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टेढा़

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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टेढा़ वि॰ [सं॰ तिरस्( = टेढा़)] [वि॰ स्त्री॰ टेढी़]

१. जो लगातार एक ही दिशा को न गया हो । इधर उधर झुका या घूमा हुआ । फेर खाकर गया हुआ । जो सीधा न हो । वक्र । कुटिल जैसे, टेढी़ लकीर, टेढी़ छडी़, टेढा़ रास्ता । यौ॰—टेढा़ मेढा़ = जो सीधा और सुडौल न हो । टेढा़ बाँका = नोक झोंक का । बना ठना । छैल चिकनिया । मुहा॰—टेढी़ चितवन = तिरछी चितवन । भावभरी दृष्टि ।

२. जो अपने आधार पर समकोण बनाता हुआ न गया हो । जो समानांतर न गया हो । तिरछा ।

३. जो सुगम न हो । कठिन । बेंडा़ । फेरफार का । मुश्किल । पेंचीला । जैसे, टेढा़ काम, टेढा़ प्रश्न, टेढा़ मामला । उ॰—मगर शेरों का मुकाविला जरा टेढी़ खीर है ।—फिसाना॰, भा॰ ३, पृ॰ २४ । मुहा॰—टेढी़ खीर = मुश्किल काम । कठिन कार्य । दुष्कर कार्य । विशेष—इस मुहा॰ के संबंध में लोग एक कथा कहते हैं । एक आदमी ने एक अंधे से पूछा 'खीर खाओगे ?' । अंधे ने पूछा 'खीर कैसी होती है ?' उस आदमी ने कहा 'सफेद' । फिर अंधे ने पूछा 'सफेद कैसा ?' । उसने उत्तर दिया 'जैसा बगला होता है ?' इसपर उस आदमी ने हाथ टेढा़ करके बताया । अंधे ने कहा—'यह तो टेढी़ खीर है, न खाई जायगी' ।

४. जो शिष्ट या नभ्र न हो । उद्धत । उग्र । उजड्ड । दुःशील । कोपवान् । जैसे, टेढा़ आदमी, टेढी़ बात । उ॰—टेढे़ आदमी से कोई नहीं बोलता ।—(शब्द॰) । महा॰—टेढा़ पड़ना या होना = (१) उग्र रूप धारण करना । जैसे,—कुछ टेढे़ पडो़गे तभी रुपया निकलेगा, सीधे से माँगने से नहीं । (२) अकड़ना । ऐंठना । टर्राना । जैसे,—वह जरा सी बात पर टेढा़ हो जाता है । टेढी़ आँख से देखना = क्रूर दृष्टि करना । शत्रुता की दृष्टि से देखना । अनिष्ट करने का विचार करना । बुरा व्यवहार करने का विचार करना । टेढी़ आँखें करना = कुपित दृष्टि करना । क्रोध की आकृति बनाना । बिगड़ना । टेढी़ सीधी सुनाना = ऊँची नीची सुनाना । खरी खोटी सुनाना । भला बुरा कहना । टेढी़ सुनाना = दे॰ 'टेढी़ सीधी सुनाना' ।