाँदना जिहि धर सतगुर नाहिं ।—कबीर (शब्द०) । २. दे० 'जोवना' ।

जोयसी पु †
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिषी] दे० 'ज्योतिषी' ।

जोर
संज्ञा पुं० [फा० जोर] बल । शक्ति । ताकत । क्रि० प्र०—आजमाना ।—देखना ।—दिखाना ।—लगना ।— लगाना । मुहा०—जोर करना = (१) बल का प्रयोग करना । ताकत लगाना । (२) प्रयत्न करना । कोशिश करना । जोर टूटना = बल घटना या नष्ट होना । प्रभाव कम होना । शक्ति घटना । जोर डालना = बोझ डालना । दे० 'जोर देना' । जोर देना = (१) बल का प्रयोग करना । ताकत लगाना । (२) शरीर आदि का) बोझ डालना । मार देना । जैसे,—इस जँगले पर जोर मत दो नहीं तो वह टूट जाएगा । किसी बात पर जोर देना = किसी बात को बहुत ही आवश्यक या महत्वपूर्ण बतलाना । किसी बात को बहुत जरूरी बतलाना । जैसे,— उन्होनें इस बात पर बहुत जोर दिया कि सब लोग साथ चलें । किसी बात के लिये जोर देना = किसी बात के लिये आग्रह करना । किसी बात के लिये हठ करना । जोर देकर कहना = किसी बात को बहुत अधिक दृढ़ता या आग्रह से कहना । जैसे,—मैं जोर देकर कह सकता हूँ कि इस काम में आपको बहुत फायदा होगा । जोर मारना या लगाना = (१) बल का प्रयोग करना । ताकत लगाना । (२) बहुत प्रयत्न करना । खूब कोशिश करना । जैसे,—उन्होंने बहुतेश जोर मारा पर कुछ भी नहीं हुआ । यौ०—जोर जुल्म = अत्याचार । ज्यादती । २. प्रबलता । तेजी । बढ़ती । जैसे, भाँग का जोर, बुखार का जोर । विशेष—कभी कभी लोग इस अर्थ में 'जोर' शब्द का प्रयोग 'से' विभक्ति उड़ाकर विशेषण की तरह और कभी कभी 'का' विभक्ति उड़ाकर क्रिया की तरह करते हैं । मुहा०—जोर पकड़ना या बाँधना = (१) प्रबल होना । तेज होना । जैसे,—(क) अभी से इलाज करो नहीं तो यह बीमारी जोर पकड़ेगी । (ख) इस फोड़े ने बहुत जोर बाँधा है । (२) दे० 'जोर में आना' । जोर करना या मारना = प्रबलता दिखलाना । जैसे,—(क) रोग का जोर करना । काम का जोर करना । (ख) आज आपकी मुहब्बत ने जोर मारा, तभी आप यहाँ आए हैं । जोर में आना = ऐसी स्थिति में पहुँचना जहाँ अना— यास ही उन्नति या वृद्धि हो जाय । जोर या जोरों पर होना = (१) पूरे बल पर होना । बहुत तेज होना । जैसे— (क) आजकल शहर में चेचक बहुत जोरों पर है । (ख) इस समय उन्हें बुखार जोरों पर है । (२) खूब उन्नत दशा में होना । ३. वश । अधिकार । इख्तियार । काबू । जैसे,—हम क्या करें, हमारा उनपर कोई जोर नहीं हैं । क्रि० प्र०—चलना ।—चलना ।—जताना ।—होना । मुहा०—जोर डालना = किसी काम के लिये कुछ अधिकार जत लाते हुए विशेष आग्रह करना । दबाव डालना । ४. वेग । आवेश । झोंक । मुहा०—जोरों पर = बड़े वेग से । बड़ी तेजी से । जैसे, गाड़ी का जोरों पर जाना, नदी का जोरों पर बहना । ५ । भरोसा । आसरा । सहारा । जैसे,—आप किसके जोर पर कूदते है? मुहा०—शतरंज में किसी मोहरे पर जोर देना या पहुँचाना = किसी मोहरे की सहायता के लिये उसके पास कोई ऐसा मोहरा ला रखना जिसमें उस पहले मोहरे के मारे जाने की संभावना न रह अथवा यदि उस पहले मोहरे को विपक्षी अपने किसी मोहरे से मारना चाहे तो उसका मोहरा भी तुरंत उस मोहरे से मार लिया जा सके जिससे पहले मोहरे को जोर पहुँचाया गया हैं । शतरंज के मोहरे का जोर पर होना = मोहरे का ऐसी स्थिति में होना जिसमें यदि उस विपक्षी का कोई मोहरा मारना चाहे तो वह स्वयं भी मारा जा सके । किसी के जोर पर कूदना = किसी को अपनी सहायता पर देखकर अपना बल दिखाना । बेजोर = जिसकी सहायता पर कोई न हो । ६. परिश्रम । मेहनत । जैसे,—अँधेरे में पढ़ने से आँखों पर जोर पड़ता है । क्रि० प्र०—पड़ना । ७. व्यायाम । कसरत ।

जोरई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़] १. एक ही में बँधे हुए लंबे लंबे और मजबूत दो बाँस जिनके सिरों पर मोटी रस्सी का एक फंदा लगा रहता है और जिसका उपयोग कोल्हू धोने के समय जाठ को रोकने और उसे कोल्हू में से निकालकर अलग करने में होता है । विशेष—जाठ का ऊपरी भाग इसके फंदे में फँसा दिया जाता है और तब जाठ का निचला भाग दोनों बाँसों की सहायता से उठाकर कोल्हू के ऊपरी भाग पर रख दिया जाता है । २. एक प्रकार का हरे रंग का कीड़ा जो फसल की डालियाँ और पत्तियाँ खा जाता है । विशेष—चने की फसल को यह अधिक हानि पहुँचाता है ।

जोरदार
वि० [फा० जोरदार] जिसमें बहुत जोर हो । जोरवा ।

जोरन †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोड़न' । उ०—जोरन दे तब दही जमाई ।—सं० दरिया, पृ० ६ ।

जोरना †
क्रि० स० [हिं०] १. दे० 'जोड़ना' । उ०—रति रण जानि अनंग नृपति आप नृपति राजति बल जोरति ।—सूर (शब्द०) । † २. जोतना । जानवर को जुए में नाँधना । ३. किसी टूटी चीज के टुकड़ों को मिलाकर एक करना । उ०—जो अति प्रिय तो करिय उपाई । जोरिय कोउ बड़ गुनी बोलाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

जोरशोर
संज्ञा पुं० [फा० जोरशोर] बहुत अधिक जोर । बहुत अधिक प्रबलता या प्रचंडता । जैसे,—कल शाम को जोर शोर से आँधी आई थी ।

जोरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोड़ा' ।

जोराजोरी (१) †पु
संज्ञा स्त्री० [फा० जोर] जबरदस्तीं । धींगा धीगी ।

जोराजोरी (२)
क्रि० वि० जबरदस्ती । बलपूर्वक ।

जोरावर
वि० [फा० जोरांवर] बलवान् । ताकतवर । जबरदस्त ।

जोरावरी
संज्ञा स्त्री० [फा० जोरावरी] १. जोरावर होने का भाव । २. जबरदस्ती । धींगाधींगी ।

जोरिल्ला †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का गंधबिलाव ।

जोरी (१)पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. समानता । समता । दे० 'जोरी' । उ०—स्वर्ग सूर ससि करै अजोरी । तेहि ने अधिक देउ केहि जोरी ।—जायसी (शब्द०) । २. सहेली । साथिन । दे० 'जोड़ी' । उ०—पूछत है रुक्मिणी इनमें को वृषभानु किशोरी । बारेक हमें दिखाओ अपने बालपने की जोरी ।—सूर (शब्द०) । ३. दे० 'जोड़ी' ।

जोरी (२)
संज्ञा स्त्री० [फा० जोर] जोरावरी । जबरदस्ती । उ०— जोरी मारि भजत उतही को जात यमुन के तीर । इक धावत पोछे उनही के पावत नहीं अधीर ।—सूर (शब्द०) ।

जोरू
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़ा] स्त्री । पत्नी । भार्या । घरवाली । मुहा०—जोरू का गुलाम = स्त्री का भक्त या उसके वश में रहने— वाला । स्त्रैण । यौ०—जोरू जाँता = गृहस्थी । परिवार । घर बार ।

जोल (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] मेल । मिलाप । विशेष—इस शब्द का व्यवहार प्रायः मेल के साथ होता है । जैसे, मेल जोल ।

जोल (२)
संज्ञा पुं० [हिं० जोड़] समूह । संघ । जमघट । उ०— कहा करौ बारिज मुख ऊपर, बिथके षठपद जोल । सूरस्याम करि ये उतकरषा, बस कीन्ही बिनु मोल ।—सूर०, १० ।१७९२ ।

जोलहटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] जुलाहों की बस्ती ।

जोलहा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जुलाहा' ।

जोलाहल †पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वाला] ज्वाला । अग्नि । आग । उ०—रोम रोम पावक शिखा जगी जोलाहल जोर ।—रघुराज (शब्द०) ।

जोलाहा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जुलाहा' ।

जोलाही
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. जोलाहे की स्त्री । उ०—काशी में जोलाहा जोलाही हुए ।—कबीर मं०, पृ० १०३ । २. जोलाहे का काम या धंधा ।

जोली (१) †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोड़ी] वह जो बराबरी का हो । जोड़ । जोड़ी । यौ०—हमजोली ।

जोली (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] जाली या किशमिच आदि का बना हुआ एक प्रकार का लटफौआँ बिस्तर ।—(लश०) । विशेष—इसके दौनों सिरों पर अदवान की तरह कई रस्सियाँ होती हैं । दोनों ओर की ये रस्सियाँ दो कड़ियों में बँधी होती हैं और दोनों कड़ियाँ दो तरफ खूँटियों आदि में लटका दी जाती हैं । बीच का बिस्तरवाला हिस्सा लटकता रहता है जिसपर आदमी सोते हैं । इसका व्यवहार प्रायः जहाजो लोग जहाजों में करते हैं । २. वह रस्सी जो तूफान के समय जहाजों में पाल चढ़ाने या उता— रने के काम में आती है ।—(लश०) । ३. एक प्रकार की गाँठ जो रस्से के एक सिरे पर उसकी लड़ों से बनाई जाती है ।

जोवना पु
क्रि० स० [सं० जुषण (= सेवन), अथवा प्रा० जो (जोव = देखना)] १. जोहना । देखना । तकना । २. ढूँढ़ना । तलाश करना । ३. आसरा देखना । रास्ता देखना । उ०— रैण बिहाणी जोवताँ दिन भी बीतो जाय । रामदास बिरहिन झुरै पीव पाया जाय ।—राम० धर्म०, पृ० १९३ ।

जोवसी पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिषी] दे० 'ज्योतिषी' । उ०—सूंदिन कहे रूड़ा जोवसी । चतुर नागर ईसउ आण ज्यों चंद ।—बी० रासो०, पृ० ६ ।

जोवारी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मैना जिसका रंग बहुत चमकीला होता है । विशेष—यह बहुत अच्छी तरह कई प्रकार की बोलियाँ बोल सकती है, इसलिये लोग इसे पालते और बोलना सिखाते हैं । यह ऋतुपरिवर्तन के अनुसार भिन्न भिन्न देशों में घूमा करती हैं । फूलों और अनाजों को बहुत हानि पहुँचाती है और टिड्डियों का खूब नाश करती है । इसके अंडे बिना चित्ती के और नीले रंग के होते हैं । इसका मांस खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है ।

जोश
संज्ञा पुं० [फा०] १. किसी तरल पदार्थ का आँच या गरमी के कारण उबलना । उफान । उबाल । मुहा०—जोश खाना = उबलना । उफनना । खौलना । जोश देना = पानी के साथ उबालना । जैसे,—इस दवा का जोश देकर पीओ । जोश मारना = उबलना । मथना । यौ०—जोशाँदा = क्वाथ । काढ़ा । २. चित्त की तीव्र वृत्ति । मनोवेग । आवेश । जैसे,—उन्होंने जोश में आकर बहुत ही उलटी सीधी बातें कह डालीं । मुहा०—जोश खाना = आवेश में आना । जोश देना = आवेश में लाना या करना । जोश मारना = उमड़ना । जोश में आना = उत्तेजित हो उठना । आवेश में आना । खून का जोश = प्रेम का वह वेग जो अपने वंश या कुल के किसी मनु्ष्य के लिये उत्पन्न हो । जैसे,—खून के जोश ने उन्हें रहने न दिया, वे अपने भाई की मदद के लिये उठ दौड़े । यौ०—जोश खरोश = अधिक आवेश । जोशे जवानी = जवानी का जोश । जोशे जुनून = पागलपन का दौर । उन्माद का जोर । सनक ।

