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कलाधर

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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कलाधर संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. चंद्रमा । उ॰—यह समता क्यौं करि बनत मो कर मुख मृदु गात । कमल कलाधर कनक लखि कबि कुल कहत लजात ।—स॰ सप्तक, पृ॰ ३८४ ।

२. दंडक छंद का एक भेद जिसके प्रत्येक चरण में एक गुरु, एक लघु, इस क्रम से १५ गुरु और १५ लघु होकर अंत में गुरु होता है । जैसे,— जाय के भरत्थ चित्रकूट राम पास बेगि, हाथ जोरि दीन ह्वै सुप्रेम तें बिनै करी । सीय तात मात कौशिला वशिष्ठ आदि पूज्य लोक वेद प्रीती नीति की सुरति ही धरी । जान भूप बैन धर्म पाल राम ह्वै सकोच धीर दे गंभीर बंधुकी गलानि को हरी । पादुका दई पठाय औध को समाज साज देख नेह राम सीय के हिये कृपा भरी (शब्द॰) ।

३. शिव ।

४. कलाओं को जाननेवाला । वह जो कलाओं का ज्ञाता हो । उ॰—कविकुल विद्याधर सकल कलाधर राज राज बर वेश बने ।—केशव (शब्द॰) ।