ओस

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ओस संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ अदश्याय, पा॰ उस्साव, प्रा॰ उस्सा] हवा में मिली हुई भाप जो रात की सर्दी से जमकर और जलविंदु के रूप में हवा से अलग होकर पदार्थों पर लग जाती है । शीत । शबनम । उ॰—ओस ओस सब कोई आँसू कहे न कोय । मोहिं बिरहिन के सोग में रैन रही है रोय ।—कविता कौ॰, भा॰ ४, पृ॰ ५७६ । विशेष—जब पदार्थों की गर्मो निकलने लगती है, तब वे तथा उनके आसपास की हवा बहुत ही ठंड़ी हो जा ती है । उसी से ओस की बूँदें ऐसी ही वस्तुओं पर अधिक देखी जाती हैं जिनमें गर्मी निकालने की शक्ति अधिक है और धारण करने की कम, जैसे घास । इसी कारण ऐसी रात को ओस कम पड़ेगी जिसमें बादल न होंगे और हवा तेज न चलती होगी । अधिक सरदी पाकर ओस ही पाला हो जाती है । मुहा॰—ओस चाटने से प्यास न बुझना=थोड़ी सामग्री से बड़ी आवश्यकता की पूर्ति न होना । उ॰—अजी ओस चाटने से कहीं प्यास बुझी है ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ ४६ । ओस पड़ना या पड़ जाना=( १) कुम्हलाना । बेरौनक हो जाना । (२) उमंग बुझ जाना । (३) लज्जित होना । शरमाना । ओस का मोती=शीघ्र नाशवान । जल्दी मिटनेवाला । उ॰— यह संसार ओस का मोती बिखर जात इक छिन में ।— कबीर (शब्द॰) ।