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चौँर

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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चौँर संज्ञा पुं॰ [ सं॰ चामर ]

१. सुरों या चौंरी मृग (= चामर मृग ) गाय की पूँछ के बालों का गुच्छा जो एक डांडी में लगा रहता है और पिछे या बगल से राजा महाराजाओं या देव- मूर्तियों के सिरों पर इसलिये हिलाया जाता है जिसमें मक्खियाँ आदि न बैठने पावें । चँवर ।दे॰ 'चँवर' । क्रि॰ प्र॰—करना ।—डुलाना ।—होना । मुहा॰— चौंर ढलना = सिर पर चेँवर हिलाया जाना । चौंर ढालना = सिर पर चौंर हिलाना । चौंर ढुरना = दे॰ 'चौंर ढलना' । चौंर ढुराना =दे॰ 'चौंर ढालना' ।

२. भडभाँड की जड । सत्यानाशी की जड । चोक ।

३. पिंगल में मगण के पहले भेद (s) की संज्ञा । जैसे, श्री.... । ४ झालर । फुँदना । उ॰—(क) तैसइ चौंर बनाए औ घाले गल झंप । बँधे सेत गजगाह तहँ जो देखै सो कंप ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) बहु फूल की माल लपेटि के खंभन धूप सुगंध सो ताहि धुपाइए । तापै चहूँ दिसि चंद छपा से सुसोभित चौंर घने लटकाइए ।—हरिश्चंद्र (शब्द॰) ।