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अंसु

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

अंसु ^१पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ अंशु, प्रा॰ अंसु] किरण । उ॰— सरद निसि को अंसु अगनित इंदु आभा हरनि । —सूर॰ १० । ३५१ । यौ॰— अंसुपति, अंसुमान, अंसुमाल = सूर्य ।

अंसु ^२पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ अंस] भाग । अंश । उ॰— लोभा लई नीचे ज्ञान चलाचल ही की अंसु अंत है क्रिया पाताल निंदा रस ही को खानि ।— भिखारी॰, ग्रं॰, भा॰,

२. पृ॰ २१२ ।

अंसु ^३ पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ अंस] स्कंध । कंधा । उ॰— सखा अंसु पर भुज दिन्हें लीन्हें मुरलि अधर मधुर विश्व भरन । — सूर॰, १० । ६२४ ।

अंसु ^४पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ अश्रु; प्रा॰ अस्सु, अंसु] आँसू । अश्रु । उ॰— गहत बाल पिय पानि सु गुरू जन संभेर । लोचन मोचि सुरंग सु अंसु बहे खरे । —पृ॰ रा॰, २५ । २७५ ।

अंसु ^७पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ अश्व, प्रा॰, अस्स] अश्व । धोड़ा । उ॰— पय मंड़िहि अंसु धरै उलटा । मनौ विंटय देषि चलै कुलटा ।— पृ॰ रा॰ २७ ।३५ ।