जोशन
स्त्री० पुं० [फा०] १. भुजाओं पर पहनने का चाँदी या सोने का एक प्रकार का गहना । विशेष—इसमें छह पहल या आठ पहलवाले लंबोतरे पोले दानों की पाँच, छह या सात जोड़ियाँ लंबाई में रेशम या सूत आदि के डोरे में पिरोई रहती हैं । दोनों बाँहों पर दो जोशन पहने जाते हैं । २. जिरह बकतर । कवच । चार आईना ।

जोशाँदा
संज्ञा पुं० [फा० जोशाँदह्] दवा के काम के लिये पानी में उबाली हुई जड़ या पत्तियाँ आदि । क्वाथ । काढ़ा ।

जोशिश
संज्ञा स्त्री० [फा०] उत्साह । जोश [को०] ।

जोशी
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोषी' ।

जोशीला
वि० [फा० जोश + हिं० ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० जोशीली] जोश से भरा हुआ । जिसमें खूब जोश हो । आवेंग- पूर्ण । जैसे,—उन्होनें कल बड़ी जोशीली वक्तृता दी थी ।

जोष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रीति । प्रेम । २. सुख । आराम । ३. सेवा । ४. संतोष (को०) । ५. मौन (को०) ।

जोष (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० योषा] स्त्री । नारी ।

जोष (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोख' । उ०—चढ़े न चातिक चित कबहुँ प्रियपयोद के दोष । तुलसी प्रेम पयोधि की तातें माप न जोख ।—तुलसी (शब्द०) ।

जोषक
संज्ञा पुं० [सं०] सेवक ।

जोषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रीति । प्रेम । २. सेवा । ३. दे० 'जोष' (को०) ।

जोषणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'जोषण' [को०] ।

जोषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नारी । स्त्री ।

जोषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कलियों का स्तबक या गुच्छा । २. नारी । स्त्री [को०] ।

जोषित
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्त्री [को०] ।

जोषति
संज्ञा स्त्री० [सं० जोषित्] दे० 'जोषिता' । उ०—जुवा खेल खेलन गई जोषित जोबन जोर ।—स० सप्तक, पृ० ३६४ ।

जोषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्त्री । नारी । औरत । उ०—जदपि जोषिता अन अधिकारी । दासी मन क्रम बचन तुम्हारी ।—मानस, १ । ११० ।

जोषी
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिषी] १. गुजराती ब्राह्मणों की एक जाति । २. महाराष्ट्र ब्राह्मणों की एक जाति । ३. पहाड़ी ब्राह्मणों की एक जाति । ४. ज्योंतिषी । गणक—(क्व०) ।

जोष्य
वि० [सं०] कमनीय । प्रिय । प्यारा [को०] ।

जोस †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोश' ।

जोसना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योत्स्ना] दे० 'ज्योत्स्ना' । उ०— इह बरनी तुम जोग चंद जोसना वान बृत ।—पृ० रा०, २५ । १८६ ।

जोसी पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिष, ज्योतिषी, जोइसी, जोसी] ज्योतिषी । उ०—पांड्या तोहि बोलावहि हो राय । ले पतड़ो जोसी बेगो तुं आई ।—बी० रासो, पृ० ६ ।

जोइ पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोहना] १. खोज । तलाश । क्रि० प्र०—लगाना । २. इंतजार । प्रतीक्षा । ३. नजर । दृष्ठि । विशेषता । कृपायुक्त दृष्टि । क्रि० प्र०—रखना ।

जोहड़ पु
संज्ञा पुं० [देश०] कच्चा तालाब ।

जोहन पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोहना] १. देखने या जोहने की क्रिया । उ०—सघन कला तरु तर मनमोहन । दक्षिण चरन चरन पर दीन्हें तनु त्रिभंव मृदु जोहन ।—सूर (शब्द०) । २. तलाश । खोज । ढूँढ़ । ३. प्रतीक्षा । इंतजार ।

जोहना †
क्रि० स० [सं० जुषण (= सेवन) अथवा प्रा० जोव (= देखना)] १. देखना । अवलोकन करना । ताकना । निहारना । उ०—(क) दर्पन शाह भीत तहँ लावा । देखों जोहि झरोखे आवा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) जो सत ठौर खंभ हू होहि । कह्वो प्रह्वार आहि तूँ जोहि ।—सूर (शब्द०) । २. खोजना । ढूँढ़ना । पता लगाना । उ०—शकद्वीप तेहि आगे सोहा । अतिस्र अख योखन कर जोहा ।—विश्राम (शब्द०) । ३. राह देखना । इतंजार देखना । प्रतीक्षा करना । आसरा देखना । उ०—फुचन सेजरिया कोठरिया बिछौले बलबिरवा जोहेला तोरी बाट ।—बलबीर (शब्द०) ।

जोहर (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोहड़] बावली । छोटा तालाब ।

जोहर पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जौहर' । उ०—जोहर करि देह त्यागी ।—ह० रासो, पृ० १६० ।

जोहार (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] अभिवादन । वंदन । प्रणाम । नमस्कार ।

जोहार (२)पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जौहर' ।

जोहारना †
क्रि० अ० [हिं०] प्रणाम या नमस्कार आदि करना । अभिवादन करना ।

जोहारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जोहार] नमस्कार । प्रणाम । उ०—इक इक बाण भेज्यो सकल नृपति पै मानौ सब साथ कीन्हे जोहारी ।—सूर (शब्द०) ।

जौं (१) †
अव्य० [हिं० ज्यों] यदि । जो ।

जौं (२)
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'ज्यौं' ।

जौंकना पु
क्रि० स० [अनु०] डाँटना । डपटना । क्रुद्ध होकर ऊँचे स्वर से कुछ कहना ।

जौंची †
संज्ञा स्त्री० [देश०] पेहूँ या जौ कौ फसल का एक रोम जिनसे बाल काली हो जाती है और उसमें बाने नहीं पड़ते ।

जौंड़ा †
संज्ञा पुं० [हिं० जौरा] दे० 'जौरा' ।

जौंरा पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्वर, प्रा० हिं० जौरा] १. ज्वर । जूड़ी । ताप । २. व्याध । उ०—जाप करत जौंरा उल्या, सुंदर साथी लोच ।—अंत बाणी०, पृ० १०८ ।

जौंराभौंरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] किले या महलों के भीतर का वह नहरा तहखाना जिसमें गुप्त खाजाना आदि रहता है ।

जौंराभौंरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० जोड़ा + भौंरा] १. दो बालकों का जोड़ा ।—(प्यार का शब्द) । २. दो घनिष्ठ मित्रों का जोड़ा ।

जौंरे पु †
क्रि० वि० [फा० जवार] निकट । समीप । आसपास ।

जौ (१)
संज्ञा पुं० [सं० यव] १. चार पाँच महीने रहनेवाला एक पौधा जिसके बीज या दाने की गिनती अनाजों में है । विशेष—यह पौधा पृथ्वी के प्रायः समस्त उष्ण तथा समप्रकृतिस्थ स्थानों में होता है । भारत का यह एक प्राचीन धान्य औरहविष्यान्न है । भारतवर्ष में यह मैदानों के अतिरिक्त प्रायः पहाड़ों पर भी १४००० फुट की उँचाई तक होता है । इसकी बोआई कार्तिक अगहन में होती है और कटाई फागुन चैत में होती है । इसका पौधा बहुत कुछ गेहूँ का सा होता है । अंतर इतना होता है कि इसमें जड़ के पास से बहुत से डंठल निकलते है जिन्हें कभी कभी छाँटकर अलग करना पड़ता है । इसमें टूँड़दार वाल लगती है जिसमें कोश के साथ बिलकुल चिपके हुए दाने पंक्तियों में गुछे रहते हैं । दानों के ऊपर का नुकीला कोश कठिनाई से अलग होता है, इसी से यह अनाज कोश सहित बिकता है, पर काशमीर में एक प्रकार का जौ ग्रिम नाम का होता है जिसके दाने गेहूँ की तरह कोश से अलग रहते हैं । गेहूँ के समान जो के या जौ की गूरी के भी आटे का व्यवहार होता हैं । भूसी रहित जौ या उसके मैदा का प्रयोग रोगियों के लिये पथ्य के काम आता है । सूखे हुए पौधे का भूसा होता है जो चौपायों को प्रिय, लाभकर है और उनके के खाने के काम में आता है । यूरोप में और अब भारतवर्ष के भी कई स्थानों में जौ से एक प्रकार की शराब बनाई जाती है । जौ कई प्रकार के होते है । इस अन्न को मनु्ष्य जाति अत्यंत प्राचीन काल से जानती है । वेदों में इसका उल्लेख बराबर है । अब भी हवन आदि में इस अन्न का व्यवहार होता है । ईसा से २७०० वर्ष पहले चीन के बादशाह शिनंद ने जिन पाँच अन्नों को बोआया था उनमें एक जौ भी था । ईसा से १०१५ वर्ष पहले सुलेमान बादशाह के समय में भी जौ का प्रचार खूब था । मध्य एशिया के करडँग नामक स्थान के खँडहर के नीचे दबे हुए जौ स्टीन साहब को मिले थे । इस खँड़हर के स्थान पर सातवीं शताब्दी में एक अच्छा नगर था जो बालु में दब गया । वैद्यक में जो तीन प्रकार के माने गए हैं—शूक, निःशूक और हरित वर्ण । शूक को अव, नि?शूक को अतियव और हरे रंग के यव को स्तोक्य कहते हैं । जो शीतल, रूखा, वीर्यवर्धक, मलरोधक तथा पित्त और कफ को दूर करनेवाला माना जाता है । यव से अतियव और अतियव से स्तोक्य (घोड़जई भी) हीन गुणवाला माना जाता है । पर्या०—यव । मेध्य । सितशूल । दिव्य । अक्षत । कंचुकि । धान्यराज । तीक्ष्णशूक । तुरयप्रिय । शक्तु । हयेष्ट । पवित्र धान्य । मुहा०—जौ जौ बढ़ना = धीरे धीरे बिना लक्षित हुए बढ़ना या विकसित होना । तिल तिल बढ़ना । क्रमशः बढ़ना । जौ बराबर = जौ के दाने के बराबर लंबा । जौ भर = जौ के दाने के परिमाण का । खाए पिए सौ सौ हिसाब करे जौ जौ, या दे ले सौ सौ हिसाब करे जौ जौ = अधिक से अधिक सामुहिक व्यय करे पर हिसाब पाई पाई या पैसे पैसे का रखे । २. एक पौधा जिसकी लचीली टहनियों से पंजाब में टोकरे झाड़ु आदि बनते हैं । मध्य एशिया के प्राचीन खँड़हरों में मकान के परदों के रूप में इसकी टट्टियाँ पाई गई हैं । ३. एक तौल जो ६ राई (खरदल) के बराबर मानी जाती है ।

जौ (२) †
अव्य० [सं० यद्] यदि । अगर । उ०—जौ लरिका कछु अनुचित करहीं । गुरु पितु मातु मोद मन भरहीं ।—तुलसी (शब्द०) ।

जौ (३)
क्रि० वि० [हिं०] जब । यौ०—जौ लौं, जौ लगि, जौ लहि = जब तक ।

जौक (१)
संज्ञा पुं० [तु० जूक] १. सेना । २. कतार । ३. झुंड । गिरोह । उ०—तुजे देखना था बड़ा हम कूँ शौक । तुजे देक पाए हजारा सूँ जौक ।—दक्खिनी०, पृ० ३४५ ।

जौक (२)
संज्ञा पुं० [अ० जौक़] स्वाद । मजा । शौक । आनंद [को०] ।

जौकेराई
संज्ञा स्त्री० [हिं० जौ + केराव] मटर मिला हुआ जौ ।

जौख पु
संज्ञा पुं० [तु० जूक] १. झुंड । जत्था । २. फौज । सेना । ३. पक्षियों की श्रेणी । उ०—बनी गौख वे जौख की मौख सोहै । पताकानु केकी पिकी ही अरोहै ।—सूदन (शब्द०) । ४. आदमियों का गोल । समूह । भीड़ ।

जौगढ़वा
संज्ञा पुं० [हिं० जौगढ़ (= कोई स्थान) + बा (प्रत्य०)] एक प्रकार का धान । विशेष—यह अगहन के महीने में तैयार होता है और इसका चावल सैकड़ों वर्ष तक रह सकता है ।

जौचनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] चना मिला हुआ जौ ।

जौजा
संज्ञा स्त्री० [अ० जौजहु] जोरू । भार्या । पत्नी ।

जौजीयत
संज्ञा स्त्री० [अ० जौजीयत] पत्नीत्व ।

जौड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० जेवरी या जेवड़ी] मोटा रस्सा । उ०—फूस क जौड़ा दूरि करि, ज्यूं बहुरि न लागै लाइ ।—कबीर ग्रं०, पृ० ७१ ।

