ऋषभ

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ऋषभ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. बैल । वृषभ । विशेष—पुरुष या नर आदि शब्दों के आगे उपमान रूप में समस्त होने से सिंह, व्याघ्र आदि शब्दों के समान यह शब्द भी श्रेष्ठ का अर्थ देता है । जैसे,— पुरुषर्षभ=पुरुषश्रेष्ठ ।

२. नक्र या नाक नामक जलजंतु की पूँछ ।

३. राम की सेना का एक बंदर ।

४. बैल के आकार का दक्षिण का एक पर्वत जिस पर हरिश्याम नामक चंदन होता है (वाल्मीकीय) ।

५. संगीत के सात स्वरों में से दूसरा । विशेष—इसकी तीन श्रृतियाँ हैं—दयावती, रंजनी और रतिका । इसकी जाति क्षत्रिय, वर्ण पीला, देवता ब्रह्मा, ऋतु शिशिर, वार सोम, छंद गायत्री तथा पुत्र मालकोश है । यह स्वर बैल के समान कहा जाता हैं पर कोई इसे चातक के स्वर के समान मानते हैं । नाभि से उठकर कंठ और शीर्ष को जाती हुई वायु से इसकी उत्पत्ति होती है । ऋषभ (कोमल) के स्वरग्राम बनाने से विकृत स्वर इस प्रकार होते हैं— ऋषभ स्वर । गांधार—ऋषभ । तीव्र मध्यम—गांधार । पंचम—मध्यम । धैवत—पंचम । निषाद—धैवत । कोमल ऋषभ—निषाद ।

५. लहसुन की तरह की एक ओषधि या जड़ी जो हिमालय पर होती है । इसका कंद मधुर, बलकारक और कामोद्दीपक होता है ।

७. नर जानवर । जैसे,—अजर्षभ=बकरा (को॰) ।

८. वारह की पूँछ (को) ।

९. विष्णु का एक अवतार (को॰) ।