उच्चारण

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

  1. शब्द को कहना का ढंग

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

उच्चारण संज्ञा पुं॰ [सं॰] [वि॰ उच्चारणीय, उच्चारित, उच्चर्य, उच्चार्यप्राण]

१. कंठ, तालु, ओष्ठ, जिह्वा आदि के प्रयत्न द्वारा मनुष्यों का व्यक्त और विभक्त ध्वनि निकलना । मुँह से स्व र और व्यंजनयुक्त शब्द निकालना । जैसे (क) वह लड़का शब्दों का ठीक ठीक उच्चारण नहीं कर सकता । (ख) बहुत से लोग वेद के मंत्रों का उच्चारण सबके सामने नहीं करते । विशेष—गद्य में मनुष्य ही की बोली के लिये इस शब्द का प्रयोग होता है । मानव शब्द के उच्चारण के स्थान से संबद्ध मनुष्य हैं—उर, कठ, मूर्द्धा, जिह्वा, स्थरतंत्री, काकल, अभिकाकल, जिह्वामूल, वर्त्स, दाँत, नाक, ओठ और तालु ।

२. यावर्णों शब्दों को बोलने का ढंग । तलफ्फुज । जैसे— बंगालियों का संस्कृत उच्चारण अच्छा नहीं होता ।