ऊभना

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ऊभना ^१पु क्रि॰ अ॰ [सं॰ उद्भवन=ऊपर होना; गुज॰ ऊभूँ= खड़ा होना]

१. उठना । खड़ा होना । उ॰—(क) बिरहिन ऊभी पंथ सिर पंथी पूछै धाय । एक शब्द कहो पीव का कबेर मिलैंगे आय ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) एक खड़ा होना लहै इक ऊभा ही बिललाय । समरथ मेरा साँइया सूता देइ जगाय ।—कबीर (शब्द॰) । (ग) ऊभा मारूँ बैठा मारूँ मारूँ जागत सूता । तीन भवन में जाल पसारूँ कहाँ जायगा पूता ।—दादू (शब्द॰) । (घ) करुणा करति मंदोदरि रानी । चौदह सहस सुंदरी ऊभी उठै न कंत महा अभिमानी ।—सूर (शब्द॰) ।

२. उत्पन्न होना । आना या लगना (लाज) । उ॰—ढोलउ मन चलपथ थपउ ऊभउ साहइ लाज, साम्हउ वीसू आवियउ, आइ कियउ सुभराज । —ढोला॰ दू॰ १०५ ।

ऊभना ^२ क्रि॰ [हिं॰ ऊबना] घबड़ाना । व्याकुल होना ।