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चैतन्यघन

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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चैतन्यघन संज्ञा पुं॰ [सं॰] चैतन्य रुप परमात्मा । उ॰— सर्वदिस सब काल, पुरि रहयौ चैतन्यधन । सदा एकरस चाल, बंदन वा परब्रह्म कौ । — ब्रज॰ ग्रं॰ , पृ॰ १०६ ।