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चितभंग

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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चितभंग संज्ञा पुं॰ [सं॰ चित्त + भंग]

१. ध्यान न लगाना । उचाट । उदासी । उ॰—(क) मेरो मन हरि चितवन समझानो । यह रसमगन रहति निसि बासर हार जीत नहिं जानो । सूरदास चितभंग होत क्यो जो जेहि रूप समानो ।—सूर (शब्द॰) । (ख) कमल, खंजन, मीन मधुकर होत है चितभंग ।—सूर (शब्द॰) । (ग) देव मान मन भंग चितभंग मद क्रोध लोभादि पर्वत दुर्ग भुवन भर्ता ।—तुलसी (शब्द॰) ।

२. बुद्धि का लोप । होश का ठिकाने न रहना । मतिभ्रम । भौचक्का- पन । चकपकाहट ।