करखा
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]करखा ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ कड़खा]
१. दे॰ 'कड़खा' ।
२. एक छंद जिसके प्रत्येक पद में ८, १२, ८ और ९ के विराम से ३७ मात्राएँ होती है और अंत में यगण होता है । उ॰—नमों नरसिंह बलवंत प्रभु, संत हित काज, अवतार धारो । खंभ तें निकसि, भु हिरनकश्यप पटक, भटक दै नखन सों उर विदारो ।
करखा ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ कर्ष]
१. उत्तेजना । बढ़ावा ।
२. रणगीत । उ॰—जहँ आँगरे करखा कहैं । अति— उँमगि आनँद कों लहैं ।— पद्माकर ग्रं॰, पृ॰ ८ ।
३. लागडाँट । ताव । उ॰—नैननि होड़ बदी बरखा सों । राति दिवस बरसत झर लाये दिन टुना करखा सों—सूर (शब्द॰) । (ख) भलेहि नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढ़ावहिं करषा—तुलसी (शब्द॰) ।
करखा ^३ † संज्ञा पुं॰ [हिं॰ कालिख] दे॰ 'कालिख' ।