सामग्री पर जाएँ

कन्नी

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

[सम्पादित करें]

शब्दसागर

[सम्पादित करें]

कन्नी ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ कन्ना]

१. पतंग या कनकौए के दोनों ओर के किनारे । मुहा॰—कन्नी खाना या मारना=पतंग का उड़ते समय किसी ओर झूका रहना । पतंग का एक ओर झुककर उड़ना । विशेष—इस प्रकार उड़ने से पतंग बढ़ नहीं सकती ।

२. वह धज्जी जो पतंग की कन्नी में इसलिए बाँधी जाती है कि उसका वजन बराबर हो जाय और वह सीसी उड़े । क्रि॰ प्र॰—बाँधना ।—लगाना ।

३. किनारा । हाशिया । कोर । मुहा॰—किसी की कन्नी दबाना=(१) किसी के अधीन या वशीभूत होना । किसी के ताबे में होना । (२) दबना । सहमना । धीमा पड़ना । (३) झेंपना । लजाना ।

४. धोती चद्दर आदि का किनारा । हाशिया । जैसे, लाल कन्नी की धोती । यौ॰—कन्नीदार=किनारेदार ।

कन्नी ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ करण] राजगीरों का एक औजार जिससे वे दीवार पर गारा पन्ना लगाते हैं । करनी ।

कन्नी ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰ स्कन्ध]

१. पेड़ों का नया कल्ला । कोपल ।

२. तमाकू के वे छोटे छोटे पत्ते या कल्ले जो पत्तों के काट लेने पर फिर से निकलते है । ये अच्छे नहीं होते ।

३. हेंगे या पटैल के खींचने के लिये रस्सियों की मुद्धी में लगी हुई खूँटी जिसे हेंगे के सूराख में फँसाते हैं ।

कन्नी ^४ † वि॰ [हिं॰ कन्न+ ई (प्रत्य॰)] कान की । उ॰—सुरति सिमृति दुइ कन्नी मुंदा ।—कबीर ग्रं,॰; पृ॰ २२८ ।