चौगान

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

चौगान संज्ञा पुं॰ [फा॰]

१. एक खेल जिसमें लकडी के बल्ले से गेंद मारते हैं । यह घोडे पर चढ़कर भी खेला जाता है । यह खेल हाकी या पोलो नामक अँगरेजी खेलों के ही समान होता है । उ॰—(क) ते तव सिर कुंदंक सम नाना । खेलिहहिं भालु कीस चौगाना ।—मानस ६ । २ । (ख) श्री मोहन खेलत चोगान । द्वारावती कोट कंचन में रच्यो रूचिर मैदान । यादव बीर बराई बटाई इक हलधर इक आपै ओर । निकसै सबै कुँवर असवारी उच्चैश्रवा के पोर । लीले सुरँग, कुमैत श्याम तेहि पर दै सब मन रंग ।—सूर (शब्द॰) ।

२. चौगान खेलने का लकडी जो आगे की ओर टेढी या झुकी होती है । उ॰—(क) कर कमलनि विचित्र चौगाने खेलन लगे खेल रिझए ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) लै चौगान बटा करि आगे प्रभु आए जब बाहर । सूर श्याम पूछत सब ग्वालन खेलैगे केहि ठाहर । सूर (शब्द॰) ।

३. चौगान खेलने का मैदान । उ॰—अंत: पुर चौगान लौं निकसत कसमस होई । नरनार ी धावत सुख छावत पूछत कोउ नहिं कोइ ।—रघुराज (शब्द॰) ।

४. नगाडा बजाने की लकड़ी