ढार

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ढार ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ धार या सं॰ अवधार * प्रा॰ ओढार > ढार]

१. वह स्थान जो बराबर क्रमशः नीचा होता गया हो और जिसपर से होकर कोई वस्तु नीचे फिसल या बह सके । उतार । उ॰— सकुच सुरत आरंभ ही बिछुरी लाज लजाय । ढरकि ढार डुरि ढिग भई ढीठ ढिठाई आय ।— बिहारी (शब्द॰) ।

२. पथ । मार्ग । प्रणाली । उ॰—(क) सब ह्वै आवैं अवधे ड़ार । मीत मिलन दुर्लभ संसार ।— नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ २३९ । (ख)ढेर डार तेही ढरल, दूजे ढार ढरै न । क्यों हूँ आनन आन सौ नैना लागत नैन ।— बिहारी (शब्द॰) ।

३. प्रकारं । ढाँचा । ढंग । रचना । बनावट । उ॰—(क) दृग धरकौहें अधखूले, देह धकोंहैं ढार । सुरति सूखी सी देखियत, दुखित मरम के भार ।—बिहारी (शब्द॰) । (ख) तिय को मुख सुंदर बन्यो, बिधि फेयो परगार । तिलन बीच कौ बिंदु है, गाल गोल इक ढार— मुबारक (शब्द॰) ।

ढार ^२ संज्ञा स्त्री॰

१. ढाल के आकार का कान में पहनने का एक गहना । बिरिया ।

२. पछेली नामक गहना ।

ढार ^३ संज्ञा स्त्री॰ [अनु॰] रोने का घोर शब्द । आर्तनाद । चिल्लाकर रोने की ध्वानि । मुहा॰— ढार मारना या ढार मारकर रोना = आर्तनाद करना । चिल्ला चिल्लाकर रोना ।