छीप
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]छीप ^१ वि॰ [सं॰ क्षिप्र] तेज । वेगवान् । उ॰—सात दीप नृप दीप छीप गति चहत समर सरि ।—गोपाल (शब्द॰) ।
छीप ^३ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ शुक्ति, हिं॰ सीप] दे॰ 'सीप' । उ॰—(क) सब तरवर चंदन नहीं सब कदली न कपूर । सब छीपन मुकता नहीं, सब दल नाहिन सूर ।—रस र॰, पृ॰ २२३ । (ख) छीप रूपहि करी परकासा । स्वाति रूप इच्छा नीवासा ।—कबिर सा॰, पृ॰ ९३ ।
छीप ^३ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ छाप]
१. छाप । चिह्व । दाग ।
३. वह दाग या धब्बा जो छोटी छोटी बिंदियों के रूप में शरीर पर पड़ जाता है । सेहुआँ । एक प्रकार का चर्म रोग ।
छीप † ^४ संज्ञा पुं॰ [सं॰ क्षप, या क्षय] आक्रमण । नाश । बिनाश । उ॰—छीप करै दल दुज्जणां जीप खड़ो रण जंग ।—रा॰ रू॰, पृ॰ २३२ । क्रि॰ प्र॰—करना ।—होना ।
छीप ^५ संज्ञा स्त्री॰ [देश॰] वह छड़ी जिसमें डोरी बाँधकर मछली फँसाने की कँटिया लगाई जाती है । डगन । बंसी ।
२. एक पेड़ का नाम जिसके फल की तरकारी होती है । इसे खीप और चीप भी कहते हैं ।