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गोमूत्रिका

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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गोमूत्रिका संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. एक प्रकार का चित्रकाव्य जिसके अक्षरों को पढ़ने में उस क्रम से चलते हैं, जिस क्रम से बैलों के मूतने से बनी हुई रेखा जमीन पर गई रहती है । विशेष—इस चित्रकाव्य के पढ़ने का क्रम यह है कि पहली पंक्ति का एक अक्षर पढ़कर फिर दूसरी पंक्ति का दूसरा, फिर पहली का तीसरा, फिर दूसरी का चौथा फिर पहली का पाँचवाँ और दूसरी का छठा और फिर आगे इसी क्रम से पढ़ते चलते हैं । ऐसी कविता के पद बनाने में यह आवश्यक होता है कि उनके पहले और दूसरे (और आवश्यकता पड़ने पर तीसरे, चौथे और पाँचवें, छठे आदि ) चरणों के दूसरे, चौथे, छठे आठवें दसवें, बारहवें, चौदहवें और सोलहवें (और यदि चरण आधिक लंबा हो तो संमसंख्या पर पड़नेवाले सभी) अक्षर एक हों । इसे बरधामूतन भी कहते हैं ।

२. एक प्रकार की घास जिसके बीज सुगंधित होते हैं और जो औषध के काम में आती है । वैद्यक में इसे मधुर, वीर्यवर्धक और गौओं का दूध बढानेवाली कहा है । पर्या॰—रक्ततृणा । क्षेत्रजा । कृष्णभूमिजा ।

३. कौटिल्य कतित सर्पसारी नामक व्यूह ।

४. पीतमणि जिसका रंग लाली लिए पीला होता है (को॰) ।

५. शीतल चीनी (को॰) ।