ऊक

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ऊक ^१पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ उल्का]

१. उल्का । टूटता तारा । उ॰— ऊक पात दिकदाह दिन फेकरहिं स्वान सियार । उदित केतु गत हेतु महि कंपति बारहिं बार ।—तुलसी (शब्द॰) ।

२. लुक्क लुआठा । उ॰—घरी एक झरि सार बहु ज्यों अगि संजुक्ता ऊक । पृ॰ रा॰, १० । ३३ ।

३. दाह । जलन । आच । ताप । तपन । ताव । उ॰—कहाँ लौं मानै अपनी चूक । बिनु गुपाल सखि री यह छतियाँ ह्वै न गई द्वै टूक । तन मन धन यौवन ऐसे सब भए भुअँगम फूँक । हृदय जरत है दावानल ज्यों कठिन बिरह की ऊक । जाकी मणि सिर ते हरि लीनी कहा कहत अति मूक । सूरदास ब्रज वास बसीं हम मनो दाहिनो सूक ।—सूर (शब्द॰) ।

ऊक ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ चूक का अनुकरण अथवा सं॰ अव+कृ (अवकृत्) भूल । चूक । गलती । उ॰—सुंदर इस औजूद मौं इश्क लगाई ऊक । आशिक ठंडा होइ आइ मिलै माशूक ।—सुदरं ग्रं॰, भा॰१, पृ॰ २९१ ।

ऊक ^३ वि॰ [सं॰ उत्कट] उत्कट । तीव्र । उ॰—अति ऊक गंध रसु रस्स वासि ।—पृ॰ रा॰, ५७ । २५२ ।