आकर्षणशत्कि

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

आकर्षणशत्कि संज्ञा पुं॰ [सं॰] भौतिक पदार्थों की एक शक्ति जिससे वे अन्य पदाथों को अपने ओर खींचते हैं । विशेष—यह शक्ति प्रत्येक परामाणु में रहती है । क्या कारण, क्या कार्य रूप में सब परमाण या उनसे उत्पन्न सब पदाथों की और आकृष्ट होते हैं । इसी से द्वयण, त्रसरेणु तथा समस्त चराचर जगत् का संगठन होता है । इसी से पाषाणादि के परमाणु आपस में जुड़े रहते हैं । पृथवी के ऊपर कंकड़, पत्थर तथा जीव आदि सब इसी शक्तिके बल पर ठहरे रहते हैं । जल के चंद्रमा की ओर आकृष्ट हो ने से समुद्र में ज्वार भाटा उठता है । बड़े बड़े पिंड़, ग्रहमंड़ल, सूर्य, चंद्रादि सब ईसी शक्ति से आकाशमंड़ल में निराधार स्थित हैं और नियम से अपनी अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हैं । पृथ्वी भी इसी शक्ति से बृहत् वायुमंड़ल को धारण किए हुए हैं । सूर्य से लेकर परमाणु तक में यह शतक्ति विघमान है । यह शक्ति भिन्न भिन्न रूपों से भिन्न भिन्न पदार्थों और दशाओं में काम करती हैं । मात्रानुसार इसका प्रभाव दूरस्थ और निकटवर्ती सभी पदाथोँ पर पड़ता है । धारण या गुरूत्वाकर्षण, चुंबकाकर्षण, संलग्ना- कर्शण, केशाकर्षण, रासायनिकाकर्षण आदि इनके अनेक प्रभेद है ।