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गहरना

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शब्दसागर

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गहरना ^१ क्रि॰ अ॰ [हिं॰ गहर = देर ] देर लगाना । विलंब करना । उ॰—ठहरत आवै मनमोहन महरनंद, ठहरत आवे पुंज परिमल पुर को । सेवक त्यों गहरत आवै ज्यों ज्यों बाँसुरी सों कहरत आवै मन मेरो मानि दूर को ।—सेवक (शब्द॰) ।

गहरना ^२ क्रि॰ अ॰ [अ॰ क़हर]

१. झगड़ना । उलझना । उ॰— तुम सौं कहत सकुचतिं महरि । स्याम के गुन कछु न जानति जात हमसों गहरि ।—सूर॰, १० । १४२२ ।

२. कुढ़ना । नाराज होना । उ॰—सुनत श्याम चक्रित भए बानी ।..... अधर कंप रिसि सौंह मरोरयो मन ही मन गहरानी ।—सूर (शब्द॰) ।