गुणाढय
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]गुणाढय ^१ वि॰ [सं॰] गुणपुर्ण । बहुत गुणोंवाला ।
गुणाढय ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰] एक प्रसिद्ध कवि । विशेष—इसने पैशाची भाषा में वह बडा़ ग्रंथ लिखा था जिसके आधार पर पीछे से क्षेमेंद्र ने वृहत्कथामंजरी और सोमदेव ने कथासरित्सागर नाम की पुस्तकें लिखीं । कथासरित्सागर में गुणाढय की कथा इस प्रकार लिखा है । प्रतिष्ठानपुर में सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसे श्रुतार्थ नाम की एक परम सुंदरी कन्या थी । इस कन्या के साथ नागराज बासुकि के छोटे भाई कीर्ति ने गांधर्व विवाह किया । इसी कन्या के गर्भ से गुणाढय का जन्म हुआ । गुणाढय के बचपन ही में उसका पिता मर गया । गुणाढय ने दक्षिणापथ में जाकर खूब अध्ययन किया और वह बडा़ प्रसिद्ध विद्वान् होकर प्रतिष्ठान देश के राजा सातवाहन की सभा में रहने लगा । राजा संस्कृत नहीं जानता था, मूर्ख था । एक दिन वह अपनी रानी के व्यवहार से अपनी मूर्खता पर बडा़ लज्जित हुआ और उसने संस्कृत सीखने का विचार किया । गुणाढय ने उसे छह वर्षों में व्याकरण सिखा देने का वादा किया । शर्व शर्मा नामक एक पंडित ने छह महीने में ही राजा को व्याकरण सिखा देने को कहा । इसपर गुणाढय ने चिढ़कर कहा 'यदि तुम राजा को छह महीने में व्याकरण सिखा दोगे तो मैं संस्कृत और प्राकृत आदि समस्त देशी भाषाओं का व्यवहार छोड दूँगा ।' शर्वशर्मा ने कलाप व्याकरण का निर्माण करके छह महीने में राजा को व्याकरण सिखा दिया । इसपर अपमानित गुणाढय ने बस्ती का रहना छोड़ दिया और वह जंगल में जाकर पिशाचों के बीच रहने और उन्हीं की भाषा का व्यवहार करने लगा । वहाँ पर उससे काणभूति से साक्षात्कार हुआ जो कुवेर के शाप से पिशाच हो गया था । काणभूति के मुख से उसने पुष्पदंत का कहा हुआ सप्तकथामय उपाख्यान सुना और उसे लेकर सात लाख श्लोकों का, पिशाच भाषा का एक ग्रंथ लिखा । राजसभा में उपस्थित होने पर, ग्रंथ की भाषा पैशाची होने से लोगों ने पुनः उसकी उपेक्षा की । दुःखी गुणाढय वन में पशुपक्षियों को यह ग्रंथ सुनाने और प्रत्येक पृष्ठ को अग्नि में जलाने लगा । कालांतर में राजा ने अपनी भूल का परिमार्जन किया पर ग्रंथ का एक अंश ही बचा पाए जिसके आधार पर सोम- देव और क्षेमेंद्र ने अपने अपने ग्रंथ लिखे ।