छरना
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]छरना ^१ क्रि॰ अ॰ [सं॰ क्षरण, प्रा॰ छाँरण]
१. चूना । बहना । टपकना । झरना । उ॰—ऊँची अटा घटा इव राजाहिं छरति छटा छिति छोरैं ।—रघुराज (शब्द॰) । संयो॰ क्रि॰—जाना ।
२. चकचकाना । चुचुवाना । उ॰—बिथुरी अलक, शिथिल कटि होरी नखछत छरितु मरालगामिनी ।—सूर (शब्द॰) ।
३. छँटना । दूर होना । न रह जाना । उ॰—जब हरि मुरली अधर धरत । थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं जमुना जल न बहत खग । मोहैं, मृगजूथ भुलाहीं, निरखि बदन छवि छरत ।—सूर॰, १० । ६० । चावल का फटककर साफ किया जाना ।
५. छँटकर अलग होना । दूर होना । उ॰— जेहि जेहि मग सिय राम लषन गए तहँ तहँ नर नारि बिनु छट छरिगे ।—तुलसी (शब्द॰) ।
छरना ^२ † क्रि॰ स॰ [स॰क्षरण] कन्ना अलग करने के लिये चावल को फटककर साफ करना । दे॰ 'छड़ना' ।
छरना ^३ क्रि॰ अ॰ [हिं॰ छलना] भूत प्रेत आदि द्वारा मोहित होना । संयो॰ क्रि॰—जाना ।
छरना पु ^४ क्रि॰ स॰ [हिं॰ छलना]
१. छलना । धोखा देना । ठगना । उ॰—जोगी कौन बड़ी संकर तैं, ताकौं काम छरै ।—सूर॰ १ । ३५ ।
२. मोहित करना । लुभाना । उ॰— तूँ काँवरू पराबस टोना । भूला योग छरा तोहि सोना ।— जायसी (शब्द॰) ।