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गौड़ी

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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गौड़ी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ गौडी]

१. एक प्रकार की मदिरा जो गुड़ से बनती है । वैद्यक में इसे वात और पित्तनाशक, बल और कांतिवर्द्धक, दीपन, पथ्य और रुचिकर कहा है ।

२. काव्य में एक प्रकार की रीति या वृत्ति जिसे परुषा भी कहते हैं । यह ओजगुणप्रकाशक मानी जाती है और इसमें टवर्ग, संयुक्त अक्षर अथवा समास अधिक आते हैं; जैसे,—(क) कटकटहिं मर्कट विकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) वक्र वक्र करि पुच्छ करि रुष्ट ऋच्छ कपि गुच्छ । सुभट ठट्ट धन धट्ठ सम मर्दहि रच्छन तुच्छ- (शब्द॰) ।

२. संपूर्ण जाति की एक रागिनी जो रात के पहले पहर में गाई जाती है । विशेष—कुछ लोग इसे कल्याण राग का एक भेद मानते हैं । यह वीर और श्रृंगार रस के वर्णन के लिये बहुत उपयुक्त होती है ।