जौतुक
संज्ञा पुं० [सं० यौतुक] दे० 'यौतुक' ।

जौधिक पु
संज्ञा पुं० [सं० यौद्धिक] तलवार या खङ्ग के ३२ हाथों में सें एक । उ०—पृष्ठत प्रथित जौधिक प्रथित ये हाथ जानौ बत्तिसै ।—रघुराज (शब्द०) ।

जौन † (१)पु
सर्व० [सं० यः पुनः (कः पुनः >कौन के साम्य पर बना)] जो ।

जौन (२)पु
वि० जो । उ०—जौन ठौर मोहिं आज्ञा होई । ताहि ठौर रैहौं मैं जोई ।—सूर (शब्द०) ।

जौन (३)पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'यवन' ।

जौनाल
संज्ञा स्त्री० [सं० यव + नाल] १. वह जमीन जिसपर जौ आदि रबी की फसल बोई जाय । रबी का खेत । २. जौ का डंठल ।

जौन्ह पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोन्ह' ।

जौपै पु †
अव्य० [हिं० जौ + पै] अगर । यदि ।

जौबति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० युवती] दे० 'युवती' ।

जौबन पु
संज्ञा पु० [सं० यौवन] दे० 'यौवन' ।

जौम
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जोम' ।

जौर
संज्ञा पुं० [अ०] अत्याचार । जुल्म । उ०—अब तलक खींच खींच जौरो जफा । हर तरह दोस्ती निबाही है ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १७ ।

जौरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० जूरा] वह अनाज जो गाँवों में नाऊ बारी आदि पौनियों कौ उनके काम के बदले में दिया जाता है ।

जौरा (२)
संज्ञा पुं० [सं० ज्या + वर अथवा हिं० जेवरी] बड़ा रस्सा ।

जौनावर पु
वि० [हिं०] दे० 'जोरावर' । उ०—जौरावर कोई ना बाँचे, रावण था दशकंधा ।—कबीर सा०, पृ० ८८७ ।

जौलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जुलाई' ।

जौलाऊ
संज्ञा पुं० [हिं० जौलाय (= बारह)] प्रति रुपया बारह पैसे । फी रुपया तीन आना । (दलाली) ।

जौलानी पु
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. तेजी । फुरती । उ०—शराब मँगाओ तो अक्ल को और जौलानी हो ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८८ । २. घोड़ा (को०) । ३. शराब का प्याला (को०) । ४. मनोरंजन (को०) ।

जौलाय
वि० [हिं० जौलाय] बारह । (दलाल) ।

जौशन
संज्ञा पुं० [फा०] बाहु पर पहनने का एक आभूषण । दे० 'जोशन' ।

जौहर (१)
संज्ञा पुं० [फा० गौहर का अरबी रूप] १. रत्न । बहुमुल्य पत्थर । २. सार वस्तु । सारांश । तत्व । क्रि० प्र०—निकालना । ३. तलवार या और किसी लोहे के धारदार हथियार पर वे सूक्ष्म चिह्न या धारियाँ जिनसे लोहे की उत्तमता प्रकट होती है । हथियार की ओप । ४. गुण । विशेषता । उत्तमता । खूबी । तारीफ की बात । जैसे,—(क) घुलने पर इस कपड़े का जौहर देखिएगा । (ख) मैदान में वे अपना जौहर दिखाएँगे । क्रि० प्र०—खुलना ।—दिखाना । मुहा०—जौहर खुलना = (१) गुण का विकास होना । गुण प्रकट होना । खूबी जाहिर होना । (२) करतब प्रकट होना । भेद खुलना । गुप्त कारवाई जाहिर होना । जौहर खोलना = गुण प्रकट करना । उत्कर्ष दिखाना । खूबी जाहिर करना । करतब दिखाना । ३. आईने की चमक ।

जौहर (२)
संज्ञा पुं० [हिं० जीव + हर] १. राजपूतों में युद्ध के समय की एक प्रथा जिसके अनुसार नगर या गढ़ में शत्रु के प्रवेश का निश्चय होने पर उनकी स्त्रियाँ और बच्चे दहकती हुई चिता में जल जाते थे । विशेष—राजपूत लोग जब देखते थे कि वे गढ़ की रक्षा न कर सकेंगे और शत्रुओं का अवश्य अधिकार होगा तब वे अपनी स्त्रियों और बच्चों से विदा लेकर और उन्हें दहकती चिता में भस्म होने का आदेश देकर आप युद्ध के लिये सुसज्जित होकर निकल पड़ते थे । स्त्रियाँ भी शृंगार करके बड़े भारी दहकते कुंड में कूदकर प्राण विसर्जन करती थीं । प्रसिद्ध है कि जब अलाउद्दीन ने चित्तौरगढ़ को घेरा था तब महारानी पद्मिनी सोलह हजार स्त्रियोँ को लेकर भस्म हुई थी । इसी प्रकार जब जैसलमेर का दुगँ घिरा था तब नगर की समस्त स्त्रियाँ और बच्चे अर्थात् २४००० प्राणियो के लगभग क्षण भर में जल मरे थे । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—जौहर होना = चिता पर जल मरना । उ०—जौहर भइँ सब स्त्री पुरुष भए संग्राम ।—जायसी (शब्द०) । २. आत्महत्या । प्राणत्याग । क्रि० प्र०—करना । २. वह चिता जो दुर्ग में स्त्रियों के जलने के लिये बनाई जाती थी । उ०—(क) जौहर कर साजा रनिवासु । जेहि सत हिये कहाँ तेहि आँसू ।—जायसी (शब्द०) । (ख) अजहूँ जौहर साज के कीन्ह चहौ उजियार । होरी खेलउ रन कठिन कोउ न समेटै छार ।—जायसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—साजना ।

जौहरी
संज्ञा पुं० [फा०] १. हीरा, लाल आदि बहुमूल्य पत्थर बेचने— वाला । रत्नविक्रेता । २. रत्न परखनेवाला । जवाहिरात की पहचान रखनेवाला । पारखी । परखैया । जँचवैया । ३. किसी वस्तु के गुण दोष की पहचान रखनेवाला । ४. गुण का आदर करनेवाला । गुणग्राहक । कदरदान ।

ज्ञंमन्य
वि० [सं० ज्ञामन्य] अपने आपको ज्ञानी माननेवाला [को०] ।

ज्ञ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्ञान । बोध । २. ज्ञानी । ज्ञाननेवाला । जैसे, शास्त्रज्ञ, सर्वज्ञ, कार्यज्ञ, निमित्तज्ञ । ३. ब्रह्मा । ४. बुद्ध ग्रह । ५. सांख्य के अनुसार निष्क्रिय निर्विकार पुरुष जिसको जान लेने से बंधन कट जाते हैं । ६. मंगल ग्रह । ७. ज और ञ के संयोग से बना हुआ संयुक्त अक्षर ।

ज्ञ (२)
वि० १. जाननेवाला । जैसे, शास्त्रज्ञ । २. बुद्धिमान् । जैसे, विज्ञ ।

ज्ञपित
वि० [सं०] १. जाना हुआ । २. मारा हुआ । ३. तुष्ट किया हुआ । ४. तेज किया हुआ । चोखा किया हुआ । ५. जिसकी स्तुति या प्रशंसा की गई हो ।

ज्ञप्त
वि० [सं०] जाना हुआ ।

ज्ञप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जानकारी । २. बुद्धि । ३. मारण । ४. तोषण । तुष्टि । ५. स्तुति । ६. जलाने की क्रिया ।

ज्ञवार
संज्ञा पुं० [सं०] बुधवार । बुध का दिन ।

ज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जानकारी ।

ज्ञात (१)
वि० [सं०] विदित । जाना हुआ । अवगत । मालूम ।

ज्ञात (२)
संज्ञा पुं० ज्ञान ।

ज्ञातजौवना पु
[सं० ज्ञात+ यौवना] दे० 'ज्ञातयौवना' । उ०— निज तनु जोबन आगमन जानि परत है जाहि । कबि कोविद सब कहत है ज्ञातजौबना ताहि ।—मति० ग्रं०, पृ० २७६ ।

ज्ञातनंदन
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञातनन्दन] जौनों के तीर्थकर महाबीर स्वामी का एक नाम ।

ज्ञातयौवना
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुग्धा नायिका का एक भेद । वह मुग्धा नायिका जिसे अपने यौवन का ज्ञान हो । इसके दो भेद हैं—नवोढ़ा और विश्रब्धनवोढ़ा ।

ज्ञातव्य
वि० [सं०] जो जाना जा सके । जिसे जानता हो अथवा जिसे जानना उचित हो । ज्ञेय । वेद्य । बोधगम्य । विशेष—श्रुति उपनिषद् आदि में आत्मा को ही एक मात्र ज्ञातव्य माना है । उसे जान लेने पर फिर कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता ।

ज्ञाता
वि० [सं० ज्ञातृ] [वि० स्त्री० ज्ञात्री] जाननेवाला । ज्ञान रखने वाला । जानकार ।

ज्ञाति
संज्ञा पुं० [सं०] एक ही गोत्र या वंश का मनुष्य । गोती । भाई । बंधु । बांधव । सपिंड समानोदक आदि । उ०—ते मोहि मिले ज्ञात घर अपने में बूझी तब जात । हँसि हँसि दौरि मिले अंकम भरि हम तुम एकै ज्ञाति ।—सूर (शब्द०) । (ख) अहिर जाति ओछी मति कीन्ही । अपनी ज्ञाति प्रकट करि दीन्ही ।—सूर (शब्द०) ।

ज्ञातिपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. गोत्रज का पुत्र । २. जैन तीर्थंकर महाबीर स्वामी का नाम ।

