कुसवारी
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]कुसवारी संज्ञा पुं॰ [सं॰ कोश = हि, कुस + वारी (प्रत्य॰)]
१. रेशम का जंगली काड़ा जो बेर ओर पियासाल आदि पेड़ा पर कोया बनाकर उसके अंदर रहता है । विशेष—इस कीड़े क जीवन में चार अवस्थाएँ हाती है जिन्हें युग कह कसते हे । सब के पहले यह अंड़ के रूप में रहता है । अंड़े से निकलकर यह कमला की तरह का कीड़ा हो जाता है । फिर उसमे पक्षावरण दिखाई पड़ते है ओर वह तागे निकालता है । अंत में वह कोए स निकलकर कतिंग होकर उड़ने लगता है, जड़े खाता हे ओर मर जाता है । जिन कीड़ो की ये चार अवस्यापुँ या एर पी़ढ़ ी वर्ष भर में बीतती हैं वे एक युगक कहलाते है । कही कहीं जैसे चीन में, ऐसे कीड़े भी पाए जाते है जनकी वर्ष भर में दो पिढ़ियाँ हो जाती है । ऐसे कीड़ों को द्बियुगक कहते है । बहुत से देशों में त्रियुगक और चतुर्युगक कीड़े तक मिलते है । विशेष दे॰ 'रेशम' ।
२. रेशम का कोया । उ॰— अरे हाँ पलटू कुसवारी में कीटहिं चारा देत है ।—पलटू, पृ॰, ९८ ।