झझकना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

झझकना क्रि॰ अ॰ [अनु॰]

१. किसी प्रकार के भय की आशंका से अकस्मात् किसी काम से रुक जाना । अचानाक डरकर ठिठकना । बिदकना । चमकना । भड़कना । उ॰—(क) कबहुँ चुंबन देत आकर्षि जिय लेत करति बिन चेत सब हेत अपने । मिलति भुज कंठ वै रहति अंग लटकि कै जात दुख दुर ह्वँ झझकि सपने ।—सूर (शब्द॰) । (ख) छाले परिबे के डरन सकै न हाथ छुवाइ । झझकति हियहिं गुलाब के झँवा झँवावति पाइ ।—बिहारी (शब्द॰) । संयो॰ क्रि॰—उठना ।—जाना ।—पड़ना ।

२. झुँझलाना । खिजलाना ।

३. चौंक पड़ना । उ॰— जसुमति मन मन यहै विचारति । झझकि उठयौ सोवत हरि अवहीं कछु पढ़ि पढ़ि तन दोष निवारति ।—सूर॰, १० ।२०० ।

३. संकुचित होना । झिझकना । उ॰— अति प्रतिपाल कियौ तुम हमरौ सुनत नंद जिय झझकि रहे ।— सूर॰, १० ।३११२ ।

झझकना पु क्रि॰ अ॰ [अनु॰] झाँझ बाजे का बजना । झाँझ की ध्वनि होना । उ॰—झंझ झझक्कत उठत तरंग रंग, आरि उच्चारहिं दंद दंद मिरदंग ।—माधवानल॰, पृ॰ १९४ ।