ज्ञातृत्व
संज्ञा पुं० [सं०] जानकारी । अभिज्ञता ।

ज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वस्तुओं और विषयों की वह भावना जो मन या आत्मा को हो । बोध । जानकारी । प्रतीति । क्रि० प्र०—होना । विशेष—न्याय आदि दर्शनों के अनुसार जब विषयों का इंद्रि- यों के साथ, इंद्रियों का मन के साथ और मन का आत्मा के साथ संबंध होता है तभी ज्ञान उत्पन्न होता है । मान लीजिए, कहीं पर एक घड़ा रखा है । इंद्रियों ने उस घड़े का साक्षात्कार किया, फिर उस साक्षात्कार की सूचना मन को दी । फिर मन ने आत्मा को सूचित किया और आत्मा ने निश्चित किया कि यह घड़ा है । ये सब व्यापार इतने शीघ्र होते हैं कि इनका अनुमान नहीं हो सकता । एक ही साथ दो विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता । ज्ञान सदा अयुगपद् होता हैं । जैसे,—मन यदि एक ओर है और हमारी आँख किसी दूसरी ओर है तो इस दूसरी वस्तु का ज्ञान नहीं होगा । न्याय में जो प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द, ये चार प्रमाण माने गए हैं, उन्ही के द्वारा सब प्रकार का ज्ञान होता है । चक्षु, श्रवण आदि इंद्रियों द्वारा जो ज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष कहलाता है । व्याप्य पदार्थ को देख व्यापक पदार्थ का जो ज्ञान होता है उसे अनुमान कहते हैं । कभी कभी एक वस्तु (व्याप्य) के होने से दूसरी वस्तु (व्यापक) का अभाव नहीं हो सकता, ऐसे अवसर पर अनुमान से काम लिया जाता है । जैसे, धुएँ कौ देखकर अग्नि का ज्ञान । अनुमान तीन प्रकार का होता है—पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतो दृष्ट । कारण को देख कार्य के अनुमान को पूर्ववत् (कारणलिंगक) अनुमान कहते हैं । जैसे, बादलों का उभड़ना देख होनेवाली वृष्टि का ज्ञान । कार्य को देख कारण के अनुमान को शेषवत् (या कार्यलिंगक) अनुमान कहते हैं । जैसे, नदी का जल बढ़ता हुआ देख वृष्टि का ज्ञान । व्याप्य क्रो देख व्यापक के ज्ञान को सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहते हैं । जैसे, धुएँ को देख अग्नि का ज्ञान, पूर्ण चंद्रमा को देख शुक्ल पक्ष का ज्ञान इत्यादि । प्रसिद्ध या ज्ञान वस्तु के साधार्य द्वारा जो दूसरी वस्तु का ज्ञान कराया जाता है, उसे उपमान कहते है । जैसे,—गाय ही ऐसी नीलगाय होती है । दूसरों के कथन या शब्द के द्वारा जो ज्ञान होता है उसे शब्द कहते हैं । जैसे गुरु का उपदेश आदि । सांख्य शास्त्र प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ये तीन ही प्रमाण मानता है उपमान को, इनके अंतर्गत मानता है । ज्ञान दो प्रकार का होता है—प्रमा अर्थात् यथार्थ ज्ञान और अप्रमा या अयथार्थ ज्ञान । वेदांत में ब्रह्म को ही ज्ञानस्वरूप माना है अतः उसके अनुसार प्रत्येक का ज्ञान पृथक् नहीं हो सकता । एक वस्तु से दूसरी वस्तु में या एक के ज्ञान से दूसरे के ज्ञान में जो विभिन्नता दिखाई देती है, वह विषय रूप उपाधि के कारण है । वास्तविक ज्ञान एक ही है जिसके अनुसार सब विभिन्न दिखाई पड़नेवाले पदार्थों के बीच में केवल एक चित् स्वरूप सत्ता या ब्रह्म का ही बोध होता है । पाशचात्य दर्शन में भी विषयों के साथ इंद्रियों के संयोग रूप ज्ञान को ही ज्ञान का मूल अथवा प्रथम रूप माना है । किसी एक वस्तु के ज्ञान के लिये भी यह भावना आवश्यक है कि वह कुछ वस्तुओं के समान और कुछ वस्तुओं से भिन्न है अर्थात् बिना साधर्म्य और वैधर्म्य की भावना के किसी प्रकार का ज्ञान होना असंभव है । इस साक्षात्करण रूप ज्ञान से आगे चलकर सिद्धांत रूप ज्ञान के लिये संयोग, सहकालत्व आदि की भावना भी आवश्यक है । जैसे,—'वह पेड़ नदी के किनारे है' इस बान का ज्ञान केवल पेड़' 'नदी' और किनारा का साक्षात्कार मात्र नहीं है बल्कि इन तीन पृथक् भावों का समाहार है । प्राणिविज्ञान के अनुसार खोपड़ी के भीतर जो मज्जा-तंतु- जाल (नाड़ियाँ) और कोश हैं, चेतन व्यापार उन्हीं की क्रिया से संबंध रखते हैं । इनमें क्रिया को ग्रहण करने और उत्पन्न करने दोनों की शक्ति है । इंद्रियों के साथ विषयों के संयोग द्वारा संचालन नाड़ियों के द्वारा भीतर की ओर जाता है और कोशों को प्रोत्साहित करके परमाणुओं में उत्तेजना उत्पन्न करता है । भूतवादियों के अनुसार इन्हीं नाड़ियों और कोशों की क्रिया का नाम चेतना है, पर अधिकांश लोग चेतना को एक स्वतंत्र शक्ति मानते हैं । क्रि० प्र०—होना । मुहा०—ज्ञान छाँटना=अपनी विद्या या जानकारी प्रकट करने के लिये लंबी चौड़ी बातें करना । २. यथार्थ ज्ञान । सम्यक् ज्ञान । तत्वज्ञान । आत्मज्ञान । प्रमा । केवलज्ञान । विशेष—मीमांसा को छोड़कर प्रायः सब दर्शनों ने ज्ञान से मोक्ष माना है । न्याय में ज्ञान द्वारा मिथ्या ज्ञान का नाश, मिथ्या ज्ञान के नाश से दोष का नाश, दोष न रहने पर प्रवृत्ति से निवृत्ति, प्रवृत्ति के नाश से जन्म से निवृत्ति और जन्म की निवृत्ति से दुःख का नाश, दुःख के नाश से मोक्ष माना जाता है । सांख्य ने पुरुष और प्रकृति के बीच विवेक ज्ञान प्राप्त होने से जब प्रकृति हठ जाती है तब मोक्ष का ज्ञान होना बतलाया है । वेदांत का मोक्ष ऊपर लिखा जा चुका है ।

ज्ञानकांड
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञानकाण्ड] वेद के तीन कांडों था विभागों में से एक एक जिसमें ब्रह्ना आदि सुक्ष्म विषयों का विचार है । जैसे,—उपनिषद् ।

ज्ञानकृत
वि० [सं०] जो पाप जान बूझकर किया गया हो, भूल से न हुआ हो ।विशेष—ज्ञानकृत पापों का प्रायशिच्त दूना लिखा गया है ।

ज्ञानगम्य
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान की पहुँच के भीतर । जो जाना जा सके ।

ज्ञानगर्भ
वि० [सं०] ज्ञान से पूर्ण या भरा हुआ [को०] ।

ज्ञानगोचर
वि० [सं०] ज्ञानेद्रियों से जानने योग्य । ज्ञानगम्य ।

ज्ञानघन
संज्ञा पुं० [सं०] शुद्ध ज्ञान । केवल ज्ञान [को०] ।

ज्ञानचक्षु (१)
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञानचक्षुस्] ज्ञान के नेत्र । अंतर्दृष्टि [को०] ।

ज्ञानचक्षु (२)
वि० ज्ञान की आँख से देखनेवाला । पंडित [को०] ।

ज्ञानज्येष्ठ
वि० [सं०] जो ज्ञान में बढ़कर हो [को०] ।

ज्ञानतः
क्रि० वि० [सं० ज्ञानतस्] जान बूझकर । जानकारी में । समझ बूझकर ।

ज्ञानतत्व
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञानतत्त्व] यथार्थ ज्ञान [को०] ।

ज्ञानतपा
वि० [सं० ज्ञानतपस्] शुद्ध ज्ञान के लिये तप करनेवाला [को०] ।

ज्ञानद
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान देनेवाला । गुरु [को०] ।

ज्ञानद्ग्धदेह
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो चतुर्थ आश्रम में हो । संन्यासी । विशेष—स्तुतियों में लिखा है कि संन्यासी जीवित अवस्था ही में देह अर्थात् सुख दुःख आदि को ज्ञान द्वारा दग्ध कर डालता है अतः मृत्यु हो जाने पर उसके दाह कर्म की आवश्यकता नहीं । उसके शरीर को एक गड्ढा खोदकर प्रणव मंत्र के उच्चारण के साथ गाड़ देना चाहिए ।

ज्ञानदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरस्वती । [को०] ।

ज्ञानदाता
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञानदातृ] ज्ञान देनेवाला मनुष्य । गुरु ।

ज्ञानदात्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्ञान देनेवाली देवी । सरस्वती [को०] ।

ज्ञानदुर्बल
वि० [सं०] ज्ञान में दुर्बल या असमर्थ [को०] ।

ज्ञानधन
वि० [सं०] ज्ञानी । तत्वविद् । उ०—क्रिया समाहित चित्त ज्ञानधन तुम्हें जानकर ।—अपरा, पृ० १९३ ।

ज्ञानधाम
वि० [सं० ज्ञानधामन्] परम ज्ञानी । उ०—खोजै सो कि अज्ञ इन नारी । ज्ञानधाम श्रीपति असुरारी ।—मानस, १ । ५१ ।

ज्ञाननिष्ठ
वि० [सं०] १. श्रवण, मनन, निदिष्यासन, आदि ज्ञान साधनोंवाला । २. तत्वज्ञानी [को०] ।

ज्ञानपिपासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्ञान प्राप्त करने की प्रबल इच्छा । ज्ञान की प्यास [को०] ।

ज्ञानपिपासु
वि० [सं०] ज्ञानप्राप्ति की इच्छावाला । जिज्ञासु [को०] ।

ज्ञानप्रम
संज्ञा पुं० [सं०] एक तथागत का नाम ।

ज्ञानमद
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान का अभिमान । ज्ञानी या जानकार होने का घमंड ।

ज्ञानमुद्र
वि० [सं०] ज्ञानी । ज्ञानवाला [को०] ।

ज्ञानमुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तंत्रसार के अनुसार राम की पूजा की एक मुद्रा । विशेष—इसमें दाहिने हाथ की तर्जनी को अँगूठे से मिलाकर हाथ में रखते हैं और बाएँ हाथ की उँगलियों को कमलसंपुट के आकार की करके उनसे सिर से लेकर बाएँ जंघे तक रक्षा करते हैं ।

ज्ञानयज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान द्वारा अपनी आत्मा का परमात्मा में हवन अर्थात् आत्मा और परमात्मा का संयोग या अमेदज्ञान । ब्रह्मज्ञान ।

ज्ञानयोग
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान की प्राप्ति द्वारा मोक्ष का साधन । उ०—एक ज्ञानयोग विस्तरै । ब्रह्म जानि सबसों हित करै ।— सूर (शब्द०) ।

ज्ञानलत्तण
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. न्याय में अलौकिक प्रत्यक्ष का एक भेद । विशेष—नैयायिकों ने प्रत्यक्ष के दो भेद माने हैं, लौकिक । और अलौकिक । अलौकिक प्रत्यक्ष के तीन भेद हैं, सामान्य- लक्षण, ज्ञानलक्षण और योगज । ज्ञानलक्षण वह है जिसमें विशेषण के ज्ञात होने पर विशेष्य का ज्ञान होता है । जैसे, घटत्व का ज्ञान होने पर घट शब्द से घड़े का ज्ञा्न । २. ज्ञान का निर्देशक, संकेतक साधन या उपाय (को०) ।

ज्ञानलक्षणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ज्ञानलक्षण' [को०] ।

ज्ञानवान
वि० [सं०] जिसे ज्ञान हो । ज्ञानी ।

ज्ञानवापी
संज्ञा स्त्री० [सं०] काशीस्थित एक प्रसिद्ध तीर्थ ।

ज्ञानविज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] १. विभिन्न प्रकार का या पवित्र ज्ञान । २. वेद, उपवेद सहित उसकी शाखाओं का ज्ञान [को०] ।

ज्ञानवृद्ध
वि० [सं०] ज्ञान में बड़ा । जिसकी जानकारी अधिक हो ।

ज्ञानशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] भविष्य का विचार अथवा कथन करनेवाला शास्त्र [को०] ।

ज्ञानसाधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्रिय । २. ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न ।

ज्ञानांजन
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञानाञ्जन] तत्वज्ञान । ब्रह्मज्ञान [को०] ।

ज्ञानाकर
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्ध ।

ज्ञानापोह
संज्ञा पुं० [सं०] भूल जाना । ज्ञान न रहना । विस्मरण [को०] ।

ज्ञानावरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्ञान का परदा । ज्ञान का बाधक । २. वह पाप कर्म जिससे ज्ञान का यथार्थ लाभ जीव को नहीं होता है । विशेष—यह पाँच प्रकार का है,—(१) मतिज्ञानावरण । (२) श्रुतिज्ञानावरण । (३) अवधिज्ञानावरण । (४) मनः पर्याय ज्ञानावरण और (५) केवलज्ञानावरण । (जैन) ।

ज्ञानावरणीयकर्म
पुं० [सं०] दे० 'ज्ञानावरण' ।

ज्ञानासन
संज्ञा पुं० [सं०] रुद्रयामल के अनुसार योग का एक आसन । विशेष—इससे योगाभ्यास में शीघ्र सिद्धि होती हैं । इसमें दाहिनी जाँघ पर बाएँ पैर के तलवे को रखना पड़ता है । इससे पैर की नसें ढीली हो जाती हैं ।

ज्ञानी
वि० [सं० ज्ञानिन्] १. जिस ज्ञान हो । ज्ञानवान् । जानकार । २. आत्मज्ञानी । ब्रह्मज्ञानी ।

ज्ञानेंद्रिय
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्ञानेन्द्रिय] वे इंद्रियाँ जिनसे जीवों क्रो विषयों का बोध या ज्ञान होता है । ज्ञानोंद्रियाँ पाँच हैं,-दर्शनें— द्रिय, श्रवणेंद्रिय, घ्रणोंद्रिय, रसना और स्पर्शेंद्रिय । विशेष—इन इंद्रियों के गोलक या आधार क्रमशः आँख, कान, जीभ,नाक और त्वक् हैं । इन पाँचों के अतिरिक्त कोई कोई छठी इंद्रिय मन या अंतःकरण मानते हैं पर मन केवल ज्ञानेद्रिय नहीं है कर्मोंद्रिय भी है अतः उसे दार्शनिकों ने उभयात्मक माना है ।

ज्ञानोदय
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान का उदय [को०] ।

ज्ञापक (१)
वि० [सं०] १. जतानेवाला । जिससे किसी बात का बोध या पता चले । सूचक । व्यजंक (वस्तु) । २. बतानेवाला । सूचित करनेवाला (व्यक्ति) ।

ज्ञापक (२)
संज्ञा पुं० १. गुरु । आचार्य । २. प्रभु । स्वामी [को०] ।

ज्ञापन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० ज्ञापित, ज्ञाप्य] जताने या बताने का कार्य ।

