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कल्पितोपमा

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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कल्पितोपमा संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] एक प्रकार का उपमालंकार जिसमें कवि उपमेय के लिये कोई ओक स्वाभाविक उपयुक्त उपमान न मिलने से मनमाना उपमान कल्पित कर लेता है । इसे 'अभूतोपमा' भई कहते हैं । जैसे,— (क) कंकनहार विविध भूषण विधि रचे निज कर मन लाई ।— गजमणि माल बीच भ्राजत कहि जाता न पदिक निकाई । जनु उड़गन मंड़ल व रिद पर नवग्रह रची अथाई । —तुलसी (शब्द॰) । इसमें गजमुक्ता के हार के बीज में पदिक की शोभा के हेतु उपयुक्त उपनमान न पाकर कवि कल्पना करता है कि मानों मेघों के ऊपर बैठकर नवाग्रह ने अथाई रची है । (ख) राधे मुख ते छुटि अलका लगी पयोधर आया । शशि मंड़ल मेरु सिर लटकी भोगिनी भाय (शब्द॰) ।