टसर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

टसर संज्ञा पुं॰ [सं॰ टसर]

१. एक प्रकार का कड़ा और मोटा रेशम जो बंगाल के जंगलों में होता है । विशेष—छोटा नागपुर, मयूरअंज, बालेश्वर, बीरभूम, मेदिनीपुर आदि के जंगलों में साखू बहेड़ा, पियार, कुसुम, बेर इत्यादि वृक्षों पर टसर के कीड़े पलते हैं । रेशम के कीड़ों की तरह इन कीड़ों की रक्षा के लिये अधिक यत्न नहीं करना पड़ता । पालनेवालों को जंगल में आप से आप होनेवाले कीड़ों को केवल चीटियों और चिड़ियों आदि से बचाना भर पड़ता है । पालनेवाले इनकी बृद्धि के लिये कोश से निकले हुए कीड़ों को जंगल में छोड़ आते हैं । जहाँ अपने जोड़े ढूँढ़कर वे अपनी वृद्धि करते हैं । मादा कीड़े पेड़ की पत्तियों पर सरसों के ऐसे पर चिपटे चिपटे अंडे देते हैं जो पत्तियों में चिपक जाते हैं । एक कीड़ा तीन चार दिन के भीतर दो ढाई सौ तक अंडे देता है । अंडे देकर ये कीड़े मर जाते हैं । दस बारह दिनों में इन अंडों से सूंटी या ढोल के आकार के छोटे छोटे कीड़े निकल आते हैं और पत्तियाँ चाट चाटकर बहुत जल्दी बढ़ जाते हैं । इस बीच में ये तीन चार बार कलेवर या खोली बदलते हैं । अधिक से अधिक पंद्रह दिन में ये कीड़े अपनी पूरी बाढ़ को पहुंच जाते हैं । उस समय इनका आकार ८, १० अंगुल तक होता है । ये यटमैले, भूरे, नीले, पीले कई रंगों के होते हैं । पूरी बाढ़ को पहुँचने पर ये कीड़े कोश बनाने में लग जाते हैं और अपने मुँह से एक प्रकार की लार निकालते है जो सूखकर सूत के रूप में हो जाती हैं । सूत निकालते हुए घूम घूम कर ये अपने लिये एक कोश तैयार कर लेते हैं और उसी में बंद हो जाते हैं । ये कोश अंडाकार होते हैं । बड़ा कोश ६— ६ १/२ अंगुल तक लंबा होता है । कोश के भीतर तीन चार दिनों तक सूत निकालकर ये कीड़े मुरदे की तरह चुप- चाप पड़ जाते हैं । पालपेदाले कोशों के पकने पर उन्हें इकट्ठा कर लेते हैं; क्योंकि उन्हें भय रहता है कि पर निकलने पर कीड़े सूत को कुतर कुतरकर निकल जायँगे; अत:उड़ने के पहले ही इन कोशों को क्षार साथ गरम पानीं में उबालकर वे कीड़ों को मार डालते हैं । जिन कोशों को उबालना नहीं पड़ता, उनका टसर सबसे अच्छा होता है ।