सामग्री पर जाएँ

काँचा

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

[सम्पादित करें]

शब्दसागर

[सम्पादित करें]

काँचा पु वि॰ [सं॰ कषण या कषण अथवा कुपक्व, * प्रा॰ कुपच्च * कुअच्च, कच्च, कच्चा] [स्त्री॰ काँची]

१. कक्चा । अपक्व ।

२. अदृढ़ । दुर्बल । अस्थिर । मुहा॰— काँचा मन = जो शुद्धता और भक्ति में ढढ़ न हो । उ॰ — जप माला, छापा तिलक सरै न एकौ काम । मन काँचे नाचे वृथा साँचे राँचे राम । — बिहारी ( शब्द॰) मन काँचा होना = जि छोटा होना । उत्सार और दृढ़ता न रहना । उ॰ — समय सुभाय नारि कर साँचा । संगल महँ भय मन अति काँचा । — तुलसी (शब्द॰) काँची मति या बुद्धि = अपरिपक्व बुद्धि । खोटी समझ । उ॰ — ठकुराइत गिरिधर जू की साँची । हरि चरणारविंद तजि लागत अनत कहुँ तिनकी मति काँची । सूरदास भगवंत भजत जे तिनकी लीक चहूँ युग खाँची ।— सूर (शब्द॰) ।