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कलिङ्गड़ा

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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कलिंगड़ा संज्ञा पुं॰ [सं॰ कलिङ्ग] एक राग जो दीपक राग का पाँचवाँ पुत्र माना जाता है । उ॰—जीवन में आग लगा डालूँ ? हँसकर कलिंगड़ा गाऊँ ? मेरा अंतरयामी कहता है, मैं मलार बरसाऊँ ।—हिम॰, पृ॰ ४५ । विशेष—यह संपूर्ण जाति का राग है और रात के चौथे पहर में गाया जाता है । इसमें सातों स्वर लगते हैं इसका स्वरपाठ इस प्रकार हैः म ग रे सा सा रे ग म प ध नी सा ।