गोभी

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

  1. एक प्रकार का सब्जी

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

गोभी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ गोजिह्वा (= बनगोभी) या गुम्भ (= गुच्छा)] एक प्रकार की घास, जिसके पत्ते लंबे, खरखरे, कटावदार और फूलगोभी के पत्तों के रंग के होतो हैं । गोजिया । बनगोभी । विशेष—इसमें पीले रंग के चक्राकार फूल लगते हैं और पत्तों के बीच में एक बाल निकलती है । इसे पशु बड़े चाव से खाते हैं । वैद्यक में यह शीतल, कडुई, हलकी, वातकारक और कफ, पित्त, खाँसी, रुधिरविकार, अरुचि, फोड़ा, ज्वर और सब प्रकार के विष का दोष दूर करनेवाली मानी गई है ।

गोभी ^२ संज्ञा स्त्री॰ [अं॰ कैबेज] एक प्रकार का शाक । विशेष—इसकी खेती इधर कुछ दिनों भारत में अधिकता से होने लगी है । वनस्पति शास्त्र के ज्ञाता इसके क्षुप को रोई या सरसों की जाति का मानते हैं । यह तीन प्रकार की होती है—फूल गोभी, गाँठगोभी (दे॰ 'गाँठगोभी' ) और पातगोभी या करमकल्ला (दे॰ 'करमकल्ला') । फूलगोभी को साधारणतः गोभी ही कहते हैं । इसका डंठल, जो जमीन में गड़ा होता है, साधारण गन्ने के बराबर मोटा होता है और एक बालिश्त या इससे कुछ अधिक लंबा होता है । इसके ऊपर चारो ओर चौडे मोटे और बड़े पत्ते होते हैं जिनके बीच में बहुत छोटे छोटे मुँहबँधे फूलों का गुथा हुआ समूह रहता है । खिले हुए फूलोंवाली गोभी खराब समझी जाती है । यह कार्तिक के अंत तक तैयार हो जाती है और जाड़े भर रहती है । इसके फूल की तरकारी बनती है और मुलायम पत्तों का साग बनाया जाता है । यह सुखाकर भी पखी जाती है और दूसरी ऋतुओं में काम आती है ।

३. पौधों का गोभ नामक एक रोग ।

गोभी संज्ञा पुं॰ [सं॰ गोमिन्]

१. श्रृगाल । सियार । गीदड़ ।

२. पृथ्वी ।—(डिं॰) ।