झुरना
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]झुरना क्रि॰ अ॰ [हिं॰ धूल या चूर]
१. सूखना । खुश्क होना । दे॰ 'झुराना' । उ॰— हाड़ भई झुरि किंगड़ी नसें भई सब ताँति । रोंव र्रोंव तन धुन उठें कहौं विथा केहि भाँति ।— जायसी (शब्द॰) ।
२. बहुत अधिक दुःखी होना या शोक करना । उ॰— (क) साँझ भई झुरि झुरि पथ हेरी । कौन धौं घरी करी पिय फेरी ।— जायसी (शब्द॰) ।(ख) इनका बोझ आपके सिर है; आप इनकी खबर न लेंगे तो संसार में इनका कहीं पता न लगेगा । वे बेचारे यो हो झुर झुर कर मर जायँगे ।— श्रीनिवासदास (शब्द॰) ।
३. बहुत अधिक चिंता, रोग या परिश्रम आदि के कारण दुर्बल होना । घुलना । उ॰— (क) ये दोऊ मेरे गाइ चरैया । जानि परत नहिं साँच झुठाई चारत धेनु झुरैया । सूरदास जसुदा मैं चेरी कहि कहि लेति बलैया ।— सूर॰, १० ।५१३ । (क) सूनौ कै परम पद, ऊनो कै अनंत मद नूनौ कै नदीस नद इंदिरा झुरै परी ।—देव (शब्द॰) । संयो॰ क्रि॰ —जाना । पड़ना (क्व॰) । — पु परना । उ॰— सिद्धिन की सिद्धि दिगपालन की रिद्धि वृद्धि वेधा की समृद्धि सुरसदन झुरै परीं ।— रघुराज (शब्द॰) ।