ज्ञार्पायता
वि० [सं० ज्ञार्पायितृ] सूचक । बतानेवाला । ज्ञापक [को०] ।

ज्ञापित
वि० [सं०] जताया हुआ । बताया हुआ । सूचित ।

ज्ञाप्य
वि० [सं०] जताने या सूचित करने योग्य [को०] ।

ज्ञीप्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जानने की इच्छा [को०] ।

ज्ञेय
वि० [सं०] १. जिसका जानना योग्य या कर्तव्य हो । जानने योग्य । विशेष—ब्रह्मज्ञानी लोग एकमात्र ब्रह्म को ही ज्ञेय मानते है, जिसको जाने बिना मोक्ष नहीं हो सकता । २. जो जाना जा सके । जिसका जानना संभव हो ।

ज्याँना पु †
क्रि० स० [हिं० जिमाना, जेवाना] खिलाना । उ०— सुभग सुस्वाद सुबिंजन आनि । जननी ज्याँये अपने पानि ।— नंद० ग्रं०, पृ० २७८ ।

ज्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. धनुष की डोरी । २. वह रेखा जो किसी चाप के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हो । ३. वह रेखा जो किसी चाप के एक सिरे से उस व्यास पर लंब रूप से गिरी हो जो चाप के दूसरे सिरे से होकर गया ही । ४. त्रिकोणमिति में केंद्र पर के कोण के विचार से ऊपर बतलाई हुई रेखा (क ग) और त्रिज्या (क घ) की निष्पत्ति । ५. पृथ्वी । ६. माता । ७. किसी वृत्त का व्यास । ८. सर्वोच्च शक्ति (को०) । ९. अत्यधिक माँग (को०) । १०. एक प्रकार की छड़ी । शम्या (को०) । १०. सेना का पृष्ठ भाग (को०) ।

ज्याग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'याग' । उ०—जेहा केहा ज्याग हैवर राखोड़ा हुवै ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० १४ ।

ज्याघात
संज्ञा पुं० [सं०] धनुष की डोरी के स्पर्श या रगड़ से होने वाला उँगलियों पर का निशान या चिह्न [को०] । यौ०—ज्याघातवारण=धनुर्धरों द्वारा पहना जानेवाला अंगुलित्राण ।

ज्योघोष
संज्ञा पुं० [सं०] धनुष की टंकार [को०] ।

ज्यादती
संज्ञा स्त्री० [फा़० ज्यादती] १. अधिकता । बहुतायत । अधिकाई । २. जुल्म । अत्याचार ।

ज्यादा
क्रि० वि० [फा़० ज्यादह्] अधिक । बहुत ।

ज्यान पु † (१)
संज्ञा पुं० [फा़० जियान] नुकसान । हानि । घाटा । उ०—ह्वैकै अजान जु कान्ह सों कीनो सु मान भयो वहै ज्यान है जी को ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ११६ ।

ज्यान (२)पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० जान] दे० 'जान' । उ०—(क) पातसाह की ज्यान बखसीस करो ।—ह० रासो, पृ० १५६ । (ख) अरे इस्क ऐसा बुरा, फिरि लेता है ज्यान ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ४८ ।

ज्याना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'जियाना' । उ०—ज्याइए तो जानकी रमन जन जानि जिय, मारिए तो माँगी मीचु सूधिए कहतु हौं ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २४० ।

ज्यानि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वृद्धावस्था । जरा । बुढ़ा़पा । २. क्षय । ३. त्याग । परित्याग । ४. नदी । ५. अत्याचार । उत्पीड़न । ६. हानि [को०] ।

ज्यानी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्यानि, तुलनीय फा़० जियान] हानि । घाटा । उ०—ता दिन तें ज्यानी सी बिकानी सी दिखानी बिलसानी सी बिलानी राजधानी जमराज की ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २६३ ।

ज्याफत
संज्ञा स्त्री० [अ० जियाफ़त] १. दावत । भोज । २. मेह- मानी । आतिथ्य । क्रि० प्र०—खाना ।—देना ।

ज्यामिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गणित विद्या जिससे भूमि के परिमाण, भिन्न क्षेत्रों के अंगों आदि के परस्पर संबंध तथा रेखा, कोण, तल आदि का विचार किया जाता है । क्षेत्र, गणित । रेखागणित । विशेष—इस विद्या में प्राचीन यूनानियों (यवनों) ने बहुत उन्नति की थी । यूनान देश के प्राचीन इतिहासवेत्ता होरोडोटस के अनुसार ईसा से १३५७ वर्ष पूर्व सिसोस्ट्रिस के समय में मिस्त्र देश में इस विद्या का आविर्भाव हुआ । राजकर निर्धा— रित करने के लिये जब भूमि को नापने की आवश्यकता हुई तब इस विद्या का सूत्रपात हुआ । कुछ लोग कहते हैं कि नील नंद के चढ़ाव उतार के कारण लोयों की जमीन की हद मिट जाया करती थी, इसी से यह विद्या निकाली गई । इउक्लिड के टीकाकार प्रोक्लस ने भी लिखा है कि येल्स ने मिस्ञ में जाकर यह विद्या सीखी थी और यूनान में इसे प्रचलित की थी । धीरे धीरे यूनानियों ने इस विद्या में बडी़ उन्नति की । पाइथागोरस ने सबसे पहले इसके संबंध में सिद्धांत स्थिर किए और कई प्रतिज्ञाएँ निकालीं । फिर तो प्लेटो आदि अनेक विद्वान् इस विद्या के अनुशीलन में लगे । प्लेटो के अनेक शिष्यो ने इस विद्या का विस्तार किया जिनमें मुख्य अरस्तू (एरिस्टाटिल) और इउडोक्सस थे । पर इस विद्या का प्रधान आचार्य इउक्लिड (उकलैदस) हुआ जिसका नाम रेखागणित का पर्याय स्वरुप हो गया । यह ईसा से २८४ वर्ष पूर्व जीवित था और इसकंदरिया (अलेग्जैंड्रिया, जो मिस्ञ में है) के विद्यालय में गणित की शिक्षा देता था । वास्तव में इउक्लिड ही यूरप मेंज्यामिति विद्या का प्रतिष्ठापक हुआ है और इसकंदरिया ही इस विद्या का केंद्र या पीठ रहा है । जब अरबवालों ने इस नगर पर अधिकार किया तब भी वहाँ इस विद्या का बड़ा प्रचार था । प्राचीन हिंदू भी इस विद्या में बहुत पहले अग्रसर हुए थे । वैदिक काल में आर्यों को यज्ञ की वेदियों के परिमाण, आकृति आदि निर्धारित करने के लिये इस विद्या का प्रयोजन पड़ा था । ज्यामिति का आभास शुल्वसूत्र, कात्यायन श्रोतसूत्र, शतपथ ब्राह्मण आदि में वेदियों के निर्माण के प्रकरण में पाया जाता है । इस प्रकार यद्यपि इस विद्या का सूत्रपात भारत में ईसा से कई हजार वर्ष पहले हुआ पर इसमें यहाँ कुछ उन्नति नहीं की गई । यूनानियों के संसर्ग के पीछे ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य के ग्रंथों में ही ज्यामिति विद्या का विशेष विवरण देखा जाता है । इस प्रकार जब हिदुओं का ध्यान यवनों के संसर्ग से फिर इस विद्या की ओर हुआ तब उन्होंने उसमें बहुत से नए निरुपण किए । परिधि और ध्वास का सूक्ष्म अनुपात ३ १४१९ : १ भास्कराचार्य को विदित था । इस अनुपात को अरबवालों ने हिंदुओं से सीखा, पीछे इसका प्रचार यूरप में (१२ वीं शताब्दी के पीछे) हुआ ।

न्यायस्
वि० [सं०] [वि० स्त्री० ज्यायसी] १. ज्येष्ठ । बड़ा । २. सर्बश्रेष्ठ । ३. विशाल । महत् । ४. जो नावालिग न हों । प्रौढ़ । ५. वयोवृद्ध । वृद्ध । ६. क्षीण । क्षयशील । ७. उत्तम । शक्तिशाली । वरेण्य [को०] ।

न्यायिष्ठ
वि० [सं०] १. सर्वश्रेष्ठ । २. प्रथम । सर्वप्रथम [को०] ।

ज्यारना † (१)पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'जियाना', 'जिलाना' । उ०— आयो फिरि विप्र नेह खोजहुँ न पायो कहुँ सरसायो वातै लै दिखायो स्याम ज्यारियै ।—प्रिया० (शब्द०) ।

ज्यारना (२)पु
क्रि० स० [हिं० जारना (= जलाना)] दे० 'जारना' । उ०—चिंता वारूँ ममता ज्यारूँ ।—दक्खनी०, पृ० १३४ ।

ज्यावना †पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'जिलाना' ।

ज्युति
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योति [को०] ।

ज्यूँ †
अव्य० [हिं०] दे० 'ज्यों' ।

ज्येष्ठ (१)
वि० [सं०] १. बड़ा । जेठा । जैसे, ज्येष्ठ भ्राता । २. वृद्ध । बड़ा । बूढ़ा़ । यौ०—ज्येष्ठ तात = बाप का बड़ा भाई । ज्येष्ठ वर्ण=ब्राह्मण । ज्येष्ठ श्वश्रू = पत्नी की बड़ी बहन । बड़ी साली ।

ज्येष्ठ (२)
संज्ञा पुं० १. जेठ का महीना । वह महीना जिसमें ज्येष्ठा नक्षत्र में पूर्णिमा का चंद्रमा उदय हो । यह वर्ष का तीसरा और ग्रीष्म ऋतु का पहला महीना है । २. वह वर्ष जिसमें बृहस्पति का उदय ज्येष्ठा नक्षत्र में हो । विशेष—यह वर्ष कँगनी और सावाँ को छोड़ और अन्नों के लिये हानिकारक माना जाता है । इसमें राजा धर्मज्ञ होता है और श्रेष्ठता जाति, कुल और धन से होती है ।—(बृहत्संहिता) ३. सामगान का एक भेद । ४. परमेश्वर । ५. प्राण ।

ज्येष्ठता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ज्येष्ठ होने का भाव । बड़ाई । २. श्रेष्ठता ।

ज्येष्ठवला
संज्ञा स्त्री० [सं०] सहदेई नाम की जड़ी जो औषध के काम में आती है ।

ज्येष्ठसामग
संज्ञा पुं० [सं०] अरण्यक साम का पढ़नेवाला ।

ज्येष्ठसामा
संज्ञा पुं० [सं० ज्येष्ठसामन्] ज्येष्ठ सामवेद का पढ़नेवाला ।

ज्येष्ठांबु
संज्ञा पुं० [सं० ज्येष्ठाम्बु] १. चावलों का धोवन । २. मांड़ (को०) ।

ज्येष्ठांश
संज्ञा पुं० [सं०] १. बड़े भाई का हिस्सा या अंश । २. पैतृक संपत्ति में बड़े भाई को मिलनेवाला अधिक अंश । ३. उत्तम्र अंश या हिस्सा [को०] ।

ज्येष्ठा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. २७ नक्षत्रों में से अठारहवाँ नक्षत्र जो तीन तारों से बने कुंडल के आकार का है । इसके देवता चंद्रमा है । २. वह स्त्री जो औरों की अपेक्षा अपने पति को अधिक प्यारी हो । ३ । छिपकली । ४. मध्यमा उँगली । ५. गंगा । ६. पद्मपुराण के अनुसार अलक्ष्मी देवी । विशेष—ये समुद्र मथने पर लक्ष्मी के पहले निकली थी । जब इन्होंने देवताओं से पूछा कि हम कहाँ निवास करें तब उन्होंने बतलाया कि जिसके घर में सदा कलह हो, जो नित्य गंदी या बुरी बातें बके, जो अशुचि रहे इत्यादि उसके यहाँ रहो । लिंगपुराण में लिखा है कि जब देवताओं में से किसी ने इन्हें ग्रहण नहीं किया तब दुःसह नामक तेजस्वो ब्राह्नण ने इन्हें पत्नी रूप से ग्रहण किया ।

ज्येष्ठा (२)
वि० स्त्री० बड़ी ।

ज्येष्ठाश्रम
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तमाश्रम । गृहस्थाश्रम ।

ज्येष्ठाश्रमी
संज्ञा पुं० [सं० ज्येष्ठाश्रमिन्] गृहस्थ । गृही ।

ज्येष्ठी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गृहगोधा । पल्ली । छिपकली । बिस- तुइया ।

