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जञ्जीर

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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जंजीर संज्ञा स्त्री॰ [फा़॰ जंजीर] [वि॰ जंजीरी]

१. साँकल । सिकड़ी । कड़ियों की लड़ी । जैसे, लोहे की जंजीर । उ॰— तुम सु छुड़ावहु मंत कहु, बहुरि जरहु जंजीर ।—पु॰ रा॰, ६ ।१६२ । ।

२. बेड़ी । मुहा॰—जंजीर डालना = पैर में बेड़ी डालना । बाँधना । बंदी करना । पैर में जंजीर पड़ना = (१) जंजीर में जकड़ा जाना । बंदी होना । (२) स्वच्छंदता का अपहरण होना । वाथा या विवशता । उ॰—प्रीतम बसंत पहार पर, हम जमुना के तीर । अब तो मिलना कठिन है, पाँव परी जंजीर ।—(शव्द) ।

३. किवाड़ की कुंडी या सिकड़ी । मुहा॰—जंजीर बजाना = कुंडौ खटखटाना । जंबीर लगाना = कुंड़ी बंद करना ।