ऊँघ

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ऊँघ ^१ संज्ञा स्त्री॰ [ सं॰ अवाड् = नीचे मुख, प्रा॰ उघइ = सोता है ] ऊँघाई । निद्रागम । झपकी । अर्धनिद्रा ।

ऊँघ ^२ संज्ञा स्त्री॰ [ हिं॰ औंगन ] बैलगाडी़ के पहिए की नाभि और धुरकीली के बीच पहनाई हुई सन की गेडुरी । यह इसलिये लगाई जाती है जिसमें पहिया कसा रहे और धुरकीली की रगड़ से कटे नहीं ।

ऊँघ ।

२. वह हलकी बेहोशी जो चिंता, भय, शोक या दुर्बलता आदे के कारण हो । विशेष— वैद्यक के अनुसार इसमें मनुष्य को व्याकुलता बहुत होती है, इंद्रियों का ज्ञान नहीं रह जाता, जँभाई आती है, उसका शरीर भारी जान पड़ता है, उससे बोला नहीं जाता तथा इसी प्रकार की दूसरी बातें होती हैं । तंद्रा कटुतिक्त या कफनाशक वस्तु खाने और व्यायाम करने से दूर होती है । क्रि॰ प्र॰—आना ।