ज्यामिति

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हिन्दी[सम्पादन]

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संज्ञा[सम्पादन]

ज्यामिति [स्त्री]

  1. गणित की शाखा, जो रेखाएँ और बहुभुज के बारे है

यह भी देखें[सम्पादन]

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ज्यामिति संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] वह गणित विद्या जिससे भूमि के परिमाण, भिन्न क्षेत्रों के अंगों आदि के परस्पर संबंध तथा रेखा, कोण, तल आदि का विचार किया जाता है । क्षेत्र, गणित । रेखागणित । विशेष—इस विद्या में प्राचीन यूनानियों (यवनों) ने बहुत उन्नति की थी । यूनान देश के प्राचीन इतिहासवेत्ता होरोडोटस के अनुसार ईसा से १३५७ वर्ष पूर्व सिसोस्ट्रिस के समय में मिस्त्र देश में इस विद्या का आविर्भाव हुआ । राजकर निर्धा— रित करने के लिये जब भूमि को नापने की आवश्यकता हुई तब इस विद्या का सूत्रपात हुआ । कुछ लोग कहते हैं कि नील नंद के चढ़ाव उतार के कारण लोयों की जमीन की हद मिट जाया करती थी, इसी से यह विद्या निकाली गई । इउक्लिड के टीकाकार प्रोक्लस ने भी लिखा है कि येल्स ने मिस्ञ में जाकर यह विद्या सीखी थी और यूनान में इसे प्रचलित की थी । धीरे धीरे यूनानियों ने इस विद्या में बडी़ उन्नति की । पाइथागोरस ने सबसे पहले इसके संबंध में सिद्धांत स्थिर किए और कई प्रतिज्ञाएँ निकालीं । फिर तो प्लेटो आदि अनेक विद्वान् इस विद्या के अनुशीलन में लगे । प्लेटो के अनेक शिष्यो ने इस विद्या का विस्तार किया जिनमें मुख्य अरस्तू (एरिस्टाटिल) और इउडोक्सस थे । पर इस विद्या का प्रधान आचार्य इउक्लिड (उकलैदस) हुआ जिसका नाम रेखागणित का पर्याय स्वरुप हो गया । यह ईसा से २८४ वर्ष पूर्व जीवित था और इसकंदरिया (अलेग्जैंड्रिया, जो मिस्ञ में है) के विद्यालय में गणित की शिक्षा देता था । वास्तव में इउक्लिड ही यूरप में ज्यामिति विद्या का प्रतिष्ठापक हुआ है और इसकंदरिया ही इस विद्या का केंद्र या पीठ रहा है । जब अरबवालों ने इस नगर पर अधिकार किया तब भी वहाँ इस विद्या का बड़ा प्रचार था । प्राचीन हिंदू भी इस विद्या में बहुत पहले अग्रसर हुए थे । वैदिक काल में आर्यों को यज्ञ की वेदियों के परिमाण, आकृति आदि निर्धारित करने के लिये इस विद्या का प्रयोजन पड़ा था । ज्यामिति का आभास शुल्वसूत्र, कात्यायन श्रोतसूत्र, शतपथ ब्राह्मण आदि में वेदियों के निर्माण के प्रकरण में पाया जाता है । इस प्रकार यद्यपि इस विद्या का सूत्रपात भारत में ईसा से कई हजार वर्ष पहले हुआ पर इसमें यहाँ कुछ उन्नति नहीं की गई । यूनानियों के संसर्ग के पीछे ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य के ग्रंथों में ही ज्यामिति विद्या का विशेष विवरण देखा जाता है । इस प्रकार जब हिदुओं का ध्यान यवनों के संसर्ग से फिर इस विद्या की ओर हुआ तब उन्होंने उसमें बहुत से नए निरुपण किए । परिधि और ध्वास का सूक्ष्म अनुपात ३ १४१९ : १ भास्कराचार्य को विदित था । इस अनुपात को अरबवालों ने हिंदुओं से सीखा, पीछे इसका प्रचार यूरप में (१२ वीं शताब्दी के पीछे) हुआ ।