छेव
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]छेव ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ छेद, प्रा॰ छेव]
१. काटने, छीलने आदि के लिये किया हुआ आघात । वार । चोट । उ॰—तबै मेव यह कही बीर ठाढो । अब नहिं जीवत जाइलोह करिहौं रन गाढो । सुनत राव ह्वै क्रुद्ध जुद्ध में तेगहि झारी । तहीं मेव गहि छेव तुरंगम ते गहि डारी । भू परच्य़ो परी ह्वै तीन असि बडगुजर के अंग पर । लियो सीस काटि साथी सहित राव रुंड सोयो समर ।—सूदन (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—चलाना ।—मारना ।—लगना ।—लगाना ।
२. वह चिन्ह काटने छीलने आदि से पडे । जखम । घाव । जैसे,—उसने इस पेड में कुल्हाडी से कई छेव लगाए हैं । उ॰— अरिन के उर मोहिं कीन्ह्यो इमि छेव है ।—भूषण (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—लगना ।—लगाना ।—पडना । मुहा॰—छल छेव = कपट व्यवहार । कुटिलता का दाँव पेंच । छल छिद्र । उ॰—जानत नहीं कहाँ ते सीखे चोरी के छल छेव ।—सूर (शब्द॰) ।
३. आनेवाली आपत्ति । होनहार । दुःख ।
४. किसी दुष्कर्म या क्रुर ग्रह आदि के प्रभाव से होनेवाला अनिष्ट । क्रि॰ प्र॰—उतरना ।—छूटना ।—टलना ।—मिटना ।
छेव ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰] दे॰ 'टेव' ।
छेव ^३ संज्ञा पुं॰[देशी छेअ] अत । समाप्ति । पर्यत । छोर ।