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काकु

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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काकु संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. छिपी हुई चुटीली बात । व्यंग । तनज । ताना । उ॰—(क) राम बिरह दशरथ दुखित कहत केकयी काकु । कुसमय जाय उपाय सब केवल कर्मविपाकु ।— तुलसी (शब्द॰) । (ख) —बिनु समझे निज अघपरिपाकू । जारिउ जाय जननि कहि काकू ।—तुलसी (शब्द॰) ।

२. अलंकार में वक्रोक्ति के दो भेदों में से एक जिसमें शब्दों के अन्यार्थ या अनेकार्थ से नहीं बल्कि ध्वनि ही से दूसरा अभिप्राय ग्रहण किया जाय । जैसे, —क्या वह इतने पर भी न आवेगा? अर्थात् आवेगा । उ॰—आलिकुल कोकिल कलित यह ललित वसंत बहार । कहु सखि नहिं ऐ हैं कहा प्यारे अबहुँ अगार (शब्द॰) ।

३. अस्पष्ट कथन (को॰) ।

४. जिह्वा (को॰) ।

५. जोर देना । बल देना (को॰) ।