कुम्हडा़
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]कुम्हडा़ संज्ञा पुं॰ [सं॰ कुष्माण्ड, पा॰ कुम्हंड, प्रा॰ कुभंड ]
१. फैलनेवाली बेल जिसके फलों की तरकारी और मुरब्बा, पाक आदि बनाया जाता है । विशेष—इसके पते बडे़ गोल रोएँदार होते हैं । पते का डंठल बडा़ और पोला होता है । इसमें घंटी के आकार के बडे़ बडे़ पीले फूल लगते हैं । कुम्हडे़ की बेल बहुत दूर तक फैलती है । इसके फल गोल और बहुत बडे़ बडे़ सात आठ सेर तक के होते हैं । कुम्हडा़ दो प्रकार का होता है—एक सफेद, दूसरा पीला । सफेद रंग के कुम्हडे़ को पेठा कहते हैं । यह खाने में बहुत फीका सा होता है । लोग इसका मुरब्बा डालते हैं ओर इसके महीन टुकड़ों को पीठी में मिलाकर बरी भी बनाते हैं । पिले कुम्हडे़ का गूदा लाल रंग का और खाने में मिठा होता है । इसकी दो फसले होती हैं—एक गरमी में, दूसरी बरसात में । गरमी का कुम्हडा़ जमीन पर और बरसात का छप्पर आदि पर फैलता है । कुम्हडे़ के फल की तरकारी होती है और फूलों तथा पत्तों का साग बनता है । पर्या॰—काशीफल । पेठा ।
२. कुम्हडे़ का फल । मुहा॰ —कुम्हड़ बतिया = (१) कुम्हडे़ का छोटा फल । (२) अशक्त और निर्बल मनुष्य । उ॰—इहाँ कुम्हडबतिया कोउ नाहीं । जो तर्जनि देखत मरि जाहीं ।—तुलसी (शब्द॰) । कुम्हडे़ की बतिया = (१) कुम्हडे़ का छोटा कच्चा फल । (२) अशक्त और निर्बल मनुष्य ।