अद्भुतोपमा
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
शब्दसागर
अद्भुतोपमा संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] उपमा अलंकार का एक भेद । विशेष—इसमें उपमा के ऐसे गुणों का उल्लेख किया जाता है, जिनका होना उपमेय में त्रिकाल में भी संभवन हो । । जैसे— प्रीतम को अपमाननि गान सयाननि रिझि रिझावै । अंक बिलोकान बोलि अभोलनि बोलि के केशव मोद बढ़ावै । हावइ भाव विभाव प्रभाव सुभाव के भाइनि चित्र चुरावै । ऐसे बिलास जु होहिं सरोज मैं तो उपमा मुख तेरे की पावै ।—केशव ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ १८९ ।