ज्योँ
क्रि० वि० [सं० यः + इव] १. जिस प्रकार । जैसे । जिस ढंग से । जिस रूप से । उ०—(क) तुलसिदास जगदव जवाअ ज्यौं अनघ आगि लागे डाढ़न ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) करी न प्रीति श्याम सुंदर सो जन्म जुआ ज्यों हायो ।—सूर (शब्द०) । विशेष—अब गद्य में इस शब्द का प्रयोग अकेले नहीं होता केवल कविता में साद्दश्य दिखलाने के लिये होता है । मुहा०—ज्यों त्यों = (१) किसी न किसी प्रकार । किसी ढंग से । झंझट और बखेड़े के साथ । (२) अरुचि के साथ । अच्छी तरह नहीं । ज्यों त्यों करके = (१) किसी न किसी प्रकार । किसी ढंग से । किसी उपाय से । जिस प्रकार हो सके उस प्रकार । जैसे,—ज्यो त्यों करके उसे हमारे पास ले आओ । (२) झंझट और बखेड़े के साथ । दिक्कत के साथ । कठिनाई के साथ । जैसे,—रास्ते में बड़ी गहरी आँधी आई, ज्यों त्यों करके घर पहुँचे । ज्यों का त्यों = (१) जैते का तैसा । उसी रूप रंग का । तद्रूप । सदृश । (२) जैसा पहले था वैसा ही । जिसमें कुछ फेर या घटती बढ़ती न हुई हो । जिसके साथकुछ क्रिया न की गई हो । जैसे,—सब काम ज्यों का त्यों पड़ा है कुछ भी नहीं हुआ है । विशेष—वाक्य का संबंध पूरा करने के लिये इस शब्द के साथ 'त्यों' का प्रयोग होता है पर गद्य में प्रायः नहीं होता । २. जिस क्षण । जैसे ही । जैसे,—(क) ज्यों मैं आया कि पानी बरसने लगा । (ख) ज्यों ही मै पहुँचा, वह उठकर चला गया । विशेष—इस अर्थ में इसका प्रयोग 'ही' के साथ अधिक होता है । मुहा०—ज्यों ज्यों = जिस क्रम से । जिस मात्रा से । जितना । उ०—जमुना ज्यों ज्यों लागी बाढ़न । त्यों त्यों सुकृत सुभट कलि रपहि निदरि लगे वहि काढ़न ।—तुलसी (शब्द०) ।

ज्योतिःपुंज
वि० [सं० ज्योतिःपुंञ्ज] प्रखर या दिव्य प्रकाशवाला । जिसमें प्रकाश भरा हो । उ०—खग को ज्योतिपुंज प्रात दो ।—आराधना, पृ० ८ ।

ज्योतिःशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष ।

ज्योतिःशिखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लघु गुरु वर्णों की गणना के अनुसार विषम वर्णवृत्तों का एक भेद जिसके पहले दल में ३२ लघु और दूसरे दल में १६ गुरु होते हैं ।

ज्योति
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्योतिस्] १. प्रकाश । उजाला । द्युति । २. अग्निशिखा । लपट । लौ । मुहा०—ज्योति जगना = (१) प्रकाश फैलना । (२) किसी देवता के सामने दीपक जलाना । ३. अग्नि । ४. सू्र्य० । ५. नक्षत्र । ६. मेथी । ७. संगीत में अष्टताल का एक भेद । ८. आँख की पुतली के मध्य का वह विंदु या स्थान जो दर्शन का प्रधान साधन है । ९. द्दष्टि । १०. अग्नि- ष्टोम यज्ञ की एक संख्या का नाम । ११. विष्णु । १२. वेदांत में परमात्मा का एक नाम । यौ०—ज्योतिमयी = प्रकाश से भरी हुई । ज्योतिमुख = ज्योति का मुख ।

ज्योतिक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिषी' । उ०—बार बार ज्योतिक सो घरी बुझि आवै । एक जाइ पहुँचे नहिं और एक पठावै ।—सूर (शब्द०) ।

ज्योतित
वि० [सं० ज्योति + हिं० त (प्रत्य०)] प्रकाशित । उदभा- सित । ज्योति से पूर्ण । उ०—मा ! तब तूने मुझे दिखाई अपनी ज्योतित छटा अपार ।—वीणा, पृ० ५५ ।

ज्योतिरिंग
संज्ञा पुं० [सं० ज्तोतिरिङ्ग] जुगनू ।

ज्योतिरिंगण
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिरिङ्गण] जुगनू ।

ज्योतिर्मय
वि० [सं०] प्रकाशमय । द्युतिपूर्ण । जगमगाता हुआ ।

ज्योतिर्लिग
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिर्लिङ्ग] १. महादेव । शिव । विशेष—शिवपुराण में लिखा है कि जब विष्णु की नाभि से ब्रह्मा उत्पन्न हुए तब वे घबड़ाकर कमलनाल पर इधर से उधर घूमने लगे । विष्णु ने कहा कि तुम सृष्टि बनाने के लिये उत्पन्न किए गए हो । इसपर ब्रह्मा बहुत क्रुद्ध हुए और कहने लगे कि तुम हो, तुम्हारा भी तो कोई कर्ता है? जब दोनों में घोर युद्ध होने लगा तब झगड़ा निपटाने के लिये एक कालाग्नि सद्दश ज्योतिर्लिग उत्पन्न हुआ जिसके चारों ओर भयंकर ज्वाला फैल रही थी । यह ज्योतिर्लिंग आदि, मध्य और अंत रहित था । इस कथा का अभिप्राय ब्रह्मा और विष्णु से शिव को श्रेष्ठ सिद्ध करना ही प्रतीत होता है । २. भारतवर्ष में प्रतिष्ठित शिव के प्रधान लिंग जो बारह हैं । वैद्यनाथ माहात्म्य में इन बारह लिंगों के नाम इस प्रकार हैं । सोमनाथ सौराष्ट्र में, मल्लिकार्जुन श्रीशैल में, महाकाल उज्ज- यिनी में, ओंकार नर्मदा तट पर (अमरेशवर में), केदार हिमालय में, भीमशंकर डाकिनी में, विश्वेश्वर काशी में, त्र्यंबक गोमती किनारे, वैद्यनाथ चिताभूमि में, नागेशवर द्वारका में, रामेश्वर सेतुबंध में, घृष्णेशवर शिवालय में ।

ज्योतिर्लोक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कालचक्र प्रवर्तक ध्रुव लोक । २. उस लोक के अधिपति परमेश्वर या विष्णु । विशेष—भागवत में इस लोक को सप्तर्षि मंडल से १३ लाख योजन और दूर लिखा है । यहीं उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव स्थित हैं जिनकी परिक्रमा इंद्र कश्यप प्रजापति तथा ग्रह नक्षत्र आदि बराबर करते रहते हैं ।

ज्योतिर्विद्
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष जाननेवाला । ज्योतिषी ।

ज्योतिर्विद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष विद्या ।

ज्योतिर्हस्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा ।

ज्योतिश्चक्र
संज्ञा पुं० [सं०] नक्षत्र और राशियों का मंडल ।

ज्योतिष
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह विद्या जिससे अंतरिक्ष में स्थित ग्रहों नक्षत्रों आदि की परस्पर दूरी, गति, परिमाण आदि का निश्चय किया जाता है । विशेष—भारतीय आर्यो में ज्योतिष विद्या का ज्ञान अत्यंत प्राचीन काल से था । यज्ञों की तिथि आदि निश्चित करने में इस विद्या का प्रयोजन पड़ता था । अयन चलन के क्रग का पता बराबर वैदिक ग्रंथों में मिलता है । जैसे, पुनर्वसु से मृगशिरा (ऋगवेद), मृगशिरा से रोहिणी (ऐतरेय ब्रा०), रोहिणी से कृत्तिका (तौत्ति० सं०) कृत्तिका ते भरणी (वेदांग ज्योंतिष) । तैत्तरिय संहिता से पता चलता है कि प्राचीन काल में वासंत विषुवद्दिन कृत्तिका नक्षत्र में पड़ता था । इसी वासंत विषुवद्दिन से वैदिक वर्ष का आरंभ माना जाता था, पर अयन की गणना माघ मास से होती थी । इसके पीछे वर्ष की गणना शारद विषुवद्दिन से आरंभ हुई । ये दोनों प्रकार की गणनाएँ वैदिक ग्रंथों में पाई जाती हैं । वैदिक काल में कभी वासंत विषुवद्दिन मृगशिरा नक्षत्र में भी पड़ता था । इसे पंडित बाल गंगाधर तिलक ने ऋग्वेद से अनेक प्रमाण देकर सिद्ध किया है । कुछ लोगों ने निश्चित किया है कि वासंत विषुबद्दिन की यह स्थिति ईसा से ४००० वर्ष पहले थी । अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि ईसा से पाँच छह हजार वर्ष पहले हिंदुओं को नक्षत्र अयन आदि का ज्ञान था और वे यज्ञों के लिये पत्रा बनाते थे । शारद वर्ष के प्रथम मास का नाम अग्रहायण था जिसकी पुर्णिमा मृगशिरानक्षत्र में पड़ती थी । इसी से कृष्ण ने कहा है कि 'महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ' । प्राचीन हिंदुओं ने ध्रुव का पता भी अत्यंत प्राचीन काल में लगाया था । अयन चलन का सिद्धांत भारतीय ज्योतिषियों ने किसी दूसरे देश से नहीं लिया; क्योंकि इसके संबंध में जब कि युरोप में विवाद था, उसके सात आठ सौ वर्ष पहले ही भारतवासियों ने इसकी गति आदि का निरूपण किया था । वराहमिहिर के समय में ज्योतिष के संबंध में पाँच प्रकार के सिद्धांत इस देश में प्रचलित थे—सौर, पैतामह, वासिष्ठ, पौलिश ओर रोमक । सौर सिद्धांत संबंधी सूर्य सिद्धांत नामक ग्रंथ किसी और प्राचीन ग्रंथ के आधार पर प्रणीत जान पड़ता है । वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त दोनों ने इस ग्रंथ से सहायता ली है । इन सिद्धांत ग्रंथों में ग्रहों के भुजांश, स्थान, युति, उदय, अस्त आदि जानने की क्रियाएँ सविस्तर दी गई हैं । अक्षांश और देशातंर का भी विचार है । पूर्व काल में देशांतर लंका या उज्जयिनी से लिया जाता था । भारतीय ज्योतिषी गणना के लिये पृथ्वी को ही केंद्र मानकर चलते थे और ग्रहों की स्पष्ट स्थिति या गति लेते थे । इससे ग्रहों की कक्षा आदि के संबंध में उनकी और आज की गणना में कुछ अंतर पड़ता है । क्रांतिवृत्त पहले २८ नक्षत्रों में ही विभक्त किया गया था । राशियों का विभाग पीछे से हुआ है । वैदिक ग्रंथों में राशियों के नाम नहीं पाए जाते । इन राशियों का यज्ञों से भी कोई संबंध नहीं हैं । बहुत से विद्वानों का मत है कि राशियों और दिनों के नाम यवन (युनानियों के) संपर्क के पीछे के हैं । अनेक पारिभाषिक शब्द भी यूनानियों से लिए हुए हैं, जैसे,— होरा, दृक्काण केंद्र, इत्यादि । ज्योतिष के आजकल दो विभाग माने जाते हैं—एक सिद्धांत या गणित ज्योतिष, दूसरा फलित ज्योतिष । फलित में ग्रहों के शुभ अशुभ फल का निरूपण किया जाता है । २. अस्त्रों का एक संहार या रोक जिससे चलाया हुआ अस्त्र निष्फल जाता है । विशेष—इसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में हैं ।

ज्योतिषिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने— वाला । ज्योतिषी ।

ज्योतिषिक (२)
वि० ज्योतिष संबंधी ।

ज्योतिषी (१)
संज्ञा पुं० [सं० ज्योतिषिन्] ज्योतिष शास्त्र का जानने— वाला मनुष्य । ज्योतिर्विद् । दैवज्ञ । गणक ।

ज्योतिषी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] तारा । ग्रह । नक्षत्र ।

ज्योतिष्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. ग्रह, तारा, नक्षत्र आदि का समूह । २. मेथी । ३. चित्रक वृक्ष । चीता । ४. मनियारी का पेड़ । ५. मेरु पर्वत के एक शृंग का नाम । ६. जैन मतानुसार देवताओं का एक भेद जिसके अंतर्गत चंद्र, तारा, ग्रह, नक्षत्र और अकं हैं ।

ज्योतिष्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] मालकँगनी ।

ज्योतिष्टोम
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का यज्ञ जिसमें १६ ऋत्विक् होते थे । इस यज्ञ समापनांत में १२०० गोदान का विधान था ।

ज्योतिष्पथ
संज्ञा पुं० [सं०] आकाश ।

ज्योतिष्पुंज
संज्ञा पुं० [सं०] नक्षत्रसमूह ।

ज्योतिष्मती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मालकँगनी । २. रात्रि । ३. एक नदी का नाम । ४. एक प्रकार का वैदिक छंद । ५. सारंगी की तरह का एक प्राचीन बाजा । ६. सत्वगुणप्रधान मन की शांत अवस्था (को०) ।

