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चर्चरिका

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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चर्चरिका संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. चर्चरी ।

२. नाटक में वह गान जो किसी एक विषय की समाप्ति और जवनिकापात होने पर और किसी दूसरी विषय के आरंभ होने और जवनिका उठने से पहले होता रहता है । इसी बीच में पात्र तैयार होते रहते हैं और दर्शकों के मनोरंजन के लिये यह गान होता है । विशेष—(क) कालिदास के विक्रमोर्वशी नाटक में अनेक चर्चरि- काएँ हैं । (ख) आधुनिक नाटकों में केवल किसी अंक की समाप्ति पर ही पात्रों को तैयार होने का समय मिलता है । गर्भांक या दृश्य की समाप्ति पर दूसरा अंक आरंभ होने से पहले जो गान होता है वह भी चर्चरिका ही है ।