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अखूट

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

अखूट विं॰ [सं॰ अ+√खुड् = तोड़ना अथवा सं॰ *अखोडच, प्रा॰ *अखुडु, अखुड्ड>अखूट]

१. जो तोड़ा या खंडित न किया जा सके । अटूट । उ॰— सात दीप सात सिंधु थरक थरक करै जाकै डर टूटत अखूट गढ़ राना के । —अकबरी॰, पृ॰१४३ ।

२. जो न घटे या न चुके । अखंड । अक्षय । बहुत । अधिक । उ॰—(क) नैना अतिहीं लोभ भरे । संगहिँ संग रहत वै जहँ तहँ बैठत चलत खरे । काहू की परतीति न मानत जानत सबहिनि चोर । लूटत रूप अखूट दाम कौ स्याम बस्य यौँ भोर ।—सूर॰, १० । २८८४ । (ख) झूट न कहिए साँच को साँच न कहिए झूट । साहब तो मानै नहीं लागै पाप अखूट ।—दादू (शब्द॰) ।