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कम्पा

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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कंपा ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ कम्( = गाँठ)+पाश या हिं॰ कंप] बाँस की पतली पतली तीलियाँ जिनमें बहेलिए लासा लगाकर चिड़ियों को फँसाते हैं । उ॰—लीलि जाते बरही बिलीक बेनी बनिता की जो न होती गूंथनि कुसुमसर कंपा की ।—(शब्द॰) । विशेष—यह दस पाँच पतली पतली तीलियों का कूँचा होता है । इसे पतले बाँस के सिरे पर खोंसकर लगाते हैं और फिर उस बाँस को दूसरे में और उसे तीसरे में इसी तरह खोंसते जाते हैं । इससे पेड़ पर बैठी हुई चिड़ियों को फँसाते हैं । बाँस को खोंचा और कूँचे को कंपा कहते हैं । मुहा॰—कंपा मारना या लगाना = (१) चिड़ियों को कंपे से मारना या फँसाना । (२) धोखे से किसी को अपने वश में करना । फँसाना । दाँव पर चढ़ाना । उ॰—अब तुम माशा अल्लाह से सयानी हो । नेक बद समझ सकती हो । अगर यहाँ कंपा न मारा तो कुछ भी न किया ।—सैर॰, पृ॰ २८ ।

कंपा संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ कम्पा]

१. काँपना ।

२. भय । डर ।

३. हिलना । आंदोलन [को॰] ।