ज्योतिष्मान् (१)
वि० [सं० ज्योतिष्मत्] प्रकाशयुक्त । ज्योतिर्मय ।

ज्योतिष्मान् (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. प्लक्ष द्वीप के एक पर्वत का नाम । ३. ब्रह्मा का तृतीय पाद या चरण (को०) । ४. प्रलयकाल में उदित होनेवाले सात सूर्यों में सै एक (को०) ।

ज्योतिस् (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. द्युति । ज्युति । प्रकाश । २. परम ज्योति । ब्रह्म की ज्योति । ३. विद्युत् । बिजली । ४. दिव्य सत्ता । ५. नक्षत्र । तारा आदि । ६. आकाशीय प्रकाश (तमस् का विलोम) । ७. सूर्य चंद्र । ८. दिव्य प्रकाश या बुद्धि । ९. ग्रह नक्षत्र संबंधी शास्त्र या विज्ञान । वि० दे० 'ज्योतिष' । १०. देखने की शक्ति । ११. दिव्य जगत् । १२. गाय [को०] ।

ज्योतिस् (२)
संज्ञा पुं० १. सूर्य । २. अग्नि । ३. विष्णु [को०] ।

ज्योतिसास्त्र पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योतिःशास्त्र' । उ०— ज्योतिसात्र अति इंद्री ज्ञान । ताके तुम ही बीज निदान ।—नंद० ग्रं०, पृ० २४४ ।

ज्योतिस्ना पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'ज्योत्स्ना' ।—अनेकार्थ०, पृ० ३१ ।

ज्योतिस्नात
वि० [सं० ज्योतिः + स्नात] प्रकाशपूर्ण । उ०— ज्योतिस्नात जीवनपथ पर अब चरण चार गंतव्य एक हो ।—अग्नि०, पृ० ३५ ।

ज्योतिहीन
वि० [सं० ज्योतिः + हीन] प्रकाश से रहित । प्रभाहीन । उ०—उल्का बज्र व धूभादि से हत विपर्ण ज्योतिहीन होने पर ।—बृहत्संहिता, पृ० ८२ ।

ज्योतीरथ
संज्ञा पुं० [सं०] ध्रुव (जिसके आश्रित ज्योतिश्चक है) ।

ज्योतीरस
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का रत्न जिसका उल्लेख बाल्मीकीय रामायण और बृहत्संहिता में है ।

ज्योत्स्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चंद्रमा का प्रकाश । चाँदनी । २. चाँदनी रात । ३. सफेद फूल की तोरई । ४. सौंफ । ५. दुर्गा का एक नाम (को०) । ६. प्रकाश । उजाला (को०) ।

ज्योत्स्नाकाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत के अनुसार सोम की कन्या जो वरुण के पुत्र पुष्कर की पत्नी थी ।

ज्योत्स्नाधौत
वि० [सं०]दे० 'ज्योत्स्नास्नात' ।

ज्योत्स्नाप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर ।

ज्योत्स्नावृत्त्क्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दीपाधार । दीवंट । फतीलसोज ।

ज्योत्स्नास्नात
वि० [सं०] चाँदना में नहाया हुआ । चाँदनी से पूर्ण ।

ज्योत्स्निका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चाँदनी रात । २. सफेद फूल की तोरई ।

ज्योत्स्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ज्योत्स्निका' ।

ज्योत्स्नेश
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा [को०] ।

ज्योनार
संज्ञा स्त्री० [सं० जेंमन (= खाना)] १. पका हुआ भोजन । रसोई । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. भोज । दावत । ज्याफत । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—होना । मुहा०—ज्योनार बैठना = अतिथियों का भोजन करने बैठना । ज्योनार लगाना = अतिथियों के सामने रखने के लिये व्यंजनों को क्रम से लगाना या रखना ।

ज्योबन पु
संज्ञा पुं० [सं० यौवन] दे० 'जोबन' । उ०—तन धन ज्योबन कछु नहिं भावत हरि सुखदाई री ।—दक्खिनी०, पृ० १३२ ।

ज्योरा †
संज्ञा पुं० [देश०] वह अनाज जो फसल तैयार होने पर गाँवों में नाइयों चमारों आदि को उनके कामों के बदले में दिया जाता है ।

ज्योरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० जीवा] रस्सी । रज्जु । डोरी ।

ज्योरू पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'जोरू' । उ०—माँ बाप बेटे ज्योरू लड़के सब देखत लोकन सरीखे ।—दक्खिनी, पृ० १२२ ।

ज्योहत †पु
संज्ञा पुं० [सं० जीव + हत] आत्महत्या । जौहर । उ०—केश गहि करखि जमुना धार डारिहै, सुन्यो नृप नारि पति कृष्ण मारयो । भईं ब्याकुल सबै हेतु रोवन लगीं मरन को तुरत ज्योहत विचारयो ।—सूर (शब्द०) ।

ज्योहर †
संज्ञा पुं० [सं० जीव + हर] राजपूतों की एक प्रथा जिसके अनुसार उनकी स्त्रियाँ गढ़ के शत्रुओं से घिर जाने पर चिता में जलकर भस्म हो जाती थीं । दे० 'जौहर' ।

ज्यौँ
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'ज्यों' ।

ज्य़ौ (१)
अव्य० [सं० यदि] जो । यदि । उ०—जो न जुगुति पिय मिलन की धूर मुकुति मोहि दीन । ज्यौ लहियै सँग सजन तौ धरक नरक हू की न ।—बिहारी (शब्द०) ।

ज्यौ (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० जीव, प्रा० जीअ, जीय] दे० 'जीव' । उ०—बूड़त ज्यौ घनआनंद सोचि, दई बिधि ब्याधि असाधि नई है ।—घनानंद, पृ० ५ ।

ज्यौ (३)
संज्ञा पुं० [सं०] बृहस्पति ग्रह [को०] ।

ज्यौतिष
वि० [सं०] ज्योतिष संबंधी ।

ज्यौतिषिक
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिषी ।

ज्यौत्त्न (१)
वि० [सं०] चंद्रकिरणों से प्रकाशित [को०] ।

ज्यौत्स्न (२)
संज्ञा पुं० शुक्ल पक्ष । उजाला पाख [को०] ।

ज्यौत्स्निका, ज्यौत्स्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूर्णिमा की रात [को०] ।

ज्यौनार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योनार' ।

ज्यौरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ज्योरा' ।

ज्वर
संज्ञा पुं [सं०] १. शरीर की वह गरमी या ताप जो स्वाभाविक से अधिक हो और शरीर की अवस्थता प्रकट करे । ताप । बुखार ।

विशेष—सुश्रुत, चरक आदि ग्रंथों में ज्वर सब रोगों का राजा और आठ प्रकार का माना गया है—वातज, पित्तज, कफज, वात- पित्तज, वातकफज, पित्तकफज, सान्निपातिक और आगतुज । आगंतुज ज्वर वह है जो चोट लगने, विष खाने आदि के कारण हो जाता है । इन सब ज्वरों के लक्षण और आचार भिन्न भिन्न हैं । ज्वर से उठे हुए, कृश या मिथ्या आहार विहार करनेवाले मनुष्य का शेष या रहा सहा दोष जब वायु के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होकर आमाशय, हृदय, कंठ, सिर और संधि इन पाँच कफ स्थानों का आश्रय लेता है तब उससे अँतरा, तिजरा और चौथिया आदि विषम ज्वर उत्पन्न होते हैं । प्रलेपक ज्वर से शरीरस्थ धातु सूख जाती है । जब कई एक दोष कफ स्थान का आश्रय लेते हैं तब विपर्यज नाम का विषम ज्वर उत्पन्न होता है । विपर्यय ज्वर वह है जो एक दिन न आकर दो दिन बराबर आवे । इसी प्रकार आगंतुक ज्वर के भी कारणों के अनुसार कई भेद किए गए हैं । जैसे, कामज्वर, क्रोधज्वर, भयज्वर इत्यादि । ज्वर अपने आरंभ दिन से सात दिनों तक तरुण, १४ दिनों तक मध्यम २१ दिनों तक प्राचीन और २१ दिनों के उपरांत जीर्णज्वर कहलाता है । जिस ज्वर का वेग अत्यंत अधिक हो, जिससे शरीर की कांति बिगड़ जाय, शरीर शिथिल हो जाय, नाड़ी जल्दी न मिले उसे कालज्वर कहते हैं । वैद्यक में गुड़च, चिरायता, पिप्पली, नीम आदि कटु वस्तुएँ ज्वर को दूर करने के लिये दी जाती हैं । पाश्चात्य मत के अनुसार मनुष्य के शरीर में स्वाभाविक गरमी ९८/?/और ९९/?/के बीच होती है । शरीर में गरमी उत्पन्न होते रहने और निकलते रहने का ऐसा हिसाब है कि इस मात्रा की उष्णता शरीर में बराबर बनी रहती है । ज्वर की अवस्था में शरीर में इतनी गरमी उत्पन्न होती है जितनी निकलने नहीं पाती । यदि गरमी बहुत तेजी से बढ़ने लगती है तो रक्त त्वचा से हटने लगता है जिसके कारण जाड़ा लगता है और शरीर में कँपकँपी होती । ज्वर में यद्यपि स्वस्थ दशा की अपेक्षा गरमी अधिक उत्पन्न होती है पर उतनी ही गरमी यदि स्वस्थ शरीर में उत्पन्न हो तो वह बिना किसी प्रकार का अधिक ताप उत्पन्न किए उसे निकाल सकता है । अस्वस्थ शरीर में गरमी निकालने की शक्ति उतनी नहीं रह जाती, क्योंकि शरीर की धातुओं का जो क्षय होता है वह पूर्ति की अपेक्षा अधिक होता है । ज्वर में शरीर क्षीण होने लगता है, पेशाब अधिक आता है, नाड़ी और श्वास जल्दी जल्दी चलने लगता है, प्रायः कोष्ठबद्ध भी हो जाता है, प्यास अधिक लगती है, भूख कम हो जाती है, सिर में दर्द तथा अंगों में विलक्षण पीड़ा होती है । विषैले कीटाणुपों के शरीर में प्रवेश और वृद्धि, अंगों की सूजन, धूप आदि के ताप तथा कभी कभी नाड़ियों या स्नायुओं की अव्यवस्था से भी ज्वर उत्पन्न होता है । ज्वर के संबंध में हरिवंश में एक कथा लिखी है । जब कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध बाणासुर के यहाँ बंदी हो गए तब कृष्ण औरबाणासुर में धोर संग्राम हुआ था । उसी अवसर पर बाणासुर की सहायता के लिये शिव ने ज्वर उत्पन्न किया । जब ज्वर ने बलराम आदि को गिरा दिया और कृष्ण के शरीर में प्रवेश किया तब कृष्ण ने भी एक वैष्णव ज्वर उत्पन्न किया जिसने माहेश्वर ज्वर को निकालकर बाहर किया । माहेश्वर ज्वर के बहुत प्रार्थना करने पर कृष्ण ने वैष्णव ज्वर समेट लिया और माहेश्वर ज्वर को ही पृथ्वी पर रहने दिया । दूसरी कथा यह है कि दक्ष प्रजापति के अपमान से कुद्ध होकर महादेव जी ने अपने श्वास से ज्वर को उत्पन्न किया । क्रि० प्र०—आना ।—होना । मुहा०—ज्वर उतरना = ज्वर का जाता रहना । बुखार दूर होना । (किसी को) ज्वर चढ़ना = ज्वर आना । ज्वर का प्रकोप होना । २. मानसिक क्लेश । दुःख । शोक (को०) ।

ज्वरकुटुंब
संज्ञा पुं० [सं० (ज्वर कुटुम्व)] ज्वर के साथ होनेवाले उपद्रव, जैसे, प्यास, श्वास, अरुचि, हिचकी इत्यादि ।

ज्वरघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुड़ुंच । २. बथुआ ।

ज्वरचिकित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्वर का उपचार या इलाज [को०] ।

ज्वरप्रतीकार
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वर का उपचार [को०] ।

ज्वरराज
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वर की एक औषध जो पारे, माक्षिक मैनसिल, हरताल, गंधक तथा भिलावें के योग से बनती है ।

ज्वरहंत्री
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वरहन्त्री] मँजीठ ।

ज्वरहर (१)
वि० [सं०] ज्वर को दूर करनेवाला [को०] ।

ज्वरहर (२)
संज्ञा पुं० ज्वर का चिकित्सक [को०] ।

ज्वरांकुश
संज्ञा पुं० [सं० ज्वराङ्कुंश] १. ज्वर की एक औषध जो पारे, गंधक, प्रत्येक बिष और धतूरे के बीजों के योग से बनती है । २. कुश की तरह की एक सुगंधित घास । विशेष—यह उत्तरी भारत में कुमायूँ गढ़वाल से लेकर पेशावर तक होती है । इसकी जड़ में से नीबू की सी सुगंध आती है । यह घास चारे के काम की उतनी नहीं होती । इसकी जड़ और डंठलों से एक प्रकार का सुंगधित तेल निकाला जाता है जो शरबत आदि में डाला जाता है ।

