गेहूँ

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

गेहूँ पु॰

अनुवाद[सम्पादन]


प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

गेहूँ संज्ञा पुं॰ [सं॰ गोधूम या गोधुम] एक अनाज जिसकी फसल अग- हन में बोई जाती और चैत में काटी जाती है । विशेष—इसका पौधा डेढ़ या पौने दो हाथ ऊँचा होता है और इसमें कुश की तरह लंबी पतली पत्तियाँ पेड़ों से लगी हुई निकलती हैं । पेड़ों के बीच से सीधे ऊपर की और एक सींक निकलती है जिसमें बाल लगती है । इसी बाल में दाने गुछे रहते हैं । गेहुँ की खेती अत्यंत प्राचीन काल से होती आई है; चीन में ईसा से २७०० वर्ष पूर्व गेहुँ बोया जाता था । मिस्त्र के एक ऐसे स्तूप में भी एक प्रकार का गेहूँ गड़ा पाया गया जो ईसा से ३३५९ वर्ष पूर्व का माना जाता है । जंगली गेहूँ अब- तक कहीं नहीं पाया गया है । कुछ लोगों की राय है कि गेहूँ जवगोधी या खपली नामक गेहूँ से उन्नत करके उत्पन्न किया गया है । गेहूँ प्रधानत: दो जाति के होते हैं, एक टूँड़वाले दूसरे बिना टूँडके । इन्हीं के अंतर्गत अनेक प्रकार के गेहूँ पाए जाते हैं, कोई कड़े कोई नरम, कोई सफेद और कोई लाल । नरम या अच्छे गेहूँ उत्तरीय भारत में ही पाए जाते हैं । नर्मदा के दक्षिण में केवल कठिया गेहूँ मिलता है । संयुक्त प्रदेश और बिहार में सफेद रंग का नरम गेहूँ बहुत होता है और पंजाब में लाल रंग का । गेहूँ के मुख्य मुख्य भेदों के नाम ये हैं-दूधिया (नरम और सफेद), जमाली (कड़ा भूरा), गंगाजली, खेरी (लाल कड़ा), दाउदी (उत्तम, नरम और श्वेत), मुँगेरी, मुँड़ियाँ (बिना टूँड का नरम, सफेद), पिसी (बहुत नरम और सफेद), कठिया (कड़ा और लसदार), बंसी (कड़ा और लाल) । भारतबर्ष में जितने गेहूँ बोए जाते हैं वे अधिकांश टूँडदार हैं क्योंकि किसान कहते हैं कि बिना टूँड के गेंहुँओं को चिड़ियाँ खा जाती हैं । दाऊदी गेहूँ सबसे उत्तम समझा जाता है । जललिया की सूजी अच्छी होती है । बंबई प्रांत में एक प्रकार का बखशी गेहूँ भी होता है । खपली या जवगोधी नाम का बहुत मोटा गेहूँ सिंध से लेकर मैसूर तक होता है । इसमें विशेषता यह है कि यह खरीफ की फसल है और सब गेहूँ रबी की फसल के अंतर्गत हैं । यह खराब जमीन में भी हो सकता है ओर इसे उत्पन्न करन में उतना परिश्रम नहीं पड़ता । भारतवर्ष में गेहूँ के तीन प्रकार के़ चूर्ण बनाए जाते हैं, मैदा, आटा और सूजी । मैदा बहुत महीन पीसा जात है और सूजी के बड़े बड़े रवे या कणा होते हैं । नित्य के व्यवहार में रोटी बनाने के काम में आटा आता है, मैदा अधिकतर पूरी, मिठाई आदि बनाने के काम में आता है, सूजी का हलवा अच्छा होता है । पर्या॰—गोधूम । बहुदुग्ध । अरूप । म्लेच्छभोजन । यवन । निस्तुष । क्षीरी । रसाल । शुमन ।

यह भी देखिए[सम्पादन]