सामग्री पर जाएँ

काँधना

विक्षनरी से

प्रकाशितकोशों से अर्थ

[सम्पादित करें]

शब्दसागर

[सम्पादित करें]

काँधना पु क्रि॰ स॰ [हिं॰ काँध से नाम॰ ]

१. उठाना । सिर परलेना । सँभालना । उ॰— (क) प्रीति पहाड भार जो काँधा । कित तेहि छूट लाइ जिय बाँधा । — जायसी ( शब्द) । (ख) उठा बाँध जस सब गढ बाँधा । कीजै बेगि भार जस काँधा । — जायसी (शब्द) ।

१. ठानना । मचाना । उ॰ — (क) सुभुज मारीच खर त्रिसिर दूषन बालि दलत जेहि दूसरो सर न साँधो । आनि पर बाम, बिधि बाम तेहि राम सों सकत संग्राम दसकंध काँधो । तुलसी ( शब्द॰) । (ख) भूषन भनत सिवराज तब किर्ति सम और की न किर्ति कहिबे को काँधियतु है । — भूषण (शब्द॰) ।

३. स्वीकार करना । अंगीकार करना । उ॰ — (क) जो पहिले मन मान न काँधे । परखे रतन गाँठि तब बाँधे । — जायसी ( शब्द॰) । (ख) तिनहिं जीति रन आनेसु बाँधी । उठि सुत पितु अनुसासन काँधी । — तुलसी (शब्द॰) ।

४. भार सहना । अँगेजना । सहना । उ॰ — बिरह पीर को नैन ये सकैं नहीं पल काँध । मीत आइके तूँ इन्हैं रूप पीठि दै बाँध । — रतनहजारा (शब्द॰) ।