ज्वरांगी
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वराङ्गी] भद्रदंती नाम का पौधा ।

ज्वरांतक
संज्ञा पुं० [सं० ज्वरान्तक] १. चिरायता । २. अमलतास ।

ज्वरा (१)
संज्ञा पुं० [सं०] मृत्यु । मौत । उ०—लिये सब आधिन व्याधिन जरा जब आवै ज्वरा की सहेली ।—केशव (शब्द०) ।

ज्वरा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्वर ।

ज्वरापह
वि० [सं०] ज्वर को दूर करनेवाला ।

ज्वरापहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बेलपत्री ।

ज्वरार्त
संज्ञा [सं०] ज्वरपीड़ित ।

ज्वरित
वि० [सं०] ज्वरयुक्त । जिसे ज्वर चढ़ा हो ।

ज्वरी
वि० [सं० ज्वरिन्] [वि० स्त्री० ज्वरिणी] जिसे ज्वर हो ।

ज्वर्रा †
संज्ञा पुं० [हिं० जुर्रा] दे० 'जुर्रा' । उ०—ज्वर्रा बाज बाँसे कुही बहरी लगर लोने, टोने जरकटी त्यौं शचान सानवारे हैं ।—रघुराज (शब्द०) ।

ज्वलंत
वि० [सं० ज्वलन्त] १. जलता हुआ । प्रकाशमान् । दीप्त । देदीप्यमान् । २. प्रकाशित । अत्यंत स्पष्ट । जैसे, ज्वलंत दृष्टांत, ज्वलंत प्रमाण ।

ज्वल
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्वाला । अग्नि । २. दीप्ति । प्रकाश ।

ज्वलका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अग्निशिखा । आग की लपट । लौर ।

ज्वलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलने का कार्य या भाव । जलन । दाह । उ०—(क) अधर रसन पर लाली मिसी मलूम । मदन ज्वलन पर सोहति, मानहु धूम ।—(शब्द०) । (ख) सुदसा ज्वलन सनेहवा कारन तोर । अंजन सोइ उर प्रगटत लगि दृग कोर ।—रहीम (शब्द०) । २. अग्नि । आग । ३. लपट । ज्वाला । ४. चित्रक वृक्ष । चीता ।

ज्वलन
वि० १. प्रकाश करनेवाला । प्रकाशयुक्त । दाहक [को०] ।

ज्वलनांत
संज्ञा पुं० [सं० ज्वलनान्त] बौद्ध ग्रंथों के अनुसार दस हजार देवपुत्रों का नायक जिसने बौद्ध मठ में प्रवेश करते ही बोधिज्ञान प्राप्त कर लिया था ।

ज्वलित
वि० [सं०] १. जला हुआ । दग्ध । २. उज्वल । दीप्ति- युक्त । चमकता या झलकता हुआ ।

ज्वलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूर्वा लता । मुर्रा । मरोड़फली ।

ज्वलिनी सीमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दो गाँवों के बीच की सीमा जो ऊंचे पेड़ लगाकर बनाई गई हो । विशेष—मनु ने लिखा है कि पीपल, बड़, साल, ताड़ तथा ढाक के वृक्ष गाँव की सीमा पर लगाए ।

ज्वाइनि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० अजवाइन] एक प्रकार का पौधा । जिसके बीज औषध ओर मसाले के काम में आते हैं । अजवाइन । उ०—विसूचित तन नहिं सकै समारि । पीपल मूल ज्वइनि सारि ।—प्राण०, पृ० १५० । यौ०—ज्वाइनिसारि = अजवाइन का सत्त ।

ज्वान †
वि० [फा़० जवान ] दे० 'जवान' ।

ज्वानी †
संज्ञा स्त्री० [फा़० जवानी] दे० 'जवानी' ।

ज्वाब †
संज्ञा पुं० [अ० जवाब] दे० 'जवाब' । उ०—को रक्खै या भुंमि पर, रक्खि करे को ज्वाब ।—ह० रासो, पृ० ४८ ।

ज्वार
संज्ञा स्त्री० [सं० यवनाल, यवाकार या जूर्ण] १. एक प्रकार की घास जिसकी बाल के दाने मोटे अनाजों में गिने जाते हैं । विशेष—यह अनाज संसार के बहुत से भागों में होता है । भारत, चीन, अरब, अफ्रीका, अमेरिका आदि में इसकी खेती होती है । ज्वार सूखे स्थानों में अधिक होती है, सीड़ लिए हुए स्थानों में उतनी नहीं हो सकती । भारत में राज- पूताना, पंजाब आदि में इसका ब्यवहार बहुत अधिक होता है । बंगाल, मद्रास, बरमा आदि में ज्वार बहुत कम बोई जाती है । यदि बोई भी जाती है तो दाने अच्छे नहीं पडते । इसका पौधा नरकट की तरह एक डंठल के रूप में सीधा५—६ हाथ ऊँचा जाता है । डठल में सात सात आठ आठ अंगुल पर गाँठें होती हैं जिनसे हाथ डेढ़ हाथ लंबे तलवार के आकार के पत्ते दोनों ओर निकलते हैं । इसके सिरे पर फूल के जीरे और सफेद दानों के गुच्छे लगते हैं । ये दाने छोटे छोटे होते हैं और गेहूँ की तरह खाने के काम में आते हैं । ज्वार कई प्रकार की होती है जिनके पौधों में कोई विशेष भेद नहीं दिखाई पड़ता । ज्वार की फसल दो प्रकार की होती है, एक रबी, दूसरी खरीफ । मक्का भी इसी का एक भेद है । इसी से कहीं कहीं मक्का भी ज्वार ही कहलता है । ज्वार को जोन्हरी, जुंडी आदि भी कहते हैं । इसके डंठल और पौधे को चारे के काम में लाते हैं और चरी कहते हैं । इस अन्न के उत्पत्तिस्थान के संबंध में मतभेद है । कोई कोई इसे अरब आदि पश्चिमी देशों से आया हुआ मानते हैं और 'ज्वार' शब्द को अरबी 'दूरा' से बना हुआ मानते हैं, पर यह मत ठीक नहीं जान पड़ता । ज्वार की खेती भारत में बहुत प्राचीन काल से होती आई है । पर यह चारे के लिये बोई जाती थी, अन्न के लिये नहीं । २. ससुद्र के जल की तरंग का चढा़व । लहर की उठान । भाटा का उलटा । विशेष—दे०'ज्वारभाटा' ।

ज्वारभाटा
संज्ञा पुं० [हिं० ज्वार + भाँटा] समुद्र के जल का चढा़व उतार । लहर का बढ़ना और घटना । विशेष—समुद्र का जल प्रतिदिन दो बार चढ़ता और दो बार उतरता है । इस चढा़व उतार का कारण चंद्रमा और सूर्य का आकर्षण है । चंद्रमा के आकर्षण में दूरत्व के वर्ग के हिसाब से कमी होंती है । पृथ्वी जल के उस भाग के अणु जो चंद्रमा से निकट होगा, उस भाग के अणुओं की अपेक्षा जो दूर होगा, अधिक आकर्षित होंगे । चंद्रमा की अपेक्षा पृथ्वी से सूर्य की दूरी बहुत अधिक है; पर उसका पिंड चंद्रमा से बहुत ही बडा़ है । अतः सुर्य की ज्वार उत्पन्न करनेवाली शक्ति चंद्रमा से बहुत कम नहीं है ४/९ के लगभग है । सूर्य की यह शक्ति कभी कभी चंद्रमा की शक्ति के प्रतिकूल होती है; पर अमावस्या और पूर्णिमा के दिन दोनों की शक्तियाँ परस्पर अनुकूल कार्य करती हैं; अर्थात् जिस अंश में एक ज्वारा उत्पन्न करेगी, उसी अंश में दूसरी भी ज्वार उत्पन्न करेगी । इसी प्रकार जिस अंश में एक भाटा उत्पन्न । करैगी दूसरी भी उसी में भाटा उत्पन्न करेगी । यही कारण है कि अमावस्या और पूर्णिमा को और दिनों की अपेक्षा ज्वार अधिक ऊँची उठती है । सप्तमी और अष्टमी के दिन चंद्रमा और सूर्य की आकर्षण शक्तियाँ प्रतिकूल रूप से कार्य करती हैं, अतः इन दोनों तिथियों को ज्वार सबसे कम उठती है ।

ज्वारी पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जुआरी' ।

ज्वाल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्निशिखा । लौ । लफ्ट । आँच । उ०—चिंता ज्वाल शरीर बन दावा लगि लगि जाय ।— गिरिधर (शब्द०) । २. मशाल (को०) ।

ज्वाल (२)
वि० जलता हुआ । प्रकाशयुक्त [को०] ।

ज्वालमाली
संज्ञा पुं० [सं० ज्वालमालिन्] सूर्य ।

ज्वाला
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्निशिखा । लपट । २. विष आदि की गरमी का ताप । ३. गरमी । ताप । जलन । मुहा०—ज्वाला फूँकना = (१) गरमी उत्पन्न करना । शरीर में दाह उत्पन्न करना । (२) प्रचंड क्रोध आना । ४. दग्धान्न । भुना हुआ चावल । ५. महाभारत के अनुसार तक्षक की पुत्री ज्वाला जिससे ऋक्ष ने विवाह किया था ।

ज्वालाजिह्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्नि । आग । २. एक प्रकार का चित्रक वृक्ष ।

ज्वालादेवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शारदापीठ में स्थित एक देवी । विशेष— इनका स्थान काँगडा़ जिले के अंतर्गत देरा तहसील में है । तंत्र के अनुसार जब सती के शव को लेकर शिव जी घूम रहै थे तब यहाँ पर सती की जिह्वा गिरी थी । यहाँ की देवी 'अंबिका' नाम की ओर भैरव 'उन्मत्त' नामक हैं । यहाँ पर्वत के एक दरार से भूगर्भस्थ अग्नि के कारण एक प्रकार की जलनेवाली भाप निकला करती है जो दीपक दिखलाने से जलने लगती है । इसी को देवी का ज्वलंत मुख कहते हैं ।

ज्वलाध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि [को०] ।

ज्वालामालिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तंत्र के अनुसार एक देवी का नाम ।

ज्वालामाली
संज्ञा पुं० [सं० ज्वालामालिन्] शिव । महादेव [को०] ।

ज्वालामुखी पर्वत
संज्ञा पुं० [सं०] वह पर्वत जिसकी चोटी के पास गहरा गड्ढा या मुँह होता है जिसमें धूआँ, राख तथा पिघलेया जले हुए पदार्थ बराबर अथवा समय समय पर बराबर निकला करते हैं । विशेष— ये वेग से बाहर निकलनेवाले पदार्थ भूगरर्भ में स्थित प्रचंड आग्नि के द्वारा जलते या पिघलते हैं और संचित भाप के वेग से ऊपर निकलते हैं । ज्वालामुखी पर्वतों से राख, ठोस और पिघली हुई चट्टानें, कीचड, पानी, धुआँ आदि पदार्थ निकलते हैं । पर्वत के मुँह के चारों और इन वस्तुओं के जमने के कारण कँगूरेदार ऊँचा किनारा सा बन जाता है । कहीं कहीं प्रधान मुख के अतिरिक्त बहुत से छोटे छोटे मुख भई इधर उधर दूर तक फैले हुए होते हैं । ज्वालामुखी पर्वत प्रायः समुद्रों के निकट होते हैं । प्रशांत महासागर (पैसफिक समुद्र) में जापान से लेकर पूर्वीय द्वीप समूह तक अनेक छोटे बडे़ ज्वालामुखी पर्वत हैं । अकेले जावा ऐसे छोटे द्वीप में ४९ टीले ज्वालामुखी के हैं । सन् १८८३ में क्रकटोआ टापू में ज्वालामुखी का जैसा भयंकर स्फोट हुआ था, वैसा कभी नहीं देखा गया था । टापू के आसपास प्रायः चालीस हजार आदमी समुद्र की घोर हलचल से डूबकर मर गए थे ।

ज्वालावक्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

ज्वालाहल्दी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] रँगने की एक हलदी ।

ज्वेहर पु †
संज्ञा पुं० [अ० जवाहिर] बेशकीमत पत्थर । रत्न । जवाहर । उ०— हीरे रत्न ज्वेहर लाल । सचु सूची साची टकसाल । — प्राण०, पृ० १६७ ।