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गाँडर

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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गाँडर संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ गणडाली]

१. मूँज की तरह की एक घास जिसकी पत्तियाँ बहुत पतली और हाथ सवा हाथ लंबी होती है । बीरन । खस । उ॰—सो मैं कुमति कहौ केहि भाँती । बाजु सुराग कि गाँडर ताँती ।—तुलसी (शब्द॰) । विशेष—जड़ से इसके अंकुर गुच्छो में निकलते हैं । यह घास तराई में तथा ऐसे स्थानों पर होती है जहाँ पानी इकट्ठा होता है । नैपाल की तराई में तालों और झीलों के किनारे यह बहुत उपजती है । इसकी सूखी जड़ जेठ असाढ़ से पनपती है और उसमें से बहुत में अंकुर निकलते हैं जो बढ़ते जाते हैं । कुआर के महीने में बीच से पतली पतली सीकें निकलती हैं, जिनके सिरे पर छोटे छोटे जीरे लगते हैं । किसान सीकों को निकालकर उनसे झाड़ू पंखे टोकरियाँ आदि बनाते हैं और पौधों को काटकर उनसे छप्पर छाते हैं । इस घास की जड़ सुगंधित होती है और उसे संस्कृत में उशीर तथा फारसी में खस कहते हैं । यह पतली, सीधी और लंबी होती है और बाजारों में खस के नाम से बिकती है । खस का अतर निकाला जाता है और उसकी टट्टियाँ भी बनती हैं । खस के नैचे भी बाँधे जाते हैं ।

२. एक प्रकार की दूब जिसमें बहुत सी गाँठे होती हैं । गंडदूर्वा । विशेष—यह जमीन पर दूर तक फैलती और जगह जगह जड़ पकड़ती जाती है । पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं । यह कड़ुई, कसैली और मीठी होती है, दाह, तृषा और कफ पित्त को दूर करती है तथा रुधिर के विकार को हरती है । भावप्रकाश में इसे लोहद्राविणी अर्थात् लोहे को गलानेवाली लिखा है ।