गगनानङ्ग
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प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]गगनानंग संज्ञा पुं॰ [सं॰ गगनानङ्ग] पचीस मात्राओं का एक मात्रिक छंद । विशेष—इसके प्रत्येक चरण में सोलहवीं मात्रा पर विश्राम होता है और आरंभ में रगण होता है । इस छंद में विशेषता यह है कि प्रत्येक चरण में पाँच गुरु और पंद्रह लघु होते हैं । किसी किसी के मत से बारह मात्राओं के बाद भी यति होती है । जैसे—माधव परम वेद निधि देवक, असूर हरंत तू । पावन धरम सेतु कर पूरण, सजन गहंत तू । दानव हरण हरि सुजग संतन, काज करंत तू । देखहु कस न नीति कर मोहि कहँ, मान धरंत तू ।