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ढोरना

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शब्दसागर

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ढोरना पु † क्रि॰ स॰ [हिं॰ ढारना]

१. पानी या और कोई द्रव पदार्थ गिराकर बहाना । ढरकाना । ढालना उ॰— (क) रीते भरै, भरे पुनि ढोरै, चाहै फेरि भरै । कबहुँक तृण बूड़ै़ पानी मैं कबहूँ शिला तरै ।—सूर (शब्द॰) । (ख) जननी अति रिस जानि बधायो चितै वदन लोचन जल ढोरै ।— सूर (शब्द॰) । (ग) वै अक्रूर कूर कृत जिनके रीते भरे भरे गहि ढोरे ।— सूर (शब्द॰) ।

२. लुढ़काना ।

३. फेरना । ड़ालना । उ॰— यमुनाप्रासाद ने आँखें ढीरी । कहा,'पहलवाना, मामला हमारा नहीं और अव बिलकुल वक्त नहीं रहा' ।— काले॰, पृ॰ ४१ ।

४. डुलाना । हिलाना । उ॰— (क) चँवर चारु ढोरत ह्वै ठैढ़ी ।— नंद ग्रं॰, पृ॰ २१३ । (ख) लैकर वाउ विजन कर ढोरौ ।— रसरतन, पृ॰ २१५ । (ग) पान खवावत चरन पलोटत ढोरत बिजन चौर ।— भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ २, पृ॰ ५९९ ।

५. नम्र करना । नमाना । नीचा करना । उ॰— औसी बचनु सुन्यो सुलितान । सीसु ढोरि कै मूँदे कान ।— छिताई॰, पृ॰ ९१ ।