टाँक

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

टाँक ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ टङ्क]

१. एक प्रकार की तौल जो चार माशे की ( किसी किसी के मत से तीन माशे की) होती है । इसका प्रचार जौहरियों में है ।

२. धनुष की शक्ति की परीक्षा के लिये एक तौल जो पचीस सेर की होती थी । विशेष—इस तौल के बटखरे को धनुष की डोरी में बाँधकर लटका देते थे । जितने बटखरे बाँधने से धनुष की डोरी अपने पूरे संधान या खिंचाव पर पहुंच जाती थी, उतनी टाँके का, वह धनुष समझा जाता था । जैसे,— कोई धनुष सवा टांक का, कोई डेढ टाँक का, यहाँ तक कि कोई तो या तीन टाँक तक होता था जिसे अत्यंत बलवान पुरुष ही चढ़ा सकते थे ।

३. जाँच । कूत । अंदाज । आँक ।

४. हिस्सेदारों का हिस्सा । बखरा ।

५. एक प्रकार का छोटा कटोरा । उ॰—घीउ टाँक मँह सोध सेरावा । लौंग मिरिच तेहि ऊपर नावा ।—जायसी (शब्द॰) ।

टाँक ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ टाँकना]

१. लिखावट । लिखने का अंक या चिह्न । लिखन । उ॰—छतौ नेह कागर हिये भई लखाय न टाँक । विरह तज्यो उघरयो सु अब सेंहुड़ को सो आँक ।— बिहारी (शब्द॰) ।

२. कलम की नौक । लेखनी का डंक । उ॰—हरि जाय चेत चित सूखि स्याही झरि जाय, बरि जाय कागद कलम टाँक जरि जाय ।—रघुनाथ (शब्द॰) ।